# [Marathon] Complete Economy in One Shot | UPSC Prelims 2026 Revision | Madhukar Kotawe

https://www.youtube.com/watch?v=mcyP9uLsR7I
Translation: en

[00:38] हाय एवरीवन लेट्स क्रैक यूपीएससी सीएससी
  Hi everyone, let's crack UPSC CSE.

[00:41] हिंदी में आप सभी का भरपूर स्वागत है।
  A hearty welcome to all of you in Hindi.

[00:46] इस साल का यह हमारा आखिरी मैराथन है और
  This is our last marathon of the year and

[00:51] क्योंकि मैंने जितना उम्मीद की थी या
  because as much as I had hoped or

[00:54] जितना मैंने कहा था आप लोगों से कि लगभग
  as much as I had told you all that approximately

[00:57] हम सभी विषय का मैराथन कवर कराएंगे।
  we will cover the marathon of all subjects.

[01:00] तो जितने भी जरूरी विषय थे मॉडर्न हिस्ट्री कहिए,
  So, all the important subjects, say Modern History,

[01:02] फिजिकल ज्योग्राफी, इंडियन ज्योग्राफी, इंडियन पॉलिटी, इंडियन इकोनॉमी, साइंस एंड टेक्नोलॉजी, इकोलॉजी एनवायरमेंट।
  Physical Geography, Indian Geography, Indian Polity, Indian Economy, Science and Technology, Ecology, Environment.

[01:09] पहली बार लगभग सभी विषयों के मैराथन हमने लिए हैं।
  For the first time, we have taken marathons of almost all subjects.

[01:13] विद करंट अफेयर भी हमने बातचीत की है।
  We have also talked about current affairs.

[01:16] तो करंट अफेयर के भी सभी हिस्सों को कवर किया है।
  So, all parts of current affairs have also been covered.

[01:18] आज की ये क्लास कंप्लीट होने के बाद पूरे YouTube के इतिहास में शायद यह पहली बार होगा कि
  After this class is completed today, it will probably be the first time in the history of YouTube that

[01:25] एक सिंगल एजुटर के द्वारा सभी इंपॉर्टेंट विषय को कवर करा दिया गया है।
  all important subjects have been covered by a single educator.

[01:28] इस क्लास को शुरू करने से पहले पुनः याद
  Before starting this class, remember again

[01:38] दिला दूं यह केवल और केवल एक रिवीजन है।
  Let me tell you, this is only and only a revision.

[01:43] इसे कंप्लीट सिलेबस मानने की गलती ना करें।
  Do not make the mistake of considering it a complete syllabus.

[01:47] यह कंप्लीट सिलेबस जरूर है।
  It is definitely a complete syllabus.

[01:51] लेकिन इसमें कांसेप्ट को पढ़ाया नहीं बल्कि दोहराया जाएगा।
  But in this, concepts will not be taught but revised.

[01:55] हम एक तरीके से सभी चीजों को समराइज करेंगे।
  We will summarize all things in a way.

[02:00] इस रिवीजन का मकसद उन विद्यार्थियों को मदद करना है जो 2026 में कोई भी कॉम्पिटिटिव एग्जाम देना चाहते हैं जिसमें इंडियन इकोनॉमिक सिलेबस है।
  The purpose of this revision is to help those students who want to give any competitive exam in 2026 which has the Indian Economic syllabus.

[02:13] दूसरा 2027, 28 और 29 के विद्यार्थियों को यह क्लास जरूर देखनी चाहिए ताकि उन्हें यह पता चले वास्तविक रूप में कि कितना पढ़ना है।
  Second, students of 2027, 28, and 29 should definitely watch this class so that they know in reality how much to study.

[02:29] क्योंकि अगर मैं इंडियन इकोनमी का सिलेबस बताने जाऊंगा तो डेढ़ दो घंटे लगेंगे।
  Because if I go to explain the syllabus of Indian Economy, it will take one and a half to two hours.

[02:34] लेकिन वास्तविक रूप में इन 12 घंटों में उन्हें महसूस होगा कि कितना
  But in reality, in these 12 hours, they will feel how much

[02:39] पढ़ना है।
  It has to be read.

[02:41] और तीसरी बात यदि कोई और भी कॉम्पिटिटिव एग्जाम देनी है जैसे कि एसएससी वाली एग्जाम होती है, वन डे एग्जाम होती है।
  And the third thing, if you have to give any other competitive exam, like the SSC exam, the one-day exam.

[02:49] उनमें अगर किसी विषय को कवर करना है तो यह क्रीम मटेरियल है जिसको अगर आपने कवर कर लिया तो भी आपका एक बढ़िया रिवीजन हो जाता है।
  If you have to cover any subject in them, then this is cream material, which if you have covered, then you will also have a good revision.

[02:57] हम देखेंगे इस पूरी थ्योरी के साथ-साथ कुछ क्वेश्चंस को भी कोशिश करेंगे कि कांसेप्ट अच्छे से रिवाइज हो जाए और यह जो इंडियन इकोनमी का मैराथन है मेरी रिक्वेस्ट है कि अब आने वाले जितने भी दिन हमारे पास बचे हैं उनमें एटलीस्ट दो बार तो ही जरूर देखकर चले जाइएगा।
  We will try to cover some questions along with this entire theory so that the concepts are revised well, and this marathon of Indian Economy, my request is that in the remaining days we have, at least watch it twice.

[03:20] स्टैटिक पोर्शन में पूरी मदद मिलेगी।
  You will get full help in the static portion.

[03:23] इंडियन इकोनॉमी का करंट अफेयर का मैराथन हम ऑलरेडी कंप्लीट कर चुके हैं।
  We have already completed the Indian Economy current affairs marathon.

[03:28] इंडियन इकोनॉमी, साइंस एंड टेक्नोलॉजी, इकोलॉजी एनवायरमेंट तीनों विषयों में करंट अफेयर का अपना एक अलग रोल होता है।
  In Indian Economy, Science and Technology, Ecology, and Environment, current affairs have their own separate role in all three subjects.

[03:34] तो मैंने उन तीनों के करंट अफेयर भी कंप्लीट कराए हैं और तीनों का स्टैटिक सेगमेंट भी कवर करा
  So I have completed the current affairs for all three and also covered the static segment for all three.

[03:41] दिया है।
  It is given.

[03:43] अब इसके बाद कुछ नहीं हो पाएगा।
  Now nothing can be done after this.

[03:45] जैसे कुछ लाल लाली कह रहे हैं कि आर्ट एंड कल्चर तो नहीं अब नहीं हो पाएंगे क्लासेस।
  Like some 'lal lali' are saying that Art and Culture classes will not be possible now.

[03:51] अब 2027 की जंग में हम लगेंगे।
  Now we will engage in the battle of 2027.

[03:53] सभी को पहले एक बार मैं पूछना चाहूंगा कि ऐसे कितने लाल लाली जिन्होंने पूरे के पूरे मैराथन विद करंट अफेयर कंप्लीट कर दिए हैं ताकि पहले उन लोगों को एक डडीिकेशन मैं कर दूं कि हां फिर आप बिल्कुल एक जेन्युइन विद्यार्थी के रूप में आगे बढ़े हैं।
  First, I would like to ask everyone, how many 'lal lali' have completed the entire marathon with current affairs, so that I can first dedicate something to those people, that yes, you have progressed as a genuine student.

[04:12] बजट सर्वे वाली बातचीत करंट अफेयर में कवर कराई है।
  The discussion about the budget survey has been covered in current affairs.

[04:15] जो भी इंपॉर्टेंट थी बातें हमने कंप्लीट करा दी थी उसमें।
  Whatever important points there were, we had completed them in it.

[04:27] शक्ति शिव शक्ति बहुत बढ़िया बहुत बढ़िया यह बहुत अच्छी बात है और यह दिखा रहा है आपकी सिंसियरिटी को कि बिल्कुल सुबह 6:00 बजे आप लोग तैयार हो जाते हैं।
  Shakti, Shiv Shakti, very good, very good, this is a very good thing and it shows your sincerity that you get ready at 6:00 AM sharp.

[04:37] वेट करते हैं कि मास्टर आएगा
  Waiting for the master to come.

[04:42] और चीजें कंप्लीट करा देगा इस बार।
  And it will complete other things this time.

[04:45] बहुत बढ़िया।
  Very good.

[04:47] तो आप सभी लोग तैयार हैं अगले 12 घंटे तक लगातार मुझे सुनने के लिए, विषय को जानने के लिए और एक बार पुनः इंडियन इकोनमी को दोहराने के लिए जो इंडियन इकोनमी की हमारी 48 वीडियो की सीरीज है उसमें दो-तीन वीडियो और डालेंगे हम और वो कंप्लीट हो जाएगी।
  So are you all ready to listen to me continuously for the next 12 hours, to know the subject, and to revise the Indian Economy once again, in our 48-video series on the Indian Economy, we will add two-three more videos and it will be completed.

[05:09] पहली बार इंडियन इकोनमी आपको YouTube पर पूरी तरह से उपलब्ध करा दी गई है।
  For the first time, the Indian Economy has been made fully available to you on YouTube.

[05:14] तो आइए शुरुआत करते हैं बिना किसी देरी के ज्यादा समय नहीं लेते।
  So let's start without any delay, without taking much time.

[05:19] सबसे पहले तो इतिहास पुनः याद दिला दूं मैं।
  First of all, let me remind you of the history again.

[05:22] आज तक ऐसा कोई इंस्टट्यूट नहीं बना जिसने इंग्लिश और हिंदी दोनों मीडियम की पहली रैंक लाकर दिखाई हो।
  Until today, no institute has been formed that has managed to bring the first rank in both English and Hindi mediums.

[05:28] उस मामले में केवल अनअकडमी इकलौता इंस्टट्यूट है।
  In that regard, Unacademy is the only institute.

[05:31] जहां से हिंदी और इंग्लिश मीडियम दोनों की पहली रैंक आई है।
  From where the first rank has come in both Hindi and English mediums.

[05:37] एक अद्भुत रिजल्ट इस बार अनअकडमी ने दिए हैं।
  Unacademy has given wonderful results this time.

[05:40] इस समय यदि आप तैयारी
  If you are preparing at this time

[05:43] कर रहे हैं 2027-28 का कोई विद्यार्थी आपके परिचय में है तो उन्हें सूचित कर दीजिएगा कि एमके लाइव रेफर कोड यूज़ करते हुए क्योंकि यह चिट कोड है जिससे मैक्सिमम डिस्काउंट मिलता है आप लोगों को।
  If any student of 2027-28 is in your acquaintance, please inform them to use the MK Live referral code because this is a cheat code that gives you the maximum discount.

[05:55] यह नंबर है हमारी टीम का एमके लाइव रेफर कोड के माध्यम से इस समय आप 179 में 6 महीने के एक्सटेंशन के साथ एक प्रकार से अपनी तैयारी को एक बेहतर दिशा दे सकते हैं।
  This is our team's number. Through the MK Live referral code, you can give your preparation a better direction with a 6-month extension for 179.

[06:10] कंप्लीट हिंदी मीडियम के भी बैच है।
  There are also batches for complete Hindi medium.

[06:13] कंप्लीट इंग्लिश मीडियम के भी बैच है।
  There are also batches for complete English medium.

[06:16] बाइलिंगुअल भी बैच है।
  There are also bilingual batches.

[06:19] एक सब्सक्रिप्शन पर आपको तीनों मीडियम के बैच मिल जाते हैं।
  With one subscription, you get batches for all three mediums.

[06:21] यह सबसे बड़ी खासियत है।
  This is the biggest specialty.

[06:24] तो इस समय यदि आप 12 महीने का सब्सक्रिप्शन लेंगे तो 1799 में 15 मंथ का सब्सक्रिप्शन लेंगे तो आपको 3 महीने का फ्री एक्सटेंशन मिल जाएगा।
  So, if you take a 12-month subscription now, you will get a 3-month free extension for 1799 for a 15-month subscription.

[06:35] मेरा पर्सनल सजेशन है कि यदि 2027 भी देना है तब भी आप इसी को प्रेफर करिएगा ताकि प्रीलिम्स के बाद मेंस तक में चीजें बेटर रहनी चाहिए।
  My personal suggestion is that even if you are appearing in 2027, you should prefer this, so that things remain better from Prelims to Mains.

[06:45] यह बातचीत अगर हम कहें तो एक प्रकार से जो लोग 2028 के लिए प्लानिंग कर रहे हैं और जो लोग 2029 के लिए प्लानिंग कर रहे हैं।
  If we say this conversation, then people who are planning for 2028 and people who are planning for 2029.

[06:55] एक बेटर मौका है यह 20101 में जो फीस थी उसी के अंतर्गत रखा गया है।
  It is a better opportunity, this has been kept within the fees that were in 20101.

[06:59] एमके लाइव रेफर कोड जरूर यूज़ करते चलना है।
  You must keep using the MK Live referral code.

[07:01] इस समय कई सारे नए बैच स्टार्ट हुए हैं।
  Many new batches have started at this time.

[07:07] जैसे 14th मई से कंप्लीट इंग्लिश मीडियम का बैच है।
  For example, there is a complete English medium batch from May 14th.

[07:09] 15th मई को हिंदी मीडियम का बैच स्टार्ट हो रहा है।
  A Hindi medium batch is starting on May 15th.

[07:13] अह 15th मई को आगाज़ बाइलिंगुअल बैच 2027 के लिए स्टार्ट हो रहा है और 15th मई को ही बाइलिंगुअल न्यू बैच 2028 के लिए स्टार्ट किया जा रहा है।
  Uh, the bilingual batch for 2027 is starting on May 15th, and a new bilingual batch for 2028 is also being started on May 15th.

[07:25] यह वो नए बैच है जो आने वाले दिनों में कंप्लीट होंगे।
  These are the new batches that will be completed in the coming days.

[07:31] [गला साफ़ करने की आवाज़] ऑल इंडिया यूपीएससी प्रीलिम्स मॉक टेस्ट 17th मई को लिया जा रहा है।
  [Sound of clearing throat] The All India UPSC Prelims mock test is being conducted on May 17th.

[07:35] यदि आप देना चाहे तो जरूर दे दीजिएगा।
  If you wish to take it, please do give it.

[07:40] और ₹1 में अभी भी टेस्ट सीरीज का यह ऑफर चल रहा है।
  And this offer for the test series is still running for ₹1.

[07:43] मेरा मानना है कि 203031 भी
  I believe that 203031 also

[07:46] देना हो तब भी ₹1 का यह टेस्ट लेकर रख लीजिए क्योंकि इससे बेस्ट और कुछ नहीं हो सकता।
  Even if you have to give, take this ₹1 test because nothing can be better than this.

[07:51] इंडियन इकोनमी का आज हम कंप्लीट रिवीजन करेंगे।
  Today we will do a complete revision of the Indian economy.

[07:55] देखो हम कवर करने वाले हैं इनमें से प्रीलिम्स वाले वो सेगमेंट जो कि हमारे एग्जाम के पॉइंट ऑफ व्यू से जरूरी है।
  Look, we are going to cover those segments from the prelims which are important from our exam point of view.

[08:03] सबसे पहले हम कवर करेंगे की बेसिक कांसेप्ट बैंकिंग और फाइनेंशियल मार्केट बजट एंड फिस्कल पॉलिसी।
  First, we will cover the basic concepts of banking and financial market, budget and fiscal policy.

[08:14] अगर ब्रेक से पहले यहां तक कवर हो गया तो समझ जाइएगा कि लाइफ जिनागाला हो गई।
  If this much is covered before the break, then understand that life has become easy.

[08:20] अर्थव्यवस्था से जुड़े हुए चैलेंजेस जिसमें पावर्टी, अनइंप्लॉयमेंट, इनफ्लेशन पर बातचीत करेंगे।
  We will talk about challenges related to the economy, including poverty, unemployment, and inflation.

[08:27] फिर सेक्टर ऑफ इकोनमी में एग्रीकल्चर ऑलरेडी कवर करा चुके तो एग्रीकल्चर नहीं करेंगे।
  Then in the sector of economy, since agriculture has already been covered, we will not do agriculture.

[08:29] इंडस्ट्री और सर्विस सेक्टर पर थोड़ी बहुत बातचीत होगी।
  There will be a little discussion on the industry and service sector.

[08:34] नेशनल इनकम के बारे में बातचीत करेंगे।
  We will talk about national income.

[08:36] जीडीपी के बारे में बातचीत करेंगे।
  We will talk about GDP.

[08:40] फिर नए सेक्टर में कुछ नई शब्दावली आएगी।
  Then some new terminology will come in the new sector.

[08:43] कुछ वर्ल्ड ऑर्गेनाइजेशन और बैलेंस ऑफ पेमेंट ये हमारा टॉपिक बचा हुआ है बस रियल मेन
  Some world organizations and balance of payment, this is our remaining topic, just the real main

[08:49] सीरीज में।
  In the series.

[08:51] तो ये मैं जल्द ही कवर करा दूंगा।
  So I will cover this soon.

[08:54] तो ये क्योंकि वैसे भी मेंस में ज्यादा आने की पॉसिबिलिटी रहती है।
  So this is because it is more likely to come in the mains anyway.

[08:56] लेकिन फिर भी हम प्रीलिम्स में इससे जुड़े हुए कुछ छोटे-छोटे कांसेप्टों को कवर करेंगे।
  But still, we will cover some small concepts related to this in the prelims.

[09:01] फिर लास्ट में कुछ बच गया तो देखेंगे।
  Then we will see if anything is left at the end.

[09:04] 12 घंटे का टाइम है हमारे पास।
  We have 12 hours of time.

[09:06] हम पूरी कोशिश करेंगे कि इन 12 घंटों में ये पूरे 10 जो टॉपिक है ये कंप्लीटली कवर हो जाए।
  We will try our best to completely cover these 10 topics in these 12 hours.

[09:12] पूरे इंडियन इकोनॉमी को हम 10 हिस्सों में डिवाइड करते हैं ताकि सिलेबस बेटर तरीके से कवर किया जा सके।
  We divide the entire Indian economy into 10 parts so that the syllabus can be covered in a better way.

[09:18] सबसे पहले हम बात कर रहे हैं की बेसिक कांसेप्ट क्योंकि वास्तविक रूप में बेसिक कांसेप्ट ही बहुत टिपिकल माने जाते हैं।
  First of all, we are talking about basic concepts because in reality, basic concepts are considered very typical.

[09:26] सबसे ज्यादा सवालों का मटेरियल यहां से आता है।
  The material for the most questions comes from here.

[09:29] तो सुनते चलिएगा।
  So keep listening.

[09:31] नोट्स बनाने की जरूरत नहीं है।
  There is no need to make notes.

[09:34] पीडीएफ हम आपको लास्ट में दे देंगे।
  We will give you the PDF at the end.

[09:36] अगर आप अपनी कॉपी में कुछ स्पीड से नोट डाउन कर सकते हैं तो उसको जरूर देखते चलेंगे।
  If you can note down something quickly in your copy, then definitely keep an eye on it.

[09:44] सबसे पहले एक-एक शब्द को समझते हैं क्योंकि इंडियन इकोनॉमी और इकोनॉमिक्स यही
  First of all, let's understand each word because Indian economy and economics is this

[09:49] एक बड़ी समस्या आ जाती है।
  A big problem arises.

[09:52] इकोनॉमिक्स का मतलब होता है अर्थशास्त्र।
  Economics means economics.

[09:56] जैसे अगर मैं आपको बताऊं तो पॉलिटी और पॉलिटिक्स।
  For example, if I tell you, then polity and politics.

[10:05] पॉलिटिक्स मतलब होता है राजनीति।
  Politics means politics.

[10:09] शक्ति प्राप्त करने का तरीका।
  The way to gain power.

[10:17] और पॉलिटी का मतलब होता है राज व्यवस्था
  And polity means the political system

[10:22] कि वहां पर किसी व्यक्ति को क्या जिम्मेदारियां दी गई हैं?
  What responsibilities have been given to a person there?

[10:25] प्रधानमंत्री की क्या जिम्मेदारियां हैं?
  What are the Prime Minister's responsibilities?

[10:27] चीफ मिनिस्टर की क्या जिम्मेदारी हैं?
  What are the Chief Minister's responsibilities?

[10:30] पार्लियामेंट के क्या काम हैं?
  What are the functions of Parliament?

[10:34] जुडिशरी के क्या काम हैं?
  What are the functions of the Judiciary?

[10:37] या फिर हम कह सकते हैं कि हमारे देश में इस लोकल गवर्नमेंट को क्या जिम्मेदारियां दी गई है?
  Or we can say, what responsibilities have been given to this local government in our country?

[10:43] हम इसे कहते हैं राज व्यवस्था व्यवस्था सिस्टम शासन करने का सिस्टम तो
  We call this the political system, the system of governance, the system of ruling, so

[10:47] वैसे ही अर्थशास्त्र और अर्थव्यवस्था है।
  Similarly, there is economics and the economy.

[10:54] यूपीएससी के सिलेबस में हमें पॉलिटी पढ़ना होता है।
  In the UPSC syllabus, we have to study polity.

[10:57] पॉलिटिक्स नहीं।
  Not politics.

[10:59] वैसे ही यूपीएससी के सिलेबस में हमें व्यवस्था पढ़नी है।
  Similarly, in the UPSC syllabus, we have to study the system.

[11:01] अर्थ की व्यवस्था।
  The system of economy.

[11:05] अर्थ का मतलब यहां मुद्राओं से लिया जा सकता है, संसाधन से लिया जा सकता है।
  Economy here can mean currency, it can mean resources.

[11:10] जिसकी कोई कीमत होती है।
  Which has some value.

[11:13] हम ऐसी किसी भी चीज को अर्थ शब्द कह सकते हैं।
  We can call any such thing the word economy.

[11:16] तो उसकी व्यवस्था कैसी है?
  So how is its system?

[11:19] कैसा यहां का सिस्टम काम करता है?
  How does the system here work?

[11:21] क्या पूरी तरह से इन पर सरकार का कंट्रोल होता है?
  Is the government in complete control of these?

[11:25] कि जनता के पास राइट्स होते हैं?
  Or do the public have rights?

[11:27] कि दोनों मिक्स रूप में काम कर रहे होते हैं।
  Or are both working in a mixed form?

[11:30] यह एक प्रकार का शास्त्र है।
  This is a type of science.

[11:32] मतलब एक प्रकार का सिद्धांत है।
  Meaning, it is a type of principle.

[11:35] यहां पर हमारे लिए थ्योरी की बातचीत आ जाती है।
  Here, the discussion of theory comes to us.

[11:39] इस प्रकार का मतलब यहां पर हम जानते हैं कि विषय क्या इंपैक्ट डालेगा?
  In this way, here we know what impact the subject will have?

[11:41] इसके क्या कॉज होंगे?
  What will be its causes?

[11:45] क्या इंपैक्ट होंगे?
  What will be the impacts?

[11:48] कारण और प्रभावों पर जब हम चर्चाएं करने लग जाते हैं तो कहीं ना कहीं अर्थशास्त्र
  When we start discussing causes and effects, then somewhere economics

[11:51] का यहां पर पुट आ जाता है।
  A put comes here.

[11:54] वास्तविक रूप में वैसे तो अर्थव्यवस्था पढ़ते समय हमें शास्त्र की जरूरत पड़ेगी।
  In reality, while studying the economy, we will need the scripture.

[12:00] मतलब वास्तविक रूप में शास्त्र के अनुप्रयोग ही व्यवस्था का निर्माण करेंगे।
  Meaning, in reality, the applications of the scripture will build the system.

[12:03] तो बीच-बीच में शास्त्र के कांसेप्टों को यूज़ करते हुए हम अपनी व्यवस्थाओं को समझने का प्रयास करेंगे।
  So, using the concepts of scripture from time to time, we will try to understand our systems.

[12:11] बीच-बीच में सिद्धांतों का उपयोग करते हुए हमारी व्यवस्था जानने की कोशिश करेंगे।
  From time to time, using principles, we will try to understand our system.

[12:16] तो वास्तविक रूप में हम पढ़ना क्या चाहते हैं?
  So, what do we actually want to study?

[12:19] भारतीय अर्थव्यवस्था याद रखिएगा कि आपका सिलेबस क्या है?
  Indian economy, remember what your syllabus is.

[12:23] यही सबसे पहला सवाल समझना जरूरी है।
  This is the first question that is important to understand.

[12:26] इसे हम इंडियन इकोनॉमी कहते हैं।
  We call this the Indian economy.

[12:30] जब भी आपसे कोई पूछेगा कि यूपीएससी में आपका सिलेबस का नाम क्या है?
  Whenever someone asks you what the name of your syllabus is in UPSC,

[12:33] इस विषय को लेकर तो आप कहेंगे इंडियन इकोनॉमी हमें पढ़ना होता है।
  regarding this subject, you will say we have to study the Indian economy.

[12:36] इकोनॉमिक्स नहीं पढ़ना होता है।
  We do not have to study economics.

[12:39] क्योंकि वास्तविक रूप में जिन लोगों को पीएचडी करना है, जिनको ग्रेजुएशन करना है, जिनका 12th में इकोनॉमिक्स था, वे लोग शास्त्र पढ़ते हैं।
  Because in reality, those who want to do a PhD, those who want to graduate, those who had economics in 12th, they study scripture.

[12:52] हमारी कॉम्पिटिटिव एग्जाम में शास्त्र से कम व्यवस्थाओं से सवाल ज्यादा आते हैं।
  In our competitive exams, questions come more from fewer systems than from scriptures.

[12:58] वे जानना चाहते हैं कि दुनिया भर में यह व्यवस्थाएं कैसे काम कर रही है।
  They want to know how these systems are working around the world.

[13:00] दुनिया की व्यवस्थाओं में अंतर क्या आ जाता है?
  What differences arise in the world's systems?

[13:03] भारतीय व्यवस्था में कौन से यूनिक कैरेक्टर हैं जो बाकी की व्यवस्थाओं में नहीं होते हैं?
  What are the unique characteristics in the Indian system that are not present in other systems?

[13:10] तो अर्थशास्त्र जिसको इकोनॉमिक्स कहते हैं ये हमारे सिलेबस में नहीं है।
  So, economics, which is called economics, is not in our syllabus.

[13:16] पर थोड़ा बेसिक तो जानना पड़ेगा ताकि इसको श्रद्धांजलि देते हुए व्यवस्थाओं की ओर हम आगे बढ़ पाए।
  But we will have to know a little basic so that by paying homage to it, we can move forward towards systems.

[13:24] अर्थशास्त्र अर्थ का मतलब धन संसाधन जिसकी कोई कीमत होगी।
  Economics: 'Artha' means wealth, resources, which will have some value.

[13:28] शास्त्र का मतलब अध्ययन करना।
  'Shastra' means to study.

[13:31] यह बना हुआ शब्द है ग्रीक ओई ओइकोमिया से ओइकोस का मतलब होता है घरेलू डोमेस्टिक और नोमास का मतलब होता है मैनेजमेंट तो घर का मैनेजमेंट करना ही इस विषय का एक प्रकार से निर्माण कहलाता था अर्थशास्त्र
  This word is derived from the Greek 'Oikonomia', where 'Oikos' means domestic and 'Nomos' means management, so managing the household was, in a way, called the creation of this subject, economics.

[13:45] दो शब्दों से मिलकर बना है अर्थ और शास्त्र अर्थ से तात्पर्य धन जबकि शास्त्र का मतलब होता है अध्ययन करना
  It is made up of two words: 'Artha' and 'Shastra'. 'Artha' refers to wealth, while 'Shastra' means to study.

[13:53] स्टडी करना अर्थशास्त्र सोशल साइंस का
  Studying economics is part of social science.

[13:57] वस्तु और सेवाओं के उत्पादन वितरण उपभोग
  The production, distribution, and consumption of goods and services.

[14:00] मतलब प्रोडक्शन, डिस्ट्रीब्यूशन और कंजमशन
  Meaning production, distribution, and consumption.

[14:03] ऑफ गुड्स और सर्विसेज के बारे में स्टडी होती है।
  The study is about goods and services.

[14:05] एडम स्मिथ जैसे महोदय कहते हैं
  Gentlemen like Adam Smith say

[14:08] कि अर्थशास्त्र को धन का विज्ञान कहा जाता है।
  That economics is called the science of wealth.

[14:10] अर्थात किसी देश की अर्थव्यवस्थाएं
  That is, the economies of a country

[14:13] वस्तु और सेवाओं के माध्यम से उत्पन्न धन पर निर्भर करती है।
  Depend on the wealth generated through goods and services.

[14:16] इसमें वस्तु और सेवाओं का निर्यात, आयात सब शामिल है।
  This includes the export and import of goods and services.

[14:18] उपभोग उत्पादन भी इंक्लूड किया जाता है।
  Consumption and production are also included.

[14:21] तो ज्यादा मतलब दिमाग नहीं लगाना।
  So, don't overthink it.

[14:24] सिंपल सी बात है।
  It's a simple matter.

[14:27] अर्थशास्त्र वास्तविक रूप में संसाधन धन के अध्ययन का विषय है।
  Economics is, in reality, the study of resource wealth.

[14:29] इसके अलावा इसमें थ्योरी सिद्धांत कारण प्रभाव सब चीजों को जाना जाता है।
  Besides this, theories, principles, cause and effect, all these things are known.

[14:33] दो प्रकार की शाखाएं होती है।
  There are two types of branches.

[14:36] माइक्रो और मैकोनॉमिक्स अर्थशास्त्र की।
  Micro and macroeconomics of economics.

[14:39] माइक्रो का मतलब हम सूक्ष्म स्तर पर अध्ययन करते हैं।
  Micro means we study at a micro level.

[14:42] जैसे किसी कंपनी का, किसी व्यक्ति का, किसी घर का
  Like that of a company, an individual, a household.

[14:45] कि वहां पर घर के लोग किस तरीके के काम में लिप्त हैं?
  What kind of work are the people in the household engaged in?

[14:47] कंपनी किस तरीके का
  What kind of company

[14:55] प्रोडक्शन कर रही है?
  What production is being done?

[14:58] कौन सी सर्विज दे रही है?
  What services are being provided?

[15:01] कंपनी के खर्चे क्या-क्या हैं?
  What are the company's expenses?

[15:03] कंपनी अपने आपको बिना प्रॉफिट में कैसे ला सकती है?
  How can a company bring itself into a no-profit situation?

[15:06] घर वाले अपनी सेविंग कैसे बढ़ा सकते हैं?
  How can households increase their savings?

[15:08] ये सारे विषय माइक्रो के होते हैं।
  All these topics are related to microeconomics.

[15:11] लेकिन जब हम किसी राज्य के लिए, किसी शहर के लिए, किसी देश के लिए पूरे के पूरे सिस्टम को अप्लाई करने की कोशिश करते हैं और कोशिश करते हैं कि समझ सके कि यहां पर पूरे देश में लोग क्या उत्पादन कर रहे हैं?
  But when we try to apply the entire system to a state, a city, a country, and try to understand what people are producing in the entire country?

[15:20] किस चीज का ज्यादा उत्पादन है?
  What is produced more?

[15:23] कौन सा कंजमशन ज्यादा है?
  What consumption is higher?

[15:25] यहां पर पैसे क्यों ज्यादा लग जा रहे हैं?
  Why is more money being spent here?

[15:28] यहां पैसे क्यों कम लग रहे हैं?
  Why is less money being spent here?

[15:30] तो हम उसे मैकोनॉमिक्स के अंतर्गत रखते हैं।
  Then we place it under macroeconomics.

[15:35] माइक्रोइकोनॉमिक्स के फादर कहलाते हैं अल्फ्रेड मार्शल और मैकोनॉमिक्स के फादर कहलाते हैं जॉन मेनार्ड किंस।
  Alfred Marshall is called the father of microeconomics, and John Maynard Keynes is called the father of macroeconomics.

[15:44] ये पहले तो हमें पता होना चाहिए क्योंकि ऑब्जेक्टिव सवाल का मटेरियल है।
  First, we should know this because it is material for objective questions.

[15:49] व्यक्तिगत आर्थिक इकाइयों का व्यवहार और निर्णयों का अध्ययन कि भ पर्सनल किसी की प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है, किसी का फर्म है या किसी का
  The study of the behavior and decisions of individual economic units, whether it is someone's private limited company, a firm, or someone's

[15:56] परिवार है तो उससे जुड़ा हुआ पूरा स्टडी
  If there is a family, then the entire study related to it.

[15:59] कंप्लीट इकोस कंप्लीट इकोनॉमी की स्टडी जब हम करते हैं उसके अंदर क्या वेरिएबल है उसकी स्टडी करते हैं।
  When we do a complete study of the economy, we study what variables are within it.

[16:08] यह छोटे लेवल पर होता है।
  This happens at a small level.

[16:08] यह बड़े लेवल पर होता है।
  This happens at a large level.

[16:10] इसमें कंजमशन कंज्यूमर परिवार उत्पादक फर्म उद्योग आते उसमें नेशनल इनकम एंप्लॉयमेंट इनफ्लेशन बचतें देश की बचतें या फिर हम कहते हैं विनियोग इन सभी प्रकार के विषय पर चर्चाएं की जाती है।
  In this, consumption, consumers, families, producing firms, and industries are included. National income, employment, inflation, savings, country's savings, or what we call investment - discussions are held on all these types of topics.

[16:24] यहां पर बहुत लिमिटेड चीजों पर डिस्कशन होता है।
  Here, discussions happen on very limited things.

[16:26] वहां काफी डिटेल में हम बातचीत करते हैं।
  There, we talk in quite a lot of detail.

[16:28] इसका मकसद होता है कि संसाधनों को बेटर से बेटर कैसे यूज़ करें।
  Its purpose is how to use resources in the best possible way.

