# OneShot : Complete Modern History | आधुनिक भारत का इतिहास  For SSC, UPSC, Railways & State PCS exams

https://www.youtube.com/watch?v=gkEFXeuCVRg
Translation: en

[00:00] नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका वनशॉट एसएससी पर।
  Hello friends, welcome to Oneshot SSC.

[00:05] आज के इस वीडियो में हम कंप्लीट मॉडर्न हिस्ट्री को डिटेल में कवर करेंगे जो सभी प्रकार के गवर्नमेंट एग्जाम्स के लिए बहुत ही ज्यादा फायदेमंद होगा।
  In today's video, we will cover complete modern history in detail, which will be very beneficial for all types of government exams.

[00:11] तो चलिए शुरू करते हैं।
  So let's begin.

[00:14] इस कहानी को समझने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं।
  To understand this story, let's go back a little.

[00:16] भारत तो हमेशा से व्यापार का केंद्र था।
  India has always been a center of trade.

[00:18] सोने की चिड़िया यूं ही नहीं कहलाता था।
  It was not called the golden bird for nothing.

[00:20] बिल्कुल।
  Absolutely.

[00:21] यूरोप तक भारतीय सामान खासतौर पर मसाले सदियों से पहुंच रहे तो फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि पुर्तगाल और स्पेन जैसे देशों को एक बिल्कुल नया खतरनाक समुद्री रास्ता खोजना पड़ा।
  Indian goods, especially spices, had been reaching Europe for centuries, so what suddenly happened that countries like Portugal and Spain had to find a completely new dangerous sea route.

[00:32] क्या पुराने रास्ते बंद हो गए थे?
  Were the old routes closed?

[00:33] पुराने रास्ते कह सकते हैं कि बंद नहीं हुए थे।
  One can say that the old routes were not closed.

[00:35] उन पर कब्जा हो गया था।
  They had been captured.

[00:37] अच्छा।
  Okay.

[00:37] सदियों से भारत और यूरोप के बीच व्यापार के दो मेन रास्ते थे।
  For centuries, there were two main trade routes between India and Europe.

[00:40] एक था फारस की खाड़ी से और दूसरा लाल सागर से।
  One was from the Persian Gulf and the other from the Red Sea.

[00:44] और इनमें से ज्यादातर व्यापार फारस की खाड़ी वाले रास्ते से होता था।
  And most of this trade used to happen through the Persian Gulf route.

[00:48] हां, वो ज्यादा चलता था।
  Yes, that was used more.

[00:49] लेकिन फिर अचानक एक बड़ी घटना हुई जिसने सब कुछ बदल दिया।
  But then suddenly a major event happened that changed everything.

[00:51] साल था 1453।
  The year was 1453.

[00:55] 1453 में तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया पर कब्जा कर लिया और ऑटोमन साम्राज्य की स्थापना की।
  In 1453, the Turks captured Constantinople and established the Ottoman Empire.

[01:00] इसके कारण यूरोप से भारत तक
  Because of this, from Europe to India

[01:02] का जो पुराना जमीनी और समुद्री व्यापार मार्ग था वो एक तरह से बंद हो गया।
  The old land and sea trade route was, in a way, closed.

[01:07] अब यूरोपीय व्यापारियों के लिए भारत पहुंचना लगभग असंभव सा हो गया था।
  Now, it had become almost impossible for European traders to reach India.

[01:12] और इसका सीधा असर पड़ा होगा कीमतों पर।
  And this must have had a direct impact on prices.

[01:13] खासकर मसालों की पुर्तगाल जैसे देशों में तो महंगाई बहुत बढ़ गई होगी।
  Especially for spices in countries like Portugal, inflation must have increased a lot.

[01:18] हां, क्योंकि जो थोड़ा बहुत व्यापार होता भी था, उस पर अरब और इटली के व्यापारियों का एकाधिकार था।
  Yes, because whatever little trade was happening, it was monopolized by Arab and Italian merchants.

[01:23] मतलब मोनोपोली।
  Meaning, a monopoly.

[01:25] वो भारत से सामान खरीदते थे और यूरोप में कई गुना ज्यादा कीमत पर बेचते थे।
  They used to buy goods from India and sell them in Europe at many times the price.

[01:30] इसी एकाधिकार को तोड़ने और सीधे भारत से व्यापार करके भारी मुनाफा कमाने के लिए एक नए समुद्री मार्ग की खोज जिसे भौगोलिक खोज कहा गया वो शुरू हुई।
  To break this monopoly and to earn huge profits by trading directly with India, the search for a new sea route, called the Age of Discovery, began.

[01:39] अच्छा मकसद साफ था।
  Okay, the motive was clear.

[01:42] बिचोलियों को हटाओ।
  Remove the middlemen.

[01:42] सीधे भारत पहुंचो और व्यापार पर कब्जा करके बेशुमार दौलत कमाओ।
  Reach India directly, capture the trade, and earn immense wealth.

[01:45] एक नए रास्ते की खोज शुरू हुई।
  The search for a new route began.

[01:48] लेकिन वास्कोडि गामा कहानी में सीधे नहीं आते।
  But Vasco da Gama doesn't come directly into the story.

[01:50] उनसे पहले भी कुछ साहसी कोशिशें हुई थी।
  There were some courageous attempts even before him.

[01:54] हां, सबसे पहली बड़ी कोशिश 1488 में हुई।
  Yes, the first major attempt happened in 1488.

[01:57] बार्थोलोमियो डियाज़ नाम का एक पुर्तगाली नाविक था।
  There was a Portuguese navigator named Bartolomeu Dias.

[02:00] हम वो अफ्रीका के दक्षिणी छोर तक पहुंचने में कामयाब रहा।
  He succeeded in reaching the southern tip of Africa.

[02:02] उसने उस जगह का नाम केप
  He named that place Cape

[02:05] ऑफ स्टॉर्म्स यानी तूफानों का अंतरीप रखा।
  It was named the Cape of Storms, meaning the cape of storms.

[02:08] क्योंकि वहां उसे एक भयानक समुद्री तूफान का सामना करना पड़ा था।
  Because there he had to face a terrible sea storm.

[02:12] जी लेकिन पुर्तगाल के राजा ने इसका नाम बदल कर केप ऑफ गुड होप यानी आशा का अंतरीप रख दिया
  Yes, but the King of Portugal changed its name to the Cape of Good Hope, meaning the cape of hope.

[02:17] क्योंकि अब उन्हें उम्मीद की एक किरण दिखी थी कि भारत का रास्ता मिल सकता है।
  Because now they saw a ray of hope that the way to India could be found.

[02:21] हां पर डियाज़ को इस तूफान की वजह से लौटना पड़ा
  However, Diaz had to turn back due to this storm.

[02:24] और फिर हुई इतिहास की सबसे मशहूर गलत मोड़ वाली घटना।
  And then happened the most famous wrong turn incident in history.

[02:29] आप क्रिस्टोफर कोलंबस की बात कर रहे हैं।
  You are talking about Christopher Columbus.

[02:31] 1492 में स्पेन की मदद से वो भारत खोजने के लिए पश्चिम की ओर निकला।
  In 1492, with the help of Spain, he set off westward to find India.

[02:35] उसे लगा कि दुनिया गोल है तो पश्चिम से जाकर भी पूर्व यानी भारत पहुंचा जा सकता है।
  He thought that since the world is round, one could reach the East, i.e., India, by going west.

[02:41] लेकिन वो अटलांटिक महासागर पार करके अमेरिका के बहामास द्वीप पर पहुंच गया।
  But he crossed the Atlantic Ocean and reached the Bahamas islands of America.

[02:46] और मजे की बात यह है कि वो अपनी मौत तक यही मानता रहा कि उसने भारत का ही कोई हिस्सा खोज लिया है।
  And the funny thing is that until his death, he believed that he had discovered some part of India.

[02:50] बिल्कुल। इसीलिए तो उसने वहां के मूल निवासियों को इंडियंस कहा।
  Exactly. That is why he called the native inhabitants there Indians.

[02:54] यह सोचना भी मजेदार है कि अमेरिका का नाम इंडिया भी हो सकता था।
  It's also fun to think that America could have been named India.

[02:58] हो सकता था। तो अब स्पेन के लिए भारत की खोज हो चुकी थी जो असल में अमेरिका था।
  It could have been. So now, for Spain, the discovery of India, which was actually America, had been made.

[03:03] तो अब मैदान में दो बड़े खिलाड़ी थे।
  So now there were two major players in the field.

[03:05] पुर्तगाल जो अफ्रीका के रास्ते पूर्व की ओर जा रहा था और स्पेन पश्चिम की ओर और यह दोनों उस समय के सुपर पावर थे।
  Portugal was going east via Africa and Spain to the west, and both were superpowers at that time.

[03:12] जाहिर है टकराव का खतरा तो था और इस टकराव को टालने के लिए उन्होंने कुछ ऐसा किया जो जो आज सुनने में बिल्कुल अविश्वसनीय लगता है।
  Obviously, there was a risk of conflict, and to avoid this conflict, they did something that sounds absolutely unbelievable today.

[03:19] हां उन्होंने उस समय के सर्वोच्च धार्मिक नेता यानी पोप की मदद से पूरी दुनिया का ही बंटवारा कर लिया।
  Yes, with the help of the supreme religious leader of that time, the Pope, they divided the entire world.

[03:26] यही थी 1494 की टोडेसिलास की संधि।
  This was the Treaty of Tordesillas of 1494.

[03:29] जी।
  Yes.

[03:29] उन्होंने अटलांटिक महासागर में एक काल्पनिक रेखा खींचकर तय किया कि इस रेखा के पश्चिम में खोजी गई सारी गैर ईसाई जमीन स्पेन की होगी।
  They drew an imaginary line in the Atlantic Ocean and decided that all non-Christian land discovered west of this line would belong to Spain.

[03:39] और पूर्व की सारी जमीन पुर्तगाल की।
  And all the land to the east would belong to Portugal.

[03:42] बिल्कुल।
  Exactly.

[03:42] 1 मिनट। क्या यह सच में इतना आसान था?
  One minute. Was it really that easy?

[03:44] मतलब दो देशों ने काल्पनिक रेखा खींची और दुनिया ने मान लिया।
  Meaning, two countries drew an imaginary line and the world accepted it.

[03:46] इंग्लैंड या फ्रांस जैसे दूसरे देशों ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई।
  Did other countries like England or France not object to this?

[03:50] यह एक बहुत अच्छा सवाल है।
  That is a very good question.

[03:50] देखिए उस समय पोप का अधिकार कैथोलिक दुनिया में सर्वोच्च माना जाता था।
  Look, at that time, the Pope's authority was considered supreme in the Catholic world.

[03:55] और इस संधि पर पोप की मोहर थी।
  And the Pope's seal was on this treaty.

[03:58] अच्छा।
  Okay.

[03:58] इंग्लैंड और फ्रांस उस वक्त स्पेन और पुर्तगाल जितने शक्तिशाली नहीं थे इसलिए वे शुरुआत में खुलकर कुछ नहीं कर पाए।
  England and France were not as powerful as Spain and Portugal at that time, so they could not openly do anything initially.

[04:05] लेकिन उन्होंने इसे कभी स्वीकार नहीं किया
  But they never accepted it.

[04:07] होगा।
  It will be.

[04:07] मन ही मन तो बिल्कुल नहीं और यही भविष्य में उनके बीच समुद्री लड़ाईयों का एक बड़ा कारण बना।
  Not at all in his heart, and this became a major cause of naval battles between them in the future.

[04:12] इसी संधि ने पुर्तगाल को भारत की खोज के लिए एक तरह से आधिकारिक लाइसेंस दे दिया।
  This treaty, in a way, gave Portugal an official license to explore India.

[04:17] और इसी लाइसेंस के साथ 1497 में वास्कोडि गामा चार जहाजों के बीड़े के साथ लिसबन से निकला।
  And with this license, in 1497, Vasco da Gama set out from Lisbon with a fleet of four ships.

[04:23] उसने बार्थोलोमियो डियाज़ वाले रास्ते को ही आगे बढ़ाया।
  He further followed the route taken by Bartholomew Diaz.

[04:26] केप ऑफ गुड होप का चक्कर काटा और अफ्रीका के पूर्वी तट पर मालिंदी नाम की जगह पर पहुंचा और यहीं उसकी किस्मत ने एक बड़ा मोड़ लिया।
  He rounded the Cape of Good Hope and reached a place called Malindi on the east coast of Africa, and here his fate took a major turn.

[04:36] हां, वहां उसे एक गाइड मिला।
  Yes, there he found a guide.

[04:38] एक अनुभवी गुजराती नाविक जिनका नाम कुछ स्रोतों में अब्दुल मुनीफ और कुछ में अहमद इब्न मजीद बताया जाता है।
  An experienced Gujarati navigator whose name is given as Abdul Munif in some sources and Ahmad Ibn Majid in others.

[04:45] जी वो मॉनसून हवाओं और समुद्री रास्तों का विशेषज्ञ था।
  Yes, he was an expert in monsoon winds and sea routes.

[04:47] उसी की मदद से वास्कोडि गामा ने हिंद महासागर को पार किया।
  With his help, Vasco da Gama crossed the Indian Ocean.

[04:50] और आखिरकार 20 मई 1498 को वह भारत के केरल में कालीकट के बंदरगाह पर उतरा।
  And finally, on May 20, 1498, he landed at the port of Calicut in Kerala, India.

[04:59] यह भारतीय इतिहास का एक ऐसा पल था जिसने आने वाली सदियों की कहानी लिख दी।
  This was a moment in Indian history that wrote the story of the coming centuries.

[05:04] बिल्कुल।
  Absolutely.

[05:04] उसका स्वागत कालीकट के स्थानीय हिंदू शासक जिनकी उपाधि जमोरन थी ने किया।
  He was welcomed by the local Hindu ruler of Calicut, whose title was Zamorin.

[05:10] एक यूरोपीय शक्ति ने आखिरकार भारत तक पहुँचने का सीधा समुद्री रास्ता खोज निकाला था।
  A European power had finally found a direct sea route to reach India.

[05:15] थे।
  Yes.

[05:18] अच्छा तो इतने लंबे खतरनाक सफर के बाद जब वो वापस पुर्तगाल गया तो आखिर ऐसा क्या लाया था जिसने सब कुछ बदल दिया?
  So after such a long, dangerous journey, when he returned to Portugal, what exactly did he bring that changed everything?

[05:23] क्या वो सोना था या हीरे जवाहरात?
  Was it gold or diamonds and jewels?

[05:26] नहीं वो अपने साथ मुख्य रूप से काली मिर्च और कुछ अन्य मसाले लेकर गया था।
  No, he primarily brought back black pepper and some other spices.

[05:30] कि उस समय काली मिर्च सिर्फ एक मसाला नहीं थी।
  That at that time, black pepper was not just a spice.

[05:33] अच्छा।
  Okay.

[05:34] यूरोप में भयंकर सर्दियों में जानवरों को खिलाने के लिए चारा नहीं होता था तो वे उन्हें मारकर उनका मांस संरक्षित करते थे।
  In Europe, during harsh winters, there was no fodder to feed the animals, so they would kill them and preserve their meat.

[05:42] और बिना रेफ्रिजरेटर के उस मांस को सड़ने से बचाने और उसका स्वाद बेहतर करने के लिए काली मिर्च सोने जितनी कीमती थी।
  And to prevent that meat from spoiling without refrigeration and to enhance its taste, black pepper was as precious as gold.

[05:49] तो जब उसने इस काले सोने को यूरोप में बेचा तो क्या हुआ?
  So when he sold this black gold in Europe, what happened?

[05:52] जब उसने उस काली मिर्च को बेचा तो उसे अपनी पूरी यात्रा पर आए खर्च से 60 गुना ज्यादा मुनाफा हुआ।
  When he sold that black pepper, he made a profit 60 times more than the cost of his entire journey.

[05:59] 60 गुना ये तो मतलब इसने तो यूरोप के हर शाही दरबार में खलबली मचा दी होगी।
  60 times? This must have caused a stir in every royal court in Europe.

[06:04] बिल्कुल।
  Absolutely.

[06:04] इस जबरदस्त सफलता के बाद पुर्तगाल ने जश्न मनाया होगा।
  After this tremendous success, Portugal must have celebrated.

[06:10] जरूर लेकिन दूसरा अभियान जो 1500 में पेड्रो एलवेरेस कैब्रल के
  Certainly, but the second expedition in 1500 by Pedro Álvares Cabral

[06:12] नेतृत्व में आया उसका अनुभव बिल्कुल अलग था।
  His experience in leadership was completely different.

[06:15] ऐसा क्या हुआ?
  What happened?

[06:16] कैब्रल एक अलग मानसिकता के साथ आया था।
  Cabral came with a different mentality.

[06:19] वो 13 जहाजों का एक भारी भरकम बेड़ा लेकर आया था जो एक व्यापारिक मिशन से ज्यादा एक सैन्य अभियान लगता था।
  He brought a formidable fleet of 13 ships that seemed more like a military expedition than a trading mission.

[06:26] अच्छा।
  Okay.

[06:26] उसने आते ही जमोरेन पर दबाव बनाना शुरू कर दिया कि वो अरब व्यापारियों को कालीकट से बाहर निकाल दे और सारा व्यापार सिर्फ पुर्तगालियों को दे।
  As soon as he arrived, he began to pressure the Zamorin to expel Arab traders from Calicut and give all trade exclusively to the Portuguese.

[06:37] यह व्यापार की बातचीत नहीं दादागिरी थी।
  This was not a trade negotiation, it was bullying.

[06:38] बिल्कुल।
  Exactly.

[06:39] और जमोरिन जिनका अरबों के साथ सदियों पुराना और फायदेमंद रिश्ता था उन्होंने साफ मना कर दिया होगा।
  And the Zamorin, who had a centuries-old and beneficial relationship with the Arabs, must have clearly refused.

[06:44] हां।
  Yes.

[06:44] और इसी के बाद पुर्तगालियों का असली रंग सामने आया।
  And after this, the true colors of the Portuguese emerged.

[06:47] मतलब जब जमोरिन ने उसकी मांगे नहीं मानी तो केब्रेल ने बंदरगाह पर खड़े अरब जहाजों पर हमला कर दिया।
  Meaning, when the Zamorin did not accept his demands, Cabral attacked the Arab ships docked at the port.

[06:54] उनमें आग लगा दी।
  He set them on fire.

[06:54] सैकड़ों नाविकों को मार डाला और शहर पर भी बमबारी की।
  He killed hundreds of sailors and also bombed the city.

[07:00] यह तो यह तो सीधी-सीधी हिंसा थी।
  This was, this was outright violence.

[07:03] यह व्यापारिक संबंधों की नहीं बल्कि औपनिवेशिक हिंसा की पहली और क्रूर शुरुआत थी।
  This was not the beginning of trade relations, but the first and brutal start of colonial violence.

[07:08] तो यहीं से टकराव का दौर शुरू हो गया।
  So, the period of conflict began from here.

[07:10] पुर्तगालियों ने रास्ता तो खोल दिया लेकिन
  The Portuguese had opened the way, but

[07:13] अब बाकी यूरोपीय ताकतें भी इस दौर में शामिल होने वाली थी।
  Now, the rest of the European powers were also about to join this era.

[07:15] पुर्तगालियों के बाद डच आए।
  After the Portuguese, the Dutch came.

[07:17] जी पुर्तगाली 1498 में फिर डच जिनकी पहली यात्रा 1595 में हुई।
  Yes, the Portuguese in 1498, then the Dutch whose first voyage was in 1595.

[07:21] फिर 1600 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई।
  Then in 1600, the British East India Company was established.

[07:27] उनके बाद 1616 में डेनमार्क से डेनिश आए और आखिर में 1664 में फ्रेंच कंपनी भारत आई।
  After them, the Danes came from Denmark in 1616, and finally, the French company came to India in 1664.

[07:30] सही क्रम है और इन सभी ने आते ही भारत में अपनी व्यापारिक कोठियां या फैक्ट्रियां बनानी शुरू कर दी।
  The correct order is, and all of them, upon arriving, started establishing their trading posts or factories in India.

[07:34] हां, पुर्तगालियों ने अपनी पहली फैक्ट्री 153 में कोचीन में लगाई।
  Yes, the Portuguese set up their first factory in Cochin in 153.

[07:39] डचों ने 1605 में मसूलीपट्टनम में और अंग्रेजों ने 1608 में सूरत में अपनी पहली फैक्ट्री स्थापित करने की कोशिश की जो कुछ सालों बाद शायद 1613 में जाकर स्थाई रूप से स्थापित हो पाई।
  The Dutch in Masulipatnam in 1605, and the British tried to establish their first factory in Surat in 1608, which was perhaps permanently established a few years later, around 1613.

[07:55] जी बिल्कुल।
  Yes, absolutely.

[07:56] वास्कोडि गामा की उस जबरदस्त कामयाबी के बाद पुर्तगाल से दूसरा बड़ा अभियान निकलता है।
  After that tremendous success of Vasco da Gama, a second major expedition departs from Portugal.

[07:59] हां, इस बार जहाजों का कप्तान था पेड्रो एल्वरस कैब्रेल।
  Yes, this time the captain of the ships was Pedro Álvares Cabral.

[08:03] पेड्रो अल्वरस कैबिल।
  Pedro Álvares Cabral.

[08:05] 1499 में केबिरेल एक बड़े बेड़े के साथ पुर्तगाल से निकला।
  In 1499, Cabral set out from Portugal with a large fleet.

[08:07] लक्ष्य साफ था भारत
  The goal was clear: India.

[08:14] पहुंचकर व्यापार करना।
  Arriving and trading.

[08:17] लेकिन समंदर का सफर उस जमाने में आज जैसा तो था नहीं।
  But the sea journey in those days was not like today.

[08:19] बिल्कुल नहीं।
  Not at all.

[08:19] तो 1500 ईसवी में केप ऑफ गुड होप के पास उसका जहाज एक तूफान में फंस गया और वो रास्ता भटक गया।
  So in 1500 AD, near the Cape of Good Hope, his ship got caught in a storm and he lost his way.

[08:27] रास्ता भटक कर वो पश्चिम की तरफ बहता चला गया और एक नई विशाल जमीन से जा टकराया
  Losing his way, he drifted westward and crashed into a vast new land

[08:30] और वो जमीन थी ब्राजील
  and that land was Brazil.

[08:33] हां ब्राजील तो अनजाने में ही सही भारत की खोज करने निकले केबरेल ने दक्षिण अमेरिका में पुर्तगाल के सबसे बड़े उपनिवेश की नीव रख दी
  Yes, Brazil, even if unknowingly, Cabral, who set out to find India, laid the foundation for Portugal's largest colony in South America.

[08:40] जब वो आखिरकार भारत पहुंचा तो उसका सामना कालेकट के राजा जमोरिन से हुआ
  When he finally reached India, he encountered the king of Calicut, the Zamorin.

[08:45] और यहां आकर उसने एक ऐसी मांग रख दी जिसने सब कुछ बदल दिया।
  And upon arriving here, he made a demand that changed everything.

[08:49] क्या मांग थी वो?
  What was that demand?

[08:52] उसने जमोरिन से कहा कि आप मसालों का व्यापार सिर्फ और सिर्फ हमारे साथ करेंगे।
  He told the Zamorin that you will trade spices only and only with us.

[08:57] मतलब उसने व्यापारिक एकाधिकार या मोनोपोली की मांग की।
  Meaning, he demanded a trade monopoly.

[08:59] अच्छा यह तो जमोरिन के लिए मानना मुश्किल रहा होगा।
  Well, that must have been difficult for the Zamorin to accept.

[09:02] नामुमकिन था।
  It was impossible.

[09:05] उसके बंदरगाह पे सदियों से अरब व्यापारी व्यापार कर रहे थे और वह उनके साथ अपने रिश्ते खराब नहीं करना चाहता था।
  Arab traders had been trading at his port for centuries, and he did not want to spoil his relationship with them.

[09:10] तो उसने मना कर दिया।
  So he refused.

[09:13] हां, जमोरिन ने इंकार कर दिया और कैब्रेल ने इस ना को अपनी बेइज्जती समझ लिया।
  Yes, the Zamorin refused, and Cabral considered this refusal an insult.

[09:15] और फिर उसने बातचीत की जगह ताकत का रास्ता चुना।
  And then he chose the path of power instead of dialogue.

[09:18] बिल्कुल।
  Absolutely.

[09:18] उसने जमोरिन को नजरअंदाज करते हुए 1500 ईसवी में पास के ही राज्य कोचिन में अपनी पहली फैक्ट्री डाल दी।
  Ignoring the Zamorin, he set up his first factory in the nearby kingdom of Cochin in 1500 AD.

[09:25] यह तो एक सीधी चुनौती थी।
  This was a direct challenge.

[09:27] हां।
  Yes.

[09:27] और इससे तनाव इतना बढ़ा कि 1501 में जमोरिन और पुर्तगालियों के बीच लड़ाई छिड़ गई।
  And the tension escalated so much that a battle broke out between the Zamorin and the Portuguese in 1501.

[09:32] अरब व्यापारियों ने जमोरिन का साथ दिया लेकिन पुर्तगालियों की नौसैनिक ताकत के आगे वो टिक नहीं पाए।
  The Arab traders supported the Zamorin, but they could not withstand the naval power of the Portuguese.

[09:38] और इस एक जीत ने जैसे सारे दरवाजे खोल दिए।
  And this one victory seemed to open all the doors.

[09:41] सही कहा।
  That's right.

[09:41] 1503 तक आते-आते उन्होंने कोचीन की फैक्ट्री की किलेबंदी कर ली।
  By 1503, they had fortified the factory in Cochin.

[09:46] मतलब उसे एक छोटे-मोटे किले में बदल दिया।
  Meaning, they turned it into a small fort.

[09:48] और कन्नूर जैसे दूसरे तटीय इलाकों में भी अपना दबदबा बना लिया।
  And they also established their dominance in other coastal areas like Kannur.

[09:50] तो एक व्यापारिक चौकी अब एक सैन्य अड्डे में बदल रही थी।
  So, a trading post was now transforming into a military base.

[09:55] हां, अब उन्हें समझ आ गया था कि भारत में व्यापार करना है तो सिर्फ जहाजों से काम नहीं चलेगा, जमीन पर भी मजबूत पकड़ चाहिए।
  Yes, they now understood that to trade in India, ships alone would not suffice; a strong hold on land was also necessary.

[10:01] और इसी पकड़ को बनाए रखने के लिए उन्हें एक सिस्टम की जरूरत थी।
  And to maintain this hold, they needed a system.

[10:05] एक संगठित सिस्टम।
  An organized system.

[10:07] और यहीं से भारत में पुर्तगाली गवर्नर्स या कहिए वाइसराय का दौर शुरू होता है।
  And from here begins the era of Portuguese Governors, or rather, Viceroys, in India.

[10:12] और इस लिस्ट में पहला नाम आता है फ्रांसिस्को डी अल्मेडा का।
  And the first name on this list is Francisco de Almeida.

[10:13] उसने एक बहुत
  He a very

[10:16] ही मशहूर नीति अपनाई थी।
  This famous policy was adopted.

[10:18] ब्लू वाटर पॉलिसी।
  Blue Water Policy.

[10:19] ब्लू वाटर पॉलिसी हां।
  Blue Water Policy, yes.

[10:20] यह नाम सुनने में तो बड़ा शांत लगता है।
  This name sounds very calm.

[10:22] शांत जल की नीति।
  Policy of calm waters.

[10:24] नाम भले ही शांत हो लेकिन इसके पीछे की सोच बहुत आक्रामक थी।
  The name may be calm, but the thinking behind it was very aggressive.

[10:29] अल्मिडा का मानना था कि भारत पर असली कब्जा जमीन से नहीं समंदर से होगा।
  Almeida believed that the real capture of India would be from the sea, not from land.

[10:32] अच्छा।
  Okay.

[10:33] जिसका हिंद महासागर पर नियंत्रण है।
  Whoever controls the Indian Ocean.

[10:35] वही भारत के व्यापार का मालिक है।
  Is the owner of India's trade.

[10:37] तो उसकी ब्लू वाटर पॉलिसी का एक ही मकसद था पुर्तगाली नौसेना को हिंद महासागर का बेताज बादशाह बनाना।
  So his Blue Water Policy had only one objective: to make the Portuguese navy the uncrowned king of the Indian Ocean.

[10:41] तो, यह बस समुंदर पर कब्जा करने से कहीं ज्यादा था।
  So, it was much more than just capturing the sea.

[10:44] उन्होंने समुंदर को ही अपना किला बना लिया।
  They made the sea their fort.

[10:46] बिल्कुल।
  Absolutely.

[10:48] और इसी नीति को लागू करने के लिए उन्होंने काटे सिस्टम शुरू किया।
  And to implement this policy, they started the Cartaz system.

[10:51] कार्टेज सिस्टम, असल में तो यह हिंद महासागर पर एक तरह की दादागिरी थी, है ना?
  Cartaz system, in reality, it was a kind of bullying on the Indian Ocean, wasn't it?

[10:53] आप इसे दादागिरी या एक संगठित वसूली कह सकते हैं।
  You can call it bullying or organized extortion.

[10:57] इस सिस्टम के तहत हिंद महासागर से गुजरने वाले किसी भी जहाज को पुर्तगालियों से एक पास खरीदना पड़ता था।
  Under this system, any ship passing through the Indian Ocean had to buy a pass from the Portuguese.

[11:04] जिसे काटेज कहते थे।
  Which was called Cartaz.

[11:07] हां, कार्टेज और इस पास के लिए उन्हें टैक्स देना पड़ता था।
  Yes, Cartaz, and for this pass, they had to pay tax.

[11:10] अगर किसी जहाज के पास कार्टेज नहीं होता तो पुर्तगाली उसे लूट लेते थे या डुबो देते थे।
  If a ship did not have the Cartaz, the Portuguese would loot it or sink it.

[11:16] यहां तक कि मुगल बादशाहों के जहाजों को भी
  Even the ships of the Mughal emperors

[11:18] हां, मुगल बादशाह अकबर के जहाजों को भी यह
  Yes, even the ships of the Mughal emperor Akbar

[11:21] कार्टेज लेना पड़ता था।
  had to pay cartage.

[11:22] तो अल्मेडा ने समंदर पर कब्जे की नीम तो
  So Almeida laid the foundation for control of the sea,

[11:24] रख दी पर जमीन पर उनकी पकड़ अभी भी कमजोर
  but their grip on land was still weak.

[11:27] थी।

[11:28] और इस कहानी को बदलने के लिए एक नए और
  And to change this story, a new and

[11:31] ज्यादा आक्रामक किरदार की जरूरत थी।
  more aggressive character was needed.

[11:33] और यहीं एंट्री होती है अल्फोंज़ो डी
  And this is where Alfonso de

[11:36] अल्ब्यूकर्क की।
  Albuquerque enters.

[11:36] हां अल्ब्यूकोक और उसे ही
  Yes, Albuquerque, and he is considered

[11:40] भारत में पुर्तगाली शक्ति का असली
  the true founder of Portuguese power in India.

[11:42] संस्थापक माना जाता है।

[11:44] असली संस्थापक हां क्योंकि वो सिर्फ समंदर
  The true founder, yes, because he didn't just stop at the sea.

[11:47] तक नहीं रुका।

[11:48] बिल्कुल नहीं।
  Not at all.

[11:48] वो समझ गया था कि जमीन पर
  He understood that on land,

[11:50] मतलब स्थाई अड्डे बनाने ही पड़ेंगे और
  meaning, permanent bases would have to be established, and

[11:52] उसका सबसे बड़ा कदम था 1510 में गोवा पर
  his biggest step was the capture of Goa in 1510.

[11:56] कब्जा।

[11:56] बीजापुर के सुल्तान यूसुफ आदिल शाह को
  Defeating the Sultan of Bijapur, Yusuf Adil Shah,

[11:59] हराकर

[11:59] हां, यूसुफ आदिल शाह को एक जबरदस्त लड़ाई
  Yes, after a fierce battle with Yusuf Adil Shah,

[12:02] में हराकर गोवा को छीन लिया और यह एक
  Goa was snatched, and this was a

[12:04] मास्टर स्ट्रोक था।
  masterstroke.

[12:04] पर एल्ब्यूकर्क सिर्फ
  But Albuquerque didn't just stop at

[12:06] जमीन जीतने तक नहीं रुका।
  conquering land.

[12:06] उसकी नीतियां भी
  His policies were also

[12:09] बहुत दूर की सोच वाली थी।
  very forward-thinking.

[12:09] जिन्हें 3G
  Known as the 3G

[12:12] पॉलिसी कहा जाता है।
  policy.

[12:13] हां, 3G गॉड, गोल्ड एंड ग्लोरी।
  Yes, 3G: God, Gold, and Glory.

[12:17] ये तीन शब्द उसके पूरे विज़न को समझाते हैं।
  These three words explain his entire vision.

[12:20] गोल्ड यानी व्यापार के जरिए ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना, ग्लोरी यानी पुर्तगाल का दबदबा बनाना।
  Gold, meaning earning as much money as possible through trade, Glory, meaning establishing Portugal's dominance.

[12:25] और गॉड यानी ईसाई धर्म का प्रचार।
  And God, meaning the propagation of Christianity.

[12:28] हां, अल्बुक का मानना था कि धर्म नियंत्रण का एक बहुत बड़ा हथियार है।
  Yes, Albuquerque believed that religion is a very big weapon of control.

[12:30] और इसी के तहत उसने एक और दिलचस्प काम किया।
  And under this, he did another interesting thing.

[12:33] विवाह नीति बिल्कुल उसने पुर्तगाली पुरुषों को भारतीय महिलाओं से शादी करने के लिए प्रोत्साहित किया।
  Marriage policy, he absolutely encouraged Portuguese men to marry Indian women.

[12:38] इसके पीछे दो मकसद थे।
  There were two objectives behind this.

[12:40] एक तो आबादी बढ़ाना।
  One was to increase the population.

[12:43] हां और दूसरा एक ऐसी मिश्रित आबादी तैयार करना जो वफादारी में पुर्तगाली हो।
  Yes, and the second was to create a mixed population that would be Portuguese in loyalty.

[12:46] यह कब्जा करने का एक सांस्कृतिक तरीका था।
  This was a cultural way of conquering.

[12:51] इसी बीच कहानी में वास्कोडि गामा की भी वापसी होती है।
  Meanwhile, Vasco da Gama also makes a return in the story.

[12:53] हां, अल्बुका के जाने के बाद पुर्तगाली प्रभाव थोड़ा कमजोर पड़ने लगा था।
  Yes, after Albuquerque left, Portuguese influence had started to weaken slightly.

[12:56] तो उसे फिर से मजबूत करने के लिए 1524 में बूढ़े हो चुके वास्कोडि गामा को तीसरी और आखिरी बार भारत भेजा गया।
  So, to strengthen it again, the aged Vasco da Gama was sent to India for the third and last time in 1524.

[13:01] इस बार वायसराय बनाकर।
  This time as Viceroy.

[13:06] हां लेकिन शायद भारत की आबोहवा उसे इस बार रास नहीं आई।
  Yes, but perhaps the Indian climate did not suit him this time.

[13:09] यहां पहुंचने के कुछ ही महीनों बाद वह बीमार पड़ गया।
  A few months after arriving here, he fell ill.

[13:12] और मलेरिया या शायद टीबी की वजह से 1524 में कोचीन में उसकी मौत हो गई।
  And due to malaria or perhaps TB, he died in Cochin in 1524.

[13:17] हां, एक महान खोजकर्ता का एहसास अंत उसे
  Yes, the end of a great explorer, he

[13:20] पहले केरल में ही दफनाया गया।
  First, he was buried in Kerala itself.

[13:22] लेकिन बाद में उसके अवशेष पुर्तगाल ले जाए गए।
  But later his remains were taken to Portugal.

[13:25] गामा और अल्बोकर के बाद तीसरा बड़ा नाम आता है नीनो डी कुन्हा का।
  After Gama and Albuquerque, the third big name is that of Nino da Cunha.

[13:29] नीनो डी कुन्हा उसने अल्बुकर के काम को आगे बढ़ाया।
  Nino da Cunha advanced Albuquerque's work.

[13:35] उसका सबसे बड़ा कदम था 1530 में पुर्तगाली मुख्यालय को कोचीन से गोवा ले जाना।
  His biggest step was to move the Portuguese headquarters from Cochin to Goa in 1530.

[13:38] इस एक फैसले ने गोवा को अगले 400 सालों के लिए पूर्व का रोम बना दिया।
  This one decision made Goa the Rome of the East for the next 400 years.

[13:43] और पुर्तगाली साम्राज्य का केंद्र उसने सिर्फ प्रशासनिक बदलाव ही नहीं किए बल्कि दमन और द्वीप पर भी कब्जा किया।
  And he not only made administrative changes to the center of the Portuguese empire but also captured Daman and Diu.

[13:49] और गुजरात के शासक बहादुर शाह से बेसिन का इलाका भी छीन लिया।
  And he also snatched the Bassein region from the ruler of Gujarat, Bahadur Shah.

[13:53] हां।
  Yes.

[13:55] और बाद में कहते हैं कि बहादुर शाह को धोखे से अपने जहाज पर बुलाकर समुद्र में धकेल कर मार डाला था।
  And later it is said that Bahadur Shah was treacherously called onto his ship and pushed into the sea and killed.

[13:59] यह घटनाएं उनके तरीकों को दिखाती हैं।
  These events show their methods.

[14:01] जहां संधि काम नहीं आती थी, वहां वो हिंसा से नहीं हिचकिचाते थे।
  Where treaties did not work, they did not hesitate to use violence.

[14:06] तो यह तो हुई साम्राज्य बनाने की कहानी।
  So this was the story of empire building.

[14:08] लेकिन इन सबके बीच क्या पुर्तगालियों ने भारत को कुछ दिया भी?
  But in the midst of all this, did the Portuguese give anything to India?

[14:11] उनकी विरासत क्या रही?
  What was their legacy?

[14:14] हां।
  Yes.

[14:16] और उनकी विरासत काफी दिलचस्प है।
  And their legacy is quite interesting.

[14:16] शायद उनकी सबसे बड़ी देन थी 1556 में गोवा में भारत की पहली प्रिंटिंग प्रेस की
  Perhaps their biggest contribution was India's first printing press in Goa in 1556.

[14:22] स्थापना।
  Establishment.

[14:23] पहली प्रिंटिंग प्रेस जी सोचिए उस एक मशीन ने भारत में ज्ञान के प्रसार का तरीका हमेशा के लिए बदल दिया
  The first printing press, just think, that one machine changed the way knowledge spread in India forever.

[14:28] और कृषि के क्षेत्र में तो उनका योगदान कमाल का है।
  And their contribution in the field of agriculture is amazing.

[14:33] आज हम सोच भी नहीं सकते कि आलू, टमाटर और लाल मिर्च के बिना हमारा किचन कैसा होता।
  Today we cannot even imagine what our kitchen would be like without potatoes, tomatoes, and red chilies.

[14:36] सही बात है।
  That's right.

[14:39] यह आज हमारी हर सब्जी, हर करी का हिस्सा है।
  It is a part of our every vegetable, every curry today.

[14:39] और यह सारी चीजें पपीता और तंबाकू के साथ पुर्तगाली ही भारत लेकर आए थे।
  And it was the Portuguese who brought all these things, along with papaya and tobacco, to India.

[14:45] तो यह कहना गलत नहीं होगा कि वो हमारे मसालों के लिए यहां आए।
  So it would not be wrong to say that they came here for our spices.

[14:49] पर बदले में हमारे खाने का स्वाद हमेशा के लिए बदल गया।
  But in return, the taste of our food changed forever.

[14:51] बिल्कुल।
  Absolutely.

[14:53] लेकिन इतिहास का नियम है हर साम्राज्य का सूरज कभी ना कभी ढलता है।
  But it is the rule of history that the sun of every empire sets sooner or later.

[14:57] इतनी मजबूत नीव के बावजूद पुर्तगालियों की शक्ति भारत में कम कैसे हुई?
  Despite such a strong foundation, how did the power of the Portuguese decline in India?

[14:59] यह एक तरह का परफेक्ट स्टॉर्म था।
  It was a kind of perfect storm.

[15:02] कई तरफ से एक साथ हमले हुए।
  Attacks happened simultaneously from many sides.

[15:04] सबसे पहला और शायद सबसे बड़ा कारण था दूसरी यूरोपीय कंपनियों का भारत आना।
  The first and perhaps the biggest reason was the arrival of other European companies in India.

[15:08] खासकर अंग्रेजों और डचों का।
  Especially the British and the Dutch.

[15:10] हां, अब हिंद महासागर में वह अकेले खिलाड़ी नहीं रहे।
  Yes, they were no longer the sole players in the Indian Ocean.

[15:13] और इस टकराव में 1612 का स्वाली का युद्ध एक निर्णायक मोड़ था।
  And in this conflict, the Battle of Swally in 1612 was a turning point.

[15:16] सही है ना?
  Right?

[15:18] हां बिल्कुल।
  Yes, absolutely.

[15:20] सूरत के पास समुद्र में लड़ी गई यह एक लड़ाई थी।
  This was a battle fought at sea near Surat.

[15:22] इसमें कैप्टन थॉमस
  In it, Captain Thomas

[15:23] बेस्ट के नेतृत्व में अंग्रेजों के सिर्फ चार जहाजों ने पुर्तगालियों के एक बड़े बीड़े को धूल चटा दी।
  Under the leadership of Best, just four English ships defeated a large Portuguese fleet.

[15:28] सिर्फ चार जहाजों ने।
  Just four ships.

[15:29] हां, इस एक हार ने उस भ्रम को तोड़ दिया कि पुर्तगालियों को समुद्र में कोई हरा नहीं सकता।
  Yes, this one defeat shattered the illusion that the Portuguese could not be defeated at sea.

[15:34] तो समंदर में उनकी बादशाहत को अंग्रेजों ने चुनौती दे दी।
  So the English challenged their dominance at sea.

[15:37] और जमीन पर जमीन पर उन्हें चुनौती दी मुगलों ने।
  And on land, on land, the Mughals challenged them.

[15:41] 163132 में बंगाल में हुगली से पुर्तगाली काफी लूटपाट कर रहे थे।
  In 1631-32, the Portuguese were plundering heavily from Hugli in Bengal.

[15:44] तब मुगल बादशाह शाहजहां ने अपनी सेना भेजकर उन्हें वहां से खदेड़ दिया।
  Then the Mughal emperor Shah Jahan sent his army and drove them away from there.

[15:50] तो एक तरफ मुगल जमीन पर उन्हें कमजोर कर रहे थे और दूसरी तरफ अंग्रेज समंदर में।
  So on one hand, the Mughals were weakening them on land, and on the other hand, the English at sea.

[15:55] लेकिन एक बड़ा झटका तो लड़ाई के मैदान में नहीं बल्कि एक शादी के मंडप से लगा।
  But a major blow came not from the battlefield, but from a wedding pavilion.

[16:01] हां बिल्कुल।
  Yes, absolutely.

[16:01] यह कहानी की सबसे अजीब घटनाओं में से एक।
  This is one of the strangest events in the story.

[16:04] 1661 में पुर्तगाल की राजकुमारी कैथरीन डी ब्रगेंजा की शादी ब्रिटेन के राजा चार्ल्स द्वितीय से हुई।
  In 1661, the Portuguese princess Catherine of Braganza married the British King Charles II.

[16:11] और पुर्तगालियों ने दहेज में पूरा का पूरा बंबई शहर अंग्रेजों को दे दिया।
  And the Portuguese gave the entire city of Bombay to the English as dowry.

[16:16] पूरा बंबई शहर।
  The entire city of Bombay.

[16:16] यह एक बहुत बड़ी रणनीतिक भूल थी।
  This was a very big strategic mistake.

[16:19] बहुत बड़े।
  A very big one.

[16:20] चार्ल्स द्वितीय ने बाद में बंबई को सिर्फ 10 पाउंड सालाना के किराए पर ब्रिटिश ईस्ट
  Charles II later leased Bombay to the British East India Company for just 10 pounds annually.

[16:24] इंडिया कंपनी को दे दिया और कंपनी ने बंबई को एक ऐसे बड़े व्यापारिक अड्डे में बदल दिया जिसने गोवा को भी पीछे छोड़ दिया।
  India gave it to the company, and the company turned Bombay into such a big trading post that it left Goa behind.

[16:31] और रही सही कसर मराठों ने पूरी कर दी।
  And the Marathas completed the remaining task.

[16:34] हां, 18वीं सदी में पश्चिम भारत में मराठे एक बड़ी ताकत बनकर उभरे।
  Yes, in the 18th century, the Marathas emerged as a major power in Western India.

[16:39] 1739 में मराठों ने पुर्तगालियों से युद्ध लड़ा और उनसे बेसिन यानी वसई का मजबूत किला छीन लिया।
  In 1739, the Marathas fought a war with the Portuguese and snatched the strong fort of Bassein, i.e., Vasai, from them.

[16:45] इस हार के बाद तो पुर्तगालियों का प्रभाव बस गोवा, दमन और दीव तक ही सिमट कर रह गया होगा।
  After this defeat, the influence of the Portuguese would have been limited only to Goa, Daman, and Diu.

[16:51] बिल्कुल बस उतने ही छोटे से इलाके तक।
  Absolutely, just to such a small area.

[16:53] तो यह थी कहानी पुर्तगालियों की।
  So this was the story of the Portuguese.

[16:56] तो आज का हमारा मिशन है भारत में डच कंपनी के उदय और पतन को समझना।
  So today our mission is to understand the rise and fall of the Dutch company in India.

[16:59] कहानी शुरू होती है डचों से।
  The story begins with the Dutch.

[17:03] तो सबसे पहला सवाल यह डच कौन थे? और उनका असली मकसद क्या था?
  So the first question is, who were these Dutch? And what was their real motive?

[17:08] देखिए डच यानी नीदरलैंड या हॉलैंड के लोग वे सिर्फ भारत के लिए नहीं निकले थे।
  Look, the Dutch, meaning the people of the Netherlands or Holland, did not set out just for India.

[17:13] अच्छा।
  Okay.

[17:13] हां।
  Yes.

[17:13] उनका लक्ष्य था पूरा ईस्ट इंडीज क्षेत्र।
  Their goal was the entire East Indies region.

[17:18] दिलचस्प बात यह है कि वह पहले इंडोनेशिया पहुंचे थे।
  The interesting thing is that they first reached Indonesia.

[17:19] इंडोनेशिया।
  Indonesia.

[17:21] भारत क्यों नहीं?
  Why not India?

[17:21] उन्हें वहां व्यापार में उतना मुनाफा नहीं दिखा जितना भारत में दिख रहा था।
  They did not see as much profit in trade there as they were seeing in India.

[17:25] उनका ध्यान भारत की ओर मुड़ गया।
  His attention turned towards India.

[17:27] भारत में उनका आगमन 1595 में हुआ।
  His arrival in India took place in 1595.

[17:30] हमें एक नाम मिलता है कॉर्निस डी हाउमैन।
  We come across a name, Cornelis de Houtman.

[17:33] यह कौन थे?
  Who was he?

[17:33] कॉलस डी हाउमैन पहले डच व्यक्ति थे जो इस अभियान पर निकले थे।
  Cornelis de Houtman was the first Dutch person who embarked on this expedition.

[17:38] ओके।
  Okay.

[17:38] 1596 में वे भारत से होते हुए इंडोनेशिया पहुंचे।
  In 1596, they reached Indonesia via India.

[17:41] उन्होंने 1602 में अपनी पहली डच कंपनी इंडोनेशिया में ही स्थापित की।
  He established his first Dutch company in Indonesia itself in 1602.

[17:46] इंडोनेशिया में।
  In Indonesia.

[17:47] जी।
  Yes.

[17:47] लेकिन यह कंपनी चल नहीं पाई।
  But this company could not run.

[17:49] मतलब ठप हो गई।
  Meaning, it stalled.

[17:49] इंडोनेशिया में व्यापारिक अवसर कम दिखने के बाद उन्होंने भारत की तरफ रुख किया।
  After seeing fewer business opportunities in Indonesia, they turned towards India.

[17:54] जहां उन्हें ज्यादा संभावनाएं नजर आ रही थी।
  Where they were seeing more possibilities.

[17:57] बिल्कुल।
  Absolutely.

[17:57] 1598 तक वो पूरी तरह से भारत में व्यापार करने के इरादे से आ चुके तो अब डच भारत में है।
  By 1598, they had arrived with the intention of fully trading in India, so now the Dutch are in India.

[18:03] लेकिन यहां तो पहले से ही पुर्तगाली मौजूद थे।
  But the Portuguese were already present here.

[18:05] फिर क्या हुआ?
  Then what happened?

[18:08] जाहिर है संघर्ष हुआ होगा।
  Obviously, there must have been a conflict.

[18:09] संघर्ष तो होना ही था और जबरदस्त हुआ।
  A conflict was bound to happen, and it was tremendous.

[18:12] डचों ने धीरे-धीरे पुर्तगालियों के जो मसाला उत्पादक क्षेत्र थे उन पर कब्जा करना शुरू कर दिया।
  The Dutch gradually started capturing the spice-producing regions of the Portuguese.

[18:18] अच्छा।
  Okay.

[18:18] स्रोत कुछ बहुत महत्वपूर्ण तारीखें बताते हैं।
  The sources mention some very important dates.

[18:21] जैसे 1639 में डचों ने गोवा पर घेरा डाला।
  For example, in 1639, the Dutch laid siege to Goa.

[18:24] गोवा पर वो तो पुर्तगालियों का गढ़ था।
  On Goa, that was a Portuguese stronghold.

[18:27] जी हां।
  Yes.

[18:30] फिर 1641 में उन्होंने मलक्का पर अधिकार कर लिया और 1658 में उन्होंने पुर्तगालियों की आखिरी बस्ती सिलोन यानी आज का श्रीलंका उस पर भी कब्जा कर लिया।
  Then in 1641 they captured Malacca, and in 1658 they also captured the last Portuguese settlement, Ceylon, that is, present-day Sri Lanka.

[18:37] तो इसका मतलब यह हुआ कि डचों ने व्यापार के मामले में पुर्तगालियों को लगभग पूरी तरह से बाहरी कर दिया था।
  So this meant that the Dutch had almost completely excluded the Portuguese in terms of trade.

[18:44] सही कहा।
  Correct.

[18:44] इसके बाद उन्होंने बंगाल, बिहार और उड़ीसा जैसे क्षेत्रों में अपनी व्यापारिक कोठियां या कहिए कारखाने स्थापित किए और अपनी व्यापारिक सत्ता को मजबूत किया।
  After this, they established their trading posts or, let's say, factories in regions like Bengal, Bihar, and Orissa, and strengthened their trading power.

[18:53] बिल्कुल।
  Absolutely.

[18:54] ठीक है।
  Okay.

[18:54] तो उन्होंने पुर्तगालियों को हटा दिया।
  So they removed the Portuguese.

[18:56] अब वे अपनी कंपनी और व्यापार को कैसे फैलाते हैं?
  Now, how do they expand their company and trade?

[18:58] भारत में उनकी पहली फैक्ट्री कहां थी?
  Where was their first factory in India?

[19:02] यह एक दिलचस्प तथ्य है।
  This is an interesting fact.

[19:02] उनकी पहली कंपनी तो जैसा हमने कहा 1602 में इंडोनेशिया में स्थापित हुई थी।
  Their first company, as we said, was established in Indonesia in 1602.

[19:07] हां।
  Yes.

[19:08] लेकिन भारत में उनकी पहली फैक्ट्री 1605 में मसूलीपट्टनम में स्थापित हुई।
  But their first factory in India was established in Masulipatnam in 1605.

[19:12] मसूलीपट्टनम यानी आंध्र प्रदेश।
  Masulipatnam, meaning Andhra Pradesh.

[19:14] जी।
  Yes.

[19:14] हालांकि यह एक अस्थाई फैक्ट्री थी।
  However, this was a temporary factory.

[19:17] अस्थाई।
  Temporary.

[19:17] तो फिर उनकी स्थाई फैक्ट्री कहां और कब बनी?
  So then, where and when was their permanent factory built?

[19:19] उनकी दूसरी फैक्ट्री 1610 में पुलीकट तमिलनाडु में बनी।
  Their second factory was built in Pulicat, Tamil Nadu in 1610.

[19:22] लेकिन उनकी पहली स्थाई फैक्ट्री।
  But their first permanent factory.

[19:25] हां।
  Yes.

[19:25] वो 1616 में सूरत गुजरात में स्थापित
  It was established in Surat, Gujarat in 1616.

[19:28] की गई।
  was done.

[19:28] सूरत में
  In Surat

[19:29] हां श्रोत यह भी बताते हैं कि फोर्ट
  Yes, sources also indicate that Fort

[19:31] गैलड्रिया नाम का एक किला जो 1613 में बना
  Geldria, a fort built in 1613,

[19:34] था 1616 तक उनका एक सरकारी केंद्र और पहली
  by 1616 became their administrative center and the first

[19:38] राजधानी बन गया था।
  capital.

[19:39] अच्छा तो उनकी राजधानी भी थी।
  Oh, so it was their capital too.

[19:41] जी। इसके बाद उन्होंने पीपली में 1627
  Yes. After that, they opened factories in Pipli in 1627,

[19:43] में, भीमापट्टनम में 1641 में और चिंसूरा
  in Bhimapatnam in 1641, and in Chinsura

[19:46] में 1653 में भी कारखाने खोले।
  in 1653.

[19:50] चिनसुरा
  Chinsura

[19:50] बंगाल में उनकी पहली फैक्ट्री थी।
  was their first factory in Bengal.

[19:52] इतने सारे कारखाने, लेकिन वे असल में व्यापार
  So many factories, but what did they actually trade?

[19:54] किस चीज का कर रहे थे?
  What did they trade?

[19:57] भारत पर उनका क्या
  What was their impact on India?

[19:57] प्रभाव पड़ा?
  impact?

[19:57] उनका प्रभाव काफी गहरा था।
  Their impact was quite profound.

[20:00] वे कॉफी और
  They were major producers of coffee and

[20:00] चीनी के प्रमुख उत्पादक यानी प्रोड्यूसर
  sugar.

[20:02] थे।
  They were.

[20:03] वे यहां उगाते थे।
  They grew them here.

[20:04] हां, लेकिन वे मसालों और सूती वस्त्रों के
  Yes, but they were major exporters of spices and cotton textiles.

[20:06] बहुत बड़े निर्यातक थे। मतलब एक्सपोर्टर।
  Meaning exporters.

[20:08] उन्होंने भारत से चाय और कपास की खेती को
  They also promoted the cultivation of tea and cotton from India.

[20:11] भी बढ़ावा दिया।
  promoted.

[20:11] और कुछ?
  Anything else?

[20:12] एक अनोखी बात यह है कि उन्होंने स्वर्ण
  One unique thing is that they also minted gold coins called the Golden Pagoda in India.

[20:14] पगोड़ा नाम के सोने के सिक्के भी भारत में
  coins.

[20:16] डाले।
  minted.

[20:17] अपने सिक्के?
  Their own coins?

[20:18] जी। अपने सोने के सिक्के।
  Yes. Their own gold coins.

[20:20] इसके अलावा वे
  Besides this, they also traded items like lead, raw silk, rice, opium, and indigo from India.

[20:20] भारत से शीशा, कच्चा रेशम, चावल, अफीम और
  traded.

[20:24] नील जैसी चीजों का भी व्यापार करते थे।
  traded.

[20:26] डच काफी अच्छा कर रहे थे लेकिन फिर तस्वीर
  The Dutch were doing quite well, but then the picture

[20:29] में ब्रिटिश आ जाते हैं।

[20:30] हां, और यही उनके पतन का कारण बना।

[20:32] क्या हुआ था?

[20:33] 1759 में बेद्रा का युद्ध हुआ।

[20:35] बेद्रा का युद्ध?

[20:36] हां, इसे हुगली या चिनसुरा का युद्ध भी

[20:39] कहा जाता है। यह युद्ध डचों और ब्रिटिश के

[20:41] बीच हुआ था। इसमें ब्रिटिश सेना निर्णायक

[20:44] रूप से जीत गई। और इस हार का नतीजा

[20:46] नतीजा यह हुआ कि डचों को भारत छोड़ना पड़ा

[20:49] पूरी तरह से।

[20:50] हां, उनकी हार ने भारत में ब्रिटिश ईस्ट

[20:53] इंडिया कंपनी के लिए दरवाजे पूरी तरह से

[20:55] खोल दिए।

[20:56] तो चलिए संक्षेप में यह भी देख लेते हैं

[20:58] कि अंग्रेजों की शुरुआत कैसे हुई?

[21:00] जरूर। कहानी 1599 में शुरू होती है जब जॉन

[21:03] मिल्डनहॉल नाम का पहला ब्रिटिश व्यक्ति

[21:05] भारत आया।

[21:06] जॉन मिल्डनहॉल।

[21:07] हां, वो मुगल बादशाह अकबर के दरबार में

[21:10] व्यापार की पेशकश लेकर पहुंचा था।

[21:11] और अकबर ने क्या कहा? अकबर ने उसकी पेशकश

[21:14] को अस्वीकार कर दिया।

[21:15] मना कर दिया।

[21:16] जी। इसके बाद जॉन मेल्डनहॉल वापस ब्रिटेन

[21:19] गया और वहां के व्यापारियों को भारत के

[21:22] व्यापारिक अफसरों के बारे में बताया।

[21:24] अच्छा।

[21:24] उन्होंने मिलकर महारानी एलिजाबेथ प्रथम से

[21:27] भारत में व्यापार करने के लिए एकाधिकार

[21:30] मतलब मोनोपोली की मांग की।

[21:31] और वो उन्हें मिल गया।

[21:32] हां वो उन्हें मिल गया।

[21:33] और इसी के साथ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी

[21:36] की स्थापना हुई।

[21:37] बिल्कुल। 31 दिसंबर 1600 को ब्रिटिश ईस्ट

[21:40] इंडिया कंपनी की स्थापना हुई।

[21:41] हम दिलचस्प बात यह है कि इसका शुरुआती नाम

[21:44] बहुत लंबा था।

[21:45] क्या नाम था?

[21:46] द गवर्नर एंड कंपनी ऑफ मर्चेंट्स ऑफ लंदन

[21:48] ट्रेडिंग इंटू ईस्ट इंडीज।

[21:50] इसका मतलब था कि ब्रिटेन से पूर्व के

[21:53] देशों के साथ सिर्फ और सिर्फ यही कंपनी

[21:55] व्यापार कर सकती थी। कोई और नहीं।

[21:58] यह एक बहुत बड़ा एडवांटेज था।

[21:59] तो अब कंपनी बन गई थी। उनके पास सरकारी

[22:02] बैकिंग भी थी। अब उन्हें भारत में मुगलों

[22:04] से इजाजत चाहिए थी। इसके लिए उन्होंने

[22:07] 1608 में कैप्टन विलियम हॉकिंस को जहांगीर

[22:10] के दरबार में भेजा और कमाल की बात यह है

[22:13] कि उसे फारसी आती थी

[22:15] और यही उसका ट्रंप कार्ड था।

[22:17] जहांगीर जो खुद कला और संस्कृति का शौकीन

[22:19] था एक अंग्रेज के मुंह से फारसी सुनकर

[22:22] बहुत इंप्रेस हुआ।

[22:23] अच्छा।

[22:24] उसने हॉकिंस को 400 का मंसब और इंग्लिश

[22:27] खान की उपाधि भी दी। दोस्ती अच्छी हो गई

[22:29] थी। लेकिन यह बात थोड़ी अजीब है। अगर

[22:31] जहांगीर इतना खुश था तो फिर उसने हॉकिंस

[22:34] को फैक्ट्री बनाने की इजाजत देने में

[22:35] आनाानी क्यों की?

[22:37] यहीं पर दोस्ती और सियासत का फर्क समझ आता

[22:40] है। जहांगीर को पता था कि पुर्तगाली पहले

[22:42] ही गोवा में अपना अड्डा बना चुके थे और वो

[22:45] एक सिरदर्द थे।

[22:46] सही।

[22:46] वो किसी और विदेशी ताकत को अपनी जमीन पर

[22:49] स्थाई ठिकाना बनाने की इजाजत देकर वही

[22:52] गलती दोहराना नहीं चाहता था। व्यापार करने

[22:54] की इजाजत देना एक बात थी पर जमीन पर किला

[22:57] बनाने की इजाजत देना बिल्कुल दूसरी।

[22:59] मतलब यह मुगलों की पॉलिटिकल समझदारी को

[23:01] दिखाता है।

[23:02] बिल्कुल।

[23:02] फिर 1615 में एक और दूत आया सर थॉमस रो।

[23:05] उसने ऐसा क्या लक किया जो हॉकिंस नहीं कर

[23:07] पाया?

[23:07] थॉमस रो ने अपनी अप्रोच बदली।

[23:10] उसने दोस्ती से ज्यादा प्रोफेशनल

[23:12] डिप्लोमेसी पर जोर दिया। वो जहांगीर के

[23:14] दरबार में 3 साल रहा और उसने सिर्फ

[23:16] फैक्ट्री बनाने की इजाजत नहीं मांगी।

[23:18] तो फिर क्या मांगा? उसने एक ऐसी डील की

[23:21] जिससे कंपनी को बड़ा फायदा हुआ। व्यापार

[23:23] में छूट यानी टैक्स में रियायतें।

[23:26] ओहो अब बात आई जमीन पर अपना अड्डा बनाने

[23:28] की। स्रोतों में दो पहली फैक्ट्रियों का

[23:30] जिक्र है। एक टेंपरेरी और एक परमानेंट।

[23:32] इसका क्या मतलब है?

[23:33] यह उनकी बिजनेस स्ट्रेटजी का एक बेहतरीन

[23:36] उदाहरण है जो आज के स्टार्टअप्स की तरह

[23:38] है। 1611 में उन्होंने मसूलीपट्टनम में

[23:41] अपनी पहली अस्थाई फैक्ट्री खोली।

[23:43] अस्थाई।

[23:44] हां, एक तरह का पायलट प्रोग्राम या

[23:46] मार्केट टेस्टिंग था। उन्होंने बस पानी

[23:48] में पैर डालकर देखा कि माहौल कैसा है,

[23:50] व्यापार कैसे चलता है।

[23:51] और यह फैक्ट्री शब्द थोड़ा कंफ्यूजिंग हो

[23:53] सकता है। क्या यहां कुछ बनता था जैसे आज

[23:55] की फैक्ट्रियों में बनता है?

[23:56] नहीं, बिल्कुल नहीं। और यह समझना बहुत

[23:58] जरूरी है। उस जमाने की फैक्ट्री का मतलब

[24:00] था एक किला बंद ट्रेडिंग पोस्ट।

[24:02] अच्छा।

[24:03] यह एक बड़ा कंपाउंड होता था जिसमें गोदाम

[24:06] यानी वेयर हाउसेस, दफ्तर और कर्मचारियों

[24:08] के रहने की जगह होती थी। यह व्यापार का एक

[24:11] मजबूत सुरक्षित अड्डा था ना कि कोई

[24:13] मैन्युफैक्चरिंग प्लांट।

[24:14] तो मसूली पटना में एक पायलट प्रोजेक्ट था।

[24:16] तो फिर परमानेंट हेडक्वार्टर्स कहां बना?

[24:18] जब उन्हें यकीन हो गया कि भारत में

[24:20] व्यापार करना फायदेमंद है तब उन्होंने

[24:23] 1613 में सूरत में अपनी पहली स्थाई

[24:26] फैक्ट्री स्थापित की।

[24:28] सूरत में?

[24:28] हां, यह उनका पहला प्रॉपर हेड क्वार्टर्स

[24:31] था। एक मजबूत ठिकाना जहां से वो अपना

[24:34] वेस्टर्न इंडिया का पूरा ऑपरेशन चला सकते

[24:37] थे।

[24:37] पहले टेस्ट करो फिर इन्वेस्ट करो।

[24:39] हां, यह उनकी सोची समझी रणनीति थी।

[24:42] लेकिन उनके लिए राह आसान नहीं थी। उन्हें

[24:44] सिर्फ स्थानीय राजाओं से ही नहीं बल्कि

[24:45] दूसरी यूरोपीय कंपनियों से भी मुकाबला

[24:47] करना पड़ रहा था।

[24:48] सही जैसे पुर्तगाली और डच

[24:51] तो सिर्फ फैक्ट्रियां बनाने से तो काम

[24:52] नहीं चलता।

[24:53] सही पकड़ा और यहीं से उनकी रणनीति और

[24:56] ज्यादा आक्रामक होने लगी। उन्होंने महसूस

[24:59] किया कि अगर भारत में टिकना है तो सिर्फ

[25:02] व्यापार से काम नहीं चलेगा।

[25:03] उन्हें अपनी ताकत बढ़ानी होगी।

[25:05] बिल्कुल। इसके लिए उन्होंने एक चार

[25:07] सूत्रीय योजना अपनाई। पहला नए शहरों की

[25:10] स्थापना करना जो उनके पावर सेंटर्स बने।

[25:13] दूसरा पूरे भारत में नई फैक्ट्रियां खोलना

[25:16] ताकि उनका ट्रेडिंग नेटवर्क फैले। तीसरा

[25:19] जरूरत पड़ने पर युद्ध लड़ना ताकि दुश्मनों

[25:22] को रास्ते से हटाया जा सके।

[25:23] और चौथा

[25:24] और चौथा भारतीय राजाओं के साथ संधियां

[25:27] मतलब ट्रीटीज करना ताकि उन्हें राजनीतिक

[25:30] संरक्षण मिले।

[25:31] और इसी एक्सपेंशन प्लान का सबसे बड़ा

[25:33] हिस्सा था तीन बड़े शहरों की स्थापना। यह

[25:35] शहर ब्रिटिश राज के तीन स्तंभ बने।

[25:38] हां, ए था मद्रास। हम

[25:40] 1639 में फ्रांसिस डे नाम के एक अंग्रेज

[25:43] ने चंद्रगिरी के राजा से जमीन का एक

[25:46] टुकड़ा खरीदा।

[25:47] खरीदा।

[25:47] हां, यह एक सीधी साधी रियलस्टेट डील थी।

[25:50] उन्होंने वहां फोर्टसन जॉर्ज बनाया और

[25:52] मद्रास शहर की नींव रखी। यह पूर्वी तट पर

[25:56] बंगाल की खाड़ी में उनका सबसे मजबूत अड्डा

[25:59] बन गया।

[25:59] अच्छा।

[26:00] जहां से वो दक्षिण पूर्व एशिया के साथ

[26:02] होने वाले व्यापार पर नजर रख सकते थे।

[26:05] तो एक शहर खरीद लिया। लेकिन दूसरे शहर की

[26:07] कहानी तो किसी फिल्म जैसी है मुंबई?

[26:09] ये वाकई एक अजीब घटना है। 1661 में

[26:13] ब्रिटेन के राजा चार्ल्स द्वितीय की शादी

[26:16] पुर्तगाल की राजकुमारी कैथरीन से हुई और

[26:18] पुर्तगाल ने दहेज में चार्ल्स को पूरा का

[26:21] पूरा बॉम्ब का द्वीप दे दिया।

[26:23] 1 मिनट क्या? दहेज में एक पूरा द्वीप मतलब

[26:25] वहां रहने वाले लोगों के साथ यह कैसे हो

[26:27] सकता है?

[26:28] उस समय यूरोपीय शक्तियों के लिए यह आम बात

[26:30] थी। उनके लिए जमीन का एक टुकड़ा था। अब

[26:33] ब्रिटेन के राजा के लिए भारत का यह छोटा

[26:35] सा द्वीप किसी काम का नहीं था।

[26:37] संभालना एक सिर दर्द।

[26:38] एक्जेक्टली। तो 1668 में उसने इसे ईस्ट

[26:43] इंडिया कंपनी को सिर्फ 10 पाउंड सालाना के

[26:46] किराए पर दे दिया।

[26:47] बस ₹10 पाउंड? आज के हिसाब से तो कुछ भी

[26:49] नहीं।

[26:50] बिल्कुल। राजा ने सोचा कि इसका मैं क्या

[26:52] करूंगा। इससे अच्छा है कि कंपनी को दे दूं

[26:54] और कुछ किराया ही आता रहेगा। फिर गेराल्ड

[26:56] औंगियर नाम के एक दूरदर्शी गवर्नर ने

[26:59] मुंबई को एक बड़े शहर के रूप में विकसित

[27:01] किया।

[27:01] वाह! इस तरह एक शाही दहेज कंपनी की सबसे

[27:05] कीमती संपत्तियों में से एक बन गया और

[27:07] भारत की फ्यूचर फाइनेंसियल कैपिटल की नींव

[27:10] रखी गई।

[27:11] तो एक शहर खरीदा, एक दहेज में मिला और

[27:14] तीसरा कोलकाता।

[27:15] कोलकाता की कहानी इन दोनों के बीच की है।

[27:17] 1698 में जॉब चारनॉक नाम के एक कंपनी

[27:21] एजेंट ने बंगाल के सूबेदार से तीन गांव

[27:24] खरीदे। सुतानाती, कालीकाटा और गोविंदपुर।

[27:27] तीन गांव।

[27:28] हां, यह कोई बड़ा शहर नहीं था। बस तीन

[27:30] गांव थे। इन तीनों को मिलाकर उसने कोलकाता

[27:33] शहर की स्थापना की और यह एक मास्टर

[27:35] स्ट्रोक था क्योंकि बंगाल उस समय भारत का

[27:38] सबसे अमीर सुबा था।

[27:39] मतलब कोलकाता पर कब्जा मतलब बंगाल की दौलत

[27:42] पर नजर रखना।

[27:43] सही 1700 तक का समय था अपनी जड़े जमाने

[27:46] का, ठिकाने बनाने का और व्यापार को फैलाने

[27:49] का। लेकिन अब जब उनके पास यह तीन मजबूत

[27:52] लॉन्च पैड्स थे तो उनकी रणनीति बदल गई।

[27:54] कैसे?

[27:55] एक व्यापारी जानता है कि सिर्फ गोदाम

[27:57] बनाने से काम नहीं चलता। आपको पूरे बाजार

[28:00] पे कब्जा करना होता है और यहीं से उनकी

[28:02] रणनीति में सबसे बड़ा बदलाव आया शहर बसाने

[28:05] से आगे बढ़कर इलाके जीतने का।

[28:08] और इसके लिए उन्होंने अपना निशाना बनाया

[28:10] बंगाल को जो सोने की चिड़िया था।

[28:12] जी हां, बंगाल की दौलत, वहां की राजनीतिक

[28:15] अस्थिरता और कलकत्ता में उनकी मौजूदगी। इन

[28:18] सब ने मिलकर एक परफेक्ट स्टॉर्म बना दिया।

[28:20] तो उन्होंने क्या किया?

[28:21] कंपनी ने बंगाल के अंदरूनी मामलों में दखल

[28:24] देना शुरू कर दिया। और इसी दखल अंदाजी का

[28:26] नतीजा थी वह दो लड़ाईयां जिन्होंने भारत

[28:29] का इतिहास हमेशा के लिए बदल दिया।

[28:31] 1757 का प्लासी का युद्ध और 1764 का बक्सर

[28:35] का युद्ध।

[28:36] प्लासी का युद्ध तो एक धोखा था। एक साजिश

[28:39] थी जिसमें लड़ाई कम और सौदा ज्यादा हुआ।

[28:42] हम

[28:42] लेकिन बक्सर का युद्ध एक असली लड़ाई थी

[28:44] जिसमें कंपनी ने मुगल बादशाह, अवध के नवाब

[28:48] और बंगाल के नवाब तीनों की मिलीजुली सेना

[28:50] को हरा दिया।

[28:51] और बक्सर की लड़ाई के बाद क्या हुआ? बक्सर

[28:54] के बाद मुगल बादशाह ने ईस्ट इंडिया कंपनी

[28:56] को बंगाल, बिहार और उड़ीसा का दीवान बना

[29:00] दिया।

[29:00] दीवान मतलब?

[29:01] दीवानी का मतलब था टैक्स वसूलने का

[29:04] अधिकार। अब सोचिए एक प्राइवेट कंपनी को एक

[29:07] पूरे देश के सबसे अमीर हिस्से का टैक्स

[29:10] वसूलने का अधिकार मिल गया।

[29:11] यह तो बहुत बड़ी बात थी।

[29:13] यह वो पल था जब ईस्ट इंडिया कंपनी सिर्फ

[29:16] एक व्यापारिक कंपनी नहीं रही। वो एक शासक

[29:18] बन गई। उनके पास अब बेहिसाब दौलत थी और उस

[29:21] दौलत से उन्होंने एक बड़ी सेना खड़ी की।

[29:24] यहीं से भारत में ब्रिटिश राज की असल

[29:26] शुरुआत होती है। कहानी शुरू होती है मुगल

[29:29] बादशाह औरंगजेब की मृत्यु के बाद जब मुगल

[29:32] सत्ता मतलब बिखर रही थी।

[29:35] हां। और बंगाल जैसे बड़े और अमीर सूबे खुद

[29:38] को स्वतंत्र घोषित करने लगे थे।

[29:39] यहीं पर मुर्शिद कुली खान का नाम आता है।

[29:42] हां। मुर्शिद कुली खान जिसे 1717 में मुगल

[29:45] बादशाह फर्रुख सीयर ने बंगाल का नवाब

[29:48] नियुक्त किया था। उसी ने बंगाल में एक

[29:49] स्वतंत्र राज्य की नींव रखी और 1719 में

[29:52] उड़ीसा को भी बंगाल में मिला लिया।

[29:54] अच्छा उसके बाद सत्ता उसके दामाद

[29:57] शुजााउद्दीन के पास आई जिसने 1733 में

[30:00] बिहार पर भी अधिकार कर लिया।

[30:02] जी

[30:03] और यही कहानी में बहुत ही महत्वपूर्ण

[30:06] व्यक्ति अली वर्दी खान की एंट्री होती है।

[30:08] जिसे शुजााउद्दीन ने बिहार का सूबेदार

[30:11] बनाया था। था।

[30:12] अली वर्दी खान एक बहुत ही योग्य और कह

[30:14] सकते हैं महत्वाकांक्षी व्यक्ति था। तो जब

[30:16] शुजााउद्दीन के बाद उसका बेटा सरफराज खान

[30:18] नवाब बना जो उतना काबिल नहीं था तो अली

[30:20] वर्दी खान ने मौके का फायदा उठाया

[30:22] और उसने क्या किया?

[30:23] 1740 में गिरिया का युद्ध हुआ। उसमें उसने

[30:26] सरफराज खान को हराकर खुद को बंगाल का नवाब

[30:29] घोषित कर दिया।

[30:30] तो इससे पता चलता है कि उस जमाने में ताकत

[30:32] और काबिलियत ही सब कुछ थी।

[30:34] हां।

[30:35] अब बंगाल के नवाब अली वर्दी खान थे। लेकिन

[30:37] उनके सामने भी चुनौतियां कम नहीं हां

[30:40] मराठों ने मराठों ने उन्हें 1751 में

[30:43] हराया था। जिसके बाद संधि के तौर पर

[30:45] उन्हें उड़ीसा का प्रांत और सालाना ₹1 लाख

[30:48] देने पड़े।

[30:48] अली वर्दी खान यूरोपियों को बहुत अच्छे से

[30:51] समझते थे। उनका एक बहुत प्रसिद्ध कथन भी

[30:53] है।

[30:54] वो मधुमक्खी वाला?

[30:55] हां बिल्कुल।

[30:56] उन्होंने यूरोपियों की तुलना मधुमक्खी के

[30:58] छपते से की थी। उनका कहना था अगर उन्हें

[31:00] ना छेड़ा जाए तो वे शहद देंगी। लेकिन अगर

[31:03] छेड़ा गया तो वे काट काट कर मार डालेंगी।

[31:05] यह तो उनकी दूरदर्शिता थी।

[31:07] बिल्कुल। अलीवर्दी खान के बाद उनका नाती

[31:09] सिराजुद्दौला नवाब बना। लेकिन उसके अपने

[31:12] ही दुश्मन घर में मौजूद थे।

[31:14] जी। उसका चचेरा भाई शौकतगंज और उसकी मौसी

[31:16] घसीटी बेगम यह सब उसके खिलाफ षड्यंत्र कर

[31:19] रहे थे।

[31:20] और इसी आंतरिक संघर्ष ने सिराजुद्दौला की

[31:23] स्थिति को कमजोर कर दिया था।

[31:25] हां, हालांकि उसने 1756 में मनिहारी के

[31:28] युद्ध में शौकतगंज को मार दिया था। लेकिन

[31:30] यह अंदरूनी कलह अंग्रेजों को अपना खेल

[31:32] खेलने का मौका दे रही थी। यहां से कहानी

[31:34] तेजी से बदलती है। जब सिराज अपने घरेलू

[31:37] दुश्मनों से उलझा हुआ था तब अंग्रेज

[31:40] कोलकाता में और फ्रांसीसी चंद्रनगर में

[31:43] किलेबंदी कर रहे थे। नवाब के मना करने पर

[31:46] भी वे नहीं रुके।

[31:47] और यह तो नवाब की सत्ता को सीधी चुनौती

[31:49] थी।

[31:49] बिल्कुल।

[31:50] जवाब में सिराजुद्दौला ने जून 1756 मेंक

[31:54] पर हमला कर फोर्ट विलियम पर कब्जा कर

[31:56] लिया।

[31:56] और यहीं पर वो ब्लैक होल की घटना का जिक्र

[31:59] आता है।

[31:59] हां। जिसके बारे में श्रोत बताते हैं कि

[32:01] यह अंग्रेजों का दावा है जबकि भारतीय पक्ष

[32:04] इसे नहीं मानता एक प्रोपोगेंडा की तरह।

[32:06] अच्छा फिर सिराज नेक मानिक चंद नाम के एक

[32:09] अधिकारी को सौंप दिया और खुद मुर्शिदाबाद

[32:11] लौट आया।

[32:12] जो एक बहुत बड़ी भूल साबित हुई।

[32:14] कैसे?

[32:14] क्योंकि खबर मिलते ही मद्रास से रॉबर्ट

[32:16] क्लाइव अपनी सेना के साथ पहुंच गया।

[32:18] और क्लाइव ने पहले तो मानिक चंद को रिश्वत

[32:21] देकर कलकत्ता वापस ले लिया।

[32:23] हां। और फिर फरवरी 1757 में सिराजुद्दौला

[32:26] के साथ अलीनगर की संधि की। इस संधि से

[32:28] अंग्रेजों को किलेबंदी करने और अपने

[32:30] सिक्के ढालने तक की अनुमति मिल गई।

[32:32] लेकिन क्लाइव का इरादा तो कुछ और ही था।

[32:34] बिल्कुल। उसने संधि के तुरंत बाद

[32:36] फ्रांसीसियों के चंद्रनगर पर हमला करके उस

[32:39] पर कब्जा कर लिया।

[32:40] जिसे सिराजुद्दौला ने संधि का उल्लंघन

[32:42] माना।

[32:42] हां। और यहीं से प्लासी के युद्ध की

[32:44] भूमिका तैयार हो गई।

[32:45] तो आखिरकार 23 जून 1757 को प्लासी के

[32:49] मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने थी। एक

[32:51] तरफ सिराजुद्दौला के करीब 50000 सैनिक

[32:54] और दूसरी तरफ क्लाइव के महज 3000 सैनिक।

[32:57] नतीजों को देखते हुए यह यकीन करना मुश्किल

[32:59] है। पर सिराजुद्दौला यह युद्ध हार गया।

[33:02] ऐसा कैसे हुआ?

[33:03] इसका एक ही जवाब है धोखा और षड्यंत्र।

[33:06] सिर्फ धोखा।

[33:07] रॉबर्ट क्लाइव ने यह लड़ाई सैन्य बल से

[33:09] नहीं बल्कि साजिश से जीती थी। उसने नवाब

[33:11] के सबसे खास लोगों को अपनी तरफ मिला लिया

[33:14] था।

[33:14] इनमें सबसे बड़ा नाम था सेनापति मीर जाफर।

[33:17] और उसके साथ थे अमीर चंद, जगत सेठ और राय

[33:20] दुर्लभ। नवाब की तरफ से मीर मदन और

[33:23] मोहनलाल जैसे वफादार लोग लड़े पर वे इस

[33:25] धोखे के सामने टिक नहीं सके।

[33:27] तो युद्ध के बाद क्या हुआ?

[33:28] सिराजुद्दौला की हत्या कर दी गई और साजिश

[33:31] के तहत मीर जाफर को बंगाल का नया नवाब बना

[33:34] दिया गया।

[33:34] लेकिन वो तो सिर्फ अंग्रेजों की कठपुतली

[33:36] था।

[33:37] बिल्कुल। उसने इनाम के तौर पर अंग्रेजों

[33:39] को 24 परगना की जमींदारी और बेशुमार दौलत

[33:42] दी। इससे शाही खजाना लगभग खाली हो गया।

[33:45] 1757 में अंग्रेजों ने सिराजुद्दौला को

[33:47] हराया और मीर जाफर को बंगाल का नवाब बना

[33:50] दिया। सब कुछ योजना के मुताबिक लग रहा था।

[33:53] अंग्रेजों के पास अपना एक कठपुतली नवाब

[33:56] था। लेकिन यह व्यवस्था ज्यादा दिन चली

[33:59] नहीं।

[33:59] नहीं चली चल ही नहीं सकती थी। क्योंकि

[34:01] अंग्रेजों की मांगे कभी खत्म ही नहीं होती

[34:03] थी। उन्होंने मीर जाफर से इतना पैसा और

[34:05] इतने तोहफे वसूले कि बंगाल का खजाना मतलब

[34:08] खाली होने लगा।

[34:09] और जब मीर जाफर ने और पैसे देने में थोड़ी

[34:12] आनाकानी शुरू की। तो अंग्रेजों को लगा कि

[34:15] यह कठपुतली अब उनके काम की नहीं रही। उनके

[34:17] लिए नवाब एक एटीएम मशीन जैसा था और जब

[34:19] मशीन से पैसे निकलने बंद हो गए तो

[34:21] उन्होंने मशीन ही बदलने का फैसला कर लिया।

[34:23] और यहीं कहानी में मीर कासिम की एंट्री

[34:26] होती है जो मीर जाफर का ही दामाद था।

[34:28] हां, 1760 में अंग्रेजों ने उसे नया नवाब

[34:31] बना दिया।

[34:32] जाहिर है यह मुफ्त में तो नहीं हुआ होगा।

[34:34] बिल्कुल नहीं। इसकी एक भारी कीमत थी। मीर

[34:36] कासिम को नवाब बनने के बदले बर्धवान,

[34:39] मिदनापुर और चडगांव जैसे तीन बड़े और अमीर

[34:42] जिले अंग्रेजों को सौंपने पड़े।

[34:44] तीन जिले

[34:45] हां और साथ ही कंपनी के बड़े अधिकारियों

[34:47] को लाखों रुपए तोहफे में भी दिए। अंग्रेज

[34:49] खुश थे। उन्हें लगा कि उन्हें मीर जाफर से

[34:51] भी ज्यादा आज्ञाकारी कठपुतली मिल गई है।

[34:54] लेकिन वह बहुत बड़ी गलतफहमी में थे।

[34:56] और यहीं से कहानी दिलचस्प हो जाती है। मीर

[34:59] कासिम अपने ससुर की तरह सिर्फ नाम का नवाब

[35:02] नहीं बनना चाहता था। हम

[35:03] वह समझ गया था कि अगर अंग्रेजों के

[35:05] नियंत्रण से बाहर नहीं निकला तो उसका भी

[35:08] वही हश्र होगा जो मीर जाफर का हुआ था।

[35:10] हां और उसने कुछ ऐसे कदम उठाए जो उस समय

[35:13] के हिसाब से बहुत बहुत साहसी माने जाएंगे।

[35:16] जैसे कि

[35:16] सबसे पहला और बड़ा कदम था अपनी राजधानी

[35:19] बदलना। 1762 में उसने अपनी राजधानी

[35:22] मुर्शिदाबाद से मुंगेर शिफ्ट कर दी।

[35:24] मुर्शिदाबाद से मुंगेर ये सिर्फ जगह बदलना

[35:26] तो नहीं रहा होगा। इसके पीछे जरूर कोई

[35:28] गहरी सोच होगी।

[35:29] बहुत गहरी सोच थी। देखिए मुर्शिदाबाद

[35:31] कोलकाता के पास था जहां अंग्रेजों का गढ़

[35:34] था।

[35:34] अच्छा।

[35:34] वहां रहकर कंपनी के अधिकारियों की रोज-रोज़

[35:37] की दखलअंदाजी से बचना नामुमकिन था। मुंगेर

[35:40] दूर था, सुरक्षित था। वहां मीर कासिम अपनी

[35:42] शर्तों पर एक स्वतंत्र शासक की तरह काम कर

[35:44] सकता था और उसने सिर्फ यही नहीं किया।

[35:46] उसने अपनी सेना को आधुनिक बनाने पर भी

[35:49] बहुत जोर दिया। आधुनिक बनाने का मतलब

[35:51] सिर्फ नए हथियार खरीदना नहीं था। मीर

[35:53] कासिम समझ गया था कि अंग्रेजों की असली

[35:56] ताकत, उनकी ट्रेनिंग और अनुशासन है।

[35:58] अच्छा। इसलिए उसने यूरोपीय तर्ज पर अपनी

[36:01] सेना को ट्रेनिंग देना शुरू किया। अपने

[36:03] तोपखाने को बेहतर बनाया और सबसे बड़ी बात

[36:05] मुंगेर में बंदूके और तोपें बनाने का एक

[36:08] कारखाना भी स्थापित किया।

[36:10] मतलब वो आत्मनिर्भर होना चाहता था।

[36:12] हां वो समझ गया था कि अंग्रेजों से लड़ने

[36:14] के लिए उनकी ही तकनीक और रणनीति अपनानी

[36:17] होगी।

[36:18] लेकिन असली टकराव तो जाहिर है पैसे और

[36:20] अधिकार को लेके ही होना था। है ना?