[16:33] इसका मकसद होता है कि देश के अंदर रोजगार कैसे बढ़ाएं, ग्रोथ कैसे करें? स्टेबिलिटी कैसे लाएं?
  Its purpose is how to increase employment within the country, how to grow? How to bring stability?

[16:41] इसका मेन मकसद होता है कि कंपनी के प्रोडक्ट की मांग और सप्लाई को कैसे बेटर करें?
  Its main purpose is how to improve the demand and supply of a company's product?

[16:46] इसका मेन मकसद होता है नेशनल इनकम।
  Its main purpose is national income.

[16:49] जनरल लेवल जो प्राइस लेवल होता है उन पर कैसे काम करें?
  How to work on the general price level?

[16:51] व्यक्तिगत वस्तु और सेवाओं की कीमत, सामान्य मूल्य स्तर, किसी वस्तु की मांग और पूर्ति का अध्ययन देश की वृद्धि दर और
  The price of individual goods and services, the general price level, the study of demand and supply of any commodity, the country's growth rate and

[16:59] मुद्रास्फीति का अध्ययन हम इसमें करते हैं।
  We study inflation in this.

[17:08] पर हम जिसको पढ़ने जा रहे हैं वह है अर्थव्यवस्था।
  But what we are going to study is the economy.

[17:10] अर्थव्यवस्था वो संरचना है जिसके अंतर्गत सभी आर्थिक गतिविधियों का संचालन होता है।
  The economy is the structure under which all economic activities are conducted.

[17:15] उत्पादन, उपभोग व निवेश अर्थव्यवस्था की बेसिक गतिविधियां हैं।
  Production, consumption, and investment are the basic activities of the economy.

[17:21] पॉल सेमुलसन कहते हैं कि अर्थव्यवस्था एक समाज या देश में संसाधनों के उत्पादन, वितरण और उपभोग करने की प्रोसेस है।
  Paul Samuelson says that the economy is the process of producing, distributing, and consuming resources in a society or country.

[17:29] जिसमें लोग और सरकार मिलकर आर्थिक गतिविधियां करते हैं।
  In which people and the government together carry out economic activities.

[17:31] उत्पादन, खपत या डिस्ट्रीब्यूशन ताकि सीमित रिसोर्स का अधिकतम उपयोग किया जा सके।
  Production, consumption, or distribution so that limited resources can be utilized to the maximum.

[17:38] मानवीय आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके।
  Human needs can be met.

[17:40] आधुनिक अर्थशास्त्र जो है मॉडर्न इकोनॉमिक्स जो है वैसे उनके फादर कहलाते हैं एडम स्मिथ।
  The father of modern economics is Adam Smith.

[17:49] 1776 में इन्होंने एक पुस्तक लिखी थी वेल्थ ऑफ नेशन जिसमें उन्होंने कहा था कि धन के विज्ञान के रूप में डिफाइन किया था।
  In 1776, he wrote a book, 'The Wealth of Nations', in which he defined it as the science of wealth.

[17:57] भारतीय अर्थव्यवस्था के जनक कौटिल्य
  The father of the Indian economy is Kautilya.

[17:59] कहलाते हैं।
  They are called.

[18:02] क्योंकि उन्होंने अर्थशास्त्र जैसी किताब लिखी थी।
  Because he wrote a book like Economics.

[18:04] लेकिन याद रखना कौटिल्य की जो किताब अर्थशास्त्र है उसमें केवल अर्थ के बारे में बातचीत नहीं है
  But remember, Kautilya's book, Economics, is not just about economics.

[18:09] बल्कि कौटिल्य ने अपनी इस किताब में राजनीति का भी वर्णन किया हुआ है।
  Rather, Kautilya has also described politics in this book of his.

[18:15] सामाजिक वर्णन भी किया हुआ है।
  Social descriptions have also been done.

[18:17] नैतिकता के भी ज्ञान दिए हुए हैं।
  Knowledge of ethics has also been given.

[18:20] भले ही उनकी किताब का नाम अर्थशास्त्र है लेकिन उसमें केवल अर्थशास्त्र की बातचीत नहीं है।
  Even though his book is named Economics, it is not just about economics.

[18:24] लगभग सभी प्रकार के विषयों का वर्णन किया गया है।
  Almost all types of subjects have been described.

[18:27] तो अर्थशास्त्र वस्तु और सेवाओं के उत्पादन वितरण विनिमय और उपभोग का अध्ययन
  So, economics is the study of the production, distribution, exchange, and consumption of goods and services.

[18:33] वह एक स्ट्रक्चर है।
  It is a structure.

[18:35] एक सिस्टम है।
  It is a system.

[18:37] एक सिस्टम है जिसके अंतर्गत सभी प्रकार की आर्थिक गतिविधियां होती है।
  It is a system under which all types of economic activities take place.

[18:40] वास्तविक रूप में इन्हीं विषयों का प्रैक्टिकल उपयोग हम अर्थव्यवस्था के रूप में जानते हैं।
  In reality, we know the practical application of these subjects as the economy.

[18:45] तो हमें अपनी अर्थव्यवस्था को पढ़ना है।
  So, we have to study our economy.

[18:48] दुनिया में जो सिस्टम होते हैं वो कई प्रकार के होते हैं।
  The systems in the world are of many types.

[18:50] जैसे मैं आपको बताऊं आप अगर किसी बड़े मॉल में जाएंगे तो बड़े मॉल में भी दो तरीके के सिस्टम काम करते हैं।
  For example, if you go to a big mall, two types of systems work in a big mall as well.

[18:57] एक ऐसी लग्जरी गुड्स जिसकी कीमतें
  One is luxury goods whose prices

[19:00] बहुत ज्यादा होती है और एक ऐसी प्राइस वाली चीजें जिसकी कीमतें ठीक-ठाक होती है जो आम नागरिक आसानी से खरीद सकता है।
  is very high and things with a price that are reasonably priced which the common citizen can easily afford.

[19:08] तो वो क्या करते हैं कि अपने मॉल में दो सेक्शन बना देते हैं।
  So what they do is they create two sections in their mall.

[19:13] एक सेक्शन होता है जहां पर महंगी चीजें मिल जाएगी और एक सेक्शन होता है जहां सस्ती चीजें मिल जाती है तो उसको वो इकोनॉमी सेक्शन कहते हैं कि एक ऐसी व्यवस्था जो आम लोगों तक पहुंचाई जा सके।
  One section is where expensive things are available and one section is where cheap things are available, so they call it the economy section, meaning a system that can be made accessible to common people.

[19:22] जैसे फ्लाइट का टिकट अगर आप बुक करेंगे तो फ्लाइट के टिकट में बिजनेस क्लास होता है।
  For example, if you book a flight ticket, there is a business class in the flight ticket.

[19:27] इकोनॉमिक क्लास होता है।
  There is an economic class.

[19:29] इकोनॉमिक क्लास का मतलब उसकी कीमत कम रहती है।
  Economic class means its price is less.

[19:32] बिजनेस क्लास का मतलब उस टिकट की जो कीमत रहेगी वो ज्यादा रहेगी।
  Business class means the price of that ticket will be higher.

[19:37] तो व्यवस्थाएं जो बनाई जाती है वह कहीं ना कहीं अर्थव्यवस्था से जुड़ी हुई मानी जाती है।
  So the systems that are created are considered to be related to the economy in some way.

[19:42] हमारे दुनिया में ऐसी व्यवस्थाओं को कई आधारों पर बांटा गया है।
  In our world, such systems are divided on many bases.

[19:45] व्यवस्था को पढ़ रहे हैं हम लोग।
  We are studying systems.

[19:47] व्यवस्था का मतलब जैसे मैं आपको बताऊं कि हमारा परिवार हमारा परिवार भी एक सिस्टम है जो बाकी परिवार से थोड़ा सा अलग होगा।
  System means, for example, if I tell you, our family, our family is also a system that will be slightly different from other families.

[19:54] पर जब हम बात करते हैं पूरे समाजशास्त्र की जिसमें परिवार जैसे विषय के सिद्धांत कि भाई ये
  But when we talk about sociology as a whole, in which the principles of subjects like family, that brother, this

[20:03] परिवार कैसे बनते हैं?
  How are families formed?

[20:06] परिवार पहली बार कब बने होंगे?
  When might families have been formed for the first time?

[20:09] परिवारों में कैसे स्टेबिलिटी लाई जा सकती है?
  How can stability be brought into families?

[20:11] तो ये विषय हो गया।
  So this topic is covered.

[20:13] लेकिन हम अपने परिवार को जानना चाहते हैं कि परिवार में किसकी क्या जिम्मेदारी है?
  But we want to know our family, what responsibilities each person has in the family?

[20:15] तो ये हो गई व्यवस्था का अध्ययन करना।
  So this is the study of systems.

[20:18] हम व्यवस्थाओं का अध्ययन कर रहे हैं।
  We are studying systems.

[20:20] हम सिस्टम का अध्ययन कर रहे हैं।
  We are studying systems.

[20:22] हमारे लिए अब यहां परिवार का मतलब रहेगा पूरा भारत।
  For us, family here will now mean all of India.

[20:25] हम देखना चाहते हैं कि भारत के कौन से हिस्से में इंडस्ट्री होती है।
  We want to see in which parts of India there is industry.

[20:27] कौन से हिस्से में एग्रीकल्चर होता है।
  In which parts is there agriculture.

[20:29] क्यों लोग एग्रीकल्चर में ज्यादा लिप्त होते हैं?
  Why are people more involved in agriculture?

[20:32] क्यों हमारे देश में इकोनॉमिकल सेक्टर ज्यादा बढ़ रहा है?
  Why is the economic sector growing more in our country?

[20:36] हम इसे जानना चाहेंगे कि हमारे देश के प्रधानमंत्री ने लोगों से अपील क्यों की होगी?
  We would like to know why our country's Prime Minister might have appealed to the people?

[20:41] इन सभी व्यवस्थाओं के पहलुओं को समझना ही अर्थव्यवस्था का मुख्य उद्देश्य होता है।
  Understanding the aspects of all these systems is the main objective of the economy.

[20:47] तो व्यवस्थाओं का वर्गीकरण बड़ा इंपॉर्टेंट है।
  So the classification of systems is very important.

[20:51] हम सबसे पहले बात करते हैं रिलेशंस के आधार पर कि क्या वो व्यवस्थाएं बाकियों के साथ जुड़ी है या नहीं।
  First, we talk about the basis of relations, whether those systems are connected with others or not.

[20:57] जैसे केमिस्ट्री में सिस्टम
  Like systems in chemistry

[21:03] होते हैं। सिस्टम अगर आपको याद होगा तो

[21:06] केमिस्ट्री में सिस्टम होता है बंद तंत्र

[21:08] होता है। केमिस्ट्री में खुला तंत्र होता

[21:11] है। अगर आपको याद हो। केमिस्ट्री में

[21:13] विलगित तंत्र होता है। आइसोलेटेड सिस्टम

[21:16] होता है। क्लोज तंत्र हम इसे कहते हैं

[21:19] जहां पर एनर्जी का तो लेनदेन हो सकता है

[21:22] लेकिन मास का लेनदेन नहीं होता। खुला

[21:25] तंत्र जिसमें एनर्जी और मास दोनों का

[21:27] लेनदेन होता है और आइसोलेटेड सिस्टम

[21:30] जिसमें एनर्जी और मास दोनों का लेनदेन

[21:32] नहीं होता। जैसे कि थर्मस फ्लास्क हमने

[21:34] इसमें केमिस्ट्री में ऐसा पढ़ा था। ऐसा

[21:37] इकोनॉमी के साथ भी होता है कि क्या किसी

[21:40] देश की इकोनॉमी दुनिया के साथ पूरी तरह से

[21:43] ना सही लेकिन जुड़ी हुई है या नहीं है?

[21:45] क्या वहां से माल आता और जाता है या नहीं

[21:48] है? क्या इस प्रकार की इकोनॉमी जहां पर भी

[21:51] हम आसानी से इस वस्तु और सेवाओं का

[21:53] एक्सपोर्ट और इंपोर्ट कर सकते हैं। हम उसे

[21:56] कहते हैं कि वह एक ओपन इकोनॉमी है। लेकिन

[21:59] अगर वहां पर बंद अर्थव्यवस्था का मतलब

[22:02] होगा कि आयात और निर्यात लगभग नहीं के

[22:05] बराबर होता है। जैसे दुनिया में कुछ ऐसे

[22:08] देश हैं जिनके साथ आयात निर्यात बहुत

[22:10] मुश्किल होता है। जैसे नॉर्थ कोरिया की

[22:12] बातचीत कर लेते हैं। तो ऐसी अर्थव्यवस्था

[22:15] को बंद अर्थव्यवस्था कहते हैं। यह

[22:18] धीरे-धीरे हो सकता है कि गरीबी के दुचक्र

[22:20] में फंस जाए, क्योंकि इनके पास नवीन

[22:23] प्रकार के रिसोर्स नहीं होते हैं। नवीन

[22:25] प्रकार की टेक्नोलॉजी नहीं आ पाती है। देश

[22:27] के भीतर जितना चल रहा है उसी में जीवन

[22:29] यापन करना होता है। तो ऐसी अर्थव्यवस्था

[22:32] जो दुनिया भर के साथ कनेक्ट होती है ओपन

[22:35] कहलाती है जो दुनिया भर के साथ कनेक्ट

[22:37] नहीं होती है। वैसे एक और चीज कही जाती

[22:40] है। यदि जाने और आने वाली चीजें बिल्कुल

[22:43] बराबरी में होती है। कोई लेनदेन मतलब ऐसा

[22:45] नहीं लग रहा है कि किसी का प्लस या माइनस

[22:47] हुआ तो भी कई बार सैद्धांतिक रूप से उसे

[22:50] क्लोज इकोनॉमिक कह दिया जाता है। फिर

[22:52] संसाधनों के स्वामित्व के आधार पर बेस्ड

[22:56] ऑन द ओनरशिप ऑफ रिसोर्सेज यदि किसी

[22:58] अर्थव्यवस्था में जितने भी संसाधन है जैसे

[23:01] देश के अंदर कोयला है, हम कह सकते हैं कि

[23:04] मेटल्स है, देश के अंदर कई प्रकार के पानी

[23:08] के रिसोर्स है, रेलवे हैं, परिवहन है,

[23:10] स्कूल है, कॉलेज है, अस्पताल है। इन सभी

[23:13] पर केवल और केवल प्राइवेट लोगों का

[23:16] नियंत्रण है। सरकार ने ऐसी कोई व्यवस्था

[23:18] ना की हो तो हम उसे कहते हैं कि वह

[23:20] पूंजीवादी अर्थव्यवस्था है। पूंजीवादी

[23:23] अर्थव्यवस्था में सरकार क्या करती है कि

[23:25] जनता से कहती है कि तुम हर चीज का उत्पादन

[23:28] करो। साबुन का उत्पादन, गेहूं का उत्पादन,

[23:31] चावल का उत्पादन, चिप्स का उत्पादन,

[23:34] दुकानें खोलो, व्यापार करो। सब कुछ बस वो

[23:37] तय करती है नियमों को। इसके अलावा उसका

[23:39] कोई काम नहीं होता है। ऐसी अर्थव्यवस्था

[23:42] को कैपिटलिस्टिक इकोनॉमी कहते हैं। इस

[23:44] अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा बेनिफिट है कि

[23:46] इस अर्थव्यवस्था में नए-नए इनोवेशन के लिए

[23:49] जगह बहुत अच्छी मिल जाती है। इस

[23:51] अर्थव्यवस्था में बेनिफिट जो कमाता है वो

[23:54] तेजी से आगे बढ़ जाता है। लेकिन इस

[23:56] अर्थव्यवस्था का एक ड्रॉबैक ये है कि कुछ

[23:58] अभागे लोग होते हैं। कुछ ऐसे लोग होते हैं

[24:01] जो कि बेटर तरीके का प्रोडक्शन नहीं कर

[24:04] सकते क्योंकि उनके अंदर वो आर्थिक गुण

[24:06] नहीं होते हैं। तो इसमें वो पिछड़ जाते,

[24:09] गरीब हो जाते हैं और ऐसी व्यवस्था में

[24:11] उनके लिए जीवन यापन कठिन हो जाता है।

[24:14] दूसरी होती है सोशलिस्ट इकोनॉमी समाजवादी

[24:17] अर्थव्यवस्था जिसमें सरकार कहती है कि

[24:19] सारा का सारा कब्जा मेरा रहेगा। मैं ही

[24:22] साबुन बनाऊंगा। मैं ही सब बिस्किट

[24:25] बनाऊंगा। मैं ही स्कूल डालूंगा। मैं ही

[24:27] अस्पताल डालूंगा। मेरी ही सारी रेलवे लाइन

[24:30] होगी। मेरी ही सारी बसें होगी। अह

[24:33] एयरपोर्ट भी और उसके अंदर उड़ने वाले हवाई

[24:36] जहाज भी सब सरकार के होंगे। खेती भी सरकार

[24:39] ही करेगी। बस हम सब लोग सरकार के पास

[24:42] मजदूरी करेंगे और उसके एवज में सरकार हमें

[24:45] सैलरी नहीं देगी बल्कि हमारी जरूरतों को

[24:47] पूरा करेगी। इस अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा

[24:50] बेनिफिट होता है कि जनरली कोई अमीर गरीब

[24:52] नहीं होता क्योंकि सबके पास संसाधन लगभग

[24:54] बराबरी में होते हैं। इस प्रकार की

[24:57] अर्थव्यवस्था का एक बड़ा बेनिफिट ये भी

[24:59] होता है कि इस अर्थव्यवस्था में संसाधनों

[25:02] का मिनिमम से मिनिमम होने पर भी मैक्सिमम

[25:05] रिजल्ट लाया जा सकता है। लेकिन इसका

[25:07] ड्रॉबैक होता है कि किसी के अंदर कोई

[25:09] मोटिवेशन और इनोवेशन नहीं होता है।

[25:11] क्योंकि व्यक्ति सोचता है कि इनोवेशन करके

[25:13] भी फायदा क्या होगा? क्योंकि सरकार का

[25:15] नियंत्रण रहेगा तो कोई ज्यादा इनोवेशन

[25:18] नहीं करता है। कोई ज्यादा मोटिवेट नहीं

[25:20] रहता है। सब लोग अपनी क्षमता के अनुसार ही

[25:23] बस जितना कर सकते हैं उतना योगदान देते

[25:25] हैं। पर तीसरे प्रकार की होती है मिक्स्ड

[25:28] इकोनॉमी जहां पर सरकार कहती है कि मैं भी

[25:30] कुछ उत्पादन करूंगी तुम भी करो। जैसे

[25:33] सरकार के स्कूल भी होंगे और प्राइवेट

[25:34] स्कूल भी होंगे। सरकार के हॉस्पिटल भी

[25:36] होंगे, प्राइवेट हॉस्पिटल भी होंगे। सरकार

[25:39] की अपनी हवाई एयरलाइन भी हो सकती है और

[25:41] प्राइवेट एयरलाइन भी हो सकती है। सरकार का

[25:43] अपना कम्युनिकेशन के लिए BSNL जैसी सिम

[25:47] होगी तो प्राइवेट कंपनियां भी काम करेगी।

[25:50] जब दोनों मिलकर प्रोडक्शन का काम करते हैं

[25:52] तो हम ऐसे व्यवस्था को मिक्स्ड इकोनॉमी

[25:55] कहते हैं। इसमें लगभग ड्रॉबैक दोनों के जो

[25:58] होते हैं वो कम होने की कोशिश हो जाती है।

[26:00] इंडियन इकोनॉमी को एक प्रकार से मिक्स्ड

[26:03] इकोनॉमी कहते हैं। पर उसी में डेवलपमेंट

[26:06] के आधार पर भी इकोनॉमी का वर्गीकरण किया

[26:08] जाता है। कुछ व्यवस्थाएं विकसित मानी जाती

[26:11] है। डेवलप्ड मानी जाती है। किस आधार पर?

[26:14] यदि किसी व्यवस्था में एग्रीकल्चर का

[26:16] परसेंटेज पूरे के पूरी कमाई में सबसे कम

[26:19] हो तो इसका मतलब वो विकसित हो गए। कैसे

[26:22] विकसित मान लिए जाते हैं? क्योंकि हम सबसे

[26:24] पहले एग्रीकल्चर पर निर्भर थे। आज से लगभग

[26:27] 10,000 साल से लेकर तो पिछले कुछ 200 साल

[26:31] पहले तक हमारी दुनिया में हर व्यक्ति

[26:33] जितनी कमाई करते थे राजा महाराजा या जो भी

[26:36] व्यवस्था है सब एग्रीकल्चर से कमाई करते

[26:39] थे। फिर धीरे-धीरे इंडस्ट्री का

[26:41] रिवॉल्यूशन हुआ। औद्योगिक क्रांति हुई और

[26:44] कमाई के नए तरीके विकसित हुए। तो जिनके

[26:47] पास इंडस्ट्री आ गई हम मानते हैं कि वह

[26:49] डेवलप्ड हो गए। तो ऐसी अर्थव्यवस्थाएं

[26:52] जिनमें अब एग्रीकल्चर का रोल कम हो गया है

[26:54] वे मैन्युफैक्चरिंग पर ज्यादा काम करते

[26:56] हैं। सर्विस सेक्टर पर अच्छा काम करते

[26:58] उन्हें कहते हैं डेवलप्ड इकोनमी। जैसे कि

[27:00] अमेरिका हम कहेंगे कि कनाडा, ऑस्ट्रेलिया,

[27:04] जापान में यूरोप के कई सारे देश।

[27:08] विकासशील का मतलब कि ठीक है। अभी वहां पर

[27:12] एग्रीकल्चर का रोल ठीक-ठाक है। लेकिन

[27:14] धीरे-धीरे अब एग्रीकल्चर का योगदान कम और

[27:17] इंडस्ट्री का योगदान बढ़ रहा है। सर्विस

[27:19] सेक्टर का योगदान बढ़ रहा है। उनकी हर हर

[27:22] साल की कमाई में इंडस्ट्री का रोल

[27:25] धीरे-धीरे इंप्रूव होता चला जा रहा है। तो

[27:27] हम कहते हैं कि वो डेवलपिंग इकोनमी है। और

[27:29] अल्पविकसित का मतलब होता है कि आज भी वहां

[27:32] एग्रीकल्चर से ही सबसे ज्यादा कमाई की

[27:34] जाती है। तो हम उसे कहते हैं कि वो अंडर

[27:36] डेवलप्ड इकोनॉमी है। कहने का अभिप्राय ये

[27:39] है कि ओपन इकोनमी क्लोज इकोनॉमी ये जो

[27:43] वर्गीकरण है अलग-अलग आधारों पर व्यवस्थाओं

[27:46] का वर्गीकरण किया जाता है। ऐसी

[27:48] अर्थव्यवस्था जो अन्य देशों के साथ लगभग

[27:50] व्यापार नहीं करती है। क्लोज इकोनमी

[27:53] कहलाती है। जो व्यापार करती है बंद इकॉनमी

[27:55] कहलाती है। आयात निर्यात लगभग नहीं होता

[27:58] है। दोनों होते हैं। घरेलू संसाधन से सभी

[28:01] आवश्यकताएं पूरी होती है। वैश्विक व्यापार

[28:04] और आर्थिक विकास को बढ़ाने में मदद करते

[28:06] हैं। बाहरी अर्थव्यवस्था से बहुत कम

[28:08] रिलेशन होते हैं। अन्य देशों से काफी

[28:10] ज़्यादा रिलेशन होते हैं। किसी और देश में

[28:13] कोई घटना हुई तो इस पर भी असर पड़ता है।

[28:15] विदेशी पूंजी का प्रवेश और निकास लगभग

[28:18] नहीं होता क्योंकि कोई व्यवस्था जुड़ी हुई

[28:20] नहीं है। लेकिन यहां आना-जाना चलता रहता

[28:22] है। टेक्निकल प्रगति कम होती है। वहां

[28:25] टेक्नोलॉजिकल इनोवेशन ज्यादा होते हैं।

[28:27] आत्मनिर्भरता पर ज्यादा बल देते हैं।

[28:30] वैश्विक सहभागिता पर ज्यादा बल देते हैं।

[28:32] दुनिया भर में अधिकतर लोग आत्मनिर्भरता की

[28:35] बात कर रहे हैं। ऐसा नहीं कि हम ही बात कर

[28:36] रहे हैं। अमेरिका भारत का मेक इन इंडिया

[28:39] हो अमेरिका का मागा हो सब के सब लगे हुए

[28:41] आत्मनिर्भरता में जबकि आत्मनिर्भरता में

[28:44] समस्याएं बढ़ेगी। जरूरी है वैश्विक

[28:47] सहभागिता। कंपटीशन बहुत कम होता है।

[28:49] कंपटीशन बहुत ज्यादा होता है। पूर्ण बंद

[28:52] अर्थव्यवस्था का उदाहरण लगभग नहीं मिलता।

[28:54] लेकिन उत्तर कोरिया हो गए या कुछ ऐसे देश

[28:57] हो गए जो बाहरी देशों के साथ संपर्क नहीं

[28:59] रखते हैं कम रखते हैं उनको शामिल कर सकते

[29:02] हैं लेकिन आइडियली कोई भी नहीं है। भारत,

[29:04] अमेरिका, जापान सभी खुली अर्थव्यवस्थाओं

[29:06] के रूप में इंक्लूड किए जाते हैं। तो

[29:09] वास्तविक रूप में खुली और बंद

[29:11] अर्थव्यवस्थाएं अर्थव्यवस्थाओं का एक ऐसा

[29:14] टाइप है जो इंटरनेशनल रिलेशन के आधार पर

[29:17] डिसाइड होता है।

[29:20] फिर तीन प्रकार की अर्थव्यवस्थाएं होती

[29:22] है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था जिसको

[29:24] अनकंट्रोल या बाजार अर्थव्यवस्था भी कहते

[29:28] हैं क्योंकि सब कुछ बाजार पर छोड़ दिया

[29:30] जाता है। बाजार का मतलब सभी प्रकार का

[29:32] बाजार। कौन सी वस्तु का उत्पादन होगा? तो

[29:35] बाजार में जिस वस्तु की मांग होगी। जैसे

[29:37] हमारे देश में इमेजिन करिए कि लोग अब

[29:40] पिज़्ज़ा ज्यादा खाने लग गए हैं। तो पिज़्ज़ा

[29:43] की मांग बढ़ गई है तो लोग अब पिज़्ज़ा की

[29:45] दुकानें ज्यादा खोल रहे हैं। और लोग जो

[29:47] लोकल फूड होता था उसकी मांग कम हो गई है।

[29:49] तो धीरे-धीरे उसका उत्पादन कम हो रहा है।

[29:52] तो बाजार तय करेगा। डिमांड और सप्लाई की

[29:55] जो शक्तियां हैं वो डिसाइड करेगी कि बाजार

[29:57] में किस तरीके की मांग है। जैसे बाजार में

[30:00] अगर हम कह सकते हैं कि ऑनलाइन क्लास की

[30:04] डिमांड है तो ऑनलाइन क्लास के ऐप आ

[30:06] जाएंगे। ऑफलाइन क्लास की डिमांड है तो लोग

[30:08] ऑफलाइन क्लासेस लेने लग जाएंगे। बाजार

[30:10] क्या कह रहा है उसके अकॉर्डिंग होता है।

[30:12] अनकंट्रोल इसलिए कहते हैं क्योंकि सरकार

[30:14] इसमें हस्तक्षेप नहीं करती है। सबसे

[30:17] मिनिमम सरकार का हस्तक्षेप होता है इसलिए

[30:19] अनकंट्रोल कहते हैं। सरकार कहती है कि

[30:22] देखो भाई कोई चीज की कीमत मान लो बाजार

[30:24] में टमाटर ₹1 लाख किलो हो जाए तो यहां पर

[30:27] सरकार तब भी इंटरफेयर नहीं करेगी। क्यों?