[36:23] बिल्कुल। और टकराव की सबसे बड़ी वजह बना

[36:25] दस्तक।

[36:26] दस्तक।

[36:27] हां। इसे समझना बहुत जरूरी है। मुगल

[36:29] बादशाह फर्रुख सीयर ने बहुत पहले

[36:31] अंग्रेजों को एक शाही फरमान दिया था जिससे

[36:34] उन्हें बंगाल में बिना टैक्स दिए व्यापार

[36:36] करने का अधिकार मिल गया था।

[36:38] अच्छा।

[36:39] इसके लिए कंपनी एक दस्तक यानी एक तरह का

[36:42] ट्रेड पास जारी करती थी जिसे दिखाकर उनका

[36:45] माल बिना चुंगी दिए निकल जाता था।

[36:46] मतलब कंपनी के सामान पर कोई टैक्स नहीं।

[36:49] यह तो उनके लिए बहुत बड़ा फायदा था।

[36:51] फायदा था। लेकिन समस्या तब शुरू हुई जब

[36:54] कंपनी के कर्मचारी अपने निजी व्यापार के

[36:57] लिए भी इन दस्तकों का दुरुपयोग करने लगे।

[37:00] ओह वह अपना सामान भी कंपनी का बता के

[37:02] टैक्स बचाते थे। इससे बंगाल के खजाने को

[37:04] दोहरा नुकसान हो रहा था। एक तो टैक्स नहीं

[37:06] मिल रहा था। दूसरा भारतीय व्यापारियों का

[37:08] माल टैक्स लगने की वजह से महंगा हो जाता

[37:10] था और वो मुकाबला ही नहीं कर पाते थे।

[37:12] यह तो एक तरह की आर्थिक लूट थी।

[37:15] और मीर कासिम ने इसी को रोकने की कोशिश

[37:17] की।

[37:17] हां। और उसने एक ऐसा दांव खेला जिसकी

[37:19] अंग्रेजों ने कल्पना भी नहीं की थी। क्या

[37:21] किया उसने?

[37:22] जब अंग्रेजों ने दस्तक का दुरुपयोग बंद

[37:24] करने से मना कर दिया तो मीर कासिम ने

[37:27] बंगाल के अंदर होने वाले व्यापार पर से

[37:30] सभी के लिए टैक्स हटा दिया।

[37:31] क्या सबके लिए?

[37:33] भारतीयों और अंग्रेज सबके लिए। उसने कहा

[37:35] अगर तुम टैक्स नहीं दोगे तो कोई नहीं

[37:37] देगा। उसने बराबरी का खेल खेला जिससे

[37:40] अंग्रेजों का वो जो विशेषाधिकार था वही

[37:42] खत्म हो गया।

[37:43] जाहिर है अंग्रेज आग बबूला हो गए होंगे।

[37:45] उनका सबसे बड़ा आर्थिक हथियार ही छीन लिया

[37:47] गया था। यहीं से सीधी लड़ाई की शुरुआत हुई

[37:49] होगी। बिल्कुल अंग्रेजों ने इसे अपनी

[37:51] तौहीन और अपने व्यापार पर हमला माना।

[37:53] कटवा, गिरिया और सूती जैसी जगहों पर

[37:56] छोटी-छोटी लड़ाईयां हुई जिनमें मीर कासिम

[37:58] की सेना हार गई।

[37:59] हम्म।

[37:59] उसे अपनी राजधानी मुंगेर छोड़कर भागना

[38:01] पड़ा। उसे समझ आ गया कि वो अकेला इस

[38:03] संगठित ताकत का सामना नहीं कर सकता।

[38:06] तो उसने मदद के लिए बाहर देखना शुरू किया

[38:08] और वो पहुंचा अवध के नवाब शुजाऊदौला के

[38:12] पास।

[38:12] जो उस समय उत्तर भारत के सबसे शक्तिशाली

[38:15] शासकों में से एक थे।

[38:16] हां। और सिर्फ सुजाऊ उद्दौला ही नहीं उस

[38:19] समय के नाम मात्र के ही सही लेकिन

[38:21] हिंदुस्तान के मुगल बादशाह शाह आलम

[38:23] द्वितीय भी इस गठबंधन में शामिल हो गए।

[38:26] तो अब कागज पर एक बहुत शक्तिशाली गठबंधन

[38:28] तैयार था।

[38:29] हां, बंगाल का भगोड़ा नवाब मीर कासिम, अवध

[38:32] का शक्तिशाली नवाब शुजााउद्दौला और मुगल

[38:34] बादशाह शाह आलम द्वितीय।

[38:36] यह तो किसी भी दुश्मन को डराने के लिए

[38:38] काफी था। तीन बड़ी ताकतें एक साथ।

[38:40] कागज पर तो यह गठबंधन बहुत मजबूत दिख रहा

[38:42] था। शायद 400 से 500 सैनिक थे। अंग्रेजों

[38:46] के पास हेक्टर मुनरो के नेतृत्व में

[38:48] 10,000 से भी कम।

[38:49] फिर भी वह जीत गए।

[38:50] हां, क्योंकि इस गठबंधन की सबसे बड़ी

[38:52] कमजोरी इसकी एकता में ही थी। तीनों नेताओं

[38:54] को एक दूसरे पर पूरा भरोसा नहीं था। सबके

[38:56] अपने-अपने स्वार्थ थे और जैसा कि स्रोत

[38:58] में लिखा है तीनों को एक दूसरे पर संदेह

[39:00] था।

[39:01] और फिर 22 अक्टूबर, 1764 को बक्सर के

[39:05] मैदान में वह ऐतिहासिक लड़ाई हुई।

[39:07] हां। और नतीजा उम्मीद से बिल्कुल अलग था।

[39:09] हेक्टर मुनरो की सेना छोटी जरूर थी लेकिन

[39:12] कहीं ज्यादा अनुशासित, बेहतर प्रशिक्षित

[39:14] और आधुनिक हथियारों से लैस थी।

[39:17] उनके तोपखाने ने कमाल का काम किया और जैसा

[39:19] हमने कहा भारतीय खेमे में एकता और एक

[39:21] स्पष्ट रणनीति की कमी थी। कुछ ही घंटों की

[39:23] लड़ाई में नतीजा साफ हो गया। अंग्रेजों की

[39:25] एक निर्णायक और जबरदस्त जीत हुई।

[39:27] और इस गठबंधन का क्या हुआ? मीर कासिम का

[39:29] क्या हुआ?

[39:29] मीर कासिम तो युद्ध के मैदान से भाग गया

[39:31] और फिर कभी दोबारा नहीं उभरा।

[39:33] और बाकी दो

[39:33] बचे शूजाउदरा और शाह आलम द्वितीय

[39:36] जिन्होंने अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण

[39:37] कर दिया। अब उन्हें नतीजों का सामना करना

[39:39] था और इसी मौके पर एक पुराने खिलाड़ी की

[39:41] वापसी हुई।

[39:42] रॉबर्ट क्लाइव

[39:43] रॉबर्ट क्लाइव

[39:44] जो प्लासी की जीत के बाद इंग्लैंड में

[39:46] हीरो बनकर बैठा था

[39:47] उसे हालात संभालने के लिए वापस भारत भेजा

[39:50] गया।

[39:50] तो लड़ाई खत्म हुई और अब हिसाब किताब का

[39:53] वक्त था। यहीं पर इलाहाबाद की संधि होती

[39:55] है जिसके बारे में हमने पढ़ा है।

[39:57] हां। लेकिन ये एक संधि नहीं थी। हम

[40:00] बल्कि दो अलग-अलग संधियां थी

[40:02] जो अगस्त 1765 में की गई

[40:05] और इन संधियों की शर्तों ने ही भारत का

[40:07] भविष्य तय कर दिया।

[40:08] चलिए इन दोनों संधियों को समझते हैं। पहली

[40:10] संधि किसके साथ हुई?

[40:11] पहली संधि हुई 12 अगस्त 1765 को मुगल

[40:15] बादशाह शाह आलम द्वितीय के साथ। क्लाइव ने

[40:18] बड़ी चालाकी से शुजाउद्दौला से इलाहाबाद

[40:22] और कड़ा के जिले छीनकर बादशाह को दे दिए।

[40:25] एक तरह से उन्हें खुश करने के लिए।

[40:26] लेकिन इसके बदले में जो लिया वो अनमोल था।

[40:28] हां। और वह था अंग्रेजों को बादशाह से

[40:32] बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी मिल गई।

[40:35] दीवानी।

[40:36] इसका मतलब?

[40:36] दीवानी का मतलब है राजस्व यानी टैक्स

[40:39] वसूलने का कानूनी अधिकार। यह कंपनी के लिए

[40:41] सबसे सबसे बड़ी जीत थी। अब वो सिर्फ

[40:43] व्यापारी नहीं बल्कि इन तीन बड़े प्रांतों

[40:45] के कानूनी टैक्स कलेक्टर बन गए थे।

[40:47] और बादशाह को क्या मिला?

[40:48] बदले में बादशाह को ₹26 लाख की सालाना

[40:50] पेंशन देकर इलाहाबाद में बिठा दिया गया।

[40:52] यह सोचना भी अजीब है। हिंदुस्तान का मुगल

[40:55] बादशाह जिसके नाम का सिक्का चलता था। अब

[40:58] एक ब्रिटिश कंपनी से पेंशन ले रहा था। यह

[41:00] तो सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि एक बहुत बड़ी

[41:02] सांकेतिक हार थी।

[41:04] बिल्कुल। यह बादशाहत के ताबूत में एक कील

[41:06] की तरह था। अब दूसरी संधि पर आते हैं जो 4

[41:08] दिन बाद 16 अगस्त को अवध के नवाब

[41:09] शुजााउद्दौला के साथ हुई।

[41:11] उनके साथ क्या हुआ?

[41:11] उसे इलाहाबाद और कड़ा के जिले तो देने ही

[41:13] पड़े। साथ ही युद्ध के हरर्जाने के तौर पर

[41:15] कंपनी को ₹50 लाख भी देने पड़े।

[41:17] 50 लाख?

[41:18] हां।

[41:18] और

[41:18] और अवध में अंग्रेजों को अपनी सेना रखने

[41:20] और उसके रखरखाव का पूरा खर्च नवाब से

[41:22] वसूलने का अधिकार मिल गया। अंग्रेजों ने

[41:24] अवध के नवाब से कहा कि हम तुम्हारी रक्षा

[41:28] करेंगे लेकिन उसका खर्चा भी तुम ही दोगे।

[41:30] यह तो एक तरह की वसूली हुई।

[41:32] यह वसूली ही थी जिसे कूटनीति का चोला

[41:34] पहनाया गया था। नवाब को अपनी ही सुरक्षा

[41:36] के लिए रखी गई अंग्रेजी सेना का पूरा खर्च

[41:38] उठाना था। इसके अलावा अंग्रेजों को अवध

[41:41] में टैक्स फ्री व्यापार करने की छूट भी

[41:42] मिल गई। संक्षेप में अवध का नवाब अपनी ही

[41:45] जमीन पर अंग्रेजों का मोहताज बन गया।

[41:46] और इस जीत के बाद मिली दीवानी ने तो सब

[41:49] कुछ बदल दिया होगा। सब कुछ इस संधि ने

[41:51] बंगाल में एक बहुत अजीब व्यवस्था को जन्म

[41:53] दिया जिसे इतिहास में दोहरी शासन प्रणाली

[41:56] या ड्यूल गवर्नमेंट कहते हैं।

[41:58] यह क्या था?

[41:58] मतलब पैसा वसूलने का अधिकार यानी दीवानी

[42:01] कंपनी के पास था। लेकिन प्रशासन, न्याय और

[42:04] कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी यानी निजामत

[42:06] नवाब के पास थी।

[42:07] ओ

[42:08] नतीजा कंपनी के पास सारी शक्ति और सारा

[42:11] पैसा था। पर कोई जिम्मेदारी नहीं और नवाब

[42:13] के पास सारी जिम्मेदारी थी पर कोई शक्ति

[42:15] या पैसा नहीं।

[42:16] यह तो तबाही का नुस्खा है शक्ति बिना

[42:18] जिम्मेदारी के। और तबाही हुई भी। इस

[42:20] व्यवस्था ने अगले 7 सालों में बंगाल को

[42:22] पूरी तरह से खोखला कर दिया। कंपनी के

[42:24] अधिकारी और कर्मचारी बेतहाशा लूटखसोट करते

[42:27] रहे। और जब 1770 में बंगाल में भयानक अकाल

[42:29] पड़ा

[42:30] तो किसी ने जिम्मेदारी नहीं ली।

[42:31] ना तो कंपनी ने कोई जिम्मेदारी ली और ना

[42:33] ही नवाब के पास लोगों की मदद करने के लिए

[42:35] कोई साधन थे।

[42:36] तो स्रोत में जो समय रेखा दी गई है वो अब

[42:39] ज्यादा साफ समझ आती है।

[42:41] 1765 में दीवानी मिलने के साथ बंगाल में

[42:44] ब्रिटिश प्रशासन की शुरुआत हुई। हां, यह

[42:47] एक तरह का अप्रत्यक्ष शासन था। फिर 1773

[42:51] में रेगुलेटिंग एक्ट आने तक बंगाल पर उनका

[42:54] पूर्ण अधिकार स्थापित हो गया और यह दोहरी

[42:56] शासन व्यवस्था खत्म कर दी गई।

[42:58] और फिर धीरे-धीरे 1857

[43:00] तक आते-आते

[43:02] पूरे भारत पर ब्रिटिश सरकार का प्रत्यक्ष

[43:04] शासन स्थापित हो गया। बक्सर ने उस

[43:06] साम्राज्य की पहली और सबसे मजबूत नींव रखी

[43:09] थी। बंगाल जीतने के बाद अंग्रेजों की नजर

[43:11] पूरे भारत पर थी। लेकिन उन्होंने खासतौर

[43:14] पर मैसूर को ही अपना निशाना क्यों बनाया?

[43:16] ऐसा क्या था मैसूर में?

[43:17] देखिए मैसूर उस वक्त सोने की चिड़िया जैसा

[43:20] था। खासकर अंग्रेजों के लिए।

[43:23] अच्छा?

[43:23] हां। इसकी सबसे बड़ी वजह थी उसकी लोकेशन।

[43:26] लोकेशन?

[43:26] जी। यह मालाबार तट पर था और वह तट मसालों

[43:30] खासकर काली मिर्च के व्यापार का दुनिया का

[43:32] सबसे बड़ा केंद्र था।

[43:34] तो व्यापार के लिहाज से मैसूर एक खजाना था

[43:36] जिस पर कंपनी कब्जा करना चाहती थी। 1565

[43:39] में तालीकोटा की लड़ाई में ताकतवर विजयनगर

[43:42] साम्राज्य बिखर गया।

[43:44] और इस बिखराव से कई छोटे-छोटे राज्य पैदा

[43:47] हुए और उन्हीं में से एक था मैसूर जहां

[43:49] वाडियार वंश का राज था।

[43:51] ओके।

[43:52] लेकिन 18वीं सदी के मध्य तक आते-आते जो

[43:54] वाडियार राजा थे चिक्का कृष्णराज वो सिर्फ

[43:57] नाम के राजा रह गए थे।

[43:59] मतलब असली ताकत किसी और के हाथ में थी।

[44:01] हां, असली ताकत दो भाइयों नंदराज और

[44:04] देवराज के हाथों में थी। वही सरकार चलाते

[44:07] थे। हैदर अली इसी नंदराज की सेना में एक

[44:10] मामूली घुड़सवार सैनिक था।

[44:12] बस एक सैनिक

[44:13] जी।

[44:13] उसने देखा कि भविष्य उसी का है जिसके पास

[44:16] आधुनिक सेना होगी।

[44:17] तो 1755 में जब उसे डिंडीगुल का फौजदार

[44:21] बनाया गया तो उसने पहला काम यही किया।

[44:23] क्या किया उसने?

[44:24] उसने फ्रांसिसियों की मदद ली जो उस वक्त

[44:27] भारत में अंग्रेजों के सबसे बड़े दुश्मन

[44:29] थे और उनकी मदद से एक मॉडर्न हथियारखाना

[44:32] एक शस्त्रगार खोला।

[44:34] अच्छा फ्रांसीसियों की मदद से।

[44:35] हां। यहीं से उसने अपनी ताकत बढ़ानी शुरू

[44:38] की। धीरे-धीरे उसने सेना में अपनी पकड़

[44:40] मजबूत की और 1761 आते-आते उसने नंदराज को

[44:44] सत्ता से हटाकर मैसूर की कमान पूरी तरह

[44:48] अपने हाथों में ले ली।

[44:49] कमाल है। तो यहीं से अंग्रेजों के कान

[44:50] खड़े हुए होंगे।

[44:51] बिल्कुल।

[44:52] उन्होंने इसे रोकने के लिए क्या किया?

[44:53] अंग्रेजों ने वही किया जो वो हमेशा करते

[44:56] थे।

[44:56] डिवाइड एंड रोल।

[44:57] हां, फूट डालो और राज करो। उन्हें लगा कि

[44:59] हैदर अली को अकेले हराना मुश्किल है। तो

[45:01] उन्होंने हैदर के दो सबसे बड़े पड़ोसी

[45:03] दुश्मनों को अपने साथ मिलाया। उत्तर में

[45:05] मराठे और पूर्व में हैदराबाद का निजाम।

[45:08] तो मतलब एक बड़ा गठबंधन बना लिया।

[45:10] जी, अंग्रेज, मराठे और निजाम तीनों मिलकर

[45:13] हैदर पर हमला करने वाले थे।

[45:15] लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यहीं पर हैदर की

[45:17] कूटनीति का जादू चला। है ना?

[45:19] बिल्कुल सही। हैदर का कमाल यह नहीं था कि

[45:22] उसने पैसा फेंका बल्कि यह था कि उसने

[45:24] अंग्रेजों की सबसे बड़ी कमजोरी को समझा।

[45:27] वो क्या थी?

[45:28] मराठे और निजाम दोनों ही अंग्रेजों को एक

[45:30] उभरते खतरे के तौर पर देख रहे थे। हैदर ने

[45:33] बस उस डर को हवा दी। उसने मराठों को पैसे

[45:36] का लालच दिया। इतना पैसा जितना अंग्रेज

[45:38] कभी नहीं दे सकते थे और निजाम को इलाके का

[45:40] वादा किया।

[45:41] अच्छा।

[45:42] उसने दोनों को समझाया कि आज मैं हूं। कल

[45:44] तुम्हारी बारी होगी और उसका दाव कम कर

[45:47] गया। मराठे चुप हो गए और निजाम तो पाला

[45:49] बदलकर हैदर के साथ आ गया।

[45:51] मतलब अंग्रेजों ने जो जाल बिछाया था वो

[45:53] उसी में फंस गए। और नतीजा

[45:55] नतीजा अंग्रेजों के लिए एक भयानक हार थी।

[45:58] पहले एंग्लो मैसूर युद्ध मतलब 1767 से 69

[46:02] तक उसमें हैदर अली ने अंग्रेजों को बुरी

[46:04] तरह हराया। वह लड़ते-लड़ते मद्रास तक

[46:07] पहुंच गया जो अंग्रेजों का गढ़ था।

[46:09] मद्रास तक?

[46:10] हां। कंपनी के इतिहास में यह पहली बार था

[46:13] जब उन्हें किसी भारतीय शासक के सामने इतनी

[46:15] बड़ी हार झेलनी पड़ी थी। उन्हें मजबूर

[46:18] होकर 1769 में मद्रास की संधि करनी पड़ी।

[46:22] इस संधि में क्या था?

[46:23] यह एक तरह से एक रक्षात्मक संधि थी। इसमें

[46:25] तय हुआ कि दोनों पक्ष एक दूसरे के जीते

[46:28] हुए इलाके लौटा देंगे और सबसे जरूरी बात

[46:31] कि भविष्य में अगर किसी तीसरे पक्ष ने उन

[46:34] पर हमला किया तो वे एक दूसरे की मदद

[46:36] करेंगे। हैदर ने यह क्लॉज़ खासतौर पर

[46:38] मराठों से बचने के लिए डलवाया था

[46:40] तो पहले युद्ध में अंग्रेजों को करारी हार

[46:43] मिली।

[46:43] जाहिर है वो चुप तो नहीं बैठे होंगे। तो

[46:45] दूसरे युद्ध की चिंगारी कहां से भड़की?

[46:47] चिंगारी भड़की अंग्रेजों के वादा तोड़ने

[46:49] से।

[46:50] अच्छा। हां

[46:50] जैसा कि सोर्स बताते हैं 1771 में संधि के

[46:53] सिर्फ दो साल बाद मराठों ने मैसूर पर हमला

[46:56] कर दिया

[46:56] और संधि के मुताबिक अंग्रेजों को मदद करनी

[46:58] चाहिए थी।

[46:59] हां पर वो नहीं आए। हैदर यह धोखा कभी नहीं

[47:01] भूला लेकिन युद्ध का जो तात्कालिक कारण

[47:04] बना वो था माहे

[47:05] माहे जी माहे हैदर के इलाके में एक छोटा

[47:09] सा फ्रांसीसी बंदरगाह था जहां से उसे

[47:12] हथियार मिलते थे।

[47:13] 1779 में अंग्रेजों ने उस पर कब्जा कर

[47:16] लिया। यह हैदर के लिए एक सीधी चुनौती थी।

[47:19] हम्।

[47:19] यहां एक और बड़ा वैश्विक कनेक्शन भी है।

[47:21] 1776 में अमेरिकी क्रांति हो चुकी थी

[47:25] और अमेरिका अंग्रेजों के हाथ से निकल गया

[47:27] था।

[47:27] हां।

[47:28] अमेरिका से उन्हें सस्ता कपास मिलता था जो

[47:30] अब बंद हो गया था।

[47:32] तो अब उनकी नजर भारत के कपास उत्पादक

[47:34] इलाकों पर थी और मैसूर उनमें से एक था।

[47:38] अच्छा। तो अब मैसूर पर कब्जा करना उनके

[47:40] लिए सिर्फ व्यापार नहीं बल्कि जरूरत बन

[47:41] गया था।

[47:42] बिल्कुल।

[47:42] तो दूसरा युद्ध शुरू हुआ 1780 से 84 इस

[47:45] बार क्या हुआ?

[47:46] शुरुआत में हैदर का पलड़ा भारी था। उसने

[47:48] कर्नाटक पर हमला किया और आर्काट जीत लिया

[47:52] लेकिन अंग्रेज इस बार ज्यादा तैयार थे।

[47:54] उन्होंने कूटनीति का इस्तेमाल किया और

[47:57] 1782 में मराठों के साथ साल बाई की संधि

[48:00] करके उन्हें युद्ध से बाहर कर दिया।

[48:03] तो हैदर अकेला पड़ गया।

[48:04] हां, अब हैदर अकेला पड़ गया था। और इसी

[48:07] दौरान युद्ध के बीच में ही 1782 में कैंसर

[48:11] से हैदर अली की मौत हो गई।

[48:13] और यहीं एंट्री होती है टीपू सुल्तान की।

[48:15] जी। पिता की मौत युद्ध के मैदान में और

[48:18] पूरी जिम्मेदारी अब बेटे के कंधों पर।

[48:20] हां और टीपू ने कमान संभालते ही युद्ध को

[48:23] जारी रखा। उसने हिम्मत नहीं हारी लेकिन

[48:25] दोनों ही पक्ष एक दूसरे को निर्णायक रूप

[48:28] से हरा नहीं पाए।

[48:29] तो युद्ध लगभग 2 साल और चला और आखिरकार

[48:32] 1784 में मंगलौर की संधि के साथ खत्म हुआ।

[48:36] इस संधि में भी दोनों ने एक दूसरे के जीते

[48:38] हुए इलाके लौटा दिए। तो एक तरह से दूसरा

[48:41] युद्ध बराबरी पर छूटा।

[48:42] तीसरे युद्ध की वजह क्या बनी? वजह बना

[48:44] त्रावणकोर। त्रावणकोर अंग्रेजों का सहयोगी

[48:47] राज्य था और टीपू का उसके साथ सीमा विवाद

[48:50] था। टीपू ने त्रावणकोर पर हमला कर दिया

[48:52] और अंग्रेजों को बहाना मिल गया।

[48:54] हां बिल्कुल। इस बार गवर्नर जनरल

[48:56] कॉर्नवालिस ने कोई गलती नहीं की। उसने फिर

[48:59] से मराठों और निजाम को अपने साथ मिला लिया

[49:01] और टीपू बुरी तरह अकेला पड़ गया।

[49:03] तो नतीजा तो फिर साफ ही होगा।

[49:05] जी। टीपू की बुरी तरह हार हुई। अंग्रेजो

[49:08] ने उसकी राजधानी श्रीरंगपट्टनम को घेर

[49:10] लिया और नतीजा यह हुआ कि टीपू को 1792 में

[49:14] श्रीरंगपट्टनम की संधि पर दस्तखत करने

[49:17] पड़े

[49:18] और यह संधि उसके लिए बहुत अपमानजनक थी ना।

[49:20] शायद उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी हार और

[49:22] अपमान था।

[49:23] ऐसा क्या था इस संधि में?

[49:24] इस संधि ने मैसूर की कमर तोड़ दी। टीपू को

[49:27] अपना आधा राज्य अंग्रेजों और उनके

[49:30] सहयोगियों को देना पड़ा। उस पर ₹3 करोड़

[49:33] का भारी-भरकम हर्जाना लगाया गया। 3 करोड़

[49:36] उस जमाने में

[49:37] जी और सबसे बड़ी जिल्लत की बात यह थी कि

[49:40] जब तक वो यह रकम चुका नहीं देता उसे अपने

[49:43] दो बेटों को अंग्रेजों के पास बंधक के तौर

[49:46] पर छोड़ना पड़ा।

[49:47] अपने बेटों को यह तो किसी भी शासक के लिए

[49:48] बहुत बड़ा सदमा होगा।

[49:50] बिल्कुल।

[49:50] कि नौबत कैसे आई?

[49:51] यहां एक नए खिलाड़ी की एंट्री होती है।

[49:54] लॉर्ड वेलेजली जो 1798 में गवर्नर जनरल

[49:57] बनकर भारत आया।

[49:59] हम्म

[49:59] वो अपने साथ एक बहुत ही खतरनाक नीति लेकर

[50:02] आया था। जिसे कहते हैं सहायक संधि या

[50:05] सब्सिडरी अलायंस।

[50:07] सहायक संधि। हमने इसके बारे में पढ़ा है,

[50:09] लेकिन यह असल में थी क्या? इसे राज्यों को

[50:11] हड़पने का एक चालाकी भरा तरीका क्यों कहते

[50:14] हैं?

[50:14] क्योंकि यह कागज पर एक सुरक्षा समझौता

[50:17] लगती थी। पर असल में यह एक जाल था।

[50:19] अंग्रेज किसी भारतीय राजा से कहते, बाहरी

[50:22] खतरों से हम आपकी रक्षा करेंगे। हमारी एक

[50:25] सेना आपके राज्य में तैनात रहेगी।

[50:27] सुनने में तो अच्छा लगता है।

[50:28] हां, राजा खुश हो जाता। लेकिन फिर अंग्रेज

[50:31] कहते, बस इस सेना का सारा खर्च आपको उठाना

[50:35] होगा और यह खर्च जानबूझकर इतना ज्यादा रखा

[50:38] जाता था कि राजा उसे चुका ही नहीं पाता

[50:40] था।

[50:41] और जब वो पैसे नहीं दे पाता

[50:42] तो बदले में उसे अपना इलाका अंग्रेजों को

[50:45] देना पड़ता था। तो सेना भी अंग्रेजों की,

[50:47] पैसा भी राजा का और आखिर में जमीन भी

[50:50] अंग्रेजों की।

[50:51] मतलब बिना लड़े राज्य हड़पने का एक शानदार

[50:53] तरीका?

[50:54] बिल्कुल बहुत ही शातिर योजना थी।

[50:56] तो वेलेजली ने इसे टीपू के खिलाफ कैसे

[50:58] इस्तेमाल किया? वेलेजली ने आते ही सबसे

[51:00] पहले हैदराबाद के निजाम पर यह संधि थोप

[51:03] दी। निजाम अब पूरी तरह अंग्रेजों के

[51:06] कंट्रोल में आ गया।

[51:07] जिसे टीपू और भी अलग-थलग पड़ गया।

[51:08] हां, इसके बाद वेलेजली ने टीपू पर भी

[51:11] सहायक संधि अपनाने का दबाव डाला।

[51:13] और टीपू सुल्तान ने मना कर दिया होगा।

[51:15] हां, उसके लिए यह अपनी आजादी और संप्रभुता

[51:18] को बेचने जैसा था। वो एक ऐसा शासक नहीं था

[51:21] जो अंग्रेजों के अधीन रहकर आज करें। उसने

[51:23] साफ इंकार कर दिया।

[51:24] और यही चौथे और आखिरी आंग्ल मैसूर युद्ध

[51:27] का कारण बना। बिल्कुल, वेलेजली को बस

[51:29] बहाना चाहिए था। उसने टीपू के इंकार को

[51:31] युद्ध का ऐलान माना। 1799 में अंग्रेजों

[51:34] ने दो तरफ से मैसूर पर हमला कर दिया।

[51:37] टीपू अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम के किले

[51:40] में वापस चला गया। अंग्रेजों ने किले को

[51:42] घेर लिया और 4 मई 1799 को अपनी राजधानी की

[51:47] रक्षा करते हुए टीपू सुल्तान लड़ते-लड़ते

[51:50] मारा गया।

[51:50] और टीपू की मौत के साथ ही मैसूर की उस

[51:52] चुनौती का अंत हो गया। जिसने लगभग 35

[51:54] सालों तक अंग्रेजों को चैन की सांस नहीं

[51:56] लेने दी थी। जी भारत ईस्ट इंडिया कंपनी को

[51:59] अगर किसी ने सबसे जबरदस्त टक्कर दी

[52:02] तो वो मराठा ही थे।

[52:03] हां और सबसे लंबे समय तक मैसूर, निजाम,

[52:06] बंगाल यह सब तो एक-एक करके या तो हार गए

[52:09] या अंग्रेजों के अधीन हो गए।

[52:10] सही बात है।

[52:11] लेकिन मराठा एक ऐसी पहेली थी जिसे सुलझाने

[52:14] में अंग्रेजों को लगभग 50 साल लग गए। तो

[52:17] आज हम इसी पहेली को सुलझाएंगे। हम इन तीन

[52:20] युद्धों की कहानी को परत दर परत खोलेंगे।

[52:23] तो, पहले युद्ध की जमीन यह तैयार होती है

[52:26] 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई के बाद।

[52:30] हां, उस हार ने मराठाओं को मतलब झोर कर रख

[52:33] दिया था।

[52:33] और पेशवा बालाजी बाजीराव के भी उसी दुख

[52:36] में मृत्यु हो गई।

[52:37] जी। उनके बाद आए माधवराव पेशवा, जो बहुत

[52:39] काबिल थे। उन्होंने मराठा शक्ति को फिर से

[52:41] खड़ा करने की पूरी कोशिश भी की।

[52:43] लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था।

[52:45] 1772 में बीमारी से उनकी भी मौत हो गई।

[52:49] और यहीं से आप कह सकते हैं मराठा राजनीति

[52:50] का वो कालाध्याय शुरू होता है।

[52:52] अच्छा। माधवराव के बाद उनके छोटे भाई

[52:55] नारायण राव पेशवा बने। लेकिन सिर्फ एक साल

[52:58] के लिए।

[52:58] क्यों? क्या हुआ?

[52:59] पुणे के शनिवारवाड़ा में उनकी बेरहमी से

[53:02] हत्या कर दी गई और हत्या का आरोप लगा उनके

[53:04] अपने ही चाचा रघुनाथ राव पर।

[53:06] जिन्हें इतिहास राघोबा के नाम से जानता

[53:08] है।

[53:09] क्योंकि राघोबा खुद पेशवा बनना चाहते थे।

[53:11] लेकिन कहानी में एक और बड़ा किरदार था

[53:13] नाना फडनवीस।

[53:15] हां, मराठा राजनीति के चाणक्य।

[53:17] तो उन्होंने क्या किया? नाना फडनवीस ने

[53:19] राघोबा के इस इस खेल को कामयाब नहीं होने

[53:23] दिया। उन्होंने नारायण राव के नवजात बेटे

[53:25] सवाई माधवराव या माधवराव द्वितीय को पेशवा

[53:28] घोषित कर दिया

[53:29] और एक काउंसिल बनाकर राजकाज चलाने लगे।

[53:32] जी इससे राघव बा के हाथ से सत्ता आते-आते

[53:34] रह गई और वह हताश हो गए।

[53:36] और इसी हताशा में उन्होंने वह कदम उठाया

[53:39] जिसने मराठा साम्राज्य के ताबूत में पहली

[53:42] कील ठोकी।

[53:42] वह मदद के लिए अंग्रेजों के पास चले गए।

[53:44] यह तो बहुत बड़ी बात थी। मतलब अपने ही

[53:47] लोगों के खिलाफ पेशवा की गद्दी के लिए एक

[53:49] भारी ताकत से मदद।

[53:51] हां। और यही यही मराठा राजनीति का वो

[53:53] टर्निंग पॉइंट था। देखिए सत्ता के लिए

[53:55] परिवार में हत्याएं पहले भी हुई थी। लेकिन

[53:57] इस बार फर्क यह था कि राघोबा ने अपनी

[53:59] लड़ाई जीतने के लिए एक बाहरी ताकत को घर

[54:02] के अंदर बुला लिया।

[54:02] और 1775 में उन्होंने बॉम्बे में

[54:05] अंग्रेजों से सूरत की संधि कर ली।

[54:07] बिल्कुल। इस संधि में तय हुआ कि अंग्रेज

[54:10] उन्हें पेशवा बनने में मदद करेंगे। और

[54:12] बदले में राघोबा उन्हें सालसेट और बसीन

[54:14] जैसे अहम इलाके देंगे।

[54:16] हां, एक मिनट। यहां एक बात थोड़ी अजीब है।

[54:19] क्या पूरी ईस्ट इंडिया कंपनी राघोबा की

[54:21] मदद करना चाहती थी? मैंने पढ़ा है कि उस

[54:23] वक्त कोलकाता में बैठे गवर्नर जनरल वारेन

[54:26] हेस्टिंग्स इस युद्ध के हक में नहीं थे?

[54:28] बहुत अच्छा सवाल है और यह समझना जरूरी है।

[54:30] उस समय ईस्ट इंडिया कंपनी कोई एक एक

[54:33] केंद्रीयकृत ताकत नहीं थी।

[54:34] अच्छा।

[54:34] बॉम्बे, मद्रास और कोलकाता की प्रेसिडेंसी

[54:37] अपने-अपने फैसले लेने में काफी हद तक आजाद

[54:40] थी। बॉम्बे के अधिकारी तो मराठाओं के

[54:42] इलाके में घुसने का मौका ढूंढ ही रहे थे।

[54:44] लेकिन वारेन हेस्टिंग्स जो कोलकाता में थे

[54:46] वह ज्यादा दूर की सोच रहे थे।

[54:48] जी।

[54:48] वो जानते थे कि दक्षिण में हैदर अली और

[54:50] मैसूर एक बड़ी चुनौती है और वह एक ही समय

[54:53] पर मराठाओं और मैसूर दोनों से लड़ना नहीं

[54:56] चाहते थे।

[54:57] तो फिर हुआ क्या? कोलकाता वाले मना कर रहे

[54:59] हैं बॉम्बे वाले युद्ध के लिए तैयार बैठे

[55:00] हैं।

[55:01] तो बॉम्बे वालों ने अपनी चला दी और युद्ध

[55:03] शुरू हो गया। लेकिन यह उनके लिए एक भयानक

[55:06] सपना साबित हुआ।

[55:07] तेलगांव की लड़ाई में।

[55:08] हां। 1779 में महाजी सिंधिया के नेतृत्व

[55:12] में मराठा सेना ने अंग्रेजी सेना को बुरी

[55:15] तरह घेर लिया और उन्हें घुटने टेकने पर

[55:17] मजबूर कर दिया।

[55:18] ये तो अंग्रेजो के लिए बहुत बड़ी बेइज्जती

[55:20] रही होगी।

[55:21] बहुत बड़ी उन्हें वड़गांव की संधि पर

[55:23] हस्ताक्षर करने पड़े जिसमें उन्हें जीते

[55:26] हुए सारे इलाके वापस करने थे।

[55:28] तो मतलब पहले राउंड में तो मराठा जीत गए।

[55:30] हां, मैदान में तो जीत गए लेकिन वारेन

[55:32] हेस्टिंग्स ने वडगांव की संधि को मानने से

[55:34] इंकार कर दिया।

[55:35] अच्छा और युद्ध जारी रखा। आखिरकार 1782

[55:39] में सालबाई की संधि हुई और पहला युद्ध

[55:42] खत्म हुआ।

[55:43] और इस संधि में क्या तय हुआ?

[55:44] इसमें अंग्रेजों ने महादजी द्वितीय को

[55:47] पेशवा मान लिया। राघोबा को पेंशन पर भेज

[55:49] दिया और उन्हें सालसेट का इलाका मिल गया।

[55:51] तो कागज पर देखें तो मराठाओं का पलड़ा

[55:54] भारी रहा। उन्होंने अपनी ताकत दिखाई।

[55:56] दिखाई लेकिन असल में वह एक बहुत बड़ी कीमत

[55:58] चुका चुके थे।

[55:59] क्या कीमत?

[56:00] उनके घर के झगड़े में अंग्रेजों को पंच

[56:02] बनने का मौका मिल गया था। वह मराठा

[56:03] राजनीति के अंदर घुस चुके थे।

[56:05] बिल्कुल। तो पहले युद्ध के बाद लगभग 20

[56:07] साल तक शांति रही। लेकिन जैसा कहते हैं यह

[56:10] तूफान से पहले की शांति थी।

[56:12] सही बात है। इन 20 सालों में मराठा खेमे

[56:15] में और पूरे भारत के राजनीतिक नक्शे पर

[56:17] बहुत कुछ बदल गया था।

[56:18] हां, तीन बड़ी घटनाएं हुई जिन्होंने दूसरे

[56:21] युद्ध की जमीन तैयार की।

[56:23] जी।

[56:23] पहली 1795 में महादजी सिंधिया की मृत्यु।

[56:27] वो सिर्फ एक ताकतवर सरदार नहीं थे। वो एक

[56:29] दूरदर्शी नेता थे जो मराठा संघ को एकजुट

[56:32] रखने की अहमियत समझते थे। और दूसरी बड़ी

[56:34] घटना हुई दक्षिण में।

[56:36] हां, 1799 में अंग्रेजों ने टीपू सुल्तान

[56:39] को हराकर मैसूर को पूरी तरह जीत लिया।

[56:42] इससे उनका एक बहुत बड़ा दुश्मन रास्ते से

[56:44] हट गया।

[56:44] और अब वो अपना पूरा ध्यान मराठाओं पर लगा

[56:47] सकते थे।

[56:48] बिल्कुल।

[56:48] और तीसरी और शायद सबसे बड़ी घटना थी नाना

[56:51] फडनवीस की मृत्यु।

[56:52] हां, साल 1800 में। अंग्रेज खुद उन्हें

[56:55] मराठा मैकिया वैली कहते थे।

[56:57] अच्छा।

[56:57] उनकी मौत पर एक ब्रिटिश राजनायक ने लिखा

[57:00] था। उनके साथ ही मराठा राज की सारी

[57:02] समझदारी और दूरदर्शिता खत्म हो गई।

[57:04] और यह बात सच साबित हुई।

[57:06] पूरी तरह नाना की मौत के बाद मराठा संघ

[57:09] ताश के पत्तों की तरह बिखर गया।

[57:11] और इसी बिखराव का फायदा अंग्रेजों ने

[57:13] उठाया।

[57:14] और इस समय पेशवा कौन थे?

[57:15] इस समय पेशवा थे बाजीराव द्वितीय। उसी

[57:18] राघोबा के बेटे।

[57:19] तो कह सकते हैं कि जैसे पिता वैसा बेटा?

[57:21] हां, बिल्कुल कह सकते हैं। वह काबिल नहीं

[57:23] थे और उनमें दूरदर्शिता की भारी कमी थी।

[57:26] उनकी इंदौर के होलकर परिवार से पुरानी

[57:28] दुश्मनी और उन्होंने क्या किया?

[57:30] सत्ता के नशे में उन्होंने जसवंत राव

[57:32] होलकर के भाई की पुणे में हत्या करवा दी।

[57:35] ओह तो होलकर ने इसका बदला लिया होगा।

[57:37] बदला लिया और जबरदस्त बदला लिया। जसवंतराव

[57:40] होलकर ने एक बड़ी सेना के साथ पुणे पर

[57:43] हमला कर दिया और पेशवा बाजीराव द्वितीय की

[57:45] सेना को बुरी तरह हरा दिया।

[57:47] पुणे पर होलकर का कब्जा हो गया?

[57:49] हां। और अब इतिहास ने खुद को दोहराया।

[57:51] बाजीराव द्वितीय भी अपने पिता की तरह

[57:54] भागकर अंग्रेजों के पास चले गए।

[57:55] बिल्कुल। वह भागकर बसीन पहुंचे और 1802

[57:58] में अंग्रेजों के साथ बसीन की संधि पर

[58:01] हस्ताक्षर कर दिए।

[58:02] और यह संधि जैसा कि स्रोत बताते हैं मराठा

[58:04] साम्राज्य के लिए एक डेथ वारंट साबित हुई।

[58:07] जी इस संधि के जरिए बाजीराव द्वितीय ने

[58:09] सहायक संधि यानी सब्सिडरी अलायंस को

[58:11] स्वीकार कर लिया।

[58:12] यह सहायक संधि क्या बला थी? सुनने में तो

[58:15] सहायक यानी मददगार लगती है।

[58:17] यह अंग्रेजों का सबसे खतरनाक हथियार था।

[58:19] कहने को तो यह सुरक्षा की गारंटी थी।

[58:21] लेकिन असल में यह गुलामी का दस्तावेज था।

[58:24] मतलब

[58:24] मतलब यह कि पेशवा को अपनी राजधानी में एक

[58:26] ब्रिटिश सेना रखनी थी जिसका पूरा खर्चा भी

[58:28] उन्हें ही उठाना था

[58:29] और बदले में

[58:30] बदले में उन्हें अपनी विदेशी नीतियां मतलब

[58:32] वो किस राज्य से दोस्ती करेंगे या दुश्मनी

[58:34] यह तय करने का अधिकार अंग्रेजों को सौंपना

[58:36] था।

[58:37] सीधे शब्दों में कहें तो मराठा साम्राज्य

[58:39] का मुखिया अब कागज पर आजाद था।

[58:41] लेकिन असल में वो अंग्रेजों का बंधक बन

[58:43] चुका था।

[58:44] जाहिर है सिंधिया और भोंसले जैसे बड़े

[58:46] सरदारों को यह मंजूर नहीं हुआ होगा।

[58:48] बिल्कुल नहीं। उन्होंने इसे अपनी आजादी पर

[58:50] हमला माना और अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध

[58:52] छेड़ दिया। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

[58:54] हां, मराठा एकजुट नहीं थे। होलकर इस लड़ाई

[58:57] से अलग रहे। गायवाड़ पहले ही अंग्रेजों से

[58:59] मिल चुके थे।

[59:00] अंग्रेजों ने अपनी फूट डालो और राज करो की

[59:03] नीति का बेहतरीन इस्तेमाल किया।

[59:04] जी। आर्थर वेलेसली जैसे काबिल जनरलों ने

[59:07] एक-एक करके सिंधिया और भोंसले दोनों को

[59:09] अलग-अलग लड़ाईयों में हरा दिया। बाद में

[59:11] होलकर भी लड़े और हारे।

[59:12] तो इस युद्ध के अंत तक मराठा शक्ति की कमर

[59:15] पूरी तरह टूट चुकी थी।

[59:16] पूरी तरह। मध्य भारत का एक बहुत बड़ा

[59:18] हिस्सा और दिल्ली आगरा का इलाका भी सीधे

[59:20] अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया था। तो

[59:22] दो युद्धों के बाद मराठा शक्ति लगभग बिखर

[59:25] चुकी थी। पेशवा अब सिर्फ नाम के शासक थे।

[59:28] अंग्रेजों की दया पर जी रहे थे।

[59:30] ऐसे में कोई भी सोचेगा कि कहानी खत्म हो

[59:32] गई। अंग्रेज पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर

[59:35] थे।

[59:35] राहुल अब बहुत देर हो चुकी थी। 1817-18

[59:38] में हुए इस तीसरे युद्ध में अंग्रेजों ने

[59:40] मराथों की बची कुची ताकत को भी बड़ी आसानी

[59:42] से कुचल दिया। इस दौर में कई लड़ाईयां

[59:44] हुई, लेकिन एक लड़ाई का जिक्र करना बहुत

[59:47] जरूरी है जिसमें सिर्फ सैन्य पहलू नहीं

[59:50] बल्कि एक बहुत गहरा सामाजिक पहलू भी छिपा

[59:52] है।

[59:52] आप भीमा कोरे गांव की लड़ाई की बात कर रहे

[59:54] हैं?

[59:54] हां, 1 जनवरी 1818

[59:57] यह लड़ाई इतनी अलग क्यों मानी जाती है?

[59:59] देखिए इस लड़ाई में एक तरफ पेशवा बाजीराव

[01:00:02] द्वितीय की लगभग 28,000 सैनिकों की विशाल

[01:00:05] सेना थी।

[01:00:06] और दूसरी तरफ ईस्ट इंडिया कंपनी की एक

[01:00:07] छोटी सी टुकड़ी जिसमें मुश्किल से 800

[01:00:10] सैनिक थे। लेकिन जो बात इसे खास बनाती है

[01:00:12] वो है उन 800 सैनिकों की सामाजिक बनावट।

[01:00:15] उनमें बड़ी संख्या में महार समुदाय के

[01:00:18] सैनिक थे।

[01:00:18] जी और इसका बहुत गहरा महत्व है।

[01:00:20] क्या?

[01:00:21] श्रोत बताते हैं कि पेशवा के ब्राह्मणवादी

[01:00:23] शासन के तहत महार समुदाय को भयानक, जातिगत

[01:00:26] उत्पीड़न और अपमान का सामना करना पड़ता

[01:00:28] था।

[01:00:29] उन्हें गले में हांडी और कमर में झाड़ू

[01:00:31] बांधकर चलने पर मजबूर किया जाता था। हां

[01:00:33] ताकि उनकी थूक जमीन पर ना गिरे और उनके

[01:00:36] पैरों के निशान मिट जाएं। तो उनके लिए यह

[01:00:38] लड़ाई सिर्फ ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए

[01:00:39] तनख्वाह पर लड़ना नहीं था।

[01:00:41] यह उनके आत्मसम्मान की लड़ाई थी।

[01:00:43] बिल्कुल यह उस जातिवादी घमंड के खिलाफ एक

[01:00:45] विद्रोह था जो सदियों से उनका दमन कर रहा

[01:00:48] था।

[01:00:48] तो उस लड़ाई में हुआ क्या?

[01:00:49] उस छोटी सी टुकड़ी ने पेशवा की विशाल सेना

[01:00:52] को दिन भर रोके रखा और उन्हें पीछे हटने

[01:00:54] पर मजबूर कर दिया। यह एक हैरान कर देने

[01:00:56] वाली जीत और आज भी दलित समुदाय खासकर महार

[01:01:00] समुदाय इस दिन को अपने शौर्य के प्रतीक के

[01:01:03] रूप में मनाता है।

[01:01:04] जी शौर्य दिवस की तरह यह घटना हमें याद

[01:01:06] दिलाती है कि इतिहास सिर्फ राजाओं और

[01:01:08] साम्राज्यों का नहीं होता। उसके भीतर समाज

[01:01:10] के दबे कुचले वर्गों के संघर्ष की

[01:01:12] कहानियां भी छिपी होती हैं।

[01:01:14] और इस युद्ध के बाद तो फिर सब कुछ खत्म हो

[01:01:16] गया होगा।

[01:01:17] हां, इस हार के बाद अंग्रेजों ने पेशवा के

[01:01:18] पद को ही हमेशा के लिए खत्म कर दिया।

[01:01:20] बाजीराव द्वितीय का क्या हुआ? उन्होंने

[01:01:22] आत्मसमर्पण कर दिया और उन्हें एक बड़ी

[01:01:24] पेंशन देकर कानपुर के पास बिठूर भेज दिया

[01:01:26] गया

[01:01:26] और बाकी मराठा सरदार

[01:01:28] उन्हें भी संधियों के जाल में झकड़ लिया

[01:01:30] गया और इस तरह पूरे मराठा साम्राज्य को

[01:01:32] बॉम्बे प्रेसिडेंसी में मिला लिया गया

[01:01:34] और भारत की उस आखिरी बड़ी स्वदेशी शक्ति

[01:01:37] का अंत हो गया जो अंग्रेजों को सीधे तौर

[01:01:39] पर चुनौती दे सकती थी

[01:01:41] जी

[01:01:41] तो आज हम इसी सफर को समझने की कोशिश

[01:01:44] करेंगे

[01:01:44] कि कैसे बंगाल का एक गवर्नर

[01:01:47] पूरे भारत का वायसराय बन गया

[01:01:48] एक्सक्टली

[01:01:49] ये क्रम बहुत दिलचस्प है मतलब सबसे पहले

[01:01:52] था बंगाल का गवर्नर

[01:01:53] और उस पर बैठा रॉबर्ट क्लाइव।

[01:01:55] फिर आया 1773 का रेगुलेटिंग एक्ट और पद बन

[01:02:00] गया बंगाल का गवर्नर जनरल

[01:02:02] और उस पर बैठने वाला पहला शख्स था वारेन

[01:02:05] हेस्टिंग्स और कहानी यहीं नहीं रुकी। 1833

[01:02:10] में इस पद को और बड़ा बनाया गया। भारत का

[01:02:12] गवर्नर जनरल

[01:02:14] ओके।

[01:02:14] और फिर 1857 के विद्रोह के बाद 1858 में

[01:02:19] जब शासन सीधे ब्रिटिश ताज के हाथ में गया

[01:02:23] तो यही पद भारत का वायसराय कहलाया और पहले

[01:02:26] वायसराय बने लॉर्ड कैनिंग।

[01:02:29] वाह! तो ये पूरी यात्रा बंगाल से शुरू

[01:02:31] होकर पूरे भारत पर कब्जे की कहानी है।

[01:02:33] सही कहा। चलिए तो कहानी के पहले किरदार

[01:02:35] रॉबर्ट क्लाइव से शुरू करते हैं। मतलब यह

[01:02:38] तो सोचने वाली बात है ना कि वो 1743 में

[01:02:40] भारत एक क्लर्क बनकर आया था।

[01:02:42] हम एक क्लर्क

[01:02:43] और कुछ ही सालों में एक पूरे सूबे की

[01:02:45] किस्मत का फैसला करने लगा। उसे भारत पर

[01:02:47] अंग्रेजी शासन का जन्मदाता भी कहा जाता

[01:02:49] है। आखिर उसमें ऐसा क्या था?

[01:02:51] उसमें चालाकी और क्रूरता का एक अजीब सा

[01:02:55] मिश्रण था।

[01:02:56] प्लासी की लड़ाई जो असल में एक लड़ाई कम

[01:02:59] और एक धोखा ज्यादा थी।

[01:03:00] बिल्कुल। उस धोखे की जीत ने क्लाइव को

[01:03:03] बंगाल का हीरो बना दिया। वह दो बार गवर्नर

[01:03:05] रहा। 1757 से 60 और फिर 1765 से 67 तक।

[01:03:10] अच्छा, उसके दूसरे कार्यकाल में आया। 1765

[01:03:13] में बंगाल में द्वैध शासन की शुरुआत।

[01:03:15] द्वैध शासन यानी डायर की। आखिर यह था

[01:03:19] क्या?

[01:03:19] आपका शक बिल्कुल सही है।

[01:03:20] ऐसा सिस्टम बनाया ही क्यों गया?

[01:03:22] इसे समझने के लिए हमें बक्सर के युद्ध के

[01:03:25] बाद हुई इलाहाबाद की संधि को देखना होगा।

[01:03:27] इस संधि के बाद कंपनी बंगाल की असली मालिक

[01:03:30] बन गई थी।

[01:03:31] लेकिन क्लाइव सीधे-सीधे शासन की

[01:03:33] जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता था। उसे

[01:03:35] विद्रोह का डर था तो उसने एक बहुत ही क्या

[01:03:38] कहते हैं चालाक व्यवस्था बनाई। उसने शासन

[01:03:40] को दो हिस्सों में बांट दिया।

[01:03:42] दो हिस्से कैसे?

[01:03:43] पहला हिस्सा था दीवानी। इसका सीधा मतलब था

[01:03:46] पैसा।

[01:03:46] पैसा

[01:03:47] यानी लगान वसूलने, टैक्स इकट्ठा करने और

[01:03:50] खजाना भरने का सारा अधिकार। यह मलाईदार

[01:03:52] हिस्सा कंपनी ने अपने पास रख लिया।

[01:03:54] और दूसरा हिस्सा जाहिर है वो कम मलाईदार

[01:03:56] रहा होगा। बिल्कुल। दूसरा हिस्सा था

[01:03:58] निजामत। मतलब असल सरकार चलाने का सारा सिर

[01:04:01] दर्द, पुलिस, अदालतें, सेना, कानून

[01:04:03] व्यवस्था, लोगों की भलाई यह सारा झंझट

[01:04:06] उन्होंने नवाब के सर पर डाल दिया।

[01:04:07] और नवाब को क्या मिला?

[01:04:09] उसे सालाना ₹53 लाख की पेंशन थमा दी।

[01:04:11] 1 मिनट। मतलब पैसा कंपनी वसूलेगी

[01:04:14] और उस पैसे से शासन नवाब चलाएगा। यह तो यह

[01:04:17] तो सुनने में ही बहुत अजीब लग रहा है।

[01:04:19] इसे ऐसे समझिए कि किसी ने आपको एक गाड़ी

[01:04:21] की चाबी दी और कहा कि गाड़ी की देखभाल,

[01:04:23] पेट्रोल का खर्चा और अगर कोई एक्सीडेंट हो

[01:04:25] जाए तो सारी जिम्मेदारी आपकी है।

[01:04:27] लेकिन गाड़ी चलाकर जो भी कमाई होगी वो मैं

[01:04:30] रखूंगा।

[01:04:30] एक्साक्टली, नवाब की हालत ठीक यही थी।

[01:04:33] अधिकार शून्य, जिम्मेदारियां 100%

[01:04:35] और इस काम में मदद के लिए भी तो कोई रखा

[01:04:37] था उन्होंने।

[01:04:38] हां, ताकि वसूली भी भारतीयों के ही हाथों

[01:04:40] से करवाई जाए। दो भारतीय उपवान रख लिए।

[01:04:42] बंगाल के लिए मोहम्मद रजा खान और बिहार के

[01:04:44] लिए राजा सिताब राय। तो कंपनी का मकसद साफ

[01:04:47] था। बंगाल का सारा पैसा चूस लो लेकिन वहां

[01:04:50] के लोगों के लिए कोई जिम्मेदारी मत उठाओ।

[01:04:52] सटीक और इसके परिणाम इतने विनाशकारी हुए

[01:04:54] जिसकी शायद क्लाइव ने भी कल्पना नहीं की

[01:04:56] होगी।

[01:04:56] जैसे

[01:04:57] सबसे पहले तो भ्रष्टाचार का एक ऐसा दौर

[01:04:59] शुरू हुआ जिसकी कोई सीमा नहीं। कंपनी के

[01:05:01] अधिकारियों की तनख्वाह बहुत कम थी तो

[01:05:03] उन्होंने निजी व्यापार और लूटखसोट को अपना

[01:05:05] अधिकार समझ लिया। एक संगठित लूट का माहौल

[01:05:08] बन गया।

[01:05:08] और इसका असर सीधे आम आदमी पर किसानों और

[01:05:11] कारीगरों पर पड़ा होगा।

[01:05:12] बहुत बुरी तरह पड़ा। बंगाल उस समय अपने

[01:05:14] रेशम और सूती कपड़े के लिए मशहूर था। है

[01:05:16] ना?

[01:05:17] हां, बिल्कुल।

[01:05:18] कंपनी के लोगों ने बुनकरों पर इतना

[01:05:19] अत्याचार किया कि उन्हें कौड़ियों के दाम

[01:05:22] पर रेशम बेचने पर मजबूर कर दिया गया। कई

[01:05:24] बुनकरों ने तो इस जुल्म से बचने के लिए

[01:05:25] अपने अंगूठे तक काट लिए ताकि वे काम ही ना

[01:05:27] कर सकें।

[01:05:28] हे भगवान।

[01:05:28] और किसानों से इतना लगान वसूला गया कि

[01:05:30] उन्होंने खेती करना ही छोड़ दिया। बंगाल

[01:05:32] की पूरी अर्थव्यवस्था चरमरा गई।

[01:05:34] इसी बीच एक श्वेत विद्रोह की भी बात आती

[01:05:36] है। यह क्या था? कंपनी के अपने ही लोग

[01:05:38] विद्रोह कर रहे थे।

[01:05:40] हां, यह विडंबना ही थी। 1766 में क्लाइव

[01:05:44] ने एक आदेश जारी किया कि शांति के समय में

[01:05:46] अंग्रेज सैनिकों को जो डबल अलाउंस या

[01:05:48] दोहरा भत्ता मिलता है वो बंद कर दिया

[01:05:51] जाएगा।

[01:05:51] अच्छा

[01:05:51] पैसे की बात आई तो अंग्रेज सैनिक भी भड़क

[01:05:54] गए और उन्होंने ही कंपनी के खिलाफ विद्रोह

[01:05:56] कर दिया।

[01:05:57] अच्छा।

[01:05:57] इसे वाइट म्यूटनी कहा गया।

[01:05:59] इसे तो दबा दिया गया लेकिन इसने दिखा दिया

[01:06:02] कि कंपनी की नीव कितनी खोखली थी।

[01:06:04] लेकिन इन सबसे भयानक परिणाम तो 1770 में

[01:06:07] बंगाल के अकाल के रूप में सामने आया।

[01:06:10] श्रोत बताते हैं कि लगभग 1 करोड़ लोग मारे

[01:06:13] गए थे।

[01:06:13] हम यह आंकड़ा तो आज भी दहला देता है

[01:06:16] और दहलाना भी चाहिए क्योंकि यह कोई कुदरती

[01:06:18] आफत नहीं थी। यह इंसानों द्वारा लाई गई

[01:06:21] त्रासदी थी।

[01:06:22] मतलब देखिए सूखा पड़ा फसलें खराब हुई यह

[01:06:25] सच है।

[01:06:25] लेकिन अकाल तब पड़ा जब कंपनी ने बचा खुचा

[01:06:28] सारा अनाज अपने गोदामों में भर लिया।

[01:06:31] क्यों?

[01:06:31] वे चाहते थे कि उनकी सेना के लिए अनाज कम

[01:06:33] ना पड़े। भले ही बंगाल की 1/3 आबादी भूख

[01:06:36] से मर जाए। 1/3 आबादी। इसका मतलब है कि हर

[01:06:40] तीन में से एक इंसान भूख से मर गया।

[01:06:43] सड़कों पर, खेतों में और उस पर भी कंपनी

[01:06:45] ने लगान माफ नहीं किया।

[01:06:47] माफ करना तो दूर उन्होंने 10% अतिरिक्त कर

[01:06:50] लगा दिया।

[01:06:51] क्या?

[01:06:51] हां, कंपनी के अधिकारी उसी अनाज को ऊंचे

[01:06:53] दामों पर बेचकर मुनाफा कमा रहे थे। जबकि

[01:06:55] बाहर लोग भूख से दम तोड़ रहे थे। इसी को

[01:06:57] मानव निर्मित राजदी कहते हैं। यह शासन

[01:06:59] नहीं था। यह शुद्ध लालच था।

[01:07:01] और शायद इसी लालच और क्रूरता की

[01:07:03] प्रतिक्रिया थी सन्यासी विद्रोह।

[01:07:05] बिल्कुल। जब शासन और समाज पूरी तरह टूट

[01:07:07] जाता है तो वह लोग भी हथियार उठा लेते हैं

[01:07:09] जिन्हें दुनिया से कोई लेना देना नहीं

[01:07:11] होता।

[01:07:11] सन्यासी

[01:07:12] दसनामी नागा और गिरी संप्रदाय के संत जो

[01:07:14] ईश्वर की भक्ति में लीन रहते थे। उन्होंने

[01:07:16] लोगों को मरते देखा तो हथियार उठा लिए और

[01:07:18] कंपनी के ठिकानों और खजानों पर हमले करने

[01:07:20] लगे।

[01:07:20] और इसी विद्रोह को बंकिम चंद्र चटर्जी ने

[01:07:23] अपनी किताब आनंद मठ में अमर कर दिया।

[01:07:26] जो दशकों बाद 1882 में लिखी गई।

[01:07:28] और उसी किताब से हमें हमारा राष्ट्रगीत

[01:07:31] वंदे मातरम मिला। यह दिखाता है कि उस

[01:07:33] विद्रोह की आग कितनी गहरी थी।

[01:07:36] इसीलिए जब इतिहासकार के एम पण क्लाइव के

[01:07:38] शासन को डाकुओं का राज्य कहते हैं तो यह

[01:07:41] कोई साहित्यिक उपमा नहीं है।

[01:07:42] सही बात है।

[01:07:43] सोचिए एक डाकू का मकसद क्या होता है?

[01:07:45] लूटना और भाग जाना कंपनी का शासन ठीक यही

[01:07:47] कर रहा था। बिना किसी जिम्मेदारी के बंगाल

[01:07:50] का खजाना लूटना।

[01:07:51] और यहीं से दादा भाई नौरोजी के ड्रेन ऑफ

[01:07:54] वेल्थ सिद्धांत की शुरुआत होती है।

[01:07:56] जी धन का बहिर्गमन। एक अनुमान है कि भारत

[01:07:59] से लगभग 45 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति

[01:08:01] ब्रिटेन ले जाई गई।

[01:08:03] तो क्लाइव ने जो लूटा उसका अंत कैसा रहा?

[01:08:05] बहुत बुरा जब वो ब्रिटेन लौटा तो उसके ऊपर

[01:08:07] भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे और मुकदमा

[01:08:10] चला। हालांकि वह संसद में केस जीत गया

[01:08:12] लेकिन उसकी इज्जत मिट्टी में मिल चुकी थी।

[01:08:14] ओह!

[01:08:14] इस अपमान को वह सह नहीं पाया और अंत में

[01:08:17] उसने आत्महत्या कर ली। क्लाइव ने जो

[01:08:18] साम्राज्य खड़ा किया उसी की परछाई ने उसे

[01:08:21] निगल लिया।

[01:08:21] क्लाइव के बाद और वारेन हेस्टिंग से पहले

[01:08:24] भी तो कुछ गवर्नर आए थे। लेकिन शायद बहुत

[01:08:26] छोटे कार्यकाल के लिए।

[01:08:28] हां, वह बस जगह भरने के लिए थे। हॉलवेल

[01:08:30] जिसके समय ब्लैक होल की घटना हुई।

[01:08:32] वेंसिटार्ड जिसके समय बक्सर का युद्ध हुआ

[01:08:34] और कार्टियर जो उस भयानक अकाल के समय

[01:08:36] बंगाल का गवर्नर था और कुछ नहीं कर सका।

[01:08:39] क्लाइव ने लूट का जो ढांचा तैयार किया था

[01:08:42] वो काफी हद तक अव्यवस्थित था। इस संगठित

[01:08:44] लूट को एक संस्थागत कानूनी जामा पहनाने का

[01:08:47] काम किया। बंगाल के अगले बड़े नाम ने

[01:08:50] वारेन हेस्टिंग्स। वारेन हेस्टिंग्स बंगाल

[01:08:52] का आखिरी गवर्नर और पहला गवर्नर जनरल वो

[01:08:56] 1772 में आया तो उसने क्लाइव की बनाई

[01:08:58] व्यवस्था को बदला या उसे और खतरनाक बना

[01:09:01] दिया।

[01:09:01] उसने उसे और ज्यादा खतरनाक और मजबूत

[01:09:04] बनाया। आते ही 1772 में उसने द्वैध शासन

[01:09:07] खत्म कर दिया।

[01:09:08] अच्छा।

[01:09:08] लेकिन इसलिए नहीं कि उसे बंगाल के लोगों

[01:09:10] की चिंता थी बल्कि इसलिए कि वह चाहता था

[01:09:13] कि सत्ता का हर टुकड़ा अब सीधे कंपनी के

[01:09:16] हाथ में हो। कोई बीच का आदमी नहीं। हम्।

[01:09:18] उसने नवाब की 53 लाख की पेंशन घटाकर सिर्फ

[01:09:21] ₹16 लाख कर और शासन की पूरी बागडोर अपने

[01:09:24] हाथ में ले ली।

[01:09:24] और जमीन से पैसा निकालने के लिए उसने

[01:09:27] इजारेदारी प्रथा शुरू की। यह क्या थी?

[01:09:29] यह किसानों के शोषण का एक और नया तरीका

[01:09:32] था। इसमें जमीन के टुकड़ों की नीलामी होती

[01:09:34] थी।

[01:09:34] नीलामी?

[01:09:35] हां, जो सबसे ज्यादा बोली लगाता, उसे 5

[01:09:38] साल के लिए बाद में 1 साल के लिए उस जमीन

[01:09:40] से लगान वसूलने का ठेका मिल जाता था। अब

[01:09:43] ठेकेदार को तो सिर्फ अपने मुनाफे से मतलब

[01:09:45] था। वह किसानों से कितना भी लगान वसूले

[01:09:47] कंपनी को कोई फर्क नहीं पड़ता था।

[01:09:49] मतलब शोषण अब और ज्यादा संस्थागत हो गया

[01:09:52] था। हेस्टिंग्स के समय में कुछ और भी बड़ी

[01:09:54] घटनाएं हुई जैसे कोलकाता में सुप्रीम

[01:09:56] कोर्ट की स्थापना।

[01:09:57] हां, 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट के तहत

[01:10:00] कोलकाता में सुप्रीम कोर्ट बना। लेकिन

[01:10:02] हेस्टिंग्स ने कानून के इस मंदिर का भी

[01:10:04] अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया।

[01:10:05] वो कैसे?

[01:10:06] न्यायाधीश था। उसके साथ मिलकर नंद कुमार

[01:10:09] पर ही झूठा केस चलवा दिया।

[01:10:11] ओ

[01:10:11] और 1775 में उसे फांसी पर लटकवा दिया। यह

[01:10:14] एक तरह से न्यायिक हत्या थी

[01:10:16] और अभिव्यक्ति की आजादी का भी उसने गला

[01:10:18] घोट दिया। भारत का पहला अखबार बंगाल गजट

[01:10:21] उसी के समय बंद हुआ था ना।

[01:10:23] जेम्स ऑगस्ट सिरकी ने 1780 में यह अखबार

[01:10:25] शुरू किया था। वो एक निडर पत्रकार था और

[01:10:28] कंपनी के भ्रष्टाचार और हेस्टिंग्स की

[01:10:30] निजी जिंदगी पर भी लिखता था।

[01:10:31] हेस्टिंग्स को यह बर्दाश्त नहीं हुआ और 2

[01:10:33] साल के अंदर ही 1782 में उसने अखबार को

[01:10:36] बंद करवा दिया और हिक्की को जेल में डाल

[01:10:38] दिया। वो किसी भी तरह की आलोचना सुनने को

[01:10:40] तैयार नहीं था। लेकिन उसने कुछ अच्छे काम

[01:10:42] भी तो किए जैसे आलिया मदरसा और एशियाटिक

[01:10:45] सोसायटी की स्थापना में मदद।

[01:10:47] हां, यह कुछ ऐसे गांव थे जिनका दूरगामी

[01:10:49] असर अच्छा हुआ। 1781 में कोलकाता मदरसा की

[01:10:52] स्थापना मुस्लिम कानून और शिक्षा के लिए

[01:10:55] की गई और 1784 में विलियम जों्स ने

[01:10:57] एशियाटिक सोसाइटी की स्थापना की जिसका

[01:10:59] मकसद भारतीय ग्रंथों और ज्ञान का अध्ययन

[01:11:02] करना था। लेकिन यह सब उसके बड़े कारनामों

[01:11:05] के सामने बहुत छोटे लगते हैं।

[01:11:06] और क्लाइव की तरह ही हेस्टिंग्स का अंत भी

[01:11:09] अच्छा नहीं रहा। उस पर भी ब्रिटेन में

[01:11:11] महाभियोग चलाया गया था।

[01:11:12] बिल्कुल एडमंडबर्ग जैसे बड़े नेताओं ने

[01:11:15] ब्रिटिश संसद में उस पर भ्रष्टाचार,

[01:11:17] क्रूरता और जुल्म के संगीन आरोप लगाए।

[01:11:19] महाभियोग 7 साल तक चला।

[01:11:21] 7 साल

[01:11:22] जी और हालांकि उसे भी अंत में बरी कर दिया

[01:11:25] गया। लेकिन उसका नाम इतिहास में क्रूर और

[01:11:28] भ्रष्ट शासक के तौर पर ही दर्ज हो गया।

[01:11:32] और यह कहानी शुरू होती है कुछ बेहद अहम

[01:11:36] किरदारों से। यानी गवर्नर जनरलों से। हम

[01:11:38] देखेंगे कि कैसे उन्होंने प्रशासन, पुलिस

[01:11:41] और सबसे जरूरी पैसा वसूलने के लिए जमीन की

[01:11:45] व्यवस्थाएं बनाई।

[01:11:46] हम्। और इसकी शुरुआत उस आर्किटेक्ट से

[01:11:48] करते हैं जिसे भारत में सिविल सेवा का जनक

[01:11:50] कहा जाता है। लॉर्ड कॉर्नवालिस।

[01:11:52] जी।

[01:11:52] तो लॉर्ड कॉर्नवालिस 1786 में भारत आते

[01:11:55] हैं। हमारे श्रोत इन्हें फादर ऑफ सिविल

[01:11:57] सर्विसेज कहते हैं। लेकिन उस वक्त सिविल

[01:11:58] सर्विस बनाने का मतलब क्या था? क्या पहले

[01:12:00] कोई सिस्टम नहीं था? सिस्टम तो था लेकिन

[01:12:03] वो ईस्ट इंडिया कंपनी के हिसाब से बड़ा ही

[01:12:05] कह सकते हैं अस्त-व्यस्त और भ्रष्ट था।

[01:12:08] कॉनवोलिस का काम था उसे एक संगठित एक

[01:12:11] व्यवस्थित नौकरशाही में बदलना।

[01:12:13] एक ऐसी स्टील फ्रेम बनाना जिस पर

[01:12:16] साम्राज्य खड़ा हो सके। लेकिन यहां एक

[01:12:18] बहुत दिलचस्प और अह जरूरी बात है जिसे

[01:12:21] समझना होगा। उन्होंने यह तय कर दिया कि

[01:12:24] प्रशासन के जितने भी ऊंचे पद हैं कलेक्टर,

[01:12:27] जज, एसपी उन पर सिर्फ और सिर्फ अंग्रेज ही

[01:12:30] बैठेंगे।

[01:12:31] मतलब भारतीयों के लिए दरवाजे पूरी तरह बंद

[01:12:33] कर दिए गए।

[01:12:34] बिल्कुल पूरी तरह से। भारतीयों के लिए

[01:12:36] केवल क्लर्क, चपरासी या मतलब बहुत

[01:12:39] छोटे-मोटे पद ही छोड़े गए। तो एक तरफ वो

[01:12:42] व्यवस्था बना रही थी। लेकिन दूसरी तरफ वो

[01:12:44] नस्लिया आधार पर एक दीवार भी खड़ी कर रही

[01:12:47] थी।

[01:12:47] और इसका मकसद साफ था। मकसद साफ था शासन पर

[01:12:50] ब्रिटिश नियंत्रण को इतना मजबूत कर दो कि

[01:12:53] कोई भारतीय चुनौती ही ना दे सके।

[01:12:55] और यह नियंत्रण सिर्फ दफ्तरों तक ही सीमित

[01:12:58] नहीं था। है ना? जमीनी स्तर पर भी इसे

[01:13:00] लागू किया गया। हमारे स्रोत बताते हैं कि

[01:13:02] पुलिस व्यवस्था भी इन्हीं की देन है।

[01:13:03] हां। और यह उनकी सबसे स्थाई विरासतों में

[01:13:07] से एक है। उन्हें पुलिस सेवा का जनक भी

[01:13:09] कहते हैं। उन्होंने जो ढांचा बनाया उसकी

[01:13:12] छाप तो आज तक हमारे पुलिस सिस्टम पर है।

[01:13:15] हर जिले में एक एसपी यानी सुपरिटेंडेंट ऑफ

[01:13:18] पुलिस जो पूरे जिले की कानून व्यवस्था का

[01:13:20] जिम्मेदार हो और उसके नीचे हर 32 वर्ग

[01:13:24] किलोमीटर के इलाके में एक थाना जिसका

[01:13:26] इंचार्ज एक दरोगा।

[01:13:28] एक पूरी पिरामिड जैसी संरचना

[01:13:29] जी जो ऊपर से नीचे तक नियंत्रण सुनिश्चित

[01:13:32] करती थी। अब आते हैं 1793 के कॉर् कोस कोड

[01:13:35] पर। इसमें एक शब्द का इस्तेमाल जो सुनने

[01:13:37] में बहुत आधुनिक लगता है। शक्तियों का

[01:13:39] पृथक्करण या सेपरेशन ऑफ पावर्स।

[01:13:42] हम

[01:13:42] क्या इसका मतलब वही है जो हम आज समझते

[01:13:44] हैं? यानी लोकतंत्र की बुनियाद।

[01:13:46] यह एक बहुत अच्छा सवाल है। देखिए शब्द वही

[01:13:49] है लेकिन इरादा इरादा बिल्कुल अलग था।

[01:13:52] अच्छा।

[01:13:52] आज सेपरेशन ऑफ पावर्स का मतलब है एक दूसरे

[01:13:55] पर नजर रखना। ताकि किसी के पास तानाशाही

[01:13:58] ताकत ना आ जाए। कॉनवोलस का मकसद लोकतंत्र

[01:14:01] नहीं था। नियंत्रण था।

[01:14:03] कैसे?

[01:14:03] पहले कलेक्टर के पास राजस्व वसूलने की

[01:14:05] शक्ति भी थी और न्याय करने की भी। मतलब वह

[01:14:08] अपने आप में एक छोटा राजा था। कोवालिस ने

[01:14:10] यह ताकत तोड़ दी।

[01:14:11] कैसे तोड़ी?

[01:14:12] उन्होंने कलेक्टर का काम सिर्फ राजस्व तक

[01:14:14] सीमित कर दिया। उससे न्यायिक शक्तियां

[01:14:16] छीनकर एक अलग जज को दे दी।

[01:14:18] अच्छा। तो, यह एक तरह का अंदरूनी चेक एंड

[01:14:21] बैलेंस था।

[01:14:22] बिल्कुल। इसका फायदा यह हुआ कि अब कोई भी

[01:14:24] एक अधिकारी इतना शक्तिशाली नहीं हो सकता

[01:14:27] था कि वह कंपनी के लिए ही खतरा बन जाए। यह

[01:14:29] ब्रिटिश सत्ता को सुरक्षित रखने का तरीका

[01:14:32] था। भारतीयों को अधिकार देने का नहीं।

[01:14:34] इसी कोर्ट में फौजदारी मामलों में सिर्फ

[01:14:36] यूरोपीय जजों को अधिकार दिया गया और गवाही

[01:14:39] में धर्म के आधार को खत्म कर दिया गया।

[01:14:41] अच्छा। और एक छोटी लेकिन दिलचस्प जानकारी

[01:14:44] है कॉर्नवालिस का मकबरा भारत में है।

[01:14:46] उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में। यह थोड़ा

[01:14:48] अजीब है। ज्यादातर गवर्नर जनरल तो रिटायर

[01:14:50] होकर वापस चले जाते थे।

[01:14:51] हां, वह अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान

[01:14:53] 1805 में यहीं बीमार पड़ी और उनकी मृत्यु

[01:14:56] हो गई। तो ठीक है। कॉर्नवालिस ने प्रशासन

[01:14:58] और पुलिस की मशीनरी तो बना दी लेकिन किसी

[01:15:00] भी मशीन को चलाने के लिए ईंधन की जरूरत

[01:15:03] होती है। इस साम्राज्य रूपी मशीन का ईंधन

[01:15:05] कहां से आता था?

[01:15:06] पैसे से

[01:15:06] और पैसा आता था जमीन से।

[01:15:08] यहीं पर ब्रिटिश राज का असली आर्थिक इंजन

[01:15:11] सामने आता है। भू-राजस्व प्रणालियां।

[01:15:14] अच्छा।

[01:15:14] और अंग्रेजों ने यहां कोई एक सिस्टम लागू

[01:15:17] नहीं किया बल्कि उन्होंने अलग-अलग इलाकों

[01:15:19] में आप कह सकती हैं तीन बड़े प्रयोग किए।

[01:15:22] प्रयोग। हां यह समझने जैसा है कि वह भारत

[01:15:24] को एक प्रयोगशाला की तरह देख रहे थे यह

[01:15:27] पता लगाने के लिए कि किस तरीके से सबसे

[01:15:30] ज्यादा लगान वसूला जा सकता है।

[01:15:32] तो पहला प्रयोग था 1793 का स्थाई बंदोबस्त

[01:15:35] या परमानेंट सेटलमेंट। यह भी कॉर्नवोलिस

[01:15:37] की ही देन थी। यह क्या था और इसे स्थाई

[01:15:39] क्यों कहते हैं?

[01:15:40] इसे स्थाई इसलिए कहते हैं क्योंकि इसमें

[01:15:42] सरकार ने जमींदार से वसूले जाने वाले लगान

[01:15:45] की रकम हमेशा के लिए तय कर दी। मतलब फिक्स

[01:15:48] कर दी।

[01:15:48] हमेशा के लिए?

[01:15:49] हां। तय हुआ कि जमींदार जो भी लगान

[01:15:52] वसूलेगा उसका 101 हिस्सा कंपनी को देगा और

[01:15:55] 11 हिस्सा खुद रखेगा।

[01:15:57] इसमें सबसे बड़ी बात यह थी कि जमींदार को

[01:15:59] ही जमीन का मालिक मान लिया गया।

[01:16:01] और किसान किसान महज एक किराएदार बनकर रह

[01:16:04] गया। यह व्यवस्था बंगाल, बिहार जैसे सबसे

[01:16:07] अमीर इलाकों में यानी भारत के लगभग 19%

[01:16:11] हिस्से पर लागू की गई। हम्

[01:16:13] लेकिन इस व्यवस्था में एक बहुत मतलब क्रूर

[01:16:15] कानून का जिक्र है। 1794 का सूर्यास्त

[01:16:18] कानून या सनसेट लॉ। यह नाम ही अपने आप में

[01:16:20] डरावना लगता है।

[01:16:21] और यह था भी डरावना। ये एक बेहद सख्त

[01:16:24] कानून था। इसके तहत हर जमींदार को लगान

[01:16:27] जमा करने के लिए एक तारीख दी जाती थी।

[01:16:29] हम्म।

[01:16:29] अगर वह उस तारीख के सूर्यास्त तक सूरज

[01:16:32] ढलने से पहले लगान जमा नहीं कर पाए तो

[01:16:35] उसकी पूरी की पूरी जमींदारी नीलाम कर दी

[01:16:38] जाती थी। कोई सुनवाई नहीं। कोई दूसरा मौका

[01:16:40] नहीं। बाप रे।

[01:16:41] इसने कई पुराने जमींदार घरानों को बर्बाद

[01:16:44] कर दिया और उनकी जगह नए शहरी साहूकारों ने

[01:16:47] ले ली। जिन्हें जमीन से कोई लगाव नहीं था।

[01:16:50] सिर्फ मुनाफे से मतलब था।

[01:16:51] ठीक है? तो ये था पहला मॉडल। अब आते हैं

[01:16:53] दूसरे मॉडल पर। रयतवाड़ी व्यवस्था। यह

[01:16:56] सबसे बड़े इलाके करीब 51% हिस्से पर लागू

[01:16:59] थी। यह स्थाई बंदोबस्त से कैसे अलग थी?

[01:17:01] यह बिल्कुल उल्टा मॉडल था। इसे कर्नल रीड

[01:17:04] और थॉमस मुनरो ने मद्रास, बॉम्बे जैसे

[01:17:06] इलाकों में लागू किया।

[01:17:08] अच्छा। उन्होंने सोचा कि बंगाल में

[01:17:10] जमींदार बीज का सारा मुनाफा खा जाता है तो

[01:17:13] क्यों ना बिचौलिए को ही हटा दिया जाए।

[01:17:15] तो उन्होंने सीधे किसान जिसे रयत कहते थे

[01:17:18] उसे ही जमीन का मालिक बना दिया और तय किया

[01:17:21] कि किसान सीधे सरकार को टैक्स देगा।

[01:17:23] तो मतलब जमींदार जो कि शोषण का सबसे बड़ा

[01:17:25] प्रतीक माना जाता है उसे हटा दिया गया। यह

[01:17:27] तो किसानों के लिए बहुत बड़ा सुधार था ना।

[01:17:29] हां कागज [गला साफ़ करने की आवाज़] पर तो

[01:17:30] यह क्रांतिकारी कदम लगता है। ऐसा लगता है

[01:17:33] कि अंग्रेज किसानों के हक की बात कर रहे

[01:17:35] हैं।

[01:17:35] लेकिन

[01:17:36] लेकिन जरा सोचिए अब किसान का शोषण करने

[01:17:39] वाला कोई एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरी की

[01:17:41] पूरी ब्रिटिश सरकार थी।

[01:17:43] पहले आप जमींदार से शायद दया की भीख मांग

[01:17:46] सकते थे। फसल खराब होने पर मोहलत मांग

[01:17:48] सकते थे। अब आप किससे मांगते?

[01:17:50] एक बेरहम आंकड़ों पर चलने वाली सरकारी

[01:17:52] मशीन से।

[01:17:53] बिल्कुल। अदालतों से जो खुद उसी सिस्टम का

[01:17:55] हिस्सा थी।

[01:17:56] और असल में हुआ क्या? क्या किसानों की

[01:17:58] हालत सुधरी? बिल्कुल नहीं। श्रोत बताते

[01:18:00] हैं कि इस व्यवस्था में टैक्स की दरें

[01:18:03] इतनी ज्यादा थी कि किसान उन्हें चुका ही

[01:18:06] नहीं पाते थे।

[01:18:07] नतीजा यह हुआ कि उन्हें अपनी जमीन बचाने

[01:18:10] के लिए साहूकारों से भारी ब्याज पर कर्ज

[01:18:12] लेना पड़ता था। जमींदार तो चला गया लेकिन

[01:18:15] उसकी जगह साहूकार आ गया।

[01:18:16] तो किसान कर्ज के एक ऐसे जाल में फंस गया

[01:18:18] जिससे उसकी कई पीढ़ियां बाहर नहीं निकल

[01:18:20] पाई।

[01:18:21] सही बात है।

[01:18:21] और तीसरा और आखिरी मॉडल था महालवाड़ी

[01:18:23] व्यवस्था। हां, यह 1822 में हल्ट मैकजी ने

[01:18:27] उत्तर पश्चिमी भारत, पंजाब और यूपी के

[01:18:30] करीब 30% इलाके में लागू की। यह एक तरह से

[01:18:34] बीच का रास्ता था।

[01:18:35] बीच का रास्ता।

[01:18:36] इसमें ना तो जमींदार मालिक था ना ही अकेला

[01:18:38] किसान बल्कि महाल यानी पूरे गांव को एक

[01:18:42] इकाई माना गया। गांव का मुखिया या कोई

[01:18:44] प्रतिनिधि पूरे गांव की तरफ से टैक्स वसूल

[01:18:47] कर कंपनी को देता था।

[01:18:48] तो अगर कोई एक किसान टैक्स नहीं दे पाता

[01:18:50] तो यह पूरे गांव की जिम्मेदारी होती थी।

[01:18:51] जी। इसने गांव के पारंपरिक सामाजिक ढांचे

[01:18:54] को पूरी तरह बदल कर रख दिया।

[01:18:56] तो कॉर्नवालिस ने मशीन बना दी और इन तीन

[01:18:58] मॉडलों से उसे चलाने के लिए पैसे का

[01:19:00] इंतजाम भी कर दिया। लेकिन इसके बाद आए

[01:19:02] गवर्नर जनरलों का ध्यान सिर्फ प्रशासन

[01:19:04] चलाने पर नहीं था।

[01:19:05] नहीं।

[01:19:06] बल्कि इस मशीन का इस्तेमाल साम्राज्य

[01:19:08] फैलाने पर था। वेलेजली की सहायक संदीप

[01:19:10] शायद इसी विस्तार का पहला बड़ा कदम थे।

[01:19:13] बिल्कुल। सर जॉन शोर की अहस्तक्षेप की

[01:19:16] नीति एक छोटा सा ठहराव थी जो ज्यादा चल

[01:19:19] नहीं सकी क्योंकि उनके बाद लॉर्ड वेलेजली

[01:19:22] 1798 1705 आए जो खुद को बंगाल का शेर कहते

[01:19:27] थे।

[01:19:27] बंगाल का शेर

[01:19:28] हां उनका मकसद साफ था भारत में ब्रिटिश

[01:19:31] सत्ता को सर्वोच्च बनाना और इसके लिए उनका

[01:19:34] हथियार युद्ध नहीं बल्कि एक बहुत ही चालाक

[01:19:37] कूटनीतिक जाल था सहायक संधि या सब्जी जरी

[01:19:40] अलायंस। यह सहायक संधि असल में थी क्या?

[01:19:43] सुनने में तो लगता है जैसे मदद करने वाली

[01:19:45] कोई संधि हो।

[01:19:46] नाम सहायक था लेकिन काम नियंत्रण का था।

[01:19:50] यह एक ऐसा प्रस्ताव था जिसे ठुकराना

[01:19:52] भारतीय राजाओं के लिए लगभग नामुमकिन था।

[01:19:54] इसकी शर्तें बड़ी मीठी जहर जैसी थी।

[01:19:57] जैसे कि

[01:19:58] अपनी राजधानी में एक ब्रिटिश सेना रखनी

[01:20:01] होगी और उसका पूरा खर्चा भी

[01:20:03] खुद उठाना होगा।

[01:20:04] जी पूरा खर्चा भी खुद उठाना होगा। दूसरी

[01:20:06] शर्त राजा के दरबार में एक ब्रिटिश

[01:20:09] रेजिडेंट रहेगा। कहने को तो वह बस एक

[01:20:11] राजदूत था लेकिन असल में वह एक जासूस था।

[01:20:14] जो राज्य के हर अंदरूनी मामले पर नजर रखता

[01:20:16] था।

[01:20:17] नजर रखता था और दखल भी देता था। और तीसरी

[01:20:20] और सबसे खतरनाक शर्त राजा किसी भी दूसरे

[01:20:23] यूरोपीय देश से कोई संबंध नहीं रख सकेगा

[01:20:25] और ना ही किसी और भारतीय राज्य से कंपनी

[01:20:28] की इजाजत के बिना युद्ध या संधि कर सकेगा।

[01:20:31] और बदले में

[01:20:32] बदले में कंपनी उस राज्य की बाहरी

[01:20:34] आक्रमणों से सुरक्षा का वादा करती मतलब

[01:20:37] राजा अपनी विदेश नीति और अपनी सेना दोनों

[01:20:39] ही अंग्रेजों को सौंप देता था। वो बस नाम

[01:20:41] का राजा रह जाता था।

[01:20:43] ठीक यही होता था। और स्रोत में जो सूची है

[01:20:45] वो दिखाती है कि यह जाल कितना सफल रहा।

[01:20:48] सबसे पहले हैदराबाद के निजाम 1798 में

[01:20:51] इसमें फंसे।

[01:20:52] हम

[01:20:52] फिर मैसूर, तंजौर, अवध और धीरे-धीरे

[01:20:55] पेशवा, भोंसले, सिंधिया जैसे बड़े-बड़े

[01:20:58] मराठा सरदार भी इसके शिकार हो गए।

[01:21:00] तो बिना एक भी बड़ी लड़ाई लड़े विलेजली ने

[01:21:03] भारत के बड़े हिस्से पर ब्रिटिश नियंत्रण

[01:21:05] स्थापित कर दिया।

[01:21:06] जी। तो विलेजली ने सहायक संधि से दक्षिण

[01:21:08] और अवध को तो काबू में कर लिया लेकिन

[01:21:11] उत्तर में एक बड़ी ताकत अभी भी थी महाराजा

[01:21:13] रणजीत सिंह

[01:21:14] उनसे सीधे टकराना आसान नहीं था तो फिर

[01:21:16] लॉर्ड मिंटो प्रथम के समय में क्या रास्ता

[01:21:18] निकाला गया

[01:21:19] रास्ता निकाला गया बातचीत का लॉर्ड मिंटो

[01:21:22] प्रथम 1807 1813 के समय की सबसे बड़ी घटना

[01:21:27] है 1809 की अमृतसर की संधि

[01:21:30] रणजीत सिंह के साथ

[01:21:31] हां अंग्रेज समझते थे कि रणजीत सिंह एक

[01:21:33] मजबूत शासक हैं और उनसे युद्ध महंगा

[01:21:35] पड़ेगा तो इस संधि के जरिए सतलज नदी को

[01:21:38] दोनों साम्राज्यों के बीच की सीमा मान

[01:21:40] लिया गया।

[01:21:41] तो एक तरह से अंग्रेजों ने उत्तर-पश्चिम

[01:21:43] में अपनी सीमा सुरक्षित कर ली और पंजाब को

[01:21:45] कुछ समय के लिए छोड़ दिया।

[01:21:47] बिल्कुल।

[01:21:47] लेकिन ये शांति ज्यादा दिन नहीं चली।

[01:21:49] लॉर्ड हेस्टिंग्स 1813, 1823 का कार्यकाल

[01:21:53] तो जैसे युद्धों और संघर्षों का ही दूसरा

[01:21:55] नाम लगता है।

[01:21:56] सही बात।

[01:21:56] आंग्ल नेपाल युद्ध, पिंडारियों का दमन और

[01:21:59] तीसरा आंग्ल मराठा युद्ध। ऐसा लगता है

[01:22:01] जैसे अब कूटनीति का दौर खत्म हो गया था।

[01:22:03] आप सही कह रहे हैं। यह ब्रिटिश सत्ता के

[01:22:05] सुदृढ़ीकरण यानी कंसोलिडेशन का दौर था। अब

[01:22:09] अंग्रेज सिर्फ नियंत्रण नहीं बल्कि सीधा

[01:22:12] शासन चाहते थे।

[01:22:13] और इसकी शुरुआत हुई नेपाल से।

[01:22:15] हां, आंग्ल नेपाल युद्ध 1814-16 से। यह

[01:22:19] युद्ध सुगौली की संधि से खत्म हुआ जिससे

[01:22:22] अंग्रेजों को कुमायूं गढ़वाल जैसे

[01:22:24] महत्वपूर्ण पहाड़ी इलाके मिले। और सबसे

[01:22:27] बड़ी बात बहादुर गोर्खा सैनिक पहली बार

[01:22:30] ब्रिटिश सेना में भर्ती होने लगे। जो आगे

[01:22:32] चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक

[01:22:34] बने।

[01:22:34] जी।

[01:22:35] और फिर आता है पिंडारियों का दमन। यह

[01:22:37] पिंडारी कौन थे?

[01:22:38] पिंडारी मध्य भारत में सक्रिय लड़ाकों के

[01:22:41] दल थे। यह किसी राजा के अधीन नहीं थे और

[01:22:44] मराठा सेनाओं के साथ मिलकर लूटमार करते

[01:22:46] थे।

[01:22:47] अच्छा।

[01:22:47] जब मराठा शक्ति कमजोर हुई तो यह स्वतंत्र

[01:22:50] हो गए। लॉर्ड हेस्टिंग्स ने इन्हें कानून

[01:22:52] व्यवस्था के लिए खतरा बताकर इनके खिलाफ एक

[01:22:55] बड़ा सैन्य अभियान चलाया और इनका पूरी तरह

[01:22:58] से सफाया कर दिया। और इसने मध्य भारत में

[01:23:00] ब्रिटिश सत्ता का रास्ता साफ कर दिया।

[01:23:02] हां। और इसी के साथ जुड़ा है तीसरा आंग्ल

[01:23:05] मराठा युद्ध जिसने भारतीय राजनीति का

[01:23:08] नक्शा ही बदल दिया।

[01:23:09] ये सबसे निर्णायक था ना?

[01:23:10] बिल्कुल।

[01:23:11] तृतीय आंग्ल मराठा युद्ध 1817-18

[01:23:14] इस दौर की सबसे निर्णायक घटना थी। इसने

[01:23:17] मराठा संघ का हमेशा के लिए अंत कर दिया।

[01:23:20] पेशवा का पद खत्म कर दिया गया और उन्हें

[01:23:22] कानपुर के पास बिठूर भेज दिया गया। तो अगर

[01:23:25] हम बड़ी तस्वीर देखें तो इस एक युद्ध ने

[01:23:27] मध्य और पश्चिम भारत में ब्रिटिश सत्ता को

[01:23:29] निर्विवाद बना दिया।

[01:23:30] हां मुगलों के बाद जो सबसे बड़ी भारतीय

[01:23:33] शक्ति थी मराठा वो अब इतिहास बन चुकी थी।

[01:23:36] तो पश्चिम और मध्य भारत पर कब्जा हो गया।

[01:23:38] अब इस सूची में आखिरी नाम है लॉर्ड एमहस्ट

[01:23:41] का जिनके समय में साम्राज्य का विस्तार

[01:23:44] पूर्व की ओर हुआ।

[01:23:45] हां, लॉर्ड एमहस्ट 1823 टू 1828 के समय

[01:23:49] में अंग्रेजों का सामना बर्मा के

[01:23:51] साम्राज्य से हुआ। नतीजा था प्रथम आंग्ल

[01:23:53] बर्मा युद्ध 1824 टु 26. यह युद्ध याडुबू

[01:23:58] की संधि से खत्म हुआ। इस युद्ध के बाद असम

[01:24:01] पर अंग्रेजों का सीधा कब्जा हो गया और

[01:24:03] मणिपुर एक स्वतंत्र राज्य बना जो जाहिर

[01:24:06] तौर पर ब्रिटिश प्रभाव में था। इस तरह

[01:24:08] भारत की पूर्वी सीमा भी ब्रिटिश नियंत्रण

[01:24:11] में आ गई। तो लॉर्ड विलियम बेंटिक इनका

[01:24:14] कार्यकाल 1828 से 1835 तक रहा। जब भी उनका

[01:24:18] नाम आता है, सबसे पहले जिक्र होता है सती

[01:24:21] प्रथा के अंत का।

[01:24:22] हां।

[01:24:23] यह वाकई एक बहुत बड़ा कदम था।

[01:24:25] निसंदेह 1829 में और इसमें राजा राममोहन

[01:24:28] राय जैसे भारतीय समाज सुधारकों के जबरदस्त

[01:24:31] प्रयासों का बहुत बड़ा हाथ था।

[01:24:32] हां, उनका योगदान तो बहुत बड़ा था।

[01:24:34] जी। उसके बाद ही इसे कानूनी तौर पर खत्म

[01:24:37] किया गया। यह समझना जरूरी है कि ये सिर्फ

[01:24:39] एक कानून पारित करना नहीं था। हम्म।

[01:24:41] यह ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय सामाजिक

[01:24:44] और धार्मिक मामलों में एक बहुत बड़ा

[01:24:46] हस्तक्षेप था जो वो आमतौर पर करने से बचते

[01:24:49] थे।

[01:24:49] अच्छा।

[01:24:50] शुरुआत बंगाल से हुई और फिर इसे धीरे-धीरे

[01:24:52] दूसरे प्रेसिडेंसीज में भी लागू किया गया।

[01:24:54] लेकिन मेरे मन में एक सवाल आता है। क्या

[01:24:57] इसके पीछे की सोच सिर्फ मानवतावादी थी? या

[01:25:00] फिर वह दुनिया को यह भी दिखाना चाहते थे

[01:25:02] कि देखो ब्रिटिश शासन कितना सभ्य है और

[01:25:05] भारतीय समाज कितना पिछड़ा? हम यह एक

[01:25:07] बेहतरीन सवाल है और इतिहासकार इस पर बहस

[01:25:10] करते हैं। निश्चित रूप से इसमें एक नैतिक

[01:25:12] और मानवतावादी पहलू था। था ही

[01:25:14] वो तो था।

[01:25:14] लेकिन साथ ही यह अपनी सभ्यता को श्रेष्ठ

[01:25:16] स्थापित करने और औपनिवेशिक शासन को एक

[01:25:19] नैतिक आधार देने का एक शक्तिशाली तरीका भी

[01:25:21] था।

[01:25:21] हम्म।

[01:25:22] इसी समय एक और बड़ी समस्या थी जिस पर

[01:25:24] बेंटिक ने ध्यान दिया। ठगी प्रथा।

[01:25:26] हां, ठगों के गिरोह जो यात्रियों को लूटने

[01:25:28] के लिए उनका गला घोट देते थे। ये तो एक

[01:25:31] कानून और व्यवस्था की समस्या ज्यादा लगती

[01:25:33] है।

[01:25:33] बिल्कुल। सती प्रथा का मामला जहां धार्मिक

[01:25:35] और सामाजिक हस्तक्षेप था वहीं ठगी का दमन

[01:25:38] सीधे तौर पर व्यापारिक मार्गों को

[01:25:39] सुरक्षित बनाने और प्रशासन के इकबाल को

[01:25:42] बुलंद करने से जुड़ा था।

[01:25:43] अच्छा

[01:25:44] इसके लिए कर्नल सिलीमैन को नियुक्त किया

[01:25:46] गया और उनके अभियान में 1500 से ज्यादा

[01:25:48] ठगों को पकड़ा गया।

[01:25:49] 1500 से ज्यादा

[01:25:50] हां तो आप देख सकती हैं मकसद अलग-अलग थे।

[01:25:53] भले ही दोनों को क्रूर प्रथाओं का अंत

[01:25:55] कहकर पेश किया गया।

[01:25:56] 1835 में मैकोले मिनट्स और अंग्रेजी को

[01:25:59] शिक्षा का माध्यम बनाना। हां और इसका असर

[01:26:02] सिर्फ किताबों और क्लासरूम्स तक सीमित

[01:26:04] नहीं था। थॉमस मैकले का उद्देश्य बहुत

[01:26:06] स्पष्ट था।

[01:26:06] क्या था?

[01:26:07] वो एक ऐसी भारतीय पीढ़ी तैयार करना चाहते

[01:26:09] थे जो खून और रंग से तो भारतीय हो लेकिन

[01:26:12] सोच पसंद और व्यवहार में अंग्रेज हो।

[01:26:15] अच्छा मतलब प्रशासन चलाने के लिए।

[01:26:17] बिल्कुल। साम्राज्य और जनता के बीच एक

[01:26:19] कड़ी के रूप में काम करने के लिए एक बाबू

[01:26:22] क्लास की नींव यहीं रखी गई थी। हम्।

[01:26:24] और इसी से जुड़ा एक और कदम था 1834 में

[01:26:27] भारत के पहले विधि आयोग यानी लॉ कमीशन की

[01:26:30] स्थापना।

[01:26:31] जिसके अध्यक्ष भी खुद में काले ही थे।

[01:26:32] जी।

[01:26:33] मतलब एक तरफ शिक्षा से सोच को बदलना और

[01:26:36] दूसरी तरफ कानून से व्यवस्था को दिलचस्प

[01:26:39] है। लेकिन इन सब सुधारों के लिए पैसा कहां

[01:26:41] से आ रहा था।

[01:26:42] श्रोत बताते हैं कि बेंटेक खर्च कम करने

[01:26:45] पर भी बहुत ध्यान दे रहे थे।

[01:26:47] हां। वो एक बहुत ही क्या कहते हैं

[01:26:49] व्यवहारिक प्रशासक थे। उन्होंने सैनिकों

[01:26:51] को मिलने वाले भत्ते में कटौती की। अच्छा।

[01:26:53] और प्रशासन में भारतीयों को शामिल करने के

[01:26:55] पीछे भी एक बड़ी वजह आर्थिक थी।

[01:26:57] वो कैसे?

[01:26:57] ब्रिटिश अधिकारियों की तुलना में भारतीय

[01:26:59] अधिकारियों को बहुत कम वेतन देना पड़ता

[01:27:01] था। तो यह एक तरह से दोहरे फायदे का सौदा

[01:27:03] था।

[01:27:04] मतलब खर्च भी कम हुआ और प्रशासन में

[01:27:06] स्थानीय भागीदारी भी दिखी।

[01:27:07] बिल्कुल।

[01:27:08] आर्थिक फैसलों में एक और बात मुझे चौंकाती

[01:27:10] है। अफीम का व्यापार।

[01:27:12] हम

[01:27:12] बेंटिक ने इसे नियंत्रित करने के लिए इसके

[01:27:14] रास्ते को बदलकर सिर्फ बॉम्बे बंदरगाह तक

[01:27:16] सीमित कर दिया। एक तरफ सती प्रथा जैसी

[01:27:19] अनैतिक चीज को बंद करना और दूसरी तरफ अफीम

[01:27:22] जैसे अनैतिक व्यापार को और सुव्यवस्थित

[01:27:24] करना यह कैसा विरोधाभास है?

[01:27:26] और यही यही ब्रिटिश नीति का असली चेहरा

[01:27:29] है। जहां नैतिकता उनके आर्थिक हितों के

[01:27:31] आड़े नहीं आती थी, वे सुधारक बन जाते थे।

[01:27:33] सही बात है।

[01:27:34] लेकिन जहां अफीम के व्यापार से कंपनी को

[01:27:36] भारी राजस्व मिल रहा था, वहां नैतिकता

[01:27:39] नहीं बल्कि मुनाफे को प्राथमिकता दी गई।

[01:27:41] बॉम्बे से व्यापार को नियंत्रित करके

[01:27:42] उन्होंने अपना राजस्व और नियंत्रण दोनों

[01:27:44] को मजबूत किया। तो बेंटिक का दौर सुधारों

[01:27:47] और खर्च घटाने पर केंद्रित था। लेकिन उनके

[01:27:49] जाने के बाद और डलहौजी के आने से पहले का

[01:27:52] जो एक दशक था वह एक तरह से आने वाले तूफान

[01:27:55] से पहले की शांति जैसा लगता है।

[01:27:57] कह सकते हैं छोटे-छोटे लेकिन अहम काम हुए

[01:28:00] इस दौरान।

[01:28:00] हां बिल्कुल।

[01:28:01] इस दौर को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता

[01:28:03] है। लेकिन यहां भी कुछ महत्वपूर्ण बदलाव

[01:28:04] हुए हैं। सबसे पहले चार्ल्स मैटफ का नाम

[01:28:07] आता है। 183536।

[01:28:08] सिर्फ एक साल का कार्यकाल।

[01:28:10] हां। पर असर बहुत बड़ा था। उन्हें भारतीय

[01:28:12] प्रेस का मुक्तिदाता कहा जाता है। ऐसा

[01:28:15] क्यों? क्या प्रेस पहले गुलाम था?

[01:28:18] एक तरह से हां 1823 के कानून बहुत सख्त थे

[01:28:21] और प्रेस की आजादी को सीमित करते थे।

[01:28:23] मिडकाफ ने उन कानूनों को हटा दिया।

[01:28:24] अच्छा।

[01:28:25] जिससे भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी के

[01:28:27] समाचार पत्रों को खुलकर लिखने की आजादी

[01:28:29] मिली। यह एक साहसिक कदम था क्योंकि एक

[01:28:31] आजाद प्रेस हमेशा से औनिनिवेशिक सरकारों

[01:28:34] के लिए सिरदर्द रहा है।

[01:28:35] इसके बाद लॉर्ड ऑकलैंड का जिक्र है 1836

[01:28:38] से 42 तक उनके नाम के साथ दो बातें जुड़ी

[01:28:41] हैं।

[01:28:42] एक तो शेरशाह सूरी मार्ग का नाम बदलकर

[01:28:45] जीएटी रोड रखना और दूसरा पहला आंग्ल अफगान

[01:28:49] युद्ध।

[01:28:49] हां। और वो युद्ध जो 1839 से 42 तक चला।

[01:28:52] ब्रिटिश साम्राज्य के लिए एक बड़ी तबाही

[01:28:54] साबित हुआ।

[01:28:55] अच्छा। इसके बाद आए लॉर्ड एलेन बोरो

[01:28:57] 184244

[01:28:59] जिन्होंने 1843 में आधिकारिक तौर पर दास

[01:29:01] प्रथा का पंथ किया

[01:29:03] और फिर लॉर्ड हार्डिंग प्रथम

[01:29:05] जी 1844 से 48 तक उन्होंने उड़ीसा की खोंड

[01:29:08] जनजाति में प्रचलित नरबलि प्रथा को खत्म

[01:29:11] करने के लिए सैन्य कारवाई की।

[01:29:12] तो यह दौर छोटे-छोटे लेकिन महत्वपूर्ण

[01:29:15] सुधारों का था। पर इसके बाद जो गवर्नर

[01:29:17] जनरल आया उसने तो ब्रिटिश साम्राज्य के

[01:29:20] विस्तार की रफ्तार को ही बदल दिया।

[01:29:22] अब आते हैं लॉर्ड डलहौजी पर। स्रोत में एक

[01:29:25] शिक्षक का जिक्र है जो मजाक में उसे डॉग

[01:29:28] डलहौजी कहता था।

[01:29:30] यह नाम उसकी नीतियों को देखते हुए कुछ हद

[01:29:32] तक सही लगता है।

[01:29:33] डलहौजी जो 1848 से 56 तक रहा वो ब्रिटिश

[01:29:36] साम्राज्यवाद का सबसे आक्रामक चेहरा था।

[01:29:38] अच्छा।

[01:29:39] उसका मानना था कि भारतीय शासकों का शासन

[01:29:41] पिछड़ा और खराब है और ज्यादा से ज्यादा

[01:29:43] भारतीय इलाकों को सीधे ब्रिटिश शासन के

[01:29:45] तहत लाना ही प्रगति का रास्ता है।

[01:29:47] और इसी काम के लिए उसने जो हथियार

[01:29:49] इस्तेमाल किया

[01:29:50] वो था राज्य हड़प नीति या डॉक्ट्रिन ऑफ

[01:29:53] लैप्स। यह नीति सुनने में तो बहुत सीधी

[01:29:55] लगती है। पर इसके पीछे की मंशा क्या थी?

[01:29:58] मंशा थी बहाना बनाकर राज्यों पर कब्जा

[01:30:00] करना। नीति यह थी कि अगर किसी शासक का

[01:30:03] अपना कोई पुरुष उत्तराधिकारी नहीं है तो

[01:30:05] वह किसी बच्चे को गोद नहीं ले सकता।

[01:30:07] मतलब गोद लेने की प्रथा को अमान्य कर

[01:30:10] दिया।

[01:30:10] हां। और उसकी मृत्यु के बाद उसका राज्य

[01:30:12] सीधे ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया

[01:30:14] जाएगा। यह भारतीय परंपराओं का सीधा अपमान

[01:30:16] था। जहां गोद लेने की प्रथा सदियों से चली

[01:30:18] आ रही थी।

[01:30:19] तो यह सीधे-सीधे राज्यों को निगलने का एक

[01:30:21] कानूनी जामा था। बिल्कुल।

[01:30:23] और इसके तहत तो जैसे एक के बाद एक राज्यों

[01:30:25] की लाइन लग गई।

[01:30:26] बिल्कुल। जैसे डोमिनोज गिर रहे हो। क्रम

[01:30:28] देखिए। सबसे पहले 1848 में सतारा।

[01:30:31] सतारा।

[01:30:31] फिर 1849 में जयपुर और संभलपुर।

[01:30:34] एक ही साल में दो।

[01:30:35] हां। फिर 1852 में उदयपुर, 1854 में झांसी

[01:30:39] और उसी साल नागपुर। इन सभी राज्यों को इसी

[01:30:41] नीति के तहत हड़प लिया गया।

[01:30:43] और झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का संघर्ष तो

[01:30:45] इसी नीति का परिणाम था।

[01:30:47] जी बिल्कुल।

[01:30:47] लेकिन, अवध के साथ तो डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स

[01:30:49] का इस्तेमाल नहीं हुआ, उसका मामला तो अलग

[01:30:51] था। हां और यहीं पर डलहौजी की असली मंशा

[01:30:54] दिखती है। जब एक नियम काम ना आए तो दूसरा

[01:30:56] बना लो।

[01:30:57] अवध बहुत अमीर और रणनीतिक रूप से

[01:31:00] महत्वपूर्ण राज्य था। उसे किसी भी बहाने

[01:31:03] से हड़पना जरूरी था। तो 1856 में अवध पर

[01:31:06] कुशासन का आरोप लगाया गया।

[01:31:08] कुशासन का।

[01:31:09] हां, कहा गया कि नवाब वाजिद अली शाह ठीक

[01:31:11] से शासन नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए जनता

[01:31:14] की भलाई के लिए ब्रिटिश शासन जरूरी है। और

[01:31:16] यह रिपोर्ट आउटरम नाम के एक अधिकारी ने

[01:31:18] तैयार की और डलहौजी की अवध पर बहुत पहले

[01:31:22] से नजर थी। स्रोत में उसका एक प्रसिद्ध

[01:31:24] कथन भी है।

[01:31:25] हां, एक चेरी जो हमारे मुंह में गिरेगी।

[01:31:28] यही कथन उसकी साम्राज्यवादी भूख को साफ

[01:31:30] जाहिर करता है।

[01:31:32] बिल्कुल।

[01:31:32] और अवध का विलय 1857 के विद्रोह के सबसे

[01:31:35] बड़े कारणों में से एक बना। यही तो इस

[01:31:37] व्यक्ति की कहानी को जटिल बनाता है। एक

[01:31:40] तरफ वो इस तरह राज्यों को हड़प रहा है और

[01:31:42] दूसरी तरफ उसी के कार्यकाल में उन चीजों

[01:31:45] की नींव रखी जा रही है जिन्हें हम आधुनिक

[01:31:47] भारत का आधार मानते हैं।

[01:31:49] सही।

[01:31:50] शुरुआत करते हैं रेलवे से।

[01:31:51] हां, यह एक जबरदस्त बदलाव था। भारत की

[01:31:54] पहली यात्री ट्रेन 16 अप्रैल 1853 को

[01:31:57] मुंबई से ठाणे के बीच 34 कि.मी. चली। तो

[01:31:59] फिर

[01:32:00] इसका मुख्य उद्देश्य था बंदरगाहों तक कपास

[01:32:03] और दूसरे कच्चे माल को तेजी से पहुंचाना

[01:32:05] और देश के अंदरूनी हिस्सों तक सेना को

[01:32:07] तेजी से भेजना।

[01:32:08] अच्छा मतलब आर्थिक शोषण और सैन्य

[01:32:10] नियंत्रण।

[01:32:11] ये दोनों का एक बेहतरीन उपकरण था।

[01:32:13] और कमाल की बात देखिए उस पहली ट्रेन के

[01:32:15] तीन इंजनों के नाम भी दिए गए हैं। सुल्तान

[01:32:18] साहिब और सिंध।

[01:32:19] जी हां।

[01:32:20] मतलब पूरे शाही अंदाज में शुरुआत हुई थी।

[01:32:22] एक ऐसी तकनीक की जो भारत को हमेशा के लिए

[01:32:24] बदलने वाली बिल्कुल।

[01:32:26] रेलवे के अलावा 1854 एक बहुत ही

[01:32:28] महत्वपूर्ण साल था।

[01:32:30] क्यों?

[01:32:30] इसी साल वुड डिस्पैच आया।

[01:32:31] वुड डिस्पैच क्या था? इसे अंग्रेजी शिक्षा

[01:32:33] का मैग्नाका क्यों कहते हैं?

[01:32:35] इसे मैग्नाका इसलिए कहते हैं क्योंकि यह

[01:32:37] भारत में शिक्षा के लिए एक पूरी विस्तृत

[01:32:40] योजना थी। मतलब प्राथमिक स्कूल से लेकर

[01:32:42] विश्वविद्यालय स्तर तक इसने व्यवस्थित

[01:32:44] शिक्षा प्रणाली की नींव रखी।

[01:32:46] अच्छा, इसी साल 1854 में संचार के क्षेत्र

[01:32:49] में भी क्रांति हुई। पोस्ट ऑफिस एक्ट लाया

[01:32:51] गया। जिससे पूरे भारत में कहीं भी एक ही

[01:32:53] दर पर चिट्ठी भेजी जा सकती थी।

[01:32:55] और टेलीग्राफ भी तो तभी शुरू हुआ।

[01:32:57] हां, विद्युत तार सेवा जिसने कोलकाता,

[01:32:59] बंबई, मद्रास और पेशावर को जोड़ दिया।

[01:33:02] टेलीग्राफ का मतलब तो यह हुआ कि हजारों

[01:33:04] किलोमीटर दूर संदेश मिनटों में पहुंच सकता

[01:33:06] था। प्रशासन और सेना के लिए तो यह एक गेम

[01:33:09] चेंजर रहा होगा।

[01:33:10] निश्चित रूप से 1857 के विद्रोह को दबाने

[01:33:13] में टेलीग्राफ ने अंग्रेजों की बहुत मदद

[01:33:15] की।

[01:33:15] हम्म। और 1854 में ही एक और विभाग बना लोक

[01:33:19] निर्माण विभाग यानी पीडब्ल्यूडी जिसका काम

[01:33:21] सड़कें, पुल और नहरे बनाना था।

[01:33:24] तो आप देख सकते हैं रेलवे, टेलीग्राफ,

[01:33:26] डाक, पीडब्ल्यूडी यह सब एक ऐसे बुनियादी

[01:33:29] ढांचे का निर्माण था

[01:33:30] जो साम्राज्य पर नियंत्रण को अभूतपूर्व

[01:33:33] रूप से मजबूत कर रहा था।

[01:33:34] और इस सबके बीच एक और सामाजिक सुधार की

[01:33:37] आहट भी डलहौजी के समय सुनाई देती है।

[01:33:39] विधवा पुनर्विवाह। हां ईश्वर चंद्र

[01:33:42] विद्यासागर के अथक प्रयासों से विधवा

[01:33:44] पुनर्विवाह कानून का मसौदा यानी ड्राफ्ट

[01:33:47] डलहौजी के समय ही तैयार हो गया था।

[01:33:49] अच्छा कानून बना नहीं था।

[01:33:50] नहीं कानून उसके जाने के ठीक बाद 1856 में

[01:33:53] लॉर्ड कैनिंग के समय में पारित हुआ। लेकिन

[01:33:55] इसकी जमीन डलहौजी के कार्यकाल में ही

[01:33:58] तैयार हो चुकी थी।

[01:34:01] 1857 यह सिर्फ एक साल नहीं है। यह भारतीय

[01:34:04] इतिहास का एक ऐसा मोड़ है जिस पर मतलब आज

[01:34:07] भी बहस होती है।

[01:34:08] देखिए एक तरफ वि डी सावरकर हैं जो इसे

[01:34:11] प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहते हैं।

[01:34:13] हां एक राष्ट्रीय पहचान देते हैं।

[01:34:15] बिल्कुल। लेकिन वहीं आरसी मजूमदार जैसे

[01:34:17] बड़े इतिहासकार साफ कहते हैं कि यह ना तो

[01:34:20] पहला था ना राष्ट्रीय और ना ही स्वतंत्रता

[01:34:23] संग्राम था।

[01:34:24] और इन दोनों के बीच में अंग्रेजों के अपने

[01:34:26] विचार थे।

[01:34:26] हां, वह तो थे ही। कोई इसे सभ्यता और

[01:34:29] बर्बरता का युद्ध कह रहा है तो जेम्स

[01:34:31] आउट्रम जैसे अधिकारी इसे एक हिंदू मुस्लिम

[01:34:34] साजिश का नाम दे रहे थे।

[01:34:35] मतलब एक ही घटना की इतनी सारी कहानियां यह

[01:34:38] अपने आप में ही बताता है कि जमीन पर कितना

[01:34:41] कुछ एक साथ हो रहा था।

[01:34:42] सही बात।

[01:34:43] तो फिर शुरू कहां से करना चाहिए? आर्थिक

[01:34:45] तबाही से शुरू करते हैं। सूत्र बताते हैं

[01:34:47] कि अंग्रेजों ने भारत की अर्थव्यवस्था की

[01:34:49] कमर ही तोड़ दी थी। एक आंकड़ा जो हमेशा

[01:34:51] दिमाग में रह जाता है।

[01:34:52] कि भारत दुनिया की जीडीपी का 25% हिस्सा

[01:34:56] था। हां, कभी था। अंग्रेजों ने इसे कैसे

[01:34:58] बदला?

[01:34:58] उन्होंने इसे एक सोची समझी पॉलिसी के तहत

[01:35:01] बदला। यह सिर्फ लूट नहीं थी। यह भारत की

[01:35:04] आर्थिक संरचना को बदलना था।

[01:35:06] अच्छा।

[01:35:06] भारतीय सूती कपड़ों पर ब्रिटेन में 10 से

[01:35:09] 30% तक का भारी टैक्स लगाया गया।

[01:35:12] ताकि वो वहां की मिलों से मुकाबला ना कर

[01:35:13] सके।

[01:35:14] एक्जेक्टली। और दूसरी तरफ ब्रिटेन का बना

[01:35:16] सस्ता माल भारत के बाजारों में बिना किसी

[01:35:19] टैक्स के भर दिया गया। तो नतीजा

[01:35:22] नतीजा भारत के बुनकर, कारीगर, छोटे उद्योग

[01:35:25] सब तबाह हो गए। भारत जो कभी दुनिया को

[01:35:27] तैयार माल बेचता था अब सिर्फ कच्चा माल

[01:35:30] पैदा करने वाला एक बाजार बन गया।

[01:35:32] तो एक तरफ आम आदमी की जेब काटी जा रही थी

[01:35:34] और दूसरी तरफ भारत के राजा महाराजाओं के

[01:35:37] साथ क्या हो रहा था? क्योंकि विद्रोह में

[01:35:38] तो उन्होंने भी बड़ी भूमिका निभाई।

[01:35:40] उनके साथ तो और भी बुरा हो रहा था। पहले

[01:35:42] वेलेजली सहायक संधि लेकर आया। सब्सिडरी

[01:35:45] अलायंस। सुनने में तो यह सुरक्षा का

[01:35:47] समझौता लगता है।

[01:35:48] लगता है पर असल में यह राज्यों की आजादी

[01:35:50] छीनने का एक तरीका था। राजा अपनी सेना

[01:35:52] नहीं रख सकते थे। अंग्रेजों की एक टुकड़ी

[01:35:55] रखनी पड़ती थी।

[01:35:56] जिसका खर्चा भी खुद उठाते थे।

[01:35:57] हां, वो एक तरह से अपने ही महल में कैदी

[01:36:00] बनकर रह गए थे।

[01:36:01] और फिर आई डलहौजी की हड़प नीति, डॉक्ट्रिन

[01:36:04] ऑफ लैप्स।

[01:36:05] हम्म।

[01:36:05] यह तो मतलब सीधा-सीधा राज्यों को निगल

[01:36:08] जाने वाली नीति थी।

[01:36:09] बिल्कुल। उन्होंने कहा कि जिस राजा का

[01:36:12] अपना बेटा नहीं होगा वो गोद नहीं ले सकता

[01:36:15] और उसका राज सीधा कंपनी के हाथ में चला

[01:36:17] जाएगा।

[01:36:17] और इसी एक नियम से

[01:36:19] इसी एक नियम से उन्होंने सतारा, झांसी,

[01:36:22] नागपुर जैसे कई अमीर राज्यों को बिना एक

[01:36:24] गोली चलाए हड़प लिया।

[01:36:26] हम

[01:36:26] नाना साहब जो पेशवा, बाजीराव द्वितीय के

[01:36:29] गोद लिए बेटे थे। उनकी पेंशन बंद कर दी

[01:36:32] गई।

[01:36:32] यहां तक कि मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर का

[01:36:35] भी अपमान किया गया। हां, लॉर्ड कनिंग ने

[01:36:37] ऐलान कर दिया कि वह आखिरी बादशाह होंगे और

[01:36:39] उनके बाद उनके परिवार को लाल किला खाली

[01:36:42] करना होगा। यह सिर्फ राजनीतिक फैसले नहीं

[01:36:44] थे। यह भारतीय शासकों के सम्मान पर सीधा

[01:36:46] हमला था।

[01:36:47] तो पैसे और सियासत का गुस्सा तो समझ आता

[01:36:50] है। पर क्या लोगों को यह भी लग रहा था कि

[01:36:52] उनकी पहचान उनके धर्म पर भी हमला हो रहा

[01:36:54] है?

[01:36:55] हां, और शायद यह दर सबसे गहरा था, 1813 के

[01:36:59] एक्ट ने ईसाई मिशनरियों को भारत में धर्म

[01:37:02] प्रचार की खुली छूट दे दी। स्कूलों में

[01:37:04] बाइबल पढ़ाना जरूरी कर दिया गया।

[01:37:05] अब देखिए सती प्रथा पर रोक लगाना या विधवा

[01:37:08] पुनर्विवाह को बढ़ावा देना आज के नजरिए से

[01:37:11] तो यह प्रगतिशील कदम लगते हैं।

[01:37:13] सही बात है।

[01:37:14] लेकिन उस वक्त के बहुत से भारतीयों को यह

[01:37:16] कैसा लगा होगा? उन्हें लगा होगा कि यह

[01:37:18] बाहरी ताकत हमारे सदियों पुरानी रीति

[01:37:20] रिवाजों में दखल दे रही है।

[01:37:22] सुधार भी जब जबरदस्ती थोपा जाए तो वह हमला

[01:37:24] ही लगता है।

[01:37:25] बिल्कुल। और फिर 1850 में आया धार्मिक

[01:37:28] निरग्यता अधिनियम। यह कानून कहता था कि

[01:37:31] अगर कोई अपना धर्म बदलकर ईसाई बन जाता है

[01:37:34] तो भी उसका उसकी पैतृक संपत्ति पर हक बना

[01:37:37] रहेगा।

[01:37:37] मतलब यह तो सीधे-सीधे धर्म बदलने के लिए

[01:37:39] उकसाना हुआ।

[01:37:40] लोगों ने इसे ऐसे ही देखा। सिपाहियों में

[01:37:42] भी यही बेचैनी थी। उन्हें समुद्र पार जाकर

[01:37:44] लड़ने भेजा जाने लगा जिसे वो धर्म भ्रष्ट

[01:37:47] होना मानते थे। तो आप देखिए किसान,

[01:37:50] कारीगर, राजा, सिपाही हर कोई गुस्से में

[01:37:52] था। बस एक चिंगारी का इंतजार था।

[01:37:54] और वो चिंगारी 29 मार्च 1857 को बैरकपुर

[01:37:58] में भड़की। एक अकेला सिपाही मंगल पांडे।

[01:38:01] हां, 34 इनफेंट्री के सिपाही मंगल पांडे

[01:38:04] उन्होंने उन नए एनफील्ड राइफल के कारतूसों

[01:38:08] को इस्तेमाल करने से साफ मना कर दिया।

[01:38:10] जिन पर गाय और सूअर की चर्बी लगे होने की

[01:38:13] अफवाह थी।

[01:38:14] उन्होंने सिर्फ मना ही नहीं किया बल्कि

[01:38:16] गुस्से में दो अंग्रेज अफसरों पर गोली भी

[01:38:18] चला दी। 8 अप्रैल को उन्हें फांसी दे दी

[01:38:21] गई।

[01:38:21] अंग्रेजों को लगा होगा कि मामला शांत हो

[01:38:23] गया।

[01:38:24] उन्हें यही लगा लेकिन हुआ इसका ठीक उल्टा।

[01:38:26] मंगल पांडे की मौत ने उन्हें एक शहीद एक

[01:38:29] सिंबल बना दिया

[01:38:30] और यह खबर आग की तरह फैली

[01:38:32] बिल्कुल खबर मेरठ पहुंची वहां 24 अप्रैल

[01:38:34] को 85 घुड़सवार सैनिकों ने उन कारतूसों को

[01:38:38] छूने से भी मना कर दिया

[01:38:39] और नतीजा

[01:38:40] उन सबको 10 10 साल की कैद उनकी वर्दियां

[01:38:43] फाड़ी गई और उन्हें जंजीरों में जकड़ कर

[01:38:45] जेल में डाल दिया गया। यह अपमान बाकी

[01:38:48] सिपाहियों से बर्दाश्त नहीं हुआ। और यहीं

[01:38:50] से 10 मई 1857 को क्रांति की कह सकते हैं

[01:38:53] औपचारिक शुरुआत होती है।

[01:38:55] हां उस दिन धन सिंह कोतवाल के नेतृत्व में

[01:38:58] सिपाहियों ने जेल पर धावा बोल दिया। अपने

[01:39:01] साथियों को आजाद कराया और एक नारा दिया

[01:39:04] दिल्ली चलो।

[01:39:05] अगले ही दिन 11 12 मई की सुबह ही यह

[01:39:07] विद्रोही सिपाही दिल्ली पहुंच गए।

[01:39:09] और उन्होंने दिल्ली जाकर जो किया, वह बहुत

[01:39:11] ही महत्वपूर्ण कदम था।

[01:39:12] उन्होंने बूढ़े हो चुके मुगल बादशाह

[01:39:14] बहादुर शाह जफर को हिंदुस्तान का सम्राट

[01:39:17] घोषित कर दिया। यह इतना अहम क्यों था?

[01:39:19] यह एक मास्टर स्ट्रोक था। बहादुर शाह जफर

[01:39:22] के पास असली ताकत भले ही ना हो, लेकिन

[01:39:24] उनका नाम एक प्रतीक था।

[01:39:26] मुगल सल्तनत का प्रतीक?

[01:39:27] हां, उन्हें अपना नेता मानकर इन सिपाहियों

[01:39:30] ने अपने विद्रोह को एक स्थानीय सैन्य गदड़

[01:39:32] से उठाकर एक अखिल भारतीय राजनीतिक लड़ाई

[01:39:35] का रूप दे दिया। उन्होंने संदेश दिया कि

[01:39:38] वह पूरे हिंदुस्तान के लिए अंग्रेजों के

[01:39:40] खिलाफ लड़ रहे हैं।

[01:39:41] दिल्ली पर कब्जे की खबर जैसे ही फैली, यह

[01:39:44] आग पूरे उत्तर और मध्य भारत में फैल गई।

[01:39:46] लखनऊ, कानपुर, झांसी,

[01:39:48] बिहार।

[01:39:49] हर जगह विद्रोह के अपने नायक और अपनी

[01:39:51] कहानियां हैं।

[01:39:52] और इन नेताओं में भी कितनी विविधता थी। है

[01:39:54] ना? लखनऊ में बेगम हजरत महल अपने बेटे के

[01:39:58] नाम पर हुकूमत कर रही थी। कानपुर में नाना

[01:40:01] साहब थे जिनके साथ उनके बेहतरीन सेनापति

[01:40:04] तात्या टोपे थे। और फिर झांसी की रानी

[01:40:07] लक्ष्मीबाई उनका नाम तो आज भी बहादुरी का

[01:40:09] दूसरा नाम है।

[01:40:10] यकीनन अंग्रेज जनरल ह्यूरोज़ जिसने आखिरकार

[01:40:14] उन्हें हराया उसने भी उनकी बहादुरी का

[01:40:16] लोहा माना।

[01:40:17] अच्छा।

[01:40:17] उसने अपनी डायरी में लिखा यहां वो औरत सो

[01:40:20] रही है जो विद्रोहियों में अकेली मर्द थी।

[01:40:23] वाह! मतलब दुश्मन भी सम्मान कर रहा था।

[01:40:26] बिल्कुल। उन्होंने तात्या टोपे के साथ

[01:40:28] मिलकर ग्वालियर पर भी कब्जा कर लिया था।

[01:40:30] लेकिन कुछ ऐसे भी नाम है जो शायद उतने

[01:40:33] मशहूर नहीं है पर उनकी कहानी भी कमाल की

[01:40:35] है। जैसे बिहार के कुंवर सिंह

[01:40:37] हां जगदीशपुर के 80 साल के जमींदार कुंवर

[01:40:40] सिंह इस उम्र में उन्होंने जैसी लड़ाई

[01:40:42] लड़ी वो हैरान करने वाली है।

[01:40:44] और फैजाबाद में मौलवी अहमद उल्लाह

[01:40:46] राजाओं और सिपाहियों की लड़ाई नहीं थी।

[01:40:48] इसमें आम लोग भी शामिल हो रहे थे।

[01:40:51] तो इतनी बहादुरी, इतने अलग-अलग नेता और

[01:40:54] इतना गुस्सा होने के बावजूद आखिर ये

[01:40:55] क्रांति असफल क्यों हुई? कहां कमी रही?

[01:40:58] इसकी कई बड़ी वजह थी। सबसे पहले एक

[01:41:00] केंद्रीय नेतृत्व और एक साझा योजना की

[01:41:03] कमी।

[01:41:03] मतलब कोई तालमेल नहीं था?

[01:41:05] नहीं था। हर कोई अपने-अपने इलाके में बहुत

[01:41:07] बहादुरी से लड़ा, लेकिन वह एक साथ नहीं

[01:41:09] लड़ रहे थे।

[01:41:10] और शायद क्रांति समय से पहले शुरू हो गई।

[01:41:12] माना जाता है कि 31 मई की तारीख तय की गई

[01:41:15] थी एक साथ विद्रोह के लिए। लेकिन मेरठ में

[01:41:17] घटनाएं जल्दी हो गई।

[01:41:18] इससे अंग्रेजों को संभलने का मौका मिल

[01:41:20] गया।

[01:41:20] हां, लेकिन शायद सबसे बड़ी वजह थी कि पूरा

[01:41:23] भारत एक साथ नहीं खड़ा हुआ। कई भारतीय ही

[01:41:25] अंग्रेजों के साथ थे। यह कड़वी सच्चाई है।

[01:41:28] हां, ग्वालियर के सिंध्या, इंदौर के

[01:41:30] होलकर, हैदराबाद के निजाम इन सब ने

[01:41:33] अंग्रेजों की खुलकर मदद की। पढ़े लिखे

[01:41:35] मध्यवर्ग ने भी इसका समर्थन नहीं किया।

[01:41:38] तो यह लड़ाई अखिल भारतीय होने के बावजूद

[01:41:40] पूरे भारत की लड़ाई नहीं बन सकी।

[01:41:42] नहीं बन सकी।

[01:41:43] तो 1858 आते-आते अंग्रेजों ने इस विद्रोह

[01:41:46] को पूरी तरह से कुचल दिया। हजारों लोग

[01:41:48] मारे गए। तो क्या यह सब व्यर्थ के या इस

[01:41:51] असफलता के भी कुछ दूरगामी परिणाम हुए? यह

[01:41:54] बहुत महत्वपूर्ण सवाल है। सैन्य नजरिए से

[01:41:56] देखें, तो यह एक हार थी। लेकिन इसके

[01:41:59] परिणाम इतने बड़े और गहरे थे कि इसने भारत

[01:42:02] का भविष्य हमेशा के लिए बदल दिया।

[01:42:04] वो क्या थे?

[01:42:05] सबसे बड़ा परिणाम ईस्ट इंडिया कंपनी का

[01:42:07] राज खत्म हो गया। हमेशा के लिए।

[01:42:09] हमेशा के लिए।

[01:42:10] 1857 के बाद ब्रिटिश संसद को समझ आ गया कि

[01:42:13] एक व्यापार करने वाली कंपनी के भरोसे भारत

[01:42:16] को नहीं छोड़ा जा सकता। 1858 में एक कानून

[01:42:19] पास हुआ और भारत का शासन सीधे ब्रिटिश

[01:42:22] क्राउन के हाथों में चला गया।

[01:42:24] महारानी विक्टोरिया

[01:42:25] हां इस एक घटना ने भारत को एक कॉर्पोरेट

[01:42:28] कॉलोनी से सीधे एक इंपीरियल कॉलोनी में

[01:42:30] बदल दिया।

[01:42:31] और मुगल सल्तनत का क्या हुआ?

[01:42:32] वो पूरी तरह से खत्म हो गई। बहादुर शाह

[01:42:35] जफर पर मुकदमा चलाकर उन्हें रंगून

[01:42:37] निर्वासित कर दिया गया। जहां 1862 में

[01:42:40] गुमनामी में उनकी मौत हो गई। सदियों से

[01:42:43] चला आ रहा मुगल साम्राज्य हमेशा के लिए

[01:42:45] इतिहास बन गया।

[01:42:48] 1857 कोई अकेली घटना नहीं थी। वह तो उस

[01:42:52] ज्वालामुखी का विस्फोट था जो बहुत-बहु

[01:42:55] लंबे समय से खौल रहा था। इतिहासकार बिपिन

[01:42:58] चंद्रा के काम पर आधारित हमारे स्रोत इस

[01:43:00] प्रतिरोध को तीन मुख्य धाराओं में बांट कर

[01:43:03] देखते हैं। नागरिक विद्रोह यानी अपदस्त

[01:43:05] शासकों, सैनिकों और आम शहरी लोगों का

[01:43:08] गुस्सा। फिर किसान विद्रोह यानी जिनकी

[01:43:11] जमीन और रोजगार पर सीधा हमला हुआ और आखिर

[01:43:14] में जनजातीय विद्रोह यानी उन समुदायों का

[01:43:17] संघर्ष जिनका पूरा जीवन दर्शन ही खतरे में

[01:43:20] पड़ गया था।

[01:43:20] सूची में पहला नाम ही बहुत दिलचस्प है।

[01:43:23] बंगाल का सन्यासी फकीर विद्रोह और सबसे

[01:43:25] मजेदार बात पता है क्या है? यह विद्रोह

[01:43:27] सिर्फ इतिहास की किताबों में नहीं है। यह

[01:43:29] बंकिम चंद्र चैटर्जी की मशहूर किताब आनंद

[01:43:32] मठ का हिस्सा है। हमारा राष्ट्रगीत वंदे

[01:43:34] मातरम वहीं से तो आया है।

[01:43:35] हां। और यह दिखाता है कि इस विद्रोह का

[01:43:37] सांस्कृतिक प्रभाव कितना गहरा था। इसकी

[01:43:40] वजह भी बहुत सीधी थी। 1770 में बंगाल में

[01:43:44] भयानक अकाल पड़ा था। लाखों लोग मारे गए और

[01:43:47] उस पर से अंग्रेजों ने तीर्थ यात्राओं पर

[01:43:49] टैक्स लगा दिया। सोचिए एक तरफ भुखमरी और

[01:43:52] दूसरी तरफ आपकी धार्मिक आस्था पर हमला।

[01:43:55] मजनू शाह और देवी चौधानी जैसे नेताओं ने

[01:43:58] इसी गुस्से को एक आंदोलन में बदल दिया।

[01:44:00] यानी यह सिर्फ राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक

[01:44:03] और धार्मिक शोषण के खिलाफ एक एक विस्फोट

[01:44:05] था।

[01:44:05] अच्छा जब हम दक्षिण की ओर देखते हैं तो

[01:44:08] त्रावणकोर में वेलुथम्पी विद्रोह का जिक्र

[01:44:10] आता है। श्रोत कहता है कि यह सहायक संधि

[01:44:13] यानी सब्सिडरी अलायंस के खिलाफ था।

[01:44:16] ट्रावणकोर के दीवान वेलूथप्पी ने इसी जाल

[01:44:19] को काटने की कोशिश की थी।

[01:44:20] यह तो बहुत ही कह सकते हैं चालाकी भरी

[01:44:23] योजना थी। ओसा के पाईका विद्रोह के पीछे

[01:44:25] भी कुछ ऐसी ही कहानी लगती है। बक्शी

[01:44:27] जगबंधू के नेतृत्व में यह लोग लड़े

[01:44:30] क्योंकि उनकी कर मुक्त जमीन छीन ली गई थी।

[01:44:32] हां, पाईका ओसा के पारंपरिक सैनिक थे,

[01:44:35] जिन्हें उनकी सैन्य सेवाओं के बदले राजा

[01:44:38] की तरफ से जमीन मिलती थी और इस जमीन पर

[01:44:40] कोई टैक्स नहीं लगता था। यह सिर्फ उनकी

[01:44:43] आमदनी का जरिया नहीं बल्कि उनके सम्मान का

[01:44:45] प्रतीक था। अंग्रेजों ने आते ही कहा कि यह

[01:44:48] व्यवस्था फिजूल खर्ची है और उन्होंने

[01:44:50] जमीनें छीन ली। यह उनकी आजीविका और इज्जत

[01:44:53] दोनों पर एक साथ हमला था।

[01:44:54] 1 मिनट यहां एक पैटर्न दिख रहा है।

[01:44:56] कुछ साल बाद महाराष्ट्र में गडकरी विद्रोह

[01:44:59] हुआ। वह भी वंशानुगत सैनिक थे। उन्हें भी

[01:45:01] सेवा के बदले कर मुक्त जमीन मिलती थी और

[01:45:03] उनकी भी जमीनें छीन ली गई। क्या यह महज एक

[01:45:06] इत्तेफाक था?

[01:45:07] यह इत्तेफाक बिल्कुल नहीं था। यह कंपनी की

[01:45:10] एफिशिएंसी एट ऑल कॉस्ट वाली सोच का नतीजा

[01:45:13] था। उनके लिए यह वंशानुगत सैनिक एक फालतू

[01:45:17] खर्च थे। एक पुरानी व्यवस्था का हिस्सा

[01:45:19] जिसे खत्म करना था। उन्होंने यह नहीं सोचा

[01:45:22] कि वह सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं बल्कि

[01:45:24] पीढ़ियों का सम्मान और रोजगार छीन रहे

[01:45:26] हैं। ऐसा लगता है जैसे वह एक ही फार्मूला

[01:45:28] पूरे देश पर लगा रहे थे। सेना का खर्च कम

[01:45:31] करो जमीन छीन लो और नतीजा पूरे देश से एक

[01:45:34] जैसा ही विस्फोटक रिएक्शन आया। चाहे वो

[01:45:36] ओसा हो या महाराष्ट्र।

[01:45:38] और इसीलिए इसमें कर्नाटक का कित्तूर

[01:45:40] विद्रोह भी है। जहां रानी चन्नामा ने

[01:45:41] अंग्रेजों से लोहा लिया। यह डॉक्ट्रिन ऑफ

[01:45:43] लैप्स का मामला था। है ना?

[01:45:44] बिल्कुल। जब कित्तूर के राजा की कोई पुरुष

[01:45:47] संतान नहीं हुई तो रानी चन्नामा ने एक

[01:45:49] बच्चे को गोद लिया। लेकिन अंग्रेजों ने

[01:45:51] उसे उत्तराधिकारी मानने से इंकार कर दिया

[01:45:53] और राज्य हड़पने की कोशिश की। रानी

[01:45:56] चन्नामा ने जो लड़ाई लड़ी वो आज भी

[01:45:58] कर्नाटक के लोक लोक लोक लोक लोक लोक लोक

[01:45:58] लोक लोक लोक लोक लोक लोक लोकगीतों में जिंदा है। यह

[01:46:00] दिखाता है कि प्रतिरोध सिर्फ पुरुष ही

[01:46:02] नहीं कर रहे थे।

[01:46:03] इस श्रेणी में दो आंदोलन और हैं जो थोड़े

[01:46:05] अलग हैं। बहावी आंदोलन और कुका आंदोलन। यह

[01:46:08] धार्मिक सुधार से शुरू हुए। हां, लेकिन

[01:46:10] इसमें एक और परत है। हम इन्हें धार्मिक

[01:46:13] सुधार आंदोलन कहते हैं। पर सच तो यह है कि

[01:46:16] उस समय धर्म और राजनीति को अलग करना लगभग

[01:46:19] नामुमकिन था। पटना केंद्रित बहावी आंदोलन

[01:46:22] इस्लाम में सुधार की बात करता था। लेकिन

[01:46:24] साथ ही वो अंग्रेजों को एक शोषक और विदेशी

[01:46:28] ताकत के रूप में देखता था। इसी तरह पंजाब

[01:46:30] का कूका आंदोलन सिख धर्म में सुधार के लिए

[01:46:33] शुरू हुआ। पर जल्द ही वह एक बहुत

[01:46:35] शक्तिशाली अंग्रेज विरोधी राजनीतिक आंदोलन

[01:46:39] बन गया। तो हमने देखा कि कैसे राजाओं,

[01:46:41] सैनिकों और धार्मिक नेताओं से उनकी सत्ता,

[01:46:44] सम्मान और पहचान छीनी जा रही थी। पर इस

[01:46:46] कहानी का असली भुखभोगी तो वह था जिसकी रीड

[01:46:49] पर पूरा ढांचा टिका था। किसान जब अंग्रेजी

[01:46:52] नीतियां खेतों तक पहुंची तो जमीन से जो

[01:46:54] विद्रोह फूटा वो कहीं ज्यादा व्यापक था।

[01:46:56] बिल्कुल। यह विद्रोह सीधे तौर पर

[01:46:58] अंग्रेजों की लालची राजस्व नीतियों से

[01:47:01] जुड़े थे। जमींदार बदल दिए गए। लगान की

[01:47:03] दरें आसमान छूने लगी और किसानों को उनकी

[01:47:06] ही जमीन से बेदखल किया जाने लगा। उनकी

[01:47:08] पूरी दुनिया ही उजड़ रही थी।

[01:47:10] इस सिलसिले में सबसे बड़ा और शायद सबसे

[01:47:12] मशहूर विद्रोह है बंगाल का नील विद्रोह।

[01:47:15] स्रोत इसे भारत का पहला सफल किसान आंदोलन

[01:47:17] कहता है। ऐसा क्या खास था इसमें?

[01:47:19] इसकी वजह थी ददनी प्रथा। यह एक तरह का लोन

[01:47:22] ट्रैप था।

[01:47:23] यूरोपीय बागान मालिक किसानों को थोड़ा सा

[01:47:25] एडवांस पैसा देकर एक कॉन्ट्रैक्ट साइन

[01:47:27] करवा लेते थे। जिसके तहत उन्हें अपने खेत

[01:47:30] के सबसे उपचाऊ हिस्से पर धान या गेहूं की

[01:47:32] जगह नील उगाना पड़ता था। नील जमीन को बंजर

[01:47:35] बना देता था और उसकी कीमत भी बागान मालिक

[01:47:38] खुद तय करते थे जो बाजार भाव से बहुत कम

[01:47:41] होती थी। किसान एक बार इस चक्र में फंस

[01:47:43] गया तो निकल नहीं पाता था।

[01:47:45] यानी हर तरफ से किसान ही पिस रहा था।

[01:47:46] लेकिन फिर यह सफल कैसे हुआ?

[01:47:48] किसानों के संगठित प्रतिरोध से दिगंबर

[01:47:50] विश्वास और विष्णु विश्वास के नेतृत्व में

[01:47:54] किसानों ने एकजुट होकर नील उगाने से साफ

[01:47:56] इंकार कर दिया। उन्होंने बागान मालिकों के

[01:47:59] हमलों का मुकाबला किया और अदालतों में भी

[01:48:02] लड़ाई लड़ी। इस विद्रोह को बंगाल के

[01:48:04] पढ़े-लिखे वर्ग का भी जबरदस्त समर्थन

[01:48:06] मिला। दीनबंद्र मित्र ने एक नाटक लिखा नील

[01:48:09] दर्पण जिसमें किसानों के दर्द को इतनी

[01:48:12] शिद्दत से दिखाया गया था कि वह रातोंरात

[01:48:14] मशहूर हो गया।

[01:48:15] नील दर्पण की कहानी तो कमाल है। मैंने

[01:48:18] पढ़ा है कि उस नाटक का असर इतना जबरदस्त

[01:48:20] था कि जब कोलकाता में अंग्रेज इसे देखते

[01:48:23] थे तो वह बागान मालिकों के अत्याचारों से

[01:48:25] इतने नाराज हो जाते थे कि स्टेज पर जूते

[01:48:27] फेंकने लगते थे। एक किताब, एक नाटक कैसे

[01:48:30] एक पूरे विद्रोह की आवाज बन सकता है? यह

[01:48:32] इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

[01:48:33] बिल्कुल आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा और

[01:48:36] 1860 में एक नील आयोग बनाना पड़ा जिसने

[01:48:40] ददनी प्रथा को खत्म करने की सिफारिश की।

[01:48:43] यह किसानों की एक बहुत बड़ी जीत थी।

[01:48:45] नील विद्रोह के बाद भी यह सिलसिला रुका

[01:48:47] नहीं। बंगाल में पाबना विद्रोह और संयुक्त

[01:48:50] प्रांत यानी यूपी में एका आंदोलन हुए।

[01:48:52] हम

[01:48:53] यह भी लगान और जमीन से जुड़े थे। हम्म

[01:48:56] एका आंदोलन में मदारी पासी का तरीका बड़ा

[01:48:59] अनोखा था।

[01:49:00] हां, मदारी पासी और सहदेव जैसे स्थानीय

[01:49:04] नेता किसानों को गंगा की सौगंध दिलाकर

[01:49:07] एकजुट करते थे कि वह बढ़ी हुई लगान नहीं

[01:49:09] देंगे और अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे।

[01:49:11] यह सौगंध एक शक्तिशाली प्रतीक थी।

[01:49:14] यह दिखाती है कि कैसे आंदोलन में लोगों को

[01:49:16] जोड़ने के लिए सामाजिक और धार्मिक

[01:49:19] प्रतीकों का इस्तेमाल किया जाता था। और

[01:49:21] फिर इस सूची का आखिरी किसान आंदोलन है

[01:49:24] तिभागा आंदोलन जो आजादी से ठीक पहले 1946

[01:49:27] में बंगाल में हुआ। इसकी मांग बहुत ही

[01:49:30] स्पष्ट और आधुनिक लगती है। यह दिखाता है

[01:49:32] कि समय के साथ किसान आंदोलन कितने परिपक्व

[01:49:35] हो गए थे। उनकी मांग फ्लाइड कमीशन की एक

[01:49:38] सिफारिश पर आधारित थी। वह कह रहे थे कि

[01:49:41] फसल का बंटवारा जमींदार और किसान के बीच

[01:49:44] आधा-आधा नहीं होना चाहिए। बल्कि उपज का

[01:49:46] 2/3 हिस्सा किसान को मिलना चाहिए। तेभागा

[01:49:49] का मतलब ही है तीन हिस्से। यह एक स्पष्ट,

[01:49:52] कानूनी और आर्थिक मांग थी। यह अब सिर्फ

[01:49:55] गुस्से का इजहार नहीं बल्कि अपने हक की एक

[01:49:58] संगठित लड़ाई थी।

[01:49:59] तमेलों से शुरू हुई आग खेतों तक फैल चुकी

[01:50:02] थी।

[01:50:02] लेकिन एक हिस्सा अभी बाकी था। जंगल जब

[01:50:05] अंग्रेजी राज के कानून और बाहरी लोग

[01:50:08] जंगलों में घुसे तो वहां रहने वाले

[01:50:10] आदिवासी समुदायों ने कैसी प्रतिक्रिया दी?

[01:50:13] उनकी प्रतिक्रिया सबसे तीव्र और अक्सर

[01:50:15] सबसे हिंसक थी। आदिवासियों का जीवन, उनकी

[01:50:18] अर्थव्यवस्था और उनकी संस्कृति सब कुछ

[01:50:20] सीधे तौर पर जंगल और जमीन से जुड़ा था। जब

[01:50:22] अंग्रेजों ने नए वन कानून बनाकर जंगलों पर

[01:50:25] कब्जा कर लिया और बाहरी साहूकारों और

[01:50:27] जमींदारों को जिन्हें वह दीू कहते थे उनको

[01:50:29] उनकी जमीनों पर बसाना शुरू किया तो यह

[01:50:31] उनके पूरे अस्तित्व पर हमला था। छोटा

[01:50:33] नागपुर यानी आज के झारखंड का इलाका तो

[01:50:36] जैसे इन विद्रोहों का केंद्र ही बन गया

[01:50:38] था। कोल विद्रोह, हो और मुंडा विद्रोह और

[01:50:41] फिर उलगुलान।

[01:50:42] उलगुलान यानी महान हलचल। यह बिरसा मुंडा

[01:50:45] का विद्रोह था। बिरसा मुंडा सिर्फ एक

[01:50:47] विद्रोही नेता नहीं थे। वह अपने लोगों के

[01:50:49] लिए एक पैगंबर थे। धरती आबा यानी जगत

[01:50:52] पिता। उन्होंने ना केवल अंग्रेजों और दीओं

[01:50:55] के शोषण के खिलाफ आवाज उठाई बल्कि आदिवासी

[01:50:58] समाज में सुधार की भी बात की। उन्होंने एक

[01:51:00] नए शोषण मुक्त समाज का सपना देखा था।

[01:51:03] आज भी उनकी याद में 15 नवंबर को जनजातीय

[01:51:06] गौरव दिवस मनाया जाता है। यह उनके प्रभाव

[01:51:08] को दिखाता है। इसी इलाके में संथाल

[01:51:10] विद्रोह भी हुआ था। 1857 से ठीक पहले।

[01:51:12] हां, 1855-56

[01:51:14] का संथाल विद्रोह शायद सबसे जबरदस्त

[01:51:17] जनजातीय विद्रोह में से एक था। सिद्धू,

[01:51:20] कानू, चांद और भैरव इन चार भाइयों के

[01:51:22] नेतृत्व में हजारों संथालों ने अपने इलाके

[01:51:26] को आजाद घोषित कर दिया था। उन्होंने रेलवे

[01:51:28] लाइनों को उखाड़ फेंका, डाक व्यवस्था भंग

[01:51:31] कर दी और अंग्रेजी राज के हर प्रतीक पर

[01:51:33] हमला किया। इसे दबाने के लिए अंग्रेजों को

[01:51:36] सेना बुलानी पड़ी थी।

[01:51:39] लॉर्ड कैनिंग

[01:51:41] जी। लॉर्ड कैनिंग की स्थिति तो बड़ी अजीब

[01:51:44] थी। वो ईस्ट इंडिया कंपनी के आखिरी गवर्नर

[01:51:47] जनरल थे और ब्रिटिश क्राउन के पहले

[01:51:49] वायसरॉय

[01:51:50] जी।

[01:51:51] यह सिर्फ एक टाइटर का बदलाव तो नहीं रहा

[01:51:53] होगा। इसके पीछे की वजह बहुत बड़ी थी है

[01:51:55] ना?

[01:51:55] वजह बहुत बड़ी और बहुत खूनी थी। 1857 की

[01:51:59] क्रांति।

[01:52:00] हम

[01:52:00] कैनिंग की पूरे कार्यकाल पर इसी का साया

[01:52:03] है। इसी क्रांति ने ब्रिटिश हुकूमत को

[01:52:05] एहसास दिलाया कि भाई अब कंपनी के भरोसे

[01:52:08] भारत को नहीं चलाया जा सकता।

[01:52:10] अच्छा। था और नतीजा था 1858 का गवर्नमेंट

[01:52:13] ऑफ इंडिया एक्ट। कंपनी खत्म और भारत सीधे

[01:52:16] ताज के शासन में आ गया।

[01:52:18] क्राउन रूल

[01:52:19] क्राउन रूल और 1 नवंबर 1858 को प्रयागराज

[01:52:23] में महारानी विक्टोरिया का जो घोषणापत्र

[01:52:25] पढ़ा गया वो इसी नए दौर का कह सकते हैं

[01:52:28] बिगुल था।

[01:52:29] पर यहां एक बात मुझे थोड़ी हैरान करती है।

[01:52:31] हम

[01:52:31] एक तरफ इतनी बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल चल

[01:52:34] रही है।

[01:52:34] हां।

[01:52:35] और उसी बीच कुछ सामाजिक सुधार भी हो रहे

[01:52:38] और कैनिंग ने एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया।

[01:52:40] उन्होंने हड़प नीति यानी डॉक्ट्रिन ऑफ

[01:52:42] लैप्स को खत्म कर दिया।

[01:52:44] अच्छा वो डलहौजी वाली नीति।

[01:52:45] वही यह नीति 1857 की क्रांति के बड़े

[01:52:48] कारणों में से एक थी। तो इसे खत्म करके

[01:52:51] राज्यों को गोद लेने का अधिकार वापस दे

[01:52:53] दिया गया। एक तरह से राजाओं को शांत करने

[01:52:56] की कोशिश थी।

[01:52:56] और सिर्फ इतना ही नहीं आधुनिक शिक्षा और

[01:52:59] न्याय व्यवस्था की नींव भी वो भी इसी समय

[01:53:01] रखी जा रही थी।

[01:53:02] सही कहा। 1857 में समावेशन अधिनियम के तहत

[01:53:06] कोलकाता, बॉम्बे और मद्रास में

[01:53:08] विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई।

[01:53:10] बिल्कुल क्रांति के साल में ही

[01:53:12] हां बिल्कुल। और इसके बाद 1861 के

[01:53:15] हाईकोर्ट एक्ट के तहत इन्हीं तीन शहरों

[01:53:17] में हाईकोर्ट भी स्थापित किए गए और सोचिए

[01:53:20] आज भी जो आईपीसी यानी भारतीय दंड संहिता

[01:53:24] हम इस्तेमाल करते हैं वह 1860 में बनी।

[01:53:26] और पहला आयकर अधिनियम भी 1860 में ही आया।

[01:53:29] जी हां। मतलब एक पूरा ढांचा तैयार किया जा

[01:53:32] रहा था।

[01:53:32] कैनिंग के बाद लॉर्ड मेओ का कार्यकाल भले

[01:53:35] ही छोटा था पर उन्होंने शासन को एक एक नई

[01:53:37] दिशा दी। उन्होंने भारत को आंकड़ों के

[01:53:39] चश्मे से देखना शुरू किया। है ना?

[01:53:41] बिल्कुल। यहां जो बात आकर्षक है वो यह है

[01:53:44] कि शासन अब सिर्फ ताकत पर नहीं बल्कि

[01:53:46] जानकारी पर आधारित हो रहा था।

[01:53:48] डाटा पर।

[01:53:49] डाटा पर। मेओ ने 1872 में भारतीय

[01:53:52] सांख्यिकी सर्वेक्षण विभाग की स्थापना की

[01:53:54] और इसी साल भारत में पहली बार जनगणना कराई

[01:53:57] गई। हालांकि वह अनियमित थी।

[01:53:59] हां, अनियमित थी, लेकिन यह एक शुरुआत थी।

[01:54:01] यह साम्राज्य को यह समझने की पहली कोशिश

[01:54:04] थी कि वे कितने बड़े और कितने विविध देश

[01:54:06] पर शासन कर रहे हैं।

[01:54:08] ठीक है। अब इस पर आते हैं लॉर्ड लिटन

[01:54:10] जिन्हें एक दमनकारी वायसराय के तौर पर याद

[01:54:13] किया जाता है।

[01:54:14] हां, इनके कार्यकाल की शुरुआत ही बड़ी

[01:54:16] भव्यता से हुई थी।

[01:54:17] हां, 1 जनवरी 1877 को पहला दिल्ली दरबार

[01:54:21] आयोजित किया गया। हम

[01:54:22] और इसमें शाही उपाधि अधिनियम 1876 के तहत

[01:54:26] महारानी विक्टोरिया को कैसर एह हिंद की

[01:54:28] उपाधि दी गई।

[01:54:29] भारत की साम्राज्य

[01:54:30] बिल्कुल लेकिन इस पूरी भव्यता के पीछे एक

[01:54:33] बहुत कठोर चेहरा छिपा था

[01:54:35] और वो चेहरा उनके कानूनों में साफ दिखता

[01:54:37] है। खासकर 1878 के वर्नाकुलर प्रेस एक्ट

[01:54:41] में।

[01:54:41] हां, उसे तो मुंह बंद करने वाला कानून भी

[01:54:43] कहा गया।

[01:54:44] क्यों?

[01:54:44] क्योंकि यह कानून सीधे तौर पर देसी भाषा

[01:54:47] के अखबारों पर हमला था। इसमें सोम प्रकाश

[01:54:50] और भारत मेहर जैसे पत्रकारों को खासतौर पर

[01:54:53] निशाना बनाया गया।

[01:54:54] सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने इसकी गंभीरता को

[01:54:56] बताते हुए कहा था कि यह आकाश से वज्रपात

[01:54:59] है।

[01:54:59] अच्छा।

[01:55:00] मतलब एक झटके में आवास छीन ली गई।

[01:55:02] इसके अलावा शस्त्र अधिनियम यानी आर्म्स

[01:55:04] एक्ट 1878 भी आया।

[01:55:06] हां। जिसने भारतीयों के लिए हथियार रखने

[01:55:09] के लिए लाइसेंस लेना अनिवार्य कर दिया।

[01:55:11] और सिर्फ यही नहीं उन्होंने भारतीयों के

[01:55:13] लिए सिविल सेवा में जाना और भी मुश्किल कर

[01:55:15] दिया।

[01:55:15] बिल्कुल। उन्होंने परीक्षा की आयु सीमा 21

[01:55:18] साल से घटाकर 19 साल कर दी।

[01:55:20] 19 साल

[01:55:21] जी। उनके समय में रिचर्ड स्ट्रेची की

[01:55:23] अध्यक्षता में एक अकाल आयोग भी बना और

[01:55:26] द्वितीय आंग्ल अफगान युद्ध भी हुआ। मतलब

[01:55:29] एक बहुत ही उथल-पुथल भरा दौर था।

[01:55:32] लिटन के ठीक बाद एक ऐसा वायसराय आया जिसकी

[01:55:34] छवि बिल्कुल उलट थी। लॉर्ड रिपन। हां

[01:55:37] उन्हें भारत का उद्धारक और स्थानीय

[01:55:39] स्वशासन का जनक भी कहा जाता है।

[01:55:42] इसकी वजह

[01:55:42] वजह यह थी कि उन्होंने आते ही लिटन के

[01:55:46] दमनकारी कानूनों को पलटना शुरू कर दिया।

[01:55:48] 1882 में उन्होंने वर्नाकुलर प्रेस एक्ट

[01:55:52] और आर्म्स एक्ट दोनों को खत्म कर दिया।

[01:55:54] तो यहां से बात और भी दिलचस्प हो जाती है।

[01:55:56] उन्होंने मजदूरों के लिए भी काम किया।

[01:55:58] 1881 में पहला कारखाना अधिनियम आया।

[01:56:01] हां। और इस अधिनियम में कुछ महत्वपूर्ण

[01:56:03] प्रावधान थे। जैसे 7 साल से कम उम्र के

[01:56:06] बच्चों के काम करने पर पूरी तरह रोक लगा

[01:56:09] दी गई।

[01:56:09] अच्छा

[01:56:10] और 7 से 12 साल के बच्चों के लिए काम के

[01:56:12] घंटे नौ तक सीमित कर दिए गए। यह भारत में

[01:56:15] श्रम कानूनों की दिशा में एक बड़ा कदम था।

[01:56:17] और जनगणना की जो शुरुआत मे की थी उसे रिपन

[01:56:20] ने एक व्यवस्थित रूप दिया।

[01:56:22] बिल्कुल। 1881 से हर 10 साल पर नियमित

[01:56:25] जनगणना की शुरुआत हुई जो आज तक जारी है।

[01:56:28] हम्

[01:56:28] शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए

[01:56:30] उन्होंने 1882 में हंटर आयोग का गठन किया

[01:56:34] जिसका मुख्य ध्यान प्राथमिक शिक्षा पर था।

[01:56:36] लेकिन उनके कार्यकाल में एक बड़ा विवाद भी

[01:56:38] हुआ। इल्बर्ट बिल विवाद।

[01:56:39] हां। और यह एक बहुत अहम सवाल उठाता है।

[01:56:42] क्या था यह बिल?

[01:56:43] इस बिल में भारतीय जजों को अंग्रेजों के

[01:56:46] मुकदमे सुनने का अधिकार देने का प्रस्ताव

[01:56:48] था।

[01:56:49] अच्छा। और इसका अंग्रेजों ने इतना भारी

[01:56:51] विरोध किया

[01:56:52] कि बिल को बदलना पड़ा।

[01:56:54] तो यह दिखाता है कि सुधार की भी एक सीमा

[01:56:56] थी।

[01:56:56] बिल्कुल नस्लीय श्रेष्ठता की सीमा। फिर भी

[01:56:59] फ्लोरेंस नाइटिंगल ने रिपन को भारत का

[01:57:02] मुक्तिदाता कहा जो उनकी लोकप्रियता को तो

[01:57:05] दिखाता ही है।

[01:57:06] हम

[01:57:06] रिपन के बाद आए लॉर्ड डफिन 1884 से 1888

[01:57:11] तक। उनके समय की सबसे महत्वपूर्ण घटना कौन

[01:57:14] सी थी? बिना किसी शक के 1885 में भारतीय

[01:57:18] राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना

[01:57:19] हम यह भारत के संगठित राष्ट्रवादी आंदोलन

[01:57:22] की शुरुआत थी जिसका भविष्य पर बहुत गहरा

[01:57:25] असर पड़ना था

[01:57:26] और आखिर में लॉर्ड लेंसडाउन 1888 से 1894

[01:57:30] तक उनके समय में मजदूरों के लिए सुधारों

[01:57:32] का सिलसिला जारी रहा

[01:57:33] हां 1891 में दूसरा कारखाना अधिनियम आया

[01:57:36] इसमें सभी मजदूरों के लिए साप्ताहिक अवकाश

[01:57:39] की घोषणा की गई

[01:57:40] अच्छा वीकली ऑफ

[01:57:41] जी और महिलाओं के काम करने के घंटे 11 तक

[01:57:44] सीमित ित किए गए और बच्चों के काम करने की

[01:57:46] न्यूनतम आयु 9 वर्ष कर दी गई। यह रिपन

[01:57:49] द्वारा शुरू किए गए सुधारों को आगे बढ़ाता

[01:57:52] है।

[01:57:53] पुनर्जागरण मतलब फिर से जागना लेकिन यह

[01:57:57] किस तरह की नींद से जागना था? क्या पूरा

[01:57:59] भारतीय समाज सो रहा था?

[01:58:01] ये बहुत अच्छा सवाल है। यहां पर फैसनेटिंग

[01:58:03] बात यह है कि यह जागना किसी शारीरिक नींद

[01:58:05] से नहीं बल्कि सदियों से चली आ रही

[01:58:08] रूढ़ियों और अंधविश्वास की एक गहरी

[01:58:10] आरामदायक नींद से था। हम्।

[01:58:12] एक ऐसी प्रक्रिया बताती है जहां समाज

[01:58:15] आंखें मूंदकर चीजों को स्वीकार करने की

[01:58:16] जगह तर्क यानी लॉजिक को अपनाता है।

[01:58:19] अच्छा।

[01:58:19] और मानवीय मूल्यों को सबसे ऊपर रखता है।

[01:58:22] यह एक वैचारिक क्रांति थी। एक

[01:58:23] इंटेलेक्चुअल अवेकनिंग।

[01:58:25] मतलब यह मानने से इंकार कर देना कि कोई

[01:58:27] बात इसलिए सही है क्योंकि हमारे दादा

[01:58:30] परदादा भी यही मानते थे।

[01:58:31] बिल्कुल।

[01:58:32] इसकी जगह हर बात पर क्यों का सवाल दागना।

[01:58:34] मुझे लगता है क्यों पूछने की हिम्मत करना

[01:58:36] ही अपने आप में एक बहुत बड़ा बदलाव रहा

[01:58:38] होगा। आपने बिल्कुल सही नब्ज़ पकड़ी है।

[01:58:40] यह मानना कि कोई भी परंपरा या नियम सिर्फ

[01:58:42] इसलिए पवित्र नहीं हो सकता क्योंकि वह

[01:58:44] पुराना है।

[01:58:45] हम

[01:58:45] उसे तर्क और इंसानियत की कसौती पर खरा

[01:58:48] उतरना ही होगा। यही इस पूरे आंदोलन का कोर

[01:58:50] आईडिया था।

[01:58:51] तो फिर सवाल यह उठता है कि अचानक सदियों

[01:58:53] बाद यह क्यों पूछने की जरूरत क्यों महसूस

[01:58:56] हुई? ऐसा क्या हो रहा था उस समय देश में?

[01:58:58] किताब हमें चार बड़ी वजहों की तरफ इशारा

[01:59:01] करती है। राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और

[01:59:04] आर्थिक। तो एक-एक करके इन्हें समझते हैं।

[01:59:07] चलिए पहले राजनीतिक माहौल को देखते हैं

[01:59:09] क्योंकि किसी भी बड़े बदलाव की जमीन अक्सर

[01:59:12] सियासत ही तैयार करती है।

[01:59:13] उस दौर में भारत की राजनीतिक तस्वीर पूरी

[01:59:16] तरह बदल रही थी। मुगल सल्तनत का सूरज लगभग

[01:59:19] डूब चुका था और अंग्रेजी राज का उदय हो

[01:59:22] रहा था। मुझे लगता है यह सिर्फ सत्ता का

[01:59:24] बदलना नहीं था। यह दो अलग-अलग सभ्यताओं का

[01:59:27] आमने-सामने आना था

[01:59:28] और इसी आमने-सामने आने में एक दिलचस्प

[01:59:30] मोड़ आता है। अंग्रेजों ने भारत में अपने

[01:59:33] ईसाई धर्म को तो बढ़ावा दिया जो स्वाभाविक

[01:59:35] था लेकिन साथ ही उन्होंने एक बाहरी नजर से

[01:59:38] भारतीय धर्मों और समाज में मौजूद

[01:59:40] कुप्रथाओं पर जोर शोर से सवाल उठाने शुरू

[01:59:42] कर दिए।

[01:59:43] जैसे

[01:59:43] जैसे सती प्रथा, बाल विवाह, मूर्ति पूजा

[01:59:46] इन जैसी चीजों को पिछड़ा और बर्बर कहना

[01:59:49] शुरू किया।

[01:59:49] अच्छा। तो इससे एक तरह का दबाव बना।

[01:59:52] बिल्कुल। इस बाहरी आलोचना से भारतीयों के

[01:59:55] एक पढ़े लिखे वर्ग के अंदर जबरदस्त आत्म

[01:59:58] मंथन शुरू हुआ। उन्हें लगा कि अगर हमारे

[02:00:00] समाज में वाकई इतनी कमियां हैं तो हमें

[02:00:02] खुद इन्हें दूर करना होगा।

[02:00:04] अगर हम यह बदलाव नहीं लाएंगे तो बाहर वाले

[02:00:06] हम पर उंगली उठाते रहेंगे और हमें सुधारने

[02:00:09] का दावा करेंगे। तो एक तरह से बाहरी

[02:00:10] चुनौती ने अंदरूनी सुधार की आग को हवा दे

[02:00:13] दी।

[02:00:14] तो यह राजनीतिक उथल-पुथल तो चल ही रही थी

[02:00:16] लेकिन इसका असर आम लोगों के घरों के अंदर

[02:00:19] उनके समाज में कैसा दिख रहा था? क्योंकि

[02:00:22] बदलाव की असली आग तो वहीं सुलग रही होगी

[02:00:24] और सामाजिक हालात तो सच कहूं तो वाकई बहुत

[02:00:27] ज्यादा चिंताजनक थे। किताब में कुछ ऐसी को

[02:00:29] प्रथाओं का जिक्र है जिनके बारे में सोचकर

[02:00:31] भी आज रूह का काम जाती है।

[02:00:32] जैसे कि

[02:00:33] सबसे पहले तो कन्याव यानी फीमेल

[02:00:35] इनफेंटिसाइड। लड़कियों को जन्म लेते ही

[02:00:37] मार दिया जाता था क्योंकि उन्हें एक बोझ

[02:00:39] समझा जाता था।

[02:00:40] और अगर वह किसी तरह बच भी गई तो उनकी

[02:00:42] जिंदगी चुनौतियों से भरी थी विधवाओं की

[02:00:45] स्थिति तो और भी ज्यादा दयनीय थी ना।

[02:00:47] हां और इस समस्या को कई गुना बढ़ा रही थी

[02:00:50] बहू पत्नी प्रथा। यानी पॉलीगमी।

[02:00:52] पॉलीगमी।

[02:00:52] हां, किताब में बंगाल का एक खास उदाहरण है

[02:00:55] जो इस समस्या की भयावहता को दिखाता है।

[02:00:57] वहां के कुलीन ब्राह्मणों में एक-एक

[02:00:59] व्यक्ति 50-50 यहां तक कि 100-100 शादियां

[02:01:02] करता था।

[02:01:02] 100 शादियां?