[30:29] क्योंकि सरकार कहेगी टमाटर अगर ₹1 लाख

[30:31] किलो हो गया तो लोग खरीदेंगे नहीं।

[30:34] खरीदेंगे नहीं तो धीरे-धीरे जो टमाटर

[30:36] प्रोडक्शन वाले हैं वो अपनी कम कीमतों को

[30:38] कम करने के लिए मजबूर हो जाएंगे। बाजार

[30:41] अपने आप कीमतों को कम कर लेगा। यदि किसी

[30:44] चीज की कीमत बहुत कम हो गई है तो फिर उसका

[30:46] प्रोडक्शन कुछ समय के बाद बंद हो जाएगा तो

[30:48] अपने आप उसका सप्लाई कम होगा। सप्लाई कम

[30:50] होगा तो कीमतें बढ़ जाएगी। सरकार कहती है

[30:53] कि सब कुछ बाजार करेगा। मुझे कुछ करने की

[30:56] जरूरत नहीं है।

[30:58] बाजार की शक्तियों के द्वारा संचालित है

[31:01] डिमांड और सप्लाई के रूप में समाजवादी

[31:03] अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से कंट्रोल या

[31:05] प्लानिंग इकोनमी कहते हैं। क्योंकि सरकार

[31:07] सभी चीजों पर अपना कब्जा कर लेती है और एक

[31:10] प्लान बनाती है 5 साल का 10 साल का जिसके

[31:13] तहत देश के विकास के लिए कदम उठाती है।

[31:16] सरकार का इस पर बहुत ज्यादा कंट्रोल होता

[31:18] है। सरकार के द्वारा पूरी तरह से इकोनॉमी

[31:21] संचालित होती है। मिश्रित अर्थव्यवस्था का

[31:24] मतलब दोनों के कैरेक्टर रहेंगे। सरकार

[31:26] बाजार दोनों का रोल रहेगा। जहां पर बाजार

[31:29] नहीं पहुंच पाएगा। जैसे पहाड़ी एरियाज में

[31:31] गांव में स्कूल कोई खोलना नहीं चाहता है

[31:33] तो सरकार स्कूल खोलेगी। अस्पताल कोई नहीं

[31:36] खोलना चाहता है तो सरकार अस्पताल खोलेगी।

[31:38] गरीबों तक सुविधाएं नहीं पहुंचाना चाहता

[31:40] है तो सरकार सुविधाएं पहुंचाएगी। बाजार और

[31:43] सरकारी नीतियों के आधार पर मतलब दोनों की

[31:45] पॉलिसियां रहेगी। अगर हम बातचीत करें तो

[31:48] बाजार की भूमिका पूंजीवादी अर्थव्यवस्था

[31:50] में कैपिटलिस्टिक इकोनॉमी में सबसे ज्यादा

[31:53] होती है। समाजवाद में बाजार कुछ नहीं करता

[31:55] है। सब सरकार का मूड हुआ तो सारे किसान

[31:58] टमाटर बोएंगे भले ही टमाटर की मांग हो या

[32:00] ना हो। सरकार का मन है तो सभी लोग दालें

[32:02] बोएंगे भले ही दालों की मांग हो या ना हो।

[32:05] बाजार समाजवादी इकोनॉमी में होता है। यहां

[32:07] पर दोनों लोग होते हैं। सरकार भी कुछ

[32:10] प्रोडक्शन करती है और कुछ मेनली रेगुलेशन

[32:12] पर काम करती है। सरकार का काम होता है

[32:14] रेगुलेट भी करना कि कोई बदमाशी ना करे।

[32:17] जैसे क्रिकेट में अंपायर होते हैं वैसे ही

[32:19] बाजार इकोनमी में सरकार एंपायर का काम

[32:22] करती है कि भ कोई भी गलत ना करे। लेकिन

[32:24] साथ ही साथ वह खेल भी रही होती है। मेनली

[32:27] कैपिटलिस्टिक इकोनॉमी का मकसद होता है

[32:29] कैसे प्रॉफिट कमाए। सोशलिस्ट इकोनॉमी का

[32:32] मतलब होता है लोगों की जिंदगी कैसे करें

[32:34] और मिश्रित का दोनों लक्ष्य रहेगा।

[32:36] सामाजिक कल्याण यहां पर कम होता है। यहां

[32:39] सबसे बड़ी प्रायोरिटी होती है। यहां पर

[32:40] कोशिश की जाती है कि बेस्ट से बेस्ट

[32:42] रिजल्ट आने चाहिए। यहां पर कंपटीशन बहुत

[32:45] ज्यादा होता है। यहां कंपटीशन इसलिए नहीं

[32:47] होता है क्योंकि अकेली सरकार ही होती है।

[32:49] सरकार के साथ कोई कंपट करने वाला होता ही

[32:51] नहीं। जैसे कि स्पेस टेक्नोलॉजी में एक

[32:53] जमाने में सरकार का इसरो रहता था। कोई

[32:56] कंपटीशन नहीं था। लेकिन अब प्राइवेट लोग

[32:58] आने लग गए हैं। तो समाजवादी अर्थव्यवस्था

[33:01] में जहां पर पूरी तरह से सरकार ही रहेगी।

[33:04] को मिश्रित में कंपटीशन कंट्रोल रहता है।

[33:06] निजी क्षेत्र की बहुत ज्यादा भूमिका होती

[33:09] है। यहां नहीं के बराबर यह बहुत

[33:10] महत्वपूर्ण माना जाता है। अगर हम बात करें

[33:13] तो सरकारी क्षेत्र यहां पर बहुत लिमिटेड

[33:15] होगा। यहां बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है या

[33:17] ठीक-ठाक होता है। प्रमुख विशेषताओं में

[33:19] आर्थिक इकोनमी आर्थिक लिबर्टी बहुत ज्यादा

[33:23] रहती है। कुछ भी खरीदो खुद भी खुद कुछ भी

[33:26] बेचो इसकी सभी व्यवस्थाएं रहती हैं। आप

[33:28] देखेंगे कि अमेरिका जैसी जगह पर आप कुछ भी

[33:31] खरीद और बिक्री कर सकते हैं। समाजवादी

[33:33] अर्थव्यवस्था में आर्थिक समानता पर ज्यादा

[33:35] जोर दिया जाता है। वैसे चीन को कहते थे

[33:38] लेकिन अब चीन भी नहीं रहा। चीन भी अब

[33:40] मिश्रित में बदलता चला जा रहा है। क्यूबा

[33:42] कुछ स्तर पर आज भी समाजवादी अर्थव्यवस्था

[33:45] के रूप में नॉर्थ कोरिया समाजवादी

[33:47] अर्थव्यवस्था के रूप में कह सकते हैं।

[33:49] मिश्रित अर्थव्यवस्था में भारत बेस्ट

[33:51] एग्जांपल है। वैसे अब दुनिया के अधिकतर

[33:53] देश इसी ओर में चले आ रहे हैं। सबसे पहले

[33:56] दुनिया में इस चीज का विकास हुआ। इसकी

[33:58] कमियों को ध्यान में रखते हुए कार्ल

[34:00] मार्क्स ने ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया।

[34:02] इसमें भी कमियां आ गई तो फिर हमने ऐसी

[34:04] व्यवस्था का निर्माण किया। वास्तविक रूप

[34:06] में सफल अर्थव्यवस्था मिश्रित

[34:08] अर्थव्यवस्थाओं के रूप में मानी जाती है।

[34:11] तो अपने स्तर पर कैपिटलिस्टिक इकोनॉमी,

[34:13] सोशलिस्टिक इकोनमी और मिक्स्ड इकोनॉमी में

[34:15] भी अंतर दिखता है। शब्दों पर ध्यान देना

[34:18] कि किसका रोल कहां पर ज्यादा रहेगा।

[34:22] फिर होता है डेवलप डेवलपिंग और अंडर डेवलप

[34:25] इकोनमी। औद्योगीकरण पहले ही हो चुका है।

[34:27] पहले का मतलब लगभग 18वीं सदी के अंत में

[34:31] इंडस्ट्रियल रिवॉल्यूशन शुरू हुआ और 19वीं

[34:33] सदी तक पूरा हो गया। 20वीं 21वीं सदी में

[34:35] अब औद्योगीकरण अपने चरम स्तर पर है। यहां

[34:38] पर अभी डेवलपमेंट शुरू हुआ है। यहां अभी

[34:40] भी डेवलपमेंट स्टार्ट नहीं हो पाया है।

[34:43] यहां प्राइमरी सेक्टर मतलब एग्रीकल्चर,

[34:45] फिशरीज, मत्स्य पालन, दूध पा पशुपालन इनका

[34:48] योगदान बहुत कम रहेगा। इनका योगदान बहुत

[34:51] ज्यादा रहता है। अल्प विकसित में लेकिन

[34:53] यहां धीरे-धीरे योगदान कम हो रहा होता है।

[34:56] द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्र का योगदान

[34:58] यहां सबसे ज्यादा रहेगा। यहां धीरे-धीरे

[35:00] बढ़ रहा है। वहां बहुत कम होता है।

[35:02] अवसरचना अगर देखें इंफ्रास्ट्रक्चर

[35:05] सड़कें, रेलवे के रेलवे पुल या रेलवे के

[35:08] प्लेटफार्म या फिर हम कह सकते हैं रेलवे

[35:10] स्टेशन, एयरपोर्ट सभी प्रकार के

[35:13] इंफ्रास्ट्रक्चर से एजुकेशन, हेल्थ सेक्टर

[35:16] काफी वेल डेवलप्ड होगा। अभी धीरे-धीरे

[35:18] यहां पर सब चीजें बन रही है। अभी वहां पर

[35:20] बहुत पिछड़ी हुई है। प्रति व्यक्ति आय पर

[35:23] कैपिटा इनकम बहुत ज्यादा रहेगी। सबसे कम

[35:26] रहेगी। बीच में रहेंगे। जीवन स्तर काफी

[35:28] हाई लेवल का होता है। काफी ज्यादा यह लोग

[35:31] पेट्रोल, डीजल, बिजली का उपयोग करते हैं।

[35:33] लाइफ बहुत सुकून वाली गुजारते हैं। यहां

[35:36] धीरे-धीरे लाइफ स्टैंडर्ड सुधर रहा होता

[35:38] है। वहां अभी भी लाइफ स्टैंडर्ड लो होता

[35:39] है। उद्योग और सर्विस सेक्टर की सबसे

[35:42] ज्यादा डोमिनेंस होता है। यहां संक्रमण सब

[35:44] ट्रांजिशन चल रहा है। धीरे-धीरे उद्योग

[35:46] बढ़ रहे हैं। धीरे-धीरे एग्रीकल्चर कम हो

[35:48] रहा है। वहां पर अभी भी कृषि प्रधान ही

[35:50] होता है। अमेरिका, कनाडा इसमें एग्जांपल

[35:53] में आएंगे। विकासशील में हम कहेंगे कि

[35:55] भारत रहेगा और अनेक अफ्रीकी देश अभी भी

[35:58] अल्पविकसित अवस्था में ही माने जाते हैं।

[36:01] तो यह होता है अर्थव्यवस्थाओं का वर्गीकरण

[36:04] विकास कितना हुआ उसके आधार पर। लेकिन

[36:06] वर्ल्ड बैंक ने अब व्यवस्थाओं में इस

[36:09] तरीके के वर्गीकरण को नकार दिया। क्यों?

[36:11] क्योंकि कुछ ऐसे देश आ गए हैं जिनको यह

[36:14] क्लियरली नहीं कहा जा सकता कि वह विकसित

[36:16] है कि विकासशील है। जैसे चीन अब किस

[36:19] कैटेगरी में रखें इसको तो ये थोड़ा

[36:21] मुश्किल हो जाता है। तो वर्ल्ड बैंक कहता

[36:23] है कि यह पुराना वर्गीकरण ठीक नहीं है।

[36:25] अर्थव्यवस्थाओं का नया वर्गीकरण है। हाई

[36:29] इनकम इकोनमी यदि किसी देश में पर कैपिटा

[36:33] इनकम पर कैपिटा इनकम 12535

[36:39] प्रतिवर्ष हो या उससे ज्यादा हो तो हम

[36:42] कहेंगे कि वह हाई इनकम इकोनॉमी के लोग

[36:45] हैं। मतलब अब चार श्रेणियां बनाई गई है।

[36:49] हाई इनकम इकोनमी वाले देश जैसे अमेरिका,

[36:52] यूरोप के देश, जापान, ऑस्ट्रेलिया

[36:56] अपर मीडियम इकोनमी जहां पर जीडी पर कैपिटा

[36:59] इनकम $46

[37:02] से लेकर $535

[37:05] होती है। इसको कहते हैं अपपर मीडियम

[37:07] इकोनमी। जिसमें चाइना, दक्षिण अफ्रीका,

[37:10] ब्राजील इस तरीके के देश आते हैं। रशिया

[37:13] आता है। निम्न मध्यम वाली इकोनमी लो

[37:16] मीडियम इकोनॉमी जिनमें पर कैपिटा इनकम

[37:19] 1436 से लेकर 445 आते हैं। इसमें भारत,

[37:24] पाकिस्तान, बांग्लादेश ऐसे देश आते हैं।

[37:27] और सबसे खराब है लो इनकम इकॉनमी जहां पर

[37:30] पर कैपिटा इनकम $136

[37:34] प्रतिवर्ष भी कम हो। मतलब एक साल में इतना

[37:37] डॉलर भी नहीं कमा पाते हैं। अफ्रीका के कई

[37:40] देश इसमें शामिल होते हैं। तो नया

[37:42] वर्गीकरण अर्थव्यवस्थाओं का ये भी है। हाई

[37:44] इनकम इकोनॉमी, अपर मीडियम इकोनॉमी, लो

[37:47] मीडियम इकोनॉमी और लो इनकम इकोनॉमी भारत

[37:50] इस वाली इकोनॉमी में आता है।

[37:54] 2019 में वर्ल्ड बैंक ने विकास के पैमाने

[37:56] में विकसित विकासशील दृश्य की श्रेणी

[37:58] समाप्त कर दी। की जगह पर चार श्रेणियां

[38:00] डाली है जिसको वो अपडेट करते रहते हैं

[38:03] जिसमें उसने इकोनॉमिकल और सोशल फैक्टर भी

[38:05] शामिल किए। अपनी सूची को अपडेट करने के

[38:07] लिए वर्ल्ड बैंक के द्वारा एटलस सिस्टम का

[38:09] उपयोग किया जाता है। एटलस सिस्टम का मतलब

[38:11] होता है कि विभिन्न देशों के ग्रॉस नेशनल

[38:14] इनकम को अमेरिकी डॉलर में पहले बदल देते

[38:17] हैं। जो भी देश कमाई कर रहा है उसको पहले

[38:19] डॉलर में कन्वर्ट किया जाता है। अमेरिकी

[38:22] डॉलर के साथ एक्सचेंज का 3 साल का एवरेज

[38:25] लिया जाता है कि 3 साल में $1 कितने रुपए

[38:28] का या उनकी करेंसी में कितने का रहा उसका

[38:31] एवरेज लिया जाता है और उस आधार पर

[38:33] वर्गीकरण करते हैं। अर्थव्यवस्था के

[38:36] क्षेत्र का वर्गीकरण। किसी भी

[38:38] अर्थव्यवस्था की जब हम बात करें ओपन

[38:40] इकोनमी हो, क्लोज इकोनॉमी हो,

[38:43] कैपिटलिस्टिक इकोनॉमी हो, सोशलिस्ट

[38:45] इकोनॉमी हो या फिर डेवलप्ड हो या अंडर

[38:48] डेवलप हो, सभी के अंतर्गत कुछ सेक्टर होते

[38:51] हैं। सेक्टर। ये सेक्टर काफी इंपॉर्टेंट

[38:53] होते हैं जो हमें बताता है कि ये सिस्टम

[38:55] किन चीजों से मिलकर बना है। जैसे कि

[38:58] परिवार के अंदर कमरे होते हैं। कमरों से

[39:01] मिलकर घर बनता है। हर कमरे का भी अपना एक

[39:04] स्पेशल यूज़ होता है। कमरे होते हैं भाई

[39:06] के बहन के। एक तो वर्गीकरण कमरों का यह

[39:09] होता है। फिर कमरों का वर्गीकरण एक होता

[39:12] है कि एक किचन बन जाता है। एक ड्रेसिंग

[39:15] रूम बन जाता है। एक डाइनिंग रूम बन जाता

[39:16] है। एक लिविंग रूम बन जाता है।

[39:20] ये कैसा उपयोग कर रहे उस आधार पर कमरों का

[39:22] वर्गीकरण करते हैं। तो इकोनॉमी में भी

[39:24] सेक्टर होते हैं। सेक्टर का भी कई आधारों

[39:27] पर वर्गीकरण होता है। जैसे एक्टिविटीज के

[39:30] आधार पर कि वहां पर किस तरीके के काम किए

[39:33] जा रहे हैं। फिर उसके बाद होता है कि

[39:35] इकोनॉमिकल एक्टिविटीज कैसी हो रही है?

[39:38] सरकार का कंट्रोल कितना है उस सेक्टर पर

[39:40] या वहां ऑर्गेनाइजेशन का लेवल कैसा है? उस

[39:43] आधार पर सेक्टरों का वर्गीकरण कर रहे हैं

[39:46] हम अर्थव्यवस्था के। अर्थव्यवस्था के

[39:48] सेक्टर का मतलब है कि हर अर्थव्यवस्था में

[39:50] कुछ विशेष प्रकार के क्षेत्र मिलते हैं जो

[39:53] अपने विशेष प्रकार की चीजों के लिए जाने

[39:56] जाते हैं। जैसे पहला होता है रियल सेक्टर।

[39:59] रियल सेक्टर का मतलब देखो जो रियल स्टेट

[40:02] रियल स्टेट वाली बातचीत है उसकी बात नहीं

[40:04] कर रहा हूं मैं। रियल सेक्टर मतलब

[40:05] वास्तविक रूप में वहां वस्तु और सेवाओं का

[40:08] उत्पादन होगा। जैसे किसान के द्वारा

[40:11] वास्तविक रूप में अनाज का उत्पादन होता

[40:13] है। मेरे द्वारा वास्तविक रूप में सेवाएं

[40:16] दी जा रही है। डॉक्टर के द्वारा सेवाएं दी

[40:18] जा रही हैं। किसी इंडस्ट्री में वास्तविक

[40:20] रूप में प्रोडक्शन हो रहा है। उसको बेचकर

[40:22] वो बेचारे कमाई कर रहे हैं। लेकिन एक

[40:25] सेक्टर ऐसा भी होता है जो मौद्रिक सेक्टर

[40:27] कहलाता है। जैसे शेयर मार्केट में। मुझे

[40:30] बताओ शेयर मार्केट में क्या उत्पादन हो

[40:32] रहा है किसी प्रकार का? बस एक चीज को

[40:35] सस्ते दाम पर खरीद कर महंगा बेचा जा रहा

[40:37] है और उससे कमाई की जा रही है। एक किसान

[40:40] ने पहले गेहूं का उत्पादन किया तब जाकर

[40:43] उसे कुछ लाभ हुआ। यहां पर कोई गेहूं का

[40:45] उत्पादन नहीं कर रहा है बल्कि केवल उसकी

[40:47] कीमतों में होने वाले परिवर्तन से कमाई कर

[40:50] दे रहा है। जैसे पूरा बैंकिंग सिस्टम

[40:53] सच-सच बताओ बैंकें क्या उत्पादन कर रही

[40:55] है? वो केवल और केवल पैसे को रखती है। कुछ

[40:59] समय के बाद पैसों को लौटाती है या किसी को

[41:02] पैसे उधार देती है। फिर उसके आधार पर वो

[41:04] उसका कुछ किराया वसूल करती है। बाकी वो

[41:07] कुछ भी नहीं कर रही है प्रोडक्शन के नाम

[41:09] पर। जो कई सारे ऐसे सेक्टर हैं जो केवल

[41:12] कीमतों के उतार-चढ़ाव से ही कमाई कर लेते

[41:15] हैं। उसमें वो कोई प्रोडक्शन नहीं करते।

[41:18] बस कीमतों में होने वाले बदलाव को ही अपनी

[41:20] कमाई का मुख्य जरिया बना लेते हैं। तो

[41:23] अर्थव्यवस्था का ऐसा सेक्टर मॉनिटरी

[41:25] सेक्टर कहलाता है। वास्तविक क्षेत्र किसी

[41:28] अर्थव्यवस्था का वास्तविक क्षेत्र एक

[41:30] महत्वपूर्ण खंड होता है क्योंकि क्षेत्र

[41:32] की गतिविधियां आर्थिक उत्पादन को प्रभावित

[41:34] करती है। इससे जीडीपी की प्रगति होती है।

[41:37] मौद्रिक क्षेत्र केवल मूल्य स्तर को

[41:39] प्रभावित करने की भूमिका निभाते हैं।

[41:41] इसलिए सरलीकृत उदाहरण में सप्लाई मांग की

[41:44] भूमिका आमतौर पर पैसे की मात्रा सिद्धांत

[41:46] तक सीमित होती है। जैसे कोई जमीन आपने

[41:49] अपने आसपास खरीदी थी। जब उसकी कीमत ज्यादा

[41:52] बढ़ गई तो आपने उसको बेच दिया तो आपने

[41:54] क्या जमीन का प्रोडक्शन किया? नहीं। केवल

[41:57] आपने जो कमाई की वो केवल कीमतों में हुए

[42:00] बदलाव के कारण की। तो जब आप केवल कीमतों

[42:03] के आधार पर काम करते हुए कीमतों में

[42:05] परिवर्तन के आधार पर अपनी कमाई करते हैं

[42:08] तो इसको मॉनिटरी सेक्टर के रूप में जाना

[42:10] जाता है। रियल सेक्टर में सरकार इंक्लूड

[42:13] होती है, किसान इंक्लूड होते हैं। बैंकिंग

[42:16] सेक्टर को रियल सेक्टर में ही डाला जाता

[42:18] है। उसका कारण ये है क्योंकि वो सेवाएं तो

[42:20] दे रहे हैं लेकिन शेयर मार्केट हो गया या

[42:23] फिर हम कह सकते हैं कि बॉन्ड वाला मार्केट

[42:26] हो गया, डेरिवेटिव मार्केट हो गया। वो

[42:28] शुद्ध रूप से फाइनेंशियल मार्केट कहलाता

[42:30] है क्योंकि यहां पर किसी भी प्रकार से

[42:33] उत्पादन नहीं हो रहा है। केवल और केवल

[42:35] कीमतों के ज्यादा होने का इंतजार करके

[42:38] कमाई की जाती है। फिर दूसरा होता है कि वह

[42:41] सेक्टर किस तरीके से अपने जीवन यापन को

[42:44] चला रहा है। जैसे अगर किसी सेक्टर के लोग

[42:47] प्राकृतिक संसाधन से कुछ कमाई कर रहे हैं।

[42:50] जैसे पशुपालन की बात अगर करें तो

[42:52] प्राकृतिक रूप से गाय भैंस को कमा मतलब

[42:55] पाल रहे हैं। उसको खिला रहे हैं। फिर उसके

[42:58] दूध को या उससे होने वाले अन्य प्रोडक्ट्स

[43:01] को बेचकर कमाई कर रहे हैं। तो कहीं ना

[43:03] कहीं नेचुरल चीज का उपयोग कर रहे हैं।

[43:06] जैसे मछली पालन नेचुरल चीज का उपयोग कर

[43:09] रहे हैं। रेशम कीट पालन, मधुमक्खी पालन ये

[43:11] सब नेचुरल चीजों से प्राप्त कर रहे हैं।

[43:13] किसान कहीं ना कहीं जमीन से अपना उत्पादन

[43:17] प्राप्त कर रहा है। तो जहां प्राकृतिक

[43:19] चीजों से उत्पादन को प्राप्त किया जाए,

[43:21] कुछ कमाई की जाए तो प्राइमरी सेक्टर

[43:24] कहलाता है। अगर प्राइमरी सेक्टर की चीजों

[43:27] को बेटर चीजों में कन्वर्ट किया जाए। फॉर

[43:29] एग्ज़ांपल हमने गेहूं प्राप्त किया। मतलब

[43:32] किसान ने गेहूं प्राप्त किया। यह प्राइमरी

[43:34] सेक्टर हुआ। लेकिन गेहूं को आटे में बदलने

[43:37] का काम किया। क्योंकि आटा थोड़ी डायरेक्ट

[43:39] प्रकृति से मिला था। उसे कहते हैं

[43:41] प्रोसेसिंग करना। उसे प्रसंस्कृत किया।

[43:44] उसको बेटर तरीके की क्वालिटी में बदला। तो

[43:47] आटे में बदल दिया। आटे से ब्रेड बना लिए।

[43:50] तो या तो आटा बेच दो, ब्रेड बेच दो। जैसे

[43:53] दालें प्राप्त की पर दाल दालों को पॉलिश

[43:56] करके उसे बेटर क्वालिटी में कन्वर्ट करके

[43:58] फिर लोगों को बेचा या फिर हमने प्रकृति से

[44:01] प्राप्त किया था मान लीजिए रेशा उस रेशे

[44:04] से कपड़े बनाए तो हम कहेंगे कि हमने उसे

[44:06] प्रोसेस किया है तो जो विनिर्मा क्षेत्र

[44:09] होता है विनिर्माण इसलिए कह रहे हैं

[44:11] क्योंकि फिर से निर्माण किया जा रहा है जो

[44:13] प्राकृतिक चीज थी उससे और क्वालिटी की चीज

[44:16] बनाई जा रही तो उसको कहते हैं सेकेंडरी

[44:17] सेक्टर जहां प्राकृतिक चीजों को रॉ

[44:20] मटेरियल के रूप में यूज़ करते

[44:22] यहां सब कुछ प्रकृति से प्राप्त करते हैं।

[44:24] यहां प्राकृतिक चीजों को रॉ मटेरियल में

[44:26] यूज़ करके बेटर क्वालिटी में कन्वर्ट किया

[44:28] जाता है। टर्शरी सेक्टर उन्हें कहा जाता

[44:32] है जहां पर मनुष्य सीधा सेवा प्रदान करता

[44:35] है। जैसे टीचर सीधी सेवाएं दे रहा है।

[44:38] यहां पर कोई मैन्युफैक्चरिंग नहीं हो रहा

[44:41] है। डॉक्टर सीधी सेवाएं दे रहा है। बैंक

[44:43] वाले सीधी सेवाएं दे रहे हैं या बीमा वाले

[44:46] सीधी सेवाएं दे रहे हैं। जो व्यापार कर

[44:48] रहे हैं दुकानदार जितने हैं वो सब के सब

[44:51] आपको सर्विस दे रहे हैं। वो कोई प्रोडक्शन

[44:53] नहीं करते हैं। वो सीधी आपकी मदद करते हैं

[44:55] तो इसे कहते हैं टर्शरी सेक्टर इसको

[44:57] सर्विस सेक्टर भी कहते हैं। जो खास करके

[45:00] हम कहते हैं कि पॉलिसी मेकिंग या बड़े

[45:02] पदों पर होते हैं। जैसे साइंटिस्ट।

[45:04] साइंटिस्ट सर्विस नहीं दे रहा है बल्कि

[45:06] पूरी अर्थव्यवस्था को या कहीं ना कहीं जो

[45:09] उच्च बुद्धिमत्ता वाले लोग हैं पूरी

[45:11] अर्थव्यवस्था के संचालन में काम कर रहे

[45:13] होते हैं। आविष्कार करने वाले जो लोग होते

[45:15] हैं लेकिन जो पॉलिसी मेकिंग होते हैं जैसे

[45:18] कि प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री ये लोग पूरे

[45:21] के पूरे व्यवस्था को चलाने के लिए पॉलिसी

[45:23] बनाते हैं। तो ये सर्विस भी नहीं दे रहे

[45:26] हैं। यह प्रोडक्शन भी नहीं कर रहे पर सभी

[45:28] चीजों को इंपैक्ट करते हैं। तो हम इन्हें

[45:29] कहते हैं कोनरी सेक्टर या पंचम क्षेत्र।

[45:34] प्राथमिक क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों पर

[45:36] आधारित होता है। प्रत्यक्ष रूप से संसाधन

[45:38] प्रकृति से प्राप्त करता है। कृषि, मत्स्य

[45:40] पालन और खनन माइनिंग उसी में आता है। शब्द

[45:43] पर ध्यान देना। सेकेंडरी सेक्टर को मीडियम

[45:46] सेक्टर भी कहते हैं। कच्चे माल को प्रो

[45:48] प्रोसेस करते हैं। उससे चीजों को बदलते

[45:51] हैं। इंडस्ट्री मैन्युफैक्चरिंग या

[45:53] निर्माण जैसे क्षेत्र टर्शरी सेक्टर

[45:55] सर्विस पर बेस्ड होते हैं। उत्पादन

[45:57] प्रक्रिया में सहायक होते हैं। बैंकिंग,

[45:59] परिवहन, संचार, होटल इंडस्ट्री या जितनी

[46:03] भी प्रकार की सेवाएं प्राप्त करते हैं।

[46:05] जैसे व्यापार, चतुर्थक सेक्टर ज्ञान और

[46:08] इंफॉर्मेशन पर बेस्ड होते हैं। रिसर्च

[46:10] करने वाले एआई एनालिस्ट, डाटा एनालिस्ट जो

[46:12] होते हैं वो चतुर्थक सेक्टर में रखे जाते

[46:15] हैं और पंचम में पॉलिसी मेकिंग वाले लोग

[46:18] होते हैं। सरकार, प्रशासन ये सब कुछ पंचम

[46:21] स्तर में माने जाते हैं।

[46:28] 2024 में कुछ इस तरीके का प्रश्न डाला गया

[46:30] था। कृषि उत्पादन का भंडारण करना, डेयरी

[46:34] फार्म का काम करना एक प्रकार से प्राइमरी

[46:38] कह रहा है। खनिज की खोज करना एक्सप्लोर

[46:41] करना टर्शरी कहलाएगा। कपड़ा बुनाई

[46:44] सेकेंडरी कहलाएगा। तो देखो सबसे पहली और

[46:46] इंपॉर्टेंट बात कपड़ा बुनाई बिल्कुल

[46:48] गारंटेड सेकेंडरी है। तो हम कहेंगे कि जी

[46:50] हां यह तो बिल्कुल बातचीत है। लेकिन जो

[46:53] डेयरी फार्म कर रहा है जहां पर हम बात

[46:55] करेंगे कि वह दूध डेयरी चला रहा है तो

[46:58] वास्तविक रूप में वो किसानों से केवल दूध

[47:00] को प्राप्त करके बेचने का काम करता है।

[47:03] जैसे कि उसने मान लीजिए व्यापार करने का

[47:06] काम कर लिया है। तो ऐसी सिचुएशन में हमें

[47:08] ध्यान देना होगा कि क्या वो प्राइमरी माना

[47:11] जाएगा क्या? उसी टाइप में एग्रीकल्चर

[47:14] प्रोडक्शन जो एग्रीकल्चर प्रोडक्शन कर रहे

[47:16] हैं वो तो जरूर प्राइम प्राइमरी है लेकिन

[47:19] जो एग्रीकल्चर का भंडारण कर रहे हैं जिसको

[47:22] कहते हैं स्टोर वेयर हाउस का काम करते हैं

[47:24] वो एक प्रकार से सेवा हम कहेंगे कि

[47:27] प्रोसेसिंग करने या उसको ज्यादा बेटर कीमत

[47:29] देने पर बातचीत करेंगे तो हम कहते हैं कि

[47:32] इनमें से केवल दो वाली बात ही सही है। एक

[47:34] [गला साफ़ करने की आवाज़] तो कृषि उत्पादन

[47:35] का भंडारण साथ ही साथ हम कहेंगे कि कपड़ा

[47:39] बुनाई वाला क्षेत्र दो और तीन गलत रहेंगे।

[47:42] द्वितीय क्षेत्र में कम वृद्धि हेतु

[47:44] उत्तरदाई कारक हमारे देश में लंबे समय तक

[47:47] मैन्युफैक्चरिंग आखिर विकसित क्यों नहीं

[47:49] हो पाया? यह सवाल कई बार पूछा जाता है। तो

[47:52] पहले तो हमारे देश में सभी चीजों पर

[47:54] फ्रीडम नहीं होती थी। हर जगह लाइसेंस लेना

[47:56] पड़ता था। 1991 में लाइसेंस राज खत्म हुआ।

[48:00] विदेशी निवेश पर बहुत प्रतिबंध थे। 1991

[48:03] में विदेशी निवेश पर भी प्रतिबंध बंद किए

[48:05] गए। निजी उद्योग को बढ़ावा देने के उपाय

[48:08] तब नहीं किए गए। सरकार को लगता था कि सब

[48:10] मैं ही करूंगी। सभी मैं ही करूंगा। पर

[48:13] 1991 के बाद इसको सुधारा गया। बिजली का

[48:16] उतना उत्पादन नहीं था। हमारे देश में लेबर

[48:18] लॉ बहुत ज्यादा कठोर बना दिए थे। पर्यावरण

[48:21] मंजूरी और भूमि अधिग्रह संबंधी नियम भी

[48:23] काफी कठोर थे और सस्ते विनिर्मित वस्तुओं

[48:26] का आयात करना बहुत मुश्किल होता था। इन

[48:28] सभी चीजों के कारण हमारे देश में

[48:30] मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर इतना तेजी से

[48:32] डेवलप नहीं हुआ लेकिन अब धीरे-धीरे

[48:34] डेवलप्ड होने लग गया है। क्रियाशीलता के

[48:37] आधार पर रियल सेक्टर और मॉनिटरी सेक्टर हम

[48:39] ऑलरेडी पढ़ चुके हैं। क्रियाशीलता मतलब ये

[48:43] नहीं यहां पर ये आ जाएगा। यह गलत है। यह

[48:47] पब्लिक और प्राइवेट की बात कर रहे हैं।

[48:49] पब्लिक और प्राइवेट का मतलब मालिक कौन है?

[48:51] अगर कहीं पर भी किसी कंपनी में 51% शेयर

[48:55] होल्डिंग सरकार की है तो उसे पब्लिक

[48:57] सेक्टर कहते हैं। याद रखो भारत में केवल

[49:00] पब्लिक स्कूल को छोड़ देना। पब्लिक स्कूल

[49:02] में भले ही नाम पब्लिक वर्ड यूज़ कर दिया

[49:04] गया लेकिन वो प्राइवेट स्कूल होते हैं।

[49:06] बाकी सब जगह अगर किसी बैंक में पब्लिक नाम

[49:09] यूज़ कर लिया। किसी भी कंपनी ने पब्लिक

[49:11] नाम यूज़ कर लिया तो समझ जाना सरकार उसकी

[49:14] मालिक होगी। यह बड़ा अद्भुत है कि हमारे

[49:16] देश में जो स्कूल होते हैं वो पब्लिक

[49:18] स्कूल वर्ड यूज़ कर लेते हैं। लेकिन वो

[49:20] पब्लिक नहीं होती। वो प्राइवेट स्कूलें ही

[49:22] होती है। पब्लिक सरकार की हिस्सेदारी 51%

[49:25] या ज्यादा होती है। प्राइवेट सेक्टर जहां

[49:27] प्राइवेट की हिस्सेदारी 51% या उससे

[49:30] ज्यादा हो सकती है। सरकार कुछ जगह पर

[49:32] थोड़ा बहुत 10% 20% का इन्वेस्टमेंट कर

[49:35] सकती है। लेकिन तब वो सरकारी नहीं बन जाता

[49:37] है। सरकारी तभी माना जाएगा जब उसका शेयर

[49:40] होल्डिंग ज्यादा रहेगा। सरकार का डायरेक्ट

[49:43] इनडायरेक्ट कंट्रोल होता है। सरकार का कोई

[49:45] कंट्रोल नहीं होता है। अधिकतम लोक कल्याण

[49:48] सरकार इसलिए कोई चीज कर रही है ताकि लोगों

[49:50] का कल्याण हो। प्राइवेट व्यक्ति इसलिए कोई

[49:52] काम कर रहा है ताकि बेनिफिट हो सके। यहां

[49:55] पर नौकरियां, आवास की सुविधा, पेंशन या कई

[49:59] प्रकार के जो लाभ होते हैं वो काफी ज्यादा

[50:01] होते हैं। प्राइवेट सेक्टर में उतना

[50:04] ज्यादा बेटर लाभ नहीं मिलता बल्कि यहां सब

[50:06] कुछ डिसाइड होता है कंपटीशन पर, आपके

[50:08] प्रोडक्शन पर। जितना ज्यादा आप लाभ कंपनी

[50:11] को कमा के दोगे, उतनी ही आपकी सैलरी भी

[50:13] रहेगी। प्रमोशन का मानदंड जनरली सीनियरिटी

[50:16] होती है कि कितने सीनियर हैं आप, कितने

[50:19] टाइम से हैं। यहां प्रमोशन इस आधार पर

[50:21] दिया जाता है कि कर्मचारी का योग्यता

[50:24] कितनी है। यहां पर योग्यता को वरीयता दी

[50:26] जाती है। यहां पर सीनियरिटी को योग्यता दी

[50:29] जाती है। ये भी पब्लिक सेक्टर और प्राइवेट

[50:31] सेक्टर। अर्थव्यवस्था के दो सेक्टर होते

[50:33] हैं सरकार के कंट्रोल के आधार पर। फिर एक

[50:36] और सेक्टर होता है जिसको ऑर्गेनाइज सेक्टर

[50:38] कहते हैं और सरकार धीरे-धीरे हमारे देश को

[50:41] ऑर्गेनाइज सेक्टर में बदलना चाहती है।

[50:44] ऑर्गेनाइज सेक्टर सरकार के कई नियमों का

[50:46] पालन करता है। सरकार को डाटा सही-सही

[50:49] पहुंचाता है। ऑर्गेनाइज सेक्टर के कारण

[50:52] रियल में हम देश का जो भी इकोनॉमिकल

[50:55] कैलकुलेशन है वो बेटर कर सकते हैं। हमारे

[50:58] देश में एक बड़ा ड्रॉबैक है कि हमारे देश

[51:00] का बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी अनऑर्गेनाइज्ड

[51:02] है। फिर एग्रीकल्चर की बात कर लीजिए।

[51:05] एमएसएमई की बात कर लीजिए। यह सभी के सभी

[51:07] अनऑर्गेनाइज्ड थे। एमएसएमई को पहली बार

[51:10] सरकार ने ऑर्गेनाइज सेक्टर में बदलने के

[51:12] लिए 2020 में कार्यक्रम शुरू किए थे।

[51:15] क्योंकि यहां के लोगों की जानकारी उनको भी

[51:17] बेहतर सुविधाएं मिल सके। इसलिए सरकार

[51:21] ऑर्गेनाइज सेक्टर का आकार बड़ा करने में

[51:24] लगी है। तो कैसे आकार बड़ा कर रही है?