[02:01:03] जी हां। अब जरा सोचिए जब यह एक व्यक्ति

[02:01:05] मरता होगा तो वह अपने पीछे कितनी विधवाएं

[02:01:08] छोड़ जाता होगा जिनका जीवन नर्क से कम

[02:01:10] नहीं था। यह तो कल्पना से भी परे है और

[02:01:12] पर्दा प्रथा के बारे में भी एक बहुत बड़ा

[02:01:14] भ्रम टूटता है। हम अक्सर इसे भारतीय

[02:01:16] संस्कृति का एक बहुत पुराना और अहम हिस्सा

[02:01:18] मान लेते हैं। लेकिन प्राचीन भारत में ऐसा

[02:01:21] नहीं था।

[02:01:22] सही कहा। यह प्रथा 12वीं सदी में मुस्लिम

[02:01:24] आक्रमणों के समय महिलाओं की सुरक्षा के

[02:01:26] लिए जरूरत के तौर पर शुरू हुई थी। लेकिन

[02:01:28] धीरे-धीरे जो चीज सुरक्षा के लिए थी, उसे

[02:01:31] सम्मान और इज्जत का प्रतीक मान लिया गया।

[02:01:33] और वह एक सामाजिक कुरीति बन गई।

[02:01:35] मतलब जरूरत खत्म हो गई, लेकिन आदत एक बंधन

[02:01:38] बन गई।

[02:01:38] बिल्कुल। इसके अलावा बाल विवाह, इंसानों

[02:01:41] की बलि देना और दास प्रथा जैसी कुरीतियां

[02:01:43] भी थी। यानी समाज का पूरा ढांचा ही ऐसा बन

[02:01:46] गया था जिसमें ना तो लॉजिक की कोई जगह थी

[02:01:48] और ना इंसानी

[02:01:49] और यह कुरीतियां हवा में तो पैदा नहीं

[02:01:51] होती। इनके पीछे अक्सर गहरी धार्मिक

[02:01:53] मान्यताएं और अंधविश्वास की ताकत होती है।

[02:01:56] बिल्कुल। तो अब बात करते हैं धार्मिक

[02:01:58] कारणों की। कुछ छोटे-मोटे अंधविश्वासों का

[02:02:00] जिक्र है जो शायद आज भी हमें कहीं-कहीं

[02:02:02] सुनने को मिल जाते हैं।

[02:02:03] जैसे

[02:02:03] जैसे रात में झाड़ू ना लगाना या बिल्ली का

[02:02:06] रास्ता काटना। ईमानदारी से कहूं तो आज भी

[02:02:08] मेरी गाड़ी के सामने से बिल्ली गुजर जाए

[02:02:10] तो एक सेकंड के लिए मैं भी सोच में पड़

[02:02:12] जाती हूं। यह दिखाता है कि यह चीजें कितनी

[02:02:14] गहरी बैठी हुई है।

[02:02:16] यह तो बहुत सही उदाहरण है। असली समस्या

[02:02:18] कहीं ज्यादा गहरी थी जिसे पुरोहितवाद यानी

[02:02:20] प्रीस्टक्राफ्ट कहती है।

[02:02:21] प्रीस्टक्राफ्ट

[02:02:22] इसका मतलब था धर्म को इतना जटिल और

[02:02:24] कर्मकांडों से भरा बना दो कि आम इंसान उसे

[02:02:27] समझ ही ना पाए।

[02:02:28] अच्छा।

[02:02:29] ईश्वर और इंसान के बीच पुरोहित एक

[02:02:31] अनिवार्य बिचौलिया बन गया। मतलब ईश्वर तक

[02:02:34] पहुंचने का सीधा रास्ता बंद करके एक टोल

[02:02:37] नाका बना दिया गया जहां से गुजरने के लिए

[02:02:39] पुरोहित की जरूरत पड़ेगी ही पड़ेगी।

[02:02:42] ठीक यही सोचिए एक आम किसान को अपनी बेटी

[02:02:45] की शादी करनी है। पुरोहितवाद का मतलब था

[02:02:47] कि उसे हर कदम पर रिश्ता तय होने से लेकर

[02:02:50] विदाई तक दर्जनों कर्मकांड करने हो।

[02:02:52] और उन सबके लिए उसे पुरोहित पर ही निर्भर

[02:02:54] रहना पड़ता था।

[02:02:55] बिल्कुल धार्मिक समाधान नहीं बल्कि एक

[02:02:58] जटिल भूल भुलैया बना दिया गया था। इस

[02:03:00] व्यवस्था ने लोगों की सीधे सवाल पूछने और

[02:03:02] सोचने, समझने की शक्ति को ही लगभग खत्म कर

[02:03:04] दिया था।

[02:03:05] और अब इस तस्वीर का चौथा और आखिरी कोना

[02:03:08] आर्थिक कारण। क्या गरीबी और अंधविश्वास के

[02:03:11] बीच कोई सीधा कनेक्शन है?

[02:03:12] अगर हम पूरी तस्वीर को जोड़कर देखें तो

[02:03:14] कनेक्शन बिल्कुल साफ है। किताब के मुताबिक

[02:03:17] अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों ने भारत के

[02:03:19] पारंपरिक उद्योग धंधों को तोड़ दिया।

[02:03:21] जबरदस्त आर्थिक शोषण से गरीबी बढ़ी।

[02:03:23] और जाहिर है जो इंसान भूखा है वो बच्चों

[02:03:26] को स्कूल भेजेगा या काम पर?

[02:03:27] शिक्षा का स्तर गिरा। बिल्कुल। तो क्या यह

[02:03:29] कहना सही होगा कि खाली पेट इंसान का दिमाग

[02:03:32] भी खाली हो जाता है और अंधविश्वास उसे

[02:03:35] आसानी से भर देता है।

[02:03:36] बिल्कुल यह एक दुश्चक्र था। गरीबी से

[02:03:39] अशिक्षा आई और अशिक्षा और लाचारी से

[02:03:41] अंधविश्वास मजबूत हुआ। एक अशिक्षित असहाय

[02:03:44] व्यक्ति तर्क करने की जगह भाग्य के सहारे

[02:03:47] जीने लगता है।

[02:03:48] तो राजनीतिक उथल-पुथल, सामाजिक कुरीतियां,

[02:03:51] धार्मिक अंधविश्वास और आर्थिक बदहाली इन

[02:03:54] चारों ने मिलकर एक ऐसी जमीन तैयार की जहां

[02:03:57] एक बड़े सुधार आंदोलन का जन्म होना लगभग

[02:03:59] तय था।

[02:04:00] जब इतने बड़े बदलाव की बात हो रही हो तो

[02:04:02] कोई ना कोई चेहरा तो होगा ही जो इस आंदोलन

[02:04:04] को दिशा दे रहा हो। राजा राममोहन राय को

[02:04:07] इस आंदोलन का सबसे बड़ा सबसे चमकदार चेहरा

[02:04:10] बताती है।

[02:04:11] उन्हें इस पूरे वैचारिक मंथन का केंद्र

[02:04:13] बिंदु कहा जा सकता है। एक ऐसा इंसान जो

[02:04:15] अपने समय से बहुत बहुत आगे था।

[02:04:17] उनका जीवनकाल 1772 से 1833 तक था। उनका

[02:04:21] जन्म तो बंगाल में हुआ लेकिन उनकी मृत्यु

[02:04:23] इंग्लैंड के ब्रिस्टल शहर में हुई।

[02:04:25] यह बात ही दिखाती है कि उनका दायरा और

[02:04:28] उनकी सोच सिर्फ भारत तक सीमित नहीं थी। वो

[02:04:32] एक ग्लोबल नागरिक और उन्हें जो उपाधियां

[02:04:34] दी गई वो उनके कद को बखूबी दर्शाती हैं।

[02:04:37] उन्हें सिर्फ एक समाज सुधारक कहना उनके

[02:04:39] साथ नाइंसाफी होगी।

[02:04:40] अच्छा।

[02:04:41] कई उपाधियों का जिक्र है। उन्हें आधुनिक

[02:04:43] भारत के निर्माता यानी मेकर ऑफ मॉडर्न

[02:04:46] इंडिया कहा गया।

[02:04:46] उन्हें भारतीय पुनर्जागरण के जनक, फादर ऑफ

[02:04:49] इंडियन रेननेसेंस भी कहा गया।

[02:04:51] यही नहीं उन्हें भारतीय राष्ट्रवाद के

[02:04:53] जनक, फादर ऑफ इंडियन नेशनलिज्म और भारतीय

[02:04:56] पत्रकारिता के जनक भी माना जाता है।

[02:04:58] अरे वाह। अब यह बड़ा दिलचस्प है। एक ही

[02:05:00] व्यक्ति पुनर्जागरण का भी जनक है जो काफी

[02:05:02] हद तक पश्चिमी विचारों से प्रेरित था और

[02:05:04] वही व्यक्ति राष्ट्रवाद का भी जनक है जो

[02:05:07] भारत की अपनी पहचान से जुड़ा था।

[02:05:09] यह तो कमाल की बात है।

[02:05:10] इसीलिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने उन्हें

[02:05:12] युगदूत की उपाधि दी थी।

[02:05:13] युगदूत

[02:05:14] यानी एक ऐसा दूत जो भविष्य से आया हो जो

[02:05:17] अपने युग से बहुत आगे की सोचता हो। उन्हें

[02:05:19] नवप्रभात का तारा मॉर्निंग स्टार ऑफ

[02:05:21] इंडिया भी कहा जाता है।

[02:05:22] मतलब वो तारा जो अंधेरी रात के खत्म होने

[02:05:26] और सुबह के आने का संकेत देता है।

[02:05:28] सही यह सारी उपाधियां दिखाती है कि वो

[02:05:30] सिर्फ एक सुधारक नहीं बल्कि एक दूरदर्शी

[02:05:32] थे जिन्होंने भारत के भविष्य की नींव रखी।

[02:05:34] तो क्या उस दौर में हर कोई राजा राममोहन

[02:05:37] राय की तरह सोच रहा था? क्या सबने खुले

[02:05:39] दिल से इन सुधारों का स्वागत किया?

[02:05:41] नहीं।

[02:05:42] बिल्कुल नहीं। और यहीं पर कहानी और भी

[02:05:44] ज्यादा दिलचस्प हो जाती है।

[02:05:46] हां। हां

[02:05:46] उस समय समाज विचारों के आधार पर मुख्य रूप

[02:05:49] से चार खेमों में बंटा हुआ था

[02:05:51] और इन चारों खेमों को समझना बहुत जरूरी है

[02:05:54] ताकि हम उस दौर के वैचारिक संघर्ष की

[02:05:56] जटिलता को समझ सकें। पहला खेमा था

[02:05:58] रूढ़िवादी लोगों का।

[02:05:59] अच्छा

[02:06:00] इनका मानना था जैसा चल रहा है बहुत अच्छा

[02:06:02] चल रहा है। इसे ऐसे ही चलने दो। कोई बदलाव

[02:06:05] नहीं चाहिए। यह स्टटस्को के सबसे बड़े

[02:06:07] समर्थक थे।

[02:06:08] यह वो लोग थे जिन्हें हर बदलाव से अपनी

[02:06:11] संस्कृति और धर्म पर खतरा नजर आता था।

[02:06:13] बिल्कुल। दूसरा खेमा था पुनरुत्थानवादी

[02:06:16] का। इनका नारा था प्राचीन संस्कृति की ओर

[02:06:18] लौटो।

[02:06:19] जैसे दयानंद सरस्वती का नारा था वेदों की

[02:06:21] ओर लौटो।

[02:06:22] सही। यह मानते थे कि हमारी प्राचीन

[02:06:24] संस्कृति जैसे वैदिक काल में कोई कमी थी

[02:06:26] ही नहीं। यह सारी कमियां तो बाद में आई

[02:06:28] हैं। इसलिए हमें पश्चिम से कुछ सीखने की

[02:06:30] जरूरत नहीं बल्कि अपने गौरवशाली अतीत की

[02:06:33] ओर लौटने की जरूरत है।

[02:06:34] और तीसरे खेमे में राजा राममोहन राय जैसे

[02:06:37] लोग थे प्रगतिशील। यह सबसे दिलचस्प समूह

[02:06:40] लगता है।

[02:06:40] हां क्योंकि इनकी सोच बहुत संतुलित और

[02:06:42] व्यवहारिक यह कहते थे कि अपनी संस्कृति की

[02:06:44] अच्छी बातों को रखो। उन पर गर्व करो।

[02:06:47] उन्हें मत छोड़ो। लेकिन साथ ही अगर

[02:06:49] पश्चिमी संस्कृति से कुछ अच्छी बातें मिल

[02:06:51] रही हैं

[02:06:51] जैसे विज्ञान, तर्क, लोकतंत्र।

[02:06:54] हां। और मानवतावाद

[02:06:55] जी।

[02:06:55] तो उन्हें भी अपनाने में कोई हर्ज नहीं

[02:06:57] है। यह पूरब और पश्चिम के सर्वश्रेष्ठ का

[02:06:59] संगम चाहते थे।

[02:07:00] यह एक तरह से खिड़कियां खुली रखने के पक्ष

[02:07:03] में थे ताकि ताजी हवा आ सके। लेकिन यह

[02:07:05] नहीं चाहते थे कि हवा के झोंके में पूरा

[02:07:07] घर ही उड़ जाए।

[02:07:08] बहुत अच्छी उपमा है। और चौथा और आखिरी

[02:07:10] खेमा था अतिवादी लोगों का। जैसे हेनरी

[02:07:12] डिरोज़ियो का यंग बंगाल आंदोलन। यह युवा

[02:07:15] थे, जोशी शीले थे और

[02:07:17] और पुरानी हर चीज से हर परंपरा से नफरत

[02:07:19] करते थे।

[02:07:20] बिल्कुल। वो कहते थे कि यह पूरा सिस्टम ही

[02:07:22] सड़ चुका है।

[02:07:23] मतलब यह सब कुछ जला दो और नए सिरे से शुरू

[02:07:26] करो वाली सोच थी।

[02:07:27] ठीक है। यह पुरानी हर परंपरा हर मान्यता

[02:07:30] को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहते थे और पूरी

[02:07:32] तरह से पश्चिमीकरण के पक्ष में थे।

[02:07:34] तो इसका मतलब यह हुआ कि यह कोई एक सीधी

[02:07:37] साधी लड़ाई नहीं थी। जहां एक तरफ सुधारक

[02:07:41] थे और दूसरी तरफ रूढ़िवादी।

[02:07:42] नहीं।

[02:07:43] यह तो भारत के भविष्य को लेकर चार अलग-अलग

[02:07:46] विचारों का एक टकराव था। हर कोई अपने

[02:07:49] तरीके से भारत का भला चाहता था। लेकिन भले

[02:07:52] का रास्ता क्या हो इस पर जबरदस्त मतभेद

[02:07:54] था। मुझे तो हमेशा लगता था कि एक तरफ

[02:07:57] सुधारक थे और दूसरी तरफ विरोधी। लेकिन यह

[02:07:59] तो कई ज्यादा कॉम्प्लेक्स है। यह तो सुधार

[02:08:02] के अंदर भी एक लड़ाई थी। और यही इस आंदोलन

[02:08:05] की सबसे बड़ी खूबसूरती और जटिलता है। और

[02:08:07] इसी टकराव से कुछ ऐसे लोग सामने आए

[02:08:10] जिन्होंने भारत के भविष्य की दिशा ही बदल

[02:08:12] दी।

[02:08:12] बिल्कुल। तो चलिए शुरू करते हैं उस नाम से

[02:08:15] जिसे आधुनिक भारत का जनक कहा जाता है।

[02:08:18] राजा राममोहन रॉय।

[02:08:19] ये ये बहुत भारीभरकम टाइटल है। फादर ऑफ

[02:08:22] मॉडर्न इंडिया। आखिर उन्होंने ऐसा क्या

[02:08:24] किया कि उन्हें यह उपाधि दी गई?

[02:08:26] देखिए यह उपाधि उन्हें सिर्फ किसी एक काम

[02:08:28] के लिए नहीं मिली बल्कि उनके पूरे जीवन के

[02:08:31] फलसफे के लिए मिली। स्रोत के मुताबिक उनका

[02:08:34] जन्म 1772 में बंगाल में हुआ। 1772

[02:08:38] हां सोचिए यह वो समय था जब समाज पूरी तरह

[02:08:42] से मतलब पुरानी रूढ़ियों में जकड़ा हुआ था

[02:08:45] और ऐसे माहौल में एक व्यक्ति खड़ा होता है

[02:08:48] और कहता है कि हमें हर चीज पर सवाल उठाना

[02:08:51] होगा

[02:08:51] और सवाल उठाने के लिए जानकारी चाहिए मुझे

[02:08:53] जो बात सबसे ज्यादा हैरान करती है वो है

[02:08:55] उनका ज्ञान स्रोत बताते हैं कि वह अरबी

[02:08:58] फारसी हब्रू लैटिन इंग्लिश संस्कृत कुल

[02:09:01] मिला के करीब 12 भाषाएं जानते थे

[02:09:04] असाधारण बात है यह

[02:09:05] आज के दौर में भी यह सोचना मुश्किल है और

[02:09:08] यही उनके विचारों का क्या कहते हैं? एक्स

[02:09:09] फैक्टर था। वो दुनिया को सिर्फ एक चश्मे

[02:09:12] से नहीं देख रहे थे। उन्होंने इस्लाम को

[02:09:14] अरबी में पढ़ा, ईसाई धर्म को हब्रू और

[02:09:16] लैटिन में और हिंदू धर्म को संस्कृत में।

[02:09:18] तो उन्हें एक तुलनात्मक दृष्टि मिली।

[02:09:20] बिल्कुल।

[02:09:20] और उन्होंने सिर्फ बातें नहीं की।

[02:09:22] उन्होंने जमीन पर काम भी किया। स्रोत में

[02:09:24] उनके कामों की एक पूरी लिस्ट है। चलिए साल

[02:09:27] दर साल देखते हैं कि उन्होंने कैसे अपने

[02:09:29] विचारों को एक शक्ल दी।

[02:09:30] तो इसकी शुरुआत होती है 1809 से। उन्होंने

[02:09:33] फारसी में एक किताब लिखी तोहफात अल

[02:09:36] मुवाहदीन

[02:09:36] एकेश्वरवादियों को एक तोहफा

[02:09:39] हां यह उनके विचारों का पहला बड़ा ऐलान

[02:09:41] था। फिर 1815 में उन्होंने आत्मीय सभा

[02:09:44] बनाई। एक तरह का थिंक टैंक था जहां

[02:09:46] कोलकाता के बुद्धिजीवी इन नए विचारों पर

[02:09:48] बहस करते थे।

[02:09:49] फिर 1817 में उन्होंने डेविड हेयर के साथ

[02:09:52] मिलकर कोलकाता में हिंदू कॉलेज की स्थापना

[02:09:55] की।

[02:09:55] यह बहुत महत्वपूर्ण कदम था। बहुत ज्यादा

[02:09:57] क्योंकि वह समझ गए थे कि नई पीढ़ी को

[02:09:59] आधुनिक शिक्षा दिए बिना कोई बड़ा बदलाव

[02:10:02] नहीं आ सकता।

[02:10:03] और फिर उन्होंने मीडिया की ताकत को

[02:10:04] पहचाना। 1821 में संवाद कोमोदी जो बंगाली

[02:10:07] में थी और 1822 में फारसी में मिररात उल

[02:10:10] अखबार।

[02:10:11] वो अपने विचारों को ज्यादा से ज्यादा

[02:10:13] लोगों तक पहुंचाना चाहते थे। और यहीं पर

[02:10:15] एक दिलचस्प बात सामने आती है।

[02:10:17] कि मिररात उल अखबार 1823 के लाइसेंसिंग

[02:10:20] एक्ट के तहत जब्त होने वाला पहला अखबार

[02:10:22] था। यह एक्ट क्या था? यह ब्रिटिश सरकार का

[02:10:25] एक कुख्यात कानून था जिसका मकसद प्रेस की

[02:10:28] आवाज को दबाना था। कोई भी अखबार बिना

[02:10:31] सरकारी लाइसेंस के नहीं छप सकता था और

[02:10:33] सरकार किसी भी लाइसेंस को कभी भी रद्द कर

[02:10:36] सकती थी।

[02:10:36] उनकी संस्था बनाने की यह यात्रा रुकी

[02:10:38] नहीं। 1825 में वेदांत कॉलेज और फिर 20

[02:10:41] अगस्त 1828 को वह ऐतिहासिक दिन आया जब

[02:10:45] उन्होंने ब्रह्म समाज की स्थापना की।

[02:10:46] एक तरह से उन्होंने अपने जीवन भर के काम

[02:10:49] को एक संस्था की शक्ल दे दी। और शायद उनके

[02:10:51] जीवन की सबसे बड़ी जीत 1829 में मिली।

[02:10:54] उन्हीं की जबरदस्त मेहनत और लगातार

[02:10:55] अभियानों का नतीजा था कि गवर्नर जनरल

[02:10:57] लॉर्ड विलियम बेंटिक ने सती प्रथा को

[02:10:59] गैरकानूनी घोषित कर दिया।

[02:11:01] अच्छा एक छोटी सी बात और उन्हें राजा की

[02:11:03] उपाधि कैसे मिली? यह उन्हें जन्म से तो

[02:11:05] नहीं मिली थी।

[02:11:06] नहीं नहीं यह भी एक दिलचस्प कहानी है। उस

[02:11:08] समय के मोहल बादशाह थे अकबर द्वितीय। उनकी

[02:11:11] पेंशन को लेकर अंग्रेजों से कुछ अनबन चल

[02:11:13] रही थी।

[02:11:14] अच्छा।

[02:11:14] तो उन्होंने अपनी बात रखने के लिए राममोहन

[02:11:16] राय को इंग्लैंड भेजा। उनके ज्ञान और

[02:11:18] व्यक्तित्व से बादशाह इतने प्रभावित हुए

[02:11:21] कि उन्होंने उन्हें राजा की उपाधि दी और

[02:11:23] 1833 में इंग्लैंड के ब्रिस्टल शहर में ही

[02:11:26] उनका निधन हो गया।

[02:11:27] तो 1833 में राजा राममोहन राय के निधन के

[02:11:30] बाद ब्रह्म समाज का क्या हुआ? अक्सर ऐसा

[02:11:32] होता है कि एक करिश्माई नेता के जाने के

[02:11:34] बाद उनका आंदोलन बिखर जाता है।

[02:11:36] हां, यह बहुत बड़ा खतरा था। लेकिन ऐसा हुआ

[02:11:39] नहीं। उनकी विरासत को संभालने के लिए आगे

[02:11:41] आए देवेंद्र नाथ ठाकुर।

[02:11:42] गुरुदेव रविंद्रनाथ ठाकुर के पिता।

[02:11:44] जी। उन्होंने आंदोलन को बिखरने नहीं दिया

[02:11:46] बल्कि उसे और व्यवस्थित किया। उन्होंने

[02:11:48] 1839 में तत्वबोधिनी सभा बनाई और

[02:11:51] तत्वबोधिनी पत्रिका शुरू की जो उस समय

[02:11:54] बंगाल की सबसे प्रभावशाली पत्रिकाओं में

[02:11:56] से एक बन गई। उन्होंने आंदोलन को एक तरह

[02:11:58] से स्थिरता दी।

[02:11:59] लेकिन हर स्थिर संगठन में एक ऐसी शक्ति

[02:12:02] आती है जो उसे हिला देती है जो कहती है यह

[02:12:05] काफी नहीं है। हमें और तेजी से आगे बढ़ना

[02:12:08] होगा।

[02:12:08] बिल्कुल। ब्राह्मण समाज में वो शक्ति बनकर

[02:12:10] आए केशव चंद्र सेन।

[02:12:11] बिल्कुल। केशव चंद्र सेन एक बेहद करिश्माई

[02:12:14] और जोशीले व्यक्ति थे। वह 1857 में समाज

[02:12:17] से जुड़े और अपनी योग्यता के दम पर सिर्फ

[02:12:19] 2 साल में ही आचार्य बन गए।

[02:12:21] तो उनके आने से आंदोलन में एक नई जान आ

[02:12:23] गई।

[02:12:23] हां, खासकर युवाओं के बीच वो बहुत

[02:12:25] लोकप्रिय हो गए। लेकिन उनके विचार

[02:12:27] देवेंद्रनाथ ठाकुर से कहीं ज्यादा उग्र

[02:12:30] थे।

[02:12:31] अच्छा। तो यह एक तरह से पुरानी पीढ़ी और

[02:12:33] नई पीढ़ी का टकराव था। एक तरफ स्थिरता और

[02:12:36] परंपरा दूसरी तरफ क्रांतिकारी तेजी। हां,

[02:12:39] आप ऐसा कह सकते हैं केशव चंद्र सेन पर

[02:12:41] ईसाई धर्म का भी काफी प्रभाव था। वह जाति

[02:12:43] प्रथा को पूरी तरह खत्म करने और अंतरजातीय

[02:12:46] विवाह को तुरंत बढ़ावा देने जैसे मुद्दों

[02:12:48] पर बहुत मुखर थे।

[02:12:49] जबकि देवेंद्रनाथ ठाकुर सुधार तो चाहते थे

[02:12:52] लेकिन वो धीरे-धीरे और हिंदू धर्म के

[02:12:54] दायरे में रहकर आगे बढ़ना चाहते थे। तो यह

[02:12:57] वैचारिक मतभेद इतना बढ़ गया कि 1866 में

[02:13:01] ब्रह्म समाज में पहला विभाजन हो गया।

[02:13:03] तो समाज दो हिस्सों में बट गया। हां,

[02:13:05] देवेंद्रनाथ ठाकुर के नेतृत्व वाला पुराना

[02:13:08] रूढ़िवादी धड़ा आदि ब्रह्म समाज कहलाया और

[02:13:11] केशव चंद्र सेन के नेतृत्व वाला नया

[02:13:14] प्रगतिशील धड़ा भारतीय ब्रह्म समाज के नाम

[02:13:17] से जाना गया।

[02:13:18] लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं हुई। श्रोत

[02:13:19] बताते हैं कि एक दूसरा विभाजन भी हुआ और

[02:13:22] इसकी वजह तो बहुत ही नाटकी और मतलब

[02:13:24] विडंबनापूर्ण थी।

[02:13:25] यह इस कहानी का सबसे चौंकाने वाला मोड़

[02:13:28] है। केशव चंद्र सेन ने समाज सुधार के लिए

[02:13:30] बहुत काम किया था। उन्होंने सरकार पर दबाव

[02:13:33] डालकर 1872 में नेटिव मैरिज एक्ट पास

[02:13:37] करवाया।

[02:13:37] यह एक क्रांतिकारी कानून था जिसमें

[02:13:39] लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 14 साल

[02:13:42] और लड़कों की 18 साल तय की गई थी।

[02:13:44] सही। इसे ब्रह्म मैरिज एक्ट भी कहा जाता

[02:13:46] था।

[02:13:47] 1 मिनट रुकिए। मतलब जिस इंसान ने लड़कियों

[02:13:49] की शादी की न्यूनतम उम्र 14 साल तय करवाने

[02:13:52] के लिए कानून बनवाया,

[02:13:53] उसी ने कुछ साल बाद 1878 में अपनी 13 साल

[02:13:57] की बेटी की शादी कूच विहार के राजा से कर

[02:14:00] दी। क्या यह तो यह तो आज के जमाने में भी

[02:14:02] एक बहुत बड़ा स्कैंडल होता। जिस सिद्धांत

[02:14:05] के लिए वो लड़ रहे थे उसी को खुद तोड़

[02:14:07] दिया।

[02:14:07] बिल्कुल।

[02:14:08] उनके अपने लोग क्या सोच रहे थे?

[02:14:09] उनके अनुयाई जैसे आनंद मोहन बोस और शिवनाथ

[02:14:12] शास्त्री इस बात से सन रह गए। उनके लिए यह

[02:14:15] सिद्धांतों के साथ एक बहुत बड़ा धोखा था।

[02:14:17] उन्होंने केशव चंद्र सेन का साथ छोड़ दिया

[02:14:20] और एक नए संगठन की नींव रखी। साधारण

[02:14:22] ब्रह्म समाज। केशव चंद्र सेन के शुरुआती

[02:14:25] जोश और उनके दौरों की वजह से ब्रह्म समाज

[02:14:28] का विचार बंगाल की सीमाओं को लांगकर पूरे

[02:14:30] भारत में फैल चुका था।

[02:14:31] मतलब अब ये किसी एक संस्था की जागीर नहीं

[02:14:35] रहा था।

[02:14:35] नहीं जैसे श्रोत में वेद समाज का जिक्र

[02:14:38] है।

[02:14:38] हां 1864 में मद्रास में।

[02:14:40] सही। श्री धरालू नायडू ने इसकी स्थापना

[02:14:42] की। यह ब्रह्म समाज के विचारों से ही

[02:14:44] प्रेरित था और इसे दक्षिण भारत का ब्रह्म

[02:14:47] समाज भी कहा जाता था। यानी सुधार की ये

[02:14:49] लहर दक्षिण तक पहुंच गई थी। और पश्चिम

[02:14:51] भारत में महाराष्ट्र में हमें एक ऐसी

[02:14:53] शख्सियत मिलती है जो इस आंदोलन को एक नए

[02:14:56] स्तर पर ले गई। महादेव गोविंद रानाडे

[02:14:59] इन्हें महाराष्ट्र का सुकरात क्यों कहा

[02:15:01] जाता था?

[02:15:02] क्योंकि वह सिर्फ उपदेश नहीं देते थे। वह

[02:15:04] संस्थाएं बनाते थे। उनका मानना था कि समाज

[02:15:06] को बदलने के लिए सिर्फ विचार काफी नहीं

[02:15:08] है। जमीन पर काम करने वाली संस्थाएं

[02:15:10] चाहिए। उनका फलसफा था विचार को संस्था में

[02:15:13] बदलो। और उन्होंने महाराष्ट्र में इसी

[02:15:15] विचार पर आधारित प्रार्थना समाज को मजबूत

[02:15:18] किया जिसकी स्थापना 1867 में आत्माराम

[02:15:22] पांडुरंग ने की थी।

[02:15:23] बिल्कुल प्रार्थना समाज के लक्ष्य तो

[02:15:25] ब्रह्म समाज जैसे ही थे। जाति प्रथा का

[02:15:27] विरोध, महिला शिक्षा, विधवा विवाह, एक

[02:15:29] ईश्वरवाद। लेकिन बंगाल और महाराष्ट्र के

[02:15:32] समाज का मिजाज काफी अलग था। प्रार्थना

[02:15:34] समाज ज्यादा व्यवहारिक था।

[02:15:35] मतलब

[02:15:35] वे जानते थे कि महाराष्ट्र में बंगाल जैसी

[02:15:38] सीधी टक्कर काम नहीं करेगी। इसलिए

[02:15:40] उन्होंने टकराव की जगह धीरे-धीरे समाज के

[02:15:42] भीतर रहकर सुधार करने पर जोर दिया

[02:15:44] और रानाडे इस काम के आर्किटेक्ट थे।

[02:15:46] स्रोत में उनकी बनाई संस्थाओं की एक लिस्ट

[02:15:48] है जो दिखाती है कि उनकी सोच कितनी व्यापक

[02:15:51] थी।

[02:15:51] हां, 1861 में विधवा पुनर्विवाह संघ की

[02:15:54] स्थापना उस समय यह कितना बड़ा क्रांतिकारी

[02:15:57] कदम रहा होगा।

[02:15:58] फिर 1870 में पुणा सार्वजनिक सभा यह सिर्फ

[02:16:00] एक सामाजिक संस्था नहीं थी। यह एक

[02:16:02] राजनीतिक मंच भी थी, जो जनता की शिकायतों

[02:16:04] को सरकार तक पहुंचाती थी और फिर 1884 में

[02:16:07] पुणे में दक्कन एजुकेशन सोसाइटी

[02:16:10] जिसमें उनके साथ बाल गंगाधर तिलक और जीजी

[02:16:13] आगरकर जैसे दिग्गज भी शामिल थे। इस संस्था

[02:16:16] ने तो महाराष्ट्र में शिक्षा की क्रांति

[02:16:19] ही ला दी।

[02:16:19] तो वो सामाजिक, राजनैतिक और शैक्षिक तीनों

[02:16:23] मोर्चों पर एक साथ काम कर रहे थे। वो

[02:16:25] समझते थे कि ये तीनों चीजें एक दूसरे से

[02:16:27] जुड़ी हुई हैं।

[02:16:28] इसीलिए गोपाल कृष्ण गोखले जो बाद में

[02:16:31] महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु बने, वह

[02:16:33] रानाडे को अपना गुरु मानते थे।

[02:16:35] यही उनकी महानता थी। वह सुधार आंदोलन के

[02:16:37] एक प्रैक्टिकल आर्किटेक्ट उन्होंने राइज

[02:16:39] ऑफ मराठा पावर जैसी किताब भी लिखी जो

[02:16:41] दिखाती है कि उनकी इतिहास पर भी कितनी

[02:16:43] गहरी पकड़ थी। चलिए

[02:16:45] शुरुआत करते हैं हेनरी विवियन डेरीजियो

[02:16:47] से। उनका जीवनकाल 1809 से 1831 मतलब सिर्फ

[02:16:53] 22 साल?

[02:16:54] हां। यह वाकई चौंकाने वाला है।

[02:16:56] और इससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह

[02:16:58] है कि 1826 में सिर्फ 17 साल की उम्र में

[02:17:02] वो कोलकाता के प्रतिष्ठित हिंदू कॉलेज में

[02:17:04] प्रोफेसर बन गए थे। ये कैसे मुमकिन हुआ?

[02:17:07] ये वाकई अविश्वसनीय लगता है। है ना?

[02:17:09] बिल्कुल।

[02:17:09] और देखिए इसके पीछे एक दो बड़ी वजह थी। एक

[02:17:12] तो डेरिजियो खुद एक बहुत ही अनोखे

[02:17:14] बैकग्राउंड से थे।

[02:17:15] अच्छा।

[02:17:16] जी वो एक इंडो पोर्चुगीज़ परिवार से थे।

[02:17:18] तो जाहिर है उनकी सोच पर पश्चिमी विचारों

[02:17:20] का गहरा असर था। हां, यह तो है।

[02:17:22] और दूसरा यह कि उस दौर में हिंदू कॉलेज भी

[02:17:25] एक कह सकते हैं कि नए विचारों के लिए काफी

[02:17:27] खुला हुआ था।

[02:17:28] माहौल था मतलब

[02:17:29] बिल्कुल माहौल था। और सबसे बड़ी बात तो

[02:17:31] खुद डेरिजियो की अपनी प्रतिभा थी। वो

[02:17:33] सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं देते थे।

[02:17:34] हम

[02:17:34] उनका पढ़ाने का तरीका ही अलग था। उन्होंने

[02:17:36] एकेडमिक एसोसिएशन जैसे डिबेटिंग क्लब बनाए

[02:17:39] जो असल में विचारों की प्रयोगशाला थे।

[02:17:41] डिबेटिंग क्लब?

[02:17:42] जी। वो छात्रों से कहते थे किसी भी बात को

[02:17:44] इसलिए मत मानो क्योंकि वह पुरानी है या

[02:17:46] किसी किताब में लिखी है। उस पर सवाल करो,

[02:17:48] तर्क करो, बहस करो। मतलब वो एक तरह से

[02:17:51] अपने स्टूडेंट्स के दिमाग में एक बौद्धिक

[02:17:52] विद्रोह की चिंगारी लगा रहे थे। सिर्फ एक

[02:17:55] युवा जोश था या इसके पीछे कोई गहरी सोच

[02:17:58] थी?

[02:17:58] ये सिर्फ जोश नहीं था। ये ये पूरी फिलॉसफी

[02:18:01] थी।

[02:18:01] हम्म।

[02:18:02] वो फ्रांस की क्रांति के तीन सिद्धांतों

[02:18:04] समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व से बहुत

[02:18:07] प्रभावित थे।

[02:18:07] अच्छा।

[02:18:08] उनका मानना था कि भारतीय समाज में जो

[02:18:10] जड़ता है, जो रूढ़िवाद है, उसे तोड़ने का

[02:18:12] एक ही तरीका है स्वतंत्र सोच।

[02:18:14] हम

[02:18:14] उनका मूल मंत्र था नॉलेज इज विज़डम। यानी

[02:18:18] ज्ञान ही बुद्धिमत्ता है।

[02:18:19] कुछ लोग व्यवस्था के भीतर रहकर उसी के

[02:18:22] नियमों का इस्तेमाल करके उसे बदलने की

[02:18:24] कोशिश करते हैं और इसका सबसे बड़ा उदाहरण

[02:18:26] शायद ईश्वर चंद्र विद्यासागर है।

[02:18:29] हां।

[02:18:29] हमारे नोट्स में उन्हें पारंपरिक

[02:18:31] आधुनिकतावादी कहा गया है। यह सुनने में ही

[02:18:34] एक विरोधाभास लगता है।

[02:18:35] और यही विरोधाभास उनकी सबसे बड़ी ताकत थी।

[02:18:38] वो एक पुल की तरह थे।

[02:18:39] पुल?

[02:18:39] सोचिए एक व्यक्ति जिसका एक पैर परंपरा में

[02:18:42] मजबूती से जमा हो। वह धोती पहनते थे।

[02:18:44] संस्कृत के प्रकांड पंडित थे। जिन्हें

[02:18:46] विद्यासागर यानी ज्ञान का सागर कहा जाता

[02:18:48] था।

[02:18:49] लेकिन उनका दूसरा पैर आधुनिकता में था। वो

[02:18:52] महिलाओं की शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और

[02:18:54] वैज्ञानिक सोच की बात कर रहे थे।

[02:18:56] अच्छा तो वो समाज को यह संदेश दे रहे थे

[02:18:58] कि आप अपनी जड़ों को बिना खोए भी आगे बढ़

[02:19:01] सकते हैं।

[02:19:01] बिल्कुल। जैसे जब संस्कृत शिक्षा पर

[02:19:03] ब्राह्मणों के एकाधिकार का सवाल आया तो

[02:19:05] उन्होंने कहा कि यह ज्ञान किसी एक जाति की

[02:19:07] जागीर क्यों हो?

[02:19:08] और उन्होंने क्या किया?

[02:19:09] उन्होंने गैर ब्राह्मणों के लिए भी

[02:19:11] संस्कृत कॉलेज के दरवाजे खोल दिए। और उनका

[02:19:13] सबसे बड़ा और सबसे विवादास्पद काम तो

[02:19:16] विधवा पुनर्विवाह के क्षेत्र में था।

[02:19:18] हां वो तो था ही।

[02:19:19] विद्यासागर ने शिक्षा पर इतना काम किया

[02:19:22] लेकिन जिस चीज के लिए उन्हें सबसे ज्यादा

[02:19:24] याद किया जाता है और शायद सबसे ज्यादा

[02:19:27] विरोध भी झेलना पड़ा वो था विधवा

[02:19:29] पुनर्विवाह। यह उस समय इतना बड़ा टैबू

[02:19:32] क्यों था?

[02:19:33] उस समय विधवाओं का जीवन खासकर बाल विधवाओं

[02:19:36] का नर्क से कम नहीं था।

[02:19:38] समाज उन्हें अभागा मानता था और हर तरह के

[02:19:40] अधिकारों से वंचित कर देता था। हम

[02:19:42] विद्यासागर का जीनियस इस बात में था कि

[02:19:44] उन्होंने इस परंपरा को तोड़ने के लिए

[02:19:46] परंपरा का ही सहारा लिया।

[02:19:48] वो कैसे?

[02:19:48] उन्होंने कहा आप लोग शास्त्रों की दुहाई

[02:19:50] देते हैं। चलिए हम शास्त्र ही देखते हैं।

[02:19:53] उन्होंने उन्हीं प्राचीन ग्रंथों से ऐसे

[02:19:55] श्लोक और तर्क खोज निकाले जिन्हें

[02:19:57] रूढ़िवादी पंडित या तो नजरअंदाज कर रहे थे

[02:19:59] या उनकी गलत व्याख्या कर रहे थे।

[02:20:01] उन्होंने साबित किया कि विधवा पुनर्विवाह

[02:20:04] शास्त्र सम्मत है।

[02:20:05] यह तो एक मास्टर स्ट्रोक था। मतलब

[02:20:07] उन्होंने विरोधियों को उनके ही मैदान पर

[02:20:10] मात दे दी। बिल्कुल लेकिन जाहिर है यह

[02:20:12] आसान नहीं रहा होगा।

[02:20:13] नहीं बिल्कुल नहीं।

[02:20:15] उन पर जानलेवा हमले हुए। उन्हें समाज से

[02:20:17] बाहर करने की धमकियां मिली। लेकिन वो डटे

[02:20:19] रहे। उन्होंने हजारों लोगों के दस्तखत के

[02:20:22] साथ सरकार को याचिका भेजी और आखिरकार

[02:20:24] आखिरकार 1856 में विधवा पुनर्विवाह

[02:20:28] अधिनियम पास हुआ।

[02:20:29] जी। उनके अथक प्रयासों से और सबसे बड़ी

[02:20:31] बात वह सिर्फ कानून बनवाकर नहीं रुके।

[02:20:34] हम्म।

[02:20:34] जब कोई आगे नहीं आ रहा था, तो उन्होंने एक

[02:20:36] मिसाल कायम की और अपने इकलौते बेटे नारायण

[02:20:39] चंद्र का विवाह एक विधवा से करवाया।

[02:20:41] कमाल है यह कहने की हिम्मत करना कि मैं जो

[02:20:44] कहता हूं वो करता भी हूं। यह विद्यासागर

[02:20:47] का असली चरित्र था।

[02:20:49] सही बात है।

[02:20:49] और शिक्षा के क्षेत्र में तो उनका योगदान

[02:20:52] जबरदस्त था ही। हमारे नोट्स के मुताबिक

[02:20:54] उन्होंने 35 से ज्यादा गर्ल्स स्कूल

[02:20:57] स्थापित किए।

[02:20:57] जी 35 से 20 ज्यादा। उनका एक बहुत मशहूर

[02:21:00] कथन है कि मेरे पास भगवान के बारे में

[02:21:02] सोचने का समय नहीं है क्योंकि इस धरती पर

[02:21:05] बहुत काम करना है। यह उनके बारे में क्या

[02:21:07] बताता है?

[02:21:08] हम यह दिखाता है कि वह कितने व्यावहारिक

[02:21:10] और कर्म केंद्रित व्यक्ति थे। उनके लिए

[02:21:12] मानवता की सेवा ही सबसे बड़ी पूजा थी।

[02:21:15] वो किसी अमूर्त ईश्वर की बजाय जीते जागते

[02:21:18] इंसानों की तकलीफों को दूर करने में

[02:21:19] विश्वास रखते थे। और उनके काम का असर

[02:21:21] देखिए।

[02:21:22] उन्हीं के बनाए माहौल में चंद्रमुखी बसु

[02:21:24] 1884 में भारत की पहली महिला ग्रेजुएट

[02:21:27] बनी। और कादंबिनी गांगुली 1886 में पहली

[02:21:30] महिला डॉक्टर।

[02:21:31] बिल्कुल। यह वह फल थे जिनके बीज

[02:21:33] विद्यासागर जैसे लोगों ने लगाए थे।

[02:21:35] विद्यासागर ने विधवा पुनर्विवाह के लिए

[02:21:37] कानूनी लड़ाई जीती। लेकिन हम जानते हैं कि

[02:21:40] सिर्फ कानून बदलने से समाज नहीं बदलता।

[02:21:42] नहीं बदलता।

[02:21:43] उस कानून को जमीन पर उतारने के लिए उन

[02:21:45] विधवाओं को सहारा देने के लिए एक पूरे

[02:21:48] ढांचे की जरूरत थी। और शायद यहीं पर हमारे

[02:21:50] अगले सुधारक महर्षि धोंडो केशव करवे की

[02:21:53] भूमिका शुरू होती है।

[02:21:54] आपने बिल्कुल सही कनेक्शन जोड़ा। करवे ने

[02:21:56] वहीं से काम शुरू किया जहां विद्यासागर ने

[02:21:59] छोड़ा था।

[02:21:59] हम्म।

[02:22:00] करवे का जीवन ही अपने आप में एक मिसाल है।

[02:22:02] वह 104 साल जिए। 1858 से 1962 तक।

[02:22:06] 104 साल

[02:22:07] जी। और 1958 में उनके 100वीं जन्मदिन पर

[02:22:10] उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

[02:22:12] वाह!

[02:22:12] उनका पूरा जीवन महिला उत्थान के लिए एक

[02:22:14] मिशन था। उन्होंने महसूस किया कि कानून तो

[02:22:16] बन गया लेकिन विधवाओं को समाज स्वीकार

[02:22:19] नहीं कर रहा। उन्हें रहने की जगह, शिक्षा

[02:22:21] और सम्मान चाहिए। और इसी जरूरत को पूरा

[02:22:24] करने के लिए उन्होंने एक के बाद एक

[02:22:25] संस्थाएं बनाई।

[02:22:26] जी 1893 में उन्होंने विधवा पुनर्विवाह

[02:22:30] प्रचारक मंडल बनाया। फिर 1896 में पुणे

[02:22:32] में हिंदू विधवा गृह की स्थापना की।

[02:22:35] हिंदू विधवा गृह

[02:22:36] हां यह सिर्फ एक आश्रम नहीं था। यह एक

[02:22:38] स्कूल था। एक ट्रेनिंग सेंटर था जहां

[02:22:40] विधवाओं को पढ़ना लिखना और नर्स या टीचर

[02:22:42] बनने का प्रशिक्षण दिया जाता था।

[02:22:44] ताकि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके।

[02:22:46] बिल्कुल। और करवे भी सिर्फ उपदेश नहीं

[02:22:48] देते थे। अपनी पहली पत्नी के निधन के बाद

[02:22:50] उन्होंने खुद एक विधवा से विवाह किया जो

[02:22:52] उनके ही विधवा ग्रह की पहली छात्रा थी।

[02:22:55] उन्होंने भी समाज के सामने एक और मिसाल

[02:22:57] पेश की।

[02:22:58] सही।

[02:22:59] लेकिन उनका सबसे बड़ा सपना तो 1916 में

[02:23:02] साकार हुआ। भारत का पहला महिला

[02:23:04] विश्वविद्यालय।

[02:23:05] हां, एसएडीटी यूनिवर्सिटी।

[02:23:06] आज हम इसे एसएनडीटी यूनिवर्सिटी के नाम से

[02:23:09] जानते हैं। यह विचार ही अपने समय से कितना

[02:23:11] आगे था।

[02:23:11] बहुत आगे। उस दौर में जब लड़कियों के लिए

[02:23:14] स्कूल जाना ही एक जंग थी। करवे ने महिलाओं

[02:23:16] के लिए पूरे विश्वविद्यालय की कल्पना की।

[02:23:18] उन्हें यह प्रेरणा कहां से मिली थी?

[02:23:20] उन्हें यह प्रेरणा जापान के एक महिला

[02:23:22] विश्वविद्यालय से मिली थी और उन्होंने

[02:23:24] इसकी शुरुआत सिर्फ पांच छात्राओं के साथ

[02:23:26] की।

[02:23:26] सिर्फ पांच

[02:23:27] जी। यह उनकी दूरदृष्टि और हिम्मत को

[02:23:29] दिखाता है। वह जानते थे कि असली सशक्तिकरण

[02:23:31] उच्च शिक्षा से ही आएगा। उनका एक विचार

[02:23:33] बहुत प्रसिद्ध है। यदि एक पुरुष शिक्षित

[02:23:36] होता है तो एक व्यक्ति शिक्षित होता है।

[02:23:38] लेकिन यदि एक महिला शिक्षित होती है तो

[02:23:40] पूरा परिवार शिक्षित होता है।

[02:23:42] चलिए इसे थोड़ा खोलते हैं। इसका गहरा

[02:23:44] सामाजिक मतलब क्या था?

[02:23:46] इसका मतलब था कि करवे महिलाओं को सामाजिक

[02:23:48] परिवर्तन की सबसे बड़ी एजेंट के रूप में

[02:23:50] देखते थे।

[02:23:51] अच्छा।

[02:23:51] उनका मानना था कि एक पढ़ी लिखी मां यह

[02:23:54] सुनिश्चित करेगी कि उसके बच्चे, लड़के और

[02:23:57] लड़कियां दोनों स्कूल जाएं। वह घर में

[02:23:59] तर्क और आधुनिक विचारों का माहौल बनाएगी।

[02:24:01] और परिवार के स्वास्थ्य और स्वच्छता का भी

[02:24:04] ध्यान रखेगी।

[02:24:05] बिल्कुल। यानी एक महिला को शिक्षित करना

[02:24:07] सिर्फ एक व्यक्ति को डिग्री देना नहीं है

[02:24:10] बल्कि यह समाज की अगली पीढ़ी में निवेश

[02:24:12] करना है।

[02:24:13] यह एक ऐसा विचार है जो आज भी उतना ही

[02:24:15] प्रासंगिक है।

[02:24:16] बिल्कुल है।

[02:24:17] तो अब तक हमने जिन सुधारकों की बात की वे

[02:24:19] मुख्य रूप से लैंगिक भेदभाव और शैक्षिक

[02:24:22] पिछड़ेपन पर काम कर रहे थे।

[02:24:24] जी।

[02:24:25] लेकिन भारत के समाज की एक और बहुत कड़वी

[02:24:27] सच्चाई थी और है जाति प्रथा।

[02:24:30] हम्म बिल्कुल। और यह हमें हमारे चौथे और

[02:24:32] शायद सबसे क्रांतिकारी सुधारक ज्योतिबा

[02:24:35] फुले तक ले आती है। नोट्स में बताया गया

[02:24:38] है कि गांधी जी ने उन्हें सच्चा महात्मा

[02:24:40] कहा था

[02:24:41] और यह उपाधि बिल्कुल सही थी। फुले का काम

[02:24:43] किसी एक मुद्दे पर केंद्रित नहीं था। वो

[02:24:45] पूरे सामाजिक ढांचे पर ही सवाल उठा रहे

[02:24:47] थे।

[02:24:48] अच्छा।

[02:24:48] उनका मानना था कि भारत की असली गुलामी,

[02:24:51] जाति प्रथा और ब्राह्मणवादी वर्चस्व है।

[02:24:53] इसी सोच के साथ उन्होंने 1873 में

[02:24:56] सत्यशोधक समाज की स्थापना की। सत्य शोधक

[02:24:59] समाज

[02:25:00] जी इसका मकसद था समाज को अंधविश्वास,

[02:25:02] मूर्ति पूजा और पुरोहितों के चंगुल से

[02:25:05] आजाद कराना।

[02:25:05] हम्।

[02:25:06] अगर आप देखें तो उस समय के दूसरे सुधार

[02:25:08] आंदोलन जैसे ब्रह्म समाज ज्यादातर उच्च

[02:25:10] जातियों तक सीमित थे। लेकिन सत्यशोधक समाज

[02:25:13] सीधे तौर पर दलितों और पिछड़ी जातियों का

[02:25:16] आंदोलन था।

[02:25:16] मतलब यह एक जमीनी क्रांति थी।

[02:25:18] बिल्कुल।

[02:25:19] उन्होंने और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले

[02:25:21] ने 1848 में पुले में लड़कियों के लिए

[02:25:25] भारत का पहला स्कूल खोला। जी फुले शिक्षा

[02:25:27] मंदिर

[02:25:28] हम इस तथ्य को अक्सर सुनते हैं लेकिन क्या

[02:25:30] आप उस दौर का एक मंजर खींच सकते हैं?

[02:25:33] उन्हें किन मुश्किलों का सामना करना पड़ा

[02:25:35] होगा?

[02:25:35] उनकी मुश्किलें कल्पना से भी परे। जब

[02:25:37] सावित्रीबाई पढ़ाने के लिए घर से निकलती

[02:25:39] थी तो रूढ़िवादी लोग उन पर पत्थर, कीचड़

[02:25:42] और गोबर फेंकते थे।

[02:25:43] हे भगवान।

[02:25:44] हां। क्योंकि एक महिला का पढ़ाना और वह भी

[02:25:46] दलित और पिछड़ी जातियों की लड़कियों को

[02:25:48] उनके लिए धर्म का अपमान था।

[02:25:50] तो वह क्या करती थी? सावित्रीबाई अपने साथ

[02:25:52] एक दूसरी साड़ी लेकर चलती थी ताकि स्कूल

[02:25:55] पहुंचकर गंदी साड़ी बदल सके।

[02:25:56] अविश्वसनीय

[02:25:57] फूले को उनके पिता ने घर से निकाल दिया था

[02:26:00] क्योंकि वह धर्म विरुद्ध काम कर रहे थे।

[02:26:01] उन्होंने जो किया वो सिर्फ समाज सुधार

[02:26:03] नहीं था। वो अपने समय के समाज से सीधी जंग

[02:26:06] थी।

[02:26:06] हम उनकी एक किताब है गुलामगिरी जो 1873

[02:26:10] में प्रकाशित हुई।

[02:26:12] इसका मतलब है गुलामी।

[02:26:13] लेकिन जो बात मुझे सबसे ज्यादा दिलचस्प

[02:26:16] लगी वो है इस किताब का समर्पण। उन्होंने

[02:26:18] इसे अमेरिका के उन लोगों को समर्पित किया

[02:26:21] जिन्होंने वहां दास प्रथा के खिलाफ लड़ाई

[02:26:23] लड़ी थी।

[02:26:24] यह क्या कनेक्शन था?

[02:26:25] यह कनेक्शन फुले के विचारों की विशालता को

[02:26:28] दिखाता है। वो सिर्फ भारत के समाज को नहीं

[02:26:30] देख रहे थे।

[02:26:31] उन्होंने भारत में जाति प्रथा और अमेरिका

[02:26:34] में अश्वेतों की दास प्रथा के बीच एक सीधी

[02:26:36] रेखा खींची।

[02:26:37] मतलब वो इन दोनों को एक ही नजर से देखते

[02:26:39] क्योंकि आपको बता रहे थे कि यह दोनों एक

[02:26:41] ही चीज है। एक इंसान द्वारा दूसरे इंसान

[02:26:43] का शोषण।

[02:26:44] इस समर्पण के जरिए उन्होंने भारत के

[02:26:46] जातिगत भेदभाव के मुद्दे को मानवाधिकारों

[02:26:49] के वैश्विक संघर्ष से जोड़ दिया। वो कह

[02:26:51] रहे थे कि अन्याय कहीं भी हो किसी भी रूप

[02:26:53] में हो वो अन्याय ही है।

[02:26:54] यह दिखाता है कि उनकी सोच कितनी आधुनिक और

[02:26:57] वैश्विक थी।

[02:26:58] बहुत ज्यादा। तो इन सभी सुधारकों के कामों

[02:27:01] को एक साथ देखने पर एक बात साफ उभर कर आती

[02:27:04] है। इन सभी ने शिक्षा को सामाजिक बदलाव का

[02:27:07] सबसे शक्तिशाली माध्यम माना। खासकर

[02:27:09] महिलाओं और वंचित वर्गों के लिए।

[02:27:12] लेकिन हर किसी का तरीका अलग था।

[02:27:14] हां वो तो था।

[02:27:14] गोपाल कृष्ण गोखले और उनकी द सर्वेंट्स ऑफ

[02:27:18] इंडिया सोसाइटी। कि इसकी स्थापना 1905 में

[02:27:21] पुणे में हुई थी। लेकिन यह सिर्फ एक और

[02:27:23] समाजसेवी संस्था तो नहीं थी?

[02:27:25] बिल्कुल नहीं। यह एक बहुत ही अनोखा प्रयोग

[02:27:28] था। द सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी का

[02:27:30] मकसद सिर्फ दान या राहत कार्य करना नहीं

[02:27:32] था। इसका असली उद्देश्य था ऐसे राष्ट्रीय

[02:27:35] मिशनरी तैयार करना जो देश की सेवा के लिए

[02:27:38] अपना पूरा जीवन समर्पित कर दें।

[02:27:40] अच्छा?

[02:27:41] हां, जो सदस्य बनते थे उन्हें गरीबी का

[02:27:43] व्रत लेना होता था और अपने परिवार के लिए

[02:27:45] बस बस ₹50 महीने के मामूली भत्ते पर

[02:27:48] गुजारा करना होता था। पोखले का मानना था

[02:27:50] कि भारत को ऐसे पढ़े लिखे लोगों की जरूरत

[02:27:53] है जो स्वार्थ से ऊपर उठकर देश की

[02:27:56] समस्याओं का अध्ययन करें और फिर उनके

[02:27:58] समाधान के लिए काम करें। इसीलिए सोसाइटी

[02:28:01] का काम सिर्फ सेवा तक ही सीमित नहीं था।

[02:28:03] वो अकाल और बाढ़ जैसी आपदाओं में राहत

[02:28:05] कार्य करते थे। शिक्षा और स्वास्थ्य के

[02:28:07] लिए भी काम करते थे और साथ ही वो देश की

[02:28:10] आर्थिक और सामाजिक समस्याओं पर मतलब बहुत

[02:28:12] गंभीर रिसर्च भी करते थे। वे एक उदारवादी

[02:28:15] नेता थे जिन्हें नरम दल का माना जाता था।

[02:28:18] है ना? उनका मानना था कि सुधार धीरे-धीरे

[02:28:20] और संवैधानिक तरीकों से आएगा और उनकी

[02:28:23] सोसाइटी इसी विचार का प्रतिबिंब थी। हम्

[02:28:25] [गला साफ़ करने की आवाज़]

[02:28:25] उनका एक बड़ा मकसद ईसाई मिशनरियों द्वारा

[02:28:28] किए जा रहे सामाजिक कार्यों का एक भारतीय

[02:28:30] विकल्प तैयार करना भी था ताकि स्वाधीनता

[02:28:33] आंदोलन को वैचारिक रूप से भी मजबूत किया

[02:28:35] जा सके और स्रोत यह भी बताता है कि 1915

[02:28:38] में उनकी मृत्यु के बाद श्रीनिवास

[02:28:40] शास्त्री जैसे योग्य लोगों ने इस काम को

[02:28:43] आगे बढ़ाया जो यह दिखाता है कि उन्होंने

[02:28:45] एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक संस्था का

[02:28:47] निर्माण किया था।

[02:28:48] बिल्कुल।

[02:28:49] तो गोखले का रास्ता पूरी तरह से व्यवहारिक

[02:28:51] और राष्ट्र सेवा पर आधारित था। लेकिन उसी

[02:28:54] दौर में एक और लहर चल रही थी जो मानती थी

[02:28:56] कि असली सुधार राजनीति से नहीं बल्कि धर्म

[02:29:00] और समाज की जड़ों को साफ करने से आएगा और

[02:29:02] मुझे लगता है इसी विचार के केंद्र में थे

[02:29:05] स्वामी दयानंद सरस्वती।

[02:29:06] आपने बिल्कुल सही नबज़ पकड़ी है। अगर

[02:29:08] गोखले भारत को बाहर से यानी उसके राजनैतिक

[02:29:11] और सामाजिक व्यवस्था को सुधारना चाहते थे

[02:29:13] तो दयानंद सरस्वती भारत को अंदर से

[02:29:16] सुधारना चाहते थे। मतलब उसके धार्मिक और

[02:29:18] आध्यात्मिक विश्वास को। उनका जन्म 1824

[02:29:20] में गुजरात में हुआ और बचपन का नाम था मूल

[02:29:23] शंकर तिवारी। लेकिन उनकी कहानी में एक ऐसा

[02:29:25] मोड़ आता है जो उनके काम के प्रति उस समय

[02:29:27] के समाज के रवैये को दिखाता है।

[02:29:29] आप उनकी मृत्यु की बात कर रहे हैं कि 1883

[02:29:33] में अजमेर में उनकी मृत्यु दूध में कांच

[02:29:36] मिलाकर दिए जाने से हुई।

[02:29:38] जी, यह घटना दिखाती है कि उनके विचार

[02:29:40] कितने क्रांतिकारी और उस समय के रूढ़िवादी

[02:29:42] समाज के लिए कितने असहज करने वाले थे।

[02:29:46] सुधार का रास्ता कभी फूलों का नहीं होता

[02:29:48] और दयानंद ने इसकी कीमत चुकाई। उनके विचार

[02:29:51] इतने तीखे थे कि उन्होंने बहुत से

[02:29:54] शक्तिशाली दुश्मन बना लिए थे।

[02:29:56] और इन विचारों की नींव कहां से आई? उनके

[02:29:58] गुरु कौन थे?

[02:29:59] उनके जीवन में दो प्रमुख गुरु आए। पहले

[02:30:01] ऋषि संपूर्णानंद जिन्होंने उन्हें स्वामी

[02:30:04] दयानंद सरस्वती नाम दिया। लेकिन उनके असली

[02:30:06] वैचारिक गुरु थे मथुरा के नेत्रहीन स्वामी

[02:30:10] विजानंद। हम

[02:30:11] विजानंद का मानना था कि समय के साथ हिंदू

[02:30:14] धर्म में बहुत सारी गलत चीजें, अंधविश्वास

[02:30:17] और कुरीतियां घुस आई हैं और धर्म का असली

[02:30:20] शुद्ध रूप वेदों में ही मिल सकता है।

[02:30:23] उन्होंने ही दयानंद को यह मिशन दिया कि

[02:30:25] जाओ और वेदों के सच्चे ज्ञान का प्रकाश

[02:30:27] फैलाओ।

[02:30:28] उन्होंने अपनी सबसे महत्वपूर्ण किताब

[02:30:30] सत्यार्थ प्रकाश भी 1875 में ही प्रकाशित

[02:30:33] की और यहां एक बहुत दिलचस्प बात है। यह

[02:30:35] किताब संस्कृत में नहीं हिंदी में थी। यह

[02:30:37] तो बहुत बड़ी बात है। उस समय तो धर्म और

[02:30:39] ज्ञान की भाषा संस्कृत ही मानी जाती थी।

[02:30:41] यहीं पर दयानंद की दूरदर्शिता दिखती है।

[02:30:43] श्रोत बताते हैं कि केशव चंद्र सेन और

[02:30:46] ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने उन्हें सलाह दी

[02:30:48] कि अगर आप अपने विचारों को आम जनता तक

[02:30:50] पहुंचाना चाहते हैं तो उनकी भाषा में बात

[02:30:52] करनी होगी।

[02:30:53] और उन्होंने यह सलाह मान ली।

[02:30:54] हां, 1872 में उन्होंने यह सलाह मानी। यह

[02:30:57] सिर्फ भाषा का बदलाव नहीं था। यह सत्ता का

[02:30:59] बदलाव था। उन्होंने ज्ञान को संस्कृत के

[02:31:01] जानकारों के एकाधिकार से निकालकर आम आदमी

[02:31:03] के हाथ में देने की कोशिश की। छोड़कर वापस

[02:31:06] पुराने युग में चले जाना चाहिए।

[02:31:08] यह एक बहुत आम गलतफहमी है। वेदों की ओर

[02:31:10] लौटो का मतलब समय में पीछे जाना नहीं था।

[02:31:13] उनका कहना था कि वेद किसी अंधविश्वास या

[02:31:16] कर्मकांड की किताब नहीं है बल्कि उनमें

[02:31:18] तर्क विज्ञान और एकेश्वरवाद का संदेश है।

[02:31:21] अच्छा।

[02:31:21] उन्होंने मूर्ति पूजा, अवतारवाद, बलि

[02:31:24] प्रथा जैसी चीजों का जोरदार खंडन किया

[02:31:27] क्योंकि उन्हें यह सब वेदों के मूल संदेश

[02:31:29] के खिलाफ लगती थी। उनका दर्शन त्रेतवाद पर

[02:31:32] आधारित था। यानी जीव, प्रकृति और परमात्मा

[02:31:35] ये तीनों अलग-अलग और शाश्वत सत्ताएं हैं।

[02:31:38] और उनका एक और विचार तो उस समय के समाज

[02:31:40] में भूचाल लाने जैसा रहा होगा कि वर्ण

[02:31:43] व्यवस्था जन्म से नहीं कर्म से होनी

[02:31:46] चाहिए।

[02:31:46] बिल्कुल, यह उनके सुधार कार्यक्रम का सबसे

[02:31:49] विस्फोटक पहलू था। उन्होंने सदियों से चली

[02:31:52] आ रही जाति आधारित ऊंचनीच पर सीधा प्रहार

[02:31:55] किया। यह उनके ज्ञान को लोकतांत्रिक बनाने

[02:31:57] वाले विचार का ही एक सामाजिक रूप था। अगर

[02:32:00] कोई भी वेदों को पढ़ सकता है तो कोई भी

[02:32:02] अपने कर्म से अपना वर्ण निर्धारित कर सकता

[02:32:05] है।

[02:32:05] इसी सोच के तहत उन्होंने शुद्धि आंदोलन भी

[02:32:08] चलाया था।

[02:32:08] जी यह समझना जरूरी है कि शुद्धि आंदोलन उस

[02:32:12] दौर में हो रहे बड़े पैमाने पर धर्मांतरण

[02:32:14] की प्रतिक्रिया में शुरू हुआ था।

[02:32:16] हम

[02:32:16] दयानंद का तर्क था कि अगर किसी व्यक्ति को

[02:32:19] हिंदू धर्म छोड़ने के लिए मजबूर किया गया

[02:32:21] है या उसने अपनी मर्जी से धर्म छोड़ा है

[02:32:23] तो उसे अपनी मर्जी से वापस आने का अधिकार

[02:32:26] भी मिलना चाहिए। उस समय के रूढ़िवादी

[02:32:28] हिंदू समाज में घर वापसी का कोई रास्ता

[02:32:30] नहीं था। यह एक और क्रांतिकारी कदम था।

[02:32:33] समाज सुधार में उनका योगदान बहुत गहरा

[02:32:35] लगता है। बाल विवाह का विरोध, लड़कियों और

[02:32:38] लड़कों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु तय

[02:32:40] करना, भारत का पहला हिंदू अनाथालय खोलना।

[02:32:43] और उनकी विरासत आज भी जिंदा है। खासकर

[02:32:46] शिक्षा के क्षेत्र में उनकी मृत्यु के बाद

[02:32:48] लाला हंसराज और लाला लाजपत राय जैसे

[02:32:50] नेताओं ने उनके काम को आगे बढ़ाया और 1886

[02:32:53] में दयानंद एंग्लो वेदिक यानी डीएवी

[02:32:56] संस्थानों की नींव रखी।

[02:32:57] अच्छा डीएवी

[02:32:58] हां। इसका मॉडल देखिए। एंग्लो यानी पश्चिम

[02:33:01] का आधुनिक विज्ञान और वैदिक यानी भारत के

[02:33:03] प्राचीन मूल्य। उन्होंने शिक्षा में

[02:33:05] परंपरा और आधुनिकता का वही संतुलन बनाने

[02:33:08] की कोशिश की जिसकी बात दयानंद करते थे। तो

[02:33:10] अगर दयानंद का तरीका भारत की जड़ों को

[02:33:13] भीतर से साफ करके उसे मजबूत करना था तो

[02:33:16] हमारे तीसरे व्यक्तित्व ने एक बिल्कुल ही

[02:33:18] अलग रास्ता अपनाया। उन्होंने माना कि भारत

[02:33:20] की ताकत तो पहले से ही मौजूद है। बस

[02:33:23] दुनिया उसे पहचान नहीं रही है और उसे

[02:33:25] दुनिया से पहचान कराने का काम किया स्वामी

[02:33:28] विवेकानंद ने।

[02:33:28] क्या बेहतरीन तरीका है इसे देखने का।

[02:33:30] विवेकानंद का मानना था कि भारत को

[02:33:32] रक्षात्मक होने की जरूरत नहीं है। उसे

[02:33:34] दुनिया को कुछ सिखाना है। उनका जन्म 1863

[02:33:37] में नरेंद्रनाथ के रूप में हुआ और सिर्फ

[02:33:39] 39 साल की उम्र में 1902 में उनका देहांत

[02:33:41] हो गया।

[02:33:42] सिर्फ 39 साल।

[02:33:43] हां। इतने छोटे से जीवन में उन्होंने जो

[02:33:45] प्रभाव छोड़ा वह आज भी महसूस किया जाता

[02:33:48] है। उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस ने उनकी

[02:33:51] ऊर्जा को सही दिशा दी।

[02:33:52] और उस दिशा ने उन्हें 1893 में शिकागो तक

[02:33:56] पहुंचा दिया। विश्व धर्म सम्मेलन यह उनके

[02:33:58] जीवन का और शायद आधुनिक भारत के इतिहास का

[02:34:01] एक निर्णायक मोड़ था।

[02:34:03] यकीनन सोचिए एक 30 साल का गुमनाम सन्यासी

[02:34:06] जिसके पास पहनने को ढंग के कपड़े भी नहीं

[02:34:08] थे। वो दुनिया के सबसे बड़े मंच पर हिंदू

[02:34:10] धर्म का प्रतिनिधित्व करने जा रहा था। जब

[02:34:12] 11 सितंबर 1893 को उनकी बारी आई और

[02:34:15] उन्होंने अपना भाषण अमेरिका के बहनों और

[02:34:18] भाइयों कहकर शुरू किया तो दो मिनट तक

[02:34:20] तालियां बजती रहीं।

[02:34:21] वाह!

[02:34:21] उस एक संबोधन ने दिलों को जीत लिया।

[02:34:23] उन तालियों के पीछे सिर्फ संबोधन का तरीका

[02:34:26] था या उनके विचारों में भी कुछ खास था।

[02:34:28] उनके विचारों में एक सार्वभौमिक अपील थी।

[02:34:30] उन्होंने हिंदू धर्म को किसी पूजा पद्धति

[02:34:33] या कर्मकांड के समूह के रूप में नहीं

[02:34:35] बल्कि सभी धर्मों की जननी के रूप में

[02:34:38] प्रस्तुत किया।

[02:34:38] अच्छा।

[02:34:39] उन्होंने सहिष्णुता और सार्वभौमिक

[02:34:42] स्वीकार्यता का संदेश दिया। उन्होंने

[02:34:44] दुनिया को वेदांत के उस क्रांतिकारी विचार

[02:34:46] से परिचित कराया जिसे अद्वैत वेदांत कहते

[02:34:49] हैं कि हर आत्मा में दिव्यता है। हर इंसान

[02:34:52] ईश्वर का अंश है।

[02:34:53] और इसी विचार को उन्होंने अपनी समाज सेवा

[02:34:55] का आधार बनाया। नर सेवा नारायण सेवा

[02:34:58] बिल्कुल उन्होंने कहा कि अगर हर इंसान में

[02:35:00] ईश्वर है तो भूखे गरीब और बीमार इंसान की

[02:35:03] सेवा करना ही ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा है।

[02:35:06] यह सिर्फ एक आध्यात्मिक विचार नहीं था। यह

[02:35:08] समाज सेवा के लिए एक शक्तिशाली प्रेरणा

[02:35:11] थी।

[02:35:11] हम

[02:35:11] इसी सिद्धांत पर उन्होंने 1897 में

[02:35:14] कोलकाता के पास बेलूर में रामकृष्ण मिशन

[02:35:17] की स्थापना की और उनका काम सिर्फ भारत तक

[02:35:19] सीमित नहीं रहा। 1894 में ही उन्होंने

[02:35:22] न्यूयॉर्क में वेदांत सोसाइटी की स्थापना

[02:35:24] कर दी थी। न्यूयॉर्क में

[02:35:25] जी जो पश्चिम में भारतीय दर्शन को

[02:35:27] संस्थागत रूप देने की पहली बड़ी कोशिश थी।

[02:35:29] उनका एक और प्रसिद्ध विचार था पूर्व के

[02:35:32] अध्यात्म और पश्चिम के भौतिकवाद का संगम।

[02:35:35] क्या वह सिर्फ यह कह रहे थे कि दोनों को

[02:35:37] एक दूसरे से सीखना चाहिए?

[02:35:38] यह उससे कहीं ज्यादा गहरा था। विवेकानंद

[02:35:41] का मानना था कि पश्चिम ने विज्ञान और

[02:35:43] तकनीक में जबरदस्त तरक्की की है। लेकिन

[02:35:45] आध्यात्मिक रूप से वह खोखला हो रहा है।

[02:35:48] वहीं भारत के पास आध्यात्मिक ज्ञान का

[02:35:50] खजाना है। लेकिन वह करीबी और पिछड़ेपन में

[02:35:52] जी रहा है।

[02:35:53] सही बात है।

[02:35:54] वो कहते थे कि भारत को पश्चिम से विज्ञान,

[02:35:56] संगठन और तरक्की की सोच लेनी चाहिए और

[02:35:59] पश्चिम को भारत से आध्यात्मिकता और आत्मा

[02:36:02] का ज्ञान लेना चाहिए। एक मजबूत शरीर में

[02:36:04] एक मजबूत आत्मा यही उनका विज़न था। उनकी

[02:36:07] लिखी किताबें, कर्म योग, राजयोग, भक्ति

[02:36:10] योग और उनका नारा उठो, जागो और तब तक मत

[02:36:14] रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त ना हो जाए। आज

[02:36:17] भी युवाओं को प्रेरित करता है। स्रोत में

[02:36:19] उनके दो ध्यान स्थलों का भी जिक्र है।

[02:36:21] कन्याकुमारी का रॉक मेमोरियल और अल्मोड़ा

[02:36:24] का कसार देवी मंदिर। जीव ये स्थान आज भी

[02:36:27] उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र माने

[02:36:29] जाते हैं। कहते हैं कि कन्याकुमारी में उस

[02:36:32] चट्टान पर 3 दिन ध्यान करने के बाद ही

[02:36:34] उन्हें भारत के पुनर्निर्माण का स्पष्ट

[02:36:36] रास्ता दिखा था और शिकागो जाने का निर्णय

[02:36:39] हुआ था।

[02:36:39] अच्छा।

[02:36:40] यह जगहें सिर्फ पर्यटन स्थल नहीं है बल्कि

[02:36:42] उनकी यात्रा के प्रतीक हैं। एक आंतरिक खोज

[02:36:45] से शुरू होकर वैश्विक मंच पर भारत का परचम

[02:36:47] लहराने तक की यात्रा।

[02:36:50] शुरुआत करते हैं पहली धारा से यानी

[02:36:52] सामाजिक सुधार आंदोलनों से और इसमें भी

[02:36:55] 19वीं सदी के मुस्लिम समाज में चल रही दो

[02:36:57] बड़ी और एक दूसरे से बिल्कुल अलग लहरों को

[02:36:59] समझना बहुत जरूरी है।

[02:37:00] आप अलीगढ़ और देवबंद की बात कर रहे हैं?

[02:37:02] बिल्कुल सबसे पहले अलीगढ़ आंदोलन

[02:37:04] और अलीगढ़ का नाम आते ही ज़हन में एक ही

[02:37:06] नाम आता है सर सैयद अहमद खान। उन्हें भारत

[02:37:09] में मुस्लिम पुनर्जागरण का दूत भी कहा

[02:37:11] जाता है।

[02:37:12] जी और यह खिताब बहुत बड़ा है। उनका सबसे

[02:37:14] बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने उस वक्त की

[02:37:16] सबसे बड़ी जरूरत को पहचाना।

[02:37:18] और वो क्या थी? उनका मानना था कि अगर

[02:37:20] मुस्लिम समुदाय को आगे बढ़ना है तो सिर्फ

[02:37:22] पारंपरिक शिक्षा से काम नहीं चलेगा।

[02:37:24] उन्हें आधुनिक मतलब पश्चिमी शिक्षा और

[02:37:26] विज्ञान को अपनाना ही होगा। यह उस दौर के

[02:37:29] लिए एक बहुत बड़ी एक क्रांतिकारी सोच थी।

[02:37:31] और यह सिर्फ सोच नहीं थी। उन्होंने इस पर

[02:37:33] काम भी किया। जैसे 1858 में उनकी वो किताब

[02:37:36] असबाब बगावत हिंद।

[02:37:38] हां। और उसमें उन्होंने जो लिखा वो अपने

[02:37:40] आप में बहुत हिम्मत का काम।

[02:37:42] क्या लिखा था उन्होंने? उन्होंने साफ-साफ

[02:37:43] तर्क दिया कि 1857 की जो क्रांति थी वो

[02:37:46] कोई हिंदू मुस्लिम साजिश नहीं थी जैसा कि

[02:37:49] अंग्रेज कह रहे थे।

[02:37:50] अच्छा

[02:37:50] बल्कि यह ईस्ट इंडिया कंपनी के शोषण और

[02:37:53] उनकी गलत नीतियों का सीधा नतीजा था। एक

[02:37:55] तरह से वो ब्रिटिश हुकूमत को ही कटघरे में

[02:37:57] खड़ा कर रहे थे।

[02:37:58] लेकिन वो सिर्फ अंग्रेजों की आलोचना नहीं

[02:38:00] कर रहे थे। उनका जोर ज्ञान को आम लोगों तक

[02:38:03] पहुंचाने पर भी था। है ना?

[02:38:04] बिल्कुल। इसी के लिए उन्होंने 1864 में

[02:38:07] गाजीपुर में साइंटिफिक सोसायटी की स्थापना

[02:38:09] की।

[02:38:10] इसका क्या काम था?

[02:38:11] मकसद बहुत साफ था। अंग्रेजी में जो भी

[02:38:12] जरूरी विज्ञान, इतिहास या साहित्य की

[02:38:15] किताबें हैं उनका उर्दू में अनुवाद करो

[02:38:17] ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग उन्हें पढ़

[02:38:19] सकें, समझ सकें।

[02:38:20] मतलब ज्ञान को कुछ लोगों तक सीमित नहीं

[02:38:22] रखना था।

[02:38:23] और इसी सोच का सबसे बड़ा नतीजा था 1875

[02:38:27] में अलीगढ़ स्कूल की स्थापना।

[02:38:29] जो सिर्फ 2 साल बाद मोहम्मदन एंग्लो

[02:38:31] ओरिएंटल कॉलेज बना।

[02:38:32] हां। और फिर यही कॉलेज आगे चलकर 1920 में

[02:38:36] अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बना।

[02:38:38] लेकिन यहां एक राजनीतिक पहलू भी है जिसे

[02:38:39] नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सही बात है।

[02:38:42] 1888 में सर सैयद ने यूनाइटेड इंडियन

[02:38:45] पेट्रियाटिक एसोसिएशन बनाया।

[02:38:47] और इसका सीधा मकसद कांग्रेस का विरोध करना

[02:38:49] था।

[02:38:49] हां, उनका मानना था कि मुस्लिम समुदाय को

[02:38:52] पहले शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए। राजनीति

[02:38:54] पर नहीं और शायद इसी वजह से अंग्रेजों ने

[02:38:57] भी उसी साल उन्हें नाइटहुड की उपाधि दी।

[02:38:59] सामाजिक स्तर पर भी उन्होंने पीरी मुरीदी

[02:39:02] प्रथा का विरोध किया।

[02:39:03] जी। मतलब संतों के प्रति जो अंधभक्ति और

[02:39:06] अंधविश्वास था उसके वह सख्त खिलाफ थे। तो

[02:39:08] यह तो था एक पहलू। अब सिक्के का दूसरा

[02:39:11] पहलू देखते हैं। देवबंद आंदोलन।

[02:39:13] बिल्कुल। यह आंदोलन उत्तर प्रदेश के

[02:39:15] सहारनपुर के देवबंद से शुरू हुआ और जो बात

[02:39:18] सबसे फैसिनेट करती है वो यह है कि यह

[02:39:20] आंदोलन अलीगढ़ आंदोलन के ठीक विपरीत था।

[02:39:23] एकदम उल्टा।

[02:39:24] हां, इसके जो प्रवर्तक थे मोहम्मद कासिम

[02:39:26] ननोतवी और रशीद अहमद गंगोही, वह अंग्रेजी

[02:39:29] शिक्षा के विरोधी थे।

[02:39:30] तो उनका जोर किस पर था?

[02:39:31] कुरान और हदीस की शिक्षा पर। उनका मानना

[02:39:33] था कि पश्चिमी संस्कृति से इस्लाम की असल

[02:39:36] पहचान को खतरा है।

[02:39:37] और राजनीतिक तौर पर भी इनका रुख एकदम अलग

[02:39:39] था।

[02:39:40] जमीन आसमान का फर्क, यह आंदोलन कांग्रेस

[02:39:42] का समर्थक था। इनका मानना था कि अंग्रेज

[02:39:44] विदेशी शासक हैं और आजादी की लड़ाई में

[02:39:47] कांग्रेस का साथ देना जरूरी है।

[02:39:48] उन्होंने तो सर सैयद अहमद खान के खिलाफ

[02:39:51] फतवा तक जारी कर दिया था।

[02:39:52] जी। और इसी आंदोलन के तहत 1866 में

[02:39:55] सहारनपुर में दारुल उलूम की स्थापना हुई।

[02:39:58] तो यह भविष्य को देखने के दो बिल्कुल अलग

[02:40:01] नजरिए थे। इन दोनों के अलावा एक अहमदिया

[02:40:04] आंदोलन का भी जिक्र जरूरी है जिसे मिर्जा

[02:40:07] गुलाम अहमद ने शुरू किया था।

[02:40:09] बिल्कुल। तो यह थी हमारी पहली धारा जहां

[02:40:11] समाज के अंदर से ही बदलाव की लहरें उठ रही

[02:40:13] थी।

[02:40:13] हम्म। अब चलते हैं दूसरी धारा की ओर।

[02:40:15] एक ऐसा आंदोलन जो भारत के बाहर से आया और

[02:40:19] यहां की जमीन में बहुत गहरी जड़े जमा ली।

[02:40:21] थियोसोफिकल सोसाइटी।

[02:40:23] इसका नाम ही काफी रहस्यमई लगता है। थियोस

[02:40:25] यानी ईश्वर और सोफिया यानी ज्ञान। ईश्वरीय

[02:40:29] ज्ञान।

[02:40:29] हां। और इसका मुख्य उद्देश्य था नस्लीय

[02:40:31] भेदभाव को खत्म करना और आध्यात्मिकता को

[02:40:34] बढ़ावा देना। एक तरह का सार्वभौमिक

[02:40:36] भाईचारा बनाना।

[02:40:36] और इसकी स्थापना भी बड़ी दिलचस्प है। 1875

[02:40:40] में न्यूयॉर्क में।

[02:40:41] जी। एक रूसी अमेरिकी महिला मैडम हेलेना

[02:40:43] ब्लावत्स्की और एक अमेरिकी कर्नल हेनरी

[02:40:46] स्टील ऑलकॉट ने की थी।

[02:40:48] और भारत में इसका पहला ऑफिस 1879 में

[02:40:51] मुंबई में खुला।

[02:40:52] लेकिन इसका अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय 1882

[02:40:55] में मद्रास के पास अडियार में मनाया गया।

[02:40:57] ज़रा सोचिए एक रूसी महिला और एक अमेरिकी

[02:41:00] कर्नल न्यूयॉर्क में एक सोसाइटी बनाते हैं

[02:41:03] और वह भारत में आध्यात्म की खोज का एक

[02:41:05] बड़ा केंद्र बन जाती है।

[02:41:07] लेकिन भारत में इस सोसाइटी को असली पहचान

[02:41:09] तो एनी बेसेंट से मिली।

[02:41:11] बिल्कुल वो 1889 में सोसाइटी से जुड़ी और

[02:41:14] 1893 में भारत आ गई और फिर यहीं की होकर

[02:41:17] रह गई।

[02:41:18] उनका सबसे बड़ा योगदान था 1898 में बनारस

[02:41:21] में सेंट्रल हिंदू कॉलेज की स्थापना करना।

[02:41:24] हां। और यहीं से एक बहुत बड़ा कनेक्शन

[02:41:26] जुड़ता है

[02:41:27] बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का।

[02:41:29] जी मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से यही

[02:41:32] कॉलेज 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय

[02:41:35] यानी बीएचयू बना। तो आज जो हम बीएचयू का

[02:41:37] विशाल रूप देखते हैं उसकी नींव में एनी

[02:41:40] बेसेंट और थियोसोफिकल सोसाइटी का एक बहुत

[02:41:42] बड़ा योगदान है।

[02:41:43] और 1907 में कर्नल ओल्कोट की मृत्यु के

[02:41:46] बाद एनी बेसेंट सोसायटी के अध्यक्ष भी

[02:41:48] बनी।

[02:41:49] जी। और 1908 में उन्होंने ब्रदर्स ऑफ

[02:41:51] सर्विस नाम की एक और संस्था की स्थापना

[02:41:53] की। तो, यह थी सामाजिक और आध्यात्मिक

[02:41:56] धाराएं। लेकिन अपनी मांगे रखने के लिए

[02:41:59] सत्ता से सीधी बात करने के लिए तो

[02:42:02] राजनीतिक संगठन चाहिए थे।

[02:42:03] बिलकुल और अब हम आते हैं अपनी तीसरी धारा

[02:42:06] पर उन संगठनों पर जो 1885 में कांग्रेस की

[02:42:09] स्थापना से भी पहले बन चुके थे।

[02:42:11] इसे ऐसे समझ सकते हैं कि कांग्रेस एक बड़ी

[02:42:13] नदी थी। लेकिन उससे पहले यह सब छोटी-छोटी

[02:42:16] बहुत सारी धाराएं थी।

[02:42:18] बहुत अच्छा कहा आपने। कोई जमींदारों के

[02:42:20] पहाड़ों से निकल रही कोई वकीलों के शहरों

[02:42:22] से यह सब अपनी-अपनी दिशा में बह रही थी।

[02:42:24] तो सबसे पहला राजनीतिक संगठन कौन सा था?