[51:26] क्या वो सभी सेक्टरों को ऑर्गेनाइज सेक्टर

[51:28] के रूप में विकसित कर रही है? नहीं। बल्कि

[51:31] वो इनफॉर्मल सेक्टर को अनऑर्गनाइज सेक्टर

[51:33] को ऑर्गेनाइज सेक्टर में कन्वर्ट करने के

[51:36] लिए प्रमोट कर रही है, मोटिवेट कर रही है।

[51:38] ऐसा सेक्टर जो कि औपचारिक कहलाता है,

[51:41] फॉर्मल सेक्टर कहलाता है, सरकार के पास

[51:44] रजिस्टर्ड होता है, रेगुलेट होता है, वहां

[51:46] पर पूरे श्रम कानूनों का पालन होता है।

[51:49] यहां पर पूरी तरह से नियमावली रहेगी कि

[51:51] नौकरी के लिए क्या आधार रहेगा? नौकरी से

[51:53] हटाया कैसे जाएगा? रोजगार की निश्चित और

[51:56] नियमित शर्तें क्या रहेगी? कर्मचारी

[51:58] सामाजिक सुरक्षा लाभ के हकदार होंगे कि

[52:01] नहीं होंगे तो सब कुछ इसमें मिलेगा सरकार

[52:03] के मतलब पेंशन मिलेगी इसमें एक प्रकार से

[52:06] आपका पीएफ प्रोविडेंट फंड कटेगा सब चीजें

[52:09] रहेगी जो औपचारिक वित्तीय संस्थाओं तक

[52:12] इनकी आसान पहुंच होती है। इस कारण बैंकके

[52:14] इनको आसानी से ऋण भी दे पाती है। मॉडर्न

[52:16] टेक्नोलॉजी को अपनाते हैं। स्किल

[52:18] डेवलपमेंट करते हैं। ट्रेनिंग का काम करते

[52:20] रहते हैं। कर्मचारियों की नौकरी ज्यादा

[52:22] स्टेबल होती है। जैसे बैंक में काम करने

[52:25] वाले, बीमा कंपनी में काम करने वाले, बड़े

[52:27] कंपनियों में काम करने वाले, सरकारी

[52:29] कार्यालय में काम करने वाले लोगों को हम

[52:31] ऑर्गेनाइज सेक्टर के अंतर्गत रखते हैं।

[52:34] अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर का मतलब इनफॉर्मल

[52:36] सेक्टर है। यहां पर जनरली कोई फिक्स्ड

[52:39] वेतन नहीं होता है। कोई सरकार के काम नहीं

[52:42] नियमों का पालन नहीं होता है। यह सरकार के

[52:44] पास रजिस्टर्ड नहीं होते हैं। जैसे किसान

[52:47] जो भी काम करवा रहा है अपने खेत में वो सब

[52:49] के सब अनऑर्गेनाइज के अंतर्गत आते हैं।

[52:52] कार्य की परिस्थितियां कहे रेगुलेट नहीं

[52:54] हो पाती है। टेक्नोलॉजी एडवांस नहीं होती

[52:57] है। स्किल डेवलपमेंट उतना बेटर नहीं हो

[52:59] पाता है। काम के घंटे रेगुलर नहीं होते

[53:01] हैं। यहां तक कि कोई पेंशन जो मजदूरी करने

[53:04] वाले लोग होते हैं किसान के यहां पर उनकी

[53:06] कोई पेंशन नहीं होती है। उन्हें किसी

[53:08] प्रकार से प्रोविडेंट फंड नहीं मिलता है।

[53:11] या ऐसे लोग नहीं होते जिनके पास किसी

[53:13] प्रकार का इंश्योरेंस होता है। उन लोगों

[53:15] के रिस्क ज्यादा रहते हैं। हम चाहते हैं

[53:18] कि ये सेक्टर छोटा होना चाहिए और

[53:20] ऑर्गेनाइज सेक्टर बड़ा होना चाहिए। जिस

[53:21] देश में ऑर्गेनाइज सेक्टर बड़ा बन जाता

[53:23] है। समझ जाइएगा कि वो विकसित हो जाता है।

[53:27] तो ये थे सेक्टर। किसी इकोनॉमी में किसी

[53:30] व्यवस्था के अंतर्गत अलग-अलग प्रकार के

[53:32] सेक्टर काम करते हैं। किसी भी

[53:34] अर्थव्यवस्था में अलग-अलग तरीके की जॉब भी

[53:37] होती है। कुछ वाइट कॉलर जॉब कहलाती है।

[53:40] कुछ ब्लैक कॉलर जॉब कहलाती है। कुछ नो

[53:42] कॉलर जॉब कहलाती है। तो आइए देखते हैं कि

[53:44] जॉब कितने टाइप की होती है। किसी भी

[53:46] अर्थव्यवस्था की अगर हम बातचीत करें। सबसे

[53:49] पहला होता है गोल्ड कॉलर जॉब। हाईली

[53:52] स्किल्ड नॉलेज पीपल। जैसे साइंटिस्ट को हम

[53:55] गोल्ड कॉलर जॉब कहते हैं कि सबसे एडवांस

[53:58] स्किल वाले लोग होते हैं। ब्लू कॉलर जॉब

[54:01] का मतलब हु परफॉर्म मैनुअल लेबर एंड अर्न

[54:03] आवरली वेजेस। ऐसे लोग जो वास्तविक रूप में

[54:07] हाथ से काम करने वाले लोग होते हैं और

[54:10] प्रति घंटे के या प्रतिदिन के आधार पर काम

[54:12] करते ब्लू कॉलर वाले कहलाते हैं। ये

[54:15] सामान्य मजदूर लोग जो भी किसी फैक्ट्री

[54:17] में काम कर रहे होते हैं उन्हें कहते हैं

[54:19] ब्लू कॉलर। ग्रे कॉलर ऐसे लोग जो एज के

[54:23] रिटायरमेंट के बाद भी काम करते हैं जैसे

[54:25] डॉक्टर डॉक्टर 70 साल का भी होगा तब भी वो

[54:28] डॉक्टरी बंद नहीं करता है। आईटी प्रोफेशनल

[54:31] भी अब लंबे समय तक काम करने लग गए हैं। तो

[54:34] हेल्थ केयर प्रोफेशनल वाले लोग जो

[54:36] रिटायरमेंट के बाद भी काम करते रहते हैं

[54:38] ग्रे कॉलर वाले कहलाते हैं। पिंक कॉलर जॉब

[54:41] ऐसे लोग जिनकी सैलरी काफी ज्यादा नहीं हो

[54:44] सकती है। वो कितने भी उसमें सीनियर हो जाए

[54:46] जैसे लाइब्रेरियन जैसे रिसेप्शनिस्ट ये

[54:49] ऐसे लोग होते हैं जो कितने भी सीनियर हो

[54:52] जाए सैलरी एक लेवल से ज्यादा कभी नहीं हो

[54:54] सकती है। ग्रीन कॉलर जॉब जो एनवायरमेंट से

[54:57] जुड़े हुए काम करते हैं या कहीं ना कहीं

[55:00] पर्यावरण वन्य जीवों को संरक्षण वाले काम

[55:02] करते हैं। ब्लैक कॉलर जॉब वर्कर इन द

[55:05] माइनिंग एंड ऑयल इंडस्ट्री जो खनन

[55:07] इंडस्ट्री में या तेल इंडस्ट्री में काम

[55:09] करते हैं। ओपन कॉलर जॉब ऐसे लोग जो घर से

[55:13] काम करते हैं। इंटरनेट के माध्यम से

[55:15] उन्हें कहते हैं ओपन कॉलर जॉब या कई बार

[55:18] इनको कहा जाता है कि एक प्रकार से ऐसे लोग

[55:21] जो वर्क फ्रॉम होम या इंटरनेट के माध्यम

[55:24] से काम करने वाले लोग रहेंगे। वाइट कॉलर

[55:26] जॉब यह ऑफिस काम मैनेजमेंट से जुड़े हुए

[55:29] काम ऐसे लोग जो ऑफिस में बैठकर पूरी तरह

[55:32] से संस्थाओं को चलाने का काम करते हैं।

[55:36] ऑफिस वर्क करते रहते हैं। वाइट कॉलर जॉब

[55:38] जो कैदी होते हैं कैदी भी मजदूरी करते

[55:42] रहते हैं तो उनको ऑरेंज कॉलर कहा जाता है।

[55:44] और नो कॉलर ऐसे लोग जो अपने पैशन को अपने

[55:49] एक प्रकार से उनका जो कला थी उनके अंदर जो

[55:52] योग्यता थी उसी को वह कमाई का जरिया बना

[55:55] देते जैसे आर्टिस्ट चित्रकार

[55:58] जो पेंटर होते हैं जो एक्टिंग करने वाले

[56:01] लोग होते हैं उनको कहते हैं नो कॉलर।

[56:03] उन्होंने अपने पैशन को ही अपनी कमाई का

[56:06] जरिया बना दिया है। तो हाईली स्किल्ड लोग

[56:07] गोल्ड कॉलर में आते हैं। लो स्किल्ड लोग

[56:10] ब्लू कॉलर में आते हैं। जो सेल रिटायरमेंट

[56:13] के बाद भी काम करते हैं। ग्रे कॉलर जो

[56:15] बिल्कुल लो पेड वाले लोग होते हैं। पिंक

[56:18] कॉलर ऑफिस में बैठने का ही काम होता है।

[56:20] ग्रीन कॉलर पर्यावरण से जुड़े हुए। ब्लैक

[56:22] कॉलर माइनिंग या ऑयल इंडस्ट्री से जुड़े

[56:25] हुए ओपन कॉलर वर्क फ्रॉम होम वाले वाइट

[56:27] कॉलर हाइली स्किल्ड वाले लोग कहलाएंगे।

[56:30] जैसे डॉक्टर जो भी होते हैं इंजीनियर जो

[56:32] होते हैं ऑफिस में मैनेजर जो होते हैं या

[56:36] वर्तमान में जो टीचर होते हैं उनको भी हम

[56:38] इसी में डालेंगे। ऑरेंज कॉलर मतलब जो

[56:40] प्रिजन होते हैं जो एक प्रकार से कैदी

[56:43] होते हैं और नो कॉलर का मतलब जो अपने पैशन

[56:46] को ही अपनी कमाई का जरिया बना देते हैं।

[56:48] अब बात कर लेते हैं थोड़ा सा डिमांड और

[56:51] सप्लाई की थ्योरी और इसमें कुछ जरूरी

[56:53] चीजें। सामान्यतः डिमांड और सप्लाई में हम

[56:56] यह मानते हैं कि जब भी किसी चीज की डिमांड

[56:59] बढ़ती है

[57:03] तो प्राइस बढ़ती है।

[57:06] सामान्यतः डिमांड बढ़ने पर प्राइस बढ़ती

[57:09] है। लेकिन अगर कोई ऐसी चीज हो जिसका

[57:13] प्राइस बढ़ गया इसलिए डिमांड बढ़ गई। पहले

[57:18] वो सस्ती थी तो कोई खरीदता नहीं था। पहले

[57:21] वह सस्ती थी तो कोई खरीदता नहीं था। लेकिन

[57:23] कीमतें बढ़ गई इसलिए उसकी डिमांड बढ़ गई।

[57:26] ऐसी चीजों को हम नाम देते हैं गिफिन

[57:28] गुड्स।

[57:30] सामान्यतः चीजों की डिमांड बढ़ने से

[57:33] प्राइस बढ़ती है। भाई लोग ज्यादा यूज करने

[57:35] लग गए इसलिए महंगी हो गई। लेकिन कोई चीज

[57:39] महंगी होने के कारण डिमांड बढ़ जाए। जैसे

[57:41] हमारे देश में गुड़। आज से 20 साल पहले

[57:45] अपने माता-पिता से बात करना कि गुड़ लोग

[57:47] खाते नहीं थे। इसलिए नहीं खाते थे क्योंकि

[57:50] वो सस्ता था और चीनी महंगी हुआ करती थी।

[57:54] अब गुड़ महंगा हो गया और लोगों ने खाना

[57:56] शुरू ज्यादा कर दिया। प्राइस बढ़ने के

[57:59] कारण डिमांड बढ़ गई उसकी। मतलब लोग उसको

[58:02] पहले हल्के में लेते थे, गंदा कहते थे या

[58:05] फिर मैं कह सकता हूं कि एक प्रकार से मोटा

[58:09] अनाज। मोटा अनाज मतलब

[58:12] ज्वार। घर वालों से पूछना दादा-दादी

[58:15] बताएंगे। पुराने जमाने में ज्वार गरीब लोग

[58:18] खाते थे और गेहूं अमीर लोग खाते थे।

[58:22] और ज्वार की कीमत जब से गेहूं को पार कर

[58:25] चुकी है, अब इसकी डिमांड बढ़ गई है। अब

[58:28] इसको सुपर फूड कहने लग गए हम लोग। तो

[58:31] कभी-कभी कोई चीज की कीमतों के बढ़ने के

[58:34] कारण डिमांड बढ़ जाती है। ध्यान से सुनना।

[58:37] सामान्य रूप से डिमांड के बढ़ने पर प्राइस

[58:40] बढ़ते हैं। डिमांड के बढ़ने पर प्राइस

[58:44] बढ़ता है। लेकिन किसी की प्राइस बढ़ने के

[58:47] कारण डिमांड बढ़ जाए तो इसे गिफिन गुड्स

[58:49] कहते हैं। गिफिन गुड्स।

[58:52] गिफिन गुड्स वह वस्तुएं हैं जिसकी कीमत

[58:55] बढ़ने पर मांग बढ़ती है। मतलब उसकी कीमत

[58:58] क्या बढ़ गई? लोगों ने उसकी कद्र करना

[59:00] शुरू कर दी। पहले वो सस्ते में मिलता था

[59:03] तो कोई खाता नहीं था। लेकिन अब उसकी

[59:05] कीमतें बढ़ गई। इस कारण से अब उसकी मांग

[59:08] बढ़ गई है। डिमांड बढ़ गई है। कीमतों के

[59:11] बढ़ने के कारण जब डिमांड बढ़ने लग जाए तो

[59:14] उसे गिफेन गुड्स कहते हैं। क्या यह बात

[59:16] सभी को समझ में आ रही है? फिर है वेबिन

[59:20] गुड्स। जब कोई वस्तु अपनी उच्च कीमत के

[59:22] कारण अधिक आकर्षक लगती है तो मांग बढ़

[59:25] सकती है। भले उसकी कीमत कितनी भी बढ़ जाए।

[59:28] जैसे iPhone हो गया, Rolls रॉयल्स हो गया।

[59:31] उसकी केवल प्राइस के कारण ही लोग उसको

[59:33] खरीदना चाहते हैं। iPhone हो या Rolls

[59:36] Royals हो तो उन्हें वेबन गुड्स कहते हैं।

[59:38] याद रखना गिफिन गुड्स बहुत लो क्वालिटी की

[59:41] चीजें होती है। पर उसकी कीमत बढ़ने के

[59:43] कारण अब उसकी डिमांड बढ़ गई और ये पहले से

[59:46] ही हाई क्वालिटी की चीज थी। बहुत उच्च

[59:48] गुणवत्ता वाला एक ब्रांड होता है जिसकी

[59:51] ज्यादा कीमत ही उसकी एक पहचान बनती है

[59:53] जिसके कारण लोग उसकी डिमांड करते हैं।

[59:55] इन्हें वाइट थिंग्स कहा जाता है। वेबलन

[59:58] गुड्स को वाइट थिंग्स श्वेत वस्तुएं जिससे

[01:00:00] लोगों का लिविंग स्टैंडर्ड तय होता है

[01:00:02] जिससे लोगों के समाज में स्टेटस क्लियर हो

[01:00:04] जाता है। उन्हें वेबलन गुड्स या वाइड

[01:00:07] गुड्स कहते हैं। जिनकी हाई प्राइस ही उनकी

[01:00:10] पहचान होती है। फिर इकोनॉमी में दो बड़े

[01:00:12] इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है। एक होता है

[01:00:14] आर्थिक समृद्धि और एक होता है आर्थिक

[01:00:17] विकास। इधर ध्यान दीजिएगा। जब कोई व्यक्ति

[01:00:20] मैं तीन लोगों के एग्जांपल दे रहा हूं।

[01:00:27] अमर,

[01:00:30] अकबर,

[01:00:32] एंथनी।

[01:00:35] तो ये तीन लोगों का एग्जांपल है। ध्यान से

[01:00:38] सुनते चलिएगा। अमर, अकबर, एंथनी। अमर

[01:00:41] कमाता था ₹100। एग्जांपल यह है। इसे धर्म

[01:00:44] सेम से मत जोड़ा करो। मास्टर को केवल ज्ञान

[01:00:47] देने दिया करो। हां। ₹100 अमर कमाता था।

[01:00:50] अकबर ₹100 कमाता था। एंथनी भी ₹100 कमाता

[01:00:54] था। एग्जांपल दे रहा हूं। अमर अकबर बुरा

[01:00:56] लग रहा हो तो ए बी सी एक्स वाई जेड एम एन

[01:01:01] ओ नहीं तो क्या होगा? कल के दिन कहेंगे

[01:01:04] मास्टर देखो धार्मिक हो गया है। अगर ऐसा

[01:01:07] लगे तो यह समझ लेना। ठीक है। अब जीवन पर

[01:01:09] आते हैं। तीनों लोग ₹100 कमाते थे। ये बात

[01:01:12] है वर्ष 2000 की।

[01:01:15] फिर देश में कुछ बदलाव आए, चीजें चेंज हुई

[01:01:20] और 2000 10 में

[01:01:24] अमर कमाने लगा ₹1000।

[01:01:29] अकबर कमाने लगा ₹1000।

[01:01:33] एंथनी कमाने लगा ₹1000।

[01:01:38] अमर ने ए बी सी ने अमर हटा ही देते हैं।

[01:01:42] नहीं तो आप कह दोगे कि

[01:01:45] हर जगह क्या है मानसिकताएं गंदी ना हो

[01:01:48] जाए।

[01:01:50] ए बी सी ने कमाए 100 की जगह ₹1000 ₹1000

[01:01:54] ₹1000 आपने कहा क्या बात है भाई सबकी कमाई

[01:01:56] बढ़ गई। जब सभी की आर्थिक कमाई बढ़ जाती

[01:02:00] है तो इसको कहते हैं इकोनॉमिकल ग्रोथ। इसे

[01:02:04] कहते हैं कि क्या हो गई? आर्थिक वृद्धि

[01:02:09] लेकिन एबीसी ने इस आर्थिक वृद्धि में

[01:02:12] आर्थिक वृद्धि के कारण इस ₹1000 का क्या

[01:02:16] किया? अपने भोजन पर खर्चा कर दिया लगभग

[01:02:20] ₹300

[01:02:22] अपने कपड़ों पर अपनी शानो शौकत में खर्च

[01:02:24] कर दिया ₹100 और मात्र ₹100 की बचत की

[01:02:31] एबीसी ने एक्स वzेड ने थोड़ा अलग काम

[01:02:35] किया।

[01:02:37] उसने खानेपीने पर ₹200 खर्च किए।

[01:02:41] ₹300 अपने कपड़े स्वास्थ्य, शिक्षा पर

[01:02:45] खर्च किए। और ₹500 का सेविंग करके

[01:02:49] इन्वेस्टमेंट किया। सोना खरीद के रख लिया।

[01:02:52] इन्होंने बैंक में जमा कर दिए। इन्होंने

[01:02:56] और भी ज्यादा सिस्टमेटिक काम किया। ₹200

[01:03:00] अपने भोजन पर खर्च किए। ₹300 अपने

[01:03:03] खाने-पीने पर खर्च किए। ₹400 इन्वेस्टमेंट

[01:03:07] किए और ₹100 अपने आसपास के पर्यावरण को

[01:03:11] बेहतर करने पर लगा दिए। ध्यान से सुनते

[01:03:14] चलना।

[01:03:18] 2020 जब आया 2020 जब आया तो इसकी कमाई

[01:03:24] जितनी थी वो लगभग डबल हो गई। ₹2000 कमाई

[01:03:29] हुई लेकिन यह अभी कर्जे में डूब गया

[01:03:32] क्योंकि इसका खर्चा बहुत ज्यादा है। तो

[01:03:35] इकोनॉमिकल ग्रोथ तो हुई लेकिन वो ग्रोथ

[01:03:37] सस्टेन नहीं कर पाया। कर्जे में धीरे-धीरे

[01:03:40] डूबता चला गया क्योंकि उसका खर्च बहुत

[01:03:42] ज्यादा था।

[01:03:44] लेकिन इस व्यक्ति की कमाई क्योंकि उसने

[01:03:46] ₹500 इन्वेस्ट भी करके रखे थे। फिर वह

[01:03:49] रिटर्न आने लग गए तो इसकी कमाई ₹5000 हो

[01:03:52] गई। लेकिन इसके आसपास का जो पर्यावरण था

[01:03:56] वह प्रदूषित हो गया। आसपास घर के आसपास

[01:03:58] कचरा, घर के आसपास गंदी चीजें या बीमारी

[01:04:02] फैलने के धीरे-धीरे संकेत आने लगे। इस

[01:04:05] व्यक्ति की कमाई ₹5000 ही हुई क्योंकि

[01:04:09] इसने इन्वेस्टमेंट कम किया था लेकिन फिर

[01:04:11] भी अपने आसपास बिल्कुल स्वच्छ पर्यावरण

[01:04:13] रखा स्वच्छ पानी रखा मतलब पर्यावरण की भी

[01:04:16] कद्र करते चला गया। तो 2010 में 2020 में

[01:04:21] ये सिचुएशन आ गई। 2026 तक आते-आते यह

[01:04:25] व्यक्ति पुनः गरीबी के दुष्ट में फंस गया

[01:04:29] और ₹100 जैसी कमाई पर लौट गया। अब इसी के

[01:04:32] लिए भुखमरी जैसी स्थिति आ गई। इस व्यक्ति

[01:04:35] के पास पैसा तो ठीक-ठाक था लेकिन इसे भी

[01:04:38] कई प्रकार की बीमारियां हो गई। कई प्रकार

[01:04:41] की बीमारियों के कारण इसकी जितनी सेविंग

[01:04:44] थी जो एक्स्ट्रा कमाई थी वो भी कम हो गई

[01:04:47] और वह अपने वापस जीवन पर लौट गया। तो इस

[01:04:51] व्यक्ति ने अपनी आर्थिक वृद्धि को विकास

[01:04:53] में तो कन्वर्ट किया लेकिन वह विकास

[01:04:55] ज्यादा लंबे समय तक नहीं चल पाया। उसकी

[01:04:58] जिंदगी बेटर तो हुई लेकिन वो एक टाइम के

[01:05:00] बाद पुनः वहां लौट गया। लेकिन यह व्यक्ति

[01:05:04] ने 2026 में अपनी कमाई को 7 से ₹8000 तक

[01:05:09] कर दिया और पुनः यह आगे बढ़ता ही चला गया।

[01:05:12] हमने कहा कि यह सस्टेनेबल डेवलपमेंट की ओर

[01:05:15] आगे बढ़ा। सस्टेनेबल डेवलपमेंट का मतलब एक

[01:05:18] ऐसा विकास जो निरंतर चलता रहे। यह तभी

[01:05:22] संभव होगा जब पर्यावरण भी रहेगा। तो यदि

[01:05:25] कोई व्यक्ति केवल कमाई बढ़ा दे लेकिन अपनी

[01:05:27] जिंदगी को बेहतर ना कर पाए तो हम कहेंगे

[01:05:30] कि आर्थिक वृद्धि तो कर पाया लेकिन विकास

[01:05:32] नहीं हुआ। कोई व्यक्ति अपनी कमाई को

[01:05:35] बढ़ाने के बाद जिंदगी बेहतर भी कर ले तो

[01:05:38] हम उसे कह देते कि आर्थिक विकास हो गया।

[01:05:41] लेकिन फिर वो विकास लंबे समय तक ना चले तो

[01:05:44] हम कहेंगे कि वह सस्टेनेबल डेवलपमेंट नहीं

[01:05:46] था। सतत विकास नहीं था। और कोई व्यक्ति

[01:05:50] अगर इस तरीके से विकास करे तो हम इसे कहते

[01:05:52] हैं कि उसने आर्थिक वृद्धि भी की, आर्थिक

[01:05:55] विकास भी किया और सस्टेनेबल डेवलपमेंट भी

[01:05:58] किया। उसकी आने वाली जनरेशन के लिए भी एक

[01:06:00] बेहतर वातावरण वो छोड़ के चला गया। तो

[01:06:03] आर्थिक वृद्धि केवल आंकड़ों पर गौर करती

[01:06:05] है। कितनी कमाई बढ़ गई। दुनिया भर के

[01:06:08] अधिकतर अर्थशास्त्री एक जमाने में केवल

[01:06:11] आर्थिक वृद्धि को ही सब कुछ मानते थे।

[01:06:13] आर्थिक समृद्धि एक संकीर्ण अवधारणा है जो

[01:06:16] मुख्य रूप से आर्थिक उत्पादन और आय में

[01:06:18] वृद्धि को दर्शाता है। यह बताता है कि

[01:06:21] कितनी इनकम बढ़ गई, कितना इकोनॉमिकल

[01:06:23] आउटपुट हुआ। यह किसी विशेष अवधि में किसी

[01:06:26] राष्ट्र की मौद्रिक वृद्धि को दर्शाता है

[01:06:28] कि वो राष्ट्र अब कितने पैसे कमा रहा है।

[01:06:30] वो व्यक्ति कितने कमा रहा है। इसे जीडीपी

[01:06:33] से, ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट से, ग्रॉस

[01:06:35] नेशनल इनकम से, पर कैपिटा इनकम के माध्यम

[01:06:38] से शो किया जाता है। आर्थिक समृद्धि का

[01:06:41] मुख्य केंद्र आर्थिक गतिविधियों की मात्रा

[01:06:43] का बढ़ना है। बस कि उद्योग बढ़ गए,

[01:06:46] व्यापार बढ़ गया, सर्विस सेक्टर बढ़ गया,

[01:06:48] लोगों की कमाई बढ़ गई। बस इस पर ध्यान

[01:06:50] देता है।

[01:06:52] आर्थिक विकास एक व्यापक अवधारणा है जिसमें

[01:06:55] सामाजिक, आर्थिक, मानवीय कारक शामिल होते

[01:06:58] हैं कि ठीक है भाई पैसा बढ़ गया वो ठीक

[01:07:00] है। लेकिन क्या सच में व्यक्ति की जिंदगी

[01:07:02] में बड़े स्तर पर बदलाव आया कि नहीं आया?

[01:07:05] आर्थिक विकास इकोनॉमिकल डेवलपमेंट से

[01:07:08] तात्पर्य हेल्थ कितना बेटर हुआ? एजुकेशन

[01:07:10] कितना बेटर हुआ? उस अर्थव्यवस्था में अब

[01:07:13] लोगों की लाइफ स्टैंडर्ड कितना बेटर हो

[01:07:15] पाया। आर्थिक विकास का दायरा काफी व्यापक

[01:07:18] होता है। यह सभी लोगों की जिंदगी को बेहतर

[01:07:20] तरीके से प्रभावित करता है। इसमें जीवन

[01:07:23] स्तर में पहले वो चूल्हे पर खाना बनाते

[01:07:25] थे। अब गैस पर बनाते हैं। पहले वो खराब

[01:07:27] स्कूल में पढ़ते थे। अच्छे स्कूल में पढ़

[01:07:29] रहे हैं। अब उनके पास डॉक्टरी सुविधाएं

[01:07:32] बहुत ज्यादा हो गई है। तो हम कहते हैं कि

[01:07:33] आर्थिक विकास हो गया। तो अल्पकालिक

[01:07:36] प्रक्रिया होती है। आर्थिक समृद्धि

[01:07:38] दीर्घकालिक प्रक्रिया होती है। यह केवल

[01:07:40] मात्रात्मक परिवर्तन को दर्शाती है। वह

[01:07:42] गुणात्मक परिवर्तन दर्शाती है। यह मींस

[01:07:45] होता है, साधन होता है। इसके माध्यम से

[01:07:47] उसे प्राप्त किया जाता है। विकास की

[01:07:49] गारंटी नहीं होती कि आर्थिक समृद्धि हुई

[01:07:52] तो विकास होगा ही। लेकिन अगर विकास हुआ है

[01:07:54] तो समृद्धि हुई होगी। तभी विकास हो पाएगा।

[01:07:57] इसको ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट प्रति

[01:07:59] व्यक्ति आय से मेजर करते हैं। उसको ह्यूमन

[01:08:01] डेवलपमेंट इंडेक्स, ग्रॉस हैप्पीनेस

[01:08:03] इंडेक्स कि भाई वो कितना खुशहाल है उससे

[01:08:05] मेजर करते हैं। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में

[01:08:08] आर्थिक समृद्धि ज्यादा ध्यान देते हैं।

[01:08:10] अमेरिका के लोग अमीर लोग जीडीपी जीडीपी

[01:08:13] चिल्लाएंगे। हम जैसे लोग हम कहेंगे खुश

[01:08:15] कितने लोग हैं? जिंदगी कितनी बेटर हुई है?