[02:42:27] वो था लैंड होल्डर्स सोसाइटी। इसकी

[02:42:29] स्थापना 1847 में कोलकाता में द्वारकानाथ

[02:42:32] टैगोर ने की थी।

[02:42:33] और इसकी खास बात यह है कि यह भारत का पहला

[02:42:36] राजनीतिक संगठन था।

[02:42:38] जी। लेकिन इसका मकसद खासतौर पर जमींदारों

[02:42:40] के हितों की रक्षा करना था।

[02:42:42] इसके बाद 1843 में कोलकाता में ही जॉर्ज

[02:42:45] थॉमसन ने बंगाल ब्रिटिश इंडिया सोसाइटी

[02:42:48] बनाई। और फिर 1851 में इन दोनों संगठनों

[02:42:52] का विलय हो गया जिससे ब्रिटिश इंडियन

[02:42:54] एसोसिएशन का जन्म हुआ। इसके अध्यक्ष

[02:42:57] राधाकांत देव थे और सचिव थे देवेंद्रनाथ

[02:43:00] टैगोर।

[02:43:00] यह सब तो बंगाल में हो रहा था। दक्षिण

[02:43:02] भारत की ओर चलें तो

[02:43:04] 1852 में मद्रास नेटिव एसोसिएशन की

[02:43:07] स्थापना जिसके संस्थापक थे गुजलू लक्ष्मी

[02:43:09] नरसूद चेट्टी। यह दक्षिण भारत का पहला

[02:43:12] राजनीतिक संगठन था। लेकिन फिर एक दिलचस्प

[02:43:14] मोड़ आता है। 1866 में दादा भाई नौरोजी

[02:43:18] हां।

[02:43:18] लंदन में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की स्थापना

[02:43:21] करते हैं।

[02:43:22] यह बहुत महत्वपूर्ण है। वह इस लड़ाई को

[02:43:24] भारत से हजारों मील दूर दुश्मन के घर में

[02:43:27] यानी लंदन में लड़ रहे थे।

[02:43:28] और वहीं उन्होंने अपनी प्रसिद्ध ड्रेन

[02:43:31] थ्योरी दी।

[02:43:31] ड्रेन थ्योरी धन निकासी का सिद्धांत और यह

[02:43:34] उस दौर के लिए एक धमाके जैसा था।

[02:43:36] वो कैसे? क्योंकि पहली बार किसी ने

[02:43:38] आंकड़ों और तथ्यों के साथ यह साबित किया

[02:43:40] कि अंग्रेजी हुकूमत भारत को सभ्य बनाने

[02:43:43] नहीं आई है बल्कि वह एक सिस्टम के तहत एक

[02:43:45] व्यवस्था के तहत भारत की दौलत निचोड़ कर

[02:43:48] लंदन भेज रही है।

[02:43:49] मतलब इस एक थ्यरी ने गोरे साहब के राज के

[02:43:52] पूरे नैतिक दावे की हवा निकाल दी।

[02:43:54] बिल्कुल।

[02:43:55] अच्छा फिर 1875 में कोलकाता में शिशिर

[02:43:58] कुमार घोष ने इंडिया लीग की स्थापना की।

[02:44:01] और फिर एक साल बाद 1876 में कोलकाता में

[02:44:04] ही इंडियन एसोसिएशन या भारत संघ बना जिसके

[02:44:07] संस्थापक सुरेंद्रनाथ बनर्जी और आनंद मोहन

[02:44:10] बोस थे।

[02:44:10] इसे तो कई इतिहासकार कांग्रेस का

[02:44:12] प्रीकर्सर भी कहते हैं।

[02:44:14] सही बात है क्योंकि यह पहला संगठन था

[02:44:15] जिसने सिविल सर्विस परीक्षा में भारतीयों

[02:44:18] के लिए उम्र बढ़ाने जैसे अखिल भारतीय

[02:44:20] मुद्दों को उठाया। इसका नजरिया सिर्फ

[02:44:22] बंगाल तक सीमित नहीं था।

[02:44:23] और फिर 1884 में चेन्नई में मद्रास महाजन

[02:44:27] सभा की स्थापना हुई।

[02:44:28] जी। इसके संस्थापकों में एमवी राघवाचारी,

[02:44:31] सुब्रमण्यम अय्यर और आनंद चार्लु शामिल

[02:44:33] थे।

[02:44:34] और आखिर में ठीक कांग्रेस की स्थापना वाले

[02:44:36] साल यानी 1885 में बॉम्बे में बॉम्बे

[02:44:40] प्रेसिडेंसी एसोसिएशन बनी।

[02:44:41] जिसे फिरोजशाह मेहता, केटी तेलंग और

[02:44:44] बदरुद्दीन तैयब जी ने मिलकर बनाया था। तो

[02:44:46] भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस यह नाम जब हम

[02:44:49] सुनते हैं तो ज़हन में सीधी तस्वीरें आती

[02:44:52] हैं। आजादी की लड़ाई की, गांधी, नेहरू

[02:44:55] तिरंगे की। 28 दिसंबर 1885 जगह थी बंबई का

[02:45:00] गोकुल दास तेजपाल संस्कृत कॉलेज। यहां

[02:45:03] कांग्रेस की नींव रखी गई।

[02:45:05] संस्थापक थे एओ ह्यूम। एक रिटायर्ड

[02:45:08] ब्रिटिश आईसीएस अधिकारी। लेकिन यहीं पर एक

[02:45:12] बहुत ही दिलचस्प थ्योरी सामने आती है।

[02:45:14] सेफ्टी वेल्व की थ्योरी।

[02:45:16] बिल्कुल। सेफ्टी वाल्व थ्योरी। यह थ्योरी

[02:45:18] जिसे लाला लाजपत राय ने अपने अखबार यंग

[02:45:21] इंडिया में जोर शोर से उठाया था वो यह

[02:45:23] कहती है कि कांग्रेस की स्थापना असल में

[02:45:25] अंग्रेजों ने अपने फायदे के लिए की थी।

[02:45:27] अपने फायदे के लिए?

[02:45:28] हां, उनका डर था कि 1857 जैसा कोई बड़ा

[02:45:31] विद्रोह कहीं फिर से ना हो जाए। तो

[02:45:33] उन्होंने भारतीयों को एक मंच दे दिया। एक

[02:45:35] सेफ्टी वेल्व जहां वो अपनी भड़ास निकाल

[02:45:37] सकें और कोई बड़ा खतरा टल जाए। अच्छा,

[02:45:40] मतलब एक ऐसा प्लेटफार्म जहां पढ़े-लिखे

[02:45:42] भारतीय अपनी शिकायतें दर्ज कराएं, बहस

[02:45:45] करें और अंग्रेजों को मतलब अंदर की खबर

[02:45:47] मिलती रहे कि आखिर चल क्या रहा है?

[02:45:50] लेकिन क्या यह सिर्फ एक इल्जाम था या इसके

[02:45:52] पीछे कोई ठोस वजह भी थी? वजह थी, वजह यह

[02:45:54] थी कि शुरुआती कांग्रेस का जो रवैया था वो

[02:45:57] बहुत ही नरम था। वह ब्रिटिश राज के खिलाफ

[02:45:59] नहीं थे बल्कि उसके तहत और ज्यादा अधिकार

[02:46:02] चाहते थे। उनकी पूरी राजनीति आप कह सकते

[02:46:04] हैं 3P पर आधारित 3 पी

[02:46:06] पिटीशन प्रेयर और प्रोपगेंडा

[02:46:08] याचिका प्रार्थना और प्रचार

[02:46:11] जी मतलब अर्ियां लिखो प्रार्थना करो और

[02:46:13] अपनी बात लोगों तक पहुंचाओ गोपाल कृष्ण

[02:46:15] गोखले फिरोज शाह मेहता जैसे नेता वो सब

[02:46:18] इसी विचारधारा के थे

[02:46:19] लेकिन जाहिर सी बात है हर कोई इस थ्री पी

[02:46:22] वाली राजनीति से खुश नहीं था और यहीं से

[02:46:24] कांग्रेस के अंदर एक और विचारधारा ने जन्म

[02:46:27] लिया

[02:46:27] हां गरम दल की विचारधारा उनका मानना था कि

[02:46:30] आजादी मांगने से नहीं मिलती उसे छीनना

[02:46:32] पड़ता है

[02:46:33] हम

[02:46:33] इसमें लाल बाल पाल की तिकड़ी लाला लाजपत

[02:46:36] राय, बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल

[02:46:39] यह सबसे आगे थे। उनका साफ कहना था कि

[02:46:41] याचिकाओं का जमाना गया। अब सीधे संघर्ष का

[02:46:43] वक्त है और कांग्रेस के अंदर इन्हीं दो

[02:46:46] विचारधाराओं की जो खींचतान है वो उसके

[02:46:48] शुरुआती इतिहास को बहुत दिलचस्प बनाती है।

[02:46:50] तो यह तो हुई नींव और शुरुआती विचारधारा

[02:46:54] की बात। लेकिन कांग्रेस का जो असली चरित्र

[02:46:56] है वो तो उसके सालाना अधिवेशनों यानी

[02:46:59] सेशंस में निखर कर सामने आया। और पहले कुछ

[02:47:02] अधिवेशन तो बहुत ही मतलब रणनीतिक लगते

[02:47:06] हैं।

[02:47:06] बहुत ज्यादा। आप देखिए पहला अधिवेशन 1885

[02:47:08] में बॉम्बे में हुआ। अध्यक्ष थे वमेश

[02:47:11] चंद्र बनर्जी। लेकिन उसके बाद के तीन

[02:47:13] अधिवेशनों को देखिए। 1886 में कोलकाता में

[02:47:15] अध्यक्ष बने दादा भाई नौरोजी जो एक पारसी

[02:47:17] थे।

[02:47:18] राइट?

[02:47:18] अगले ही साल 1887 में मद्रास में

[02:47:20] बदरुद्दीन तैयब जी अध्यक्ष बने। जो पहले

[02:47:23] मुस्लिम अध्यक्ष थे।

[02:47:24] और उन्होंने तो एक नारा भी दिया था।

[02:47:26] कांग्रेसी बनो जो उस दौर में सर सैयद अहमद

[02:47:29] खान जैसे नेताओं के विरोध को देखते हुए एक

[02:47:32] बहुत बड़ा कदम था।

[02:47:33] बिल्कुल। और इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए

[02:47:35] 1888 में इलाहाबाद में जॉर्ज यूल अध्यक्ष

[02:47:38] बने जो पहले यूरोपियन थे। तो आप पैटर्न

[02:47:40] देखिए हिंदू, पारसी, मुस्लिम, यूरोपियन।

[02:47:43] हम

[02:47:43] यह एक सोचा समझा समृष्ट था कि कांग्रेस

[02:47:46] किसी एक धर्म या समुदाय की नहीं बल्कि

[02:47:48] पूरे भारत की संस्था है। वो शुरू से ही एक

[02:47:51] राष्ट्रीय पहचान बनाने की कोशिश कर रहे

[02:47:53] थे।

[02:47:53] तो यह तो हुई एक समावेशी पहचान बनाने की

[02:47:55] बात। लेकिन अब कांग्रेस अपनी आवाज भी

[02:47:58] बुलंद कर रही थी और यह आवाज सिर्फ

[02:48:00] राजनीतिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और आर्थिक

[02:48:02] भी थी। 1896 का कोलकाता अधिवेशन इस लिहाज

[02:48:06] से बहुत अहम है।

[02:48:08] बहुत अहम। यहां दो बड़ी बातें हुई। पहली

[02:48:10] इसी अधिवेशन में पहली बार वंदे मातरम गाया

[02:48:13] गया।

[02:48:13] अच्छा।

[02:48:14] इसने आंदोलन को एक सांस्कृतिक पहचान दी।

[02:48:16] एक भावनात्मक नारा दिया। लेकिन दूसरी बात

[02:48:18] वो शायद इससे भी ज्यादा क्रांतिकारी थी।

[02:48:20] इसी अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी की ड्रेन

[02:48:23] थ्योरी यानी धन निष्कासन के सिद्धांत को

[02:48:26] आधिकारिक तौर पर मान लिया गया।

[02:48:27] यहां थोड़ा रुकते हैं। यह ड्रेन थ्योरी को

[02:48:29] अपनाना इतना बड़ा कदम क्यों था?

[02:48:32] क्योंकि इसने पहली बार अंग्रेजी हुकूमत की

[02:48:34] आर्थिक नींव पर सीधा हमला किया।

[02:48:36] हम

[02:48:36] अब तक बात सिर्फ राजनीतिक अधिकारों या

[02:48:39] एडमिनिस्ट्रेशन में ज्यादा हिस्सेदारी की

[02:48:41] थी। हम्म।

[02:48:42] लेकिन इस थ्यरी ने साफ-साफ कहा कि भारत की

[02:48:45] गरीबी की असल वजह अंग्रेजों की वह नीतियां

[02:48:47] हैं जो भारत का पैसा लूट कर ब्रिटेन ले जा

[02:48:50] रही हैं। इसने ब्रिटिश राज की नैतिक

[02:48:52] बुनियाद पर ही सवाल खड़ा कर दिया।

[02:48:53] और इसी वैचारिक मंथन के बीच एक ऐसा

[02:48:56] व्यक्ति पहली बार कांग्रेस के मंच पर आया

[02:48:59] जो आगे चलकर इसकी पूरी दिशा बदलने वाला

[02:49:01] था।

[02:49:02] हां, 1901 में कोलकाता अधिवेशन में

[02:49:04] महात्मा गांधी ने पहली बार हिस्सा लिया।

[02:49:06] वह उस वक्त दक्षिण अफ्रीका में अपने काम

[02:49:08] की वजह से जाने जाते हम

[02:49:10] और फिर 1906 तक आते-आते दादा भाई नौरोजी

[02:49:13] की अध्यक्षता में ही कांग्रेस ने पहली बार

[02:49:16] स्वराज शब्द का इस्तेमाल किया।

[02:49:18] स्वराज

[02:49:18] तो आप देख सकती हैं 3p से शुरू हुआ सफर अब

[02:49:21] स्वराज तक पहुंच चुका था।

[02:49:22] लेकिन जैसे-जैसे कांग्रेस के तेवर तीखे हो

[02:49:25] रहे थे, अंदरूनी मतभेद भी बढ़ रहे थे और

[02:49:27] इसका नतीजा हमें अगले ही साल 1907 के सूरत

[02:49:31] अधिवेशन में देखने को मिला। इसे सूरत की

[02:49:33] फूट भी कहा जाता है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि

[02:49:35] बात इतनी बढ़ गई?

[02:49:36] देखिए यह सिर्फ विचारधारा का टकराव नहीं

[02:49:39] था। यह नेताओं के बीच व्यक्तिगत मतभेद और

[02:49:42] रणनीति को लेकर जबरदस्त खींचतान भी थी।

[02:49:44] गरम दल चाहता था कि लाला लाजपत राय या

[02:49:47] तिलक अध्यक्ष बने

[02:49:48] और स्वदेशी आंदोलन को पूरे देश में

[02:49:50] आक्रामक तरीके से चलाया जाए। वहीं नरम दल

[02:49:52] इसके लिए तैयार नहीं था।

[02:49:53] हम

[02:49:54] माहौल इतना बिगड़ गया कि अधिवेशन में

[02:49:56] कुर्सियां तक फेंकी गई और आखिरकार

[02:49:58] कांग्रेस दो हिस्सों में टूट गई।

[02:49:59] ओ

[02:50:00] यह कांग्रेस के लिए एक बहुत बड़ा झटका था।

[02:50:01] इस फूट को भरने में तो करीब एक दशक लग

[02:50:04] गया। लेकिन जब कांग्रेस दोबारा एक हुई तो

[02:50:06] वह पहले से ज्यादा मजबूत थी। 1916 का लखनऊ

[02:50:09] अधिवेशन

[02:50:10] एक ऐतिहासिक अधिवेशन यहां तीन बड़ी बातें

[02:50:12] हुई। पहले अंबिका चरण मजूमदार की

[02:50:14] अध्यक्षता में नरम दल और गरम दल फिर से एक

[02:50:17] हो गए।

[02:50:18] अच्छा।

[02:50:18] दूसरी कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच एक

[02:50:20] समझौता हुआ जिसे लखनऊ पैक्ट कहते हैं। यह

[02:50:23] हिंदू मुस्लिम एकता की दिशा में एक बड़ा

[02:50:24] कदम था।

[02:50:25] राइट।

[02:50:26] और तीसरी बात इसी मंच से बाल गंगाधर तिलक

[02:50:28] ने अपना वो अमर नारा दिया।

[02:50:30] स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं

[02:50:33] इसे लेकर रहूंगा।

[02:50:35] बिल्कुल। इस एक नारे ने पूरे देश में जोश

[02:50:38] की एक नई लहर भर दी।

[02:50:39] और यहीं से हम कांग्रेस में गांधी युग की

[02:50:42] आहट सुन सकते हैं। है ना? 1917 में एनी

[02:50:45] बेसेंट पहली महिला अध्यक्ष बनी और फिर

[02:50:47] 1920 का साल आया जिसने असहयोग आंदोलन की

[02:50:51] नींव रखी।

[02:50:51] यहां एक दिलचस्प बात है। 1920 में दो

[02:50:54] अधिवेशन हुए। पहले कोलकाता में एक विशेष

[02:50:56] अधिवेशन हुआ जहां लाला लाजपत राय अध्यक्ष

[02:50:59] थे और असहयोग का प्रस्ताव रखा गया।

[02:51:01] गरम दल के नेता अध्यक्ष थे। जी, यह अपने

[02:51:04] आप में कांग्रेस के बदलते चरित्र को

[02:51:06] दिखाता है। फिर उसी साल नागपुर में हुए

[02:51:08] नियमित अधिवेशन में इस प्रस्ताव को पारित

[02:51:11] कर दिया गया।

[02:51:11] कांग्रेस अब याचिकाओं वाली संस्था नहीं

[02:51:14] रही। वह एक जन आंदोलन वाली संस्था बन चुकी

[02:51:16] थी।

[02:51:17] और इसी दौर में कुछ और भी महत्वपूर्ण

[02:51:19] बातें हुई। 1924 में बेलगांव में महात्मा

[02:51:22] गांधी सिर्फ एक बार के लिए कांग्रेस

[02:51:24] अध्यक्ष बने।

[02:51:24] यह भी एक अनोखी बात है कि जिसने कांग्रेस

[02:51:27] को चलाया, वह सिर्फ एक बार उसका अध्यक्ष

[02:51:29] बना।

[02:51:30] बिल्कुल। और अगले ही साल 1925 में कानपुर

[02:51:33] में सरोजनी नायडू पहली भारतीय महिला

[02:51:36] अध्यक्ष बनी।

[02:51:37] पहली भारतीय महिला।

[02:51:38] जी। इससे पहले 1917 में एनी बेसेंट

[02:51:41] अध्यक्ष थी। लेकिन वह यूरोपीय थी। सरोजनी

[02:51:44] नायडू का अध्यक्ष बनना भारतीय महिलाओं के

[02:51:46] राजनीतिक सफर में एक मील का पत्थर था। और

[02:51:48] इससे भी पहले 1923 में मौलाना अबुल कलाम

[02:51:51] आजाद सिर्फ 35 साल की उम्र में सबसे युवा

[02:51:54] अध्यक्ष बने थे। जो कांग्रेस के समावेशी

[02:51:56] चरित्र को और मजबूत करता है।

[02:51:58] अब हम उस दौर में पहुंच रहे हैं जहां

[02:52:00] स्वराज की मांग पूर्ण स्वराज में बदलने

[02:52:03] वाली थी। 1929 लाहौर अधिवेशन यह शायद

[02:52:07] कांग्रेस के इतिहास के सबसे यादगार

[02:52:09] अधिवेशनों में से एक है।

[02:52:11] यकीनन जरा उस मंजर की कल्पना कीजिए। रावी

[02:52:14] नदी का किनारा है, कड़ाके की ठंड है और

[02:52:16] आधी रात को युवा जवाहरलाल नेहरू की

[02:52:19] अध्यक्षता में तिरंगा फहराया जा रहा है और

[02:52:21] पूर्ण स्वराज का संकल्प लिया जा रहा है।

[02:52:23] क्या बात है।

[02:52:24] यह सिर्फ एक प्रस्ताव नहीं था। यह एक ऐलान

[02:52:26] था। ऐलान कि अब हमें अंग्रेजों के अधीन

[02:52:29] कोई स्टेटस नहीं चाहिए। हमें पूरी आजादी

[02:52:31] चाहिए।

[02:52:31] और इसी अधिवेशन में 26 जनवरी 1930 को पूरे

[02:52:35] देश में स्वतंत्रता दिवस मनाने का फैसला

[02:52:38] भी हुआ। यही वजह है कि बाद में हमारे

[02:52:40] संविधान को लागू करने के लिए 26 जनवरी की

[02:52:44] तारीख चुनी गई।

[02:52:45] बिल्कुल। लेकिन आजादी का यह रास्ता आसान

[02:52:47] नहीं था। 1931 का कराची अधिवेशन इस बात का

[02:52:50] गवाह है। अध्यक्ष थे सरदार वल्लभ भाई

[02:52:52] पटेल। यह अधिवेशन गांधी इरविन समझौते और

[02:52:54] भगत सिंह की फांसी के ठीक बाद हुआ था।

[02:52:56] हम तो माहौल तनावपूर्ण होगा।

[02:52:59] बहुत ज्यादा। देश के युवाओं में जबरदस्त

[02:53:01] गुस्सा था। गांधी जी जब अधिवेशन में

[02:53:03] पहुंचे तो उन्हें काले झंडे दिखाए गए।

[02:53:05] और यही उन्होंने वो मशहूर बात कही। गांधी

[02:53:07] मर सकते हैं लेकिन गांधीवाद नहीं।

[02:53:10] हां, उन्होंने गुस्से को समझा और

[02:53:11] स्वीकारा। इसी अधिवेशन में दो और बड़ी

[02:53:13] बातें हुई। गांधीइरविन समझौते को मंजूरी

[02:53:16] दी गई और पहली बार मौलिक अधिकारों का

[02:53:18] प्रस्ताव पारित किया गया।

[02:53:19] मौलिक अधिकार

[02:53:20] जी यह दिखाता है कि कांग्रेस सिर्फ

[02:53:22] राजनीतिक आजादी नहीं बल्कि नागरिकों के

[02:53:24] अधिकारों वाली आजादी का सपना देख रही थी।

[02:53:26] इस दौर में कांग्रेस गांव तक भी पहुंची।

[02:53:29] 1937 में फैजपुर में पहली बार किसी गांव

[02:53:32] में अधिवेशन हुआ। लेकिन इसके बाद कांग्रेस

[02:53:34] के अंदर एक और बड़ा वैचारिक टकराव देखने

[02:53:37] को मिला। इस बार गांधी और सुभाष चंद्र बोस

[02:53:40] के बीच।

[02:53:41] 1938 में हरपुरा में सुभाष चंद्र बोस

[02:53:44] निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए। सब कुछ ठीक

[02:53:46] था। लेकिन असली संकट 1939 के त्रिपुरी

[02:53:49] अधिवेशन में खड़ा हुआ। बोस दोबारा अध्यक्ष

[02:53:51] पद के लिए खड़े हुए। लेकिन इस बार गांधी

[02:53:53] जी ने उनका समर्थन नहीं किया।

[02:53:54] क्यों?

[02:53:55] वैचारिक मतभेद थे। गांधी जी ने बोस के

[02:53:57] खिलाफ पट्टा भी सीतारमैया को अपना

[02:53:59] उम्मीदवार बनाया।

[02:54:00] और नतीजा तो काफी चौंकाने वाला था। बोस

[02:54:02] चुनाव जीत गए। यह गांधी जी के लिए एक बड़ा

[02:54:04] झटका था।

[02:54:05] बिल्कुल। गांधी जी ने इसे अपनी व्यक्तिगत

[02:54:07] हार बताया। इसके बाद कांग्रेस वर्किंग

[02:54:09] कमेटी में बोस के लिए काम करना लगभग

[02:54:11] नामुमकिन हो गया। गांधी जी से वैचारिक

[02:54:12] मतभेदों के चलते आखिरकार उन्होंने अध्यक्ष

[02:54:15] पद से इस्तीफा दे दिया।

[02:54:16] और उनकी जगह

[02:54:17] उनकी जगह फिर डॉ. राजेंद्र प्रसाद को

[02:54:19] अध्यक्ष बनाया गया। यह कांग्रेस के इतिहास

[02:54:21] का एक बहुत ही निर्णायक और कह सकते हैं

[02:54:24] विवादास्पद मोड़ था।

[02:54:25] इसके बाद दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया

[02:54:27] और कांग्रेस का ध्यान पूरी तरह से

[02:54:29] स्वतंत्रता संग्राम पर केंद्रित हो गया।

[02:54:31] हां, 1940 में मौलाना अबुल कलाम आजाद

[02:54:34] रामगढ़ अधिवेशन में अध्यक्ष बने। लेकिन

[02:54:37] विश्व युद्ध के चलते 1941 से 1945 तक कोई

[02:54:40] अधिवेशन नहीं हो सका। इस वजह से मौलाना

[02:54:43] आजाद सबसे लंबे समय तक 1946 तक कांग्रेस

[02:54:46] अध्यक्ष बने रहे।

[02:54:47] तो अब हम आते हैं उस सबसे बड़े सवाल पर जब

[02:54:50] 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ। उस वक्त

[02:54:54] कांग्रेस का अध्यक्ष कौन था?

[02:54:56] वो थे जेबी कृपलानी। उन्हें 1946 के मेरठ

[02:54:59] अधिवेशन में अध्यक्ष चुना गया था। तो जब

[02:55:01] सत्ता का हस्तांतरण हुआ तब कांग्रेस की

[02:55:04] कमान जेबी कृपलानी के हाथों में थी।

[02:55:06] तो यह था भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का

[02:55:08] 1885 से 1947 तक का सफर। आज हम लॉर्ड

[02:55:12] कर्ज़न और बंगाल के विभाजन पर एक गहरी नजर

[02:55:15] डालने वाले हैं। लॉर्ड कर्जन वो 1898 में

[02:55:18] भारत का वायसराय बनकर आया था और आते ही

[02:55:21] उसने एक के बाद एक कई बड़े बदलाव करने

[02:55:24] शुरू कर दिए। हां, कर्ज़न का कार्यकाल 1898

[02:55:27] से 1905 तक था और बंगाल का बंटवारा ही

[02:55:30] उसका अकेला बड़ा काम नहीं था।

[02:55:32] अच्छा।

[02:55:32] असल में उसके दूसरे कामों को देखें तो

[02:55:35] बंटवारे के पीछे की सोच और साफ हो जाती

[02:55:37] है। वो बेसिकली हर चीज पर ब्रिटिश सरकार

[02:55:39] का कंट्रोल कसना चाहता था।

[02:55:41] जैसे कि पुलिस पर

[02:55:42] 1902 में उसने एंड्र्यू फ्रेजर की लीडरशिप

[02:55:44] में एक पुलिस कमीशन बनाया।

[02:55:46] हम

[02:55:46] कागज पर तो इसका मकसद था कि पुलिस को और

[02:55:49] बेहतर और एफिशिएंट बनाया जाए। लेकिन

[02:55:51] असलियत में यह कंट्रोल को और मजबूत करने

[02:55:53] का एक तरीका था।

[02:55:54] मतलब पुलिस ज्यादा से ज्यादा सरकार के

[02:55:56] हुक्म माने जनता की न सुने।

[02:55:59] और इसके ठीक 1 साल बाद 1903 में दूसरा

[02:56:02] दिल्ली दरबार हुआ। यह नाम ही कितना शाही

[02:56:04] लगता है।

[02:56:05] ये असल में था क्या? कोई शाही मेला या कोई

[02:56:07] राजनीतिक बैठक।

[02:56:08] इसे आप दोनों का मिश्रण कह सकते हैं। यह

[02:56:12] ब्रिटिश ताकत का एक जबरदस्त दिखावा था।

[02:56:15] अच्छा।

[02:56:15] सोचिए एडवर्ड सप्तम की ताजपोशी के मौके पर

[02:56:18] इसे रखा गया था। भारत के कोने-कोने से

[02:56:21] राजे महाराजे इकट्ठा हुए थे और उन्होंने

[02:56:24] अंग्रेज राजा के प्रति अपनी वफादारी दिखाई

[02:56:26] थी।

[02:56:27] मतलब पूरी शानो और शौकत का प्रदर्शन।

[02:56:29] और क्या दस्तावेज बताते हैं कि इस पर

[02:56:31] बेहिसब पैसा बहाया गया और यह सब उस वक्त

[02:56:34] हो रहा था जब देश का एक बड़ा हिस्सा अकाल

[02:56:37] और गरीबी से जूझ रहा था।

[02:56:38] हां बिल्कुल। तो एक तरफ जनता की तकलीफें

[02:56:41] थी और दूसरी तरफ यह शाही जश्न। यह

[02:56:43] अंग्रेजों का तरीका था यह जताने का कि

[02:56:45] असली मालिक कौन है।

[02:56:46] ताकत का दिखावा और फिर ताकत का इस्तेमाल

[02:56:49] यूनिवर्सिटीज पर कंट्रोल करके 1904 का

[02:56:52] यूनिवर्सिटी कानून यहां आकर मामला और

[02:56:55] दिलचस्प हो जाता है।

[02:56:56] यह सीधा-सीधा विचारों पर हमला था। इस

[02:56:58] कानून ने यूनिवर्सिटीज की जो आजादी थी

[02:57:00] मतलब उनकी ऑटोनोमी उसको लगभग खत्म कर

[02:57:02] दिया।

[02:57:02] कैसे?

[02:57:03] यूनिवर्सिटी की जो गवर्निंग बॉडी होती थी

[02:57:05] जिसे सीनेट कहते हैं, उसमें अब तक भारतीय

[02:57:07] लोग चुनाव से आते हम

[02:57:08] इस कानून ने चुने हुए भारतीय सदस्यों की

[02:57:10] संख्या कम कर दी और सरकार के चुने हुए

[02:57:13] अंग्रेज सदस्यों की संख्या बढ़ा दी।

[02:57:15] मतलब अब सरकार तय करेगी कि यूनिवर्सिटी

[02:57:17] में क्या पढ़ाया जाएगा, कौन पढ़ाएगा और

[02:57:20] किस तरह के विचारों को बढ़ावा दिया जाएगा।

[02:57:22] बिल्कुल।

[02:57:23] जाहिर है राष्ट्रवादी विचारों को दबाने के

[02:57:25] लिए ही यह किया गया होगा।

[02:57:27] ठीक। यही मकसद था और इसका जबरदस्त विरोध

[02:57:29] भी हुआ। हमारे पास जो जानकारी है उसमें

[02:57:31] आशुतोष मुखर्जी जैसे बड़े शिक्षाविदों का

[02:57:34] नाम आता है। जिन्होंने खुलकर इसकी

[02:57:35] मुखालिफत की। हम्म।

[02:57:37] उन्हें ये साफ दिख रहा था कि ये भारतीय

[02:57:38] शिक्षा की तरक्की को रोकने और युवा

[02:57:40] दिमागों को कंट्रोल करने की कोशिश है।

[02:57:42] अच्छा तो मतलब एक तरफ वो भारत के पढ़े

[02:57:45] लिखे नौजवानों के पर कतर रहा था और दूसरी

[02:57:48] तरफ उसी साल 1904 में वो पुरानी इमारतों

[02:57:51] को बचाने का कानून ला रहा था। प्राचीन

[02:57:54] स्मारक सुरक्षा अधिनियम। यह तो बड़ा अजीब

[02:57:56] कॉम्बिनेशन है।

[02:57:57] यह बड़ा दिलचस्प है। है ना?

[02:57:58] हां।

[02:57:59] एक ही साल में दो कानून। एक जो नौजवानों

[02:58:01] की सोच पर ताला लगा रहा है और दूसरा जो

[02:58:03] पुरानी इमारतों को बचा रहा है।

[02:58:05] यह कर्जन की और शायद पूरे ब्रिटिश राज की

[02:58:07] सोच को दिखाता है। लोगों को नियंत्रित करो

[02:58:10] लेकिन उनकी संस्कृति को एक म्यूजियम की

[02:58:12] तरह सहेज कर रहा। यह एक तरह का बौद्धिक

[02:58:13] कब्ज़ा था। वो भारत के अतीत की तारीफ तो

[02:58:15] करता था लेकिन भारत के भविष्य पर भरोसा

[02:58:18] नहीं करना चाहता था।

[02:58:18] तो इसी सोच के साथ बंगाल के बंटवारे का

[02:58:21] आईडिया सामने आया। हमारे स्रोत इसके पीछे

[02:58:24] दो कहानियां बताते हैं। एक वो जो

[02:58:26] अंग्रेजों ने दुनिया को बताई और एक वो जो

[02:58:29] असली वजह थी।

[02:58:30] बिल्कुल। अंग्रेजों का जो ऑफिशियल कारण था

[02:58:32] वो था प्रशासनिक सुविधा।

[02:58:33] एडमिनिस्ट्रेटिव कन्वीनियंस।

[02:58:35] हां उनका तर्क था कि बंगाल प्रांत बहुत

[02:58:37] बड़ा है। आबादी लगभग 8 करोड़ है। इतने

[02:58:40] बड़े इलाके को एक जगह कोलकाता से चलाना

[02:58:42] बहुत मुश्किल हो रहा है। इसलिए अगर इसे दो

[02:58:43] हिस्सों में बांट दें तो मैनेजमेंट बेहतर

[02:58:45] हो जाएगा।

[02:58:46] 1 मिनट। मैनेजमेंट में आसानी यह सुनने में

[02:58:49] तो बड़ा सीधा-साधा कारण लगता है। क्या उस

[02:58:51] समय किसी ने इस पर यकीन किया भी था?

[02:58:53] देखिए, ऊपर से देखने में तो बहुत तर्कसंगत

[02:58:55] लगता है। आज भी बड़े राज्यों को बेहतर

[02:58:57] प्रशासन के लिए छोटे राज्यों में बांटा

[02:58:58] जाता है। लेकिन उस समय के राष्ट्रवादी

[02:59:00] नेताओं को यह बात पहले दिन से ही खटक रही

[02:59:02] थी। उन्हें इसके पीछे की असली चाल साफ नजर

[02:59:04] आ रही थी।

[02:59:04] तो असली मकसद क्या था?

[02:59:06] असली मकसद था फूट डालो और राज करो। यह एक

[02:59:09] बहुत सोची समझी राजनीतिक चाल थी। बंगाल उस

[02:59:11] वक्त भारतीय राष्ट्रवाद का गढ़ था।

[02:59:13] हम्म। राजनीतिक चेतना, साहित्य,

[02:59:16] पत्रकारिता हर लिहाज से बंगाल पूरे देश को

[02:59:18] लीड कर रहा था और सबसे बड़ी बात वहां

[02:59:20] हिंदू मुस्लिम एकता काफी मजबूत थी जो

[02:59:22] अंग्रेजों के लिए सबसे बड़ा खतरा था।

[02:59:24] तो बंटवारे का मकसद इस गढ़ को ही तोड़ना

[02:59:27] था।

[02:59:27] ठीक यही। कर्जन का इरादा साफ था इस एकता

[02:59:29] को तोड़ो और राष्ट्रवाद की इस लहर को कुचल

[02:59:32] दो। उसने सोचा कि अगर हम हिंदुओं और

[02:59:34] मुसलमानों के बीच

[02:59:35] धर्म के नाम पर एक दरार डाल दें। हां, एक

[02:59:38] दरार डाल दें तो यह लोग आपस में ही लड़ते

[02:59:40] रहेंगे और ब्रिटिश राज के खिलाफ एकजुट

[02:59:42] होकर कभी खड़े नहीं हो पाएंगे।

[02:59:44] ठीक है? तो उन्होंने फूट डालो और राज करो

[02:59:46] की नीति के तहत यह फैसला ले लिया। लेकिन

[02:59:48] इसे जमीन पर उतारा कैसे गया होगा? मतलब आप

[02:59:51] 8 करोड़ लोगों को रातोंरात कैसे बांट सकते

[02:59:54] हैं?

[02:59:54] हां। और जब हम उन आंकड़ों को देखते हैं तो

[02:59:56] पूरी कहानी खुद ब खुद साफ हो जाती है।

[02:59:58] बंगाल को दो हिस्सों में बांटा गया।

[03:00:00] हम

[03:00:00] पहला हिस्सा था पूर्वी बंगाल और असम।

[03:00:03] जी। इसमें आज का बांग्लादेश, असम और

[03:00:06] चिटगांव, ढाका जैसे इलाके शामिल थे।

[03:00:08] ओके।

[03:00:09] और इसकी राजधानी ढाका को बनाया गया।

[03:00:11] और यहां की आबादी का हिसाब किताब क्या था?

[03:00:14] यहीं पर असली खेल था। इस नए प्रांत की कुल

[03:00:16] आबादी थी 3 करोड़ 10 लाख।

[03:00:18] ओके।

[03:00:19] इसमें से 1 करोड़ 80 लाख मुसलमान थे और 1

[03:00:22] करोड़ 30 लाख हिंदू।

[03:00:24] अच्छा मतलब इसे जानबूझकर एक मुस्लिम बहुल

[03:00:26] प्रांत बनाया गया।

[03:00:27] हां बिल्कुल। और वहां का लेफ्टिनेंट

[03:00:29] गवर्नर बनाया गया ब्लूम फील्ड फुलर को जो

[03:00:32] अपनी मुस्लिम परस्त और हिंदू विरोधी सोच

[03:00:34] के लिए कुख्यात था।

[03:00:35] उसने तो यहां तक कहा था कि मुस्लिम मेरी

[03:00:38] पसंदीदा पत्नी है।

[03:00:40] यह तो बहुत ही साफ इशारा है और दूसरा

[03:00:42] हिस्सा यानी पश्चिम बंगाल।

[03:00:44] दूसरा हिस्सा था पश्चिम बंगाल जिसमें आज

[03:00:46] का पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड और उड़ीसा

[03:00:50] आते थे।

[03:00:50] इसकी राजधानी कोलकाता ही रही।

[03:00:52] हम्। यहां की आबादी थी 5 करोड़ 30 लाख

[03:00:55] जिसमें से 4 करोड़ 40 लाख हिंदू थे और

[03:00:58] सिर्फ 90 लाख मुसलमान।

[03:01:00] यह एक हिंदू बहुल प्रांत बन गया। तो सोचिए

[03:01:02] रातोंरात एक ऐसी लकीर खींच दी गई जिसके एक

[03:01:05] तरफ मुस्लिम आबादी ज्यादा हो गई और दूसरी

[03:01:08] तरफ हिंदू। यह सिर्फ नक्शे पर एक लाइन

[03:01:11] नहीं थी। यह साफ-साफ लोगों के दिलों के

[03:01:13] बीच एक दीवार खड़ी करने की कोशिश थी।

[03:01:16] बिल्कुल। यह आंकड़े ही चिल्ला-चिल्ला कर

[03:01:18] कह रहे थे कि मकसद प्रशासन नहीं बंटवारा

[03:01:21] था। सही बात है।

[03:01:22] यहां तक कि भाषा के आधार पर भी यह बंटवारा

[03:01:24] बेतुका था। बंगाली बोलने वाले लोगों को ही

[03:01:26] दो हिस्सों में बांट दिया गया था। साफ था

[03:01:27] कि यह बंटवारा भूगोल या भाषा के आधार पर

[03:01:30] नहीं सिर्फ और सिर्फ धर्म के आधार पर किया

[03:01:32] गया था।

[03:01:33] यह सब देखकर तो गुस्सा आता है। अब सवाल यह

[03:01:35] है कि यह सब हुआ कैसे? मेरा मतलब है यह

[03:01:38] फैसला लिया कब गया? और लोगों तक यह खबर

[03:01:40] कैसे पहुंची? यह रातोंरात तो नहीं हुआ

[03:01:43] होगा।

[03:01:43] नहीं, यह एक लंबी प्रक्रिया थी। इसकी

[03:01:45] सुगबुगाहट जुलाई 1903 में ही शुरू हो गई

[03:01:48] थी जब यह प्रस्ताव पहली बार ब्रिटिश संसद

[03:01:50] में रखा गया। इसके बाद लगभग 2 साल तक अंदर

[03:01:52] खाने में प्लानिंग चलती रही।

[03:01:54] और फिर जनता के सामने इसका ऐलान कब हुआ?

[03:01:56] 19 जुलाई 1905 को शिमला से इस बंटवारे का

[03:02:00] औपचारिक ऐलान किया गया।

[03:02:01] ओके।

[03:02:02] अगले ही दिन 20 जुलाई 1905 को यह खबर सारे

[03:02:05] बड़े अखबारों में छप गई। और जैसे ही यह

[03:02:07] खबर लोगों तक पहुंची, पूरे बंगाल में जैसे

[03:02:10] एक भूचाल आ गया।

[03:02:11] हम्म।

[03:02:12] विरोध की एक जबरदस्त लहर दौड़ पड़ी।

[03:02:14] बिल्कुल।

[03:02:14] और इसी विरोध की आग से स्वदेशी आंदोलन का

[03:02:18] जन्म हुआ।

[03:02:18] राइट।

[03:02:19] 20 जुलाई के ऐलान के फौरन बाद सुरेंद्रनाथ

[03:02:21] बनर्जी जैसे बड़े बंगाली नेताओं ने विरोध

[03:02:24] की रणनीति बनाने के लिए बैठ के शुरू कर

[03:02:26] दी।

[03:02:26] ओके।

[03:02:27] और फिर 7 अगस्त 1905 को कोलकाता के

[03:02:30] ऐतिहासिक टाउन हॉल में बहुत बड़ी सभा हुई।

[03:02:33] उसी सभा में औपचारिक तौर पर स्वदेशी

[03:02:35] आंदोलन यानी विदेशी सामान के बहिष्कार का

[03:02:38] ऐलान किया गया। मतलब बंटवारा लागू होने से

[03:02:41] 2 महीने पहले ही लोगों ने अपना जवाब दे

[03:02:44] दिया था।

[03:02:44] हां और तमाम विरोधों, प्रदर्शनों और

[03:02:46] अपीलों के बावजूद कर्जन अपनी जिद पर अड़ा

[03:02:49] रहा

[03:02:49] हम

[03:02:49] और आखिरकार 16 अक्टूबर 1905 का वो दिन आया

[03:02:52] जब बंगाल का विभाजन आधिकारिक तौर पर लागू

[03:02:55] कर दिया गया।

[03:02:56] हां, वो दिन बंगाल के इतिहास में एक काले

[03:02:58] दिन के तौर पर याद किया जाता है।

[03:03:00] और जैसा कि उम्मीद थी लोगों ने इस दिन को

[03:03:02] चुपचाप स्वीकार नहीं किया। उन्होंने अपनी

[03:03:05] नाराजगी और अपनी एकता दिखाने के लिए जो

[03:03:07] तरीके अपनाए वह कमाल के थे।

[03:03:09] बिल्कुल यह एक जन आंदोलन बन गया था जिसमें

[03:03:12] हर कोई शामिल था। 16 अक्टूबर 1905 को पूरे

[03:03:15] बंगाल में शोक दिवस यानी मातम का दिन

[03:03:17] मनाया गया।

[03:03:18] शोक दिवस

[03:03:19] हां यह आईडिया रामेंद्र सुंदर का था। उस

[03:03:21] दिन किसी के घर चूल्हा नहीं चला। लोगों ने

[03:03:23] उपवास रखा। दुकानें बाजार सब बंद थे। लोग

[03:03:26] नंगे पैर जुलूस की शक्ल में गंगा किनारे

[03:03:28] गए। भजन गाए और पवित्र स्नान किया। और इसी

[03:03:31] दिन को राखी दिवस के तौर पर भी मनाया गया।

[03:03:34] यह तो कमाल का आईडिया था। मतलब अंग्रेजों

[03:03:37] के बांटों के जवाब में जोड़ों का एक सीधा

[03:03:40] संदेश।

[03:03:40] बिल्कुल यह रविंद्रनाथ टैगोर की सोच थी।

[03:03:43] उन्होंने कहा कि अगर सरकार हमें धर्म के

[03:03:45] नाम पर बांटना चाहती है तो हम एक धागे से

[03:03:47] अपने रिश्ते को और मजबूत करेंगे।

[03:03:49] वाह!

[03:03:49] आप उस दिन का माहौल सोच कर देखिए। सड़कों

[03:03:52] पर हिंदू और मुसलमान एक दूसरे की कलाई पर

[03:03:54] पीली राखियां बांध रहे थे। यह सिर्फ एक

[03:03:56] रस्म नहीं थी। यह एक राजनीतिक बयान था। वह

[03:03:59] भी बिना किसी भाषण के।

[03:04:01] सही बात है यह अंग्रेजों की फूट डायलों की

[03:04:04] नीति पर एक करारा तमाचा था।

[03:04:06] बिल्कुल लोग टोलियां बनाकर सड़कों पर निकल

[03:04:09] पड़े और एक ही नारा गूंज रहा था वंदे

[03:04:11] मातरम।

[03:04:12] वंदे मातरम।

[03:04:13] बंकिम चंद्र चटर्जी का यह गीत उस वक्त

[03:04:15] राष्ट्रवाद और एकता का सबसे बड़ा प्रतीक

[03:04:18] बन गया था। यह लोगों को सिर्फ राजनीतिक

[03:04:20] तौर पर नहीं बल्कि भावनात्मक तौर पर भी

[03:04:22] जोड़ रहा था। और इसी माहौल में रवींद्रनाथ

[03:04:25] टैगोर ने वो मशहूर गीत लिखा जो आज भी

[03:04:28] हमारे दिलों में बसा हुआ है।

[03:04:29] हां, इसी आंदोलन की आग में तप कर उन्होंने

[03:04:32] लिखा अमार सुनार बांग्ला यानी मेरा सोने

[03:04:35] का बंगाल।

[03:04:36] हम

[03:04:36] यह गीत बंटे हुए बंगाल की आत्मा की आवाज

[03:04:39] थी। यह बंगाल की एकता उसकी खूबसूरती और

[03:04:42] उसकी समृद्ध संस्कृति का गीत था। यह इतना

[03:04:45] ताकतवर साबित हुआ कि दशकों बाद 1971 में

[03:04:48] यह आजाद बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना। यह

[03:04:51] बात तो सच में अद्भुत है कि एक विरोध

[03:04:53] आंदोलन से निकला गीत एक पूरे देश का

[03:04:56] राष्ट्रगान बन जाए।

[03:04:57] हम्म

[03:04:58] और क्या यह आग सिर्फ बंगाल तक ही सीमित

[03:05:00] रही?

[03:05:00] नहीं। इसकी चिंगारियां पूरे देश में फैली।

[03:05:03] हमारे स्रोत बताते हैं कि दक्षिण भारत में

[03:05:05] सुब्रमण्यम स्वामी ने इस बंटवारे के विरोध

[03:05:08] में और स्वदेशी आंदोलन के समर्थन में

[03:05:10] स्वदेश गीतम नाम से देशभक्ति के गीत लिखे।

[03:05:14] पश्चिमित तिलक और पंजाब में लाला लाजपत

[03:05:16] राय ने इस आंदोलन को आगे बढ़ाया। यह एहसास

[03:05:19] पूरे देश में फैल गया था कि बंगाल पर हुआ

[03:05:22] हमला, पूरे भारत पर हमला है और यह विरोध

[03:05:24] बेकार नहीं गया। यह आखिरकार सफल हुआ।

[03:05:27] हमारे दस्तावेज साफ बताते हैं कि 1911 में

[03:05:30] लॉर्ड हार्डिंग द्वितीय के समय में जब

[03:05:32] तीसरा दिल्ली दरबार लगा तो जनता के भारी

[03:05:35] दबाव के आगे सरकार को झुकना पड़ा। बंगाल

[03:05:37] के विभाजन को रद्द कर दिया गया।

[03:05:39] हालांकि एक और चालाकी की गई। बंगाल के

[03:05:42] राजनीतिक असर को कम करने के लिए राजधानीक

[03:05:46] से दिल्ली शिफ्ट कर दी गई। हां, यह भी

[03:05:48] हुआ।

[03:05:48] लेकिन फिर भी बंटवारे का रद्द होना लोगों

[03:05:51] की उनकी एकता की एक बहुत बड़ी जीत थी।

[03:05:54] यह भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की पहली बड़ी

[03:05:57] जीतों में से एक इसने लोगों के अंदर एक

[03:05:59] नया आत्मविश्वास भरा। उन्हें यह यकीन हो

[03:06:01] गया कि अगर वह एकजुट होकर शांतिपूर्ण

[03:06:04] तरीके से भी संघर्ष करें तो वह दुनिया के

[03:06:06] सबसे ताकतवर साम्राज्य को भी अपनी बात

[03:06:08] मानने पर मजबूर कर सकते। अक्सर इतिहासकार

[03:06:11] भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को तीन बड़े

[03:06:13] हिस्सों में बांट कर देखते हैं। यह विभाजन

[03:06:16] क्यों जरूरी है? क्या इससे हमें उस समय की

[03:06:18] सोच को समझने में मदद मिलती है? जैसे पहला

[03:06:20] दौर था उदारवादी चरण जो कांग्रेस की

[03:06:23] स्थापना यानी 1885 से लेकर 1905 तक चला।

[03:06:27] इसमें नरम दल के नेता थे जो चिट्ठियों,

[03:06:29] याचिकाओं और अखबारों के जरिए अपनी बात

[03:06:32] अंग्रेजी हुकूमत तक पहुंचाते थे।

[03:06:34] हां। और आज के समय में यह तरीका हमें

[03:06:36] थोड़ा धीमा या शायद असरहीन लग सकता है।

[03:06:40] लेकिन हमें उस दौर को भी समझना होगा।

[03:06:43] उन्होंने ही पहली बार एक अखिल भारतीय

[03:06:45] राजनीतिक चेतना की नींव रखी। वह ब्रिटिश

[03:06:48] सरकार को यह यकीन दिलाना चाहते थे कि

[03:06:50] भारतीय भी शासन में भागीदारी के काबिल है।

[03:06:53] बिना उनके इस शुरुआती काम के शायद गरम दल

[03:06:56] के नेताओं को वह मंच ही नहीं मिलता जिस पर

[03:06:58] खड़े होकर वह अपनी आवाज बुलंद कर सकें।

[03:07:00] यह बहुत दिलचस्प बात है। तो मतलब दूसरा

[03:07:02] चरण जिसे उग्र राष्ट्रवादी चरण कहते हैं।

[03:07:05] 1905 से 1919 तक वह एक तरह से पहले चरण की

[03:07:09] प्रतिक्रिया थी। क्या लोगों का याचिकाओं

[03:07:11] और प्रार्थना पत्रों से भरोसा उठने लगा

[03:07:13] था?

[03:07:13] बिल्कुल। 20 साल के प्रेयर पिटीशन

[03:07:16] प्रोटेस्ट के बाद भी जब अंग्रेजों की

[03:07:18] नीतियों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया तो

[03:07:21] नेताओं के एक बड़े वर्ग और खासकर युवाओं

[03:07:24] को लगने लगा कि सिर्फ मांगने से आजादी

[03:07:26] नहीं मिलेगी। उन्हें लगा कि अब अपने हक के

[03:07:29] लिए लड़ना होगा। संघर्ष करना होगा। यहीं

[03:07:31] से बहिष्कार, हड़ताल और सक्रिय आंदोलन की

[03:07:34] शुरुआत हुई।

[03:07:35] और फिर तीसरा चरण आया। गांधी युग 1919 से

[03:07:38] 1947 तक जिसने तो जैसे पूरे खेल के नियम

[03:07:41] ही बदल दिए। सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह ने

[03:07:43] करोड़ों लोगों को इस आंदोलन से जोड़ दिया।

[03:07:45] लेकिन उस तक पहुंचने से पहले 1905 में ऐसा

[03:07:48] क्या हुआ था जिसने पूरे देश में आग लगा

[03:07:50] दी? मेरा इशारा स्वदेशी आंदोलन की तरफ है।

[03:07:53] 1905 का साल एक वाटर शेड मोमेंट था। इसका

[03:07:56] सबसे बड़ा और तात्कालिक कारण था बंगाल का

[03:07:58] विभाजन। लॉर्ड कर्जन ने प्रशासनिक सुविधा

[03:08:01] का बहाना बनाकर बंगाल को दो हिस्सों में

[03:08:03] बांट दिया। लेकिन असली मकसद हिंदू मुस्लिम

[03:08:06] एकता को तोड़ना और राष्ट्रवादी आंदोलन के

[03:08:08] गढ़ बंगाल को कमजोर करना था। इस फैसले ने

[03:08:11] बंगाल के लोगों के स्वाभिमान को गहरी चोट

[03:08:14] पहुंचाई

[03:08:14] और इसी के जवाब में स्वदेशी आंदोलन शुरू

[03:08:16] हुआ। मुझे पता है कि इसकी औपचारिक शुरुआत

[03:08:18] 7 अगस्त 1905 को कोलकाता के टाउनहॉल की एक

[03:08:22] बहुत बड़ी बैठक से हुई थी। लेकिन यह सिर्फ

[03:08:24] एक राजनीतिक विरोध प्रदर्शन से कहीं

[03:08:26] ज्यादा था। है ना?

[03:08:26] कहीं ज्यादा। स्वदेशी का मतलब सिर्फ अपने

[03:08:29] देश का नहीं था। यह एक विचार था। एक

[03:08:32] आंदोलन था अपनी आत्मा को फिर से जगाने का।

[03:08:36] इसका उद्देश्य सिर्फ विदेशी वस्तुओं का

[03:08:38] बहिष्कार करना नहीं था बल्कि हर उस चीज को

[03:08:41] अपनाना था जो भारतीय हो। भारतीय कपड़े,

[03:08:44] भारतीय सामान, भारतीय भाषा और यहां तक कि

[03:08:47] भारतीय शिक्षा भी यह अंग्रेजों को सिर्फ

[03:08:49] राजनीतिक नहीं बल्कि एक जबरदस्त आर्थिक और

[03:08:52] सांस्कृतिक चुनौती थी।

[03:08:54] और इस विचार को जमीन पर उतारने के लिए तो

[03:08:56] कई संस्थाएं भी बनाई गई। जैसे अश्विनी

[03:08:58] कुमार दत्त की स्वदेशी बांधव समिति। इसका

[03:09:00] काम क्या था? स्वदेशी बांधव समिति एक तरह

[03:09:03] से आंदोलन की रीड थी। इसके हजारों

[03:09:06] स्वयंसेवक गांव-गांव जाकर लोगों को

[03:09:09] स्वदेशी का मतलब समझाते थे। विदेशी सामान

[03:09:12] के बहिष्कार के लिए प्रेरित करते थे और

[03:09:14] अगर कोई विवाद होता था तो उसे सुलझाने के

[03:09:17] लिए अपनी पंचायते लगाते थे।

[03:09:19] यह जमीनी स्तर पर लोगों को आंदोलन से

[03:09:21] जोड़ने का एक बहुत शक्तिशाली मॉडल था

[03:09:23] और शिक्षा के क्षेत्र में जो हुआ वह भी

[03:09:25] कमाल का था। सतीश मुखर्जी की डॉन सोसाइटी

[03:09:28] और पुणे में तिलक की स्वदेशी प्रचारिणी

[03:09:31] सभा।

[03:09:32] फिर एक नेशनल एजुकेशन फंड भी बना। मतलब

[03:09:34] भारतीय अपनी शिक्षा व्यवस्था खुद बनाना

[03:09:36] चाहते थे।

[03:09:37] बिल्कुल। उनका मानना था कि अंग्रेजों की

[03:09:40] दी हुई शिक्षा भारतीयों को सिर्फ क्लर्क

[03:09:42] बनाती है। उनका आत्मसम्मान छीन लेती है।

[03:09:45] इसीलिए एक ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली

[03:09:48] की जरूरत महसूस की गई जो छात्रों को उनके

[03:09:51] इतिहास, उनकी संस्कृति से जोड़े और उनमें

[03:09:54] राष्ट्रवाद की भावना जगाए।

[03:09:55] और इसका नतीजा भी दिखा। 1905 में रंगपुर

[03:09:58] में पहला स्वदेशी कॉलेज खुला। फिर 1906

[03:10:00] में बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना हुई और

[03:10:03] यहां एक बहुत ही फैसनेटिंग डिटेल है। इसके

[03:10:05] पहले प्राचार्य थे अरविंद घोष, एक

[03:10:07] क्रांतिकारी विचारक, एक कॉलेज का

[03:10:09] प्रिंसिपल।

[03:10:10] हां, और यह दिखाता है कि उस दौर के नेता

[03:10:12] कितने बहुआयामी थे। अरविंद घोष सिर्फ एक

[03:10:15] राजनीतिक चिंतक नहीं थे बल्कि शिक्षा के

[03:10:18] जरिए राष्ट्र निर्माण का सपना ही देखते थे

[03:10:20] और इसी दौर में आंदोलन को एक और शक्तिशाली

[03:10:23] प्रतीक मिला। अवनींद्रनाथ टैगोर ने भारत

[03:10:26] माता का प्रसिद्ध चित्र बनाया। उस तस्वीर

[03:10:28] ने भारत की अमूर्त कल्पना को एक मां का

[03:10:31] रूप दे दिया। एक देवी का रूप जिसकी रक्षा

[03:10:33] के लिए उसके बच्चे कुछ भी कर सकते थे। यह

[03:10:36] एक तस्वीर हजारों भाषणों पर भारी पड़ी।

[03:10:38] जब यह आंदोलन इतना फैल रहा था, लोगों की

[03:10:41] भावनाओं से जुड़ रहा था तो जाहिर है

[03:10:43] ब्रिटिश सरकार चुप तो नहीं बैठी होगी।

[03:10:44] उन्होंने इसे रोकने के लिए क्या किया?

[03:10:46] सरकार ने दमन का रास्ता अपनाया और उनका

[03:10:49] सबसे पहला निशाना बने युवा और छात्र

[03:10:52] क्योंकि वही आंदोलन की जान थे। सरकार एक

[03:10:54] सर्कुलर लेकर आई जिसे कार्वलाइल सर्कुलर

[03:10:57] के नाम से जाना जाता है।

[03:10:58] यह क्या था? सुनने में तो किसी सरकारी

[03:11:00] आदेश जैसा लगता है।

[03:11:01] यह एक सीधी-सीधी धमकी थी। स्कूलों और

[03:11:04] कॉलेजों को आदेश दिया गया कि वे अपने

[03:11:07] छात्रों को आंदोलन से दूर रखें। वरना उनकी

[03:11:10] सरकारी मदद बंद कर दी जाएगी और उनकी

[03:11:12] मान्यता रद्द कर दी जाएगी। सोचिए छात्रों

[03:11:15] को अपने ही देश के लिए आवाज उठाने से

[03:11:17] रोकने के लिए उनकी पढ़ाई को दांव पर लगाया

[03:11:19] जा रहा था। और सिर्फ इतना ही नहीं वंदे

[03:11:21] मातरम का नारा लगाने पर भी पाबंदी लगा दी

[03:11:23] गई। यह तो अविश्वसनीय है। यह नारा तो

[03:11:25] आंदोलन की पहचान बन चुका था।

[03:11:27] हां, वंदे मातरम सिर्फ एक नारा नहीं बल्कि

[03:11:30] लोगों के दिलों की आवाज बन गया था। सरकार

[03:11:32] ने ऐलान किया कि जो कोई भी सार्वजनिक रूप

[03:11:35] से यह नारा लगाएगा उसे सरकारी नौकरी के

[03:11:38] लायक नहीं समझा जाएगा। इस तरह की दमनकारी

[03:11:41] नीतियों और फिर 1908 तक बड़े नेताओं की

[03:11:44] गिरफ्तारी जैसे तिलक और अरविंद घोष या

[03:11:47] बिपिन चंद्र पाल के राजनीति से सन्यास

[03:11:50] लेने के बाद यह आंदोलन धीरे-धीरे कमजोर

[03:11:53] पड़ गया।

[03:11:53] तो एक तरफ अंग्रेज स्वदेशी आंदोलन को कुचल

[03:11:56] रहे थे और दूसरी तरफ वे राजनीतिक शतरंज की

[03:11:59] एक और बिसात बिछा रहे थे। उन्हें पता था

[03:12:01] कि आंदोलन को तोड़ने का सबसे अच्छा तरीका

[03:12:04] उसे अंदर से बांटना है और इसी रणनीति की

[03:12:06] एक बड़ी मिसाल हमें 1906 में देखने को

[03:12:09] मिलती है जब मुस्लिम लीग की स्थापना हुई।

[03:12:11] यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मोड़ था।

[03:12:13] अक्टूबर 1906 में आगा खान और मोहसिन उल

[03:12:16] मुल्क के नेतृत्व में कुछ मुस्लिम अभिजात

[03:12:19] वर्ग के लोग वाइससरॉय मिंटो से शिमला में

[03:12:22] मिले। उन्होंने मिंटो के सामने अपनी कुछ

[03:12:24] मांगे रखी। और इसी मुलाकात का नतीजा था 30

[03:12:26] दिसंबर 1906 को ढाका में मुस्लिम लीग की

[03:12:29] स्थापना जिसके संस्थापक नवाब सलीमुल्ला

[03:12:32] खान थे। लेकिन उनकी सबसे बड़ी और सबसे

[03:12:34] विवादस्पद मांग क्या थी?

[03:12:35] उनकी सबसे प्रमुख मांग थी पृथक निर्वाचक

[03:12:39] मंडल यानी सेपरेट इलेक्टोरेट। इसका मतलब

[03:12:41] यह था कि मुस्लिम उम्मीदवारों के लिए वोट

[03:12:44] सिर्फ मुस्लिम मतदाता ही देंगे। यह एक

[03:12:46] बेहद खतरनाक विचार था क्योंकि यह पहली बार

[03:12:49] भारतीय समाज को राजनीतिक रूप से धर्म के

[03:12:52] आधार पर बांट रहा था। और अंग्रेजों ने इसे

[03:12:54] मान लिया।

[03:12:55] ना सिर्फ माना बल्कि वाइस मिंटो ने इसका

[03:12:58] स्वागत किया। उनकी बाटों और राज करो की

[03:13:02] नीति के लिए यह एक सुनहरा मौका था। इस

[03:13:04] मांग को 1909 के मोरले मिंटो सुधार एक्ट

[03:13:08] में कानूनी जामा पहना दिया गया। अनजाने

[03:13:10] में या जानबूझकर भारतीय राजनीति में

[03:13:13] सांप्रदायिक विभाजन के जो बीज उस दिन बोए

[03:13:15] गए, उसकी फसल हमें बाद के दशकों में काटनी

[03:13:18] पड़ी। एक हैरान करने वाली बात यह भी है कि

[03:13:21] मोहम्मद अली जिन्ना जो आगे चलकर मुस्लिम

[03:13:23] लीग का सबसे बड़ा चेहरा बने, वह इसकी

[03:13:25] स्थापना के समय इसके सदस्य नहीं थे। वह तो

[03:13:27] 1913 में इसमें शामिल हुए।

[03:13:28] हां, शुरुआती दौर में जिन्ना एक

[03:13:30] राष्ट्रवादी नेता थे और कांग्रेस के सदस्य

[03:13:33] थे। वह उस समय इस तरह की सांप्रदायिक

[03:13:36] राजनीति के पक्ष में नहीं थे। उनका बदलना

[03:13:39] भारतीय राजनीति के सबसे बड़े बदलावों में

[03:13:41] से एक है। लेकिन वह एक अलग कहानी है।

[03:13:44] तो अब कहानी में एक नया अध्याय शुरू होता

[03:13:46] है। स्वदेशी आंदोलन को कुचल दिया गया था।

[03:13:49] शांतिपूर्ण विरोध का रास्ता बंद होता दिख

[03:13:51] रहा था। ऐसे में युवाओं के एक वर्ग को लगा

[03:13:53] कि अब बात करने का नहीं बल्कि कुछ करने का

[03:13:56] वक्त है। यहीं से क्रांतिकारी गतिविधियों

[03:13:58] की शुरुआत होती है।

[03:13:59] बिल्कुल। और यहां एक बहुत जरूरी बात समझनी

[03:14:02] होगी। जब आप एक बड़े जन आंदोलन को ताकत से

[03:14:05] कुचल देते हैं तो आप संदेश देते हैं कि

[03:14:07] शांतिपूर्ण विरोध का कोई नतीजा नहीं

[03:14:09] निकलेगा। इसी हताशा और गुस्से से क्रांति

[03:14:12] का जम होता है। सरकार ने बातचीत का दरवाजा

[03:14:14] बंद किया तो युवाओं ने बम और पिस्तौल का

[03:14:17] रास्ता चुन लिया।

[03:14:18] और इसमें सबसे बड़ा नाम आता है अनुशीलन

[03:14:20] समिति का। इसकी शुरुआत तो एक व्यायामशाला

[03:14:22] यानी जिम के तौर पर हुई थी। है ना?

[03:14:24] हां। 1902 के आसपास कोलकाता और मिदनापुर

[03:14:28] में इसकी शुरुआत हुई। जहां युवाओं को लाठी

[03:14:31] चलाना, कसरत करना सिखाया जाता था। लेकिन

[03:14:34] इसका असली मकसद शरीर के साथ-साथ मन को भी

[03:14:37] मजबूत करना और उन्हें देश के लिए तैयार

[03:14:40] करना था। 1907 में यह एक संगठित

[03:14:43] क्रांतिकारी संस्था बन गई और इसका नारा था

[03:14:46] खून के बदले खून।

[03:14:47] इसके पीछे कौन लोग थे? बरिंद्र कुमार घोष

[03:14:49] और भूपेंद्रनाथ दत्त जो स्वामी विवेकानंद

[03:14:52] के भाई थे। यह नाम ही अपने आप में बहुत

[03:14:54] कुछ कहते हैं।

[03:14:54] यह सिर्फ जोशीले युवा नहीं थे बल्कि पढ़े

[03:14:57] लिखे और वैचारिक रूप से बहुत स्पष्ट लोग

[03:15:00] थे। उन्होंने 1906 में युगांतर नाम की एक

[03:15:03] पत्रिका भी शुरू की जो खुलकर ब्रिटिश राज

[03:15:06] के खिलाफ सशस्त्र क्रांति की वकालत करती

[03:15:09] थी और उनका संगठन सिर्फ बंगाल तक सीमित

[03:15:12] नहीं रहा। 1913 में सचिंद्र सान्याल ने

[03:15:15] पटना में भी इसकी एक शाखा खोली।

[03:15:17] इनकी तैयारी का स्तर क्या था? क्या यह

[03:15:19] सिर्फ कुछ गुस्से वाले नौजवान थे या कोई

[03:15:21] पूरी योजना थी? रूप से बम बनाने की कला

[03:15:24] सीखने के लिए पेरिस भेजा था। वहां

[03:15:26] उन्होंने रूसी क्रांतिकारियों से ट्रेनिंग

[03:15:28] ली और वापस आकर कोलकाता के मणिकतला में एक

[03:15:31] गुप्त बम फैक्ट्री शुरू की। यह दिखाता है

[03:15:33] कि वह इसे कितनी गंभीरता से ले रहे थे।

[03:15:36] और इसी फैक्ट्री का भंडाफोड़ हुआ। अलीपुर

[03:15:38] षड्यंत्र मामले में 1908 में पुलिस ने

[03:15:41] छापा मारा और अरविंद घोष समेत 38 लोगों को

[03:15:44] गिरफ्तार कर लिया। यह तो क्रांतिकारियों

[03:15:45] के लिए एक बहुत बड़ा झटका रहा होगा।

[03:15:47] बहुत बड़ा। लेकिन इसी केस में एक ऐसी घटना

[03:15:50] हुई जिसने सबको हिला कर रख दिया। केस का

[03:15:52] मुख्य सरकारी गवाह था नरेंद्र गोसाई जो

[03:15:56] पहले क्रांतिकारी था पर बाद में मुखबिर बन

[03:15:58] गया। जेल के अंदर ही कन्हाई लाल दत्त और

[03:16:01] सत्येंद्रनाथ बोस ने उसकी गोली मारकर

[03:16:03] हत्या कर दी।

[03:16:04] जेल के अंदर यह कैसे मुमकिन हुआ?

[03:16:06] उन्होंने किसी तरह जेल में रिवाल्वर

[03:16:09] पहुंचाई और गोसाई को बहाने से बुलाकर मार

[03:16:12] डाला। यह एक साफ संदेश था गद्दारी की सजा

[03:16:15] मौत है। यह दिखाता है कि वह अपने संगठन के

[03:16:18] राज बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते

[03:16:21] थे।

[03:16:21] इस केस में अरविंद घोष का बचाव मशहूर वकील

[03:16:24] चित्रंजन दास ने किया और उन्हें बरी भी

[03:16:26] करा लिया। लेकिन इस घटना का अरविंद घोष पर

[03:16:28] बहुत गहरा असर पड़ा।

[03:16:30] हां, जेल में बिताए समय ने उन्हें पूरी

[03:16:32] तरह बदल दिया। उनका राजनीति से मोह भंग हो

[03:16:35] गया। रिहा होने के बाद वह पोंडीचेरी चले

[03:16:37] गए और योगी बन गए। उन्होंने अपना बाकी

[03:16:40] जीवन, आध्यात्म और दर्शन को समर्पित कर

[03:16:42] दिया। भारतीय राजनीति ने एक बहुत बड़ा और

[03:16:45] प्रतिभाशाली दिमाग खो दिया।

[03:16:46] और इसी दौर की एक और घटना है जो आज भी

[03:16:49] रोंगटे खड़े कर देती है। मुजफ्फरपुर

[03:16:51] बमकांड और खुदीराम बोस की शहादत।

[03:16:53] 30 अप्रैल 1908 दो युवा क्रांतिकारी

[03:16:56] खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने

[03:16:59] मुजफ्फरपुर के जालिम जज किंग्सफोर्ड को

[03:17:01] मारने की योजना बनाई। उन्होंने शाम को

[03:17:03] किंग्सफोर्ड की बग्गी पर बम फेंका। यह सोच

[03:17:06] कर कि जज उसमें है।

[03:17:07] लेकिन गाड़ी में किंग्सफोर्ड था ही नहीं।

[03:17:09] नहीं दुर्भाग्य से उस बग्गी में दो

[03:17:12] ब्रिटिश महिलाएं मिसेस और मिस केनेडी थी

[03:17:15] जिनकी इस हमले में मौत हो गई।

[03:17:17] यह एक बहुत बड़ी गलती थी।

[03:17:18] इसके बाद पुलिस उनके पीछे लग गई।

[03:17:20] प्रफुल चाकी ने पकड़े जाने से पहले ही खुद

[03:17:22] को गोली मार ली। उन्होंने शहीद होना चुना।

[03:17:24] गिरफ्तार होना नहीं।

[03:17:25] और खुदीराम बोस?

[03:17:26] खुदीराम बोस पकड़े गए। उन पर मुकदमा चला

[03:17:29] और फांसी की सजा सुनाई गई। 11 अगस्त 1908

[03:17:31] को जब उन्हें फांसी दी गई तो उनकी उम्र थी

[03:17:34] सिर्फ 18 साल 9 महीने।

[03:17:36] सिर्फ 18 साल 9 महीने।

[03:17:38] यह सोचना भी मुश्किल है। इस उम्र में कोई

[03:17:39] देश के लिए फांसी पर चढ़ गया। इस एक घटना

[03:17:42] ने उस समय के युवाओं पर क्या असर डाला

[03:17:44] होगा।

[03:17:44] खुद ही राम बोस एक प्रतीक बन गए। वह उस

[03:17:47] पीढ़ी के बलिदान का चेहरा बन गए जो आजादी

[03:17:50] के लिए अपनी जान हंसते-हंसते देने को

[03:17:52] तैयार थी। उनकी शहादत ने बंगाल और पूरे

[03:17:55] भारत में क्रांति की आग को और भड़का दिया।

[03:17:58] अभिनव भारत सोसाइटी इसकी शुरुआत कहां से

[03:18:01] और कैसे हुई? सुनने में आता है कि इसकी

[03:18:03] जड़े एक और पुराने संगठन में है।

[03:18:06] हां, इसकी कहानी 1899 में नासिक में शुरू

[03:18:09] होती है। मित्रमेला नाम के एक गुप्त संगठन

[03:18:11] से। इसे तीन भाइयों ने मिलकर शुरू किया

[03:18:13] था। गणेश दामोदर, विनायक दामोदर जिन्हें

[03:18:16] हम वि डी सावरकर के नाम से जानते हैं और

[03:18:18] नारायण दामोदर सावरकर। शुरुआत में यह एक

[03:18:20] छोटा सा समूह था जो त्यौहारों के बहाने

[03:18:23] युवाओं को इकट्ठा करता था। लेकिन इरादे

[03:18:24] बड़े थे। वि डी सावरकर का नाम आज भी

[03:18:27] राजनीति में काफी सुनाई देता है और स्रोत

[03:18:29] भी बताते हैं कि कैसे उनके व्यक्तित्व को

[03:18:32] लेकर दो अलग-अलग तरह की राय हैं। एक पक्ष

[03:18:35] उन्हें नायक मानता है तो दूसरा उन पर सवाल

[03:18:37] उठाता है।

[03:18:38] हां और यह बहस काफी गहरी है। लेकिन आज हम

[03:18:40] स्रोतों के आधार पर उनके शुरुआती

[03:18:42] क्रांतिकारी जीवन पर ध्यान देंगे। तो हुआ

[03:18:44] यह कि 1904 में यही मित्र मेला एक ज्यादा

[03:18:47] संगठित और बड़े रूप में सामने आया और इसका

[03:18:50] नाम पड़ा अभिनव भारत सोसाइटी और इसकी

[03:18:52] प्रेरणा का स्रोत बहुत दिलचस्प है।

[03:18:54] कहां से? इटली का एक क्रांतिकारी जुसेपे

[03:18:56] मेजिनी

[03:18:56] मेजनी जिसने यंग इटली बनाया था उसका तो एक

[03:19:00] ही मकसद था सशस्त्र विद्रोह के जरिए इटली

[03:19:03] को एक करना तो क्या अभिनव भारत भी इसी

[03:19:06] रास्ते पर चल रहा था

[03:19:07] बिल्कुल मैजिनी की जीवनी सावरकर ने मराठी

[03:19:10] में लिखी थी और वह बहुत लोकप्रिय हुई| यंग

[03:19:12] इटली की तरह अभिनव भारत का भी मानना था कि

[03:19:14] सिर्फ याचिकाओं और भाषणों से आजादी नहीं

[03:19:17] मिलेगी इसके लिए सशस्त्र क्रांति करनी

[03:19:19] पड़ेगी लेकिन इस विचार को असली उड़ान तब

[03:19:22] मिली जब 1905 में वि डी सावरकर कानून की

[03:19:25] पढ़ाई के लिए लंदन चले गए

[03:19:26] और लंदन में उन्हें एक बना बनाया मंच मिल

[03:19:29] गया है ना इंडिया हाउस के रूप में

[03:19:31] सही कहा इंडिया हाउस उस समय लंदन में

[03:19:33] भारतीय क्रांतिकारियों का गढ़ था इसकी

[03:19:35] स्थापना 1905 में श्यामजी कृष्ण वर्मा ने

[03:19:38] की थी यह बाहर से तो भारतीय छात्रों के

[03:19:40] लिए एक हॉस्टल जैसा दिखता था लेकिन अंदर

[03:19:42] यहां आजादी की योजनाएं बनती थी। सांवरकर

[03:19:44] वहां मदन लाल ढींगरा और लाला हरदयाल जैसे

[03:19:47] जोशीले क्रांतिकारियों से मिले और जल्द ही

[03:19:49] उस समूह के वैचारिक नेता बन गए। इंडिया

[03:19:52] हाउस सुनने में बड़ा साधारण नाम है लेकिन

[03:19:55] काम असाधारण हो रहे थे। जाहिर है ब्रिटिश

[03:19:57] सरकार को इसकी भनक लगी होगी।

[03:19:59] जरूर लगी। जब इंडिया हाउस की गुप्त सभाओं

[03:20:01] की खबरें ब्रिटिश सरकार तक पहुंची तो

[03:20:03] उन्होंने कर्नल विलियम कर्जन वाइली नाम के

[03:20:05] एक अधिकारी को इनकी जासूसी पर लगा दिया।

[03:20:07] वायली भारतीय छात्रों से दोस्ती करके उनके

[03:20:10] राज जानने की कोशिश करता था।

[03:20:11] लेकिन क्रांतिकारियों ने शायद इस जासूसी

[03:20:13] का जवाब देने का फैसला कर लिया।

[03:20:15] और जवाब बहुत सीधा और हिंसक था। 1 जुलाई

[03:20:18] 1909 को मदन लाल ढींगरा ने लंदन में एक

[03:20:21] सार्वजनिक कार्यक्रम में कर्नल वायली को

[03:20:23] गोली मार दी। यह ब्रिटिश धरती पर किसी

[03:20:25] बड़े ब्रिटिश अधिकारी की हत्या की पहली

[03:20:27] क्रांतिकारी घटनाओं में से एक थी। ढींगरा

[03:20:29] को 16 अगस्त 1909 को फांसी दे दी गई। इस

[03:20:31] घटना ने पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को हिला

[03:20:33] कर रख दिया।

[03:20:34] तो लंदन में हुई इस एक हत्या का भारत में

[03:20:37] चल रहे आंदोलन पर क्या असर पड़ा? सावरकर

[03:20:39] पर भी तो आरोप लगे थे।

[03:20:40] सावरकर पर हत्या के लिए उकसाने का आरोप

[03:20:43] लगा। लेकिन सबूतों की कमी की वजह से वह उस

[03:20:45] मामले में बरी हो गए। लेकिन कहानी यहीं

[03:20:47] खत्म नहीं हुई। असल में इसी दौरान सावरकर

[03:20:49] ने गुप्त रूप से 20 ब्राउनिंग पिस्तल भारत

[03:20:52] भिजवाई थी। यह एक बहुत बड़ा कदम था।

[03:20:54] मतलब यह नेटवर्क कितना मजबूत था कि लंदन

[03:20:57] में बैठकर बनाई गई योजना का असर हजारों

[03:21:00] मील दूर नासिक की अदालत में होने वाला था।

[03:21:03] यह कोई छोटा-मोटा स्थानीय गुट नहीं था।

[03:21:05] बिल्कुल।

[03:21:05] उन्हीं पिस्टलों में से एक का इस्तेमाल

[03:21:07] नासिक षड्यंत्र में हुआ। हुआ यह था कि

[03:21:09] नासिक में सावरकर के बड़े भाई गणेश को

[03:21:12] क्रांतिकारी कविताएं लिखने के आरोप में जज

[03:21:14] जैक्सन ने काला पानी की सजा सुना दी थी।

[03:21:17] इसका बदला लेने के लिए अभिनव भारत के एक

[03:21:19] सदस्य लक्ष्मण अनंत कन्हैरे ने 21 दिसंबर

[03:21:22] 1909 को जज जैक्सन की हत्या कर दी।

[03:21:25] और जब जांच हुई तो हथियार का कनेक्शन सीधे

[03:21:28] लंदन

[03:21:28] और वी डी सावरकर से जुड़ गया।

[03:21:30] एकदम सही।

[03:21:31] अच्छा। जब पता चला कि हत्या में इस्तेमाल

[03:21:33] हुई पिस्तल वही है जो सावरकर ने भेजी थी

[03:21:36] तो उन्हें 1910 में लंदन में गिरफ्तार कर

[03:21:39] लिया गया। उन्हें पानी के जहाज से भारत

[03:21:41] लाया जा रहा था जब उन्होंने फ्रांस के

[03:21:43] मार्शल बंदरगाह के पास जहाज से समुद्र में

[03:21:45] छलांग लगाकर भागने की कोशिश की।

[03:21:47] अरे वाह

[03:21:48] लेकिन पकड़े गए। उन पर नासिक षड्यंत्र का

[03:21:50] मुकदमा चला और उन्हें अंडमान की सेलुलर

[03:21:53] जेल भेज दिया गया जिसे काला पानी कहते

[03:21:56] हैं। उन्हें 50 साल की सजा हुई थी। लेकिन

[03:21:58] 1921 में वे कुछ शर्तों पर रिहा हुए। तो

[03:22:00] सावरकर के जेल जाने के बाद क्या अभिनव

[03:22:03] भारत का प्रभाव खत्म हो गया या इस आग की

[03:22:05] चिंगारियां कहीं और भी तो फैल रही थी?