[01:08:18] ये थोड़ा सा कम कॉम्प्रहेंसिव है। ये काफी

[01:08:21] ज्यादा कॉम्प्रिहेंसिव मानी जाती है।

[01:08:23] लेकिन याद रखिएगा इन दोनों से ज्यादा बेटर

[01:08:26] होता है। सस्टेनेबल डेवलपमेंट सस्टेनेबल

[01:08:29] डेवलपमेंट जहां ऐसा विकास शब्द पर ध्यान

[01:08:32] देना जो भविष्य की पीढ़ियों को अपनी

[01:08:34] आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता से

[01:08:37] समझौता किए बिना वर्तमान की आवश्यकताओं को

[01:08:40] पूरा करता है। सतत विकास कहलाता है।

[01:08:44] डेवलपमेंट दैट मीट्स द नीड ऑफ द प्रेजेंट

[01:08:47] विदाउट कॉम्प्रोमाइजिंग द एबिलिटी ऑफ़

[01:08:49] फ्यूचर जनरेशन टू मीट देयर ओन नीड्स इज

[01:08:52] कॉल्ड सस्टेनेबल डेवलपमेंट। जैसे हमारे

[01:08:55] बुजुर्गों ने बड़ी अय्याशियां की है।

[01:08:57] क्षमा चाहूंगा। ऐसा आप कहेंगे कि सर कैसी

[01:08:59] बातें कर रहे हैं। जी हां। उन्होंने जी भर

[01:09:02] के प्रकृति के पेड़ों को काटा। उन्होंने

[01:09:04] जी भर के लकड़ी का उपयोग किया। उन्होंने

[01:09:07] जी भर के पानी का उपयोग किया। आज हमारे

[01:09:09] लिए सब संकट में आ गए हैं। हमारे पास ना

[01:09:12] तो नेचुरल रिसोर्स बहुत अच्छे बच गए हैं।

[01:09:14] ना हमारे पास स्वच्छ नदियां बच पाई है। इन

[01:09:17] लोगों ने बड़ी जिंदगी सुकून से गुजारी। सब

[01:09:20] कुछ अच्छे से खर्च किया है। प्रकृति के

[01:09:22] संसाधनों का जी भर के दोहन किया। पानी का

[01:09:25] जी भर के उपयोग कर लिया। आज वर्तमान की

[01:09:28] पीढ़ी के पास उसकी कमी है और आने वाली

[01:09:30] पीढ़ी के पास और भी कमी रहेगी। मतलब हमने

[01:09:33] सस्टेनेबल डेवलपमेंट नहीं किया। अगर हमारी

[01:09:35] आने वाली पीढ़ी को कोई कंप्रोमाइज ना करना

[01:09:38] पड़े। वो भी उतना ही स बेहतर तरीके से

[01:09:40] प्राकृतिक संसाधनों को उपभोग कर सके।

[01:09:43] क्योंकि उतना उत्पादन हुआ तो हम कहेंगे कि

[01:09:46] कहीं ना कहीं सस्टेनेबल डेवलपमेंट हुआ था।

[01:09:49] हमारी दुनिया में पहली बार ब्रूटलैंड

[01:09:51] कमीशन बना था जिसने पहली बार एक रिपोर्ट

[01:09:54] पब्लिश की थी आवर कॉमन फ्यूचर उसमें इस

[01:09:57] डेफिनेशन को दिया था। तो याद रखना

[01:10:00] ब्रूटलैंड रिपोर्ट ब्रूटलैंड कमीशन 1987

[01:10:03] में आया था जिसने रिपोर्ट दी थी आवर कॉमन

[01:10:06] फ्यूचर में कि सस्टेनेबल डेवलपमेंट सबसे

[01:10:08] ज्यादा जरूरी है। सस्टेनेबल डेवलपमेंट में

[01:10:12] संसाधनों का सही ढंग से उपयोग किया जाता

[01:10:15] है। सस्टेनेबल डेवलपमेंट की जरूरत क्यों

[01:10:17] होती है? क्योंकि धीरे-धीरे प्राकृतिक

[01:10:19] संसाधनों का हम बहुत ज्यादा दोहन कर रहे

[01:10:22] हैं। कई प्रजातियां विलुप्त होने के कगार

[01:10:25] पर आ गई है। अगर हम बात करें तो मछलियों

[01:10:27] का देखें तो 60% उत्पादन आने वाले समय में

[01:10:31] घटेगा क्योंकि उनकी जनसंख्या उतनी बेटर

[01:10:33] नहीं हो पा रही है। जलवायु परिवर्तन की

[01:10:36] प्रॉब्लम संसाधनों की कमी ये सब कुछ हमें

[01:10:39] लिए हमारे लिए बातचीत करते हैं कि हमें

[01:10:41] जरूरत है सस्टेनेबल डेवलपमेंट की।

[01:10:43] सस्टेनेबल डेवलपमेंट एक बेहतरीन डेवलपमेंट

[01:10:46] माना जाता है। लेकिन यहां एक और चीज ध्यान

[01:10:49] देना

[01:10:51] अगर सस्टेनेबल डेवलपमेंट में सबसे अभाग्य

[01:10:57] सबसे अभाग्ये

[01:11:01] सबसे कमजोर

[01:11:03] विकड़ सेक्शन पर काम किया जाए। अगर देश के

[01:11:07] सबसे गरीब 20% लोगों तक जिंदगी के संसाधन

[01:11:12] पहुंचाए जाए। 20% सबसे गरीब लोगों की

[01:11:16] जिंदगी को बेटर किया जाए। उन तक इकोनॉमिकल

[01:11:20] एक्टिविटी का इंपैक्ट दिखाया जाए। उन्हें

[01:11:22] बैंकों से जोड़ा जाए। उनके खातों में पैसे

[01:11:25] डाले जाए। उनको बेटर एजुकेशन दी जाए। उनको

[01:11:28] बेटर हेल्थ सुविधाएं दी जाए। उनको बेटर

[01:11:32] आर्थिक अवसर दिए जाए। तब हम कहते कि

[01:11:35] इंक्लूसिव डेवलपमेंट हो गया। उनको भी हमने

[01:11:38] विकास में शामिल कर दिया जिनका आज तक

[01:11:40] विकास नहीं हुआ था। तो याद रखिए अगर आप

[01:11:43] भविष्य में प्रधानमंत्री बनते हैं,

[01:11:45] मुख्यमंत्री बनते हैं या भविष्य में आईएस

[01:11:48] बनते हैं तो याद आपको यह रखना है कि इस

[01:11:51] दुनिया में सबसे बेस्ट है सस्टेनेबल

[01:11:55] डेवलपमेंट विद इंक्लूसिव

[01:11:59] इंक्लूसिव ग्रोथ या इंक्लूसिव डेवलपमेंट।

[01:12:03] यदि सतत विकास समावेशी विकास के साथ हो

[01:12:06] जाए तो इससे बढ़िया कुछ भी नहीं हो सकता

[01:12:08] है। समाज के अंतिम व्यक्ति तक सरकारी

[01:12:11] योजनाओं, नीतियों सहित विकास की पहुंच

[01:12:13] सुनिश्चित होना ही समावेशी विकास है।

[01:12:16] विकास की समाज के सभी वर्ग तक पहुंच

[01:12:18] समावेशन कहलाता है। दूसरे शब्दों में ऐसा

[01:12:21] विकास जो ना केवल नए आर्थिक अवसरों को

[01:12:24] पैदा करें बल्कि समाज के सभी वर्गों के

[01:12:27] लिए सजित ऐसे अवसरों को समान रूप से

[01:12:29] पहुंचा सके। सबसे अंतिम व्यक्ति तक जब

[01:12:32] चीजें पहुंचने लग जाती है तो समझ जाइएगा

[01:12:35] कि समावेशन हो गया, इंक्लूजन हो गया।

[01:12:38] जिसके पास कभी बैंक खाता नहीं था। अगर

[01:12:40] उसको बैंकिंग सुविधाएं मिल रही है। जिसको

[01:12:42] कभी सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिला। उसे

[01:12:45] सरकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है। वह

[01:12:47] अभागा था, गरीब था फिर भी नहीं मिल पाती

[01:12:49] थी। अगर जिसको कभी विकास में बेहतर

[01:12:52] शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं

[01:12:54] मिली लेकिन उनको मिल गई तो समझ जाइएगा कि

[01:12:57] आपने समावेशन करके दिखाया है। इसीलिए

[01:12:59] महात्मा गांधी कहते थे बड़े-बड़े पदों पर

[01:13:02] बैठे हुए लोगों से कि जब भी आपको यह कदम

[01:13:04] उठाते समय कंफ्यूज हो जाओ कि क्या यह कदम

[01:13:07] उठाना चाहिए या नहीं? तो आप अपनी जिंदगी

[01:13:09] का सबसे कमजोर व्यक्ति याद करिए। आपने

[01:13:12] अपनी जिंदगी में सबसे गरीब व्यक्ति जिसको

[01:13:14] देखा होगा। क्या आपके उस कदम से उस

[01:13:17] व्यक्ति की जिंदगी बदलेगी? अगर हां है तो

[01:13:20] आपको निश्चित ही वह काम करना चाहिए। ऐसा

[01:13:23] महात्मा गांधी ने सार्वजनिक पदों पर रहने

[01:13:25] वाले लोगों को सजेशन दिया था।

[01:13:29] इंक्लूसिव ग्रोथ में सोशल अफोर्डेबिलिटी

[01:13:32] एजुकेशन, क्वालिटी हेल्थ केयर, सोशल

[01:13:34] इक्विटी ट्रीटमेंट, जेंडर पेरिटी को खत्म

[01:13:36] करने की बातचीत होती है। फाइनेंशियल

[01:13:39] लिटरेसी, एग्रीकल्चर डेवलपमेंट, क्वालिटी

[01:13:42] एंप्ल एंप्लॉयमेंट की बातचीत होती है।

[01:13:44] लॉन्ग टर्म प्लानिंग की बातचीत करते हैं।

[01:13:46] ट्रांसपेरेंट एफिशिएंट गवर्नमेंट की

[01:13:49] बातचीत करते हैं। जिसमें वेस्टेज को कम

[01:13:51] किया जाता है। सस्टेनेबल डेवलपमेंट की

[01:13:53] बातचीत की जाती है। और स्टेक होल्डर में

[01:13:56] सरकार, प्राइवेट सेक्टर, नॉन गवर्नमेंटल

[01:13:58] ऑर्गेनाइजेशन सबको जोड़ा जाता है

[01:14:00] इंक्लूसिव ग्रोथ में। तो यह था पहला टॉपिक

[01:14:04] जिसका नाम हमने कंप्लीट किया बेसिक

[01:14:06] कांसेप्ट। अब हम बात कर रहे हैं दूसरा

[01:14:08] टॉपिक जिसका नाम है बैंकिंग एंड

[01:14:11] फाइनेंशियल मार्केट। आगे बढ़ने से पहले

[01:14:14] क्या स्पीड सेम है रखें या फिर कम कर दें?

[01:14:25] दूसरा टॉपिक स्टार्ट हो रहा है।

[01:15:03] ठीक चल रहा है सब कुछ।

[01:15:13] बहुत बढ़िया।

[01:15:19] जहां पर मुझे लगेगा कि चीजें थोड़ी टिपिकल

[01:15:22] होगी, मैं अपने आप थोड़ा स्लो स्पीड कर

[01:15:24] दूंगा। जहां लग रहा है कि चीजें ईजीली हल

[01:15:27] हो सकती है, वहां पर आप तेजी से थोड़ा कवर

[01:15:29] करते चलेंगे।

[01:15:38] कोई बात नहीं।

[01:15:42] आइए अब हम बात करने जा रहे हैं बैंकिंग और

[01:15:45] फाइनेंशियल मार्केट में जिसमें मनी मनी

[01:15:47] सप्लाई बैंकिंग सिस्टम मॉनिटरी पॉलिसी

[01:15:51] डेवलपमेंट बैंक और कोऑपरेटिव बैंक इसके

[01:15:53] अलावा नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां

[01:15:55] नॉन परफॉर्मिंग एसेट बेसल स्टैंडर्ड मनी

[01:15:59] मार्केट कैपिटल मार्केट स्टॉक एक्सचेंज और

[01:16:02] बैंकिंग से जुड़ी हुई शब्दावली की बातचीत

[01:16:04] करेंगे। एक बड़ा टॉपिक है रियल में

[01:16:06] प्रीलिम्स का बहुत बड़ा महत्वपूर्ण टॉपिक

[01:16:10] माना जाएगा।

[01:16:12] सबसे पहले बात करते हैं मनी की मुद्रा की

[01:16:15] करेंसी की। देखो मुद्रा होती क्या है? कोई

[01:16:18] भी ऐसी चीज कोई भी चीज ऐसा नहीं कि नोट की

[01:16:21] बात कर रहा हूं मैं। इस दुनिया में

[01:16:23] मुद्राएं कोई भी चीज हो सकती है। कुछ भी

[01:16:26] हो सकता है जिसके अंदर सबसे बड़ी चीज होनी

[01:16:29] चाहिए। मीडियम ऑफ एक्सचेंज का कैरेक्टर कि

[01:16:32] वह किसी चीज के एवज में आराम से लेनदेन के

[01:16:36] रूप में उपयोग की जा सकती है और जनता के

[01:16:39] द्वारा उसे एक्सेप्ट किया जा सके। कानूनी

[01:16:42] रूप से उसे स्वीकार किया जा सके। ऐसी कोई

[01:16:45] भी फिजिकल या वर्चुअल पहले केवल फिजिकल

[01:16:48] होता था। अब वर्चुअल भी आ गया है। वर्चुअल

[01:16:51] इसलिए क्योंकि अब डिजिटल चीजें भी वर्तमान

[01:16:53] में आ गई। जैसे डिजिटल करेंसी सेंट्रल

[01:16:56] बैंक डिजिटल करेंसी आने वाले टाइम में यह

[01:16:59] करेंसी बहुत यूज़ होगी। इसको आप कहीं से

[01:17:02] कहां तक प्रिंट नहीं करा पाएंगे। किसी

[01:17:04] एटीएम से निकाल नहीं पाएंगे। लेकिन आप

[01:17:07] इससे सामान खरीद पाएंगे। आप इसका उपयोग

[01:17:09] करके अपनी जरूरतों को पूरा कर पाएंगे

[01:17:12] क्योंकि वो मीडियम ऑफ एक्सचेंज का काम

[01:17:14] करेगा। जनरल सोशल एंड लीगल एक्सेप्टेंस भी

[01:17:17] उसके अंतर्गत रहेगा। ऐसी कोई भी चीज को हम

[01:17:20] कहते हैं कि वह करेंसी बन गई, मुद्राएं बन

[01:17:22] गई। सामान्य शब्द में मुद्रा विनिमय का

[01:17:26] माध्यम है। मीडियम ऑफ एक्सचेंज है। इसे हम

[01:17:28] करेंसी कहते हैं। यह एक ऐसा माध्यम है

[01:17:31] जिससे विभिन्न वस्तु और सेवाओं की कीमतों

[01:17:33] को व्यक्त किया जाता है। जैसे वर्तमान में

[01:17:36] हम अगर दुनिया भर में देखें तो जीडीपी जब

[01:17:38] हम कैलकुलेट करते हैं तो क्या ये कैलकुलेट

[01:17:41] करते हैं कि कितना क्विंटल गेहूं हमारे

[01:17:43] देश ने पैदा किया? अमेरिका ने पैदा किया

[01:17:45] नहीं। बल्कि हम उसकी कीमत तय करते हैं कि

[01:17:48] भाई गेहूं का कीमत इतना है तो इतना

[01:17:50] क्विंटल गेहूं का मतलब इतनी वैल्यू होगी।

[01:17:52] अमेरिका में इतना क्विंटल गेहूं मतलब इतनी

[01:17:54] वैल्यू का प्रोडक्शन हुआ। तो हम जीडीपी

[01:17:57] कैलकुलेशन में भी कीमतों को ही दर्शाते

[01:17:59] हैं। क्योंकि वर्तमान में हम हर चीज की

[01:18:02] कीमतों का फाइंड आउट कर सकते हैं वैल्यू।

[01:18:06] आर्थिक रूप से प्रत्येक सरकार ने

[01:18:08] अपनी-अपनी करेंसियां बनाई है। दुनिया भर

[01:18:10] में फाइनेंशियल अंतरराष्ट्रीय एक्सचेंज के

[01:18:12] लिए क्रिप्टो करेंसी जैसी चीजें भी अब

[01:18:14] उपयोग होने लग गई है। वस्तु विनिमय

[01:18:16] प्रणाली की अक्षमता के कारण धन की

[01:18:18] आवश्यकता ने जन्म लिया। बार्टर सिस्टम जो

[01:18:21] था कि एक वस्तु के एवज में दूसरी वस्तु

[01:18:23] जिसमें कई चैलेंजेस होते थे। आप जानते थे

[01:18:26] कि दोहरी दोहरा संयोग दोहरा संयोग मतलब

[01:18:29] मेरे पास जो वस्तु है मुझे जो प्राप्त

[01:18:31] करनी है और सामने वाले के पास जो वस्तु है

[01:18:34] उसे जो प्राप्त करना है वो बिल्कुल दोनों

[01:18:36] का मिलता है। मेरे पास टमाटर है। सामने

[01:18:38] वाले के पास प्याज है। प्याज वाले को भी

[01:18:41] टमाटर की जरूरत थी और टमाटर वाले को भी

[01:18:43] प्याज की जरूरत थी। ऐसा बहुत मुश्किल से

[01:18:45] होता है। कहने का अभिप्राय है कि यह थोड़ा

[01:18:47] मुश्किल होता है बार्टर सिस्टम में।

[01:18:50] बार्टर सिस्टम में कई चीजों के चैलेंजेस आ

[01:18:52] जाते हैं। वस्तु विनिमय प्रणाली के

[01:18:55] चैलेंजेस थे। सबसे पहला आवश्यकताओं के

[01:18:57] दोहरे सहयोग की कमी कि दो दो पक्षों के

[01:19:00] बीच वस्तु विनिमय होने के लिए दोनों

[01:19:02] पक्षों को वही होना चाहिए जो दूसरे को

[01:19:05] चाहता है। मूल्य का सामान्य माप का अभाव

[01:19:08] जैसे कि हम रुपए को आसानी से माप सकते

[01:19:10] हैं। हर जगह पर तुलनाएं नहीं की जा सकती।

[01:19:13] एक गाय की गेहूं के साथ, बकरी की चावल के

[01:19:16] साथ तुलना नहीं की जा सकती है। इसलिए उनके

[01:19:19] मूल्यों का एक दूसरे के खिलाफ मूल्यांकन

[01:19:21] बहुत मुश्किल होता है। वस्तु विनिमय

[01:19:23] अर्थव्यवस्था में यह सबसे बड़ा ड्रॉबैक

[01:19:26] माना जाता है। और कुछ ऐसी वस्तुएं होती है

[01:19:28] जिनको टूटने के बाद उनकी कीमत खत्म हो

[01:19:31] जाती है। जैसे अगर एक बकरी को काट दिया

[01:19:34] जाएगा तो उसकी कीमत लगभग अब खत्म हो

[01:19:36] जाएगी। मतलब वो उसकी कीमत भविष्य में कुछ

[01:19:39] नहीं रहेगी। अभी जो बिक जाएगा वही रहेगा।

[01:19:41] हीरे की बात करें। हीरे को जितना छोटे

[01:19:44] हिस्सों में तोड़ोगे तो बड़ा हीरा ₹1 लाख

[01:19:47] का है। उसके दो टुकड़े कर दीजिए। तो अब वो

[01:19:50] दो टुकड़े 5-प लाख के नहीं होंगे। अब वो

[01:19:52] दो टुकड़े एक एक लाख के बिकेंगे। क्योंकि

[01:19:55] जैसे-जैसे हीरों का आकार छोटा होता है।

[01:19:58] कैरेट छोटा होता है। कैरेट छोटा होता है

[01:20:00] तो हीरे की कीमत कम होती चली जाती है। तो

[01:20:03] कुछ चीजें टूटने के बाद उतनी वैल्यू नहीं

[01:20:06] रख पाती जितनी कि शुरुआत में थी। बार्टर

[01:20:09] सिस्टम में यही एक बड़ा प्रॉब्लम है।

[01:20:12] विनिमय की वस्तु विनिमय प्रणाली उस पर

[01:20:14] लागू नहीं होती जो वस्तुओं के मामले में

[01:20:16] भागों में विभाजित होने पर अपना मूल्य खो

[01:20:18] देती है। जैसे गाय का मूल्य दो बकरियों के

[01:20:20] बराबर होता है। इसका तात्पर्य हुआ कि यदि

[01:20:22] किसी व्यक्ति को गाय के बदले में एक बकरी

[01:20:24] की आवश्यकता है तो ऐसी स्थिति में उसे

[01:20:27] अपनी आधी गाय का त्याग करना पड़ेगा। ऐसा

[01:20:29] संभव ही नहीं है। आधी गाय की कोई वैल्यू

[01:20:31] नहीं रहेगी।

[01:20:33] अस्थगित भुगतान एक प्रकार से डिफेंडर

[01:20:36] डिफरेंट पेमेंट्स वे भुगतान जो भविष्य के

[01:20:39] लिए किए जाते हैं जैसे ऋण ब्याज ये कैसे

[01:20:41] चुकाए जाएंगे बार्टार्टर सिस्टम में इसका

[01:20:44] कोई कैलकुलेरिटी नहीं होती है और इसी कारण

[01:20:46] से फिर मुद्रा की जरूरत पड़ी कि भ एक ऐसी

[01:20:49] चीज होनी चाहिए जिससे मुद्रा का विकास हो

[01:20:51] सकता है। इस दुनिया में सबसे पहले मुद्रा

[01:20:54] का काम किसी कमोडिटी वाली वस्तु ने ही

[01:20:57] किया। जैसे नमक, चावल, गेहूं, गाय, बकरी

[01:21:01] यही मुद्रा के रूप में यूज़ होने लगी थी।

[01:21:03] मुद्रा के रूप में याद रखना बार सिस्टम

[01:21:06] में एक वस्तु के एवज में दूसरी वस्तु

[01:21:08] प्राप्त हो रही है और हर बार

[01:21:10] वस्तु-वस्तुएं बदल रही हैं। लेकिन करेंसी

[01:21:13] के रूप में जब हम वस्तु का उपयोग करेंगे।

[01:21:15] जैसे बकरी [नाक से की जाने वाली आवाज़]

[01:21:18] मान लीजिए कि बकरी एक करेंसी के रूप में

[01:21:20] यूज़ कैसे होगी? बकरी को देकर हमने अनाज

[01:21:23] खरीदा। बकरी को देकर हमने कपड़े खरीदे।

[01:21:26] बकरी को देकर हमने बाकी चीजें खरीदी और

[01:21:28] बाकी लोग बकरी को आराम से ले रहे हैं

[01:21:30] क्योंकि वह भी बकरी को यूज करके कुछ दूसरा

[01:21:33] सामान बकरी हर जगह पर यूज की जा रही होगी

[01:21:36] तब हम कहेंगे कि इस बकरी को आप बकरी ना

[01:21:39] कहिए करेंसी कहिए। तो शुरुआत में किसी

[01:21:42] वस्तु को करेंसी के रूप में उपयोग किया

[01:21:45] गया था। नमक, चावल, गेहूं, गाय इनका उपयोग

[01:21:49] करेंसी के रूप में होने लगा था। पर यह

[01:21:52] बार्टर सिस्टम नहीं था। बार्टर सिस्टम में

[01:21:54] बकरी के एवज में फिर मान लीजिए चावल खरीद

[01:21:57] लिया तो खत्म के एक्सचेंज। अब बकरी का यूज़

[01:22:00] नहीं होगा। अब फिर अगली जगह हम टमाटर

[01:22:02] खरीदने गए तो टमाटर की जगह पर हमने कोई

[01:22:05] दूसरी चीज दी होगी। लेकिन जब हम एक ही चीज

[01:22:07] का उपयोग करते हुए बाकी चीजों को प्राप्त

[01:22:10] कर पाएंगे तब जाकर वह वस्तु करेंसी के

[01:22:12] जैसा काम करती है। तो शुरुआत में बार्टर

[01:22:15] सिस्टम के बाद वस्तुओं को करेंसी के रूप

[01:22:17] में उपयोग करने लगे। फिर धातुएं आने लगी

[01:22:20] तो धातुओं का उपयोग मूल्य मापन और

[01:22:23] एक्सचेंज के लिए आसानी से होने लगा

[01:22:25] क्योंकि धातुओं को कहीं ना कहीं डिवाइड तो

[01:22:27] आसानी से कर सकते थे। एक जगह से दूसरी जगह

[01:22:30] ले जा सकते थे। पंचमार्क सिक्के, टंका,

[01:22:33] जीतल जैसी चीजें प्रचलित हुई। टंका और

[01:22:35] जीतल जरा बताना कौन सी धातुओं को कहते थे।

[01:22:38] फिर कागजी मुद्राएं आने लग गई। जहां एक

[01:22:41] सेंट्रल बैंक भरोसे के साथ जारी करती है

[01:22:43] कि मैं धारक को वचन देता हूं कि इतने रुपए

[01:22:46] की यह वैल्यू मैं उसे कभी भी उपलब्ध

[01:22:48] कराऊंगा। जैसे हमारे देश में आरबीआई निकट

[01:22:51] मुद्रा निकट मुद्रा मतलब वो एक्चुअल में

[01:22:53] करेंसी नहीं होती लेकिन करेंसी जैसी होती

[01:22:55] है जैसे कि बैंक जमा और चेक अगर जब हम चेक

[01:22:59] किसी को दे देते हैं तो लोग अब भरोसे के

[01:23:01] साथ ले लेते हैं कि ठीक है भाई ₹ लाख का

[01:23:04] चेक मतलब ₹3 लाख मुझे दे दिए केवल भरोसे

[01:23:06] के ऊपर प्लास्टिक मुद्रा नगदी के विकल्प

[01:23:10] के रूप में डेबिट और क्रेडिट कार्ड आजकल

[01:23:12] लिए जाने लगे नगदी का भी टेंशन ना रहे तो

[01:23:14] इसको प्लास्टिक करेंसी कहते हैं और अब

[01:23:17] डिजिटल करेंसी आ गई है जो स्मार्टफोन

[01:23:19] इंटरनेट के माध्यम से लेनदेन की जा सकती

[01:23:21] है। वर्चुअल करेंसी जैसे क्रिप्टो करेंसी

[01:23:24] हो गई जिसको हम फिजिकली प्राप्त नहीं कर

[01:23:26] सकते हैं। सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी हो

[01:23:28] गई। सीबीडीसी हो गई जिसको हम वर्चुअल

[01:23:31] करेंसी के रूप में मानते हैं। इस तरीके से

[01:23:34] धीरे-धीरे कमोडिटी करेंसी से हम मेटल पर

[01:23:36] आए। मेटल से फिर पेपर पर आए। पेपर से फिर

[01:23:39] नियर करेंसी पर आए। फिर प्लास्टिक करेंसी

[01:23:41] पर आए। जैसे-जैसे समय-समय के अनुसार लोगों

[01:23:44] ने अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए

[01:23:46] विकल्प ढूंढना शुरू किया।

[01:23:49] क्रिप्टो करेंसी एक डिजिटल या वर्चुअल

[01:23:52] करेंसी होती है जो सुरक्षा के लिए

[01:23:54] क्रिप्टोग्राफी का उपयोग करती है।

[01:23:55] क्रिप्टोग्राफी का मतलब एक ऐसी टेक्नोलॉजी

[01:23:58] जो लेनदेन वाले लोगों के अलावा किसी थर्ड

[01:24:00] पर्सन तक नहीं पहुंचती। जिस पर

[01:24:03] क्रिप्टोग्राफी का मतलब होता है

[01:24:04] इंक्रिप्टेड होना। जो एक विशेष प्रकार के

[01:24:08] सिक्योरिटी के अंतर्गत दो लोगों के बीच

[01:24:10] में ही पता चलता है। इस दुनिया में जितनी

[01:24:13] भी करेंसियां होती है उन सभी करेंसी में

[01:24:15] कोई मध्यस्थ होता है। जैसे सरकार क्योंकि

[01:24:18] आप रुपया क्यों ले रहे हैं? 500 का नोट,

[01:24:20] 200 का नोट, 100 का नोट एक्सेप्ट क्यों कर

[01:24:23] रहे हैं? क्योंकि सरकार ने भरोसा दिलाया

[01:24:24] है। लेकिन क्रिप्टो करेंसी में किसी सरकार

[01:24:27] का कोई भरोसा नहीं होता है। फिर भी लोग

[01:24:30] आपस में विश्वास है। जैसे जितने भी अंडरवर

[01:24:33] में काम करने वाले लोग हैं, जितने भी काले

[01:24:35] धंधे करने वाले लोग हैं उनके बीच में

[01:24:37] क्रिप्टो करेंसी काफी प्रचलित हो रही है।

[01:24:40] क्योंकि वह सरकार से अपने लेनदेन को

[01:24:42] छिपाना चाहते थे और इसमें सरकार का कोई

[01:24:44] रोल नहीं होता है। यह वर्चुअल करेंसी है

[01:24:47] जो नए प्रकार से वर्ष 2010 के बाद

[01:24:49] धीरे-धीरे विकसित होने लगी है। इसमें

[01:24:52] बिटकॉइन जैसी जो करेंसी है काफी चर्चा में

[01:24:55] है। एथेरियम जैसी करेंसी काफी चर्चा में

[01:24:58] रही है। लाइटकॉइन, रिपल यह ऐसी करेंसी है

[01:25:01] जो मार्केट में खरीदी बेची जा रही है और

[01:25:03] सरकार का कोई कंट्रोल नहीं होता। दुनिया

[01:25:06] की किसी सरकार का इस पर कोई कंट्रोल नहीं

[01:25:08] होता। यह एल्गोरिदम पर बेस्ड हो सकती है।

[01:25:11] यह किसी भी व्यक्ति के द्वारा गोल्ड के

[01:25:13] एवज में बनाई जा सकती है। यह चलते रहता

[01:25:15] है। भारत सरकार ने इस तरीके का ऑफिशियल

[01:25:18] करेंसी बनाया जिसको हम भारत सरकार की

[01:25:21] क्रिप्टो करेंसी कहेंगे। इंडिया ल्च

[01:25:23] सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी सीबीडीसी और

[01:25:26] डिजिटल रुपया और ई रुपया ऑन दिसंबर वन

[01:25:30] 2022। हमारे देश में भी सरकार ने अपना

[01:25:33] ऑफिशियल क्रिप्टो करेंसी लांच किया है।

[01:25:35] लेकिन वो बड़े स्तर पर अभी उपयोग नहीं हो

[01:25:37] रहा है। सरकार ने कुछ योजनाएं बनाई है

[01:25:40] फिलहाल में कुछ डिस्ट्रिक्ट में जहां

[01:25:42] लोगों को डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर जो

[01:25:45] किया जाएगा जैसे राशन खरीदने के लिए सरकार

[01:25:48] कुछ लोगों के परिवार वालों को नगदी देती

[01:25:50] थी। अब नगदी नहीं देगी बल्कि ई रुपया देगी

[01:25:53] और उस रुपए का उपयोग केवल और केवल वह राशन

[01:25:56] खरीदने के लिए कर सकेंगे। उससे वह बाकी

[01:25:58] चीजें नहीं खरीद पाएंगे। तो सही तरीके से

[01:26:01] वस्तुओं का सही तरीके से करेंसी का उपयोग

[01:26:04] गरीब लोगों तक हो पाएगा। तो हमारे देश में

[01:26:07] ई रुपए का शुरुआत 2022 1 दिसंबर को हुआ

[01:26:11] था।

[01:26:13] तो सबसे पहले बार्टर सिस्टम आया। बार्टर

[01:26:16] सिस्टम के बाद फिर क्ल क्ले करेंसी भी आई

[01:26:18] मिट्टी से बनी हुई। लेकिन फिर उसमें

[01:26:20] प्रॉब्लम आई होगी। फिर धातु वाले सिक्के

[01:26:23] आए होंगे जिनको आहत कॉइंस कहते थे। फिर

[01:26:26] उसके बाद मेटल कॉइंस। मेटल कॉइन के बाद

[01:26:29] पेपर, पेपर के बाद प्लास्टिक मनी और अब

[01:26:31] वर्चुअल मनी तक हम पहुंच चुके हैं। तो

[01:26:34] वस्तु विनिमय प्रणाली के बाद मिट्टी की

[01:26:36] मुद्रा, आहत सिक्के, धातु के सिक्के, कागज

[01:26:39] वाली करेंसी आई, प्लास्टिक मनी और अब

[01:26:41] वर्चुअल करेंसी पर हम पहुंच चुके हैं।

[01:26:43] मुद्रा करती क्या है? मेन उसके जो काम है,

[01:26:46] मीडियम ऑफ एक्सचेंज है। भाई, खरीददारी,

[01:26:48] लेनदेन करने में बहुत महत्वपूर्ण है। सबसे

[01:26:50] पहला मीडियम ऑफ एक्सचेंज है और दूसरा है

[01:26:53] मूल्य का मापन। ये इंपॉर्टेंट है। ध्यान

[01:26:55] से सुनना। इस दुनिया में करेंसी के दो

[01:26:58] बड़े काम है। पहले तो लेनदेन में यूज़

[01:27:00] होगी। दूसरा वो कीमत तय अच्छे करती है कि

[01:27:02] भ मास्टर की फीस क्या होगी? डिसाइड रुपए

[01:27:05] में हुआ। डॉक्टर की फीस क्या होगी? डिसाइड

[01:27:08] रुपए में हो गया। या जो भी देश में जो

[01:27:10] करेंसी होगी उसके अकॉर्डिंग गेहूं क्या

[01:27:12] भाव होगा? रुपए में तय हो जाएगा। कोई चीज

[01:27:15] महंगी होगी, कौन सी चीज सस्ती होगी, कौन

[01:27:18] सी चीज पर ज्यादा अमाउंट देना पड़ेगा? ऐसी

[01:27:21] सारी चीजों का वैल्यू मेजर करने का तरीका

[01:27:23] अगर कोई है तो वो करेंसी के माध्यम से ही

[01:27:26] है। तो करेंसी का दूसरा मेन काम क्या है?

[01:27:29] वैल्यू का मेजरमेंट करना। कौन सस्ता, कौन

[01:27:32] महंगा यह सब के सब रुपए या करेंसी के कारण

[01:27:36] डिसाइड होता है। तो मीडियम ऑफ एक्सचेंज

[01:27:38] जिसकी मदद से आप लेनदेन कर सकते हैं जिसकी

[01:27:41] मदद से आप किसी चीज को डिटरमाइन कर सकते

[01:27:43] हैं। लेकिन इसके अलावा भी रुपए या

[01:27:46] करेंसियां और भी कई काम करती है। जैसे

[01:27:49] किसी ने उधार लिया था। उसका भुगतान करने

[01:27:51] में भी करेंसी बहुत मदद करती है क्योंकि

[01:27:54] उसे पता रहता है कितने टाइम बाद उधार देना

[01:27:57] है कितना ब्याज देना है उस पे कितना चार्ज

[01:28:00] देना पड़ेगा कोई व्यक्ति पैसा जमा करके

[01:28:03] रखना चाहता है अपनी सात पीढ़ियों के लिए

[01:28:05] तो वह भी करेंसी के रूप में करके रख सकता

[01:28:07] है जैसे शाहरुख खान ने बहुत बड़ा एफडी बना

[01:28:10] के रखा होगा कई सारे लोगों ने एफडीआई बना

[01:28:13] के रखी होगी और आने वाली जनरेशन को वह जो

[01:28:16] संपत्तियां देता है वह भी एक प्रकार से

[01:28:18] मूल्य के रूप में आसानी से हो पाता है। तो

[01:28:21] यह करेंसी के वो काम है जो सेकेंडरी है

[01:28:23] उतने ज्यादा इंपॉर्टेंट नहीं। लेकिन हां

[01:28:25] मूल करेंसी यह भी काम करती है

[01:28:30] और इमरजेंसी में कभी किसी को जरूरत पड़

[01:28:33] जाए तो करेंसी के कारण आसानी से वह

[01:28:35] व्यक्ति अपने जरूरतों को पूरा कर पाता है।

[01:28:38] कहीं पर अमीरी गरीबी का डिसीजन लेना हो तो

[01:28:40] इसमें बड़ी मदद होती है। कहीं पर भी बाजार

[01:28:43] में रौनक बढ़ानी हो तो यह काम करने में भी

[01:28:45] करेंसी मदद करती है। अगर मा सप्लाई ज्यादा

[01:28:48] बढ़ जाएगा करेंसी का तो लोगों के जेब में

[01:28:50] पैसा पहुंचेगा। कहीं ना कहीं लोगों की

[01:28:53] भावी निर्णय लेने में एक प्रकार से डिजायर

[01:28:56] के लिए पुरफिर करने में करेंसियां मदद

[01:28:58] करती है। तो हम कह सकते हैं कि बहुत से और

[01:29:01] भी काम करती है। लेकिन कुछ याद रखो ना

[01:29:03] रखो। दो काम जिंदगी में हमेशा याद रखना।

[01:29:05] करेंसी के दो मेन काम है। एक तो एक्सचेंज

[01:29:08] मीडियम ऑफ एक्सचेंज और एक दूसरी तरफ

[01:29:10] वैल्यू का फाइंड आउट करना। मुद्रा के गुण

[01:29:14] क्या होते हैं? वह आसानी से एक प्रकार से

[01:29:17] प्रतिस्थापित हो सकती है। किसी वस्तु की

[01:29:19] जगह पर स्टेबिलिटी होती है। बार-बार उसका

[01:29:22] उपयोग किया जा सकता है। एक जगह से दूसरी

[01:29:24] जगह ले जा सकते हैं। छोटे मापन में उसे

[01:29:26] बदला जा सकता है। ₹500 के आसानी से खुले

[01:29:29] किए जा सकते हैं। और एक प्रकार से उनमें

[01:29:32] उतार-चढ़ाव उतना तेजी से नहीं होता है।

[01:29:34] जैसे बकरी की कीमतें, प्याज की कीमतें,

[01:29:37] चावल की कीमतें बहुत तेजी से बढ़ती जाती

[01:29:39] होगी, घटती होगी लेकिन रुपए में करेंसी की

[01:29:42] कीमत उतनी तेजी से नहीं बदलती। उसका

[01:29:44] ड्रॉबैक क्या है? इसी कारण से इस दुनिया

[01:29:46] में अगर करेंसी नहीं आती तो अमीर गरीब

[01:29:50] नहीं होते।

[01:29:52] अमीर गरीब की इनकलिटी को जन्म देती है

[01:29:54] करेंसी ही। कहीं ना कहीं यह पूंजीवाद के

[01:29:58] जितने दोष होते हैं कि अमीर और अमीर होता

[01:30:00] जा रहा है। गरीब और गरीब होता जा रहा है।

[01:30:02] ये सब करेंसी के कारण है। लोगों का नैतिक

[01:30:04] पतन करेंसी के कारण हुआ। लोग अनैतिक हुए,

[01:30:07] भ्रष्टाचारी हुए, लालची हो गए, गलत काम

[01:30:10] करने लग गए, हत्याएं करने लग गए। इस

[01:30:13] करेंसी की ही देन है। मुद्रा के मूल्य में

[01:30:15] अनस्टेबिलिटी कीमतों का बढ़ना, कीमतों का

[01:30:18] घटना आजकल करेंसी से बहुत प्रभावित होता

[01:30:20] है और कई बार लोग कर्जे में डूब जा रहे

[01:30:23] हैं। जरूरत से ज्यादा खर्च करने लग गए

[01:30:25] हैं। यह सब करेंसी के दोष ही हैं। इसने

[01:30:28] कहीं ना कहीं समाज को पतन की ओर लेकर गए

[01:30:31] हैं। यहां पर ग्रीशम भाई साहब का नियम

[01:30:34] आपको याद रखना चाहिए। ग्रेशम भाई साहब

[01:30:36] कहते हैं कि खराब करेंसी अच्छी करेंसी को

[01:30:39] सर्कुलेशन से बाहर कर देती है। बड़ा सिंपल

[01:30:42] सा है। मैं इसको पहले बता देता हूं। खराब

[01:30:44] करेंसी कई प्रकार की हो सकती है। खराब

[01:30:46] मतलब ब्लैक मनी काला धन। जनरली व्यक्ति के

[01:30:50] पास वास्तविक रूप से टैक्स जमा किया हुआ

[01:30:53] पैसा भी है और चोरी का पैसा भी है। बिना

[01:30:56] टैक्स वाला पैसा भी है। तो व्यक्ति पहले

[01:30:58] चोरी वाले पैसों से ही चीजें खरीदेगा। और

[01:31:01] इस कारण से सर्कुलेशन में वो करेंसी

[01:31:04] ज्यादा यूज होगी। अच्छी करेंसी जो थी

[01:31:06] पॉजिटिव अच्छी वाइट मनी जो था वो यूज ही

[01:31:08] नहीं करेगा। वो सेविंग करके रखेगा। इसे

[01:31:10] ऐसे समझ लीजिए कि आपके जेब में एक अच्छा

[01:31:12] नोट और खराब नोट है। तो पहले आप खराब नोट

[01:31:15] को मार्केट में चलाओगे फिर अच्छे नोट को

[01:31:17] चलाओगे। ग्रेशम साहब कहते हैं कि किसी भी

[01:31:20] इकॉनमी में जो खराब करेंसी होती है जो

[01:31:22] बुरी करेंसी होती है फिर वो इललीगल मनी हो

[01:31:25] सकता है वो ब्लैक मनी हो सकता है या फिर

[01:31:28] ऐसा मनी हो सकता है जिसे सरकार ने मान्यता

[01:31:30] ना दी हो वो ज्यादा सर्कुलेशन में चले गए

[01:31:33] और अच्छी करेंसी पिछड़ जाएगी वो सर्कुलेशन

[01:31:36] में नहीं चल पाती है। जैसे अगर हम बात

[01:31:38] करें तो हमारे देश में आप देख सकते हैं कि

[01:31:41] लोग ब्लैक मनी को पहले यूटिलाइज करना

[01:31:44] चाहते वो भी ग्रेशम साहब के कारण ही।

[01:31:47] ग्रेशम का नियम कहता है कि बुरी मुद्रा

[01:31:50] अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है।

[01:31:52] बुरे लोग अच्छे लोगों को चलन से बाहर कर

[01:31:55] देते हैं। YouTube पर अच्छा ज्ञान देना

[01:31:57] बहुत मुश्किल से आपके व्यू आएंगे। लेकिन

[01:32:00] YouTube पर बकवास कर दीजिए। सनसनीखे गंदी

[01:32:03] बातें कर लीजिए। आप बहुत जल्दी प्रचलित हो

[01:32:06] जाएंगे। जब भी एक ही मूल्य के धातु के

[01:32:09] सिक्कों के साथ कीमती धातु वाले सिक्कों

[01:32:11] का उपयोग किया जाता है तो दोनों कानूनी

[01:32:13] निविदा के रूप में कार्य करते हैं तो अधिक

[01:32:15] मूल्यवान धातु धीरे-धीरे प्रचलन से गायब

[01:32:17] हो जाती है। जैसे एक एग्जांपल लीजिए। मान

[01:32:20] लीजिए मैंने ₹5 का सिक्का बनाया। ₹5 के दो

[01:32:23] टाइप के सिक्के बनाए। एक ₹5 का ऐसा सिक्का

[01:32:26] है जिसको अगर हम पिघलाएंगे तो शायद ₹5 ₹6

[01:32:31] की धातु प्राप्त हो जाएगी। और अगर हमने एक

[01:32:34] ऐसी ₹5 का सिक्का बनाया जिसको पिघलाने से

[01:32:37] 50 पैसे भी नहीं मिल पाएंगे तो आप देखना

[01:32:40] कि यह जो सिक्का जो सिक्के वाली धातु थी

[01:32:43] जो महंगी धातु से बना था वो लोग प्रचलन

[01:32:46] में नहीं आने देंगे जिसके पास पहुंचेगा वो

[01:32:48] उसको संग्रहित कर लेगा और जो खराब करेंसी

[01:32:51] है जिसकी कीम कम कीमत थी केवल वही

[01:32:54] सर्कुलेट होती जाएगी इसे कहते हैं ग्रेशम

[01:32:56] का नियम ग्रेशम भाई साहब कहते हैं कि बुरे

[01:32:59] लोग ज्यादा चलते हैं अच्छे लोग कम चलते

[01:33:02] हैं यह कहावत कही जाती है कि सच जब तक

[01:33:05] अपने जूते पहन रहा होता है झूठ आधा शहर

[01:33:08] घूम कर आ जाता है। ग्रेशम साहब भी कुछ ऐसी

[01:33:11] बातचीत करना चाहते हैं।

[01:33:15] कुछ मनी के शब्द ध्यान से सुन लीजिए। यह

[01:33:17] शब्द पूछे जाते हैं। फिएट मनी से तात्पर्य

[01:33:20] सरकार द्वारा जारी किए गए धन से है जो

[01:33:22] सोने और चांदी जैसे किसी भौतिक वस्तु या

[01:33:25] समर्थ द्वारा समर्थित नहीं होती बल्कि उसे

[01:33:27] जारी करने वाले सरकार के द्वारा समर्थित

[01:33:30] होती है। जैसे हमारे देश में वास्तविक रूप

[01:33:32] में सरकार ने केवल ₹200 करोड़ का ही धन

[01:33:36] रखा हुआ है। जिसमें ₹15 करोड़ का लगभग

[01:33:38] सोना रखा हुआ है। लेकिन आज हमारे देश में

[01:33:42] कई अरब रुपए छापे जा चुके हैं। तो क्या

[01:33:46] सरकार ने कोई पैसा या उसके एवज में सोना

[01:33:49] चांदी रखा है? बिल्कुल भी नहीं। बस भरोसे

[01:33:51] पर चल रहा है भाई। तो जब कोई करेंसी केवल

[01:33:55] सरकार के सपोर्ट के द्वारा उत्पन्न हो

[01:33:57] जाती है तो उसे कहते हैं फिएट करेंसी।

[01:34:00] भारत में जितने भी करेंसी वर्तमान में

[01:34:02] छापी जा रही है वो लगभग फिएट करेंसी है जो

[01:34:05] केवल सरकार के समर्थन सरकार के भरोसे से

[01:34:08] चल रही है। फुल बॉडी मनी मुद्रा की कोई भी

[01:34:12] इकाई जिसका अंकित मूल्य और आंतरिक मूल्य

[01:34:15] बराबर होता है उसे पूर्ण मुद्रा कहते हैं।

[01:34:17] पूर्ण मुद्रा ऐसी करेंसी होती है कि जिस

[01:34:20] पर मान लीजिए जो चीज छपी है वह गायब भी हो

[01:34:22] जाए तब भी उसकी वैल्यू उतनी रहेगी। जैसे

[01:34:25] ₹500 का नोट है। ₹500 का नोट पर कुछ नाम

[01:34:29] मिट जाए तो वो नोट चलेगा नहीं। अब वो

[01:34:32] बेकार है। वो फुल बॉडी मनी है। फुल बॉडी

[01:34:35] मनी नहीं है। लेकिन इमेजिन करिए चांदी का

[01:34:37] सिक्का है। चांदी के सिक्के पर लिखा हुआ

[01:34:40] था ₹200। ₹200 लिखा था और उसकी ओरिजिनल

[01:34:43] कीमत भी उतनी ही थी। तो हम उसे कहेंगे कि

[01:34:46] भाई वो फुल बॉडी मनी है। उस पर 200 नहीं

[01:34:48] भी लिखते तब भी चांदी के दुकान पर वो ₹200

[01:34:51] का ही बिकता। तो अगर कोई ऐसी करेंसी है

[01:34:54] जिसकी इंटरनल वैल्यू और एक्सटर्नल वैल्यू

[01:34:56] सेम है तो हम उसे फुल बॉडी करेंसी के रूप

[01:34:59] में कहते हैं कि उसका फेस वैल्यू और उसकी

[01:35:01] रियल वैल्यू सेम ही है। हॉट मनी हॉट वर्ड

[01:35:04] जब भी आएगा तो याद रखना ऐसी करेंसी जो

[01:35:08] रुकती नहीं है। कहीं भी चली जाती है तेजी

[01:35:11] से। दुनिया भर के शेयर मार्केट जो

[01:35:13] उतार-चढ़ाव दिखाते वो इस हॉट करेंसी के

[01:35:16] कारण जिसमें ठहरने की क्षमताएं कम होती है

[01:35:19] जो आसानी से एक जगह से दूसरी जगह चली जाती

[01:35:22] है। हॉट मनी वह करेंसी होती है जिसमें

[01:35:25] निवेशक उच्चतम अल्पकालिक ब्याज दरों से

[01:35:27] लाभ उठाने के लिए नियमित रूप से

[01:35:29] अर्थव्यवस्था और फाइनेंशियल मार्केट के

[01:35:32] बीच ले जाते हैं। अधिकतर हॉट मनी का सिंपल

[01:35:35] सा मतलब यह है कि ऐसी करेंसी जिसमें ठहरने

[01:35:38] की क्षमताएं नहीं होती है। वह तेजी से

[01:35:40] कमाई करने के लिए कभी भारत के शेयर

[01:35:43] मार्केट में कभी अमेरिका के शेयर मार्केट

[01:35:45] में कहीं भी जा सकती है।

[01:35:48] एक होती है हेलीकॉप्टर मनी। हेलीकॉप्टर

[01:35:50] मनी या हेलीकॉप्टर ड्रॉप का तात्पर्य अधिक

[01:35:53] व्यय, कर, कटौती आदि जैसे उपायों के

[01:35:55] माध्यम से अर्थव्यवस्था में धन की आपूर्ति

[01:35:58] बढ़ाना। अगर कोई देश में अर्थव्यवस्थाएं

[01:36:02] रुक सी गई हो तो उसे हेलीकॉप्टर मनी के

[01:36:05] द्वारा प्रमोट किया जाता है। सरकार टैक्स

[01:36:08] कम कर देती है। मतलब जेब में पैसा ज्यादा

[01:36:11] रहे। जेब में पैसा ज्यादा रहेगा। मार्केट

[01:36:13] में लोग खरीदारी ज्यादा करेंगे तो एक रौनक

[01:36:15] आ जाएगी। यहां तक कि सरकार खुद भी बहुत

[01:36:18] खर्चा करती है। बड़े-बड़े पुल बनाने के

[01:36:20] प्रोजेक्ट, सड़कें बनाने के प्रोजेक्ट

[01:36:22] लेकर आ जाती है ताकि बाजार में सर्कुलेशन

[01:36:25] बढ़ाया जा सके। जब कहीं पर इस तरीके से

[01:36:28] जोड़ जबरदस्ती से मार्केट में पैसों को

[01:36:30] बढ़ाने की कोशिशें की जाती हैं तो उसको

[01:36:33] हेलीकॉप्टर मनी या हेलीकॉप्टर ड्रॉप कहा

[01:36:36] जाता है। ताकि अर्थव्यवस्था को

[01:36:38] प्रोत्साहित किया जा सके। हो सकता है

[01:36:40] अर्थव्यवस्था दुखी और शांत हो गई हो।

[01:36:45] फिर एक होता है हार्ड मनी और सॉफ्ट मनी।

[01:36:48] हार्ड मनी ऐसी करेंसी जिसका डिमांड ज्यादा

[01:36:51] और सप्लाई कम होती है। इनकी बाजार में

[01:36:54] कीमतें ज्यादा होती है। जैसे डॉलर, यूरो,

[01:36:57] पाउंड ये ऐसी करेंसियां होती है जिनकी

[01:37:00] मार्केट में डिमांड ज्यादा है। जैसे सऊदी

[01:37:02] अरब का रियाल, जैसे दुबई या अन्य देशों का

[01:37:06] दीार ऐसी करेंसियां जिनकी डिमांड बहुत

[01:37:09] ज्यादा है। दुनिया भर में हर देश उसको

[01:37:10] खरीदना चाहता है क्योंकि उसके आधार पर वो

[01:37:13] शायद उससे कुछ खरीदेगा दुनिया भर में और

[01:37:16] सॉफ्ट करेंसी ऐसी करेंसी होती है जिसकी

[01:37:18] डिमांड कम होती है पर सप्लाई ज्यादा होता

[01:37:20] है।

[01:37:23] जैसे वर्तमान में भारतीय रुपया जिसकी

[01:37:25] डिमांड नहीं हो रही क्योंकि दुनिया भर के

[01:37:27] लोग इसकी मांग नहीं कर पा रहे हैं। मांग

[01:37:29] इसलिए नहीं करेंगे क्योंकि हम उन्हें भारत

[01:37:31] से कुछ खरीदना नहीं है ज्यादा।

[01:37:36] तो ऐसी करेंसी जिसकी डिमांड ज्यादा और

[01:37:39] सप्लाई कम होता है हार्ड मनी कहलाता है।

[01:37:42] ऐसी करेंसी जिसकी डिमांड कम और सप्लाई

[01:37:45] ज्यादा होती है सॉफ्ट करेंसी कहलाती है।

[01:37:48] फिर है फेस वैल्यू। फेस वैल्यू मुद्रा के

[01:37:50] उस मूल्य को कहते हैं जो उस मुद्रा पर

[01:37:52] अंकित होता है। ₹500 के नोट पर ₹200 के

[01:37:54] नोट पर जो वैल्यू छपी है वह उसकी फेस

[01:37:57] वैल्यू कहलाती है। और मेटल वैल्यू जिससे

[01:37:59] वह मिलकर बना है। कागज के नोट की कोई

[01:38:01] वैल्यू नहीं होती। वो तो केवल फेस वैल्यू

[01:38:03] के कारण होता है। यह है सिनेरेज।

[01:38:07] यह ध्यान से सुनना। हमारी माननीय यूपीएससी

[01:38:11] ने एक साल के बाद आंसर की जारी की है।

[01:38:15] उसमें इस प्रश्न पर बड़ा विवाद है।

[01:38:18] सिनेरियो यह बातचीत ध्यान से सुनिएगा।

[01:38:21] इसका कांसेप्ट बहुत इंपॉर्टेंट है। फिर भी

[01:38:24] हमारी संस्था मानने को तैयार नहीं है।

[01:38:27] आरबीआई के द्वारा किसी भी मूल्य के नोट को

[01:38:30] छापने में लगने वाले खर्च और उस नोट के

[01:38:32] अंकित मूल्य के बीच के अंतर को सिनी यरेज

[01:38:36] कहा जाता है। यह आरबीआई की कमाई होती है।

[01:38:39] मुझे बताइए ₹500 के नोट को छापने के लिए

[01:38:43] आरबीआई को कितना खर्चा होता होगा? ज्यादा

[01:38:45] से ज्यादा ₹20 कलर को ध्यान में रखते हुए

[01:38:49] प्रिंटिंग को ध्यान में रखते हुए ₹20

[01:38:51] मैक्सिमम इतना तो लगता नहीं फिर भी पकड़

[01:38:53] लेते हैं। लेकिन वास्तव में मार्केट में

[01:38:56] उसकी कीमत ₹500 की है तो आरबीआई को ₹480

[01:39:00] की कमाई हुई कि नहीं हुई?

[01:39:03] सरेज इज द प्रॉफिट दैट द गवर्नमेंट और द

[01:39:06] सेंट्रल बैंक गेट्स बाय प्रिंटिंग करेंसी।

[01:39:10] जो सरकार या केंद्रीय बैंक को मुद्रा

[01:39:12] छापने से प्राप्त होता है। यह अंतर मुख्य

[01:39:15] रूप से नोट की छपाई और उसके अंकित मूल्य

[01:39:17] के बीच होता है। तो याद रखिएगा कि वैल्यू

[01:39:20] ऑफ मनी कॉस्ट ऑफ प्रोडक्शन सिनरेज कहलाता

[01:39:24] है। ₹10 के नोट को छापने में अगर ₹2 का

[01:39:27] खर्च आता है तो ₹8 की कमाई मानी जाती है।

[01:39:30] याद रखिएगा मृदा की सृजन लागत कम होगी तो

[01:39:34] नोट बड़े इसलिए बड़े नोट छापे जाते हैं

[01:39:36] क्योंकि उससे प्रॉफिट ज्यादा हो जाता है।

[01:39:39] इसका लाभ का उपयोग आर्थिक गतिविधि और

[01:39:41] विकास परियोजनाओं के लिए किया जाता है।

[01:39:43] उच्च मूल्य वाले नोटों में सिनेरियो अधिक

[01:39:45] होता है। जैसे ₹2000 का नोट छापने में ₹5

[01:39:48] लगते होंगे तो सिनेरेज काफी ज्यादा होगा।

[01:39:52] भारत में नोट छापने का काम केंद्रीय बैंक

[01:39:54] भारतीय रिजर्व बैंक के पास है। आरबीआई ₹1

[01:39:56] के नोट को छोड़कर याद रखना ₹1 के नोट को

[01:40:00] छोड़कर सभी मूल्य वर्ग के नोट छापता है।

[01:40:03] करेंसी छापता है। सिक्के छापता है। ₹1 के

[01:40:06] नोट छापने और सभी प्रकार के सिक्के बनाने

[01:40:08] का अधिकार वित्त मंत्रालय के पास है।

[01:40:10] कॉइंस बनाने का राइट्स वित्त मंत्रालय के

[01:40:13] पास है। पूरे देश में मुद्रा की आपूर्ति

[01:40:16] मतलब सप्लाई करने का काम एक्सक्लूसिवली

[01:40:18] आरबीआई के पास है। छापने में दो तरीके से

[01:40:21] लोग मदद कर रहे हैं। ₹1 और जितने भी

[01:40:23] सिक्के होंगे वह सब फाइनेंस मिनिस्ट्री के

[01:40:26] अंतर्गत आएंगे और जो बड़े नोट होते हैं वह

[01:40:28] आरबीआई के अंतर्गत आएंगे। लेकिन सप्लाई का

[01:40:31] काम केवल एक ही करेगा। वित्त मंत्रालय

[01:40:33] सप्लाई करने में मदद नहीं करता है। तो आइए

[01:40:36] जरा देखते हैं मनी सप्लाई की क्या बातचीत

[01:40:38] है। यह वाला सवाल आप जरूर देख लीजिएगा।

[01:40:41] सिनेरियो वाला यूपीएससी ने एक सवाल दिया

[01:40:43] इंडियन इकोनमी में पिछले साल। उसका जवाब

[01:40:46] यूपीएससी ने वन और टू दिया हुआ है।

[01:40:51] जबकि उसका जवाब 1 2 और फाइव होना चाहिए

[01:40:54] था। पर हमारी यूपीएससी है मानने को तैयार

[01:40:58] नहीं है। और वह ऐसी अपने आप को शो करती है

[01:41:00] कि अब मैंने जो आंसर दे दिया वह भगवान के

[01:41:03] द्वारा कहा गया आंसर है। पिछले साल भी इन

[01:41:05] बेशर्मों ने गधों ने एक पॉलिटिकल आंसर गलत

[01:41:09] दिया था।

[01:41:13] आपने देखा इस सवाल को मुझे जरा बताना। यह

[01:41:16] जो पिछले साल आया था कि आरबीआई की कमाई

[01:41:19] किस-किस के माध्यम से होती है? तो सिनेरेज

[01:41:22] भी एक प्रकार से आरबीआई की कमाई मानी जाती

[01:41:24] है।

[01:41:31] मनी सप्लाई यह किसी भी विशिष्ट समय पर

[01:41:35] जनता द्वारा रखे गए सभी प्रकार के धन का

[01:41:37] कुल स्टॉक होता है। मुद्रा आपूर्ति में

[01:41:40] नगद, सिक्के, चालू, बचत खातों में रखी गई

[01:41:43] शेष राशि अन्य निकट धन विकल्प शामिल होते

[01:41:45] हैं। देखो जब भी हम किसी अर्थव्यवस्था की

[01:41:49] बात करते हैं जैसे भारत की बात कर रहे हैं

[01:41:52] तो भारत में दो चीजों का कैलकुलेशन हम

[01:41:54] हमेशा करते रहेंगे। एक चीज हमारे देश में

[01:41:58] कुल कितनी वस्तु और सेवाओं का उत्पादन हुआ

[01:42:06] और दूसरा हमारे देश में कुल कितनी करेंसी

[01:42:13] मुद्रा की आपूर्ति है?

[01:42:17] ध्यान से सुनना मेरी बात। एक बहुत मोटा

[01:42:20] कांसेप्ट बता रहा हूं। अगर किसी देश में

[01:42:23] मुद्रा की आपूर्ति ज्यादा हो जाए और देश

[01:42:26] में वस्तु सेवाओं का उत्पादन कम हो जाए तो

[01:42:30] ऐसी सिचुएशन में उस देश में महंगाई आ जाती

[01:42:33] है। क्योंकि वस्तु और सेवाएं तो कम है

[01:42:37] लेकिन करेंसी ज्यादा हो जाती है। तो जो

[01:42:40] बचपन में लोगों को लगता नहीं था कि भ

[01:42:42] सरकार नोट छाप दे और सब गरीबों को बांट दे

[01:42:45] तो उससे कुछ नहीं होगा। गरीबी दूर नहीं

[01:42:47] होगी बल्कि देश में महंगाई आ जाएगी।

[01:42:51] या फिर

[01:42:52] अगर मान लीजिए कि वस्तु सेवाओं का उत्पादन

[01:42:56] वस्तु सेवाओं का उत्पादन करेंसी का है। यह

[01:43:00] अगर व करेंसी का उत्पादन कम हो और वस्तु

[01:43:04] सेवाओं का उत्पादन ज्यादा हो जाए तो ऐसी

[01:43:07] सिचुएशन में लोगों के पास पैसे ही नहीं है

[01:43:10] तो कोई खरीद बिक्री नहीं होगी। देश में

[01:43:13] मंदी आ जाएगी। तो यह मंदी और महंगाई क्यों

[01:43:17] आ जाती है? क्योंकि या तो देश में वस्तु

[01:43:19] सेवाओं का प्रोडक्शन कम हुआ था। लेकिन नोट

[01:43:22] ज्यादा छाप दिए थे या फिर देश में वस्तु

[01:43:24] सेवाओं का उत्पादन ज्यादा हुआ था। नोट कम

[01:43:27] छापे थे। तो ये प्रॉब्लम्स ना क्रिएट हो

[01:43:30] इसलिए सामान्य रूप से सरकार हमेशा ही

[01:43:34] चीजों को बैलेंस में रखने की कोशिश करती

[01:43:36] है। देखती है कि हमारे देश में जितने

[01:43:39] करोड़ रुपए के नोट चल रहे होंगे तो क्या

[01:43:42] हमारे देश में उतनी वस्तु सेवाओं का

[01:43:44] प्रोडक्शन हो रहा है या नहीं हो रहा है।

[01:43:47] इसका फायदा क्या होगा? महंगाई नहीं आएगी,

[01:43:50] मंदी नहीं आएगी, अर्थव्यवस्था में झटके

[01:43:53] नहीं आएंगे।

[01:43:55] यह हमारी आरबीआई समय-समय पर बताती चलती है

[01:43:58] कि कितना उत्पादन हुआ है। यह हमारी सरकार

[01:44:01] समय-समय पर बताती रहती है कि हमारे देश का

[01:44:04] जीडीपी कितना है। तो देश का जीडीपी और देश

[01:44:08] में आरबीआई के द्वारा इन चीजों को

[01:44:10] कैलकुलेट किया जाता है। आरबीआई जब इसको

[01:44:12] कैलकुलेट करती है तो इसे कई तरीके के

[01:44:15] अलग-अलग रूप में कैलकुलेट करती है। मनी

[01:44:17] सप्लाई m0, m1, m2, m3 और m4 ये ब्रॉड मनी

[01:44:24] कहलाते हैं। मतलब इसमें सब कैलकुलेट किया

[01:44:26] जाता है और ये नैरो मनी कहलाते हैं जिसमें

[01:44:29] कि एक प्रकार से कम कैलकुलेशन होता है। और

[01:44:31] रियल में M0 मनी प्रोडक्शन है। मनी

[01:44:35] प्रोडक्शन। मैं थोड़ा सा प्रैक्टिकल

[01:44:37] एग्जांपल दे रहा हूं। याद रखिएगा कि

[01:44:40] आरबीआई ने ₹100 का नोट छापा। तो रियल में

[01:44:44] जो नोट छापा है वह M0 है। M0

[01:44:48] लेकिन M3 और M4 रियल में वह ₹100 ना होकर

[01:44:52] हो सकता है कि वह ₹2000 होंगे। ₹2000 कैसे

[01:44:56] महोदय? यह ₹100 का नोट जब बाजार में जाएगा

[01:45:00] तो कितने लोगों को प्रभावित करके या कितनी

[01:45:04] वैल्यू को प्रभावित करके आएगा वो एक

[01:45:07] प्रकार से ब्रॉड मनी कहलाएगा। मतलब मैं

[01:45:09] इसे प्रैक्टिकल एग्जांपल दे रहा हूं। मान

[01:45:12] लीजिए कि हमारी अर्थव्यवस्था बिल्कुल 10

[01:45:14] लोगों से मिलकर बनी है। ध्यान से सुनना

[01:45:16] मेरी बात। 10 लोगों से मिलकर बनी है।

[01:45:19] आरबीआई ने ₹100 का नोट छापा। वो ₹100 मुझे

[01:45:22] दिया कि जाओ सर आपने बहुत फ्री में

[01:45:24] पढ़ाया। यह ₹100 आप रखो। अब मुझे बताओ कि

[01:45:28] मैं बाजार में ₹100 में क्या करूंगा? हो

[01:45:31] सकता है मैंने ₹100 में एक किताब खरीदी।

[01:45:34] अब मैंने उस दुकानदार को ₹100 दिए। फिर वह

[01:45:37] ₹100 हो सकता है दुकानदार ने किसी होटल

[01:45:40] वाले को दिए। ₹100 का खाना खाया। फिर यह

[01:45:43] ₹100 होटल वाले ने जिसने भी प्राप्त किए

[01:45:46] उसने उससे मूवी देखी। सिनेमा देखने गया।

[01:45:49] उस ₹100 से सिनेमा के पास सिनेमा मालिक के

[01:45:52] पास ₹100 गए। उससे उसने शिक्षा प्राप्त

[01:45:55] की।

[01:45:58] उस टीचर को दिया। टीचर से किसी और को

[01:46:01] दिया। फिर किसी और को दिया। इस तरीके से

[01:46:03] चलता जाएगा। तो फाइनली वह वापस जब

[01:46:07] पहुंचेगा किसी भी सर्कल को कंप्लीट करके

[01:46:10] तो हो सकता है वो 2000 मतलब 20 बार लेनदेन

[01:46:13] कर चुका होगा। तो भले ही नोट छपता कम है

[01:46:17] लेकिन वह जब मार्केट में जाता है तो वह कई

[01:46:21] चीजों को परचेस करने की औकात रखता है। तो

[01:46:24] याद रखना कि m0 रियल में नोट कितना छापा

[01:46:27] गया है उसको बताने के लिए है। m1 m2 m3 m4

[01:46:30] उसके सप्लाई को बताने की कोशिश करता है।

[01:46:37] मुद्रा का वेग वेलोसिटी ऑफ मनी वेलोसिटी

[01:46:40] ऑफ मनी मतलब कितना तेजी से वह एक हाथ से

[01:46:43] दूसरे हाथ में पहुंच रही है। कितना तेजी

[01:46:45] से उसका एक्सचेंज हो रहा है? मुद्रा के

[01:46:48] वेग से तात्पर्य अर्थव्यवस्था में ₹1

[01:46:50] कितने रुपए की वस्तु और सेवाएं खरीदने की

[01:46:53] क्षमता रखता है। जैसे मैंने आपको 2000

[01:46:55] बताया। तो यह मनी की स्पीड को दर्शाएगा।

[01:46:57] यह वह दर है जिस पर किसी अर्थव्यवस्था में

[01:46:59] मुद्रा का आदान-प्रदान होता है। सीधे

[01:47:01] शब्दों में कहे तो वह दर जिस पर लोग पैसा

[01:47:04] खर्च करते हैं। जनरली हम मानते हैं कि

[01:47:06] जीडीपी जब भी तैयार किया जाएगा तो जितना

[01:47:09] मनी की आपूर्ति और मुद्रा का वेग होगा।

[01:47:12] जीडीपी देश में वस्तु सेवाओं का उत्पादन

[01:47:15] कितना होता है? तो एक प्रकार से कितने नोट

[01:47:18] छापे गए और कितना मनी की वेलोसिटी थी?