[03:22:07] चिंगारियां फैल रही थी और एक नई जगह पर एक

[03:22:09] बड़ा धमाका होने वाला था। 1912 में केंद्र

[03:22:12] अब महाराष्ट्र से हटकर दिल्ली पहुंच चुका

[03:22:14] था। इसे दिल्ली षड्यंत्र मामला कहा जाता

[03:22:17] और इसके पीछे जो दिमाग था वो थे रास

[03:22:18] बिहारी बोस।

[03:22:19] अच्छा यह वो समय था जब अंग्रेजों ने अपनी

[03:22:22] राजधानी कोलकाता से दिल्ली शिफ्ट की थी।

[03:22:24] हां। 1911 में यह घोषणा हुई थी 23 दिसंबर

[03:22:27] 1912 को जब भारत का नया वायसरॉय लॉर्ड

[03:22:30] हार्डिंग द्वितीय एक भव्य जुलूस में हाथी

[03:22:33] पर बैठकर

[03:22:33] दिल्ली के चांदनी चौक से गुजर रहा था

[03:22:36] जी तो उसी वक्त उस पर बम फेंका गया।

[03:22:38] स्रोत में एक बहुत ही दिलचस्प डिटेल है।

[03:22:41] बताया गया है कि बम फेंकने वाले

[03:22:43] क्रांतिकारी बसंत कुमार विश्वास ने भीड़

[03:22:46] में किसी को शक ना हो इसलिए एक महिला का

[03:22:49] वेश धारण किया हुआ था। हालांकि इस हमले

[03:22:51] में वायसरॉय हार्डिंग घायल तो हुआ लेकिन

[03:22:53] बच गया। और इस हमले की गूंज सिर्फ दिल्ली

[03:22:56] में नहीं बल्कि हजारों मील दूर अमेरिका और

[03:22:58] कनाडा में सुनाई दी। जहां बैठे भारतीय इसे

[03:23:01] एक संकेत के तौर पर देख रहे थे।

[03:23:03] यानी एक घटना की गूंज ने एक पूरे नए

[03:23:05] आंदोलन को जन्म दे दिया।

[03:23:06] बिल्कुल। यहीं से गदर पार्टी की नींव

[03:23:08] पड़ी। उस समय कनाडा और अमेरिका में हजारों

[03:23:11] भारतीय ज्यादातर पंजाबी सिख काम करने गए

[03:23:14] थे। लेकिन वहां उन्हें भयानक नस्लीय

[03:23:15] भेदभाव का सामना करना पड़ता था। उन्हें

[03:23:17] समझ आ गया था कि जब तक उनका अपना देश

[03:23:19] गुलाम है उन्हें कहीं भी इज्जत नहीं

[03:23:21] मिलेगी। इसी गुस्से और बेचैनी को लाला

[03:23:23] हरदयाल जैसे नेताओं ने एक संगठन का रूप

[03:23:25] दिया।

[03:23:26] और 1913 में सैन फ्रांसिस्को में गदर

[03:23:28] पार्टी की स्थापना हुई। गदर नाम ही अपने

[03:23:30] आप में बहुत कुछ कहता है।

[03:23:32] हां, उन्होंने एक अखबार भी शुरू किया

[03:23:33] जिसका नाम गदर था। उसके पहले पन्ने पर

[03:23:35] लिखा होता था अंग्रेजी राज का दुश्मन।

[03:23:37] उनका मकसद साफ था भारत में जाकर सशस्त्र

[03:23:40] विद्रोह करना और अंग्रेजों को बाहर

[03:23:42] निकालना। उनका एक ही नारा था जंग द होका

[03:23:45] यानी युद्ध का ऐलान।

[03:23:46] तो गदर पार्टी विदेशों में भारत की आजादी

[03:23:49] के लिए माहौल बना रही थी। लेकिन फिर 1914

[03:23:51] में एक ऐसी घटना हुई जिसने उनके गुस्से को

[03:23:54] और भड़का दिया। मैं कोमागाटा मारू की बात

[03:23:57] कर रही हूं।

[03:23:57] कोमागाटा मारू की घटना सिर्फ एक राजनीतिक

[03:24:00] नाकामी नहीं थी। यह एक मानवीय त्रासदी थी।

[03:24:02] यह एक जापानी जहाज था जिसे एक भारतीय

[03:24:04] व्यवसाय गुरदीप सिंह ने किराए पर लिया था।

[03:24:06] यह 376 भारतीयों को लेकर कनाडा के वैंकवर

[03:24:09] जा रहा था। यह लोग बेहतर भविष्य की तलाश

[03:24:12] में निकले थे।

[03:24:12] लेकिन कनाडा में उनके साथ जो हुआ, उसकी

[03:24:14] उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी। की

[03:24:16] नहीं कनाडा सरकार ने जो उस समय ब्रिटिश

[03:24:18] साम्राज्य का ही हिस्सा थी। ब्रिटिश दबाव

[03:24:20] में आकर जहाज को बंदरगाह में घुसने ही

[03:24:22] नहीं दिया। उन्होंने नए कानून बना दिए थे

[03:24:24] जो भारतीयों का आना लगभग नामुमकिन कर देते

[03:24:26] थे। 2 महीने तक जहाज समुद्र में खड़ा रहा।

[03:24:29] यात्रियों के पास खाना पानी खत्म हो रहा

[03:24:30] था लेकिन उन्हें उतरने नहीं दिया गया।

[03:24:32] और आखिर में उन्हें वापस लौटना पड़ा।

[03:24:34] हां। और जब 2 महीने की उस भयानक यात्रा के

[03:24:37] बाद जहाज कोलकाता के बजब बंदरगाह पर

[03:24:40] पहुंचा तो ब्रिटिश पुलिस को शक था कि यह

[03:24:42] सब गदर पार्टी के क्रांतिकारी हैं।

[03:24:44] उन्होंने यात्रियों को जबरदस्ती ट्रेन में

[03:24:46] बिठाकर पंजाब भेजने की कोशिश की। जब

[03:24:48] यात्रियों ने इंकार किया तो पुलिस ने उनके

[03:24:50] गोलियां चला दी जिसमें करीब 22 लोग मारे

[03:24:52] गए।

[03:24:52] सोचिए उन लोगों के बारे में जो एक बेहतर

[03:24:55] जिंदगी के लिए निकले थे और अपने ही देश

[03:24:57] में गोलियों का सामना करना पड़ा। इस घटना

[03:24:59] ने गदर आंदोलन के गुस्से को एक निजी स्तर

[03:25:02] पर पहुंचा दिया। और इसी गुस्से के बीच

[03:25:04] उन्हें एक मौका भी नजर आया। प्रथम विश्व

[03:25:06] युद्ध, सही समय पर सही चोट। 1914 में पहला

[03:25:09] विश्व युद्ध शुरू हो गया। गदर पार्टी के

[03:25:11] नेताओं को लगा कि यह सुनहरा मौका है।

[03:25:13] ब्रिटेन की ज्यादातर सेना यूरोप में लड़ने

[03:25:16] चली गई थी। भारत लगभग खाली था। उन्होंने

[03:25:18] नारा दिया, ब्रिटेन का दुश्मन हमारा दोस्त

[03:25:20] है। हजारों गदर क्रांतिकारी अमेरिका और

[03:25:22] कनाडा से अपनी जमीन जायदाद बेचकर भारत के

[03:25:25] लिए निकल पड़े। उनकी योजना पंजाब में जाकर

[03:25:27] एक बड़े विद्रोह को अंजाम देने की थी। और

[03:25:29] इस विद्रोह का नेतृत्व करने के लिए उन्हें

[03:25:31] एक अनुभवी नेता भी मिल गया। रास बिहारी

[03:25:34] बोस जो दिल्ली षड्यंत्र के बाद से छिपे

[03:25:36] हुए थे।

[03:25:37] हां, रास बिहारी बोस ने पंजाब पहुंचकर इन

[03:25:40] क्रांतिकारियों को संगठित किया। 21 फरवरी

[03:25:42] 1915 की तारीख पूरे उत्तर भारत में एक साथ

[03:25:46] विद्रोह के लिए तय की गई। योजना थी कि

[03:25:48] छावनियों में भारतीय सैनिकों को साथ

[03:25:50] मिलाकर अंग्रेज अधिकारियों को खत्म कर

[03:25:52] दिया जाएगा। योजना बहुत बड़ी थी।

[03:25:54] लेकिन क्या वे सफल हुए? सुनने में तो यह

[03:25:56] एक पूरी तरह से तय जीत लगती है।

[03:25:58] हम नहीं योजना सफल नहीं हो पाई। ब्रिटिश

[03:26:00] सरकार का खुफिया तंत्र बहुत मजबूत था। एक

[03:26:03] भेदिए ने विद्रोह की सारी जानकारी

[03:26:05] अंग्रेजों तक पहुंचा दी। तारीख आने से

[03:26:07] पहले ही उन्होंने गदर नेताओं को गिरफ्तार

[03:26:09] करना शुरू कर दिया। छावनियों में भारतीय

[03:26:11] सैनिकों से हथियार छीन लिए गए। आंदोलन को

[03:26:13] बेरहमी से कुचल दिया गया। सैकड़ों लोगों

[03:26:15] पर मुकदमे चले। कई को फांसी हुई और कईयों

[03:26:18] को काला पानी भेजा गया। रास बिहारी बोस

[03:26:20] किसी तरह बचकर जापान भागने में सफल रहे।

[03:26:23] 1916 तक गदर आंदोलन लगभग खत्म हो गया।

[03:26:26] तो गदर आंदोलन के कुचले जाने के बाद

[03:26:28] क्रांतिकारियों के बीच एक एहसास था कि

[03:26:30] सिर्फ हथियार और विदेशी मदद काफी नहीं है।

[03:26:33] शायद इसी खालीपन को भरने के लिए एक नए कम

[03:26:36] हिंसक लेकिन राजनीतिक रूप से ज्यादा मुखर

[03:26:39] आंदोलन की जमीन तैयार हुई।

[03:26:41] यहीं से संघर्ष का तरीका बदलता है। जब

[03:26:43] सशस्त्र क्रांति का रास्ता बंद होता दिखा

[03:26:45] तो दो बड़े नेताओं ने एक नया रास्ता

[03:26:48] दिखाया। यह थे बाल गंगाधर तिलक जो मांडले

[03:26:50] जेल से सजा काट कर लौटे थे और एक आयरिश

[03:26:53] महिला एनी बेसेंट जो भारत को अपना घर

[03:26:55] मानती थी। इन दोनों ने 1916 में होमरूल

[03:26:58] आंदोलन की शुरुआत की।

[03:26:59] होमरूल यानी स्वशासन लेकिन इनका स्वशासन

[03:27:02] का विचार गदर पार्टी की पूरी आजादी के

[03:27:05] विचार से अलग था। है ना?

[03:27:06] हां, यह एक बड़ा रणनीतिक बदलाव था। होमरूल

[03:27:09] का मतलब पूर्ण स्वतंत्रता नहीं था। इसका

[03:27:11] उद्देश्य था ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर

[03:27:13] रहते हुए स्वशासन हासिल करना। ठीक वैसे ही

[03:27:16] जैसे कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड को

[03:27:18] मिलावत। मतलब देश के आंतरिक मामले भारतीय

[03:27:21] चलाएंगे लेकिन देश रहेगा ब्रिटिश क्राउन

[03:27:24] के अधीन।

[03:27:25] यह एक ऐसा लक्ष्य था जो नरम दल और गरम दल

[03:27:28] दोनों तरह के लोगों को स्वीकार्य हो सकता

[03:27:30] था।

[03:27:30] यह दिलचस्प है कि तिलक और बेसेंट दोनों एक

[03:27:33] ही आंदोलन चला रहे थे, लेकिन अलग-अलग क्या

[03:27:35] उनके तरीकों में कोई बुनियादी फर्क था? या

[03:27:38] सिर्फ एक रणनीतिक बंटवारा था?

[03:27:40] यह एक बहुत अच्छा सवाल है। असल में यह एक

[03:27:42] रणनीतिक बंटवारा ही था। दोनों एक दूसरे का

[03:27:44] सम्मान करते थे, लेकिन दोनों के समर्थकों

[03:27:46] में कुछ मतभेद थे। इसलिए उन्होंने

[03:27:48] अपने-अपने कार्यक्षेत्र बांट लिए। तिलक ने

[03:27:50] पुणे में अपनी लीग बनाई जिसका प्रभाव

[03:27:52] महाराष्ट्र और कर्नाटक तक सीमित था। एनी

[03:27:54] बेसेंट ने मद्रास में अपनी लीग बनाई जो

[03:27:56] बाकी पूरे भारत में काम कर रही थी।

[03:27:58] तो क्या यह एक तरह से पीछे हटना था बम और

[03:28:01] पिस्तौल से हटकर अखबारों और सभाओं पर आ

[03:28:04] जाना।

[03:28:05] इसे पीछे हटना नहीं बल्कि रणनीति का विकास

[03:28:07] कहना ज्यादा सही होगा। उन्होंने समझा कि

[03:28:09] क्रांति के लिए जमीन तैयार करनी पड़ती है।

[03:28:12] उनका तरीका था सभाएं करना, पर्चे बांटना

[03:28:14] और अखबारों के जरिए होम रूल के विचार को

[03:28:16] घर-घर तक पहुंचाना। तिलक के अखबार थे

[03:28:18] केसरी और मराठा और बेसन के अखबार थे

[03:28:20] कॉमनवील और न्यू इंडिया। उन्होंने भारत के

[03:28:23] उन पढ़े लिखे मध्यवर्ग को राजनीति से

[03:28:25] जोड़ा जो बम और पिस्तौल की राजनीति से दूर

[03:28:27] रहते थे।

[03:28:28] तो क्या हम कह सकते हैं कि इस आंदोलन ने

[03:28:31] भारत की आजादी की लड़ाई का राजनीतिक

[03:28:34] चरित्र तय कर दिया। काफी हद तक इस आंदोलन

[03:28:36] ने राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई ऊर्जा दी।

[03:28:39] जब 1917 में ब्रिटिश सरकार ने घबराकर एनी

[03:28:42] बेसेंट को गिरफ्तार कर लिया तो पूरे देश

[03:28:45] में उनके समर्थन में ऐसी लहर उठी कि सरकार

[03:28:47] को उन्हें छोड़ना पड़ा। यह दिखाता है कि

[03:28:50] आंदोलन ने लोगों में राजनीतिक चेतना जगा

[03:28:52] दी थी। अंत में 1920 में यह आंदोलन अखिल

[03:28:55] भारतीय होमरूल लीग के रूप में एक हो गया

[03:28:58] और महात्मा गांधी को इसका अध्यक्ष चुना

[03:29:00] गया। कुछ समय बाद इसका कांग्रेस में विलय

[03:29:03] हो गया और इसने कांग्रेस को संघर्ष के लिए

[03:29:05] एक मजबूत आधार दिया।

[03:29:09] शुरुआत करते हैं उस कानून से जिसने इस

[03:29:11] पूरे घटनाक्रम की नींव रखी रेलेट एक्ट।

[03:29:15] ठीक है? तो इस रेलेट एक्ट को विस्तार से

[03:29:17] समझते हैं। इसका एक और नाम भी था द

[03:29:19] अनारकिकल एंड रेवोल्यूशनरी क्राइम एक्ट।

[03:29:23] सुनने में ही काफी भारी लगता है।

[03:29:25] यह नाम ही इसके मकसद को साफ करता है। इसे

[03:29:28] 19 मार्च 1919 को वॉइसरॉय चेम्सफोर्ड के

[03:29:32] समय में लागू किया गया था। यह सर सिडनी

[03:29:34] रॉलेट की अध्यक्षता वाली एक समिति की

[03:29:36] रिपोर्ट पर आधारित था।

[03:29:37] अच्छा

[03:29:37] और इसका मुख्य उद्देश्य था भारत में बढ़

[03:29:40] रहे क्रांतिकारी आंदोलनों को कुचलना।

[03:29:42] और इसी वजह से गांधी जी ने इसे बिना अपील,

[03:29:45] बिना दलील, बिना वकील का कानून कहा था।

[03:29:48] इसका असल में क्या मतलब था? मतलब आम लोगों

[03:29:51] के लिए इसके क्या मायने थे?

[03:29:52] इसका मतलब था कि सरकार किसी भी भारतीय को

[03:29:55] सिर्फ शक के आधार पर गिरफ्तार कर सकती थी।

[03:29:57] सिर्फ शक के आधार पर?

[03:29:58] जी। ना कोई अपील करने का अधिकार था, ना

[03:30:00] वकील रखने का और सजा एक गुप्त अदालत

[03:30:03] सुनाती थी जो 2 साल तक की हो सकती थी।

[03:30:05] 2 साल तक?

[03:30:06] हां। यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों का

[03:30:08] पूरी तरह से हनन था। तभी तो मदन मोहन

[03:30:11] मालवीय जी ने इसे भारत की आत्मा का अपमान

[03:30:13] कहा था।

[03:30:14] तो जाहिर है इस तरह के कानून का जबरदस्त

[03:30:16] विरोध हुआ होगा। यह विरोध कैसे शुरू हुआ

[03:30:19] और कैसे इसने एक बड़े आंदोलन का रूप लिया?

[03:30:21] इसकी शुरुआत हुई 6 अप्रैल 1919 को। गांधी

[03:30:25] जी के आह्वान पर साबरमती आश्रम से एक

[03:30:27] देशव्यापी हड़ताल शुरू की गई

[03:30:29] हम

[03:30:29] और इस दिन को राष्ट्रीय निरादर दिवस के

[03:30:32] रूप में घोषित किया गया

[03:30:33] और पंजाब में हालात कुछ ज्यादा ही गंभीर

[03:30:35] हो गए हैं ना स्रोत में डॉक्टर सत्यपाल और

[03:30:37] सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी का जिक्र है

[03:30:40] बिल्कुल 9 अप्रैल को रामनवमी के दिन पंजाब

[03:30:43] में हिंदू मुस्लिम एकता का एक बहुत बड़ा

[03:30:45] जुलूस निकला जिससे अंग्रेजी सरकार सच में

[03:30:47] घबरा गई

[03:30:48] अच्छा

[03:30:48] अगले ही दिन 10 अप्रैल को उन्होंने पंजाब

[03:30:50] के दो बड़े नेताओं डॉक्टर सत्यपाल और

[03:30:53] डॉक्टर सैफुद्दीन किचलू को गिरफ्तार कर

[03:30:55] लिया

[03:30:55] और गांधी जी को भी

[03:30:57] हां इसी बीच 9 अप्रैल को गांधी जी को भी

[03:31:00] पलवल मतलब हरियाणा में गिरफ्तार कर लिया

[03:31:02] गया था तो इन गिरफ्तारियों ने आग में घी

[03:31:04] का काम किया

[03:31:05] और फिर सरकार ने दमन का रास्ता अपनाया

[03:31:07] हां 11 अप्रैल को पूरे पंजाब में मार्शल

[03:31:10] लॉ लागू कर दिया गया

[03:31:12] मार्शल लॉ

[03:31:13] मतलब

[03:31:13] मतलब

[03:31:14] चार से ज्यादा लोगों के एक साथ इकट्ठा

[03:31:16] होने पर पाबंदी लगा दी गई| यहां दो

[03:31:18] अंग्रेज अधिकारी मुख्य थे। एक पंजाब का

[03:31:20] लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओडायर और दूसरा

[03:31:23] सैन्य कमांडर ब्रिगेडियर जनरल आर डायर

[03:31:26] ओडायर और डायर

[03:31:27] जी प्रशासन की जिम्मेदारी ओडायर की थी

[03:31:29] जिसने भीड़ को नियंत्रित करने का काम जनरल

[03:31:32] डायर को सौंप दिया था

[03:31:33] और यहीं से हम भारतीय इतिहास के सबसे काले

[03:31:37] दिनों में से एक पर पहुंचते हैं। 13

[03:31:39] अप्रैल 1919 जलियांवाला बाग उस दिन वहां

[03:31:42] क्या हुआ था?

[03:31:43] वह बैसाखी का दिन था। लगभग 20,000 लोग

[03:31:46] अपने नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में

[03:31:48] शांतिपूर्वक सभा करने के लिए जलियांवाला

[03:31:50] बाग में इकट्ठा हुए थे।

[03:31:52] 20,000 लोग

[03:31:53] जी। और यह बाग चारों तरफ से दीवारों से

[03:31:55] घिरा था और बाहर निकलने का रास्ता बहुत ही

[03:31:58] संकरा था।

[03:31:58] और तभी जनरल डायर वहां पहुंचता है। श्रोत

[03:32:01] में जो विवरण है वो वो तो दिल दहला देने

[03:32:04] वाला है।

[03:32:05] जनरल डायर 90 सैनिकों के साथ वहां पहुंचा।

[03:32:07] उसने बाहर निकलने का रास्ता बंद कर दिया

[03:32:10] और और बिना किसी चेतावनी के भीड़ पर

[03:32:12] गोलियां चलाने का आदेश दे दिया। बिना

[03:32:14] चेतावनी के

[03:32:15] हां 10 मिनट तक लगातार 1650 राउंड गोलियां

[03:32:18] चली।

[03:32:19] 1650 राउंड

[03:32:20] जी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 379 लोग

[03:32:23] मारे गए लेकिन असली संख्या कहीं ज्यादा

[03:32:26] थी। कई लोगों ने तो जान बचाने के लिए बाग

[03:32:28] में बने कुएं में छलांग लगा दी।

[03:32:29] इस घटना के बाद की प्रतिक्रियाएं भी बहुत

[03:32:31] महत्वपूर्ण है। जैसे रविंद्रनाथ टैगोर ने

[03:32:34] अपनी नाइटहुड की उपाधि लौटा दी।

[03:32:36] हां, टैगोर ने इसे सभ्य सरकार द्वारा की

[03:32:39] गई असभ्य घटना कहा। हम्म।

[03:32:40] गांधी जी और सरोजनी नायडू ने अपनी केसर-ए-

[03:32:42] हिंद की उपाधि वापस कर दी।

[03:32:44] हम

[03:32:44] और शंकरन नायर ने गवर्नर की कार्यकारिणी

[03:32:47] से इस्तीफा दे दिया।

[03:32:48] और सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है कि

[03:32:51] अंग्रेजों ने डायर को सजा देने के बजाय

[03:32:53] उसे सम्मानित किया।

[03:32:55] बिल्कुल। ब्रिटेन की हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने

[03:32:56] उसे सम्मानित किया। उसे स्वॉर्ड ऑफ ऑनर

[03:32:59] यानी सम्मान की तलवार दी गई और उसके लिए

[03:33:01] चंदा भी इकट्ठा किया गया।

[03:33:02] कमाल है।

[03:33:03] इस घटना की जांच के लिए दो कमेटियां बनी।

[03:33:05] एक अंग्रेजों की हंटर कमेटी जिसने डायर को

[03:33:07] निर्दोष बताया।

[03:33:08] निर्दोष।

[03:33:08] जी। और दूसरी कांग्रेस की तहकीकात कमेटी

[03:33:11] जिसने उसे दोषी माना।

[03:33:12] तो इसी उथल-पुथल के बीच एक और आंदोलन चल

[03:33:15] रहा था खिलाफत आंदोलन। इसका जलियांवाला

[03:33:18] बाग और रोलेट एक्ट से क्या संबंध था?

[03:33:20] इसका सीधा संबंध पहले विश्व युद्ध से था।

[03:33:22] युद्ध में तुर्की ब्रिटेन के खिलाफ लड़ा

[03:33:24] था।

[03:33:24] ओके।

[03:33:25] और तुर्की के सुल्तान को दुनिया भर के

[03:33:27] मुसलमान अपना खलीफा यानी धार्मिक प्रमुख

[03:33:29] मानते थे।

[03:33:30] अच्छा। तो अंग्रेजों ने भारतीय मुसलमानों

[03:33:32] से वादा किया था कि युद्ध के बाद खलीफा के

[03:33:35] पद और सम्मान को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया

[03:33:37] जाएगा। बिल्कुल यही वादा किया था

[03:33:39] और उन्होंने अपना वादा नहीं निभाया।

[03:33:41] सुई युद्ध जीतने के बाद अंग्रेजों ने

[03:33:43] तुर्की का विभाजन कर दिया और खलीफा के

[03:33:45] सारे अधिकार छीन लिए।

[03:33:47] हम

[03:33:47] इसी वादा खिलाफी के विरोध में भारत में

[03:33:49] अली बंधुओं मतलब मोहम्मद अली और शौकत अली

[03:33:52] ने 1919 में खिलाफत आंदोलन शुरू किया।

[03:33:55] और यहीं पे गांधी जी को एक बड़ा मौका

[03:33:57] दिखाई दिया।

[03:33:58] हां, गांधी जी ने इसे हिंदू मुस्लिम एकता

[03:34:00] को मजबूत करने और अंग्रेजों के खिलाफ एक

[03:34:03] बड़ा संयुक्त आंदोलन खड़ा करने का एक

[03:34:05] सुनहरा अवसर माना। और यहीं आगे चलकर

[03:34:08] असहयोग आंदोलन बना।

[03:34:09] जी। हालांकि मोहम्मद अली जिन्ना इसके

[03:34:11] खिलाफ थे।

[03:34:11] वह क्यों?

[03:34:12] उनका मानना था कि एक धार्मिक आंदोलन का

[03:34:14] राजनीतीरण नहीं किया जाना चाहिए।

[03:34:16] अच्छा।

[03:34:16] अंत में 1924 में जब तुर्की में ही

[03:34:19] मुस्तफा कमाल पाशा ने खलीफा का पद समाप्त

[03:34:22] कर दिया तो भारत में भी यह आंदोलन अपने आप

[03:34:24] खत्म हो गया। तो कुल मिलाकर हम देखते हैं

[03:34:26] कि कैसे एक दमनकारी कानून एक क्रूर

[03:34:29] नरसंहार और एक अंतरराष्ट्रीय धार्मिक

[03:34:32] मुद्दा यह सब भारत में एक साथ आकर आजादी

[03:34:35] की लड़ाई को हमेशा के लिए बदल देते हैं।

[03:34:37] यह दौर हमें दिखाता है कि कैसे दमन की

[03:34:40] प्रतिक्रिया में ही एकता और प्रतिरोध की

[03:34:42] सबसे मजबूत भावनाएं जन्म लेती हैं और इसी

[03:34:45] ने आगे चलकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम

[03:34:47] की दिशा तय की।

[03:34:50] तो चलिए कहानी की शुरुआत उनके घर से ही

[03:34:53] करते हैं।

[03:34:53] हां बिल्कुल। हम सब जानते हैं कि उनका

[03:34:56] जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर में हुआ।

[03:34:59] पिता दीवान थे। मां बहुत धार्मिक थीं।

[03:35:02] लेकिन जो बात मुझे हमेशा सोचने पर मजबूर

[03:35:05] करती है वो है राष्ट्रपिता की भूमिका के

[03:35:08] पीछे छिपे एक पिता की कहानी।

[03:35:10] जो काफी जटिल थी।

[03:35:11] हां, बहुत जटिल। उनके चार बेटे थे और हर

[03:35:14] बेटे की कहानी गांधी के साथ उनके रिश्ते

[03:35:17] का एक अलग ही पहलू दिखाती है।

[03:35:19] और यह पहलू उनकी सार्वजनिक छवि से मतलब

[03:35:21] बहुत अलग है।

[03:35:22] बहुत अलग। यह हमें एक ऐसे गांधी से

[03:35:24] मिलवाता है जो गलतियां कर सकता था जिसके

[03:35:26] अपने परिवार में ही गहरे मतभेद थे।

[03:35:29] सबसे बड़ी मिसाल है उनके सबसे बड़े बेटे

[03:35:31] हरीलाल।

[03:35:32] पिता पुत्र में जमीन आसमान का फर्क था।

[03:35:34] गांधी के आदर्शों के खिलाफ हरीलाल ने जैसे

[03:35:37] विद्रोही कर दिया था। बात इतनी बिगड़ी कि

[03:35:40] उन्होंने कुछ समय के लिए इस्लाम कबूल कर

[03:35:42] लिया और अपना नाम अब्दुल्ला गांधी रख

[03:35:44] लिया।

[03:35:44] सोचिए।

[03:35:45] हां, सोचिए। जिस इंसान की आवाज पर पूरा

[03:35:47] देश उठ खड़ा होता हो, उसका अपना बेटा उसकी

[03:35:50] राह से इतना दूर चला गया। हरीलाल का

[03:35:52] विद्रोह सिर्फ एक बेटे का विद्रोह नहीं

[03:35:55] था। वह गांधी के आदर्शों की सबसे पहली और

[03:35:57] सबसे करीबी चुनौती थी।

[03:35:59] सही है।

[03:35:59] हालांकि बाद में वह आर्य समाजी बन गए

[03:36:02] लेकिन पिता से जो दूरी बनी वह शायद कभी

[03:36:04] नहीं मिटी।

[03:36:04] और फिर सिक्के का दूसरा पहलू भी है। दूसरे

[03:36:07] बेटे मणिलाल जो पिता की परछाई बन कर रहे।

[03:36:10] वो गांधी के साथ दक्षिण अफ्रीका गए और फिर

[03:36:12] वहीं बस गए। उन्होंने वहां गांधी के शुरू

[03:36:14] किए काम को उनके अखबार इंडियन ओपिनियन को

[03:36:17] जिंदा रखा। था।

[03:36:18] वो जैसे अपने पिता की विरासत को एक दूसरे

[03:36:20] महाद्वीप पर सहेज रहे थे।

[03:36:22] बिल्कुल। और तीसरे बेटे रामदास थे जो शायद

[03:36:24] भावनात्मक रूप से उनके सबसे करीब थे।

[03:36:26] इतने करीब कि गांधी की चिता को मुखाग्नि

[03:36:29] देने का अधिकार उन्हीं को मिला।

[03:36:30] हां।

[03:36:30] यह दिखाता है कि तमाम तनाव के बावजूद

[03:36:33] परिवार में एक भावनात्मक जुड़ाव बना हुआ

[03:36:35] था।

[03:36:36] यहां एक और दिलचस्प बात है। इन्हीं रामदास

[03:36:39] के बेटे यानी गांधी के पोते कानू गांधी

[03:36:42] उनके निजी फोटोग्राफर बने। हां आज हम

[03:36:45] गांधी की जो बेतलुफ तस्वीरें देखते हैं

[03:36:48] जिनमें वह बच्चों के साथ हंस रही हैं या

[03:36:50] चरखा कात रही हैं उनमें से कई उन्हीं की

[03:36:53] देन है।

[03:36:54] उन्होंने हमें वो गांधी दिखाया जो

[03:36:56] सार्वजनिक मंच से अलग था।

[03:36:57] और फिर सबसे छोटे बेटे देवदास जिन्होंने

[03:37:00] पत्रकारिता को चुना और हिंदुस्तान टाइम्स

[03:37:03] के संपादक बने। एक आधुनिक पेशेवर रास्ता।

[03:37:06] तो आप देखिए एक ही पिता की छत्रछाया में

[03:37:08] चार बेटे और चार बिल्कुल अलग दुनिया। हम

[03:37:12] एक विद्रोही, एक अनुयाई, एक भक्त और एक

[03:37:15] आधुनिक पेशेवर। यह परिवार अपने आप में उस

[03:37:18] बदलते हुए भारत का एक छोटा सा मॉडल था,

[03:37:20] जहां हर पीढ़ी अपनी नई राह तलाश रही थी।

[03:37:23] और इसी परिवार में एक पांचवें मानद पुत्र

[03:37:26] भी थे।

[03:37:27] जमनालाल बजाज।

[03:37:28] जमनालाल बजाज एक उद्योगपति जिसने अपना सब

[03:37:31] कुछ गांधी के आंदोलन के लिए समर्पित कर

[03:37:34] दिया।

[03:37:34] तो यह उनके पारिवारिक जीवन की जटिल तस्वीर

[03:37:37] थी। अब उस मोड़ पर आते हैं जिसने मोहनदास

[03:37:40] की पेशेवर जिंदगी और भारत के भविष्य दोनों

[03:37:43] की दिशा बदल दी। वह 1888 में वकालत पढ़ने

[03:37:46] लंदन गए। 1891 में बैरिस्टर बनकर लौटे

[03:37:50] लेकिन

[03:37:50] भारत में उनकी वकालत बिल्कुल नहीं चली।

[03:37:52] नहीं चली।

[03:37:53] और कभी-कभी जीवन में एक छोटी सी नाकामी ही

[03:37:56] आपको एक बड़े रास्ते पर धकेल देती है।

[03:37:58] भारत में उनकी वकालत का ना चलना ही वो वजह

[03:38:01] बना कि उन्होंने दक्षिण अफ्रीका जाने का

[03:38:02] प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

[03:38:04] बिल्कुल। 1893 में दादा अब्दुल्ला एंड

[03:38:07] कंपनी नाम की एक फर्म का मुकदमा लड़ने के

[03:38:10] लिए वह दक्षिण अफ्रीका गए।

[03:38:11] जी।

[03:38:11] चुक्ति सिर्फ एक साल का था। वेतन था 105

[03:38:15] पाउंड। किसी ने खुद गांधी ने भी नहीं सोचा

[03:38:17] होगा कि यह एक साल की यात्रा

[03:38:19] 21 साल लंबी हो जाएगी।

[03:38:21] हां। और एक नौजवान वकील को एक आंदोलनकारी

[03:38:23] बना देगी।

[03:38:24] और इसी यात्रा में एक स्टेशन ऐसा आया जहां

[03:38:27] मोहनदास का ट्रेन से उतरना महात्मा के सफर

[03:38:30] की शुरुआत बन गया। हां वो घटना जिसके बारे

[03:38:32] में हम सब ने पढ़ा है डरबन से प्रिटोरिया

[03:38:35] जाते हुए पीटर मैरिड्सबर्ग स्टेशन पर

[03:38:38] उन्हें फर्स्ट क्लास के डिब्बे से बाहर

[03:38:41] फेंक दिया गया वजह क्योंकि वो एक कुली

[03:38:44] बैरिस्टर थे एक हिंदुस्तानी

[03:38:46] और यह सिर्फ एक टिकट का अपमान नहीं था।

[03:38:48] नहीं बिल्कुल नहीं।

[03:38:49] यह उससे कहीं ज्यादा गहरा था। वो एक

[03:38:51] ब्रिटिश शिक्षित बैरिस्टर थे जो अंग्रेजी

[03:38:54] कायदे कानून पर भरोसा करते थे।

[03:38:55] उस रात उस ठंडे प्लेटफार्म पर उनका वो

[03:38:58] भरोसा टूट कर बिखर गया। सही।

[03:39:00] उन्हें पहली बार यह एहसास हुआ कि

[03:39:02] साम्राज्य की नजर में उनकी शिक्षा, उनके

[03:39:04] पेशे की कोई कीमत नहीं है। उनकी पहचान

[03:39:07] सिर्फ उनका रंग था। यह वो चिंगारी थी

[03:39:09] जिसने उनके अंदर के संघर्ष को आग दे दी।

[03:39:12] और उन्होंने फौरन इस अपमान को एक संगठित

[03:39:14] लड़ाई में बदल दिया।

[03:39:15] बिल्कुल। अगले ही साल 1894 में उन्होंने

[03:39:18] नटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की। यह

[03:39:20] उनका पहला राजनीतिक संगठन था।

[03:39:22] एक वकील अब समुदाय का नेता बन रहा था।

[03:39:25] जी। लेकिन यहां उनके शुरुआती दिनों की एक

[03:39:27] ऐसी बात है जो आज के परिप्रेक्ष में

[03:39:30] बहुतों को हैरान करती है।

[03:39:31] बल्कि विरोधाभासी लगती है।

[03:39:33] हां, अब बोर वॉर युद्ध की बात कर रहे हैं।

[03:39:35] जी।

[03:39:36] ये यह वाकई चौंकाने वाला है। 1899 से 1902

[03:39:40] के बीच जब डच उपनिवेशियों और अंग्रेजों

[03:39:42] में बोर युद्ध हुआ तो गांधी ने अंग्रेजों

[03:39:45] का साथ दिया।

[03:39:46] हम

[03:39:46] उन्होंने 1100 भारतीयों की एक एंबुलेंस

[03:39:48] कोर बनाई और युद्ध के मैदान में घायलों की

[03:39:51] मदद की।

[03:39:52] हम

[03:39:52] इस सेवा के लिए उन्हें बोर पदक भी मिला।

[03:39:54] इस कदम को समझना बहुत जरूरी है। यह गांधी

[03:39:57] का मतलब भोलापन या अंग्रेज परस्ती नहीं

[03:40:00] थी।

[03:40:00] तो क्या था यह?

[03:40:01] यह एक सोची समझी रणनीति थी। उनका तर्क था

[03:40:04] कि अगर हम ब्रिटिश साम्राज्य के नागरिक के

[03:40:06] तौर पर अधिकार मांगते हैं तो हमें नागरिक

[03:40:08] के तौर पर अपने कर्तव्य भी निभाने होंगे।

[03:40:10] अच्छा।

[03:40:11] वो अपनी वफादारी साबित करके बराबरी का हक

[03:40:13] मांगना चाहते थे। वो साम्राज्य को भीतर से

[03:40:15] सुधारना चाहते थे। उसे तोड़ना नहीं।

[03:40:17] मतलब वो सिस्टम के साथ काम करके उसे बदलने

[03:40:20] की कोशिश कर रहे थे।

[03:40:21] बिल्कुल। क्रांति का विचार भी बहुत दूर

[03:40:23] था। यह सुधार का दौर था और इसी दौर में

[03:40:25] उन्होंने अपने सबसे बड़े विचारों की

[03:40:27] प्रयोगशाला बनाई उनके आश्रम।

[03:40:28] फिनिक्स फार्म और टॉलस्टॉय फार्म।

[03:40:30] हां, 1904 में डरबन में फिनिक्स फार्म और

[03:40:33] 1910 में जोहान्सबर्ग के पास टॉलस्टॉय

[03:40:36] फार्म जिसे बनाने में उनके जर्मन बोस्ट

[03:40:38] कानबर्क ने मदद की। यह सिर्फ रहने की जगह

[03:40:40] नहीं थी। यह भविष्य के भारत के छोटे-छोटे

[03:40:43] मॉडल थे।

[03:40:44] यहां आत्मनिर्भरता, सामुदायिक जीवन और

[03:40:47] सत्याग्रह के सिद्धांतों को जिया जाता था।

[03:40:50] सिर्फ पढ़ा नहीं जाता था। बिल्कुल।

[03:40:52] और इन्हीं सिद्धांतों के लिए उन्हें पहली

[03:40:54] बार जेल भी जाना पड़ा। 1908 में एशियाटिक

[03:40:57] रजिस्ट्रेशन बिल के खिलाफ। यह सिर्फ एक

[03:40:59] पहचान पत्र का कानून नहीं था।

[03:41:01] नहीं, यह कहीं ज्यादा अपमानजनक था। इस बिल

[03:41:03] के तहत हर भारतीय को औरतों समेत अपनी

[03:41:06] उंगलियों के निशान देकर एक रजिस्ट्रेशन

[03:41:08] सर्टिफिकेट हमेशा अपने पास रखना होता था।

[03:41:10] हम

[03:41:11] यह उन्हें अपराधियों की श्रेणी में खड़ा

[03:41:13] कर देता था। गांधी के लिए यह आत्मसम्मान

[03:41:15] पर हमला था। तो उन्होंने कहा कि इस

[03:41:17] अपमानजनक कानून को मानने से बेहतर जेल

[03:41:20] जाना है।

[03:41:20] और यहीं से सत्याग्रह के एक हथियार के तौर

[03:41:23] पर जेल भरो आंदोलन की शुरुआत हुई।

[03:41:25] इसी संघर्ष के बीच 1909 में लंदन से

[03:41:28] दक्षिण अफ्रीका लौटते हुए जहाज पर

[03:41:31] उन्होंने हिंद स्वराज किताब लिखी।

[03:41:33] कहते हैं 10 दिनों में पूरी किताब लिख दी।

[03:41:35] हां। यह सिर्फ एक किताब नहीं भविष्य के

[03:41:38] भारत का एक घोषणा पत्र था।

[03:41:40] तो देखिए 21 सालों में दक्षिण अफ्रीका ने

[03:41:42] उन्हें क्या-क्या दिया। संगठन बनाना

[03:41:44] सिखाया। आंदोलन की तकनीक दी, जेल जाने का

[03:41:47] अनुभव दिया और भविष्य का एक दर्शन दिया।

[03:41:49] वह एक पूरी तरह तैयार होकर भारत लौटे।

[03:41:52] जी।

[03:41:53] 21 साल बाद 9 जनवरी 1915 को वो एस एस

[03:41:57] सुदीप जहाज से मुंबई के अपोलो बंदरगाह पर

[03:42:00] उतरे। आज भी हम इस दिन को प्रवासी भारतीय

[03:42:03] दिवस के रूप में मनाते हैं। लेकिन भारत

[03:42:06] आते ही उन्होंने राजनीति में छलांग नहीं

[03:42:08] लगाई।

[03:42:09] नहीं उनकी राजनीति गुरु गोपाल कृष्ण गोखले

[03:42:11] ने उन्हें एक बहुत कीमती सलाह दी।

[03:42:13] क्या? उन्होंने कहा एक साल तक पूरे भारत

[03:42:16] में घूमो। अपनी आंखें और कान खुले रखो

[03:42:18] लेकिन अपना मुंह बंद रखो।

[03:42:20] हम

[03:42:20] गोखले जानते थे कि दक्षिण अफ्रीका का हीरो

[03:42:23] भारत की जमीनी हकीकत से अनजान है। पहले

[03:42:25] देश को समझना जरूरी था।

[03:42:27] और उनके एक आध्यात्मिक गुरु भी थे जैन

[03:42:29] दार्शनिक रायचंद्र।

[03:42:31] जी।

[03:42:31] लेकिन भारत आते ही पहले विश्व युद्ध के

[03:42:33] दौरान वो फिर उसी विरोधाभासी स्थिति में

[03:42:36] खड़े हो गए।

[03:42:37] जो हमने बोर युद्ध के समय देखी हां

[03:42:39] उन्होंने फिर से ब्रिटिश साम्राज्य का साथ

[03:42:41] दिया और भारतीयों को सेना में भर्ती होने

[03:42:44] के लिए प्रोत्साहित किया।

[03:42:45] और इस बार भारत में इसकी तीखी प्रतिक्रिया

[03:42:47] हुई।

[03:42:48] बहुत तीखी कई राष्ट्रवादी उनसे नाराज हुए

[03:42:51] और मजाक में उन्हें भर्ती करने वाला

[03:42:53] सार्जेंट कहने लगी।

[03:42:54] वहीं दूसरी तरफ अंग्रेज उनकी वफादारी से

[03:42:57] इतनी खुश हुए कि 1915 में उन्हें केसर-ए-ह

[03:43:00] हिंद की उपाधि दी।

[03:43:01] यह क्षण बहुत महत्वपूर्ण है।

[03:43:02] बिल्कुल। एक ही व्यक्ति को एक तरफ

[03:43:04] देशद्रोही जैसा ताना मिल रहा है और दूसरी

[03:43:06] तरफ दुश्मन से सबसे बड़ा सम्मान। हम

[03:43:09] यह दिखाता है कि गांधी अभी भी उस सहयोग

[03:43:11] वाली रणनीति पर चल रहे थे। उन्हें अभी भी

[03:43:14] उम्मीद थी कि साम्राज्य के प्रति वफादारी

[03:43:16] का इनाम मिलेगा।

[03:43:17] मतलब यह असहयोग आंदोलन से पहले का गांधी

[03:43:20] है।

[03:43:20] जिसका विश्वास अभी पूरी तरह टूटा नहीं था।

[03:43:23] भारत आकर उन्होंने आश्रम बनाने का काम भी

[03:43:25] जारी रखा। 1915 में अहमदाबाद के कोचरब

[03:43:29] गांव में सत्याग्रह आश्रम बनाया।

[03:43:31] लेकिन वहां प्लेग फैल गया?

[03:43:32] हां। और फिर 1917 में यह आश्रम साबरमती

[03:43:36] नदी के किनारे ले जाया गया। और यही

[03:43:38] साबरमती आश्रम अगले 13 सालों तक 1930 में

[03:43:42] दांडी मार्च तक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम

[03:43:44] का मुख्यालय बना।

[03:43:45] इस आश्रम से जुड़ी भी कुछ प्यारी बातें

[03:43:47] स्रोतों में मिलती हैं।

[03:43:49] जैसे जैसे इसके लिए पैसा उद्योगपति

[03:43:51] अंबालाल साराभाई ने दिया था। गांधी जिस

[03:43:54] कुटिया में रहते थे उसे हृदय कुंज कहा

[03:43:57] जाता था।

[03:43:57] अच्छा।

[03:43:58] और मेहमानों के लिए जो कमरा था उसका नाम

[03:44:00] था नंदिनी। यह छोटी-छोटी बातें उस जगह को

[03:44:02] एक मानवीय स्पर्श देती हैं।

[03:44:04] तो अब तक हमने उनके जीवन के सफर, उनके

[03:44:06] परिवार, उनके संघर्ष और उनके ठिकानों की

[03:44:09] बात की। लेकिन यह जो तरीके उन्होंने अपनाए

[03:44:11] सत्याग्रह, भूख हड़ताल, अहिंसक प्रतिरोध।

[03:44:14] इन तरीकों की प्रेरणा कहां से आई थी?

[03:44:16] हां, यह जानना जरूरी है।

[03:44:18] यह बहुत दिलचस्प है कि उनके दो सबसे

[03:44:21] शक्तिशाली हथियारों की प्रेरणा पश्चिमी

[03:44:23] विचारकों से आई। उन्होंने दुनिया भर के

[03:44:26] विचारों को पढ़ा और उन्हें भारतीय मिट्टी

[03:44:28] के हिसाब से ढाल लिया।

[03:44:29] बिल्कुल। उनकी सोच एक संगम की तरह थी जहां

[03:44:32] पूरब और पश्चिम की धाराएं आकर मिलती थी।

[03:44:34] जैसे कि भूख हड़ताल जो उनका सबसे बड़ा

[03:44:37] नैतिक हथियार था।

[03:44:38] हम

[03:44:39] इसकी प्रेरणा उन्हें अंग्रेज विचारक जॉन

[03:44:42] रस्किन की किताब अनटू दिसलास से मिली।

[03:44:45] लेकिन इस किताब ने उन्हें सिर्फ एक तरीका

[03:44:47] नहीं दिया बल्कि सर्वोदय का एक पूरा दर्शन

[03:44:49] दिया।

[03:44:50] यानी सबका उदय

[03:44:51] सबका उदय समाज के आखिरी व्यक्ति का भी

[03:44:53] विकास। यह उनके आर्थिक चिंतन का आधार बना।

[03:44:56] और दूसरा बड़ा प्रभाव एक महान रूसी लेखक

[03:44:59] का था। हां लियो टॉलस्टॉय सविनय अवज्ञा

[03:45:01] यानी अन्यायपूर्ण कानून को विनम्रता से ना

[03:45:04] मानना।

[03:45:05] इस विचार की जड़े टॉलस्टॉय की किताब द

[03:45:08] किंगडम ऑफ गॉड इज विद इन यू में थी।

[03:45:10] जी।

[03:45:10] टॉलस्टॉय का तर्क था कि राज्य हिंसा पर

[03:45:13] आधारित है और उसे हराने का एकमात्र तरीका

[03:45:15] है नैतिक बल और असहयोग।

[03:45:18] गांधी और टॉलस्टॉय के बीच तो खत किताबत भी

[03:45:21] हुई थी।

[03:45:21] हुई थी।

[03:45:22] तो उन्होंने रस्किं से आर्थिक दर्शन लिया।

[03:45:24] टॉलस्टॉय से राजनीतिक रणनीति ली और इन

[03:45:27] दोनों को अहिंसा के भारतीय सिद्धांत के

[03:45:30] धागे में पिरोकर एक ऐसा आंदोलन खड़ा कर

[03:45:33] दिया जो दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा था।

[03:45:36] शुरुआत करते हैं बिहार के चंपारण से साल

[03:45:39] 1917 यहां की हवा में नील की गंध और

[03:45:43] किसानों का दर्द घुला हुआ था। समस्या थी

[03:45:46] तिनकठिया प्रणाली।

[03:45:47] हां तिनकठिया प्रणाली। सुनने में तो यह

[03:45:49] सिर्फ एक नाम लगता है, लेकिन इसके पीछे

[03:45:52] शोषण की एक पूरी कहानी है।

[03:45:54] कहानी से कहीं ज्यादा यह एक जाल था।

[03:45:56] तिनकटिया का सीधा मतलब था कि किसानों को

[03:45:59] अपनी जमीन के हर बीघे में से तीन कट्ठे पर

[03:46:01] यानी करीब 15% हिस्से पर अनिवार्य रूप से

[03:46:04] नील की खेती करनी ही होगी।

[03:46:06] करनी ही होगी। और यह सिर्फ एक आदेश नहीं

[03:46:08] था। यह किसानों के लिए तीन तरफ़ा मार थी।

[03:46:11] मतलब सिर्फ आर्थिक बोझ नहीं था।

[03:46:13] नहीं बिल्कुल नहीं। पहला तो आर्थिक था ही।

[03:46:15] नील की खेती बहुत खर्चीली हम्म।

[03:46:17] और अंग्रेज बागान मालिक जो दाम देते थे वो

[03:46:19] लागत से भी कम होता था।

[03:46:20] अच्छा।

[03:46:21] तो किसान पीढ़ी दर पीढ़ी कर्ज में डूबते

[03:46:23] जा रहे थे। दूसरा यह जमीन के लिए जहर था।

[03:46:26] जमीन के लिए जहर।

[03:46:27] पोषक तत्व खींच लेता था जिससे खेत कुछ ही

[03:46:30] सालों में बंजर हो जाते थे। और तीसरा जो

[03:46:32] शायद सबसे ज्यादा दिल दहलाने वाला है वो

[03:46:35] था इंसानी सेहत पर असर।

[03:46:37] सेहत पर, वो कैसे?

[03:46:38] नील को तैयार करने की प्रक्रिया में उसे

[03:46:41] बड़ी-बड़ी हौदियों में डालकर पैरों से

[03:46:43] रौंदना पड़ता था।

[03:46:44] ओहो। इससे किसानों के पैरों में और पूरे

[03:46:47] शरीर में भयानक चर्म रोग हो जाते थे जो

[03:46:49] कभी ठीक नहीं होते थे। तो यह सिर्फ आर्थिक

[03:46:51] शोषण नहीं था। यह उनके शरीर और उनकी जमीन

[03:46:54] दोनों को धीरे-धीरे खत्म करने वाला एक

[03:46:57] क्रूर सिस्टम था।

[03:46:58] यह तो सोच से भी ज्यादा भयानक है। और फिर

[03:47:01] कहानी में एक नया मोड़ आता है। जर्मनी में

[03:47:04] बने कृत्रिम रंगों का।

[03:47:06] हां। और यही तो विडंबना है। जब जर्मनी के

[03:47:08] सिंथेटिक डाई बाजार में आए तो नील की मांग

[03:47:10] अचानक गिर गई।

[03:47:11] तो अब अंग्रेजों को भी नील नहीं चाहिए था।

[03:47:13] हां। अब अंग्रेज बागान मालिक भी नील की

[03:47:16] खेती से छुटकारा चाहते थे। लेकिन वे अपना

[03:47:18] घाटा क्यों सह? उन्होंने किसानों से कहा

[03:47:20] कि अगर तुम्हें इस अनुबंध से आजाद होना है

[03:47:22] तो हमें भारी भरकम लगान और टैक्स दो।

[03:47:25] मतलब जाते-जाते भी वो किसानों को निचोड़

[03:47:28] लेना चाहते थे।

[03:47:28] बिल्कुल।

[03:47:29] यहीं पर एक अकेले आदमी की हिम्मत काम आती

[03:47:32] है राजकुमार शुक्ल। यह बात हैरान करती है

[03:47:34] कि एक आम किसान उस समय के इतने बड़े नेता

[03:47:38] को चंपारण तक खींच ले गया। यह उनकी लगन को

[03:47:41] दिखाता है। राजकुमार शुक्ल कोई बड़े

[03:47:43] जमींदार नहीं थे। वह खुद इस शोषण के शिकार

[03:47:45] थे। वह महीनों तक गांधी जी के पीछे पड़े

[03:47:47] रहे।

[03:47:48] अच्छा।

[03:47:48] हां। 1916 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में

[03:47:51] मिले। फिर उनके आश्रम गए, कोलकाता गए।

[03:47:53] जहां गांधी जी जाते वह पहुंच जाते। उनकी

[03:47:55] आंखों में अपने लोगों के लिए एक सच्चाई और

[03:47:57] एक तड़प थी जिसे गांधी जी ने पहचान लिया।

[03:47:59] और गांधी जी मान गए।

[03:48:00] हां, उनका आना यह दिखाता है कि उनके लिए

[03:48:02] भारत का मतलब बड़े-बड़े शहर नहीं बल्कि

[03:48:05] दूर-दराज का वो किसान था, जिसकी आवाज कोई

[03:48:07] नहीं सुन रहा था। तो गांधी जी चंपारण

[03:48:09] पहुंचते हैं।

[03:48:10] जाहिर है अंग्रेज प्रशासन ने लाल कालीन

[03:48:12] बिछाकर उनका स्वागत तो नहीं किया होगा।

[03:48:13] स्वागत तो दूर की बात है। उन्हें आते ही

[03:48:15] जिला छोड़ने का नोटिस थमा दिया गया।

[03:48:18] और उन्होंने क्या किया? गांधी जी ने कहा,

[03:48:20] मैं नहीं जाऊंगा। आपको जो करना है कर

[03:48:22] लीजिए। यह भारत में सविनय अवज्ञा का पहला

[03:48:24] प्रदर्शन था और वह अकेले नहीं थे।

[03:48:26] उनके साथ और कौन था?

[03:48:27] उन्होंने तुरंत भारत के कुछ सबसे बेहतरीन

[03:48:29] दिमागों को इकट्ठा कर लिया। नरहरी पारिक,

[03:48:32] महादेव देसाई, जेबी कृपलानी और बिहार के

[03:48:34] एक नौजवान वकील राजेंद्र प्रसाद। राज

[03:48:37] प्रसाद जो आगे चलकर भारत के पहले

[03:48:39] राष्ट्रपति बने।

[03:48:40] जी हां भाई यह गांधी जी की सबसे बड़ी

[03:48:42] ताकतों में से एक थी। सही काम के लिए सही

[03:48:44] लोगों को जोड़ना।

[03:48:45] और विरोध सिर्फ कानूनी नहीं था। यह

[03:48:47] जानलेवा भी हो गया था। श्रोत में एक

[03:48:49] अंग्रेज मैनेजर इरविन द्वारा जहर देने की

[03:48:52] कोशिश का जिक्र है।

[03:48:53] रुकिए। दूध में जहर यह तो सीधी-सीधी हत्या

[03:48:55] की कोशिश थी।

[03:48:56] हां।

[03:48:56] मतलब अंग्रेज मैनेजर उन्हें सिर्फ एक

[03:48:58] राजनीतिक विरोधी नहीं बल्कि जान का दुश्मन

[03:49:00] समझ रहे थे।

[03:49:01] बिल्कुल। स्रोत बताता है कि इरविन ने अपने

[03:49:04] रसोइए बत्तख मियां को गांधी जी के दूध में

[03:49:07] जहर मिलाने का आदेश दिया। लेकिन बत्तख

[03:49:09] मियां ने अपनी जान की परवाह ना करते हुए

[03:49:12] गांधी जी को इशारा कर दिया और दूध गिरा

[03:49:15] दिया

[03:49:15] और उनकी जान बच गई। यह दिखाता है कि

[03:49:17] संघर्ष कितना व्यक्तिगत और खतरनाक हो चुका

[03:49:19] था।

[03:49:20] तो फिर आखिर में हुआ क्या?

[03:49:21] अंत में गांधी जी के सत्याग्रह और बढ़ते

[03:49:24] जदबाब के आगे सरकार को झुकना पड़ा। फ्रैंक

[03:49:26] स्लाई की अध्यक्षता में एक जांच समिति

[03:49:29] बनाई गई। और सबसे बड़ी बात यह थी कि गांधी

[03:49:31] जी को भी उसका सदस्य बनाया गया।

[03:49:33] जी, यह एक बहुत बड़ी जीत थी। समिति ने

[03:49:36] माना कि तिनकठिया प्रणाली अवैध और

[03:49:38] शोषणकारी थी। इसे तुरंत खत्म कर दिया गया

[03:49:40] और किसानों से वसूला गया 25% अवैध पैसा

[03:49:44] वापस दिलाया गया।

[03:49:45] और कहते हैं इसी आंदोलन की सफलता के बाद

[03:49:48] रवींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें पहली बार

[03:49:50] महात्मा कहकर संबोधित किया।

[03:49:52] जी हां। लेकिन गांधी जी के लिए यह सिर्फ

[03:49:54] एक राजनीतिक जीत नहीं थी।

[03:49:56] अच्छा। जैसे ही आंदोलन खत्म हुआ उन्होंने

[03:49:58] कहा अब असली काम शुरू होगा और उन्होंने

[03:50:01] चंपारण के गांव में बरवा लखन सेन

[03:50:03] भित्तिहरवा और मधुबन में तीन स्कूल खोले

[03:50:06] स्कूल

[03:50:07] हां उनका मानना था कि अज्ञानता ही सबसे

[03:50:09] बड़ी गुलामी है यहीं से उनका काम करने का

[03:50:12] तरीका स्थापित हुआ पहले समस्या की जड़ तक

[03:50:14] जाओ तथ्यों की जांच करो लोगों को संगठित

[03:50:17] करो और फिर अहिंसक कारवाई करो

[03:50:19] और समाधान सिर्फ राजनीतिक नहीं सामाजिक भी

[03:50:22] होना चाहिए

[03:50:23] बिल्कुल

[03:50:23] तो चंपारण में गांधी जी ने किसानों को एक

[03:50:26] बाहरी ताकत यानी अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट

[03:50:30] किया। लेकिन अहमदाबाद की कहानी और भी

[03:50:32] ज्यादा जटिल और व्यक्तिगत है।

[03:50:34] हां क्योंकि यहां लड़ाई बाहरी नहीं बल्कि

[03:50:36] अपनों के बीच थी। मालिकों और मजदूरों के

[03:50:38] बीच।

[03:50:39] चलिए तो अब अहमदाबाद चलते हैं। साल 1918

[03:50:42] शहर में प्लेग की भयानक महामारी फैली थी।

[03:50:46] हां और मजदूर शहर छोड़कर भाग रहे थे।

[03:50:48] उन्हें रोकने के लिए मिल मालिकों ने 50%

[03:50:51] प्लेग बोनस का लालच दिया। लेकिन जैसे ही

[03:50:53] महामारी खत्म हुई मालिक बोनस खत्म करना

[03:50:55] चाहते थे।

[03:50:56] जबकि महंगाई बहुत बढ़ चुकी थी।

[03:50:58] हां, पहले विश्व युद्ध के कारण मजदूरों ने

[03:51:00] कहा कि हमें 50% बोनस चाहिए। मालिक 20% से

[03:51:03] ज्यादा देने को राजी नहीं थे।

[03:51:05] और यहीं पर कहानी में वह मानवीय पहलू आता

[03:51:07] है जो इसे इतना असाधारण बना देता है।

[03:51:10] मजदूरों का नेतृत्व कर रही थी अनुसूया

[03:51:12] बहन।

[03:51:13] और मिल मालिकों के संघ के अध्यक्ष थे उनके

[03:51:15] सगे भाई अंबालाल साराभाई।

[03:51:17] एक मिनट। आंदोलन का नेतृत्व बहन कर रही

[03:51:19] हैं और मिल मालिकों में उनका सगा भाई

[03:51:22] शामिल है।

[03:51:22] यह तो किसी फिल्म की कहानी जैसा लग रहा

[03:51:24] है।

[03:51:25] और यह वही अंबालाल साराभाई है जिन्होंने

[03:51:27] गांधी जी के साबरमती आश्रम को आर्थिक संकट

[03:51:29] से उबारा था।

[03:51:30] बिल्कुल। मतलब एक तरफ वो गांधी जी के

[03:51:32] समर्थक हैं और दूसरी तरफ उनके ही खिलाफ

[03:51:34] खड़े हैं।

[03:51:35] हां, यह इस संघर्ष की जटिलता है।

[03:51:36] तो गांधी जी ने क्या किया?

[03:51:38] गांधी जी ने मामले की जांच की और पाया कि

[03:51:39] मजदूरों की 35% की मांग बिल्कुल जायज है।

[03:51:42] उन्होंने हड़ताल का समर्थन किया। लेकिन

[03:51:44] कुछ हफ्तों के बाद जब मजदूरों का हौसला

[03:51:46] टूटने लगा

[03:51:47] और वे काम पर लौटने की सोचने लगे

[03:51:49] और तब गांधी जी ने अपना वो हथियार

[03:51:51] इस्तेमाल किया जिसने सबको चौंका दिया

[03:51:53] भूख हड़ताल

[03:51:54] भारत में पहली बार

[03:51:55] यह सिर्फ अनशन नहीं था इसके पीछे गहरा

[03:51:58] मनोवैज्ञानिक और नैतिक दबाव था है ना

[03:52:01] बिल्कुल और यह मालिकों के लिए नहीं था यह

[03:52:04] मजदूरों के लिए था| गांधी जी ने कहा अगर

[03:52:06] आप अपने प्रण पर टिके नहीं रह सकते तो मैं

[03:52:09] अन्न जल त्याग दूंगा

[03:52:10] यह तो मजदूरों के आत्मसम्मान को जगाने का

[03:52:13] एक तरीका था

[03:52:14] जी लेकिन इसका असर मालिकों पर भी पड़ा।

[03:52:16] अंबालाल साराभाई और दूसरे मिल मालिक गांधी

[03:52:18] जी का बहुत सम्मान करते थे। वह उन्हें

[03:52:20] भूखा मरते हुए कैसे देख सकते थे?

[03:52:22] स्रोत में 21 दिन के अनशन की बात है। पर

[03:52:25] मुद्दा यह था कि इस हथियार ने पूरे समीकरण

[03:52:28] को बदल दिया।

[03:52:28] और नतीजा क्या निकला?

[03:52:30] अंत में आनंद शंकर ध्रुव की अध्यक्षता में

[03:52:32] एक ट्रिब्यूनल बना और 35% बोनस की मांग

[03:52:36] मान ली गई। मजदूरों की जीत हुई।

[03:52:38] लेकिन इस आंदोलन ने हमें एक जीत से कहीं

[03:52:40] ज्यादा दिया। हां, इसने हमें ट्रस्टीशिप

[03:52:43] का सिद्धांत दिया। ट्रस्टीशिप यानि

[03:52:45] संरक्षकता का सिद्धांत। इसका असल में क्या

[03:52:48] मतलब था?

[03:52:49] गांधी जी ने कहा कि मिल मालिक अपनी

[03:52:51] संपत्ति के मालिक नहीं है। वे सिर्फ उसके

[03:52:53] ट्रस्टी या संरक्षक हैं। यह संपत्ति समाज

[03:52:56] की है और इसका इस्तेमाल मजदूरों और समाज

[03:52:58] की भलाई के लिए होना चाहिए।

[03:52:59] यह तो वर्ग संघर्ष का गांधीवादी समाधान

[03:53:02] था।

[03:53:02] बिल्कुल। उन्होंने मार्क्स की तरह वर्ग

[03:53:04] विनाश की बात नहीं की बल्कि वर्ग समन्वय

[03:53:06] की बात की। उन्होंने कहा, मालिक और मजदूर

[03:53:09] पिता और पुत्र की तरह हैं। उन्हें लड़ना

[03:53:11] नहीं मिलकर काम करना चाहिए।

[03:53:12] यह क्रांतिकारी विचार था।

[03:53:14] और इसी ट्रस्टीशिप के विचार के साथ

[03:53:16] अहमदाबाद आंदोलन खत्म हुआ, लेकिन गांधी जी

[03:53:18] को ज्यादा आराम नहीं मिला क्योंकि कुछ ही

[03:53:20] दिनों बाद गुजरात के खेड़ा में एक और संकट

[03:53:23] खड़ा हो गया।

[03:53:23] हां, और यहां समस्या इंसान की बनाई हुई

[03:53:26] नहीं थी।

[03:53:27] नहीं, यह कुदरत की थी।

[03:53:28] तो, अब हम आते हैं इस कहानी के तीसरे और

[03:53:31] आखिरी हिस्से पर खेड़ा सत्याग्रह 1918।

[03:53:35] यहां मुद्दा एक कानून का था जिसे अकाल

[03:53:38] संहिता या फेमन कोड कहते थे।

[03:53:40] जी नियम साफ था कि अगर फसल का उत्पादन

[03:53:43] सामान्य से 1/4 यानी 25% से कम हो तो

[03:53:47] किसानों का लगान पूरी तरह माफ कर दिया

[03:53:49] जाएगा।

[03:53:50] और 1918 में सूखा पड़ने की वजह से खेड़ा

[03:53:53] में फसल बर्बाद हो गई थी।

[03:53:55] हां, उत्पादन 25% से बहुत कम था। लेकिन

[03:53:58] स्थानीय अंग्रेज अधिकारी अपने ही बनाए

[03:54:00] कानून को मानने से इंकार कर रहे थे। वह कह

[03:54:02] रहे थे कि फसल ठीक हुई है और लगान देना ही

[03:54:05] पड़ेगा।

[03:54:05] यह तो सरासर अन्याय था। प्रशासन की ज़िद और

[03:54:09] संवेदनहीनता की हद थी।

[03:54:11] बिल्कुल।

[03:54:11] और यहां गांधी जी के साथ एक और बड़ा नाम

[03:54:14] जुड़ता है। वल्लभ भाई पटेल।

[03:54:16] हां। और यह दिखाता है कि गांधी जी का

[03:54:18] चुंबकत्व कैसे काम कर रहा था। वल्लभ भाई

[03:54:20] पटेल उस समय अहमदाबाद के एक बहुत सफल

[03:54:22] बैरिस्टर थे।

[03:54:23] अच्छा।

[03:54:23] वो गांधी जी के तरीकों को लेकर शुरू में

[03:54:25] थोड़े शंकित थे। लेकिन, जब उन्होंने गांधी

[03:54:27] जी की प्रतिबद्धता देखी, तो वह अपनी

[03:54:29] शानदार वकालत छोड़कर खेड़ा के धूल भरे

[03:54:32] गांव में किसानों के बीच काम करने आ गए।

[03:54:34] यहीं से सरदार पटेल के बनने की शुरुआत

[03:54:37] हुई।

[03:54:37] जी।

[03:54:38] तो यहां रणनीति क्या थी? क्या यहां भी भूख

[03:54:40] हड़ताल हुई?

[03:54:41] नहीं। यहां तरीका अलग था। गांधी जी ने

[03:54:43] किसानों को सत्याग्रह की शपथ दिलाई। हम

[03:54:46] लगान नहीं देंगे। चाहे हमारी जमीन ही

[03:54:48] क्यों ना जब्त कर ली जाए।

[03:54:49] यह एक अहिंसक करबंदी आंदोलन था।

[03:54:52] हां, सरकार ने दमन का रास्ता अपनाया।

[03:54:54] किसानों की जमीनें, उनके मवेशी यहां तक कि

[03:54:56] घरों के बर्तन भी कुर्क किए जाने लगे।

[03:54:59] लेकिन किसान टूटे नहीं।

[03:55:00] तो समाधान कैसे निकला? क्या सरकार ने हार

[03:55:02] मान ली?

[03:55:03] यहां एक बहुत ही व्यावहारिक हल निकला।

[03:55:05] सरकार सीधे-सीधे अपनी हार नहीं मानना

[03:55:07] चाहती थी तो उन्होंने एक गुप्त निर्देश

[03:55:09] जारी किया।

[03:55:10] गुप्त निर्देश।

[03:55:11] हां, कि लगान सिर्फ उन्हीं किसानों से

[03:55:13] वसूला जाएगा, जो देने में सक्षम है। गरीब

[03:55:15] किसानों को मजबूर नहीं किया जाएगा।

[03:55:17] गांधी जी को जैसे ही यह पता चला, उन्होंने

[03:55:19] आंदोलन वापस ले लिया। मतलब यह पूरी जीत

[03:55:21] नहीं थी लेकिन एक सम्मानजनक समझौता था।

[03:55:24] बिल्कुल।

[03:55:24] गांधी जी के लिए लड़ाई जितना उतना जरूरी

[03:55:26] नहीं था जितना लोगों के मन से डर निकालना

[03:55:28] और उन्हें उनके अधिकारों के लिए लड़ना

[03:55:30] सिखाना खेड़ा ने वही किया।

[03:55:32] और स्रोत एक छोटी लेकिन महत्वपूर्ण

[03:55:34] जानकारी देता है।

[03:55:36] हां, जो अक्सर लोगों को भनहित करती है।

[03:55:38] अहमदाबाद आंदोलन 15 मार्च 1918 को शुरू

[03:55:41] हुआ था और खेड़ा आंदोलन 22 मार्च को। तो

[03:55:43] कालक्रम के हिसाब से अहमदाबाद पहले आता

[03:55:45] है।

[03:55:45] तो चलिए अब इन तीनों धागों को एक साथ

[03:55:48] जोड़ते हैं। हमने तीन अलग-अलग प्रयोग

[03:55:50] देखे। चंपारण में शोषणकारी व्यवस्था के

[03:55:53] खिलाफ एक सीधी जीत

[03:55:55] हां।

[03:55:55] अहमदाबाद में नैतिक दबाव के हथियार यानी

[03:55:58] भूख हड़ताल से मिली जीत और खेड़ा में जहां

[03:56:01] कुदरत ने कहर ढाया था, वहां एक व्यवहारिक

[03:56:04] समाधान निकाला गया।

[03:56:05] आपने एकदम सही सारांश दिया। यह तीन

[03:56:07] स्थानीय आंदोलन गांधी जी की प्रयोगशाला

[03:56:10] थी। जहां उन्होंने अपने सिद्धांतों को

[03:56:12] हकीकत की कसौटी पर कसा।

[03:56:13] उन्होंने सीखा कि हर लड़ाई एक जैसी नहीं

[03:56:15] होती

[03:56:16] और हर बार रणनीति बदलनी पड़ती है। इन्हीं

[03:56:18] जीतों ने गांधी जी को आम भारतीय के दिल

[03:56:20] में जगह दी और उनकी एक ऐसी राष्ट्रीय छवि

[03:56:22] बनाई जिसने उन्हें भविष्य में असहयोग और

[03:56:25] सविनय अवज्ञा जैसे विशाल आंदोलनों का

[03:56:27] नेतृत्व करने के लिए तैयार किया। 1920 का

[03:56:30] साल माहौल में बहुत बेचैनी थी। ऐसा लग रहा

[03:56:32] था कि एक तूफान आने वाला है। इसकी नौबत आई

[03:56:35] क्यों? स्रोत में सबसे पहली वजह बताई गई

[03:56:36] है रॉलेट। इसे काला कानून क्यों कहते थे?

[03:56:39] मतलब ऐसा क्या था इसमें कि पूरे देश में

[03:56:40] इतना गुस्सा भड़क गया।

[03:56:42] देखिए यह कानून ब्रिटिश सरकार को एक तरह

[03:56:44] से असीमित शक्ति देता था। वो किसी भी

[03:56:47] भारतीय को सिर्फ शक के आधार पर बिना

[03:56:50] मुकदमा चलाए जेल में डाल सकते थे।

[03:56:52] मतलब ना कोई दलील, ना कोई वकील, ना कोई

[03:56:55] अपील।

[03:56:56] हां, बिल्कुल। यह सीधे-सीधे नागरिकों के

[03:56:58] अधिकारों पर हमला था। इसीलिए लोगों ने इसे

[03:57:01] काला कानून कहा।

[03:57:03] और इसी काले कानून के विरोध ने हमें

[03:57:05] इतिहास का सबसे दर्दनाक दिन दिया।

[03:57:07] जलियांवाला बाग। हां 13 अप्रैल 1919

[03:57:10] अमृतसर में लोग शांति से रेलेट एक्ट का

[03:57:13] विरोध करने के लिए जमा हुए थे और जनरल

[03:57:16] डायर ने उन निहत्ते लोगों पर गोलियां चलवा

[03:57:18] दी। सरकारी आंकड़ों में तो कुछ 100 मौतें

[03:57:21] बताई गई लेकिन असल में हजार से ज्यादा लोग

[03:57:24] मारे गए थे। इस एक घटना ने पूरे देश को

[03:57:27] हिला कर रख दिया। अंग्रेजों का जो एक यू

[03:57:29] नो तथाकथित न्यायप्रिय चेहरा था वह

[03:57:31] तार-तार हो गया। तो एक तरफ रलेट एक्ट और

[03:57:34] जलियांवाला बाग का जख्म और दूसरी तरफ

[03:57:36] स्रोत में खिलाफत आंदोलन का भी जिक्र है।

[03:57:39] अब यह थोड़ा सा उलझा हुआ लगता है। खिलाफत

[03:57:41] आंदोलन तो तुर्की के खलीफा के लिए था।

[03:57:43] हां।

[03:57:43] गांधी जी ने उसे भारत के स्वतंत्रता

[03:57:45] संग्राम से कैसे जोड़ दिया? यह तो दो

[03:57:47] बिल्कुल अलग मुद्दे लगते हैं।

[03:57:48] यह गांधी जी की रणनीति का एक आप कह सकते

[03:57:51] हैं ब्रिलियंट एग्जांपल है। पहले विश्व

[03:57:53] युद्ध में तुर्की ब्रिटेन के खिलाफ लड़ा

[03:57:56] और हार गया। अंग्रेजों ने वहां खलीफा का

[03:57:58] पद खत्म कर दिया जो दुनिया भर के सुन्नी

[03:58:00] मुसलमानों के लिए सर्वोच्च धार्मिक गुरु

[03:58:03] थे। इससे भारत के मुसलमान बहुत नाराज थे।

[03:58:05] गांधी जी ने इस गुस्से को महसूस किया।

[03:58:07] उन्होंने सोचा कि अगर कांग्रेस मुसलमानों

[03:58:10] के इस धार्मिक मुद्दे का समर्थन करती है

[03:58:12] तो यह हिंदू मुस्लिम एकता के लिए एक

[03:58:14] सुनहरा मौका होगा। एक ऐसा मौका जो शायद

[03:58:17] अगले 100 साल तक ना मिले।

[03:58:19] अच्छा, मतलब एक तीर से दो निशाने।

[03:58:21] अंग्रेजों पर दुगना दबाव भी और देश के दो

[03:58:24] सबसे बड़े समुदायों को एक साथ लाना भी।

[03:58:26] बिल्कुल। और एक तीसरी वजह भी थी 1919 के

[03:58:29] मॉनटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार अंग्रेजों ने

[03:58:32] बड़े-बड़े वादे किए थे कि भारतीयों को

[03:58:34] ज्यादा अधिकार देंगे। लेकिन हुआ क्या? इन

[03:58:36] सुधारों ने प्रांतों में द्वैध शासन यानी

[03:58:39] दोहरी सरकार की एक उलझी हुई व्यवस्था बना

[03:58:41] दी जिसमें सारे जरूरी विभाग जैसे वित्त,

[03:58:44] पुलिस यह सब अंग्रेजों के पास थे और

[03:58:46] भारतीयों को शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे नाम

[03:58:49] मात्र के अधिकार मिले। इससे सबको लगा कि

[03:58:51] उनके साथ धोखा हुआ है।

[03:58:53] तो माहौल पूरी तरह तैयार था। गुस्सा,

[03:58:55] धोखा, दर्द सब कुछ था। तो, 1 अगस्त 1920

[03:58:59] को गांधी जी ने असहयोग आंदोलन का बिगुल

[03:59:01] बजा दिया।

[03:59:02] लेकिन किसी भी इतने बड़े आंदोलन के लिए

[03:59:04] कांग्रेस की मंजूरी तो चाहिए थी।

[03:59:06] हां। और यह आसानी से नहीं मिली। सितंबर

[03:59:09] 1920 में कोलकाता में कांग्रेस का एक

[03:59:11] स्पेशल सेशन बुलाया गया। लाला लाजपत राय

[03:59:13] अध्यक्ष थे। गांधी जी ने प्रस्ताव रखा

[03:59:15] लेकिन कई बड़े नेता इसके खिलाफ थे। उन्हें

[03:59:17] डर था कि कहीं यह आंदोलन हिंसक ना हो जाए।

[03:59:20] लेकिन गांधी जी के तर्कों के आगे प्रस्ताव

[03:59:22] पास हो गया। पर असली मोहर तो नागपुर

[03:59:24] अधिवेशन में लगी। दिसंबर 1920 में श्रोध

[03:59:28] बताता है कि यहां सिर्फ प्रस्ताव पास नहीं

[03:59:30] हुआ बल्कि आंदोलन का पूरा रोड मैप तैयार

[03:59:33] किया गया। सही कहा और यहीं पर वो फैसले

[03:59:36] लिए गए जिन्होंने कांग्रेस को हमेशा के

[03:59:38] लिए बदल दिया। जैसे आंदोलन के खर्च के लिए

[03:59:40] तिलक स्वराज फंड बनाया गया। यह नाम इसलिए

[03:59:44] क्योंकि आंदोलन शुरू होने के दिन ही 1

[03:59:46] अगस्त 1920 को लोकमान्य तिलक का निधन हो

[03:59:49] गया था। और एक और छोटा सा लेकिन बहुत

[03:59:51] महत्वपूर्ण फैसला लिया गया था। कांग्रेस

[03:59:53] का सदस्य बनने की फीस चार आना कर दी गई।

[03:59:56] चार आना आज सुनने में कुछ भी नहीं लगता

[03:59:58] लेकिन इसका मतलब क्या था उस वक्त?

[03:59:59] इसका मतलब क्रांती था। यह सिर्फ पैसे

[04:00:02] जुटाने की बात नहीं थी। चार आने की फीस ने

[04:00:04] कांग्रेस के दरवाजे पहली बार आम आदमी के

[04:00:07] लिए खोल दिए। अब तक कांग्रेस वकीलों,

[04:00:09] डॉक्टरों और अमीर बुद्धिजीवियों की पार्टी

[04:00:12] मानी जाती थी। लेकिन इस एक फैसले ने उसे

[04:00:14] किसानों, मजदूरों, छात्रों, औरतों, सब की

[04:00:18] पार्टी बनने की राह पर डाल दिया। यह

[04:00:20] भारतीय राजनीति का सही मायनों में

[04:00:22] लोकतंत्रीकरण था।

[04:00:24] वाह! मतलब आंदोलन शुरू होने से पहले ही

[04:00:26] उसकी नींव में एक लोकतांत्रिक बदलाव आ

[04:00:28] चुका था और यहीं पर गांधी जी ने वह नारा

[04:00:31] दिया जिसने पूरे देश में उम्मीद की एक लहर

[04:00:33] दौड़ा दी। 1 साल में स्वराज। क्या यह वाकई

[04:00:35] मुमकिन था? या यह सिर्फ लोगों में जोश

[04:00:38] भरने का एक तरीका था?

[04:00:39] कह सकते हैं कि दोनों बातें थी। यह एक

[04:00:41] बहुत बड़ा वादा था, लेकिन इसने लोगों को

[04:00:44] यकीन दिलाया कि आजादी कोई दूर का सपना

[04:00:46] नहीं है बल्कि एक हासिल किया जा सकने वाला

[04:00:49] लक्ष्य है। इस एक नारे ने लाखों लोगों को

[04:00:52] घर से बाहर निकलकर आंदोलन में शामिल होने

[04:00:54] की हिम्मत दी।

[04:00:55] ठीक है। तो लक्ष्य तय हो गए। कांग्रेस ने

[04:00:57] मंजूरी दे दी। लोगों में जोश भर गया लेकिन

[04:01:00] जमीन पर इसे लागू कैसे किया गया? असहयोग

[04:01:02] करने का मतलब क्या था? क्या लोग बस घर पर

[04:01:04] बैठ गए?

[04:01:04] नहीं नहीं। इसके दो बिल्कुल साफ रास्ते

[04:01:07] थे। पहला था नकारात्मक यानी बहिष्कार।

[04:01:10] सरकारी उपाधियां लौटा दी गई। वकीलों ने

[04:01:12] अदालतें छोड़ दी। छात्रों ने स्कूल कॉलेज

[04:01:15] छोड़ दिए। लोगों ने सरकारी नौकरियां छोड़

[04:01:17] दी और सबसे जरूरी विदेशी सामान का

[04:01:20] बहिष्कार किया गया। जगह-जगह विदेशी कपड़ों

[04:01:23] की होली जलाई गई।

[04:01:24] यहां एक दिलचस्प बात स्त्रोत में बताई गई

[04:01:27] है। गांधी जी ने सिर्फ अंग्रेजी नहीं

[04:01:29] बल्कि सभी विदेशी सामान के बहिष्कार की

[04:01:31] बात की। इसके पीछे क्या सोच थी?

[04:01:33] बहुत गहरी सोच थी। गांधी जी का तर्क था कि

[04:01:36] अगर हम सिर्फ अंग्रेजी चीजों का बहिष्कार

[04:01:38] करेंगे तो लोग अमेरिकी या जापानी सामान

[04:01:41] खरीदने लगेंगे। इससे भारत को क्या फायदा

[04:01:43] होगा? उनका असली मकसद स्वदेशी को बढ़ावा

[04:01:46] देना था ताकि भारत आर्थिक रूप से

[04:01:48] आत्मनिर्भर बने।

[04:01:49] यह तो हुआ पहला रास्ता बहिष्कार का। लेकिन

[04:01:52] उन लोगों का क्या जो अपनी नौकरी या पढ़ाई

[04:01:54] नहीं छोड़ सकते थे? क्या उनके लिए भी

[04:01:56] आंदोलन में कोई जगह थी?

[04:01:57] बिल्कुल। और यहीं गांधी जी की दूरदर्शिता

[04:02:00] दिखती है। दूसरा रास्ता था रचनात्मक कार्य

[04:02:02] का। इसमें शराबबंदी के लिए काम करना,

[04:02:05] छुआछोत को मिटाना, हिंदू-मुस्लिम एकता को

[04:02:08] मजबूत करना और चरखा चलाकर खादी बनाना

[04:02:11] शामिल था। यह उन लोगों के लिए था जो सीधे

[04:02:13] सड़कों पर नहीं उतर सकते थे, लेकिन फिर भी

[04:02:16] देश के लिए कुछ करना चाहते थे। यह आंदोलन

[04:02:19] सिर्फ सरकार का विरोध नहीं था। यह समाज का

[04:02:21] अंदर से सुधार भी था।

[04:02:23] कमाल है। मतलब आप लड़ाई भी लड़ रहे हैं और

[04:02:25] साथ-साथ एक बेहतर समाज की नींव भी रख रहे

[04:02:27] हैं। लेकिन क्या सब लोग इस रणनीति से सहमत

[04:02:30] थे? क्या कोई विरोध के स्वर्ण नहीं थे? थे

[04:02:32] और बहुत मजबूत स्वर थे। एनी बेसेंट ने

[04:02:35] विदेशी कपड़ों को जलाने को राष्ट्रीय

[04:02:37] संपत्ति का नाश बताया। मोहम्मद अली जिन्ना

[04:02:40] को लगा कि गांधी जी खिलाफत को असहयोग से

[04:02:43] जोड़कर मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं का

[04:02:45] राजनीतिक इस्तेमाल कर रहे हैं।

[04:02:47] और श्रुत में दो और बड़े नामों का जिक्र

[04:02:49] है जो पूरी तरह सहमत नहीं थे। मोतीलाल

[04:02:51] नेहरू और चित्र चितरंजन दास।

[04:02:53] हां, और यहीं से भविष्य की राजनीति की एक

[04:02:55] नई धारा का जन्म हुआ। इन नेताओं को बाद

[04:02:58] में प्रो चेंजर्स यानी परिवर्तनवादी कहा

[04:03:00] गया। प्रो चेंजर्स मतलब यह बदलाव चाहते

[04:03:03] थे। किस चीज में?

[04:03:03] यह कांग्रेस के बहिष्कार की रणनीति में

[04:03:05] बदलाव चाहते थे। उनका कहना था कि विधानसभा

[04:03:08] चुनावों का बहिष्कार करना एक गलती है।

[04:03:11] असहयोग का मतलब विधानसभाओं से बाहर रहना

[04:03:14] नहीं बल्कि उनके अंदर जाकर सरकार का

[04:03:16] हिस्सा बनकर उनकी भारत विरोधी नीतियों का

[04:03:20] विरोध करना होना चाहिए।

[04:03:21] उनका तर्क था कि अगर हम बाहर रहेंगे तो

[04:03:23] अंग्रेज आसानी से कोई भी कानून पास कर

[04:03:25] लेंगे। लेकिन अगर हम अंदर होंगे तो हर बिल

[04:03:27] पर बहस करेंगे और उनके काम में बाधा

[04:03:29] डालेंगे। यह तो बहुत तार्किक बात लगती है।

[04:03:31] एक तरह से दुश्मन के किले में घुसकर लड़ने

[04:03:33] की रणनीति।

[04:03:34] बिल्कुल। लेकिन उस वक्त कांग्रेस का बहुमत

[04:03:36] गांधी जी के पूर्ण बहिष्कार के साथ।

[04:03:38] खैर, आंदोलन पूरे जोर शोर से चल रहा था।

[04:03:40] सरकार पर जबरदस्त दबाव था। दिसंबर 1921

[04:03:44] में जब प्रिंस ऑफ वेल्स बॉम्बे आए तो उनके

[04:03:46] स्वागत के लिए कोई नहीं था। पूरे शहर में

[04:03:48] हड़ताल थी। सरकार बौखला गई और उसने दमन का

[04:03:51] चक्र तेज कर दिया।

[04:03:52] ऐसा लग रहा था कि मंजिल अब बस करीब है और

[04:03:54] फिर चौरी चौरा हुआ। 4 फरवरी 1922 क्या हुआ

[04:03:58] था उस दिन? और फिर वह हुआ जिसने सब कुछ

[04:04:00] रोक दिया। चौरीचौरा उत्तर प्रदेश के

[04:04:02] गोरखपुर के पास एक छोटा सा कस्बा वहां लोग

[04:04:05] शराब की दुकान और बढ़ती कीमतों के खिलाफ

[04:04:07] शांति से जुलूस निकाल रहे थे। पुलिस ने

[04:04:10] उन्हें रोकने की कोशिश की। झड़प हुई और

[04:04:12] पुलिस ने भीड़ पर गोली चला दी

[04:04:14] और भीड़ बेकाबू हो गई।

[04:04:15] बेकाबू हो गई। गुस्से में लोगों ने पुलिस

[04:04:18] थाने को घेर लिया और उसमें आग लगा दी।

[04:04:20] थाने के अंदर 22 पुलिसकर्मी थे और वह सब

[04:04:23] जिंदा जल गए। यह खबर जब बारदोली में बैठे

[04:04:26] गांधी जी तक पहुंची, तो उनके लिए यह

[04:04:28] असहनीय था। उनके लिए आंदोलन का मूल

[04:04:31] सिद्धांत अहिंसा था और यह घटना उस

[04:04:34] सिद्धांत पर एक सीधा प्रहार थी।

[04:04:36] और उन्होंने 12 फरवरी 1922 को आंदोलन वापस

[04:04:39] ले लिया।

[04:04:40] अपने चरम पर चल रहे एक राष्ट्रव्यापी

[04:04:42] आंदोलन को एक जगह हुई हिंसा की वजह से रोक

[04:04:46] दिया। इसका क्या असर हुआ? लोगों ने इसे

[04:04:48] कैसे लिया? देश स्तब्ध रह गया। किसी को

[04:04:51] यकीन नहीं हुआ। सुभाष चंद्र बोस ने इसे एक

[04:04:54] तानाशाह का फरमान कहा। मोतीलाल नेहरू ने

[04:04:56] बहुत कड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा अगर

[04:04:59] कन्याकुमारी के किसी गांव में कोई अपराध

[04:05:01] होता है तो उसकी सजा हिमालय में बैठे

[04:05:04] व्यक्ति को क्यों दी जाए?

[04:05:05] हम

[04:05:05] ज्यादातर नेताओं को लगा कि गांधी जी ने एक

[04:05:08] जीती हुई बाजी पलट दी है।

[04:05:10] और ब्रिटिश सरकार ने इस मौके का पूरा

[04:05:11] फायदा उठाया। जाहिर है। उन्होंने देखा कि

[04:05:13] आंदोलन रुकने से गांधी जी राजनीतिक रूप से

[04:05:16] थोड़े कमजोर हुए हैं। लोगों में उनके

[04:05:18] फैसले को लेकर गुस्सा है। इसी माहौल का

[04:05:21] फायदा उठाकर 10 मार्च 1922 को उन्हें

[04:05:24] गिरफ्तार कर लिया गया और 6 साल की सजा

[04:05:26] सुना दी गई।

[04:05:27] तो गांधी जी जेल में थे आंदोलन खत्म हो

[04:05:29] चुका था। लोगों में निराशा थी।

[04:05:33] भगत सिंह के शुरुआती जीवन पर अगर नजर

[04:05:35] डालें तो ऐसा लगता है कि क्रांति तो उनके

[04:05:37] खून में ही थी। उनका जन्म 1907 में बंगा

[04:05:40] गांव में हुआ, जो अब पाकिस्तान में है।

[04:05:42] और दिलचस्प बात यह है कि उनका पूरा परिवार

[04:05:45] ही किसी ना किसी तरह आजादी की लड़ाई से

[04:05:47] जुड़ा हुआ था।

[04:05:48] अच्छा।

[04:05:48] हां, यह माहौल बहुत जरूरी था। उनके पिता

[04:05:51] किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह जो पगड़ी

[04:05:54] संभाल जटा आंदोलन के हीरो थे, वह लगातार

[04:05:57] अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सक्रिय थे।

[04:06:00] तो मतलब भगत सिंह ने बचपन से ही घर में

[04:06:02] गिरफ्तारी, देश प्रेम और बगावत की बातें

[04:06:04] सुनी थी?

[04:06:05] बिल्कुल। और स्रोतों में दो किस्से बहुत

[04:06:08] मशहूर हैं जो दिखाते हैं कि यह असर कितना

[04:06:10] गहरा था।

[04:06:11] एक तो वो खेत में बंदूके बोने वाले बात है

[04:06:14] ना।

[04:06:14] हां। जब किसी ने पूछा कि क्या कर रहे हो?

[04:06:17] तो छोटे से भगत सिंह का जवाब था, बंदूके

[04:06:19] बो रहा हूं ताकि जब यह उगेंगी, तो

[04:06:22] अंग्रेजों को भगा सकूंगा।

[04:06:23] और दूसरा किस्सा।

[04:06:24] दूसरा किस्सा तो और भी ज्यादा असरदार है।

[04:06:26] 1919 में जब जलियांवाला बाग का नरसंहार

[04:06:30] हुआ तो भगत सिंह सिर्फ 12 साल के थे।

[04:06:32] बस 12 साल के।

[04:06:33] जी। वह स्कूल से 30 कि.मी. पैदल चलकर उस

[04:06:36] जगह पहुंचे। वहां की खून से सनी मिट्टी एक

[04:06:39] शीशी में भरी और उसे घर ले आए।

[04:06:41] यह सोचना भी मुश्किल है कि एक 12 साल के

[04:06:43] बच्चे पर उस घटना का क्या असर हुआ होगा।

[04:06:46] यह सिर्फ एक मतलब भावनात्मक प्रतिक्रिया

[04:06:48] नहीं थी। नहीं, यह शायद उनके जीवन का पहला

[04:06:51] राजनीतिक एक्शन था। वह मिट्टी उनके लिए

[04:06:54] सिर्फ मिट्टी नहीं थी। वह अन्याय के खिलाफ

[04:06:56] लड़ने का एक संकल्प बन गई। और यहीं से भगत

[04:06:59] सिंह के उस सफर की शुरुआत होती है जहां

[04:07:01] भावना के साथ-साथ विचार भी जुड़ने लगते

[04:07:03] हैं।

[04:07:04] सही कहा।

[04:07:04] एक मिनट। यह बात मुझे बहुत दिलचस्प लगती

[04:07:06] है। आमतौर पर हम क्रांतिकारियों को सिर्फ

[04:07:08] एक्शन में सोचते हैं। बम, पिस्तौल, लेकिन

[04:07:11] स्रोत बताते हैं कि भगत सिंह घंटों

[04:07:13] किताबें पढ़ते थे। क्या यह दोनों बातें एक

[04:07:15] दूसरे के खिलाफ नहीं जाती? मतलब एक विचारक

[04:07:17] और एक एक्शन हीरो।

[04:07:18] यह बहुत अच्छा सवाल है और यही भगत सिंह को

[04:07:21] बाकी क्रांतिकारियों से अलग करता है। वह

[04:07:23] सिर्फ एक्शन नहीं चाहते थे। वह एक्शन के

[04:07:26] पीछे की वजह समझना चाहते थे। उनके लिए

[04:07:28] क्रांति का मतलब सिर्फ अंग्रेजों को भगाना

[04:07:30] नहीं था।

[04:07:31] बल्कि एक नया समाज बनाना था।

[04:07:33] बिल्कुल। और उस समाज का नक्शा उन्हें

[04:07:36] किताबों में मिला। वो बाकुनिन, मार्क्स,

[04:07:39] लेनिन, गौरकी इन सबको पढ़ रहे थे।

[04:07:42] तो क्या हम कह सकते हैं कि उनके विचारों

[04:07:44] पर इन लेखकों का सीधा असर था?

[04:07:45] हां बिल्कुल। जैसे जब हम बाकिनिन की किताब

[04:07:49] गॉड इन द स्टेट का जिक्र सुनते हैं तो

[04:07:52] हमें सीधे तौर पर उनका मशहूर लेख मैं

[04:07:54] नास्तिक क्यों हूं याद आता है।

[04:07:56] वो सिर्फ अंग्रेजों की गुलामी से ही नहीं

[04:07:59] बल्कि दिमागी गुलामी यानी धर्म और

[04:08:02] अंधविश्वास से भी आजादी चाहते थे।

[04:08:04] और मार्क्स और लेनिन को पढ़कर

[04:08:05] उनको पढ़कर उन्होंने समझा कि असली आजादी

[04:08:08] तब आएगी जब किसानों और मजदूरों का राज

[04:08:11] होगा जब इंसान के हाथों इंसान का शोषण

[04:08:14] खत्म होगा। यह विचार ही उनके एक्शन को

[04:08:16] दिशा दे रहे थे।

[04:08:17] इन सब गंभीर बातों के बीच क्या स्रोत हमें

[04:08:19] उनके निजी जीवन के बारे में भी कुछ बताते

[04:08:21] हैं, एक इंसान के तौर पर भगत सिंह कैसे

[04:08:23] थे?

[04:08:23] हां, कई बातें हैं। श्रोतों से पता चलता

[04:08:26] है कि वह खाने-पीने के शौकीन थे। रसगुल्ले

[04:08:28] उन्हें बहुत पसंद थे। लेकिन उनके निजी

[04:08:31] जीवन का एक बड़ा मोड़ तब आया जब 1923 में

[04:08:34] उनकी दादी ने उनकी शादी तय करने की कोशिश

[04:08:36] की।

[04:08:37] और तब उन्होंने घर छोड़ दिया था। है ना?

[04:08:38] हां। उन्होंने अपने पिता को एक खत लिखा जो

[04:08:41] उनके इरादों को साफ कर देता है। उन्होंने

[04:08:43] लिखा मेरी जिंदगी अब एक एक ही बड़े मकसद

[04:08:46] के लिए है भारत की आजादी और मैंने खुद को

[04:08:49] उसी के लिए सौंप दिया है।

[04:08:50] यह कहकर वह घर से निकल गए।

[04:08:52] जी और सीधे कानपुर पहुंचे। वहां वो

[04:08:54] पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी से मिले और

[04:08:56] उनके अखबार प्रताप में बलवंत नाम से लिखने

[04:08:59] लगे।

[04:08:59] और यहीं उनकी मुलाकात अपने जैसे दूसरे

[04:09:01] जोशीले नौजवानों से हुई होगी।

[04:09:03] बिल्कुल कानपुर उस समय क्रांतिकारियों का

[04:09:06] एक बड़ा केंद्र था। यहीं उनकी मुलाकात

[04:09:08] भगवती चरण बोहरा, चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव

[04:09:11] और राजगुरु जैसे साथियों से हुई।

[04:09:13] दुर्गा भाभी से भी वह यहीं मिले थे।

[04:09:15] हां, दुर्गा भाभी यानी भगवती चरण बोहरा की

[04:09:18] पत्नी से भी यहीं मिले। जिन्होंने आगे

[04:09:20] चलकर आंदोलन में बहुत अहम भूमिका निभाई।

[04:09:23] तो अब एक तरह से टीम बननी शुरू हो गई थी।

[04:09:25] जी, 1926 में उन्होंने लाहौर में नौजवान

[04:09:28] भारत सभा की स्थापना की।

[04:09:30] इसका मकसद क्या था?

[04:09:31] इसका मकसद सिर्फ राजनीतिक नहीं था। वह

[04:09:34] युवाओं को धर्म और जाति से ऊपर उठकर एकजुट

[04:09:37] करना चाहते थे। वह चाहते थे कि युवा तर्क

[04:09:39] और विज्ञान की राह पर चलें।

[04:09:41] और इसी बीच उनकी पहली गिरफ्तारी भी हुई।

[04:09:43] हां, दशहरा बम कांड में उन्हें झूठा

[04:09:46] फंसाकर पहली बार गिरफ्तार भी किया गया और

[04:09:48] स्रोत बताते हैं कि उस वक्त भी उनकी जेब

[04:09:51] से गदर आंदोलन के हीरो करतार सिंह सराभा

[04:09:53] की तस्वीर मिली थी।

[04:09:54] जो सिर्फ 19 साल की उम्र में शहीद हो गए

[04:09:57] थे।

[04:09:57] जी सराभा उनके आदर्श थे।

[04:09:59] और फिर 1928 में वह घटना हुई जिसने सब कुछ

[04:10:01] बदल दिया। साइमन कमीशन का विरोध और लाला

[04:10:04] लाजपत राय की शहादत।

[04:10:05] हां, 30 अक्टूबर 1928 को लाहौर में साइमन

[04:10:09] कमीशन के खिलाफ एक शांतिपूर्ण प्रदर्शन हो

[04:10:11] रहा था। जिसका नेतृत्व लाला लाजपत राय कर

[04:10:14] रहे थे।

[04:10:14] और पुलिस सुपरिटेंडेंट जेम्स कॉट ने लाठी

[04:10:17] चार्ज का आदेश दिया।

[04:10:18] बहुत बेरहमी से लाला जी को सिर पर गहरी

[04:10:20] चोटें आई और 17 नवंबर को उनकी मृत्यु हो

[04:10:23] गई। पूरे देश में मतलब गुस्से की लहर दौड़

[04:10:25] गई।

[04:10:26] और नौजवान क्रांतिकारियों के लिए यह एक

[04:10:28] सीधी चुनौती थी।

[04:10:29] यह उनके आत्मसम्मान पर चोट थी। उन्होंने

[04:10:32] तय किया कि लाला जी की मौत का बदला लिया

[04:10:34] जाएगा और इस बदले की योजना में सिर्फ भगत

[04:10:36] सिंह नहीं थे।

[04:10:37] राजगुरु और सुखदेव भी थे?

[04:10:38] हां, शिवराम राजगुरु जो महाराष्ट्र से थे

[04:10:41] और एक बेहतरीन निशानेबाज माने जाते थे और

[04:10:44] सुखदेव थापर जो संगठन के सबसे तेज दिमागों

[04:10:47] में से एक थे और पूरे एक्शन के मुख्य

[04:10:49] योजनाकार थे।

[04:10:50] यह एक टीम का फैसला था।

[04:10:52] योजना तो एसपी स्कॉट को मारने की थी, पर

[04:10:54] गलती से असिस्टेंट एसपी सांडर्स मारा गया।

[04:10:57] जी। 17 दिसंबर 1928 को लाला जी की मौत के

[04:11:01] ठीक 1 महीने बाद भगत सिंह और राजगुरु ने

[04:11:04] सांडर्स को गोली मार दी।

[04:11:06] चंद्रशेखर आजाद पूरे ऑपरेशन को कवर दे रहे

[04:11:08] थे।

[04:11:09] तो सांडर्स की हत्या के बाद क्रांतिकारी

[04:11:11] लाहौर से निकल तो गए लेकिन अब सवाल यह था

[04:11:14] कि अपनी आवाज पूरे देश तक कैसे पहुंचाई

[04:11:16] जाए?

[04:11:17] बिल्कुल।

[04:11:17] सिर्फ एक हत्या से अंग्रेजों पर फर्क नहीं

[04:11:19] पड़ने वाला था। उन्हें एक बड़े धमाके की

[04:11:22] जरूरत थी। और इस बार यह धमाका किसी इंसान

[04:11:25] को मारने के लिए नहीं बल्कि एक विचार को

[04:11:27] जगाने के लिए होना था।

[04:11:28] ईड यानी अपने काम से प्रचार करना कहते

[04:11:30] हैं। उस समय ब्रिटिश सरकार सेंट्रल

[04:11:33] असेंबली में दो बहुत दमनकारी कानून ला रही

[04:11:35] थी।

[04:11:36] पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट

[04:11:38] बिल।

[04:11:38] हां, एक के तहत किसी को भी बिना मुकदमे के

[04:11:41] हिरासत में लिया जा सकता था और दूसरा

[04:11:43] मजदूरों से हड़ताल करने का अधिकार छीन रहा

[04:11:45] था। तो क्रांतिकारियों ने इन बिलों का

[04:11:47] विरोध करने के लिए असेंबली को ही अपना मंच

[04:11:50] बनाने का फैसला किया। और यही 8 अप्रैल

[04:11:52] 1929 की वह ऐतिहासिक घटना हुई। भगत सिंह

[04:11:55] और बटुकेश्वर दत्त ने असेंबली में बम

[04:11:57] फेंका।

[04:11:57] जी उन्होंने जानबूझकर खाली जगह पर बम

[04:12:00] फेंके ताकि किसी को चोट ना लगे। उनका मकसद

[04:12:02] किसी को मारना था ही नहीं।

[04:12:04] और उन्होंने पर्चे भी फेंके थे।

[04:12:05] हां, बम फेंकने के बाद उन्होंने पर्चे

[04:12:08] फेंके जिन पर साफ लिखा था बहरों को सुनाने

[04:12:11] के लिए धमाके की जरूरत होती है। और फिर

[04:12:13] उन्होंने इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते

[04:12:15] हुए अपनी गिरफ्तारी दे दी। यह जो लाइन है

[04:12:18] ना बहरो को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत

[04:12:20] होती है। यह सिर्फ एक नारा नहीं था।

[04:12:21] नहीं, यह एक सोची समझी रणनीति थी। भगत

[04:12:25] सिंह जानते थे कि कोर्ट की सुनवाई देश का

[04:12:28] सबसे बड़ा मंच बन जाएगी। उनका मकसद सजा से

[04:12:31] बचना नहीं बल्कि उस मंच का इस्तेमाल करके

[04:12:34] अपने समाजवादी विचारों को पूरे भारत में

[04:12:37] फैलाना था।

[04:12:38] लेकिन क्या इस एक्शन को लेकर संगठन में

[04:12:40] सभी लोग सहमत थे?

[04:12:41] नहीं। इस पर काफी बहस हुई थी। चंद्रशेखर

[04:12:43] आजाद नहीं चाहते थे कि भगत सिंह इसमें

[04:12:46] जाएं क्योंकि वह संगठन के सबसे बड़े

[04:12:48] विचारक थे

[04:12:48] और आजाद उन्हें खोना नहीं चाहते थे।

[04:12:50] बिल्कुल लेकिन सुखदेव को लगा कि भगत सिंह

[04:12:52] शायद मौत से डर रहे हैं और जिम्मेदारी से

[04:12:55] बचना चाहते हैं। उन्होंने भगत सिंह को

[04:12:56] ताना मारते हुए एक खत भी लिखा। और उस खत

[04:12:59] का जवाब भगत सिंह ने दिया जो उनके विचारों

[04:13:01] की गहराई को दिखाता है।

[04:13:02] हां, भगत सिंह ने सुखदेव को एक लंबा पत्र

[04:13:05] लिखा जिसमें उन्होंने समझाया कि आत्महत्या

[04:13:08] करना कायरता है लेकिन देश के लिए जान देना

[04:13:11] एक महान आदर्श है। उन्होंने लिखा कि वे

[04:13:14] जानते हैं कि गिरफ्तारी के बाद उन्हें

[04:13:16] फांसी हो सकती है लेकिन उनकी शहादत हजारों

[04:13:20] नौजवानों को प्रेरणा देगी।

[04:13:21] और फिर मुकदमा शुरू हुआ जो असल में एक

[04:13:24] वैचारिक लड़ाई बन गया।

[04:13:25] बिल्कुल। उन पर लाहौर षड्यंत्र केस चलाया

[04:13:28] गया। भगत सिंह और उनके साथियों ने अदालत

[04:13:31] को अपने विचारों के प्रचार का माध्यम बना

[04:13:33] लिया। लेकिन उनकी लड़ाई सिर्फ कोर्ट में

[04:13:35] नहीं जेल के अंदर भी चल रही थी।

[04:13:38] आप उस मशहूर भूख हड़ताल की बात कर रही

[04:13:39] हैं?

[04:13:40] जी। उन्होंने जेल में राजनीतिक बंदियों के

[04:13:42] अधिकारों के लिए भूख हड़ताल शुरू की। उनकी

[04:13:45] मांगे बहुत सीधी थी। बेहतर खाना, साफ

[04:13:48] कपड़े और पढ़ने के लिए किताबें और अखबार

[04:13:50] और यह हड़ताल कई दिनों तक चली थी।

[04:13:52] यह हड़ताल 81 दिनों तक चली। अंग्रेजों ने

[04:13:55] उन्हें तोड़ने की हर कोशिश की, लेकिन वे

[04:13:58] डटे रहे। इसी हड़ताल के 63वें दिन जतिन

[04:14:01] दास शहीद हो गए।

[04:14:02] उनकी शहादत ने पूरे देश को हिला के रख

[04:14:04] दिया था।

[04:14:05] हां। और आखिरकार अंग्रेजों को कई मांगे

[04:14:08] माननी पड़ी।

[04:14:08] और फिर 7 अक्टूबर 1930 को फैसला आया।

[04:14:11] हां। जज जीसी हिल्टन ने भगत सिंह, सुखदेव

[04:14:15] और राजगुरु को फांसी की सजा सुनाई।

[04:14:17] यहां एक सवाल हमेशा उठता है और श्रोत भी

[04:14:20] इस पर रोशनी डालते हैं कि क्या भगत सिंह

[04:14:22] को बचाया जा सकता था? यह एक जटिल मुद्दा

[04:14:25] है। लेकिन अगर हम सिर्फ भगत सिंह के नजरिए

[04:14:27] से देखें तो जवाब बहुत साफ है। वह खुद

[04:14:30] बचना ही नहीं चाहते थे।

[04:14:31] अच्छा।

[04:14:32] हां। जब उनके पिता किशन सिंह ने उनके बचाव

[04:14:35] के लिए वाइसराॉय को एक अर्जी दी तो भगत

[04:14:37] सिंह बहुत नाराज हुए। उन्होंने 4 अक्टूबर

[04:14:40] 1930 को अपने पिता को एक सख्त खत लिखा।

[04:14:43] उस खत में उन्होंने क्या कहा था?

[04:14:45] उन्होंने साफ लिखा मेरी जिंदगी इतनी कीमती

[04:14:47] नहीं कि इसे सिद्धांतों को कुर्बान करके

[04:14:50] बचाया जाए। उन्होंने लिखा कि आपने मेरे

[04:14:52] साथ सलाह किए बिना यह अर्ज़ी क्यों दी? यह

[04:14:54] मेरे क्रांतिकारी सिद्धांतों के खिलाफ है।

[04:14:57] तो वह जानते थे कि उनकी मौत का असर उनकी

[04:14:59] जिंदगी से कहीं ज्यादा बड़ा होगा।

[04:15:01] वे इसे साफ देख रहे थे। वे जानते थे कि

[04:15:03] उनकी शहादत क्रांति की उस ज्वाला को और

[04:15:06] भड़का देगी जिसे उन्होंने जलाया था। उनकी

[04:15:09] आखिरी इच्छा भी उनके विचारों को ही

[04:15:11] दर्शाती है।

[04:15:12] वो क्या थी? उन्होंने ख्वाहिर जाहिर की कि

[04:15:14] फांसी से पहले वे बोगा नाम के एक दलित

[04:15:17] सफाई कर्मचारी के घर का बना खाना खाना

[04:15:19] चाहते हैं ताकि समाज को जातिवाद के खिलाफ

[04:15:22] बराबरी का संदेश जाए

[04:15:23] और फिर 23 मार्च 1931 की वो शाम आई

[04:15:26] जी तय तारीख से एक दिन पहले ही 23 मार्च

[04:15:29] की शाम को तीनों को फांसी देने का फैसला

[04:15:32] हुआ उस वक्त भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ़

[04:15:34] रहे थे

[04:15:35] अच्छा

[04:15:35] जब जेलर ने उन्हें बुलाया तो उन्होंने कहा

[04:15:37] ठहरो एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से

[04:15:40] मिल रहा है फिर किताब को हवा में उछालकर

[04:15:42] कर वे फांसी के लिए चल पड़े

[04:15:44] और हंसते-हंसते फांसी पर झूल गए।

[04:15:46] हां, कहा जाता है कि भगत सिंह, सुखदेव और

[04:15:48] राजगुरु मेरा रंग दे बसंती चोला गाते हुए

[04:15:51] और इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते हुए

[04:15:54] फांसी के फंदे पर झूल गए।

[04:15:55] उन्होंने अपने एक दोस्त बटुकेश्वर दत्त को

[04:15:57] लिखे खत में इस शहादत के मकसद को समझाया

[04:16:00] भी था। हैं। उन्हें जीवित रहकर दुनिया को

[04:16:03] यह दिखा देना चाहिए कि क्रांतिकारी न केवल

[04:16:06] अपने आदर्शों के लिए फांसी पर चढ़ सकते

[04:16:08] हैं बल्कि जेलों की अंधकार पूर्ण कोठरियों

[04:16:11] में घुट-घुट कर हर तरह के अत्याचारों को

[04:16:14] सहन भी कर सकते हैं।

[04:16:15] तो भगत सिंह की विरासत सिर्फ एक शहीद की

[04:16:17] नहीं है।

[04:16:18] नहीं बिल्कुल नहीं। वो एक गहरे समाजवादी

[04:16:20] विचारक, एक बेहतरीन लेखक और एक दूरदर्शी

[04:16:23] थे। मैं नास्तिक क्यों हूं? समाजवाद के

[04:16:26] आदर्श यह लेख दिखाते हैं कि वे एक ऐसे

[04:16:28] भारत का सपना देखते थे जहां इंसानों

[04:16:31] द्वारा इंसानों का शोषण ना हो।

[04:16:33] जहां जाति और धर्म के आधार पर कोई भेदभाव

[04:16:35] ना हो उनका नारा इंकलाब जिंदाबाद सिर्फ बम

[04:16:38] और पिस्तौल की क्रांति नहीं थी। है ना?

[04:16:40] नहीं वो अन्याय पर आधारित व्यवस्था को

[04:16:42] बदलकर न्याय समानता और श्रम के सम्मान पर

[04:16:46] आधारित समाज बनाने का आह्वान था। या एक

[04:16:48] विचार था जो आज भी जिंदा है।

[04:16:50] लेकिन फिर 1922 में वह चौरी-चौरा की घटना

[04:16:53] हो जाती है और गांधी जी अचानक आंदोलन वापस

[04:16:56] ले लेते हैं। इसका उन युवाओं पर क्या असर

[04:16:58] पड़ा होगा जिन्होंने अपना सब कुछ दांव पर

[04:17:00] लगा दिया था।

[04:17:00] असर असर बहुत गहरा और निराशाजनक था।

[04:17:04] उन्हें लगा कि उनके साथ धोखा हुआ है। जिस

[04:17:06] आजादी के वह इतने करीब महसूस कर रहे थे,

[04:17:09] वह अचानक उनसे कोसों दूर चली गई। इसी

[04:17:11] निराशा और गुस्से के माहौल में एक सवाल

[04:17:14] पैदा हुआ। क्या सिर्फ अहिंसा और

[04:17:16] शांतिपूर्ण तरीकों से अंग्रेजों को भगाया

[04:17:18] जा सकता है? और बहुतों का जवाब था, नहीं।

[04:17:21] उन्हें एक नए, ज्यादा तेज और असरदार

[04:17:23] रास्ते की तलाश थी।

[04:17:24] और इसी तलाशना ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन

[04:17:27] एसोसिएशन यानी एचआरए को जन्म दिया।

[04:17:30] सही कहा। अक्टूबर 1924 में कानपुर में देश

[04:17:33] के अलग-अलग हिस्सों से आए क्रांतिकारी

[04:17:35] इकट्ठा हुए। इसका नेतृत्व कर रहे थे

[04:17:37] सचिंद्रनाथ सान्याल जिनकी किताब बंदी जीवन

[04:17:41] उस जमाने में क्रांतिकारियों के लिए गीता

[04:17:43] जैसी मानी जाती थी।

[04:17:44] अच्छा

[04:17:44] और उनके साथ कौन थे? राम प्रसाद बिस्मिल,

[04:17:47] योगेश चंद्र चैटर्जी, अशफाक उल्लाह खान और

[04:17:50] एक नौजवान जिसका नाम था चंद्रशेखर आजाद।

[04:17:53] अच्छा तो उनका मकसद सिर्फ अंग्रेजों को

[04:17:55] यहां से भगाना नहीं था। मैं तो हमेशा यही

[04:17:56] सोचता था कि इन क्रांतिकारियों का एक ही

[04:17:58] लक्ष्य था राजनैतिक आजादी। तो फिर और क्या

[04:18:00] था उनके एजेंडे में? यह बहुत दिलचस्प सवाल

[04:18:03] है। एचआरए का मकसद सिर्फ सत्ता का

[04:18:05] हस्तांतरण नहीं था। मतलब ऐसा नहीं कि गोरे

[04:18:07] अंग्रेजों की जगह भूरे अंग्रेज आकर बैठ

[04:18:09] जाएं। वो एक पूरी व्यवस्था बनाना चाहते

[04:18:11] थे। उनके घोषणापत्र द रेवोल्यूशनरी में

[04:18:14] इसकी साफ झलक मिलती है। वो एक ऐसा भारत

[04:18:17] बनाना चाहते थे जहां सबको वोट देने का हक

[04:18:20] हो।

[04:18:20] सबको वोट का हक?

[04:18:21] जिसे आज हम यूनिवर्सल एडल्ट सफरेजा कहते

[04:18:24] हैं। यह उस जमाने के लिए बहुत बड़ी और

[04:18:26] प्रगतिशील सोच थी।

[04:18:28] 1924 में यह वाकई कमाल की बात। और क्या था

[04:18:31] उनके विज़न में?

[04:18:32] वह भारत को एक फेडरल रिपब्लिक या राज्यों

[04:18:35] का संघ बनाना चाहते थे। यानी एक ऐसा देश

[04:18:38] जहां अलग-अलग प्रांत अपनी पहचान बनाए रखते

[04:18:41] हुए एक मजबूत केंद्र के साथ जुड़े हो। और

[04:18:44] इन सब सपनों को पूरा करने के लिए उन्हें

[04:18:47] पता था कि एक सशस्त्र क्रांति की जरूरत

[04:18:49] पड़ेगी। जिसके लिए नौजवानों की भर्ती,

[04:18:52] उन्हें ट्रेनिंग देना और हथियार इकट्ठा

[04:18:54] करना जरूरी था। और अपने इन विचारों को

[04:18:56] फैलाने के लिए उन्होंने जो पर्चा निकाला द

[04:18:58] रेवोल्यूशनरी उसने तो तहलका मचा दिया

[04:19:00] होगा।

[04:19:01] तहलका मचा दिया था। सचिंद्रनाथ सान्याल ने

[04:19:04] इस पर्चे में सिर्फ अंग्रेजों की ही नहीं

[04:19:06] बल्कि गांधी जी की नीतियों की भी कड़ी

[04:19:09] आलोचना की है। उन्हें छद्मवेशी महात्मा तक

[04:19:11] कह दिया गया है। इसमें साफ-साफ लिखा था कि

[04:19:14] आजादी मांगने से नहीं मिलेगी। उसे छीनना

[04:19:17] पड़ेगा और उसका एकमात्र रास्ता क्रांति

[04:19:20] है। मतलब यह सिर्फ बम और पिस्तौल की लड़ाई

[04:19:22] नहीं थी। यह विचारों की भी जंग थी। वह देश

[04:19:25] को बता रहे थे कि वह लड़ क्यों रहे हैं।

[04:19:28] जाहिर है सरकार की नजर उन पर पड़ गई होगी।

[04:19:30] बिल्कुल। सन्याल और योगेश चंद्र चटर्जी

[04:19:32] जैसे बड़े नेताओं को जल्द ही गिरफ्तार कर

[04:19:35] लिया गया। अब एचआरए की कमान आ गई पंडित

[04:19:37] राम प्रसाद बिस्मिल के हाथों में। संगठन

[04:19:39] बन चुका था। विचार भी साफ थे। लेकिन एक

[04:19:42] बहुत बड़ी कमी थी पैसा। क्रांति के लिए

[04:19:44] हथियार खरीदने थे। पर्चे छापने थे और इन

[04:19:47] सबके लिए पैसा चाहिए था जो उनके पास नहीं

[04:19:50] था। और यहीं से काकोरी की योजना की शुरुआत

[04:19:52] होती है।

[04:19:53] हां, यहीं से। बिस्मिल ने फैसला किया कि

[04:19:55] वह किसी आम आदमी को नहीं लूटेंगे बल्कि

[04:19:58] सरकारी खजाने को लूटेंगे। यह सिर्फ पैसे

[04:20:00] के लिए नहीं था। यह अंग्रेजी हुकूमत को एक

[04:20:03] सीधी चुनौती भी थी। 9 अगस्त 1925 को एचआरए

[04:20:07] के 10 क्रांतिकारियों ने जिनमें बिस्मिल,

[04:20:09] अशफाक उल्लाह खान और चंद्रशेखर आजाद शामिल

[04:20:12] थे। सहारनपुर से लखनऊ जा रही एट डाउन

[04:20:16] ट्रेन को काकोरी नाम की जगह पर रोक लिया।

[04:20:18] और यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था।

[04:20:20] हमारे स्रोतों के मुताबिक बिस्मिल ने इसकी

[04:20:22] पूरी योजना बनाई थी। उन्होंने क्रेन का

[04:20:25] रूट, समय और गार्ड्स की संख्या सब कुछ पता

[04:20:27] किया था।

[04:20:28] दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने जर्मन

[04:20:30] माउज़र पिस्तौलों का इस्तेमाल किया जो उस

[04:20:33] जमाने में बहुत आधुनिक मानी जाती थी।

[04:20:35] हां, योजना बहुत सटीक थी। उनका मकसद किसी

[04:20:38] को चोट पहुंचाना नहीं था। सिर्फ खजाना

[04:20:39] लूटना था। लेकिन हड़बड़ी में मनमतनाथ

[04:20:41] गुप्ता से गलती से गोली चल गई और एक

[04:20:44] यात्री की मौत। यह एक हादसा था। लेकिन

[04:20:46] इसने इस डकैती को हत्या के मामले में बदल

[04:20:48] दिया।

[04:20:48] और इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने जो कारवाई

[04:20:50] की उसने तो एचआरए की कमर ही तोड़ दी।

[04:20:53] पूरी तरह से एक बहुत बड़ी देशव्यापी

[04:20:55] कारवाई हुई। एचआरए के लगभग 40 सदस्य

[04:20:57] गिरफ्तार कर लिए गए। 29 पर लखनऊ में लंबा

[04:20:59] मुकदमा चला और अंत में चार लोगों को फांसी

[04:21:02] की सजा सुनाई गई। राजेंद्र लाहड़ी, ठाकुर

[04:21:04] रोशन सिंह, अशफाक उल्ला खान और पंडित राम

[04:21:06] प्रसाद बिस्मिल।

[04:21:07] यह सिर्फ चार सजाएं नहीं थी। यह पूरे

[04:21:10] आंदोलन के लिए एक बहुत बड़ा झटका था। बहुत

[04:21:12] बड़ा। यह जानना जरूरी है कि यह सिर्फ चार

[04:21:15] नाम नहीं थे। राम प्रसाद बिस्मिल फांसी पर

[04:21:18] जाने से पहले सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे

[04:21:21] दिल में है गा रहे थे। अशफाक उल्लाह खान

[04:21:23] ने संदेश दिया कि वह पहले मुसलमान है जो

[04:21:26] देश की आजादी के लिए फांसी पर चढ़ रहे

[04:21:29] हैं। इन बलिदानों ने पूरे देश को झकझोड़

[04:21:31] कर रख दिया था। काकुरी के बाद एचआरए लगभग

[04:21:34] खत्म हो गया। बड़े नेता या तो शहीद हो गए

[04:21:37] थे या जेलों में थे। एक पल को ऐसा लगा कि

[04:21:40] शायद यह क्रांतिकारी लहर यहीं खत्म हो

[04:21:42] जाएगी।

[04:21:43] लेकिन चिंगारी अभी बुझी नहीं थी।

[04:21:45] नहीं बिल्कुल नहीं। और इस राख से एक नया

[04:21:47] संगठन एक नई और ज्यादा मजबूत सोच के साथ

[04:21:50] उठने वाला था। यहां एंट्री होती है भगत

[04:21:53] सिंह, सुखदेव और भगवती चरण बोहरा जैसे

[04:21:56] नौजवानों की जो एक अलग ही जोश और वैचारिक

[04:21:59] स्पष्टता के साथ सामने आए। काकोरी के बाद

[04:22:01] जो खालीपन आया था, उसे इन लोगों ने भरा।

[04:22:04] 1926 में उन्होंने पंजाब में नौजवान भारत

[04:22:07] सभा बनाई जो एक तरह से आने वाले बड़े

[04:22:10] तूफान की तैयारी थी

[04:22:11] और चंद्रशेखर आजाद जो काकोरी कांड में

[04:22:14] पकड़ में नहीं आए थे वह इस दौरान क्या कर

[04:22:16] रहे थे

[04:22:16] आजाद उस बिखरे हुए आंदोलन के धागों को फिर

[04:22:19] से जोड़ने की कोशिश कर रहे थे वह जानते थे

[04:22:21] कि अलग-अलग गुटों में बटकर अंग्रेजों से

[04:22:24] नहीं लड़ा जा सकता। उन्होंने बचे हुए सभी

[04:22:27] क्रांतिकारियों से संपर्क साधना शुरू किया

[04:22:30] और आखिरकार 10 सितंबर 1928 को दिल्ली के

[04:22:34] फिरोजशाह कोटला के खंडरों में एक गुप्त

[04:22:37] मीटिंग बुलाई गई।

[04:22:38] और इसी मीटिंग में एचआरए को एक नया रूप

[04:22:40] मिला।

[04:22:40] एक नया रूप भी और एक नई आत्मा भी। यहीं पर

[04:22:43] एचआरए का नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट

[04:22:46] रिपब्लिकन एसोसिएशन यानी एचएसआरए रखा गया।

[04:22:50] तो एचएसआरए ने आते ही बड़े एक्शन लिए।

[04:22:53] सोंडर्स की हत्या, असेंबली में बम फेंकना

[04:22:55] यह सब इसी नई सोच का नतीजा थे।

[04:22:57] इसी दौर में गांधी जी और क्रांतिकारियों

[04:23:00] के बीच वैचारिक मतभेद और भी खुलकर सामने

[04:23:03] आए। है ना?

[04:23:04] हां, यह टकराव अपने चरम पर था। जब एचएसआरए

[04:23:06] के सदस्यों ने वायसरॉय इरविन की ट्रेन को

[04:23:08] बम से उड़ाने की कोशिश की तो गांधी जी ने

[04:23:10] अपने अखबार यंग इंडिया में एक लेख लिखा। द

[04:23:13] कल्ट ऑफ द बम यानी बम की पूजा। उन्होंने

[04:23:15] क्रांतिकारियों के रास्ते की कड़ी निंदा

[04:23:17] की।

[04:23:17] और क्रांतिकारियों ने इसका जवाब भी दिया।

[04:23:19] उन्होंने इसका जवाब बहुत जोरदार तरीके से

[04:23:22] दिया। भगवती चरण बोहरा ने चंद्रशेखर आजाद

[04:23:25] और भगत सिंह से सलाह लेकर एक दस्तावेज

[04:23:28] लिखा। द फिलॉसफी ऑफ द बॉम्ब यानी बम का

[04:23:31] दर्शन। इसमें उन्होंने गांधी जी की आलोचना

[04:23:34] का बिंदु दर बिंदु जवाब दिया। उन्होंने

[04:23:36] लिखा कि अहिंसा हर हाल में सबसे बड़ा धर्म

[04:23:39] नहीं हो सकता और हम बम की पूजा नहीं करते।

[04:23:42] लेकिन हम समझते हैं कि कभी-कभी आजादी की

[04:23:45] लड़ाई में इसकी जरूरत पड़ती है। यह साफ

[04:23:48] करता है कि यह सिर्फ हिंसा बनाम अहिंसा की

[04:23:50] लड़ाई नहीं थी बल्कि आजादी के मायने और

[04:23:53] उसे हासिल करने के तरीकों पर एक गहरी

[04:23:56] दार्शनिक बहस थी।

[04:23:57] और इस पूरी उथल-पुथल के बीच चंद्रशेखर

[04:24:00] आजाद लगातार अंग्रेजों को चकमा देते रहे।

[04:24:02] वह एक पहेली बन गए थे।

[04:24:03] वह एक जीती जागती किमवदंती बन चुके थे।

[04:24:06] अंग्रेज सरकार ने उन पर बड़ा इनाम रखा था।

[04:24:08] लेकिन वह भेष बदलने में इतने माहिर थे कि

[04:24:11] कभी पकड़ में नहीं आए। लेकिन 27 फरवरी

[04:24:14] 1931 का दिन उनके जीवन का आखिरी दिन साबित

[04:24:18] हुआ।

[04:24:18] इलाहाबाद का अल्फ्रेड पार्क

[04:24:19] हां इलाहाबाद का अल्फ्रेड पार्क वो वहां

[04:24:21] अपने कुछ साथियों से मिलने गए थे।

[04:24:24] लेकिन एचएसआरए के ही एक सदस्य वीरभद्र

[04:24:27] तिवारी ने मुखबिरी कर दी। पुलिस को खबर

[04:24:29] मिल गई और देखते ही देखते पुलिस की एक

[04:24:32] बड़ी टुकड़ी ने पार्क को चारों तरफ से घेर

[04:24:34] लिया। पुलिस की तरफ से नेतृत्व कर रहा था

[04:24:36] नॉट बाबर। और फिर वह ऐतिहासिक मुठभेड़

[04:24:39] शुरू हुई।

[04:24:40] एक तरफ अकेला शेर और दूसरी तरफ दर्जनों

[04:24:43] पुलिस वाले।

[04:24:44] आजाद ने एक पेड़ की आड़ लेकर लड़ना शुरू

[04:24:46] किया। वह चाहते थे कि उनके साथी सुखदेव

[04:24:49] राज सुरक्षित निकल जाए। उन्होंने जबरदस्त

[04:24:52] बहादुरी दिखाते हुए पुलिस को रोक के रखा

[04:24:54] और सुखदेव राज को भागने का मौका दिया। वह

[04:24:57] आखिरी दम तक लड़ते रहे। लेकिन जब उनकी

[04:25:00] पिस्तौल में सिर्फ एक गोली बची तो उन्हें

[04:25:02] अपनी वह कसम याद आई।

[04:25:04] आजाद हैं और आजाद रहेंगे। हां, उन्होंने

[04:25:07] वह आखिरी गोली अंग्रेजों पर चलाने की बजाय

[04:25:10] अपनी कनपटी पर दाग ली। उन्होंने शहीद होना

[04:25:12] चुना लेकिन दुश्मन के हाथों जिंदा पकड़ा

[04:25:15] जाना मंजूर नहीं किया। इस तरह चंद्रशेखर

[04:25:18] आजाद ने अपनी कसम को पूरा किया। सो 1920

[04:25:22] के दशक का भारत माहौल में आजादी की एक लहर

[04:25:25] है।

[04:25:26] पहला साइमन कमीशन वो चिंगारी जिसने पूरे

[04:25:28] देश में मतलब विरोध की आग लगा दी। दूसरा

[04:25:31] उसी आग के बीच लॉर्ड बर्किन हेड की चुनौती

[04:25:34] का जवाब नेहरू रिपोर्ट जिसे भारतीय

[04:25:36] संविधान का पहला ब्लूप्रिंट कहा जाता है

[04:25:39] और तीसरा उस रिपोर्ट पर हुई असहमति जिसने

[04:25:41] मोहम्मद अल जिन्ना के 14 सूत्रों को जन्म

[04:25:44] दिया और भारत की राजनीति की दरारों को और

[04:25:46] भी गहरा कर दिया।

[04:25:47] तो चलिए इस कहानी के पन्ने पलटते हैं। तो

[04:25:50] कहानी शुरू होती है साइमन कमीशन से। नवंबर

[04:25:53] 1927 में इसका गठन हुआ। कागजों पर तो इसका

[04:25:56] काम बड़ा सीधा-साधा था। 1919 के जो

[04:25:59] मॉनटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार थे उनकी जांच

[04:26:02] करना और यह बताना कि भारत में और क्या

[04:26:04] संवैधानिक सुधार किए जा सकते हैं। सुनने

[04:26:07] में तो यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया

[04:26:09] लगती है ना?

[04:26:10] लगती तो है लेकिन यहीं पर अंग्रेजों ने एक

[04:26:12] बहुत बड़ी राजनीतिक भूल कर दी। इस कमीशन

[04:26:14] में सात सदस्य थे और सातों के सातों गोरे

[04:26:17] अंग्रेज थे। एक भी भारतीय नहीं।

[04:26:18] एक भी नहीं।

[04:26:19] एक भी नहीं। जरा सोचिए भारत के भविष्य का

[04:26:22] फैसला करने वाली समिति में कोई भारतीय ही

[04:26:24] नहीं है। यह बात भारतीयों को एक तमाचे की

[04:26:25] तरह लगी। इसे सिर्फ एक भूल नहीं बल्कि एक

[04:26:27] राष्ट्रीय अपमान माना गया।

[04:26:28] और इसी वजह से इसका नाम पड़ गया वाइट मैन

[04:26:31] कमीशन या गोरों का कमीशन। मुझे एक बात समझ

[04:26:34] नहीं आती। क्या ब्रिटिश सरकार इतनी नादान

[04:26:37] थी कि उन्हें इस प्रतिक्रिया का अंदाजा

[04:26:39] नहीं था या यह जानबूझकर किया गया था।

[04:26:42] देखिए यह एोगेंस और राजनीतिक गणना का

[04:26:44] मिलाजुला रूप था। लॉर्ड बरकन हेड जैसे

[04:26:46] लोगों का मानना था कि भारतीय इतने बटे हुए

[04:26:49] हैं हिंदू, मुसलमान, सिख, रियासतें

[04:26:51] अलग-अलग पार्टियां कि वह कभी किसी एक बात

[04:26:54] पर सहमत हो ही नहीं सकते। उन्हें लगा कि

[04:26:56] अगर भारतीयों को शामिल किया तो वह आपस में

[04:26:57] ही लड़ते रहेंगे और कोई रिपोर्ट बन ही

[04:26:59] नहीं पाएगी। उन्होंने इस विविधता को भारत

[04:27:01] की कमजोरी समझा। ताकत नहीं

[04:27:02] और उनका यह अंदाजा कितना गलत साबित हुआ।

[04:27:05] जब यह कमीशन 3 फरवरी 1928 को बंबई के तट

[04:27:09] पर उतरा तो उसका स्वागत शांत गलियों से

[04:27:11] नहीं बल्कि साइमन गो बैकक के नारों के

[04:27:14] तूफान से हुआ। पूरे देश में हड़तालें हुई,

[04:27:17] प्रदर्शन हुए।

[04:27:18] हां, कोलकाता में सुभाष चंद्र बोस ने

[04:27:19] मोर्चा संभाला तो लखनऊ में जवाहरलाल नेहरू

[04:27:21] ने यह एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन बन गया था।

[04:27:24] लेकिन सबसे दर्दनाक घटना लाहौर में हुई।

[04:27:26] लाहौर में? हां।

[04:27:27] वहां पंजाब केसरी लाला लाजपत राय एक

[04:27:30] शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व कर

[04:27:33] रहे थे। पुलिस अधिकारी स्कॉट और सैंडर्स

[04:27:35] ने बेरहमी से लाठी चार्ज का आदेश दिया।

[04:27:38] लाला जी को निशाना बनाया गया और उनके सीने

[04:27:40] पर गंभीर चोटें आई। कुछ हफ्तों बाद 17

[04:27:43] नवंबर 1928 को इन्हीं चोटों की वजह से

[04:27:46] उनका देहांत हो गया। फिर भी कुल मिलाकर

[04:27:48] देश का मिजाज पूरी तरह कमीशन के खिलाफ था।

[04:27:50] उस समय के गुस्से को उदारवादी नेता सर

[04:27:53] शिवस्वामी अय्यर के एक वाक्य में समझा जा

[04:27:55] सकता है। उन्होंने कहा साइमन कमीशन की

[04:27:57] रिपोर्ट को सीधे कूड़ेदान में फेंक देना

[04:27:59] चाहिए।

[04:28:00] ठीक है। तो साइमन कमीशन का राष्ट्रव्यापी

[04:28:02] विरोध हुआ और इसी माहौल में लॉर्ड बर्किन

[04:28:05] हेड ने वो चुनौती फेंकी जिसका जिक्र हमने

[04:28:08] शुरू में किया था। उन्होंने भारतीय नेताओं

[04:28:10] का मजाक उड़ाते हुए कहा कि अगर तुम में

[04:28:12] इतनी ही काबिलियत है तो एक ऐसा संविधान

[04:28:15] बनाकर दिखाओ जिस पर तुम्हारे सारे दल सहमत

[04:28:18] हो। और भारतीय नेताओं ने इस चुनौती को

[04:28:20] अपमान की तरह नहीं बल्कि एक मौके की तरह

[04:28:22] लिया। मई 1928 में 29 राजनीतिक संगठनों की

[04:28:27] एक सर्वदलीय बैठक बुलाई गई। यह आज अपने आप

[04:28:29] में एक बहुत बड़ी बात थी और इसी बैठक में

[04:28:32] एक समिति बनाने का फैसला हुआ जिसका काम था

[04:28:34] भारत के लिए एक संविधान का मसौदा तैयार

[04:28:37] करना।

[04:28:37] और इस समिति के अध्यक्ष बनाए गए मोतीलाल

[04:28:40] नेहरू।

[04:28:41] जी, मोतीलाल नेहरू जो उस समय के एक बहुत

[04:28:43] बड़े वकील और नेता थे, और जवाहरलाल नेहरू

[04:28:45] के पिता भी। और इसी समिति ने 10 अगस्त

[04:28:48] 1928 को अपनी रिपोर्ट पेश की जिसे आज हम

[04:28:51] नेहरू रिपोर्ट के नाम से जानते हैं। इसे

[04:28:54] अक्सर भारतीय संविधान का ब्लूप्रिंट या

[04:28:57] नीलपत्र कहा जाता है। तो आखिर था क्या इस

[04:29:00] ब्लूप्रिंट में?

[04:29:00] इसमें कई दूरगामी प्रस्ताव थे। सबसे पहला

[04:29:03] और बड़ा प्रस्ताव था भारत को डोमिनियन

[04:29:05] स्टेटस का दर्जा देना।

[04:29:07] 1 मिनट। यह डोमिनियन स्टेटस क्या होता है?

[04:29:09] क्या यह पूरी आजादी थी?

[04:29:10] नहीं, पूरी आजादी नहीं। इसका मतलब था कि

[04:29:13] भारत ब्रिटिश साम्राज्य का ही हिस्सा

[04:29:15] रहेगा। ब्रिटिश राजा या रानी ही भारत के

[04:29:17] भी प्रमुख होंगे लेकिन देश का आंतरिक शासन

[04:29:20] पूरी तरह से भारतीयों के हाथ में होगा।

[04:29:22] रक्षा और विदेशी मामलों पर कुछ हद तक

[04:29:24] ब्रिटिश नियंत्रण बना रहता।

[04:29:25] अच्छा मतलब ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसा

[04:29:28] मॉडल।

[04:29:29] बिल्कुल। उस समय के लिहाज से ये एक बहुत

[04:29:31] बड़ा कदम था।

[04:29:32] और क्या था इस रिपोर्ट में? मुझे पता है

[04:29:34] कि इसमें मौलिक अधिकारों की बात भी थी। जो

[04:29:37] उस जमाने के लिए बहुत क्रांतिकारी रही

[04:29:39] होगी।

[04:29:40] बिल्कुल क्रांतिकारी। रिपोर्ट में 19

[04:29:42] मौलिक अधिकारों की एक विस्तृत सूची थी।

[04:29:44] इसमें भाषण की स्वतंत्रता, धर्म की

[04:29:46] स्वतंत्रता, कानून के सामने बराबरी जैसे

[04:29:49] अधिकार शामिल थे। यह पहली बार था कि किसी

[04:29:51] भारतीय दस्तावेज में नागरिकों के अधिकारों

[04:29:54] को इतनी स्पष्टता से रखा गया था।

[04:29:56] हम

[04:29:56] यह उस सोच को दिखाता है कि आजाद भारत

[04:29:59] सिर्फ अंग्रेजों से आजाद नहीं होगा बल्कि

[04:30:01] अपने हर नागरिक को कुछ बुनियादी अधिकार भी

[04:30:04] देगा।

[04:30:04] एक और दिलचस्प बात थी सुप्रीम कोर्ट की

[04:30:07] स्थापना का प्रस्ताव। रिपोर्ट में कहा गया

[04:30:09] कि अंतिम अपील के लिए ब्रिटेन की प्रिवी

[04:30:11] काउंसिल की जगह भारत में ही एक सुप्रीम

[04:30:14] कोर्ट होना चाहिए। इसका क्या मतलब था?

[04:30:16] इसका मतलब था न्यायिक स्वतंत्रता। उस समय

[04:30:18] भारत में सबसे बड़ी अदालत लंदन में स्थित

[04:30:20] प्रिवी काउंसिल थी।

[04:30:21] यानी भारत के सबसे बड़े कानूनी मामलों का

[04:30:24] फैसला भी अंग्रेज जज करते थे।

[04:30:25] सही कहा। अपना सुप्रीम कोर्ट होने का मतलब

[04:30:27] था कि भारत अपने कानूनी मामलों का फैसला

[04:30:30] खुद करेगा। यह न्यायिक संप्रभुता की दिशा

[04:30:32] में एक बहुत बड़ा कदम था। लेकिन रिपोर्ट

[04:30:35] का एक हिस्सा ऐसा था जिसने सबसे बड़ा

[04:30:37] तूफान खड़ा कर दिया और वह था सांप्रदायिक

[04:30:40] आधार पर अलग निर्वाचन प्रणाली को खत्म

[04:30:42] करने का प्रस्ताव। पहले यह बताइए कि यह

[04:30:44] पृथक निर्वाचन या सेपरेट इलेक्टोरेट्स था

[04:30:47] क्या?

[04:30:48] यह समझना बहुत जरूरी है। पृथक निर्वाचन का

[04:30:50] मतलब सिर्फ सीटों का आरक्षण नहीं था। इसका

[04:30:52] मतलब था कि मुस्लिम मतदाता सिर्फ मुस्लिम

[04:30:55] उम्मीदवार को ही वोट देंगे और हिंदू

[04:30:57] मतदाता सिर्फ हिंदू उम्मीदवार को।

[04:31:00] हां। इसके नतीजा यह होता था कि नेताओं को

[04:31:02] सिर्फ अपने समुदाय को खुश रखने की जरूरत

[04:31:04] होती थी। पूरे चुनाव क्षेत्र की जनता को

[04:31:06] नहीं नेहरू रिपोर्ट का मानना था कि यह

[04:31:08] व्यवस्था भारत को राजनीतिक रूप से हमेशा

[04:31:10] के लिए बांट कर रख देगी।

[04:31:11] तो उन्होंने क्या प्रस्ताव दिया?

[04:31:13] इसलिए रिपोर्ट ने इसे खत्म करके एक

[04:31:15] संयुक्त निर्वाचन प्रणाली का प्रस्ताव

[04:31:17] दिया जिसमें अल्पसंख्यक समुदायों के लिए

[04:31:19] उनकी आबादी के अनुपात में सीटें आरक्षित

[04:31:22] हो। लेकिन वोट सभी लोग मिलकर करें।

[04:31:24] तो एक तरफ डोमिनियन स्टेटस और दूसरी तरफ

[04:31:26] पृथक निर्वाचन को खत्म करना। इन दो

[04:31:29] मुद्दों ने तो भारतीय राजनीति में भूचाल

[04:31:31] ला दिया होगा। विडंबना देखिए जो रिपोर्ट

[04:31:33] सबको जोड़ने के लिए बनी थी उसी ने सबसे

[04:31:36] पहले कांग्रेस के अंदर ही एक दरार पैदा कर

[04:31:38] दी।

[04:31:38] बिल्कुल सही। डोमिनियन स्टेटस किंग गांडान

[04:31:40] कांग्रेस के युवा नेताओं को बिल्कुल पसंद

[04:31:42] नहीं आई। जवाहरलाल नेहरू जो कि रिपोर्ट

[04:31:44] बनाने वाली समिति के सचिव थे और सुभाष

[04:31:46] चंद्र बोस जैसे नेताओं ने इसे सिरे से

[04:31:48] खारिज कर दिया।

[04:31:49] क्यों?

[04:31:49] उनका तर्क था कि अब आधा अधूरा राज नहीं

[04:31:52] पूर्ण स्वराज यानी पूरी आजादी चाहिए। उनके

[04:31:55] लिए डोमिनियन स्टेटस आजादी से समझौता करने

[04:31:57] जैसा था। यहां एक दिलचस्प पिता पुत्र का

[04:31:59] टकराव भी देखने को मिलता है। मोतीलाल

[04:32:01] नेहरू रिपोर्ट के अध्यक्ष थे और डोमिनियन

[04:32:04] स्टेटस के पक्ष में थे। जबकि उनके बेटे

[04:32:06] जवाहरलाल इसके कट्टर विरोधी।

[04:32:08] हां, यह एक पीढ़ी का तो वैचारिक टकराव था।

[04:32:10] मोतीलाल और पुराने नेता इसे एक व्यवहारिक

[04:32:12] कदम मानते थे। एक सीढ़ी जिस पर चढ़कर

[04:32:15] आजादी तक पहुंचा जा सकता है। वहीं

[04:32:17] जवाहरलाल और बोस का मानना था कि अब और

[04:32:19] इंतजार नहीं किया जा सकता। उन्होंने अपनी

[04:32:21] बात पर जोर देने के लिए इंडिपेंडेंस फॉर

[04:32:23] इंडिया लीग नाम से एक अलग संगठन भी बना

[04:32:26] लिया। कांग्रेस के अंदर का यह मतभेद

[04:32:27] सार्वजनिक हो गया।

[04:32:28] तो फिर इस टकराव को सुलझाया कैसे गया?

[04:32:31] यहां गांधी जी ने एक मध्यस्थ की भूमिका

[04:32:33] निभाई। वह जानते थे कि अगर कांग्रेस ही

[04:32:35] टूट गई तो आजादी की लड़ाई कमजोर पड़

[04:32:37] जाएगी। उन्होंने एक बीच का रास्ता निकाला।

[04:32:39] एक समझौता हुआ जिसके तहत ब्रिटिश सरकार को

[04:32:41] नेहरू रिपोर्ट को स्वीकार करने के लिए 31

[04:32:44] दिसंबर 1929 तक यानी 1 साल का अल्टीमेटम

[04:32:48] दिया गया।

[04:32:48] एक साल का अल्टीमेटम।

[04:32:50] जी। और साथ ही यह भी तय हुआ कि अगर एक साल

[04:32:52] में सरकार ने यह मांग नहीं मानी तो

[04:32:54] कांग्रेस का लक्ष्य डोमिनियन स्टेटस से

[04:32:56] बदलकर पूर्ण स्वराज हो जाएगा और वह एक

[04:32:59] बड़ा जन आंदोलन शुरू करेगी।

[04:33:01] ठीक है तो कांग्रेस के अंदर का मसला तो एक

[04:33:02] साल के लिए टल गया लेकिन नेहरू रिपोर्ट का

[04:33:05] जो दूसरा विवादास्पद बिंदु था पृथक

[04:33:07] निर्वाचन को खत्म करना उसने तो बाहर एक

[04:33:09] बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया।

[04:33:11] हां और इस तूफान के केंद्र में थे मोहम्मद

[04:33:14] अली जिन्ना। जब सर्वदलीय बैठक में नेहरू

[04:33:16] रिपोर्ट पर चर्चा हो रही थी, तो जिन्ना ने

[04:33:18] कुछ संशोधन सुझाए। उनकी मुख्य मांग थी कि

[04:33:21] केंद्रीय विधायिका में मुसलमानों को 1/3

[04:33:24] मतलब 33% आरक्षण दिया जाए और प्रांतों को

[04:33:27] ज्यादा अधिकार मिले।

[04:33:28] और

[04:33:28] जब उनके इन संशोधनों को खारिज कर दिया गया

[04:33:30] तो वह बैठक से बाहर चले गए।

[04:33:32] पर जिन्ना इतने नाराज क्यों हुए? नेहरू

[04:33:34] रिपोर्ट तो अल्पसंख्यकों के लिए सीटें

[04:33:37] आरक्षित कर ही रही थी।

[04:33:38] देखिए यह सिर्फ सीटों के गणित का सवाल

[04:33:40] नहीं था। यह दो अलग-अलग राजनीतिक दर्शनों

[04:33:43] का टकराव था। नेहरू रिपोर्ट एक मजबूत

[04:33:45] केंद्र वाली सरकार बना रही थी इस धारणा के

[04:33:47] साथ कि हम सब पहले भारतीय हैं और हमारी

[04:33:49] राष्ट्रीय पहचान सबसे ऊपर है।

[04:33:51] और जिन्ना का नजरिया

[04:33:52] जिन्ना और मुस्लिम लीग के एक बड़े हिस्से

[04:33:54] का तर्क था कि भारत जैसे देश में जहां एक

[04:33:57] समुदाय का भारी बहुमत हो वहां अल्पसंख्यक

[04:34:00] खासकर मुसलमान अपने राजनीतिक और

[04:34:02] सांस्कृतिक पहचान खो सकते हैं। वो एक ऐसा

[04:34:04] संघीय ढांचा चाहते थे जहां प्रांतों को

[04:34:06] ज्यादा ताकत मिले और केंद्र में मुसलमानों

[04:34:08] की आवाज की गारंटी हो जो सिर्फ आरक्षण से

[04:34:11] नहीं बल्कि पृथक निर्वाचन जैसी व्यवस्था

[04:34:13] से ही संभव थी।

[04:34:14] तो ये राष्ट्र की दो अलग-अलग परिभाषाओं का

[04:34:17] टकराव था

[04:34:18] और इसी असहमति के जवाब में जिन्ना ने

[04:34:21] मार्च 1929 में अपना प्रसिद्ध 14 सूत्रीय

[04:34:24] कार्यक्रम पेश किया।

[04:34:26] जी ये 14 सूत्र नेहरू रिपोर्ट का एक तरह

[04:34:29] से जवाब थे। इसमें मुख्य बातें थी एक

[04:34:31] संघीय संविधान हो जिसमें बची हुई शक्तियां

[04:34:34] प्रांतों के पास हो। सभी प्रांतों को समान

[04:34:36] स्वायत्तता मिले। केंद्रीय विधायिका में

[04:34:38] मुसलमानों के लिए 1/3 आरक्षण हो और सबसे

[04:34:41] महत्वपूर्ण पृथक निर्वाचन प्रणाली को जारी

[04:34:43] रखा जाए जब तक कि कोई समुदाय खुद इसे

[04:34:45] छोड़ने के लिए तैयार ना हो।

[04:34:47] अगर हम इसे बड़े परिप्रेक्ष्य में देखें

[04:34:49] तो यह एक निर्णायक मोड़ था।

[04:34:51] बहुत बड़ा मोड़। नेहरू रिपोर्ट एक एकीकृत

[04:34:53] राष्ट्रीय पहचान बनाने की कोशिश कर रही

[04:34:55] थी। जहां धार्मिक पहचान एक निजी मामला हो।

[04:34:57] वहीं जिन्ना के 14 सूत्र उस राष्ट्र के

[04:34:59] भीतर एक अलग मुस्लिम राजनीतिक पहचान को

[04:35:01] सुरक्षित और स्थाई बनाने पर जोर दे रहे

[04:35:04] थे।

[04:35:04] यहां से कांग्रेस और मुस्लिम लीग के

[04:35:05] रास्ते अलग होने शुरू हो गए और यह उन

[04:35:07] घटनाओं की श्रंखला में एक महत्वपूर्ण कड़ी

[04:35:09] थी जो आखिरकार देश के विभाजन तक ले गई।

[04:35:12] तो जैसा कि तय था एक साल का अल्टीमेटम बीत

[04:35:14] गया। 31 दिसंबर 1929 की तारीख आ गई और

[04:35:18] ब्रिटिश सरकार ने नेहरू रिपोर्ट पर कोई

[04:35:20] ध्यान नहीं दिया। इसके बाद क्या हुआ?

[04:35:22] इसके बाद कांग्रेस ने वही किया जिसका उसने

[04:35:24] वादा किया था। दिसंबर 1929 में कांग्रेस

[04:35:27] का ऐतिहासिक वार्षिक अधिवेशन लाहौर में

[04:35:30] रावी नदी के किनारे हुआ। माहौल में एक नई

[04:35:32] ऊर्जा और संकल्प था।

[04:35:33] और इस अधिवेशन के अध्यक्षता भी बहुत

[04:35:35] सांकेतिक थी। है ना?

[04:35:37] बिल्कुल। अध्यक्ष पद के लिए गांधी जी का

[04:35:39] नाम सबसे आगे था। लेकिन उन्होंने अपना नाम

[04:35:40] वापस ले लिया और जवाहरलाल नेहरू के नाम का

[04:35:43] प्रस्ताव रखा। सरदार पटेल जैसे वरिष्ठ

[04:35:45] नेताओं ने भी इसका समर्थन किया। यह सिर्फ

[04:35:47] एक व्यक्ति का चुनाव नहीं था। यह कांग्रेस

[04:35:49] में एक पीढ़ी बदलाव का संकेत। मतलब यह एक

[04:35:51] ऐलान था कि अब आजादी की लड़ाई की कमान

[04:35:54] युवा पीढ़ी के हाथों में है।

[04:35:55] हां, और जिनका लक्ष्य साफ था पूर्ण

[04:35:57] स्वराज।

[04:35:58] और इसी लाहौर अधिवेशन में वो ऐतिहासिक

[04:36:00] फैसले लिए गए जिन्होंने स्वतंत्रता

[04:36:02] संग्राम की दिशा हमेशा के लिए बदल दी।

[04:36:05] हां, तीन बड़े फैसले हुए। पहला कांग्रेस

[04:36:07] ने आधिकारिक तौर पर अपना लक्ष्य डोमिनियन

[04:36:09] स्टेटस से बदलकर पूर्ण स्वराज यानी

[04:36:12] कंप्लीट इंडिपेंडेंस घोषित कर दिया।

[04:36:14] मतलब अब कोई समझौता नहीं।

[04:36:15] कोई गुंजाइश नहीं। दूसरा फैसला था 26

[04:36:18] जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में

[04:36:20] मनाने का।

[04:36:21] जी, तय हुआ कि 26 जनवरी 1930 को पूरे देश

[04:36:24] में पहला स्वतंत्रता दिवस मनाया जाएगा। और

[04:36:27] इसी अधिवेशन में 31 दिसंबर 1929 की आधी

[04:36:30] रात को कड़कड़ाती ठंड में अध्यक्ष

[04:36:32] जवाहरलाल नेहरू ने रावी नदी के तट पर

[04:36:35] हजारों लोगों के सामने तिरंगा फहराया और

[04:36:37] इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाया।

[04:36:39] वो सिर्फ एक घोषणा नहीं थी। है ना? नहीं,

[04:36:41] वह एक एहसास था कि अब वापसी का कोई रास्ता

[04:36:43] नहीं है।

[04:36:44] और तीसरा बड़ा फैसला?

[04:36:45] तीसरा फैसला था गांधी जी को एक नया

[04:36:48] राष्ट्र व्यापी आंदोलन शुरू करने का पूरा

[04:36:50] अधिकार देना। और इसी अधिकार के तहत कुछ

[04:36:53] महीनों बाद गांधी जी ने अपनी प्रसिद्ध

[04:36:55] दांडी यात्रा के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन

[04:36:58] की शुरुआत सविनय अवज्ञा आंदोलन यानी सिविल

[04:37:01] डिसओबिडियंस मूवमेंट की कहानी और गांधी जी

[04:37:04] ने अप्रैल 1930 में इसकी शुरुआत की। कहते

[04:37:06] हैं कि उन्हें इसकी प्रेरणा अमेरिकी लेखक

[04:37:08] हेनरी डेविड थरो से मिली थी। हां जिनका

[04:37:10] मानना था कि अनैतिक कानूनों का उल्लंघन

[04:37:12] करना नागरिकों का कर्तव्य है।

[04:37:14] लेकिन 1 मिनट थरों का विचार तो एक पश्चिमी

[04:37:16] राजनीतिक विचार था। क्या भारत में इसकी

[04:37:18] कोई अपनी जमीन थी? या यह विचार पूरी तरह

[04:37:20] से बाहर से लिया गया था?

[04:37:22] यह एक दिलचस्प सवाल है। देखिए थरों का

[04:37:24] प्रभाव तो था लेकिन गांधी जी ने इसे

[04:37:26] सत्याग्रह के भारतीय दर्शन से जोड़ दिया।

[04:37:28] यह सिर्फ कानून तोड़ना नहीं था बल्कि सत्य

[04:37:31] के लिए कष्ट सहने की एक आध्यात्मिक

[04:37:33] प्रक्रिया थी।

[04:37:34] समझ गया? उन्होंने एक पश्चिमी राजगनीतिक

[04:37:37] विचार को एक भारतीय आध्यात्मिक ढांचे में

[04:37:40] ढाल दिया जिससे यह आम लोगों के लिए ज्यादा

[04:37:42] अपना और शक्तिशाली बन गया।

[04:37:44] तो अब समझते हैं कि इस बड़े टकराव की नौबत

[04:37:46] आई क्यों? 1922 में चौरीचौरा के बाद तो सब

[04:37:49] शांत हो गया था। फिर अचानक इतना बड़ा

[04:37:51] आंदोलन खड़ा करने की जरूरत क्यों पड़ी?

[04:37:53] इसकी कई ठोस वजह थी। पहली अंग्रेजों ने

[04:37:56] नेहरू रिपोर्ट को पूरी तरह से खारिज कर

[04:37:58] दिया था। यह रिपोर्ट भारतीयों द्वारा अपना

[04:38:00] संविधान बनाने की पहली गंभीर कोशिश थी और

[04:38:03] इसे ठुकराकर अंग्रेजों ने एक तरह से संदेश

[04:38:06] दिया कि वे भारतीयों को स्वशासन के लायक

[04:38:09] नहीं समझते।

[04:38:10] और दूसरा कारण

[04:38:11] दूसरा गांधी जी की 11 मांगों को वायसराय

[04:38:14] इरविन ने मतलब रद्दी की टोकरी में फेंक

[04:38:16] दिया।

[04:38:17] इन 11 मांगों में ऐसा क्या खास था? क्या

[04:38:19] यह सिर्फ बड़ी-बड़ी राजनीतिक मांगे थी?

[04:38:21] नहीं। और यही तो इनकी खूबी थी। इन मांगों

[04:38:23] में राजनीतिक कैदियों की रिहाई जैसी बड़ी

[04:38:25] बातों के साथ-साथ सेना का खर्च घटाने,

[04:38:28] नमक पर टैक्स खत्म करने और लगान कम करने

[04:38:32] जैसी आम लोगों से जुड़ी बातें भी थी।

[04:38:34] गांधी जी यह दिखाना चाहते थे कि कांग्रेस

[04:38:37] सिर्फ पढ़े लिखे लोगों की नहीं बल्कि हर

[04:38:40] किसान हर गरीब की बात कर रही है।

[04:38:42] तो जब वायसराय ने इन मांगों को नजरअंदाज

[04:38:44] किया तो यह संदेश साफ था सरकार किसी की भी

[04:38:47] सुनने को तैयार नहीं है।

[04:38:48] बिल्कुल। और जैसा हमने शुरू में कहा 1922

[04:38:51] से 1929 तक लोगों में एक निराशा भी थी।

[04:38:54] सत्याग्रह पर से भरोसा उठ चुका था।

[04:38:56] बिल्कुल एक तरह का सन्नाटा था। लेकिन 1928

[04:38:58] में गुजरात के बारदोली में कुछ ऐसा हुआ

[04:39:01] जिसने इस सन्नाटे को तोड़ दिया।

[04:39:03] बारदोली में?

[04:39:04] हां, वहां सरकार ने अचानक लगान 30% बढ़ा

[04:39:07] दिया। यह किसानों के लिए तबाही जैसा था।

[04:39:10] तब सरदार वल्लभ भाई पटेल ने मोर्चा

[04:39:12] संभाला। उन्होंने किसानों का एक ऐसा

[04:39:14] अनुशासित सत्याग्रह आयोजित किया जो आगे

[04:39:17] चलकर पूरे देश के लिए एक मिसाल बन गया।

[04:39:19] बारदोली सत्याग्रह में ऐसा क्या अलग था

[04:39:21] जिसने उसे इतना सफल बनाया?

[04:39:23] पटेल ने संगठन पर बहुत जोर दिया। उन्होंने

[04:39:25] लोगों में एकता बनाए रखने के लिए उनसे

[04:39:28] गीता और कुरान पर हाथ रखकर शपथ दिलवाई कि

[04:39:31] वे पीछे नहीं हटेंगे। चाहे कितनी भी

[04:39:34] मुश्किल आए।

[04:39:34] तो यह सिर्फ एक राजनीतिक लड़ाई नहीं रही।

[04:39:37] नहीं, यह एक नैतिक और धार्मिक संकल्प बन

[04:39:39] गया। और जब 2 अगस्त 1928 को गांधी जी खुद

[04:39:42] बारदोली पहुंचे तो सरकार पर दबाव और बढ़

[04:39:45] गया होगा।

[04:39:45] बहुत ज्यादा। आखिरकार सरकार को झुकना

[04:39:48] पड़ा। जो लगान 30% बढ़ाया गया था उसे

[04:39:51] घटाकर सिर्फ 6.03%

[04:39:54] कर दिया गया।

[04:39:54] तो यह एक बहुत बड़ी जीत थी।

[04:39:56] यह सिर्फ जीत नहीं थी। यह एक मनोवैज्ञानिक

[04:39:59] बूस्टर डोज़ थी। बारदोली ने पूरे देश को

[04:40:01] दिखा दिया कि अहिंसक सत्याग्रह आज भी

[04:40:04] कारगर है। इसने लोगों का खोया हुआ

[04:40:06] आत्मविश्वास लौटा दिया और सविनय अवज्ञा

[04:40:09] जैसे बड़े आंदोलन के लिए एक उपजाऊ जमीन

[04:40:12] तैयार कर दी।

[04:40:13] तो अब मंच तैयार था। सरकार बात सुनने को

[04:40:16] तैयार नहीं थी और लोगों में संघर्ष का

[04:40:18] आत्मविश्वास लौट आया था। गांधी जी की 11

[04:40:20] मांगे खारिज होने पर उन्होंने वह मशहूर

[04:40:22] बात कही थी। हमने घुटने टेक कर रोटी मांगी

[04:40:25] थी लेकिन बदले में हमें पत्थर मिला। अब

[04:40:27] उन्हें एक ऐसे मुद्दे की तलाश थी जो सिर्फ

[04:40:29] राजनीतिक ना हो बल्कि हर भारतीय के दिल को

[04:40:32] छू जाए।

[04:40:32] और वह मुद्दा उन्हें मिला रसोई घर में

[04:40:35] नमक।

[04:40:36] नमक?

[04:40:36] हां, नमक। आज हमें यह अजीब लग सकता है

[04:40:39] लेकिन उस समय नमक एक बहुत शक्तिशाली

[04:40:42] प्रतीक था। गांधी जी ने महसूस किया कि नमक

[04:40:45] ही वह चीज है जो भारत के सबसे अमीर आदमी

[04:40:48] को भी चाहिए और सबसे गरीब को भी। यह

[04:40:50] हिंदुओं और मुसलमान दोनों की थाली का

[04:40:52] हिस्सा है। इस पर लगाया गया टैक्स हर किसी

[04:40:55] को चुभता था। यह नमक का टैक्स था क्या? और

[04:40:58] यह इतना बड़ा मुद्दा क्यों बना?

[04:41:00] अंग्रेजों ने 1882 में एक साल्ट टैक्स बिल

[04:41:03] पास किया था। इसके तहत नमक बनाने पर सरकार

[04:41:05] का एकाधिकार हो गया और उस पर भारी टैक्स

[04:41:08] लगा दिया गया।

[04:41:09] मतलब भारतीय अब खुद नमक नहीं बना सकते थे।

[04:41:12] नहीं। मतलब यह था कि भारतीय जो सदियों से

[04:41:15] समुद्र के किनारे मुफ्त में नमक बनाते आए

[04:41:18] थे, अब ऐसा नहीं कर सकते थे। उन्हें

[04:41:20] अंग्रेजों से महंगा टैक्स वाला नमक खरीदना

[04:41:24] पड़ता था। तो यह सिर्फ एक आर्थिक बोझ नहीं

[04:41:26] था।

[04:41:26] यह हर भारतीय का राष्ट्रीय अपमान था।

[04:41:29] गांधी जी ने इसी अपमान को आंदोलन की ऊर्जा

[04:41:33] बनाने का फैसला किया।

[04:41:34] और फिर ऐलान हुआ ऐतिहासिक दांडी मार्च का।

[04:41:37] हां।

[04:41:37] मुझे इसकी योजना हमेशा बहुत दिलचस्प लगती

[04:41:39] है। मतलब एक-एक चीज कितनी सोची समझी थी।

[04:41:42] हां, यह एक शानदार योजना थी। 12 मार्च

[04:41:44] 1930 को साबरमती आश्रम से यात्रा शुरू

[04:41:47] होगी। 24 दिनों में 385 कि.मी. पैदल चलकर

[04:41:51] 5 अप्रैल को गुजरात के समुद्र तट पर बसे

[04:41:54] एक छोटे से गांव दांडी पहुंचना।

[04:41:56] और अगले दिन 6 अप्रैल को

[04:41:58] मुट्ठी में नमक उठाकर कानून तोड़ना हर

[04:42:00] डिटेल में गहरा संदेश छिपा था।

[04:42:02] जैसे कि दांडी को ही क्यों चुना गया?

[04:42:05] गुजरात में तो कई बड़े शहर थे तट पर।

[04:42:07] और यही तो रणनीति थी। अंग्रेज शायद किसी

[04:42:10] बड़े शहर में एक भव्य प्रदर्शन की उम्मीद

[04:42:13] कर रहे होंगे। लेकिन गांधी जी ने एक अनजान

[04:42:16] दलदली और मुश्किल जगह चुनी। यह कहने का एक

[04:42:19] तरीका था कि भारत की असली ताकत उसके बड़े

[04:42:22] शहरों की चकाचौंध में नहीं

[04:42:24] बल्कि उसके उन गुमनाम कोनों में है जो

[04:42:26] आजादी के लिए कष्ट सहने को तैयार हैं।

[04:42:29] सही बात है। यह उम्मीदों को पलटने की एक

[04:42:32] शानदार रणनीति थी।

[04:42:33] और 6 अप्रैल की तारीख का भी एक खास मतलब

[04:42:35] था। है ना?

[04:42:36] बिल्कुल। 6 अप्रैल से ही 1919 के

[04:42:39] जलियानावाला बाग हत्याकांड की याद में

[04:42:42] राष्ट्रीय सप्ताह मनाया जाता था। तो गांधी

[04:42:44] जी ने शोक के दिन को संघर्ष के दिन में

[04:42:47] बदल दिया।

[04:42:48] वाह! यह एक मास्टर स्ट्रोक था जो कह रहा

[04:42:50] था कि हम अब सिर्फ मातम नहीं मनाएंगे

[04:42:52] बल्कि उस जुल्म का सक्रिय विरोध करेंगे।

[04:42:55] सही।

[04:42:55] उस यात्रा की तस्वीरें आज भी जहन में ताजा

[04:42:58] हैं। गांधी जी जो उस वक्त 61 साल के थे,

[04:43:00] अपनी लाठी के सहारे आगे बढ़ रहे हैं और

[04:43:02] उनके पीछे लोगों का हुजूम।

[04:43:04] उनके साथ 78 चुने हुए सहयोगी थे। जिनमें

[04:43:08] सबसे कम उम्र का सत्याग्रही सिर्फ 16 साल

[04:43:11] का था।

[04:43:12] सब ने सफेद खादी पहनी थी। इसीलिए इस

[04:43:14] यात्रा को वाइट फ्लोइंग रिवर यानी सफेद

[04:43:17] बहती नदी भी कहा गया।

[04:43:18] हां, जो धीरे-धीरे आंदोलन का गीत बन गया।

[04:43:21] यह सिर्फ एक पद यात्रा नहीं थी। यह 24

[04:43:23] दिनों तक चलने वाला एक लाइव मीडिया इवेंट

[04:43:25] था जिस पर पूरी दुनिया की नजर थी।

[04:43:27] और फिर 6 अप्रैल 1930 को वो हुआ जिसका

[04:43:30] सबको इंतजार था। गांधी जी ने दांडी में

[04:43:33] नमक उठाया। इसके बाद क्या हुआ? क्या

[04:43:35] आंदोलन सिर्फ नमक बनाने तक ही सीमित रहा?

[04:43:37] वह एक मुट्ठी नमक एक चिंगारी थी। जैसे ही

[04:43:40] गांधी जी ने कानून तोड़ा, पूरे देश में

[04:43:42] आंदोलन की आग फैल गई। 9 अप्रैल को

[04:43:44] कांग्रेस ने आंदोलन का पूरा कार्यक्रम

[04:43:46] घोषित कर दिया।

[04:43:46] इसमें सिर्फ नमक कानून तोड़ना ही नहीं था

[04:43:49] बल्कि

[04:43:49] विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, सरकारी टैक्स

[04:43:51] ना देना।

[04:43:52] हां, शराब और अफीम की दुकानों पर महिलाओं

[04:43:55] का धरना देना और छुआछूत मिटाने जैसे

[04:43:57] सामाजिक सुधार के काम भी शामिल थे।

[04:43:59] तो यह आंदोलन सिर्फ गुजरात में नहीं बल्कि

[04:44:01] पूरे भारत में फैल गया।

[04:44:03] हां। और यही इसकी सबसे बड़ी कामयाबी थी।

[04:44:06] यह आग सिर दांडी तक ही नहीं रुकी।

[04:44:08] तमिलनाडु में सी राजगोपालाचारी ने गांधी

[04:44:11] जी की ही तरह तिरुचरापल्ली से वेदारण्यम

[04:44:14] तक एक नमक मार्च का नेतृत्व किया।

[04:44:16] और केरल में के किलप्पन ने मोर्चा संभाला।

[04:44:19] सही। लेकिन सबसे हैरान करने वाला नजारा तो

[04:44:22] पेशावर में देखने को मिला।

[04:44:23] पेशावर में जहां अंग्रेज मानते थे कि लोग

[04:44:26] लड़ाके हैं, अहिंसा का पालन नहीं करेंगे।

[04:44:28] उसी पेशावर में खान अब्दुल गफ्फार खान

[04:44:31] जिन्हें लोग प्यार से फ्रंटियर गांधी कहते

[04:44:33] थे। उन्होंने अपने खुदाई खिदमतगार यानी

[04:44:36] ईश्वर के सेवक संगठन के साथ आंदोलन चलाया।

[04:44:39] लाल कुर्ती आंदोलन भी कहते हैं इसे। है

[04:44:41] ना?

[04:44:42] हां, वे लोग लाल रंग की कुर्तियां पहनते

[04:44:44] थे। इसलिए इसे लाल कुर्ती आंदोलन भी कहा

[04:44:46] गया। इसने अंग्रेजों के इस मिथक को तोड़

[04:44:49] दिया कि पश्तून सिर्फ हिंसा की भाषा समझते

[04:44:51] हैं। यह दिखाता है कि आंदोलन ने कैसे

[04:44:54] स्थानीय पहचान और संस्कृति को भी अपने साथ

[04:44:57] जोड़ा। यहां तक कि पूर्वोत्तर भारत में भी

[04:44:59] इसका असर पहुंचा।

[04:45:00] हां, मणिपुर और नागालैंड में यदुनांग और

[04:45:03] उनकी बहन रानी गायदिन ने इस आंदोलन में

[04:45:06] हिस्सा लिया। यह दिखाता है कि आंदोलन की

[04:45:08] पहुंच कितनी गहरी और व्यापक थी। इसके लिए

[04:45:11] यदुनांग को फांसी दे दी गई और सिर्फ 16

[04:45:14] साल की गायदिन को आजीवन कारावास की सजा

[04:45:17] सुनाई गई।

[04:45:18] और सालों बाद जब जवाहरलाल नेहरू उनसे जेल

[04:45:20] में मिले, तो उन्होंने ही उन्हें रानी की

[04:45:22] उपाधि दी थी।

[04:45:23] सही कहा। आंदोलन को इतना फैलता देख

[04:45:25] ब्रिटिश सरकार की क्या प्रतिक्रिया थी?

[04:45:27] वे चुप तो नहीं बैठे होंगे?

[04:45:28] सरकार बुरी तरह घबरा गई। उन्होंने दमन का

[04:45:30] रास्ता अपनाया। 5 मई 1930 को आंदोलन शुरू

[04:45:33] होने के ठीक 1 महीने बाद गांधी जी को

[04:45:36] गिरफ्तार कर लिया गया और पुणे की यरवदा

[04:45:38] जेल भेज दिया गया।

[04:45:39] अंग्रेजों को लगा होगा कि नेता को हटाने

[04:45:41] से आंदोलन खत्म हो जाएगा।

[04:45:43] हां, यही सोचा था उन्होंने।

[04:45:44] लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

[04:45:45] बिल्कुल नहीं। गांधी जी की गिरफ्तारी ने

[04:45:47] आग में घी का काम किया। उनके बाद अब्बास

[04:45:50] तैयब जी ने आंदोलन का नेतृत्व संभाला और

[04:45:52] जब उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तो सरोजनी

[04:45:54] नायडू ने कमान संभाली।

[04:45:56] हां। और यहीं से आंदोलन अपने सबसे नाटकीय

[04:46:00] और भयानक मोड़ पर पहुंचता है। महाराष्ट्र

[04:46:02] के धरसाना नमक डिपो पर।

[04:46:04] धरसाना स्रोतों में इसका जिक्र बहुत भयावह

[04:46:07] तरीके से किया गया है। वहां ऐसा क्या हुआ

[04:46:08] था?

[04:46:09] धरसाना एक सरकारी नमक का गोदाम था। गांधी

[04:46:12] जी ने अपनी गिरफ्तारी से पहले ही यहां

[04:46:14] धावा बोलने की योजना बनाई थी। उनके बाद

[04:46:16] सरोजनी नायडू के नेतृत्व में हजारों

[04:46:19] निहत्ते सत्याग्रही वहां पहुंचे। उनका

[04:46:22] मकसद सिर्फ शांति से गोदाम में घुसकर नमक

[04:46:25] पर कब्जा करना था।

[04:46:26] और पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए क्या

[04:46:27] किया?

[04:46:28] पुलिस ने जो किया वह क्रूरता की इंतहा थी।

[04:46:30] उन्होंने लोहे की मूठ वाली लाठियों से

[04:46:33] सत्याग्रहियों के सर पर मारना शुरू कर

[04:46:35] दिया। लोग लहूलुहान होकर गिर पड़ते। लेकिन

[04:46:38] किसी ने हाथ तक नहीं उठाया।

[04:46:39] मतलब एक जत्था घायल होता तो दूसरा उसकी

[04:46:42] जगह लेने के लिए शांति से आगे बढ़ जाता।

[04:46:44] हां ये एक अविश्वसनीय नजारा था।

[04:46:46] यह सोचना भी मुश्किल है एक तरफ क्रूरता की

[04:46:49] इंतहा और दूसरी तरफ अहिंसक अनुशासन का ऐसा

[04:46:52] शिखर यह इंसान की सहनशीलता की सबसे बड़ी

[04:46:54] परीक्षा थी।

[04:46:55] और इस पूरी परीक्षा को एक अमेरिकी पत्रकार

[04:46:58] वेब मिलर अपनी आंखों से देख रहा था। उसने

[04:47:01] जो लिखा वो दुनिया भर के हजारों अखबारों

[04:47:03] में छापा। उसने लिखा, मैंने 18 देशों में

[04:47:06] कई नागरिक विद्रोह देखे हैं। लेकिन

[04:47:09] धर्शाना जैसा दिल दहला देने वाला नजारा

[04:47:12] मैंने अपनी पूरी जिंदगी में नहीं देखा।

[04:47:14] तो मिलर की रिपोर्टिंग ने ब्रिटिश सरकार

[04:47:16] का असली क्रूर चेहरा पूरी दुनिया के सामने

[04:47:18] नंगा कर दिया।

[04:47:19] हां बिल्कुल।

[04:47:19] तो दर्शाना की घटना ने लड़ाई को भारत से

[04:47:21] निकालकर दुनिया के मंच पर पहुंचा दिया।

[04:47:23] हां और यही इसका सबसे बड़ा असर हुआ। टाइम

[04:47:26] मैगजीन जैसी पत्रिकाओं ने जो पहले गांधी

[04:47:28] जी का मजाक उड़ाती थी। अब उन्हें मैन ऑफ द

[04:47:30] ईयर घोषित किया। इस जबरदस्त अंतरराष्ट्रीय

[04:47:33] दबाव के कारण ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा

[04:47:35] और वॉइसरायॉय इरविन जो गांधी जी से बात

[04:47:37] करने को भी तैयार नहीं थे।

[04:47:39] अब उन्हें गांधी जी को जेल से ले आकर

[04:47:41] बातचीत के लिए बुलाने पर मजबूर होना पड़ा

[04:47:44] ताकि कांग्रेस को लंदन में हो रहे गोलमेज

[04:47:46] सम्मेलनों में शामिल किया जा सके।

[04:47:50] हम इन तीन गोलमेज सम्मेलनों की कहानी को

[04:47:52] समझेंगे। यह लंदन की बैठकें भारत के

[04:47:54] भविष्य के लिए इतनी अहम क्यों थी? चलिए

[04:47:57] इसी सवाल का जवाब ढूंढते हैं।

[04:47:58] हां। और कहानी शुरू करने से पहले थोड़ा सा

[04:48:01] बैकग्राउंड समझना जरूरी है।

[04:48:02] सही बात है।

[04:48:03] आखिर ये सारी पार्टियां लंदन में इकट्ठा

[04:48:05] क्यों हुई?