[01:47:21] जैसे मैंने कहा कि ₹100 का नोट छापा गया।

[01:47:23] वेलोसिटी 20 की थी। मतलब ₹2000 के बराबर

[01:47:26] का वो काम करके आएगा। मतलब हमारे देश में

[01:47:29] वस्तु सेवाओं का उत्पादन 2000 के बराबर

[01:47:32] होना चाहिए। सबसे पहले इसको समझने से पहले

[01:47:35] मनी सप्लाई को समझने से पहले बैंक डिपॉजिट

[01:47:38] समझते हैं। बैंक में जो पैसा लोग जमा करते

[01:47:41] हैं वो दो तरीके का जमा किया जाता है।

[01:47:43] ध्यान से सुनना। बैंकों में एक होती है

[01:47:45] डिमांड डिपॉजिट। डिमांड डिपॉजिट मतलब

[01:47:48] कासा। करंट अकाउंट और सेविंग अकाउंट।

[01:47:52] और टर्म डिपॉजिट टाइम डिपॉजिट का मतलब

[01:47:54] होता है यहां पर हम कहेंगे कि रिकंट राफा

[01:47:59] कहते हैं रिकंट अकाउंट और फिक्स्ड अकाउंट

[01:48:03] मतलब एक प्रकार से कासा का मतलब होता है

[01:48:06] कि व्यक्ति करंट अकाउंट खोलता है। चालू

[01:48:09] खाता खोलता है। चालू खाते में जनरली कोई

[01:48:11] कंपनी इसको खोलती है। दैनिक लेनदेन को

[01:48:14] लेने के लिए इसमें बैंक के अंदर जो पैसा

[01:48:17] जमा किया जाता है उसे कभी भी कितना भी

[01:48:20] प्राप्त किया जा सकता है। इसमें कोई लिमिट

[01:48:22] नहीं होती है। लिमिट मतलब मान लीजिए कि

[01:48:24] किसी व्यक्ति के खाते में ₹00 करोड़ है

[01:48:28] किसी कंपनी के खाते में तो वह एक दिन में

[01:48:30] ₹400 करोड़ 500 करोड़ का लेनदेन कर सकता

[01:48:33] है। चालू खाता है वह। पर दूसरा होता है

[01:48:36] सेविंग अकाउंट। किसी के सेविंग खाते में

[01:48:38] अगर ₹200 करोड़ हैं और वो बैंक में चला

[01:48:41] जाए तो बैंक उसे ₹200 करोड़ एक दिन में

[01:48:43] नहीं देगी। बैंक कहेगी कि देखो भाई शर्त

[01:48:46] है आप 20 करोड़ एक दिन में ले जा सकते।

[01:48:48] इतना पैसा हमारे पास एक दिन में नहीं आता

[01:48:50] है। आप हमें सूचना दे दीजिए। हम उसके

[01:48:53] अकॉर्डिंग आगे उपलब्ध करा देंगे।

[01:48:56] तो सेविंग खाते ये लोग जब खोलते हैं जैसे

[01:48:58] मैंने आपने सबने खोले होंगे। रिकरेंट

[01:49:01] अकाउंट का मतलब होता है जहां फिक्स्ड रूप

[01:49:03] से तय कर दिया जाता है कि मैं 4 साल के

[01:49:05] बाद पैसा निकालूंगा और हर महीने इतना पैसा

[01:49:08] जमा करता चलूंगा। फिक्स्ड अकाउंट होता है

[01:49:11] जहां एक मु्त पैसा जमा किया जाता है और

[01:49:14] कुछ निश्चित टाइम के बाद निकाला जाता है।

[01:49:16] तो इसको कहते हैं टाइम डिपॉजिट। टाइम

[01:49:18] डिपॉजिट में ब्याज अच्छा मिल जाता है

[01:49:21] क्योंकि एक फिक्स्ड टाइम तक आप उसको रख

[01:49:23] लेते हैं लेकिन आपको इसमें बार-बार

[01:49:25] निकालने की अनुमति नहीं मिलती है। करंट

[01:49:27] अकाउंट और सेविंग अकाउंट में ब्याज कम

[01:49:29] मिलते हैं लेकिन आपको फ्रीडम होती है कि

[01:49:31] आप डेली उसको निकाल सकते हैं। कई बैंकें

[01:49:34] करंट अकाउंट में ब्याज देती नहीं बल्कि

[01:49:36] लेती है। जैसे हमारे देश में कुछ ऐसी

[01:49:39] बैंकें भी है जो करंट अकाउंट में भी ब्याज

[01:49:41] देने लगी है ताकि कस्टमर ज्यादा आ सके।

[01:49:43] लेकिन सामान्यत करंट अकाउंट में किसी

[01:49:45] प्रकार का ब्याज नहीं मिलता है। तो सेविंग

[01:49:48] अकाउंट, करंट अकाउंट, फिक्स्ड डिपॉजिट,

[01:49:50] रिकंट डिपॉजिट ऐसे कई प्रकार के खाते होते

[01:49:53] हैं। मांग जमा खाते में ऐसी धनराशि होती

[01:49:56] है जो किसी भी समय निकाली जाती है। चालू

[01:49:59] खाता जो करंट अकाउंट होता है, यह

[01:50:01] व्यवसायों के द्वारा यूज किया जाता है।

[01:50:03] जैसे मेरी कंपनी है तो मेरी कंपनी का करंट

[01:50:05] अकाउंट होगा। सामान्यत बैंक कोई ब्याज

[01:50:08] नहीं देगा। बचत खाता जितने भी अधिकतर लोग

[01:50:10] हैं वो अपने खाते को सेविंग अकाउंट के रूप

[01:50:13] में खोलते हैं। फिक्स्ड डिपॉजिट वाले होते

[01:50:15] हैं कि एक निश्चित अवधि के बाद जब परिपक्व

[01:50:17] हो जाएगा तब वह एक प्रकार से पैसा लेने

[01:50:20] आएंगे। फिर उसके बाद होता है रिकरेंट

[01:50:23] डिपॉजिट कि हर महीने में वह ₹2000 जमा

[01:50:26] करेंगे जो दो-दो साल के बाद लेने आएंगे।

[01:50:28] तो वह भी एक प्रकार से रिकरेंट डिपॉजिट

[01:50:31] कहलाता है। फिक्स्ड डिपॉजिट रिकंट डिपॉजिट

[01:50:34] टर्म या टाइम डिपॉजिट का मतलब एक निश्चित

[01:50:36] टाइम के बाद लेने आएगा। अगर लमसम अमाउंट

[01:50:38] एक साथ लेने आए या फिर हर महीने वह एक

[01:50:41] निश्चित कमाई के रूप में लेना चाहता है।

[01:50:45] अब बात करते हैं मनी सप्लाई की या मनी

[01:50:47] मेजरमेंट की। किसी भी समय अर्थव्यवस्था

[01:50:50] में कुल मुद्रा को मापने के लिए केंद्रीय

[01:50:52] बैंक आरबीआई ने कुछ मेजरमेंट किए हैं।

[01:50:55] सबसे पहले तो मुद्रा आपूर्ति के उपायों को

[01:50:57] M0 के साथ चार श्रेणी M1, M2, M3, M4 में

[01:51:01] बांटा जाता है। M0, रियल में क्या होता

[01:51:03] है? m0 रियल में होता है। कितना मनी छापा

[01:51:07] गया है? 1977 में आरबीआई ने इस तरीके के

[01:51:10] लिए कैलकुलेशन के कुछ फार्मूले बनाए। एम

[01:51:13] का मतलब होता है मनी जिसमें M1 से लेकर M2

[01:51:17] की बात करेंगे तो वह नैरो मनी कहलाएगा। M1

[01:51:20] सबसे नैरो मनी कहलाता है। M4 सबसे ब्रॉड

[01:51:22] मनी कहलाता है। पर M4 की जगह पर M3 को ही

[01:51:26] जनरली मेजर किया जाता है। बट इन द पॉलिसी

[01:51:29] मेकिंग M इज़ एसेंशियल टू सेंटर व्हिच

[01:51:31] डिपेंड ऑन द कंट्री सेंट्रल बैंक। आइए

[01:51:34] देखते हैं एक-एक चीज को क्या बताया। सबसे

[01:51:36] पहले है रिजर्व मनी। देखो रिजर्व मनी रियल

[01:51:38] में m0 का मतलब जब भी कोई कहेगा m0 क्या

[01:51:43] है? तो दिमाग को कहोगे रियल में कितने के

[01:51:45] नोट छापे गए? देखो हमारे देश में नोट छापे

[01:51:49] कम जाते हैं लेकिन जब वो सर्कुलेशन में

[01:51:51] आते हैं तो वो काम बहुत ज्यादा का करके

[01:51:53] आते हैं क्योंकि उसकी वेलोसिटी भी होती है

[01:51:56] और इसी कारण से एम जीरो मतलब एक्चुअल छापा

[01:52:00] हुआ नोट है जिसको हाई पावर्ड मनी कहेंगे

[01:52:04] रिजर्व मनी कहेंगे आरबीआई के पास कितने

[01:52:07] पैसे हैं कितने आरबीआई ने अलग जगह पर खुद

[01:52:10] छाप कर रखे हैं और कितना मार्केट में रियल

[01:52:13] नोट चल रहा है रिजर्व मनी का दूसरा दूसरा

[01:52:16] नाम हाई पावर्ड मनी है। यह वास्तविक रूप

[01:52:19] में आरबीआई ने कुल कितना नोट छापा हुआ है

[01:52:22] जो आरबीआई की लायबिलिटी को दर्शाता है कि

[01:52:25] वास्तविक रूप में अगर यह नोट कल के दिन

[01:52:27] चलना बंद हो जाए तो आरबीआई को लोगों को

[01:52:29] इतना सोना तो देना ही पड़ेगा क्योंकि

[01:52:32] लोगों ने उन पर भरोसा करके ही लिया था।

[01:52:36] यह वास्तविक रूप में पूरी तरह से आरबीआई

[01:52:40] के द्वारा छापे हुए नोट समझिएगा। आरबीआई

[01:52:43] के साथ बैंक के चालू खाते भी होते हैं।

[01:52:45] अदर बैंक के जो आरबीआई में जमा होते हैं।

[01:52:47] अन्य जमाओं में विदेशी केंद्रीय बैंक और

[01:52:49] सरकार के खाते में शेष अंतरराष्ट्रीय

[01:52:51] एजेंसी जैसे आईएमएफ जैसे आईएमएफ में भी

[01:52:54] हमने अपने कुछ नोट छाप कर दिए हुए हैं

[01:52:56] अपनी करेंसी के रूप में। देखो रिजर्व मनी

[01:52:58] इतना नहीं बस सिंपल सा कांसेप्ट है।

[01:53:01] वास्तविक छापा हुआ नोट।

[01:53:05] वास्तविक छापे हुए नोट को हम कहेंगे

[01:53:08] रिजर्व मनी।

[01:53:10] सरकार को आरबीआई का शुद्ध क्रेडिट बैंकों

[01:53:12] पर, आरबीआई का दावा, वाणिज्यिक बैंक यह सब

[01:53:15] कैलकुलेशन में यूज होते हैं। बट अगर आप

[01:53:16] इसकी रियल परिभाषा समझेंगे तो केवल इतना

[01:53:19] याद रखना कितना नोट छापा गया है। अब नोट

[01:53:23] छापना मैंने कहा एक अलग चीज होती है।

[01:53:25] लेकिन नोट जब मार्केट में जाता है भले ही

[01:53:27] वो ₹100 का नोट हो लेकिन वो कितने का भी

[01:53:29] काम करके आ सकता है। तो मनी सर्कुलेशन में

[01:53:32] हम m1, m2, m3, m4 को कैलकुलेट करते हैं।

[01:53:36] m1 और m2 सभी मनी को कैलकुलेट नहीं करता

[01:53:38] है। जैसे m1 और m2 क्या करेगा? अब जैसे

[01:53:41] मुझे एक बात बताइए जिन लोगों ने फिक्स्ड

[01:53:43] डिपॉजिट करके रखा हुआ है फिक्स्ड डिपॉजिट

[01:53:46] वो मार्केट में मनी प्रचलन में भले ही हो

[01:53:48] सकता है लेकिन वास्तविक रूप में वह भी

[01:53:51] प्रचलन उतना तेजी से नहीं हुआ होगा जितना

[01:53:54] सेविंग खाते का मनी जितना करंट खाते का

[01:53:57] मनी मनी सर्कुलेशन में आया होगा। तो हमारी

[01:54:00] केंद्रीय बैंक जैसे आप भी अगर केंद्रीय

[01:54:02] बैंक के मालिक होते और आपको भी

[01:54:03] अर्थव्यवस्था का थोड़ा सा ज्ञान होता तो

[01:54:05] आप क्या कहते देखो भाई जो सेविंग खाता है

[01:54:08] जो करंट खाता है उसका पैसा अलग कैलकुलेट

[01:54:10] करो क्योंकि वो ज्यादा एक्सचेंज हो रहा है

[01:54:12] उसकी स्पीड ज्यादा है और जो फिक्स्ड

[01:54:14] डिपॉजिट होंगे जो रिकंट डिपॉजिट होंगे वो

[01:54:17] थोड़ा सा कम मूवेबल होगा तो उसको बाद में

[01:54:19] कैलकुलेट करेंगे तो m1 और m2 इसी तरीके से

[01:54:23] कैलकुलेट होते हैं कि जो रियल में तेजी से

[01:54:25] करेंसी में लेनदेन हो रहा है जिसकी स्पीड

[01:54:28] ज्यादा है उसको कैल कैलकुलेट कर लो और

[01:54:30] जिनकी स्पीड कम है उसको बाद में कैलकुलेट

[01:54:32] कर लेंगे। लेकिन जब हम बाद वाले को

[01:54:34] कैलकुलेट करेंगे तो रियल में ब्रॉड मनी

[01:54:36] वही आएगा। वास्तविक रूप से पूरे मार्केट

[01:54:38] में सर्कुलेशन में उसी का इंपैक्ट होगा।

[01:54:42] नैरो मनी जनता के पास कितनी करेंसी है?

[01:54:45] जनता की जमा राशि जमा राशि मतलब डिमांड

[01:54:48] डिपॉजिट वाली बात हम करने जा रहे हैं।

[01:54:49] करंट अकाउंट सेविंग अकाउंट और आरबीआई के

[01:54:52] पास कितना अन्य जमाएं हैं। M2 का मतलब

[01:54:55] होता है कि M1 के साथ-साथ M2 का मतलब होगा

[01:54:58] M1 के साथ-साथ कुछ लोगों ने पोस्ट ऑफिस

[01:55:01] में सेविंग अकाउंट खोला होता है गांवों

[01:55:03] में। बहुत कम पैसा होता है यह। तो M2 बड़ा

[01:55:06] है M1 से लेकिन फिर भी नैरो मनी है। सब

[01:55:09] कुछ सेविंग करंट अकाउंट की बातचीत कर रहे

[01:55:11] हैं। M3 ब्रॉड मनी है। ब्रॉड मनी M3 में

[01:55:16] याद रखना M2 नहीं होता है। M1

[01:55:20] M1 के साथ-साथ फिक्स्ड डिपॉजिट, रिकंट

[01:55:23] डिपॉजिट, टाइम डिपॉजिट की भी हम बातचीत कर

[01:55:26] देते हैं। जिसका मतलब होता है कि बैंकिंग

[01:55:29] प्रणाली के साथ ताऊदी जमा है। मतलब M1

[01:55:32] प्लस बैंकिंग प्रणाली के साथ जितनी सावधि

[01:55:34] जमाएं हैं वाणिज्यिक क्षेत्र के बैंकों के

[01:55:36] ऋण सरकार को शुद्ध बैंक यह सिंपल सी बात

[01:55:39] इसको मैं बहुत प्रैक्टिकल वे में समझाना

[01:55:41] चाहूंगा आप लोगों को प्रैक्टिकल वे में

[01:55:43] देखना जरा

[01:55:47] ये मार्च 2026 की हम बातचीत करने जा रहे

[01:55:51] हैं। मार्च 2026 31 मार्च का रियल डाटा ये

[01:55:55] हमें याद नहीं रखना है। बिल्कुल भी याद

[01:55:57] नहीं रखना है। इधर ध्यान दीजिएगा। सबसे

[01:56:00] पहले अगर हम बात करें M3 की तो हमारे देश

[01:56:03] में इस समय कितना नोट छापा गया है? छापा

[01:56:08] गया नोट M0 है। पर वो नोट कितने का वैल्यू

[01:56:11] कितने की औकात रखता है? तो ध्यान से

[01:56:14] देखिएगा। हमारे देश में हमारे देश में

[01:56:18] जितना भी जितना भी M3 की हम बातचीत करने

[01:56:23] जा रहे हैं। इकाई दहाई सैकड़ा हजार

[01:56:29] लाख 10 लाख करोड़ और ये करोड़ में डाटा है

[01:56:34] ऑलरेडी। ये डाटा किस में है? करोड़ में है

[01:56:38] तो इकाई दहाई सैकड़ा हजार

[01:56:42] लाख 10 लाख करोड़ 3 करोड़ 14 लाख 6596

[01:56:49] करोड़ के बराबर का पैसा सर्कुलेशन में है।

[01:56:54] आप देखेंगे कि इसके पहले यह पैसा कम था।

[01:56:57] आप देखेंगे कि इसके पहले 25, 26, 26, 27

[01:57:01] में क्या चेंजेस आ रहा है। उसकी बातचीत

[01:57:03] उससे पता चलेगा कि मार्केट में पैसों का

[01:57:06] फ्लो कितना है। ये सब के सब अमाउंट को

[01:57:09] निकाला गया है। जिसमें करेंसी विद द

[01:57:11] पब्लिक पब्लिक के पास कितना नोट है।

[01:57:14] डिमांड डिपॉजिट विद द बैंक। बैंकों में

[01:57:16] कितना डिमांड डिपॉजिट है। टाइम डिपॉजिट का

[01:57:20] मतलब होता है फिक्स्ड अमाउंट कितना? यह

[01:57:22] बहुत बड़ा अमाउंट होगा। अदर डिपॉजिट विद

[01:57:25] रिजर्व बैंक के पास कितना है? रिजर्व बैंक

[01:57:27] के पास कुछ लोगों ने खाते खोले होते हैं।

[01:57:29] गवर्नर जैसे लोगों के खाते होते हैं। तो

[01:57:32] हम कह सकते हैं कि यह हो गया कंपोनेंट m3

[01:57:35] का जिसमें 1 2 3 4 सबको जोड़ा जाएगा। फिर

[01:57:39] अगर हम बातचीत करें तो नेट बैंक क्रेडिट

[01:57:41] टू गवर्नमेंट सेक्टर, रिजर्व बैंक, अदर

[01:57:44] बैंक, बैंक क्रेडिट ये ऐसे कैलकुलेशन में

[01:57:46] वो यूज़ करते हैं। सर क्या हमें इसे यूज़

[01:57:47] करना है? नहीं। पर मैं जो बताना चाह रहा

[01:57:50] हूं उसको ध्यान से सुनिएगा। M1 मतलब सबसे

[01:57:53] ज्यादा लिक्विफाइड होता है। लिक्विफाइड का

[01:57:55] मतलब जो आसानी से बाजार में एक हाथ से

[01:57:58] दूसरे हाथ में जा सकता है। इसको

[01:57:59] लिक्विफाइड को ऐसे समझो जो इजीली उपलब्ध

[01:58:03] रहेगा। जैसे आपके पास चार चीजें हैं।

[01:58:05] इमेजिन करिए प्रैक्टिकली। प्रैक्टिकली

[01:58:07] ज्यादा इमेजिन करोगे तो जल्दी समझ में

[01:58:09] आएगा।

[01:58:12] चार चीजें आपके पास है। एक है आपके पास

[01:58:14] ₹500 का नोट। एक है आपके पास 1 ग्राम

[01:58:18] सोना।

[01:58:20] एक है आपके पास 100 शेयर और एक चीज है

[01:58:23] आपके पास जमीन। अब मुझे बताओ आपको

[01:58:26] इमीडिएटली खाना खाना है तो क्या आपको मान

[01:58:31] लीजिए जमीन बेचकर खाना खाना है। क्या इतना

[01:58:34] आसानी से संभव होगा? आज आप कहोगे मुझे

[01:58:37] अपनी जमीन बेचनी है। फिर लोगों को कुछ दिन

[01:58:40] का इंतजार करोगे। कुछ लोगों को दिखाओगे और

[01:58:44] फिर लोग कभी अगर उन्हें जमता हो सौदेबाजी

[01:58:47] तब जाकर वह आप बेच पाओगे। तो इसे कहते हैं

[01:58:52] कि इसका लिक्विफिकेशन नहीं हो सकता है

[01:58:54] आसानी से बहुत मुश्किल है। शेयर शेयर

[01:58:57] मार्केट सैटरडे संडे बंद होता है। मान

[01:58:59] लीजिए आपको सैटरडे संडे खाना खाना है। तो

[01:59:02] जब तक शेयर मार्केट खुलेगा नहीं तब तक आप

[01:59:04] उसे बेच नहीं पाओगे। तब भी आपको इंतजार तो

[01:59:07] करना पड़ेगा। इमीडिएट तो नहीं हो पाएगा।

[01:59:09] सोना

[01:59:11] सोने के लिए भी जरूरी है कि पहले दुकान

[01:59:13] में जाओगे सोने वाले उसे पहले कन्वर्ट

[01:59:16] करोगे तब जाकर होटल में जा पाओगे लेकिन

[01:59:19] करेंसी ₹500 का नोट कहीं भी चले जाओ

[01:59:23] डायरेक्ट लेकर तो यह सबसे ज्यादा

[01:59:24] लिक्विफाइड है फिर सोना सेकंड नंबर पर

[01:59:27] लिक्विफाइड है शेयर तीसरे नंबर पर

[01:59:30] लिक्विफाइड है और जमीन चौथे नंबर पर

[01:59:33] लिक्विफाइड है इसका मतलब उसका आसानी से

[01:59:36] कन्वर्जन नहीं हो पाता है किसी भी

[01:59:38] जरूरतमंद चीजों में तो तो जब हम अपनी

[01:59:41] जरूरतमंद चीजों को आसानी से किसी में बदल

[01:59:43] देते हैं तो उसको कहते हैं इकोनॉमी में

[01:59:45] लिक्विफिकेशन होना, द्रवीकरण होना। जब हम

[01:59:48] कोई भी जैसे मुझे कुर्सी खरीदनी है, मकान

[01:59:50] खरीदना है, दुकान खरीदनी है, कोई मुझे

[01:59:53] खाने-पीने की चीज खरीदनी है, कपड़े पहनने

[01:59:55] की चीज खरीदनी है तो ये सोना शेयर से

[01:59:58] खरीददारी करना लगभग मुश्किल है। मुझे पहले

[02:00:01] उसे करेंसी में बदलना पड़ेगा। तो वैसे ही

[02:00:04] M1 M3 में भी अगर हम देखेंगे तो यहां पर

[02:00:07] करंट अकाउंट सेविंग अकाउंट की बातचीत है

[02:00:09] तो ये सबसे ज्यादा लिक्विफाइड है और M3 की

[02:00:13] अगर हम बातचीत करें या M4 की बात करें तो

[02:00:15] M4 का मतलब होता है M3 प्लस

[02:00:19] जो भी अ पोस्ट ऑफिस में फिक्स्ड डिपॉजिट

[02:00:23] है वो भी उसमें कैलकुलेट करते हैं। सबसे

[02:00:25] ब्रॉड मनी वैसे M4 है। लेकिन ये बहुत कम

[02:00:28] अमाउंट होता है। इसलिए M3 को ही कैलकुलेट

[02:00:30] करके हम ब्रॉड मनी कह देते हैं। यह लेस

[02:00:32] लिक्विफाइड होंगे। पूरी तरह से मनी

[02:00:34] सर्कुलेशन को बता रहा है। अब ध्यान से

[02:00:36] सुनना।

[02:00:38] M0 जो होता है वो बताता है कि रियल में

[02:00:41] कितने के नोट छापे गए हैं। कितने नोट छापे

[02:00:44] गए हैं। और M3 रियल में बताता है कि वो

[02:00:47] नोट वैल्यू कितनी रखते हैं। यह पॉइंट पर

[02:00:50] ध्यान देना। अगर आप इकोनॉमी में कंफ्यूज

[02:00:53] रहते हो तो थोड़ा सा प्रैक्टिकल वे को समझ

[02:00:56] लीजिएगा। जैसे मान लीजिएगा कि ₹100 का नोट

[02:00:59] छापा गया था लेकिन उसने ₹2000 का लेनदेन

[02:01:02] करके आ गया तो हम इसे कहेंगे कि m3 की

[02:01:05] वैल्यू हो गई ₹2000 और m0 की वैल्यू हो गई

[02:01:09] ₹100

[02:01:10] m1 जो होगा वो हो सकता है कि m1 लगभग ₹200

[02:01:15] ₹300 आ जाए। m2 हो सकता है ₹350 आ जाए। m3

[02:01:20] ₹2000 और m4 हो सकता है ₹00 ₹10 आ जाए। तो

[02:01:24] हम जनरली कहते हैं कि चलो भाई 2000 ही

[02:01:26] ठीक-ठाक मान लेते हैं मोटा-मोटा। तो रियल

[02:01:29] में M0 का मतलब होता है कि आपने कितने नोट

[02:01:32] छापे थे और M3 का मतलब है कि रियल में वो

[02:01:36] मार्केट में कितने का काम करके आए।

[02:01:37] क्योंकि मैंने आपको एक एग्जांपल दिया कि

[02:01:39] ₹100 का जब नोट छापा जाएगा ₹100 जब मेरे

[02:01:43] पास आएंगे तो मैं

[02:01:46] अगर उस ₹100 को मटके में डालकर गाड़ दूं

[02:01:49] तो फिर तो वह m0m3 के बराबर हो जाएगा

[02:01:54] क्योंकि सर्कुलेशन बंद कर दिया मैंने।

[02:01:56] लेकिन मैंने उस नोट का उपयोग किसी होटल

[02:01:59] में जाकर किया। फिर होटल वाले ने उसमें

[02:02:01] ₹100 का मुझे खाना खिलाया। होटल वाले ने

[02:02:04] उस ₹100 को ले जाकर सिनेमा हॉल में दिया।

[02:02:07] उसने ₹100 की मूवी देखी। अब नोट तो ₹100

[02:02:11] का था लेकिन ₹200 का काम हो गया कि नहीं

[02:02:13] हो गया? अब सिनेमा ओनर ने हो सकता है वो

[02:02:16] ₹100 कहीं और दिए होंगे। फिर वो ₹100 कहीं

[02:02:19] और गए होंगे। फिर वो ₹100 कहीं और गए

[02:02:21] होंगे। तो जब तक वो ₹100 घूमता जा रहा है

[02:02:24] तब तक M3 की वैल्यू में उसका इंक्लूड होता

[02:02:27] जाएगा। M3 में हम उसको कैलकुलेट करते चले

[02:02:30] जाएंगे। याद रखिएगा अगर आपका देश का

[02:02:33] जीडीपी और M3 की वैल्यू बराबरी में नहीं

[02:02:37] है तो फिर देश में समस्याएं आएगी। इसलिए

[02:02:41] हम कहते रहते हैं कि इसको भी मेजर करते

[02:02:43] चलो। जीडीपी का मतलब होता है कि एक साल

[02:02:46] में कितना उत्पादन हुआ और एक साल में यहां

[02:02:48] पर वैल्यू का लेना देना कितना रहा? तो M3

[02:02:51] और जीडीपी बराबरी में आने चाहिए। कि अगर

[02:02:54] जीडीपी ज्यादा बड़ा है और M3 छोटा है मतलब

[02:02:58] पैसे कम है तो हम कहेंगे कि मार्केट में

[02:03:00] लिक्विडिटी कम हो गई है। तरलता कम हो गई

[02:03:04] है। लोगों के जेब में पैसे नहीं जबकि अनाज

[02:03:06] गेहूं सब बहुत ज्यादा हो गया है। तो कहीं

[02:03:09] ना कहीं वैल्यूएं गिरने लग जाएगी। सही

[02:03:11] कीमत नहीं मिल पाएगी। लेकिन अगर आपने नोट

[02:03:14] छाप दिए गरीबी को दूर करने के लिए M3 बड़ा

[02:03:18] कर दिया और उतना वस्तु सेवाओं का उत्पादन

[02:03:20] नहीं हुआ है तो महंगाई देश के अंदर आ

[02:03:23] जाएगी क्योंकि लोगों के जेब में पैसा तो आ

[02:03:26] गया लेकिन वस्तुएं बाजार में नहीं आई तो

[02:03:28] लोग कहेंगे कि भाई हमारे पास पैसा है

[02:03:31] लेकिन हम वस्तु खरीद नहीं पा रहे मतलब

[02:03:33] कीमतें आसमान पर चढ़ जाएगी। लिक्विडिटी का

[02:03:36] मतलब होता है मुद्रा के वेग तथा विनिमय के

[02:03:39] माध्यम की तीव्रता को एक प्रकार से हम

[02:03:41] कहते हैं लिक्विडिटी। दूसरे शब्दों में

[02:03:44] नगदी में बदलने की मुद्रा को तरलता। नगदी

[02:03:46] में करेंसी में कितना बदल सकते हैं? कैश

[02:03:49] में कितना बदल सकते हैं?