[04:48:05] इसकी जड़े हैं साइमन कमीशन में।

[04:48:08] अच्छा।

[04:48:08] याद होगा कि 1928 में साइमन कमीशन भारत

[04:48:11] आया था।

[04:48:12] जिसका काम था भारत में संवैधानिक सुधारों

[04:48:14] पर रिपोर्ट देना।

[04:48:15] लेकिन उसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था।

[04:48:17] हां, साइमन गो बैक के नारे। वो तो बहुत

[04:48:19] मशहूर है। जबरदस्त विरोध हुआ था।

[04:48:21] बिल्कुल। तो अंग्रेजों को यह समझ आ गया कि

[04:48:23] भारतीयों के बिना भारत के लिए कानून नहीं

[04:48:25] बनाए जा सकते।

[04:48:26] हम्म।

[04:48:27] तो जब साइमन कमीशन ने 1930 में अपनी

[04:48:29] रिपोर्ट दी तो ब्रिटिश सरकार ने कहा ठीक

[04:48:32] है। अब हम भारतीय नेताओं को भी बुलाते हैं

[04:48:34] और इस रिपोर्ट पर साथ बैठकर बात करते हैं।

[04:48:36] अच्छा तो इसीलिए इन सम्मेलनों का आयोजन

[04:48:38] हुआ।

[04:48:38] एकदम यह कोशिश थी सबको एक टेबल पर लाने

[04:48:41] की।

[04:48:42] ठीक है। तो मंच तैयार है। लंदन का सेंट

[04:48:44] जेम्स पैलेस। साल है 1930 महीना नवंबर का।

[04:48:48] हम

[04:48:48] ब्रिटेन के प्रधानमंत्री हैं रमजे

[04:48:51] मैकडोनाल्ड पहला गोलमेज सम्मेलन शुरू होता

[04:48:54] है और यहां कौन-कौन है?

[04:48:55] एक लंबी लिस्ट है।

[04:48:56] हां, भारत से प्रतिनिधियों की एक लंबी

[04:48:59] लिस्ट है। हिंदू महासभा की तरफ से एमआर

[04:49:01] जैकर और वी एस मुंजे हैं।

[04:49:04] हां।

[04:49:05] और मुस्लिम लीग से मोहम्मद अली जिन्ना और

[04:49:07] आगा खान जैसे बड़े नाम। यही नहीं सिखों की

[04:49:10] तरफ से सरदार संपूर्ण सिंह, ईसाइयों की

[04:49:13] तरफ से केटी पॉल

[04:49:15] और यहां तक कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व

[04:49:17] करने के लिए बेगम जहानारा और राधाबाई

[04:49:19] सुब्बारायन भी वहां थी।

[04:49:20] मतलब यह अपने आप में एक बड़ी बात थी उस

[04:49:23] समय।

[04:49:23] और इन सबके बीच एक आवाज थी जो शायद पहली

[04:49:27] बार इतने बड़े मंच पर गूंज रही थी।

[04:49:29] हां। और वो आवाज थी डॉ. बी आर अंबेडकर की।

[04:49:32] वो दमित वर्गों यानी डिप्रेस्ड क्लासेस का

[04:49:35] प्रतिनिधित्व कर रहे अच्छा।

[04:49:37] अब तक जिन्हें समाज के हाशिए पर रखा गया

[04:49:40] था, उनका एक प्रतिनिधि अब बराबरी से टेबल

[04:49:43] पर बैठकर अपने लोगों के लिए अधिकार मांग

[04:49:46] रहा था।

[04:49:46] और उन्होंने क्या मांग रखी?

[04:49:48] उन्होंने साफ तौर पर दमित वर्गों के लिए

[04:49:50] पृथक निर्वाचन की मांग रखी।

[04:49:52] एक मिनट। यह पृथक निर्वाचन या सेपरेट

[04:49:55] इलेक्टोरेट इसका मतलब क्या है? क्या यह आज

[04:49:57] के आरक्षण जैसा है?

[04:49:58] नहीं नहीं। यह उससे कहीं ज्यादा शक्तिशाली

[04:50:00] था।

[04:50:01] अच्छा। देखिए आरक्षण में सीटें तो आरक्षित

[04:50:03] होती हैं लेकिन वोट सभी लोग करते हैं।

[04:50:06] पृथक निर्वाचन का मतलब था कि दमित वर्ग की

[04:50:09] सीटों पर उम्मीदवार भी दलित होगा।

[04:50:11] ठीक है?

[04:50:11] और उसे वोट देने वाले भी सिर्फ दलित ही

[04:50:14] होंगे।

[04:50:14] ओह मतलब पूरी तरह से अलग।

[04:50:15] हां। अंबेडकर के लिए यह असली राजनीतिक

[04:50:18] सशक्तिकरण का सबसे बड़ा जरिया था। क्योंकि

[04:50:21] तब चुनावा नेता सिर्फ अपने समुदाय के

[04:50:23] प्रति जवाबदेह होता। किसी और के वोटों पर

[04:50:26] निर्भर नहीं।

[04:50:27] समझ गए? मतलब लंदन के उस कमरे में हर कोई

[04:50:29] अपने-अपने समुदाय के लिए सुरक्षा और

[04:50:31] अधिकार मांग रहा था।

[04:50:32] बिल्कुल। मुस्लिम लीग, सिख, रियासतें और

[04:50:35] अब अंबेडकर भी।

[04:50:36] लेकिन इस पूरी तस्वीर में एक बहुत बड़ी

[04:50:38] चीज गायब थी।

[04:50:39] हां, कमरे में एक बहुत बड़ी कुर्सी खाली

[04:50:42] थी।

[04:50:42] और वो कुर्सी थी?

[04:50:44] भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की।

[04:50:45] भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी उस

[04:50:48] मीटिंग में थी ही नहीं।

[04:50:49] और वह क्यों नहीं थी? क्योंकि उस समय

[04:50:52] गांधी जी के नेतृत्व में देश में सविनय

[04:50:54] अवज्ञा आंदोलन मतलब

[04:50:56] सिविल डिसओबिडियंस मूवमेंट

[04:50:58] अपने चरम पर था।

[04:50:59] नमक सत्याग्रह हो चुका था।

[04:51:01] हां। और कांग्रेस के ज्यादातर बड़े नेता

[04:51:04] गांधी जी समेत जेल में थे।

[04:51:07] तो ये एक विरोधाभास है ना?

[04:51:09] हम

[04:51:09] लंदन में भारत के भविष्य पर बात हो रही

[04:51:11] है।

[04:51:11] और भारत का सबसे बड़ा नेता जेल में बैठा

[04:51:14] है।

[04:51:14] बिल्कुल।

[04:51:14] और इसका नतीजा वही हुआ जो होना था जब देश

[04:51:17] की सबसे बड़ी पार्टी ही शामिल नहीं तो आप

[04:51:19] क्या समझौता करेंगे?

[04:51:20] और उसे लागू कैसे करवाएंगे?

[04:51:22] सही बात है। वो मीटिंग वो बिना किसी ठोस

[04:51:24] नतीजे के खत्म हो गई। वह पूरी तरह से फेल

[04:51:27] हो गई।

[04:51:28] हम्।

[04:51:28] लेकिन इससे ब्रिटिश सरकार को एक बात

[04:51:30] साफ-साफ समझ आ गई

[04:51:32] कि कांग्रेस के बिना बात आगे नहीं बढ़

[04:51:34] सकती।

[04:51:34] एकदम उन्हें एहसास हो गया कि भारत का

[04:51:36] भविष्य तय करना है तो गांधी और कांग्रेस

[04:51:39] को टेबल पर लाना ही होगा।

[04:51:41] ओह, अब उन्हें मनाने की कोशिशें शुरू हुई।

[04:51:44] हां। और यहीं से कहानी में एंट्री होती है

[04:51:46] गांधी इरविन पैक्ट की। हां, इसे दिल्ली

[04:51:49] समझौता भी कहते हैं। तारीख थी 5 मार्च

[04:51:52] 1931

[04:51:53] वाइस लॉर्ड इरविन और गांधी जी के बीच एक

[04:51:56] लंबी बातचीत के बाद यह समझौता हुआ। कहते

[04:51:58] हैं कि तेज बहादुर सप्रू और एमआर जयकर

[04:52:01] जैसे नेताओं ने इसमें मतलब बिचोलिए की

[04:52:04] भूमिका निभाई थी।

[04:52:05] सरोजिनी नायडू ने तो मजाक में गांधी और

[04:52:08] इरविन को दो महात्मा तक कह दिया था। हां।

[04:52:10] यह एक तरह का लेन-देन था। एक गिव एंड टेक।

[04:52:13] दोनों पक्षों ने कुछ मांगे मानी और कुछ

[04:52:16] छोड़ी। चलिए इसे थोड़ा खोलते हैं।

[04:52:18] कांग्रेस की कौन सी मांगे मानी गई? पहली

[04:52:20] कि हिंसा के आरोपियों को छोड़कर सभी

[04:52:23] राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया जाएगा।

[04:52:26] हां, यह एक बड़ी मांग थी।

[04:52:27] दूसरी, भारतीयों को समुद्र किनारे निजी

[04:52:30] इस्तेमाल के लिए नमक बनाने का अधिकार

[04:52:32] मिलेगा। हां, बेचने का नहीं।

[04:52:33] इसके अलावा शराब और विदेशी कपड़ों की

[04:52:36] दुकानों के सामने शांतिपूर्ण धरना देने का

[04:52:39] अधिकार भी वापस मिल गया।

[04:52:40] और आंदोलन के दौरान जिन लोगों की जमीन

[04:52:42] जायदाद सरकार ने ज्त कर ली थी, वह भी वापस

[04:52:45] कर दी जाएगी। यह कांग्रेस के लिए बड़ी

[04:52:46] जीतें थी।

[04:52:47] बिल्कुल

[04:52:47] लेकिन बदले में गांधी जी ने क्या माना

[04:52:49] यहां भी कुछ बड़ी बातें थीं सबसे पहली और

[04:52:52] सबसे बड़ी शर्त कि कांग्रेस सविनय अवज्ञा

[04:52:54] आंदोलन को तुरंत रोक देगी।

[04:52:56] हां, यह अंग्रेजो के लिए जरूरी था।

[04:52:58] और दूसरी शर्त यह थी कि कांग्रेस दूसरे

[04:53:00] गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेगी।

[04:53:02] और तीसरी जो काफी विवादास्पद भी रही, वो

[04:53:05] ये थी कि गांधी जी पुलिस की ज्यादतियों की

[04:53:07] सार्वजनिक जांच की मांग छोड़ देंगे।

[04:53:09] अच्छा, यह बहुत एक बहुत बड़ी मांग थी जो

[04:53:12] गांधी जी ने छोड़ दिया।

[04:53:12] हां, जिस पर बाद में उनकी आलोचना भी हुई।

[04:53:15] तो अब दूसरे गोलमेज सम्मेलन के लिए मंच

[04:53:17] तैयार था। इस बार कांग्रेस भी आ रही थी।

[04:53:20] सितंबर 1931 में गांधी जी कांग्रेस के

[04:53:23] एकमात्र प्रतिनिधि के तौर पर एस एस

[04:53:25] राजपूताना जहाज से लंदन पहुंचे।

[04:53:27] और उनका लंदन का अनुभव भी काफी दिलचस्प

[04:53:29] था। वह किसी बड़े होटल में नहीं रुके।

[04:53:31] नहीं।

[04:53:32] बल्कि पूर्वी लंदन के किंग्सले हॉल में

[04:53:34] रुके जो एक गरीब इलाके में था। वो वहां आम

[04:53:37] लोगों के साथ रहे। उन्हीं की तरह सुबह

[04:53:39] टहलने जाते थे।

[04:53:40] वो दुनिया को एक संदेश देना चाहते हां, कि

[04:53:43] वह भारत के करोड़ों गरीबों के प्रतिनिधि

[04:53:45] हैं।

[04:53:45] और उनका पहनावा तो चर्चा का विषय बन ही

[04:53:47] गया।

[04:53:48] हां, वह अपनी वही धोती और लंगोटी में

[04:53:50] सम्राट जॉर्ज पंचम से मिलने बकिंघम पैलेस

[04:53:53] पहुंच गए।

[04:53:54] हां, इसी दौरान विंस्टन चर्चिल ने उन्हें

[04:53:56] वो मशहूर तंज कसा था।

[04:53:57] अंधनाग्न फकीर।

[04:53:59] हाफ नेकेड सिडिशियस फकीर।

[04:54:00] बिल्कुल। लेकिन गांधी जी का जवाब भी उतना

[04:54:03] ही शानदार था।

[04:54:04] हां।

[04:54:04] जब बाद में पत्रकारों ने उनसे पूछा कि

[04:54:06] क्या उन्होंने सम्राट से मिलते हुए कम

[04:54:08] कपड़े नहीं पहने थे? तो गांधी जी ने हंसकर

[04:54:11] कहा, "महामहिम ने हम दोनों के हिस्से के

[04:54:13] कपड़े पहन रखे थे।"

[04:54:14] क्या बात है?

[04:54:15] यह सिर्फ हाजिर जवाबी नहीं थी। यह एक गहरा

[04:54:17] राजनीतिक बयान था। वह कह रहे थे कि

[04:54:19] ब्रिटेन की अमीरी भारत को लूट कर ही बनी

[04:54:22] है।

[04:54:22] भारी बातें लेकिन सम्मेलन के टेबल पर असली

[04:54:25] टकराव तब शुरू हुआ जब बात आई भारत के

[04:54:28] भविष्य के संविधान की।

[04:54:29] हां। और यहां फिर से वही मुद्दा उठा जिसने

[04:54:32] पहले सम्मेलन को भी उलझा दिया था। डॉ.

[04:54:34] अंबेडकर ने दमित वर्गों के लिए पृथक

[04:54:37] निर्वाचन की अपनी मांग को और जोरदार तरीके

[04:54:40] से रखा।

[04:54:41] उन्होंने आंकड़ों और तर्कों से यह साबित

[04:54:44] करने की कोशिश की कि कैसे हजारों सालों से

[04:54:46] दलितों को सामाजिक और राजनीतिक रूप से

[04:54:49] दबाया गया है और अब उन्हें अपने पैरों पर

[04:54:52] खड़े होने के लिए राजनीतिक सुरक्षा की

[04:54:54] जरूरत है।

[04:54:55] और गांधी जी, वह तो इसके सख्त खिलाफ थे।

[04:54:57] उनका तर्क क्या था? वो क्यों इसका इतना

[04:54:59] विरोध कर रहे थे?

[04:55:00] गांधी जी का नजरिया वो बिल्कुल अलग था।

[04:55:02] उनका मानना था कि दलित हिंदू समाज का एक

[04:55:05] अभिन्न अंग है।

[04:55:07] छुआछूत वह हिंदू धर्म पर एक कलंक है। एक

[04:55:10] पाप है जिसे हिंदुओं को खुद पश्चाताप करके

[04:55:12] धोना है।

[04:55:13] अच्छा।

[04:55:14] उनके लिए दलितों को एक अलग राजनीतिक पहचान

[04:55:17] देना हिंदू समाज को हमेशा के लिए बांट

[04:55:19] देता। यह सुधार की प्रक्रिया को शुरू होने

[04:55:22] से पहले ही खत्म कर देता। उनका रास्ता

[04:55:24] हृदय परिवर्तन का था।

[04:55:26] तो एक तरफ अंबेडकर थे जो कह रहे थे कि

[04:55:28] हमें कानूनी और राजनीतिक अधिकार चाहिए।

[04:55:30] हां।

[04:55:30] किसी के हृदय परिवर्तन के भरोसे हम और

[04:55:32] इंतजार नहीं कर सकते। और दूसरी तरफ गांधी

[04:55:34] जी थे जो कह रहे थे कि यह एक सामाजिक और

[04:55:36] आध्यात्मिक समस्या है जिसे राजनीतिक

[04:55:39] बंटवारे से हल नहीं किया जा सकता।

[04:55:40] बिल्कुल यह दो बहुत ही शक्तिशाली ईमानदार

[04:55:44] और अलग-अलग दृष्टिकोणों का टकराव था।

[04:55:46] अंबेडकर का अनुभव कहता था कि बिना

[04:55:49] राजनीतिक शक्ति के सामाजिक सम्मान नहीं

[04:55:51] मिल सकता।

[04:55:52] और गांधी जी का विश्वास कहता था कि

[04:55:54] राजनीतिक बंटवारा सामाजिक एकता को नष्ट कर

[04:55:57] देगा। हां दोनों अपनी-अपनी जगह सही थे और

[04:56:00] दोनों के तर्क बहुत मजबूत थे।

[04:56:02] और इस गहरे मतभेद का नतीजा क्या हुआ?

[04:56:04] नतीजा यह हुआ कि अल्पसंख्यक समुदायों के

[04:56:07] प्रतिनिधित्व के सवाल पर सम्मेलन में

[04:56:09] गतिरोध पैदा हो गया। कोई किसी बात पर सहमत

[04:56:11] नहीं हो पा रहा था।

[04:56:12] तो मतलब दूसरा सम्मेलन भी

[04:56:14] दूसरा सम्मेलन भी बिना किसी ठोस नतीजे के

[04:56:17] दिसंबर 1931 में समाप्त हो गया। गांधी जी

[04:56:20] खाली हाथ भारत लौटे।

[04:56:22] और उनके भारत लौटते ही माहौल फिर से बदल

[04:56:24] गया। वो गांधी-इयरविन पैक एक तरह से टूट

[04:56:26] चुका था। हां, अंग्रेजों ने दमन का नया

[04:56:29] दौर शुरू कर दिया था।

[04:56:31] गांधी जी ने वापस सविनय अवज्ञा आंदोलन

[04:56:33] शुरू करने का ऐलान किया और उन्हें तुरंत

[04:56:35] गिरफ्तार करके पुणे की यरवदा जेल में डाल

[04:56:38] दिया गया।

[04:56:38] अब गेंद वापस ब्रिटिश प्रधानमंत्री रमजे

[04:56:41] मैकडोनल्ड के पाले में थी। जब भारतीय नेता

[04:56:44] आपस में सहमत नहीं हो पाए तो उन्होंने

[04:56:46] कहा, ठीक है। अब फैसला हम करेंगे।

[04:56:48] अच्छा। और 16 अगस्त 1932 को उन्होंने अपना

[04:56:52] फेमस सांप्रदायिक पंचा्ट या कम्युनल

[04:56:55] अवार्ड घोषित कर दिया।

[04:56:57] और इसमें क्या था? इसने तो जैसे भारतीय

[04:56:58] राजनीति में भूचाल ही ला दिया।

[04:57:00] इस अवार्ड ने न सिर्फ मुसलमानों, सिखों और

[04:57:03] ईसाइयों के लिए अलग निर्वाचन को जारी रखा

[04:57:06] हम

[04:57:06] बल्कि इसने गप्प अंबेडकर की मांग को पूरी

[04:57:09] तरह से मान लिया गया। दमित वर्गों को भी

[04:57:12] अल्पसंख्यक का दर्जा देकर पृथक निर्वाचन

[04:57:14] का अधिकार दे दिया गया। ओह!

[04:57:16] अंग्रेजों के लिए यह एक मास्टर स्ट्रोक

[04:57:18] था। वह खुद को दलितों के मसीहा की तरह पेश

[04:57:21] कर सकते थे और साथ ही नेशनलिस्ट मूवमेंट

[04:57:24] को हिंदू समाज के अंदर से ही बांट सकते

[04:57:27] थे।

[04:57:27] मतलब एक तीर से दो निशाने।

[04:57:29] बिल्कुल।

[04:57:30] गांधी जी उस वक्त यरवदा जेल में थे।

[04:57:32] जब उन्होंने ये खबर सुनी तो उनका क्या

[04:57:34] रिएक्शन था?

[04:57:35] वो पूरी तरह से हिल गए। उन्होंने इसे

[04:57:37] हिंदू धर्म को तोड़ने की एक ब्रिटिश साजिश

[04:57:39] के तौर पर देखा। हम

[04:57:41] उन्होंने वायसरॉय को चिट्ठी लिखी कि अगर

[04:57:43] इस फैसले को बदला नहीं गया तो वह आमरण

[04:57:46] अनशन करेंगे मतलब मरने तक उपवास

[04:57:48] और जब सरकार नहीं मानी

[04:57:50] तो 20 सितंबर 1932 को गांधी जी ने जेल के

[04:57:53] अंदर ही अपना अनशन शुरू कर दिया

[04:57:55] हां और इस खबर से पूरे देश में हलचल मच गई

[04:57:58] सबकी नजरें अब एक ही व्यक्ति पर थी डॉक्टर

[04:58:01] अंबेडकर

[04:58:02] सोचिए डॉक्टर अंबेडकर पर क्या गुजर रही

[04:58:04] होगी

[04:58:04] एक तरफ उनके लोगों के वह राजनैतिक अधिकार

[04:58:08] थे जिन्हें हासिल करने के लिए उन्होंने

[04:58:09] सालों सालों संघर्ष किया था और अब वह उनके

[04:58:12] हाथ में थे

[04:58:13] और दूसरी तरफ गांधी जी की जान थी

[04:58:15] और पूरे देश का भावनात्मक दबाव था कि अगर

[04:58:18] गांधी जी को कुछ हो गया तो इतिहास उन्हें

[04:58:21] कभी माफ नहीं करेगा। यह एक मतलब लगभग

[04:58:23] नामुमकिन चुनाव था।

[04:58:24] तो क्या हुआ? अंबेडकर ने क्या किया?

[04:58:26] मदन मोहन मालविया, सी राजगोपालाचारी और

[04:58:29] राजेंद्र प्रसाद जैसे कई बड़े नेताओं ने

[04:58:31] मध्यस्थता की। अंबेडकर और गांधी जी के

[04:58:34] समर्थकों के बीच कई दौर की बातचीत हुई। हम

[04:58:37] और आखिरकार भारी दबाव के बीच एक समझौता

[04:58:40] हुआ जिसे इतिहास पूना पैक्ट के नाम से

[04:58:43] जानता है। यह 24 सितंबर 1932 को यवदा जेल

[04:58:47] में ही साइन हुआ।

[04:58:48] इस समझौते की शर्तें क्या थी? अंबेडकर को

[04:58:50] क्या छोड़ना पड़ा और बदले में क्या मिला?

[04:58:52] सबसे बड़ी बात यह थी कि डॉ. अंबेडकर ने

[04:58:54] दमित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग

[04:58:57] को छोड़ दिया।

[04:58:58] अच्छा।

[04:58:58] उन्होंने संयुक्त निर्वाचन यानी जॉइंट

[04:59:01] इलेक्टोरेट का सिद्धांत स्वीकार कर लिया।

[04:59:03] यह गांधी जी की सबसे बड़ी मांग थी

[04:59:05] और बदले में

[04:59:06] बदले में प्रांतीय विधान मंडलों मतलब

[04:59:08] राज्यों की असेंबली में दलित वर्ग के लिए

[04:59:11] आरक्षित सीटों की संख्या 71 से बढ़ाकर 148

[04:59:15] कर दी गई।

[04:59:16] दोगुनी से भी ज्यादा।

[04:59:17] हां दोगुनी से भी ज्यादा। इसके अलावा

[04:59:19] केंद्रीय विधानमंडल में भी 18% सीटें उनके

[04:59:22] लिए आरक्षित की गई। यह एक बीच का रास्ता

[04:59:25] था एक समझौता।

[04:59:26] लेकिन ये एक ऐसा समझौता था जो बहुत भारी

[04:59:29] मन से और भारी दबाव में किया गया था।

[04:59:31] बिल्कुल। इसके बाद कहानी का तीसरा और

[04:59:34] आखिरी हिस्सा आता है। तीसरा गोलमेज

[04:59:35] सम्मेलन।

[04:59:36] हां, यह नवंबर 1932 में हुआ, लेकिन तब तक

[04:59:39] खेल लगभग खत्म हो चुका था। यह काफी हद तक

[04:59:42] एक औपचारिकता ही थी।

[04:59:43] कांग्रेस ने तो हिस्सा नहीं लिया होगा।

[04:59:45] नहीं, कांग्रेस ने इसमें हिस्सा नहीं लिया

[04:59:46] और ज्यादातर बड़े भारतीय नेता भी इससे दूर

[04:59:49] रहे। इसमें बस पिछली बहसों के आधार पर कुछ

[04:59:52] अंतिम रूपरेखा तैयार की गई।

[04:59:54] तो इन तीनों सम्मेलनों, इतनी बहसों, इतने

[04:59:57] टकराव का आखिर में नतीजा क्या निकला? क्या

[04:59:59] यह सब बेकार गया? ऊपर से देखने पर तो लगता

[05:00:01] है कि यह सम्मेलन फेल हो गए क्योंकि कोई

[05:00:03] सर्वसम्मति नहीं बन पाई। लेकिन यहां एक

[05:00:05] बहुत दिलचस्प मोड़ आता है।

[05:00:07] इन तीनों सम्मेलनों में जो भी चर्चा हुई,

[05:00:10] जो भी प्रस्ताव रखे गए उन सबको मिलाकर

[05:00:12] ब्रिटिश सरकार ने मार्च 1933 में एक श्वेत

[05:00:16] पत्र यानी वाइट पेपर जारी किया।

[05:00:18] यह श्वेत पत्र क्या होता है?

[05:00:20] यह दरअसल सरकार की तरफ से एक आधिकारिक

[05:00:22] रिपोर्ट या प्लान होता है जो बताता है कि

[05:00:25] भविष्य में क्या कानून बनने वाला है।

[05:00:27] अच्छा। और इसी श्वेत पत्र पर ब्रिटिश संसद

[05:00:30] में और बहस हुई और आखिरकार इसी ने भारत

[05:00:33] सरकार अधिनियम 1935 यानी गवर्नमेंट ऑफ

[05:00:36] इंडिया एक्ट 1935 की शक्ल ली।

[05:00:39] अरे और 1935 का एक्ट तो हमारे अपने

[05:00:41] संविधान का सबसे बड़ा स्त्रोत माना जाता

[05:00:43] है।

[05:00:44] बिल्कुल।

[05:00:44] कहते हैं कि हमारे संविधान का ढांचा काफी

[05:00:46] हद तक उसी पर आधारित है।

[05:00:48] एकदम सही। तो विडंबना देखिए। जो सम्मेलन

[05:00:50] आपसी सहमति बनाने में पूरी तरह नाकाम रहे

[05:00:53] उन्होंने अनजाने में भारत के भविष्य के

[05:00:56] संवैधानिक ढांचे की नींव रख दी।

[05:00:58] वाह!

[05:00:58] इन बैठकों से ही वो दस्तावेज निकला जिसने

[05:01:01] आजाद भारत के संविधान की जमीन तैयार की।

[05:01:06] तो कहानी की शुरुआत होती है 1 सितंबर 1939

[05:01:10] से। जर्मनी ने पोलैंड पर हमला किया।

[05:01:12] द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया और ठीक 2

[05:01:14] दिन बाद 3 सितंबर को ब्रिटेन भी युद्ध में

[05:01:17] कूद पड़ा। हां। और यहीं पर सबसे बड़ा मोड़

[05:01:20] आता है।

[05:01:20] क्या?

[05:01:20] तत्कालीन वायसराय थे लिलगो। उन्होंने बिना

[05:01:24] किसी भारतीय नेता से पूछे बिना किसी चुनी

[05:01:26] हुई प्रांतीय सरकार से सलाह लिए यह घोषणा

[05:01:29] कर दी कि भारत भी ब्रिटेन के साथ जर्मनी

[05:01:32] के खिलाफ युद्ध में है।

[05:01:33] अरे यह तो मतलब बहुत बड़ी बात थी। उस वक्त

[05:01:35] तो आठ प्रांतों में कांग्रेस की सरकारें

[05:01:38] थीं जो 1937 के चुनाव जीत कर बनी थी।

[05:01:40] बिल्कुल।

[05:01:41] मतलब आपने लाखों लोगों द्वारा चुनी गई

[05:01:43] सरकारों को कुछ समझा ही नहीं। यही तो उनकी

[05:01:46] वो औपनिवेशिक सोच थी और इसमें जो सबसे

[05:01:48] बड़ी विडंबना थी वो देखने वाली थी।

[05:01:50] हम

[05:01:50] वो क्या?

[05:01:51] ब्रिटेन पूरी दुनिया में यह कह रहा था कि

[05:01:53] वो लोकतंत्र और आजादी के लिए जर्मनी के

[05:01:55] साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ रहा है। लेकिन

[05:01:57] भारत में वो खुद वही साम्राज्यवादी रवैया

[05:02:00] अपना रहा था।

[05:02:00] हां, यह दोहरा मापदंड तो साफ-साफ दिख रहा

[05:02:02] था।

[05:02:03] और यह भारतीय नेताओं को बहुत चुभ रहा था।

[05:02:05] वैसे जाहिर है इस पर प्रतिक्रिया पहुंची

[05:02:07] थी।

[05:02:07] प्रतिक्रियाएं भी एक जैसी नहीं थी।

[05:02:09] कांग्रेस के अंदर ही अलग-अलग विचार थे।

[05:02:11] हां, तीन मुख्यधाराएं थी। कह सकते हैं। एक

[05:02:14] तरफ थे सुभाष चंद्र बोस।

[05:02:15] अच्छा।

[05:02:16] उनका मानना था कि यह सुनहरा मौका है। उनका

[05:02:18] सीधा-साधा तर्क था ब्रिटेन की मुसीबत भारत

[05:02:20] के लिए अवसर है।

[05:02:22] ब्रिटेन युद्ध में फंसा है, कमजोर है। तो

[05:02:24] यही सही समय है एक बड़ा जन आंदोलन छेड़ने

[05:02:26] का ताकि उन पर दबाव बनाया जा सके।

[05:02:28] यानी लोहा गर्म है मार दो हथौड़ा वाली

[05:02:30] रणनीति। लेकिन गांधी जी का नजरिया तो इससे

[05:02:33] बिल्कुल अलग था।

[05:02:34] बिल्कुल अलग। गांधी जी युद्ध के दौरान

[05:02:36] आंदोलन शुरू करने के खिलाफ थे।

[05:02:38] क्यों? उन्हें लगता था कि किसी की मजबूरी

[05:02:40] का फायदा उठाना नैतिक रूप से गलत है और

[05:02:44] उन्हें यह भी डर था कि ब्रिटिश सरकार

[05:02:45] आंदोलन को बेरहमी से कुचल देगी जिसमें

[05:02:47] बहुत से लोगों की जान जा सकती है।

[05:02:49] तो यह नैतिकता और व्यवहारिकता दोनों का

[05:02:52] मिलाजुला फैसला था।

[05:02:53] हां।

[05:02:53] और तीसरा प्रमुख पक्ष मुस्लिम लीग

[05:02:56] उन्होंने तो अपना रास्ता ही अलग चुन लिया

[05:02:58] था।

[05:02:58] उन्होंने बहुत होशियारी से अपने पत्ते

[05:03:00] खेले। उन्होंने तय किया कि वह ब्रिटिश

[05:03:02] सरकार का समर्थन करेंगे।

[05:03:03] अच्छा। उन्हें लगा कि इस मुश्किल समय में

[05:03:05] सरकार का साथ देने से भविष्य में राजनीतिक

[05:03:08] फायदा होगा। उन्होंने अंग्रेजों से एक तरह

[05:03:10] की गारंटी ले ली कि भविष्य में कोई भी

[05:03:12] प्रस्ताव बिना उनकी सहमति के पारित नहीं

[05:03:14] किया जाएगा।

[05:03:14] ओहो मतलब एक वीटो पावर मिल गई उन्हें।

[05:03:16] एक तरह से हां।

[05:03:17] तो फिर कांग्रेस युद्ध में समर्थन के बदले

[05:03:19] में क्या चाहती थी?

[05:03:20] उनकी दो सीधी और स्पष्ट मांगे थी। पहली एक

[05:03:23] अंतरिम राष्ट्रीय सरकार का गठन हो और

[05:03:25] दूसरी युद्ध के बाद भारत का संविधान बनाने

[05:03:28] के लिए एक संविधान सभा का गठन किया जाए।

[05:03:30] लेकिन ब्रिटिश सरकार ने यह मांगे नहीं

[05:03:32] मानी।

[05:03:32] नहीं मानी। जिसके बाद कांग्रेस ने एक बड़ा

[05:03:34] कदम उठाया।

[05:03:35] बिलकुल। 22 अक्टूबर 1939 को कांग्रेस ने

[05:03:37] विलो में आठ प्रांतों की सरकारों से

[05:03:40] इस्तीफा दे दिया। यह एक बहुत बड़ा

[05:03:41] राजनीतिक संदेश था।

[05:03:42] और इस इस्तीफे पर मुस्लिम लीग की

[05:03:44] प्रतिक्रिया तो और भी दिलचस्प थी।

[05:03:46] वह बहुत खुश हुए। उन्होंने 22 दिसंबर 1939

[05:03:49] को मुक्ति दिवस के रूप में मनाया।

[05:03:51] मुक्ति दिवस।

[05:03:52] हां, क्योंकि उन्हें लगा कि वे प्रांतीय

[05:03:54] सरकारों में कांग्रेस के शासन से मुक्त हो

[05:03:56] गए हैं।

[05:03:57] यह तो बड़ा राजनीतिक दाव था।

[05:03:58] बहुत बड़ा। यह दौर मुस्लिम लीग के लिए भी

[05:04:01] एक ऐतिहासिक मोड़ था। मार्च 1940 में उनका

[05:04:04] लाहौर अधिवेशन हुआ।

[05:04:05] हां। और यहीं पर पहली बार आधिकारिक तौर पर

[05:04:08] दो राष्ट्र सिद्धांत यानी टू नेशन थ्योरी

[05:04:11] पेश किया गया।

[05:04:12] अच्छा।

[05:04:13] हां। यह विचार कि हिंदू और मुसलमान दो

[05:04:15] अलग-अलग राष्ट्र हैं और एक साथ नहीं रह

[05:04:17] सकते। इसी अधिवेशन में एक अलग राष्ट्र की

[05:04:20] मांग का प्रस्ताव पेश हुआ। यहां पर एक

[05:04:22] बहुत ही दिलचस्प बात पता चलती है।

[05:04:24] श्रोत में पाकिस्तान नाम के पीछे की भी एक

[05:04:26] कहानी है। यह नाम जिन्ना का दिया हुआ नहीं

[05:04:28] था।

[05:04:28] नहीं बिल्कुल नहीं। यह नाम 1933 में

[05:04:31] कैंब्रिज के एक छात्र चौधरी रहमत अली ने

[05:04:34] गढ़ा था।

[05:04:35] अच्छा कैसे? और उन्होंने इसे पंजाब,

[05:04:37] अफगानिया, कश्मीर और बलूचिस्तान के नामों

[05:04:40] से मिलाकर बनाया था।

[05:04:41] अरे वाह।

[05:04:42] और मजे की बात यह है कि वो जिन्ना को पसंद

[05:04:45] भी नहीं करते थे। और यह भी आश्चर्य की बात

[05:04:47] है कि सारे जहां से अच्छा लिखने वाले कवि

[05:04:50] मोहम्मद इकबाल ने जिन्ना को वापस राजनीति

[05:04:53] में सक्रिय होने के लिए प्रेरित किया था।

[05:04:55] हां, यह भी एक ऐतिहासिक मोड़ है।

[05:04:57] अब युद्ध में ब्रिटेन की हालत खराब हो रही

[05:04:59] थी। जापान तेजी से आगे बढ़ रहा था।

[05:05:02] उन्हें भारतीयों के सहयोग की सख्त जरूरत

[05:05:04] थी। इसी पृष्ठभूमि में 8 अगस्त 1940 को

[05:05:08] अगस्त प्रस्ताव लाया गया।

[05:05:09] यह वायसरॉय लुधितगो की एक कोशिश थी। इसमें

[05:05:12] मुख्य बातें थी युद्ध के बाद भारत को

[05:05:15] डोमिनियन स्टेटस देना।

[05:05:16] डोमिनियन स्टेटस

[05:05:17] हां। और वायसरॉय की कार्यकारिणी परिषद में

[05:05:20] और अधिक भारतीयों को शामिल करना और युद्ध

[05:05:22] के बाद एक संविधान सभा बनाना।

[05:05:24] लेकिन 1929 में पूर्ण स्वराज की मांग के

[05:05:28] बाद डोमिनियन स्टेटस की बात तो बहुत पीछे

[05:05:30] छूट चुकी थी ना।

[05:05:31] एकदम सही। इसीलिए कांग्रेस और मुस्लिम लीग

[05:05:34] दोनों ने इसे अस्वीकार कर दिया।

[05:05:36] हम्म।

[05:05:37] नेहरू ने तो इसे दरवाजे में लगी जंग लगी

[05:05:40] कील तक कह दिया था। तो अगस्त प्रस्ताव की

[05:05:42] विफलता के बाद व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू

[05:05:45] हुआ।

[05:05:46] यह गांधी जी और बोस के विचारों के बीच का

[05:05:49] एक समझौता था। सही कह रही हूं?

[05:05:50] हां।

[05:05:50] ये एक जन आंदोलन ना होकर एक प्रति

[05:05:54] प्रतीकात्मक आंदोलन था।

[05:05:56] इसका उद्देश्य क्या था?

[05:05:57] इसका उद्देश्य दुनिया को यह संदेश देना था

[05:05:59] कि भारत युद्ध में ब्रिटेन के साथ नहीं है

[05:06:02] और और भाषण की स्वतंत्रता के अधिकार पर

[05:06:05] जोर देना था।

[05:06:06] यह काम कैसे करता? मतलब इसका तरीका क्या

[05:06:08] था? एक सत्याग्रही पहले से सूचना देकर

[05:06:11] युद्ध विरोधी भाषण देता था और गिरफ्तारी

[05:06:13] देता था। उसके बाद दूसरा व्यक्ति उसकी जगह

[05:06:16] लेता था।

[05:06:16] अच्छा एक के बाद एक

[05:06:17] हां पहले सत्याग्रही विनोबा भावे थे।

[05:06:20] दूसरे जवाहरलाल नेहरू और तीसरे

[05:06:22] ब्रह्मदत्त।

[05:06:23] हम

[05:06:23] बाद में दिल्ली चलो का नारा भी दिया गया।

[05:06:25] जिसमें लगभग 25,000 लोगों को गिरफ्तार

[05:06:28] किया गया। जब युद्ध में ब्रिटेन पर

[05:06:30] अमेरिका, चीन और ऑस्ट्रेलिया जैसे सहयोगी

[05:06:32] देशों का दबाव पड़ा तो उन्होंने मार्च

[05:06:34] 1942 में स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा।

[05:06:37] हां क्रिप्स मिशन

[05:06:38] इसके प्रस्ताव अगस्त प्रस्ताव से थोड़े

[05:06:40] बेहतर थे।

[05:06:41] हां, थोड़े बेहतर तो थे। उन्होंने युद्ध

[05:06:43] के बाद डोमिनियन स्टेटस के साथ-साथ

[05:06:46] राष्ट्रमंडल से अलग होने का भी अधिकार

[05:06:48] दिया। संविधान सभा की बात भी की।

[05:06:50] लेकिन इसमें एक बहुत ही विवादास्पद बात

[05:06:53] थी।

[05:06:53] वो यह थी कि जो प्रांत नए संघ में शामिल

[05:06:56] नहीं होना चाहेंगे, उन्हें अपना अलग

[05:06:58] संविधान बनाने और अलग संघ बनाने की छूट

[05:07:00] होगी।

[05:07:01] अरे!

[05:07:01] कांग्रेस ने इसे भारत को टुकड़ों में

[05:07:03] बांटने की साजिश के तौर पर देखा और

[05:07:05] अस्वीकार कर दिया। और मुस्लिम लीग

[05:07:07] मुस्लिम लीग ने भी इसे खारिज कर दिया

[05:07:09] क्योंकि इसमें सीधे तौर पर पाकिस्तान

[05:07:10] बनाने की बात नहीं थी।

[05:07:11] और यहीं पर गांधी जी का वो प्रसिद्ध कथन

[05:07:14] आया।

[05:07:14] हां, उन्होंने इसे एक डूबते हुए बैंक का

[05:07:17] पोस्ट डेटेड चेक कहा।

[05:07:18] मतलब ऐसे वादे जो भविष्य के लिए थे।

[05:07:20] तो उस शक्ति द्वारा किए जा रहे थे जो खुद

[05:07:23] युद्ध हारती हुई दिख रही थी।

[05:07:24] तो क्रिप्स मिशन की असफलता के साथ ही

[05:07:27] बातचीत के सारे रास्ते बंद हो गए। यह साफ

[05:07:29] हो गया है कि ब्रिटिश सरकार आसानी से

[05:07:31] वास्तविक आजादी देने वाली नहीं है।

[05:07:33] और इसी ने इसी नाकामी ने स्वतंत्रता

[05:07:36] संग्राम के सबसे बड़े आंदोलन भारत छोड़ो

[05:07:39] आंदोलन की जमीन तैयार की।

[05:07:42] और देखिए इस आंदोलन की जो नींव है वो

[05:07:45] मार्च 1942 में ही पड़ गई थी। जब क्रिप्स

[05:07:48] मिशन भारत आया।

[05:07:49] हां अंग्रेजों को वर्ल्ड वॉर में भारतीयों

[05:07:51] का साथ चाहिए था।

[05:07:52] जी उनकी हालत बहुत पतली थी। तो वो एक ऑफर

[05:07:55] लेकर आए डोमिनियन स्टेटस का। मतलब ब्रिटिश

[05:07:57] राज के अंदर ही एक सीमित स्वशासन।

[05:08:00] लेकिन तब तक तो भारतीय नेता पूर्ण स्वराज

[05:08:02] की मांग पर अड़ चुके थे। है ना?

[05:08:04] सही बात है। वह अब इससे कम पे मानने को

[05:08:06] तैयार नहीं थे। तो जब यह मिशन फेल हो गया

[05:08:08] तो यह साफ हो गया कि अब बातचीत से नहीं

[05:08:10] बल्कि एक बड़े आंदोलन से ही बात बनेगी।

[05:08:12] तो क्रिप्स मिशन के जाने के बाद कांग्रेस

[05:08:15] के अंदर जरूर एक गहमाग-गहमी का माहौल बन

[05:08:17] गया होगा। मौलाना अबुल कलाम आजाद उस वक्त

[05:08:20] अध्यक्ष थे।

[05:08:21] हां, बैठकों का दौर शुरू हो गया। और फिर

[05:08:23] वह तारीख आई 14 जुलाई 1942 जब वर्धा में

[05:08:27] कांग्रेस की बैठक में भारत छोड़ो का

[05:08:29] प्रस्ताव पहली बार रखा गया। लेकिन मैंने

[05:08:31] पढ़ा है कि सब लोग इस पर एकमत नहीं थे।

[05:08:33] नहीं थे बिल्कुल नहीं थे। कांग्रेस के कई

[05:08:36] बड़े नेता यहां तक कि नेहरू जी भी शुरुआत

[05:08:38] में काफी हिचकिचा रहे थे। उन्होंने तो इसे

[05:08:40] दोधारी तलवार तक कह दिया था।

[05:08:41] दो धारी तलवार मतलब उनका डर सिर्फ हिंसा

[05:08:44] को लेकर था या कोई और गहरी वजह थी?

[05:08:46] वजह बहुत गहरी थी। देखिए नेहरू जैसे नेता

[05:08:48] दुनिया के नक्शे को देख रहे थे। एक तरफ

[05:08:50] हिटलर और जापान की फांसीवादी ताकतें अच्छा

[05:08:52] उन्हें लग रहा था कि इस वक्त अंग्रेजों को

[05:08:54] कमजोर करना एक तरह से इन फाशीवादी ताकतों

[05:08:57] की मदद करने जैसा होगा। यह एक बहुत बड़ी

[05:08:59] मतलब नैतिक बहस थी कांग्रेस के अंदर।

[05:09:01] तो फिर इस पर गांधी जी का क्या तर्क था?

[05:09:04] गांधी जी का तर्क बहुत सीधा था। उन्होंने

[05:09:06] कहा कि अगर ब्रिटेन वाकई लोकतंत्र का इतना

[05:09:08] बड़ा समर्थक है तो वह सबसे पहले भारत में

[05:09:10] लोकतंत्र क्यों नहीं लाता? एक गुलाम देश

[05:09:12] से आप लोकतंत्र की लड़ाई लड़ने की उम्मीद

[05:09:13] कैसे कर सकते हैं?

[05:09:14] सही बात है।

[05:09:15] और जब गांधी जी ने देखा कि पार्टी में अभी

[05:09:17] भी कुछ लोग दुविधा में हैं तब उन्होंने

[05:09:18] अपना वो ऐतिहासिक बयान दिया।

[05:09:20] कौन सा? उन्होंने कहा मैं देश की मुट्ठी

[05:09:22] भर बालू से ही कांग्रेस से भी बड़ा आंदोलन

[05:09:24] खड़ा कर दूंगा। इस एक वाक्य ने आप समझिए

[05:09:27] पूरा माहौल ही बदल दिया।

[05:09:28] यह तो एक तरह से अपनी ही पार्टी को एक

[05:09:30] अल्टीमेटम था।

[05:09:31] हां, यह गांधी जी का तरीका था यह बताने का

[05:09:33] कि देश की जनता अब इंतजार नहीं करेगी और

[05:09:35] अगर लीडरशिप हिचकिचाएगी तो जनता अपना

[05:09:36] रास्ता खुद बना लेगी।

[05:09:38] और फिर वो दिन आया 8 अगस्त 1942 मुंबई का

[05:09:42] ग्वालियर टैंक मैदान।

[05:09:44] जी जहां भारत छोड़ो प्रस्ताव को भारी

[05:09:47] बहुमत से पारित कर दिया गया। यह प्रस्ताव

[05:09:49] गांधी जी ने खुद पेश किया था और सरदार

[05:09:51] पटेल ने इसका समर्थन किया था।

[05:09:53] इस प्रस्ताव में जनता के लिए कुछ खास

[05:09:55] निर्देश भी थे। है ना?

[05:09:56] जी हां और वो निर्देश बहुत सोची समझी

[05:09:59] रणनीति का हिस्सा थे। जैसे सरकारी

[05:10:01] कर्मचारियों से कहा गया कि नौकरी मत

[05:10:04] छोड़ो।

[05:10:04] अच्छा नौकरी नहीं छोड़नी थी।

[05:10:06] नहीं। उनसे कहा गया कि आप नौकरी करते रहें

[05:10:08] लेकिन कांग्रेस के प्रति अपनी वफादारी

[05:10:10] घोषित कर दें। छात्रों से भी कहा गया कि

[05:10:13] पढ़ाई ना छोड़ें और सेना में जो भारतीय

[05:10:15] सैनिक थे, उनसे अपील की गई कि अपने ही

[05:10:18] देशवासियों पर गोली मत चलाना।

[05:10:20] मतलब सिस्टम के अंदर रहकर ही उसे कमजोर

[05:10:23] करने की कोशिश।

[05:10:24] और इसी मैदान में गांधी जी ने अपना वो

[05:10:26] भाषण दिया था जहां से करो या मरो का नारा

[05:10:29] निकला।

[05:10:30] बिल्कुल। वो भाषण लगभग 70 मिनट तक चला था

[05:10:33] और सुनने वाले कहते हैं कि उस दिन गांधी

[05:10:35] जी में एक अलग ही ऊर्जा थी।

[05:10:37] हम्म। हम्म।

[05:10:37] उसी भाषण में उन्होंने कहा डू और डाई करो

[05:10:40] या मरो। मतलब साफ था या तो हम भारत को

[05:10:43] आजाद कराएंगे या इस कोशिश में अपनी जान दे

[05:10:46] देंगे।

[05:10:46] और उन्होंने यह भी साफ कर दिया था कि अगर

[05:10:48] नेता गिरफ्तार हो जाए तो भी आंदोलन रुकना

[05:10:51] नहीं चाहिए।

[05:10:52] सबसे जरूरी बात यही थी। उन्होंने कहा हर

[05:10:54] भारतीयों को यह समझना होगा कि वह खुद अपना

[05:10:56] नेता है।

[05:10:57] तो 8 अगस्त को प्रस्ताव पास हुआ।

[05:10:59] अंग्रेजों का रिएक्शन क्या था? क्या वह

[05:11:01] इसके लिए तैयार थे?

[05:11:02] नहीं, वह बुरी तरह घबरा गए थे। उन्होंने

[05:11:04] फौरन जवाबी कारवाई की। उसी रात ऑपरेशन 0

[05:11:07] आर लांच किया गया।

[05:11:08] 0 आर

[05:11:09] यानी आधी रात 12:00 बजे और 9 अगस्त की

[05:11:12] सुबह होने से पहले ही कांग्रेस के जितने

[05:11:14] भी बड़े नेता थे सबको गिरफ्तार कर लिया

[05:11:16] गया।

[05:11:17] और इस बार उन्हें सिर्फ जेल में नहीं डाला

[05:11:19] गया था।

[05:11:19] नहीं इस बार सरकार कोई मौका नहीं देना

[05:11:21] चाहती थी। सभी नेताओं को अलग-अलग जगहों पर

[05:11:24] नजरबंद किया गया ताकि वह एक दूसरे से

[05:11:26] संपर्क ना कर सकें।

[05:11:27] जैसे

[05:11:27] गांधी जी, कस्तूरबा गांधी और सरोजनी नायडू

[05:11:30] को पुणे के आगा खान पैलेस में रखा गया। और

[05:11:32] यह बहुत दुख की बात है कि वहीं पे

[05:11:35] कस्तूरबा गांधी और गांधी जी के सचिव

[05:11:37] महादेव देसाई की मृत्यु भी हुई।

[05:11:39] ओह हो

[05:11:40] नेहरू जी, सरदार पटेल और मौलाना आजाद को

[05:11:42] अहमदागर के किले में रखा गया और डॉ.

[05:11:44] राजेंद्र प्रसाद को पटना की बांकीपुर जेल

[05:11:47] में। मतलब प्लान साफ था आंदोलन को शुरू

[05:11:49] होने से पहले ही नेतृत्व विहीन कर दो।

[05:11:51] लेकिन उनका यह अंदाजा तो पूरी तरह से गलत

[05:11:53] साबित हुआ।

[05:11:54] बिल्कुल। नेताओं की गिरफ्तारी की खबर ने

[05:11:56] तो आग में घी का काम किया। आंदोलन रुकने

[05:11:58] की बजाय और ज्यादा भड़क गया।

[05:12:00] एक ब्रिटिश अधिकारी था एफ जी हचिंस। उसने

[05:12:02] इसे स्पॉनटेनियस रिवॉल्यूशन कहा। मतलब एक

[05:12:05] स्वप्रवर्तित क्रांति जो बिना किसी लीडर

[05:12:07] के अपने आप पूरे देश में फैल गई।

[05:12:09] गांधी जी की बात सच हो गई। जनता खुद अपनी

[05:12:11] नेता बन गई।

[05:12:12] एकदम 9 अगस्त की सुबह जब सारे नेता जेल

[05:12:14] में थे तब अरुणा असफ अली ने उसी ग्वालियर

[05:12:17] टैंक मैदान में तिरंगा फहराकर आंदोलन की

[05:12:19] मशाल को जलाए रखा।

[05:12:20] हां। उन्हें ग्रैंड ओल्ड लेडी भी कहा जाता

[05:12:23] है।

[05:12:23] उनके ऐसी साहसी काम के लिए।

[05:12:25] और इसी दौरान शायद लाल बहादुर शास्त्री जी

[05:12:27] ने वो नारा दिया था मरो नहीं मारो।

[05:12:30] जी। यह दिखाता है कि जमीनी स्तर पर लोगों

[05:12:32] का गुस्सा किस हद तक पहुंच चुका था और इस

[05:12:34] गुस्से का सबसे दर्दनाक रूप हमें 11 अगस्त

[05:12:37] को पटना में देखने को मिला।

[05:12:38] पटना सचिवालय की घटना

[05:12:40] हां वहां स्कूल और कॉलेज के कुछ छात्र

[05:12:42] सचिवालय की इमारत पर तिरंगा फहराने के लिए

[05:12:45] एक शांतिपूर्ण मार्च निकाल रहे थे।

[05:12:46] बस तिरंगा फहराने के लिए।

[05:12:48] हां। और उस वक्त के डिस्ट्रिक्ट

[05:12:49] मैजिस्ट्रेट डब्ल्यूजी आर्चर ने उन

[05:12:51] निहत्ते बच्चों पर गोली चलाने का आदेश दे

[05:12:54] दिया। निहत्ते बच्चों पर गोली यह तो

[05:12:56] अविश्वसनीय है।

[05:12:57] और उस गोलीबारी में सात छात्र स्कूल के

[05:13:00] सात छात्र वहीं मौके पर ही शहीद हो गए। आज

[05:13:03] भी पटना में उस जगह पर शहीद स्मारक बना

[05:13:05] हुआ है जो उन बहादुर छात्रों की याद

[05:13:07] दिलाता है।

[05:13:08] यह सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं और

[05:13:10] यह कोई अकेली घटना तो नहीं होगी।

[05:13:12] बिल्कुल नहीं। यह जज्बा उम्र और लिंग से

[05:13:15] परे था। अब बंगाल का उदाहरण लीजिए। वहां

[05:13:17] 73 साल की एक महिला थी मातंगिनी हाजरा।

[05:13:20] जिन्हें लोग बूढ़ी गांधी कहते थे। जी वह

[05:13:23] एक जुलूस का नेतृत्व कर रही थी। हाथ में

[05:13:26] तिरंगा लिए। पुलिस ने गोलियां चलाई। एक के

[05:13:28] बाद एक तीन गोलियां लगने के बाद भी

[05:13:30] उन्होंने तिरंगे को जमीन पर गिरने नहीं

[05:13:32] दिया। अपनी आखिरी सांस तक उसे थामे रही।

[05:13:35] कमाल है। यह दिखाता है कि यह आंदोलन

[05:13:38] दिल्ली मुंबई का नहीं बल्कि देश के

[05:13:40] कोने-कोने का आंदोलन बन चुका था।

[05:13:42] सही बात है।

[05:13:43] तो जब सारे बड़े नेता जेल में थे तो जाहिर

[05:13:45] है कि एक दूसरी लीडरशिप ने मोर्चा संभाला

[05:13:48] होगा भूमिगत होकर।

[05:13:49] हां। और उनकी भूमिका बहुत बड़ी थी।

[05:13:51] जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, उषा

[05:13:54] मेहता इन जैसे युवा समाजवादी नेताओं ने

[05:13:56] अंडरग्राउंड होकर इस आंदोलन को जिंदा रखा।

[05:13:59] उषा मेहता और उनका सीक्रेट रेडियो स्टेशन।

[05:14:01] जी, कमाल का काम था वो। मुंबई में एक

[05:14:03] गुप्त रेडियो स्टेशन शुरू कर दिया। वॉइस

[05:14:05] ऑफ फ्रीडम। इस रेडियो से वह रोज आंदोलन की

[05:14:07] खबरें, नेताओं के संदेश सब कुछ ब्रॉडकास्ट

[05:14:10] करती थी।

[05:14:10] जिससे लोगों का हौसला बना रहा।

[05:14:12] बिल्कुल। और भूमिगत नेताओं में जयप्रकाश

[05:14:15] नारायण का नाम तो बहुत ही बड़ा है। उनका

[05:14:17] जेल से भागने का किस्सा भी बड़ा मशहूर है।

[05:14:20] हां, वह क्या कहानी थी?

[05:14:21] वो तो बिल्कुल फिल्मी कहानी है। जेपी को

[05:14:23] हजारीबाग जेल में बंद किया गया था। लेकिन

[05:14:26] 1942 में दिवाली की रात।

[05:14:28] दिवाली की रात।

[05:14:29] हां, जब सब लोग त्यौहार मना रहे थे, तो वह

[05:14:31] अपने कुछ साथियों के साथ धोतियों की रस्सी

[05:14:33] बनाकर, जेल की दीवार फांद कर फरार हो गए।

[05:14:36] और फिर नेपाल के जंगलों में आजाद दस्ता

[05:14:39] नाम का एक गोरिल्ला संगठन बनाया।

[05:14:41] वाह! मतलब हौसला किस स्तर पर था। अच्छा इस

[05:14:43] आंदोलन की एक और बहुत अनोखी बात थी।

[05:14:46] समानांतर सरकारें इसका क्या मतलब था?

[05:14:49] समानांतर सरकार यानी पैरेलल गवर्नमेंट।

[05:14:51] देश के कुछ हिस्सों में लोगों ने अंग्रेजी

[05:14:53] हुकूमत को पूरी तरह उखाड़ फेंका और अपनी

[05:14:55] खुद की आजाद सरकार बना ली।

[05:14:57] सच में अपनी सरकार?

[05:14:59] हां, ऐसी तीन सरकारें बहुत मशहूर हुई।

[05:15:01] सबसे पहले बनी उत्तर प्रदेश के बलिया में।

[05:15:03] वहां चित्तू पांडे जिन्हें लोग शेर बलिया

[05:15:05] कहते थे। उन्होंने एक हफ्ते के लिए अपनी

[05:15:07] सरकार चलाई।

[05:15:08] सिर्फ एक हफ्ता। हां, भले ही एक हफ्ते,

[05:15:10] लेकिन इसने एक संदेश दिया कि अंग्रेजी राज

[05:15:12] को ढाया जा सकता है।

[05:15:13] और बाकी दो सरकारें

[05:15:14] दूसरी और सबसे लंबे समय तक चलने वाली

[05:15:17] सरकार बनी महाराष्ट्र के सतारा में वाईवी

[05:15:19] चौहान और नाना पाटिल के नेतृत्व में। वह

[05:15:22] सरकार तो 1945 तक चलती रही।

[05:15:24] 3 साल तक

[05:15:24] जी। उन्होंने अपना पूरा प्रशासन, अपनी

[05:15:27] न्याय व्यवस्था सब कुछ बना लिया था।

[05:15:28] और मैंने बंगाल की जातीय सरकार के बारे

[05:15:31] में भी सुना है। इस जातीय का क्या मतलब

[05:15:33] था? हां

[05:15:33] यह बहुत अच्छा सवाल है। यहां जातीय का

[05:15:35] मतलब किसी जाति या कास्ट से नहीं बल्कि

[05:15:37] राष्ट्रीय यानी नेशनल से था। यह बंगाल के

[05:15:40] तमलुक इलाके में सतीश सामंत के नेतृत्व

[05:15:42] में बनी थी।

[05:15:43] अच्छा तो एक राष्ट्रीय सरकार

[05:15:44] बिल्कुल उन्होंने तो अपनी एक सशस्त्र सेना

[05:15:46] भी बना ली थी जिसका नाम था विद्युत

[05:15:48] वाहिनी।

[05:15:48] तो कुल मिलाकर भारत छोड़ो आंदोलन ने

[05:15:50] ब्रिटिश शासन की नींव तो पूरी तरह से हिला

[05:15:53] कर रख दी थी।

[05:15:54] हिला कर रखती थी। अंग्रेजों ने इसे दबाने

[05:15:56] में कोई कसर नहीं छोड़ी। सरकारी आंकड़ों

[05:15:58] में ही 10,000 से ज्यादा लोग मारे गए। 1

[05:16:00] लाख से ज्यादा गिरफ्तार हुए। लेकिन इसका

[05:16:03] जो संदेश था वह साफ था।

[05:16:05] बिल्कुल साफ। इस आंदोलन ने यह साबित कर

[05:16:07] दिया कि अब हिंदुस्तान पर बल के जोर पर

[05:16:09] शासन नहीं किया जा सकता। अंग्रेज समझ गए

[05:16:11] थे कि युद्ध खत्म होने के बाद उन्हें भारत

[05:16:13] छोड़ना ही होगा।

[05:16:13] और यही बात आज भी सोचने पर मजबूर करती है।

[05:16:16] गांधी जी ने कहा था कि हर भारतीय खुद अपना

[05:16:19] नेता है और हुआ भी बिल्कुल वैसा ही।

[05:16:21] जी।

[05:16:24] आज हम जिनकी कहानी में गहरे उतरने वाले

[05:16:27] हैं उन्हें पूरा देश नेताजी के नाम से

[05:16:30] जानता है।

[05:16:30] सुभाष चंद्र बोस।

[05:16:32] सुभाष चंद्र बोस

[05:16:33] उनके पिता जानकीनाथ बोस एक नामी वकील थे

[05:16:36] और वो चाहते थे कि बेटा आईसीएस अफसर बने।

[05:16:39] अच्छा

[05:16:40] बोस बचपन से मेधावी तो थे ही लेकिन उन पर

[05:16:43] स्वामी विवेकानंद और अरविंदो घोष का बहुत

[05:16:46] गहरा असर। तो राष्ट्र सेवा का जज्बा तो कह

[05:16:49] सकते हैं स्कूल के दिनों से ही था।

[05:16:50] तो वो लंदन गए सिर्फ पिता का मान रखने के

[05:16:52] लिए। हां 1919 में वह लंदन चले तो गए पर

[05:16:56] उनका मन तो भारत में ही लगा हुआ था।

[05:16:58] और कमाल देखिए सिर्फ 8 महीने की तैयारी

[05:17:00] में 1920 में उन्होंने आईसीएस की परीक्षा

[05:17:03] पास कर ली।

[05:17:04] वो भी चौथी रैंक के साथ।

[05:17:05] वही तो उस दौर में किसी भारतीय के लिए यह

[05:17:08] लगभग अकल्पनीय एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी।

[05:17:11] बिल्कुल। लेकिन यहीं उनके जीवन का पहला

[05:17:14] बड़ा फैसला आता है। उन्हें यह एहसास हो

[05:17:16] गया था कि इस नौकरी का मतलब है अंग्रेजों

[05:17:19] के हुक्म की तामील करना और यह राष्ट्र

[05:17:22] सेवा के उनके आदर्श के बिल्कुल खिलाफ था।

[05:17:24] तो उनके सामने दो ही रास्ते थे।

[05:17:25] हां, वह मानते थे कि वह या तो अंग्रेजों

[05:17:28] की गुलामी कर सकते हैं या देश की सेवा।

[05:17:31] दोनों एक साथ मुमकिन नहीं। इसीलिए 1921

[05:17:34] में उन्होंने इस्तीफा दे दिया। सोचिए जरा

[05:17:36] उस जमाने में ऐसी नौकरी छोड़ना कितना बड़ा

[05:17:39] और साहसिक कदम रहा होगा। नौकरी छोड़ने के

[05:17:42] बाद वह रुके नहीं। सीधा राजनीति के मैदान

[05:17:44] में उतर गए और असहयोग आंदोलन से जुड़ गए।

[05:17:46] जी।

[05:17:47] और यहीं उनकी मुलाकात हुई उनके राजनीतिक

[05:17:49] गुरु चित्रंजन दास से।

[05:17:51] हां। और सीआर दास ने उनकी प्रतिभा को

[05:17:53] तुरंत पहचान लिया। दास ने बोस की जो

[05:17:56] प्रशासनिक क्षमता थी, उसका बेहतरीन

[05:17:59] इस्तेमाल किया।

[05:18:00] कैसे? 1924 में जब दास कोलकाता नगर निगम

[05:18:04] के मेयर बने तो उन्होंने 27 साल के बोस को

[05:18:07] निगम का मुख्य कार्यकारी अधिकारी मतलब

[05:18:10] सीईओ बना दिया।

[05:18:11] 28 साल की उम्र में सीईओ

[05:18:13] हां और बोस ने वहां भी क्रांतिकारी काम

[05:18:16] किए। उन्होंने निगम के तौरतरीकों को पूरी

[05:18:18] तरह बदल दिया। खादी को बढ़ावा दिया और

[05:18:21] अपनी आधी तनख्वाह कर्मचारियों में बांटने

[05:18:23] का ऐलान कर दिया। इससे वह आम लोगों के बीच

[05:18:26] बेहद लोकप्रिय हो गए। लेकिन जैसे-जैसे

[05:18:29] उनका कद बढ़ रहा था, वैसे-वैसे कांग्रेस

[05:18:32] के अंदर खासकर गांधी जी के साथ उनकी सोच

[05:18:34] का टकराव भी बढ़ रहा था। यह सिर्फ तरीकों

[05:18:37] का फर्क या इसके पीछे कोई गहरी वैचारिक

[05:18:39] खाई थी?

[05:18:40] नहीं, यह सिर्फ रणनीति का मतभेद नहीं था।

[05:18:42] यह यह दर्शन का टकराव था।

[05:18:45] दर्शन का?

[05:18:45] हां, गांधी जी के लिए साध्य साधन शुचिता

[05:18:48] सबसे ऊपर थी। मतलब लक्ष्य तक पहुंचने का

[05:18:51] रास्ता भी उतना ही पवित्र होना चाहिए।

[05:18:53] अहिंसा उनके लिए एक अटूट सिद्धांत था।

[05:18:56] और बोस के लिए? वहीं बोस एक यथार्थवादी

[05:18:59] थे। उनके लिए आजादी का लक्ष्य इतना बड़ा

[05:19:01] था कि उसके लिए कोई भी साधन चाहे वह

[05:19:04] दुश्मन के दुश्मन से हाथ मिलाना ही क्यों

[05:19:06] ना हो जायज था।

[05:19:07] इसका कोई ठोस उदाहरण है जहां यह टकराव

[05:19:09] खुलकर सामने आया हो।

[05:19:10] सबसे बड़ा उदाहरण तो है 1931 का

[05:19:13] गांधी-इरविन समझौता।

[05:19:15] हम

[05:19:15] बोस इस बात से बहुत नाराज थे कि गांधी जी

[05:19:18] ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी

[05:19:20] को टालने के लिए समझौते में कोई मजबूत

[05:19:23] शर्त नहीं रखी।

[05:19:24] अच्छा। उनका यह भी मानना था कि गांधी जी

[05:19:27] को गोलमेज सम्मेलन में अकेले नहीं जाना

[05:19:29] चाहिए था कि अंग्रेज उन्हें वहां घेर

[05:19:31] लेंगे और हुआ भी वही

[05:19:33] हां गांधी जी निराश होकर लौटे थे।

[05:19:35] बिल्कुल बोस की कही बात सच साबित हुई।

[05:19:38] यहीं से कह सकते हैं दोनों के रास्ते अलग

[05:19:40] होने की नीव पड़ गई थी।

[05:19:41] और यह टकराव अपने चरम पर पहुंचा 1939 के

[05:19:44] त्रिपुरी अधिवेशन में

[05:19:46] इसे भारतीय इतिहास में त्रिपुरी संकट के

[05:19:48] नाम से जाना जाता है।

[05:19:50] जी

[05:19:50] संकट क्यों? ये तो कांग्रेस का एक सालाना

[05:19:52] अधिवेशन ही था। संकट इसलिए क्योंकि इसने

[05:19:54] कांग्रेस के अंदर की दरार को पूरे देश के

[05:19:57] सामने ला दिया था। देखिए 1938 में बोस

[05:20:00] हरिपुरा में निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए

[05:20:02] थे। तब तक सब ठीक था।

[05:20:04] लेकिन 1939 तक दूसरा विश्व युद्ध दरवाजे

[05:20:07] पर खड़ा था। बोस का मानना था कि हथौड़ा

[05:20:10] गर्म है। चोट कर देनी चाहिए।

[05:20:11] मतलब अंग्रेजों पर हमला करने का सही समय

[05:20:13] है।

[05:20:14] बिल्कुल कि अंग्रेज युद्ध में उलझे हैं।

[05:20:16] हमें इसी वक्त एक बड़ा आंदोलन छेड़ कर

[05:20:19] आजादी छीन लेनी चाहिए। और गांधी जी का

[05:20:21] नजरिया इसके ठीक उल्टा था।

[05:20:22] एकदम उल्टा गांधी जी का मानना था कि

[05:20:24] दुश्मन की मजबूरी का फायदा उठाना अनैतिक

[05:20:28] है। पवित्र लक्ष्य के लिए रास्ता भी

[05:20:30] पवित्र होना चाहिए।

[05:20:31] और इसी मतभेद के कारण अध्यक्ष पद के लिए

[05:20:33] चुनाव हुआ।

[05:20:34] हां, जो कांग्रेस में बहुत दुर्लभ था।

[05:20:36] गांधी जी ने पट्टा सीतारमैया को अपना

[05:20:39] उम्मीदवार बनाया और खुलकर कहा पट्टा की

[05:20:41] हार मेरी हार होगी।

[05:20:43] यह तो सीधी-सीधी गांधी बनाम बोस की लड़ाई

[05:20:45] हो गई।

[05:20:45] हां। और नतीजा चौंकाने वाला था। सुभाष

[05:20:48] चंद्र बोस 1580 वोट पाकर चुनाव जीत गए।

[05:20:52] जबकि गांधी जी के उम्मीदवार सीतारमैया को

[05:20:54] सिर्फ 1377 वोट मिले।

[05:20:57] तो यह तो बोस के बढ़ते कद का साफ सबूत था।

[05:20:59] बिल्कुल। कांग्रेस के इतिहास में पहली बार

[05:21:02] गांधी जी के चुने हुए उम्मीदवार को किसी

[05:21:04] ने खुले चुनाव में हरा दिया था।

[05:21:06] यह तो एक जबरदस्त जीत थी। फिर इस्तीफा

[05:21:08] क्यों दिया? क्या यह बोस का बड़प्पन था या

[05:21:10] एक राजनैतिक मजबूरी?

[05:21:11] यह एक राजनैतिक मजबूरी थी। एक तरह की

[05:21:14] पॉलिटिकल चेकमेट जैसी स्थिति थी। मतलब

[05:21:16] जीतकर भी वह हार गए थे।

[05:21:18] सही समझे? चुनाव के बाद गांधी जी के

[05:21:20] समर्थकों ने जो कांग्रेस कार्यकारिणी में

[05:21:22] बहुमत में थे, एक-एक करके इस्तीफा देना

[05:21:25] शुरू कर दिया।

[05:21:26] तो बोस के लिए काम करना नामुमकिन हो गया।

[05:21:28] बिल्कुल नामुमकिन। वो अध्यक्ष तो थे, पर

[05:21:30] उनके पास काम करने के लिए टीम ही नहीं थी।

[05:21:33] इस गतिरोध के बाद उन्होंने कांग्रेस

[05:21:35] छोड़ना ही बेहतर समझा और 3 मई 1939 को

[05:21:38] फॉरवर्ड ब्लॉक नाम से अपनी अलग पार्टी बना

[05:21:41] ली। तो कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने

[05:21:43] अपनी राह तो बना ली लेकिन अंग्रेजों की

[05:21:45] नजर अब पूरी तरह उन पर थी। फॉरवर्ड ब्लॉक

[05:21:47] बनाने के तुरंत बाद उन्हें नजरबंद कर दिया

[05:21:50] गया।

[05:21:50] जी

[05:21:50] और शायद इसी नजरबंदी ने बोस को वो करने पर

[05:21:53] मजबूर किया जो किसी ने सोचा भी नहीं था।

[05:21:55] देश से एक अविश्वसनीय पलायन

[05:21:58] यह किसी हॉलीवुड फिल्म की कहानी जैसा लगता

[05:22:01] है। सच में?

[05:22:02] हां। सोचिए कोलकाता में उनके घर पर 24ों

[05:22:04] घंटे पहरा है और वह दाढ़ी बढ़ाकर एक पठान

[05:22:08] बीमा एजेंट मोहम्मद जियााउद्दीन का भेष

[05:22:11] बदलकर रात के अंधेरे में निकल जाते हैं।

[05:22:13] यह तो सिर्फ शुरुआत थी।

[05:22:15] हां, वहां से वह पेशावर फिर काबुल पहुंचे।

[05:22:17] काबुल में कई हफ्तों तक वह भेष बदलकर

[05:22:20] भटकते रहे। फिर इटली के एक नागरिक ऑर्डो

[05:22:23] मेजोटा के नकली पासपोर्ट पर वह रूस के

[05:22:26] रास्ते जर्मनी के बर्लिन पहुंचे। यह पूरा

[05:22:28] सफर खतरों से भरा था। एक गलती और सब खत्म

[05:22:31] हो सकता था।

[05:22:32] और उनका लक्ष्य था हिटलर से मिलना। यह एक

[05:22:34] ऐसा फैसला है जिस पे आज भी बहुत बहस होती

[05:22:36] है। आजादी के लिए हिटलर जैसे तानाशाह से

[05:22:39] मदद मांगना इसे कैसे देखा जाए?

[05:22:40] देखिए पोस्ट का नजरिया बहुत साफ था।

[05:22:43] दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है।

[05:22:45] एक सैन्य रणनीति।

[05:22:46] हां। उनके लिए यह कोई वैचारिक गठबंधन नहीं

[05:22:49] था बल्कि एक सैन्य रणनीति थी। वह जानते थे

[05:22:52] कि हिटलर कौन है लेकिन उनका मानना था कि

[05:22:54] भारत की आजादी के लिए किसी भी शक्ति से

[05:22:57] मदद लेने में हर्ज नहीं है।

[05:22:58] कहा जाता है कि हिटलर ने ही उन्हें नेताजी

[05:23:01] की उपाधि दी थी।

[05:23:02] जी यह सच है। जर्मनी में हिटलर ने ही

[05:23:04] उन्हें सम्मान से नेताजी कहा था।

[05:23:06] तो क्या हिटलर ने उनकी मदद की?

[05:23:08] सीधे तौर पर नहीं। हिटलर ने भारत में सीधे

[05:23:11] सेना भेजने में अपनी असमर्थता जताई। लेकिन

[05:23:14] उसने बोस को एक अहम सलाह दी।

[05:23:16] क्या सलाह दी? जापान से संपर्क करने की

[05:23:19] क्योंकि जापानी सेना उस वक्त तक बर्मा

[05:23:21] यानी भारत के दरवाजे तक पहुंच चुकी थी।

[05:23:23] जर्मनी में रहते हुए बोस ने दो बड़े काम

[05:23:26] किए। पहला उन्होंने अफ्रीका में पकड़े गए

[05:23:29] भारतीय युद्ध बंदियों को मिलाकर फ्री

[05:23:31] इंडियन लीजन नाम की एक सेना बनाई और यहीं

[05:23:34] जय हिंद का नारा दिया और दूसरा

[05:23:36] दूसरा उन्होंने आजाद हिंद रेडियो की

[05:23:38] स्थापना की जिससे वह भारत तक अपना संदेश

[05:23:40] पहुंचाते जर्मनी से वह पनडुब्बी के रास्ते

[05:23:43] जापान पहुंचे और यहीं से आजाद हिंद फौज की

[05:23:46] कहानी को असली रफ्तार मिली।

[05:23:48] बिल्कुल। दरअसल जापान में इसकी नीव पहले

[05:23:50] ही रखी जा चुकी थी।

[05:23:51] रास बिहारी बोस और कैप्टन मोहन सिंह हां

[05:23:54] वहां क्रांतिकारी रास बिहारी बोस और

[05:23:57] ब्रिटिश सेना के एक अफसर कैप्टन मोहन सिंह

[05:24:00] पहले से ही भारतीय युद्ध बंदियों को

[05:24:02] इकट्ठा कर इंडियन नेशनल आर्मी बना चुके

[05:24:05] थे। लेकिन उन्हें एक करिश्माई चेहरे की

[05:24:08] जरूरत थी जो इस सेना का नेतृत्व कर सके।

[05:24:11] और वह चेहरा बने सुभाष चंद्र बोस।

[05:24:13] जी उनके पहुंचते ही यह तलाश पूरी हो गई। 4

[05:24:15] जुलाई 1943 को सिंगापुर में रास बिहारी

[05:24:19] बोस ने इसकी कमान सुभाष को सौंप दी और

[05:24:22] इसका नाम रखा गया आजाद हिंद फौज।

[05:24:25] और कमान संभालते ही अगले दिन 5 जुलाई को

[05:24:28] उन्होंने सिंगापुर के टाउनहॉल के सामने

[05:24:29] अपना वो ऐतिहासिक नारा दिया।

[05:24:31] दिल्ली चलो।

[05:24:32] दिल्ली चलो।

[05:24:32] हां। और साथ ही उन्होंने कहा था तुम मुझे

[05:24:34] खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा। इन नारों

[05:24:37] ने सैनिकों में एक नया जोश भर दिया।

[05:24:39] उन्होंने फौज को पेशेवर तरीके से संगठित

[05:24:42] किया। गांधी, नेहरू और आजाद के नाम पर

[05:24:44] ब्रिगेड बनाई।

[05:24:46] और सबसे क्रांतिकारी कदम था महिलाओं की

[05:24:48] रानी झांसी रेजीमेंट का गठन।

[05:24:50] तो 43 को बोस ने सिंगापुर में भारत की

[05:24:54] अस्थाई सरकार आजाद हिंद सरकार की स्थापना

[05:24:57] की घोषणा की।

[05:24:58] जिसके वो खुद राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री

[05:25:00] बने।

[05:25:00] हां। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और

[05:25:02] सेनाध्यक्ष और यह सिर्फ कागजी सरकार नहीं

[05:25:05] थी। जर्मनी, जापान, इटली समेत नौ देशों ने

[05:25:08] इसे मान्यता दी। जापान ने अंडमान और

[05:25:11] निकोबार द्वीप समूह इस सरकार को सौंप दिए।

[05:25:14] जिनका नाम बदलकर उन्होंने शहीद और स्वराज

[05:25:16] द्वीप रखा।

[05:25:17] जी। यह एक तरह का सिंबलिज्म था

[05:25:19] कि भारत की जमीन पर अब एक भारतीय सरकार का

[05:25:22] राज है।

[05:25:22] और फिर फौज ने भारत की ओर बढ़ना शुरू

[05:25:24] किया। दिल्ली चलो अब सिर्फ नारा नहीं था।

[05:25:27] एक हकीकत बनने जा रहा था।

[05:25:28] हां। 18 मार्च 1944. यह वह तारीख थी जब

[05:25:33] आजाद हिंद फौज ने बर्मा की सीमा पार करके

[05:25:36] भारतीय धरती पर कदम रखा। मणिपुर के मुरांग

[05:25:40] में पहली बार आजाद भारत का तिरंगा फहराया

[05:25:43] गया।

[05:25:43] एक ऐतिहासिक पल?

[05:25:44] बहुत ऐतिहासिक और भावुक पल। सोचिए उन

[05:25:47] सैनिकों के लिए इसका क्या मतलब होगा।

[05:25:49] हालांकि यह अभियान बहुत मुश्किल था। बर्मा

[05:25:52] के घने जंगल, भयंकर बारिश, मलेरिया

[05:25:55] और अंग्रेजों की मजबूत सेना।

[05:25:57] हां। और रसद और हथियारों की भी भारी कमी

[05:25:59] थी।

[05:26:00] इसी दौरान बोस ने रंगून रेडियो से गांधी

[05:26:02] जी को संबोधित किया था। उन दोनों के बीच

[05:26:04] इतने मतभेदों के बावजूद भी यह एक दिलचस्प

[05:26:06] घटना थी।

[05:26:07] बहुत दिलचस्प। 6 जुलाई 1944 को रंगून

[05:26:11] रेडियो से बोस ने गांधी जी को राष्ट्रपिता

[05:26:14] कहकर संबोधित किया और भारत की आजादी के इस

[05:26:17] अंतिम युद्ध के लिए उनका आशीर्वाद मांगा।

[05:26:20] यह दिखाता है कि राजनैतिक मतभेदों के

[05:26:22] बावजूद बोस के मन में गांधी जी के लिए

[05:26:24] कितना सम्मान था। बिल्कुल और जवाब में

[05:26:27] गांधी जी ने भी बोस को देशभक्तों का

[05:26:29] देशभक्त कहा था। प्रिंस अमंग द

[05:26:31] पेट्रिएट्स।

[05:26:32] लेकिन फिर जब लग रहा था कि फौज आगे बढ़ेगी

[05:26:35] सब कुछ अचानक बदल गया।

[05:26:36] हां, आजाद हिंद फौज की किस्मत दूसरे विश्व

[05:26:39] युद्ध के नतीजों से जुड़ी थी। अगस्त 1945

[05:26:43] में अमेरिका ने जापान के हिरशिमा और

[05:26:45] नागासाकी पर परमाणु बम गिरा दिए।

[05:26:48] और जापान ने आत्मसमर्पण कर दिया।

[05:26:50] जी। जापान के हारते ही आजाद हिंद फौज को

[05:26:53] मिलने वाली सारी मदद और सप्लाई बंद हो गई।

[05:26:56] अभियान को रोकना पड़ा और सैनिकों को

[05:26:58] आत्मसमर्पण करना पड़ा। दिल्ली का सपना

[05:27:01] अधूरा रह गया।

[05:27:02] और यहीं से नेताजी की कहानी एक रहस्य में

[05:27:05] तब्दील हो जाती है। 18 अगस्त 1945 को

[05:27:08] ताइवान के एक हवाई अड्डे पर उन्हें आखिरी

[05:27:10] बार देखे जाने की खबर है।

[05:27:12] हम

[05:27:12] कहा जाता है कि इसके बाद उनका विमान

[05:27:14] दुर्घटनाग्रस्त हो गया। लेकिन उनकी मृत्यु

[05:27:17] आज तक एक अनसुलझी पहेली बनी हुई है।

[05:27:19] उनका अंत भले ही रहस्यमय हो लेकिन उनकी

[05:27:22] कहानी का असर खत्म नहीं हुआ बल्कि मैं तो

[05:27:25] कहूंगी कि यहीं से उसका सबसे शक्तिशाली

[05:27:28] अध्याय शुरू हुआ।

[05:27:29] आप लाल किले के मुकदमे की बात कर रही हैं?

[05:27:31] हां, युद्ध के बाद अंग्रेजों ने आजाद हिंद

[05:27:34] फौज के तीन अधिकारियों, एक हिंदू कर्नल

[05:27:37] प्रेम सहगल, एक मुस्लिम मेजर जनरल शाहनवाज

[05:27:40] खान और एक सिख कर्नल गुरबख्श सिंह ढिलोन

[05:27:43] पर दिल्ली के लाल किले में देशद्रोह का

[05:27:46] मुकदमा चलाया।

[05:27:47] और यह मुकदमा अंग्रेजों के लिए ही भारी

[05:27:49] पड़ गया।

[05:27:50] बहुत भारी। अंग्रेज दिखाना चाहते थे कि यह

[05:27:52] बागी हैं। लेकिन पूरा देश इन तीनों के

[05:27:55] समर्थन में उठ खड़ा हुआ। कांग्रेस ने भूला

[05:27:58] भाई देसाई और जवाहरलाल नेहरू जैसे बड़े

[05:28:00] वकीलों की टीम उनकी पैरवी के लिए खड़ी कर

[05:28:03] दी।

[05:28:03] पूरे देश में प्रदर्शन हुए।

[05:28:05] इस मुकदमे ने वह कर दिखाया जो आजाद हिंद

[05:28:07] फौज की लड़ाई नहीं कर पाई थी। इसने भारत

[05:28:10] के हर धर्म और समुदाय को एक साथ खड़ा कर

[05:28:13] दिया। आखिरकार भारी जन दबाव के कारण

[05:28:16] तत्कालीन वाइससराॉय वेवेल को अपनी विशेष

[05:28:19] शक्तियों का इस्तेमाल करके उनकी मौत की

[05:28:21] सजा माफ करनी पड़ी। तो कई इतिहासकार यह

[05:28:24] मानते हैं कि इसी मुकदमे ने अंग्रेजों को

[05:28:26] एहसास दिलाया कि अब उनका जाना तय है।

[05:28:28] हां, इस मुकदमे और उसके बाद नौसेना में

[05:28:32] हुई बगावत ने अंग्रेजों को यह यकीन दिला

[05:28:34] दिया कि अब वो भारतीय सेना पर भरोसा नहीं

[05:28:37] कर सकते और भारत पर राज करना नामुमकिन है।

[05:28:40] तो एक तरह से सुभाष चंद्र बोस और उनकी फौज

[05:28:43] हारकर भी जीत गए। उनका रास्ता गांधी जी से

[05:28:45] बिल्कुल अलग था। शायद ज्यादा खतरनाक और

[05:28:48] विवादास्पद भी लेकिन मंजिल वही भारत की

[05:28:50] पूर्ण स्वतंत्रता। उनकी दूरदर्शिता और

[05:28:53] जुझारू तेवर ने आजादी के संघर्ष को एक ऐसी

[05:28:56] आग दी जिसे अंग्रेज बुझा नहीं पाए। एक

[05:28:59] सवाल जो आज भी सोचने पर मजबूर करता है।

[05:29:02] अगर द्वितीय विश्व युद्ध का परिणाम कुछ और

[05:29:05] होता और जापान को आत्मसमर्पण ना करना

[05:29:08] पड़ता तो क्या आजाद हिंद फौज का दिल्ली

[05:29:11] चलो अभियान भारत के इतिहास को कोई और ही

[05:29:14] मोड़ दे सकता था?