[02:03:52] M1 की लिक्विडिटी सबसे ज्यादा M4 की

[02:03:54] लिक्विडिटी सबसे कम। M1 नैरो होता है। M4

[02:03:57] ब्रॉड होता है। याद रखेंगे। मुद्रा मनी

[02:04:00] मल्टीप्लायर। मनी मल्टीप्लायर जैसे कि

[02:04:03] मैंने आपको बताया m3 रियल वैल्यू को

[02:04:05] दर्शाता है कि टोटल कितनी वैल्यू का काम

[02:04:08] किया और m0 मतलब रियल में नोट कितने छापे

[02:04:11] गए। इसको मनी मल्टीप्लायर कहा जाता है।

[02:04:14] इनके रेश्यो को मनी मल्टीप्लायर जैसे कि

[02:04:17] ₹2000 का काम हुआ जबकि नोट केवल ₹100 का

[02:04:20] छपा था। तो हम कहेंगे कि मनी मल्टीप्लायर

[02:04:23] 20 है। यहां कुछ बातें याद रखना। मनी

[02:04:26] मल्टीप्लायर ज्यादा होगा। यदि सभी लोग एक

[02:04:29] दूसरे के साथ बैंक के माध्यम से जुड़ जाए

[02:04:31] क्योंकि फाइनली बैंक में पैसा आता जाता

[02:04:34] रहेगा। सारे लोग कनेक्ट रहेंगे तो मनी

[02:04:36] मल्टीप्लायर अच्छा काम करता है। लेकिन

[02:04:38] सोचो कि बैंकके कम हो जाए तो लोग क्या कर

[02:04:41] सकते हैं? मटके में गाड़ कर आ सकते हैं।

[02:04:43] किसी ने मटके में गाड़ा कि मनी

[02:04:45] मल्टीप्लायर गिर जाता है। इसलिए जितना लोग

[02:04:48] बैंकों के साथ जुड़ेंगे मनी मल्टीप्लायर

[02:04:50] बढ़ता जाएगा। अर्थव्यवस्था में मौद्रिक

[02:04:53] आधार और मुद्रा आपूर्ति के बीच संबंध को

[02:04:55] दर्शाता है। इसे उस राशि के रूप में माना

[02:04:58] जा सकता है जो बैंक धन की प्रत्येक इकाई

[02:05:00] से उत्पन्न करता है। कमर्शियल बैंक अपने

[02:05:02] ग्राहकों से जमा स्वीकार करते एक विभिन्न

[02:05:04] राशि को रिजर्व बैंक के रूप में रखने के

[02:05:06] बाद शेष राशि को अर्थव्यवस्था में तरलता

[02:05:09] के रूप में इजेक्ट करने के लिए दे देते

[02:05:11] हैं। जनरली मनी मल्टीप्लायर एक प्रकार से

[02:05:14] कैश रिजर्व रेशो के व्युत्क्रमानुपाती

[02:05:16] होता है। हम आगे पढ़ेंगे कि ये कैश रिजर्व

[02:05:19] रेशो क्या है? मैं इसे बताऊंगा आगे। तो

[02:05:22] मनी मल्टीप्लायर जो होता है वो कैश रिजर्व

[02:05:24] रेशो के व्युत्क्रमानुपाती होता है। अगर

[02:05:27] कैश रिजर्व रेशो कम रहेगा मान लीजिए कि 4%

[02:05:31] है 100 का मल्टीप्लाई कर देंगे तो मनी

[02:05:33] मल्टीप्लायर 20 आ जाएगा। अगर कैश रिजर्व

[02:05:36] पांच हो जाएगा

[02:05:39] 25 आ जाएगा। पांच हो जाएगा तो यह 20 होगा।

[02:05:42] अगर यह 10 हो जाए तो मात्र यह 10 ही

[02:05:45] रहेगा। इसका मतलब यह है कि ₹1 का नोट

[02:05:49] छापोगे तो ₹25 का काम करेगा। ₹1 का नोट

[02:05:53] छापोगे तो ₹20 का काम करेगा। ₹1 का नोट

[02:05:56] छापोगे तो ₹10 का काम करेगा। जितना कैश

[02:05:59] रिजर्व रेशियो ज्यादा रहेगा मनी

[02:06:01] मल्टीप्लायर छोटा रहेगा। जितना कैश रिजर्व

[02:06:04] रेशो कम रहेगा मनी मल्टीप्लायर ज्यादा

[02:06:07] रहेगा। हम आगे पढ़ेंगे कैश रिजर्व रेशियो

[02:06:09] क्या होता है? इसे नगद आरक्षित अनुपात

[02:06:11] कहते हैं हम लोग।

[02:06:15] अब हमारे देश में आरबीआई ने एक प्रकार से

[02:06:18] 1998 में और बेटर तरीके के चार मनी

[02:06:22] मल्टीप्लायर दिए हुए हैं जो कि एक प्रकार

[02:06:25] से एम0 एनएम एनm1 एनएम2 एनएम3 के रूप में

[02:06:30] जाने जा रहे हैं जिसको न्यू मनी एग्रीगेट

[02:06:34] कहते हैं। न्यू नई चीजें आ गई है। जिसमें

[02:06:38] नैरो मनी के रूप में जनता के पास करेंसी

[02:06:40] बैंकिंग प्रणाली में वर्तमान जमाएं

[02:06:42] बैंकिंग प्रणाली के पास बचत जमा का मतलब

[02:06:45] करेंसी सेविंग अकाउंट में कितनी है और

[02:06:47] करंट अकाउंट में कितनी हैर आरबीआई के पास

[02:06:50] कितनी जमाएं थी लगभग वही है जो हमारे एम

[02:06:52] वन में होता था एनएम2 में एनएम वन के

[02:06:55] साथ-साथ जितने भी हमारे निवासियों की

[02:06:57] जमाएं हैं भारतीय लोगों की वो जमाएं जो एक

[02:07:01] वर्ष की सविदा में परिपक्व होगी एक साल

[02:07:03] में मैच्योर हो जाएगी और ब्रॉड मनी में

[02:07:06] एनएम टू को शामिल शामिल करने के बाद

[02:07:08] साथ-साथ लॉन्ग टर्म वाली डिपॉजिट को भी

[02:07:10] शामिल किया जाता है। यह नए तरीके का

[02:07:12] कांसेप्ट है पैसों का कैलकुलेशन करने का।

[02:07:15] मतलब देखो मैं आपको बता देता हूं। पहले

[02:07:17] पुराने तरीके से पैसे कैलकुलेट होते थे।

[02:07:19] अब कहने लगे कि नए तरीके से पैसों को

[02:07:21] कैलकुलेट करो क्योंकि कुछ ऐसी करेंसियां

[02:07:24] होती है जो एक साल के अंदर मैच्योर हो

[02:07:26] जाती है। कुछ ऐसे डिपॉजिट होते हैं और कुछ

[02:07:28] ऐसे डिपॉजिट होते हैं जो लंबे समय के बाद

[02:07:31] मैच्योर होंगे। तो ज्यादातर लोग वन ईयर

[02:07:33] वाली ही डिपोजिशन रखते हैं। तो इसलिए

[02:07:35] उन्होंने नया कैलकुलेशन शुरू किया। एनएम

[02:07:37] वन को निकालने के लिए वैल्यू्यूज दे दी।

[02:07:41] एनएम2 को निकालने के लिए एनएम वन के अलावा

[02:07:43] इन चीजों को जोड़ देंगे। जो एक साल के से

[02:07:46] कम वाली मैच्योरिटी में डिपॉजिट होते हैं

[02:07:48] और एनएम3 को निकालने के लिए एनएम2 के

[02:07:51] अलावा जो दीर्घावधिक डिपॉजिट होते हैं

[02:07:54] उनको भी शामिल कर दिया गया है।

[02:08:00] फिर उसके अलावा भी उन्होंने लिक्विडिटी भी

[02:08:03] कम्युनिटी समुच्चय नए बनाए हैं। L1, L2,

[02:08:06] L3 के आधार पर कि लिक्विडिटी किसकी

[02:08:08] ज्यादा, किसकी कम। ये नई वाली चीजों में

[02:08:10] बस इतना याद रखिएगा कि नए तरीके से

[02:08:13] कैलकुलेशन करने की शुरुआत की गई है। हमारे

[02:08:16] देश में डिजिटल करेंसी मैंने बताई थी कि

[02:08:18] शुरू हो चुका है लेकिन अभी भी बड़े स्तर

[02:08:20] पर डिजिटल करेंसी का उपयोग नहीं किया जा

[02:08:22] रहा है।

[02:08:25] भारतीय रिजर्व बैंक आरबीआई के द्वारा अपनी

[02:08:27] मौद्रिक नीति के अनुरूप जारी की गई

[02:08:29] राष्ट्रीय सोबेरियन मुद्रा है। डिजिटल

[02:08:31] रुपया। इट इज़ अ सोवेन करेंसी इशू बाय द

[02:08:34] आरबीआई इन अलाइनमेंट विथ इट मॉनिटरी

[02:08:37] पॉलिसी। ये आरबीआई के बैलेंस शीट पर देयता

[02:08:40] के रूप में दिखाई देता है। मतलब एक प्रकार

[02:08:42] से आरबीआई की लायबिलिटी कहलाएगा। क्योंकि

[02:08:44] जो भी नोट छापे जाते हैं वो सब लायबिलिटी

[02:08:46] आरबीआई की। यह अपने डिजाइन से ही

[02:08:49] मुद्रास्फीति के विरुद्ध बीमाकृत है। क्या

[02:08:51] इससे महंगाई नहीं होगी? एंड इट्स फील

[02:08:54] कन्वर्टेबल अगेंस्ट कमर्शियल बैंक मनी एंड

[02:08:57] कैश। यह मनी वाणिज्य बैंक और मुद्रा नगदी

[02:09:02] के स्वतंत्र रूप से परिवर्तनीय है। बस

[02:09:03] इतनी सी बात आपको याद रखनी है इसमें कि

[02:09:06] कोई भी इस दुनिया में ऐसी करेंसी नहीं है

[02:09:08] जो महंगाई ना लाती हो क्योंकि ऑब्वियसली

[02:09:11] मैंने बताया कि महंगाई के लिए जीडीपी के

[02:09:13] साथ तुलना होनी चाहिए। तो तीन को छोड़कर

[02:09:16] आप आंसर देख सकते हैं। 100% दो तो रहना ही

[02:09:20] चाहिए क्योंकि लायबिलिटी के रूप में आएगा।

[02:09:22] आरबीआई ने जारी किया हुआ है। इसे कन्वर्ट

[02:09:24] कर सकते हैं बड़े लिमिटेड मात्रा में। तो

[02:09:27] हम कहेंगे कि 1 2 4 इसमें ज्यादा बेटर

[02:09:30] आंसर रहेगा। इस बार देख लीजिएगा 2024 का

[02:09:32] जवाब। अब हम बात करने हैं बैंकिंग सिस्टम

[02:09:35] के बारे में। ये क्या चीज है? पुनः रिपीट

[02:09:38] कर दे रहा हूं समरी। कंफ्यूज मत होना। m0

[02:09:41] m1, m2, m3 और कुछ नहीं है। एक प्रकार से

[02:09:45] हमारी अर्थव्यवस्था में कितने नोट छापे जा

[02:09:48] रहे हैं। जिसको कहते हैं m0 वो अभी भी m0

[02:09:52] ही है। nm0 का मतलब भी वही लिया जाएगा।

[02:09:56] M1, M2, M3, M4, NM1, NM2, NM3 नए तरीके

[02:10:02] के कैलकुलेशन भी लाए गए हैं। ये एक्चुअल

[02:10:05] में हमारे करेंसी सर्कुलेशन को शो करते

[02:10:08] हैं। क्यों कैसे ऐसा कैलकुलेशन कर रहे

[02:10:10] हैं? इसका जवाब आपको मिल पा रहा है कि

[02:10:12] नहीं? क्योंकि नोट जितने का छपता है, उतने

[02:10:15] का वो काम नहीं करता। उससे ज्यादा का काम

[02:10:17] करता है। जितना ज्यादा लोग बैंकिंग सिस्टम

[02:10:21] से जुड़ेंगे उतना ही मनी मल्टीप्लायर बेटर

[02:10:24] होगा। मनी मल्टीप्लायर का मतलब होता है कि

[02:10:27] एक यूनिट वाला नोट कितने रुपए का काम करके

[02:10:30] आएगा। उसे कहते हैं मनी मल्टीप्लायर। मनी

[02:10:33] मल्टीप्लायर दिमाग में प्रवेश कर पा रहा

[02:10:36] है या नहीं मुझे जरा कमेंट्स करना तेजी से

[02:10:38] क्योंकि कई लोगों को यह समझ में नहीं आता

[02:10:40] था लेकिन शायद प्रैक्टिकली समझ में आ जाए।

[02:10:46] इस दुनिया में मनी मल्टीप्लायर से इससे

[02:10:50] अंदाजा लगता है आरबीआई को कि अच्छा हमें

[02:10:52] अगर अगर हमारे इस अर्थव्यवस्था में मल्टी

[02:10:56] मनी मल्टीप्लायर मान लीजिए हमारी

[02:10:58] अर्थव्यवस्था का 20 है। इधर ध्यान देना

[02:11:00] मनी मल्टीप्लायर हमारी अर्थव्यवस्था का 20

[02:11:03] है। मान लेते हैं कि ₹1 का नोट ₹20 का काम

[02:11:06] करता है। हमारे देश का जीडीपी मान लीजिए

[02:11:09] कि ₹1 लाख से बढ़ गया। ₹1 लाख से बढ़ गया

[02:11:15] तो हमारी जो आरबीआई वह ₹1 लाख के नोट नहीं

[02:11:18] छापेगी मेरे प्यारे लाल लालियों हमारी

[02:11:20] अर्थव्यवस्था जो है वो ₹1 लाख के नोट नहीं

[02:11:24] छापेगी। उसे पता है आरबीआई को कि मनी

[02:11:26] मल्टीप्लायर 20 है। ₹1 ₹20 के बराबर काम

[02:11:30] करता है। तो आरबीआई केवल और केवल ₹5,000

[02:11:34] के नए नोट छाप देगी ₹500 के और कहेंगे कि

[02:11:38] अब इसका सप्लाई करा दो काम चल जाएगा। मतलब

[02:11:41] आरबीआई को इससे ये पता चलता है कि उसे

[02:11:44] कितने नए नोट छापने हैं।

[02:11:48] मान लीजिए कि हमने आपको बताया कि मनी M3

[02:11:52] और जीडीपी हमेशा संतुलित रहना चाहिए।

[02:11:55] क्यों जीडीपी कैलकुलेट करते हैं? क्या

[02:11:57] लॉजिक समझ में आया? क्यों ये कैलकुलेट

[02:12:00] करते हैं? क्या यह लॉजिक समझ में आ रहा है

[02:12:02] अधिकतर लोगों को कि M3 क्यों हम कैलकुलेट

[02:12:04] कर रहे हैं? क्योंकि हमें अपनी

[02:12:06] अर्थव्यवस्था में देखना है कि पैसों और

[02:12:09] वस्तु सेवाएं जितनी उत्पादित हुई वो

[02:12:11] संतुलन में है कि नहीं है। तो अगर मान

[02:12:14] लीजिए कि हमारा जीडीपी बढ़ गया ₹1 लाख से

[02:12:17] तो हम ₹1 लाख के नोट नहीं छापेंगे। हम नोट

[02:12:20] केवल ₹5000 के छापेंगे। क्यों ₹5000 के

[02:12:24] नोट छापेंगे? क्योंकि वो M3 है। M3 अपने

[02:12:28] आप ही ₹1 लाख का बन जाएगा। जब हम ₹5000 के

[02:12:32] नोट छापेंगे। इसलिए जब हमारी अर्थव्यवस्था

[02:12:34] में जीडीपी बढ़ता है तो हमारे सरकारें

[02:12:38] नोटे नोट छापती है। आरबीआई नोट छापती है

[02:12:40] लेकिन उतना नहीं छापती है। क्या ऊपर के

[02:12:42] भेजे में ये बात प्रवेश कर पा रही है?

[02:12:45] आपने भले इसके पहले कई बार पढ़ा होगा

[02:12:47] लेकिन शायद मुझे उम्मीद है कि अभी भी

[02:12:49] क्लियर से अच्छे से समझ में आ गया होगा।

[02:12:51] भले ही हम बहुत फास्ट पढ़ रहे हैं। लेकिन

[02:12:54] दिमाग में यह बात प्रवेश कर रही होगी कि

[02:12:56] कितना जरूरी होता है ये कैलकुलेशन करना।

[02:13:00] QM3 को कैलकुलेट किया जाता है। ये सारे

[02:13:02] कैलकुलेशन क्यों किए जा रहे हैं? क्या ये

[02:13:05] पॉइंट आपके समझ में आ रहा है? पूरी

[02:13:07] अर्थव्यवस्था संतुलित रूप में चलाने के

[02:13:10] लिए आपको यह बैलेंस बनाए रखना पड़ता है।

[02:13:12] अगर यह बैलेंस बिगड़ा तो या तो

[02:13:14] अर्थव्यवस्था में इनफ्लेशन आ जाएगा,

[02:13:16] महंगाई आ जाएगी या अर्थव्यवस्था में मंदी

[02:13:19] आ जाएगी।

[02:13:22] क्योंकि वास्तविक रूप में कई बार

[02:13:24] विद्यार्थी इकोनॉमी इसलिए नहीं पढ़ पाते

[02:13:26] क्योंकि टेक्निकली उन्हें यह समझ में नहीं

[02:13:28] आता कि ऐसा क्यों कर रहे हैं, ऐसा क्यों

[02:13:30] कर रहे हैं? और ऐसे क्यों के जवाब नहीं

[02:13:32] मिल पाते तो क्लेरिटी नहीं आ पाती है। आइए

[02:13:35] अब बैंकिंग सिस्टम पर काम बात कर लेते

[02:13:37] हैं। हम जानेंगे कि बैंकों का इतिहास क्या

[02:13:39] रहा? वर्गीकरण कैसे किया जाता है? आरबीआई

[02:13:42] के क्या काम है? मॉनिटरी पॉलिसी को

[02:13:44] देखेंगे, शब्दावली देखेंगे, बैंकिंग सुधार

[02:13:46] और अन्य वित्तीय संस्थाओं की हम इसमें

[02:13:48] बातचीत करेंगे। तो ये हमारे लिए बहुत

[02:13:51] इंपॉर्टेंट है। प्रीलिम्स में इसके सवाल

[02:13:53] आते हैं। सबसे पहले तो बैंक क्या है? बैंक

[02:13:56] एक प्रकार का दलाल है। एक प्रकार का

[02:13:58] बिचोलिया है। एक प्रकार का मध्यस्थ है।

[02:14:01] किन लोगों के बीच का? उन लोगों के बीच में

[02:14:04] जहां पर बैंकों किस कुछ लोगों के पास

[02:14:06] सरप्लस में पैसा आ गया और कुछ लोगों के

[02:14:09] पास कमी हो गई पैसों की। जिनके पास सरप्लस

[02:14:12] में आ गया। वे किसी को पैसा उधार देना

[02:14:14] चाहते लेकिन उनको भरोसा नहीं है और जिनके

[02:14:17] पास पैसों की जरूरत है वो किसी से उधार

[02:14:20] लेना चाहते लेकिन उनको कोई दे नहीं रहा है

[02:14:22] तो एक बिचोलिया आ गया उसने कहा मैं भरोसा

[02:14:25] दिलाता हूं कि आप पैसा मेरे पास लेकर आ

[02:14:27] जाइए मैं जरूरतमंद को दे दूंगा और मेरी

[02:14:30] गारंटी है कि मैं लौटाऊंगा वो भले ही

[02:14:33] लौटाए या ना लौटाए तो एक मध्यस्थ है जो

[02:14:36] विश्वास के ऊपर निर्भर है। हमने उसके पास

[02:14:39] पैसे जमा कर दिए हैं। हो सकता है वह बदमाश

[02:14:42] निकले वह अलग चीज़ है कि बैंक ही डूब गई वह

[02:14:44] अलग चीज़ है। लेकिन जनरली भरोसे पर दुनिया

[02:14:46] चल रही है। तो एक भरोसे के साथ हम मध्यस्थ

[02:14:49] की बात मान लेते हैं। जो मनी सरप्लस वाले

[02:14:52] लोग होते हैं उनके उनको डर रहता है कि

[02:14:55] उनका पैसा कोई चोरी कर लेगा। किसी को उधार

[02:14:57] देंगे तो लौटाएगा नहीं। उनको डर रहता है

[02:15:00] कि ब्याज दर ठीक-ठाक नहीं मिलेगी। और कहीं

[02:15:03] ना कहीं वह ढूंढ रहे होते हैं ऐसे व्यक्ति

[02:15:05] को जिसको उसकी जरूरत होगी। जिसके पास

[02:15:08] पैसों की कमी है वह ब्याज दर लेने को

[02:15:10] तैयार है लेकिन एक निश्चित ब्याज दर लेंगे

[02:15:12] तभी लौटा पाएगा। एक प्रॉपर टाइम उसको मिल

[02:15:15] जाए तभी वह लौटा पाएगा और एक इन्वेस्टमेंट

[02:15:18] करने के लिए अपना विस्तार करने के लिए उसे

[02:15:20] पैसों की जरूरत है। तो इन सब का दुख दूर

[02:15:23] करने के लिए आ गया बैंक।

[02:15:25] हमारे देश में वैसे इस दुनिया में बैंक तो

[02:15:28] बहुत पहले से आए लेकिन हमारे देश में

[02:15:30] आधुनिक बैंक की शुरुआत कहीं ना कहीं हम कह

[02:15:32] सकते हैं कि यूरोपियन बैंकिंग सिस्टम के

[02:15:35] रूप में हुई। भारत का पहला बैंक था बैंक

[02:15:38] ऑफ हिंदुस्तान जो पूरी तरह से विदेशी

[02:15:40] कैपिटल से बना था। उस समय हमारे देश में

[02:15:42] ऐसे किसी कल्पना नहीं की गई थी कि कोई

[02:15:44] बिल्डिंग होगी जहां पर लेनदेन होगा। हमारे

[02:15:47] यहां महाजन हुआ करते थे। हमारे यहां पर

[02:15:50] शेट्टी लोग हुआ करते थे जो उधार देने में

[02:15:52] काम करते थे। अलेग्जेंडर और कंपनी ने

[02:15:55] हमारे देश में एक यूरोपियन बैंक की

[02:15:57] स्थापना की थी। एक प्रकार से और 1770 में

[02:16:02] कोलकाता में इसकी स्थापना की। कि वो अलग

[02:16:04] चीज है कि 60 साल में बैंक बंद हो गया।

[02:16:06] फिर भी ठीक-ठाक है। बैंक ऑफ हिंदुस्तान

[02:16:08] शुरू हुआ था। फिर 1813 में एजेंसी ग्रह के

[02:16:12] पतन के बाद तीन निजी अंशधारियों द्वारा

[02:16:16] तीन प्रेसिडेंशियल बैंक बनाए गए। मतलब एक

[02:16:19] प्रकार से ईस्ट इंडिया कंपनी जो ब्रिटेन

[02:16:21] की थी उसी ने 1806 में

[02:16:26] सबसे पहले कोलकाता में जिसका पहले नाम था

[02:16:28] बैंक ऑफ कोलकाता। बाद में बैंक ऑफ बंगाल

[02:16:31] बना दिया। 1806 में इसकी स्थापना की। फिर

[02:16:34] 1840 में बैंक ऑफ मुंबई या बैंक ऑफ बॉम्बे

[02:16:38] इसका नाम बैंक ऑफ बॉम्बे था क्योंकि उस

[02:16:40] समय मुंबई नहीं कहते थे। बैंक ऑफ बॉम्बे

[02:16:43] नाम रखा गया। 1840 में और मद्रास जिसे आज

[02:16:47] चेन्नई कहते हैं। 1843 में बैंक ऑफ मद्रास

[02:16:51] नाम रखा गया। बाद में 1921 में इन तीनों

[02:16:54] को जोड़ दिया गया और इन तीनों को जोड़कर

[02:16:57] इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया बना दिया गया।

[02:17:00] इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया। 1955 में हमारे

[02:17:04] देश की सरकार ने इसे अपने कब्जे में ले

[02:17:07] लिया और इसका नाम रख दिया स्टेट बैंक ऑफ

[02:17:10] इंडिया। तब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के

[02:17:12] साथ-साथ इसके कई सहयोगी भी थे। जैसे स्टेट

[02:17:16] बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर, स्टेट बैंक ऑफ

[02:17:19] सौराष्ट्र, स्टेट बैंक ऑफ इंदौर, स्टेट

[02:17:22] बैंक ऑफ पटियाला, स्टेट बैंक ऑफ मैसूर ऐसे

[02:17:25] कई सहयोगी थे। धीरे-धीरे 2008 में स्टेट

[02:17:30] बैंक ऑफ सौराष्ट्र को जोड़ दिया गया। 2010

[02:17:33] में स्टेट बैंक ऑफ इंदौर को इसमें मर्ज कर

[02:17:36] दिया गया और 2017 में हमारे देश की सरकार

[02:17:39] ने इसके सभी सहयोगों सहयोगियों को मर्ज

[02:17:42] करके स्टेट बैंक ऑफ इंडिया बना दिया। मतलब

[02:17:45] अब केवल हमारे देश में स्टेट बैंक ऑफ

[02:17:48] इंडिया है, बीकानेर नहीं है, जयपुर नहीं

[02:17:50] है, इंदौर नहीं है, पटियाला नहीं है। सब

[02:17:52] बंद कर दिए गए। तो ये स्टेट बैंक ऑफ

[02:17:55] इंडिया की शुरुआत रियल में 1806 में हुई

[02:17:57] है। काफी पुराने बैंक है ये।

[02:17:59] [नाक से की जाने वाली आवाज़]

[02:18:01] 1 जुलाई 1955 को इसका नेशनलाइजेशन हुआ।

[02:18:04] नेशनलाइजेशन मतलब राष्ट्रीयकरण।

[02:18:06] राष्ट्रीयकरण मतलब सरकार ने पूरी तरह से

[02:18:08] अपने कब्जे में ले लिया। इसका नाम फिर

[02:18:10] स्टेट बैंक ऑफ इंडिया रख दिया गया।

[02:18:12] इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया की जगह पर। 1807

[02:18:15] में जॉइंट संयुक्त पूंजी अधिनियम पारित

[02:18:18] हुआ। हमारे देश में अंग्रेजों ने कानून

[02:18:20] पारित किया जिसके बाद कई लोग मिलकर बैंक

[02:18:24] बना सकते थे। जॉइंट पूंजी का मतलब कई लोग

[02:18:26] मिलकर उसके बाद फिर बैंकें बननी शुरू हो

[02:18:29] गई। 1865 में इलाहाबाद बैंक बना। 1881 में

[02:18:33] अवध कमर्शियल बैंक बना। अवध कमर्शियल बैंक

[02:18:36] भारत का पहला ऐसा बैंक था जिसके प्रबंधन

[02:18:39] में जिसके मैनेजमेंट में भारतीय लोगों को

[02:18:41] जगह मिली। मतलब अमीर भारतीय लोग इसके

[02:18:44] मालिक में बनने लगे। पूरी तरह से इंडियन

[02:18:46] बैंक नहीं था। लेकिन फिर भी पहली बार

[02:18:49] इंडियन लोग किसी बैंक का संचालन करने लगे।

[02:18:52] पंजाब नेशनल बैंक जो कि 1895 में बना पूरी

[02:18:55] तरह से भारतीयों के द्वारा मैनेज होने

[02:18:58] वाला पहला बैंक था जिसमें कोई विदेशी

[02:19:00] व्यक्ति मालिक नहीं मतलब विदेशी व्यक्ति

[02:19:03] मैनेजमेंट में नहीं था। पूरे इंडियन लोग

[02:19:05] थे। इसी अवधि में कई और बैंक भी बने। बैंक

[02:19:08] ऑफ इंडिया बना, बैंक ऑफ बड़ौदा हुआ,

[02:19:10] सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया बना और बैंक ऑफ

[02:19:13] मैसूर बना। ऐसे कई और बैंक बने। सेंट्रल

[02:19:16] बैंक ऑफ इंडिया याद रखिएगा सेंट्रल बैंक

[02:19:19] ऑफ इंडिया भारत का ऐसा बैंक है जिसका

[02:19:22] मालिक भी बैंक के भारतीय था और जिसको

[02:19:24] चलाने वाले भी भारतीय थे शुद्ध रूप से

[02:19:27] पहला बैंक जो पूरी तरह से इंडियन कहलाएगा

[02:19:30] क्योंकि ये जो बैंक ऑफ बंगाल था बैंक ऑफ

[02:19:34] बॉम्बे थे ये हमारे नहीं थे वो तो बाद में

[02:19:36] राष्ट्रीयकरण हुआ है। बाकी बैंक में भी

[02:19:39] अवध कमर्शियल बैंक में कुछ भारतीय आए थे।

[02:19:42] पंजाब जो बैंक था उसमें पंजाब नेशनल बैंक

[02:19:45] में पूरी तरह से भारतीयों ने चलाया लेकिन

[02:19:47] उसका मालिक केवल भारतीय नहीं थे। सेंट्रल

[02:19:50] बैंक ऑफ इंडिया रियल में पूरी तरह से

[02:19:52] भारतीय बैंक था। इसकी स्थापना पोच खानवाला

[02:19:55] के द्वारा की गई थी। इसके पहले चेयरमैन

[02:19:57] फिरोजशाह मेहता बने। 1930 में भारत में

[02:20:00] बैंकों की संख्या तो काफी ज्यादा हो गई।

[02:20:03] लेकिन जो कंज्यूमर थे जो लोग इनमें खाते

[02:20:05] खोलते थे उनका संरक्षण नहीं होता था। तब

[02:20:08] डॉ. भीमराव अंबेडकर जी के सजेशन की बात

[02:20:11] करें या दुनिया भर में आए हुए संकट की बात

[02:20:14] करें तो जो भी ब्रिटेन की सरकार थी उसने

[02:20:18] कहा कि इन सभी बैंकों को रेगुलेट करने के

[02:20:20] लिए एक अच्छी संस्था होनी चाहिए। तब

[02:20:22] उन्होंने इस परिस्थिति में 1934 में कानून

[02:20:26] पारित किया आरबीआई एक्ट।

[02:20:29] 1 अप्रैल 1935 को भारत में बना भारतीय का

[02:20:33] सेंट्रल बैंक जिसको रियल में सेंट्रल आरबी

[02:20:37] भारतीय रिजर्व बैंक कहेंगे जो वास्तविक

[02:20:40] रूप में पूरे बैंकों का बैंक है सबको

[02:20:43] रेगुलेट करने का इसके पास कंट्रोल है।

[02:20:45] पहले तो इसकी ओनरशिप प्राइवेट लोगों के

[02:20:48] पास थी। 1 जनवरी 1949 को फाइनली इसका

[02:20:52] नेशनलाइजेशन किया गया। राष्ट्रीयकरण कर

[02:20:54] दिया गया। सबसे पहले इसको पूरी तरह से

[02:20:56] सरकार ने कब्जे में लिया ताकि बाकी सभी

[02:20:59] बैंकों को कंट्रोल किया जा सके। 1949 में

[02:21:02] बैंकिंग एक्ट पारित करके इसको शक्तियां दी

[02:21:05] गई कि ये बाकी बैंकों को कैसे कंट्रोल

[02:21:07] करेगा और 2013 में इसमें कुछ संशोधन करके

[02:21:11] इसकी शक्तियों को और बढ़ाया गया। 1969 में

[02:21:15] 14 बड़े बैंक जिनकी प्रॉपर्टी मिनिमम

[02:21:18] संपत्ति ₹50 करोड़ की थी। उन बैंकों को

[02:21:21] सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया था। मतलब

[02:21:24] सरकार ने उसको उसका मालिकाना अपने पास रखा

[02:21:28] ताकि मध्यम वर्ग को भी बैंकों से जोड़ सके

[02:21:30] क्योंकि पहले मध्यम वर्ग भी नहीं पहुंच

[02:21:32] पाता था बैंकों में। 1975 में आरआरबी

[02:21:35] रीजनल रूलर बैंक की स्थापना की ताकि

[02:21:37] गांवों को बैंकिंग सिस्टम से जोड़ा जा

[02:21:39] सके। 1980 में पुनः सरकार ने छह बड़े

[02:21:43] बैंकों का नेशनलाइजेशन किया। 200 करोड़ की

[02:21:46] प्रॉपर्टी वाले बैंकों को अपने कब्जे में

[02:21:48] ले लिया। नाबार्ड ग्रामीण क्षेत्र में

[02:21:51] बैंकिंग व्यवस्था को और मजबूत करने के लिए

[02:21:54] नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर और रूरल

[02:21:56] डेवलपमेंट की स्थापना हुई। 1993 में न्यू

[02:21:59] न्यू बैंक ऑफ इंडिया को मर्ज कर दिया गया।

[02:22:02] इतना कोई इतना याद रखने की जरूरत नहीं।

[02:22:06] 2008 में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के साथ

[02:22:08] स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र 2010 में स्टेट

[02:22:11] बैंक ऑफ इंदौर को मर्ज कर दिया गया। और

[02:22:13] 2017 में तो सरकार ने कई बैंकों को मर्ज

[02:22:16] कर दिया। 2017 में लगभग सभी के सभी पांचों

[02:22:19] सहयोगी जो थे स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर,

[02:22:22] जयपुर, स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद, स्टेट

[02:22:24] बैंक ऑफ मैसूर, स्टेट बैंक ऑफ पटियाला,

[02:22:27] स्टेट बैंक ऑफ ट्रावनकोर सब मर्ज कर दिए

[02:22:29] और कहा कि अब केवल स्टेट बैंक ऑफ इंडिया

[02:22:31] रहेगा। 2018 में सरकार के जो नेशनलाइज्ड

[02:22:36] बैंक थे उनमें से विजय बैंक, देना बैंक और

[02:22:38] बैंक ऑफ बड़ौदा तीनों को मिलाकर बैंक ऑफ

[02:22:41] बड़ौदा बन गया। मतलब बैंक ऑफ बड़ौदा में

[02:22:43] मर्ज कर दिया। 2020 में ओरिएंटल बैंक ऑफ

[02:22:46] कॉमर्स यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया का पंजाब

[02:22:48] नेशनल बैंक में विलय कर दिया गया। 2020

[02:22:52] में सिंडिकेट बैंक का बैंक आंध्रा बैंक और

[02:22:54] कॉरपोरेशन बैंक का यूनियन बैंक इंडिया में

[02:22:57] और इलाहाबाद बैंक का इंडियन बैंक में मर्ज

[02:22:59] कर दिया। ये क्या याद रखना है? हां ये याद

[02:23:02] रखना है। ये इतने मर्ज क्यों कर रहे थे हम

[02:23:04] लोग? क्योंकि हमारे देश में बैंकों की

[02:23:06] संख्या तो बहुत ज्यादा थी। लेकिन विश्व भर

[02:23:09] में हमारे पास ऐसा कोई बैंक नहीं था जो

[02:23:12] टॉप 50 में आ सकता हो। टॉप 10 में आ सकता

[02:23:14] हो। हमारे बैंक छोटे-छोटे बैंक थे और जब

[02:23:17] छोटे बैंक होते तो उतना बेटर वो काम नहीं

[02:23:19] कर पाते। ऐसा कई कमेटियों ने सिफारिश की

[02:23:22] थी। तो हमने कहा भाई ठीक है कई बैंकों को

[02:23:24] जोड़कर कुछ ही बैंक बनाएंगे। भारत में सात

[02:23:27] आठ ही बैंक रहेंगे लेकिन काफी बड़े और

[02:23:29] मजबूत बैंक रहेंगे ताकि वह कभी भी डूबे

[02:23:33] ना। कभी भी वह संकट में ना आए। इसलिए हमने

[02:23:36] बड़े-बड़े बैंकों का निर्माण किया। तो यह

[02:23:39] सब कुछ सरकार के जो नेशनलाइज बैंक थे उनका

[02:23:42] मर्ज होना शुरू हुआ। IDBI बैंक जो कि

[02:23:45] सरकार का बैंक था उसका प्राइवेटाइजेशन कर

[02:23:48] दिया। केंद्र सरकार और भारतीय जीवन बीमा

[02:23:50] निगम ने IDBI बैंक की हिस्सेदारी बेचने और

[02:23:53] प्राइवेटाइजेशन का निर्णय लिया। केंद्र

[02:23:56] सरकार के पास IDBI का सीधा कंट्रोल 30.48%

[02:24:00] शेयर थे जो कि उन्होंने बेचे। भारतीय जीवन

[02:24:03] बीमा निगम ने IDBI बैंक में 30.24%

[02:24:06] हिस्सेदारी बेची ताकि हमारे देश में इस

[02:24:09] बैंक को बेटर किया जा सके।

[02:24:15] तो गवर्नमेंट ने इतना परसेंट बेच दिया।

[02:24:18] उसके बाद LIC ने इतना बेच दिया। गवर्नमेंट

[02:24:20] के पास 49% LIC के पास इतना परसेंट था।

[02:24:24] पब्लिक के पास उसका इतना शेयर होल्डिंग

[02:24:26] था। उसको बेचकर कहीं ना कहीं

[02:24:27] प्राइवेटाइजेशन में कन्वर्ट कर दिया। अब

[02:24:29] उसे पूरी तरह से प्राइवेटाइज कर दिया।

[02:24:31] समरी कर दे रहा हूं मैं। भारत में पहला

[02:24:34] बैंक बैंक ऑफ हिंदुस्तान। भारत के द्वारा

[02:24:37] भारतीयों द्वारा पहला प्रबंधित बैंक बैंक

[02:24:39] ऑफ अवध कमर्शियल बैंक। फिर भारत का भारतीय

[02:24:44] पूंजी के साथ पूरी तरह से बना हुआ बैंक

[02:24:46] मतलब बैंक के संस्थापक लाला राजपत राय थे।

[02:24:49] पंजाब नेशनल बैंक था। पूरी तरह से भारत

[02:24:53] में पहला विदेशी बैंक जो हमारे देश का

[02:24:56] उसका मतलब से जो हेड ऑफिस है वो हमारे देश

[02:25:00] में नहीं है। किसी विदेश में है पूरी तरह

[02:25:02] से एचएसबीसी भारत में आने वाला पहला

[02:25:04] विदेशी बैंक था। पूरी तरह से भारत के बाहर

[02:25:08] पहला भारतीय बैंक ने शाखा खोली थी बैंक ऑफ

[02:25:10] इंडिया ने। फिर एटीएम की शुरुआत करने वाला

[02:25:14] भी एचएसबीसी बैंक ही था जिसने एटीएम की

[02:25:16] शुरुआत की थी हमारे देश में 1987 में।

[02:25:19] इंटरनेट बैंकिंग की सुविधा देने वाला पहला

[02:25:22] बैंक बना ICICI बैंक जिसने इंडियन बैंक एक

[02:25:26] प्रकार से इंटरनेट से बैंकिंग सुविधाएं दी

[02:25:29] और म्यूच्यूल फंड बेचने का काम पहली बार

[02:25:31] शुरू किया था हम कह सकते हैं कि एसबीआई ने

[02:25:36] क्रेडिट कार्ड जारी करने वाला पहला बैंक

[02:25:38] सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया सेंट्रल बैंक ऑफ

[02:25:41] इंडिया भारत का पूरी तरह से पहला भारतीय

[02:25:44] बैंक जिसका मालिक मैनेजमेंट करने वाले

[02:25:46] भारतीय पहला डिजिटल बैंक हमारे देश इसका

[02:25:49] Dजी बैंक है। इसका कोई ऑफिस नहीं है। कहीं

[02:25:51] पर भी यह मतलब इसका हेड ऑफिस होगा लेकिन

[02:25:54] ये इसकी कहीं शाखाएं नहीं है। सब ऑनलाइन

[02:25:56] इसमें खाता खोल सकते हैं। सब ऑनलाइन होता

[02:25:58] है। इसमें डीजी बैंक कहते हैं। भारत में

[02:26:01] मर्चेंट बैंकिंग शुरू करने वाला बैंक जो

[02:26:03] पहला बैंक था ग्रांडलेस बैंक। मर्चेंट

[02:26:06] बैंकिंग मतलब शेयर मार्केट बाकी चीजों से

[02:26:08] जुड़ने वाला। ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी शुरू

[02:26:11] करने वाला 2021 में ताकि बहुत अच्छे से जो

[02:26:16] लेनदेन होते हैं उसको ऑटोमेटिक लेनदेन में

[02:26:18] कन्वर्ट किया गया। बैंकिंग सेवा में रोबोट

[02:26:21] पेश करने वाला पहला बैंक HDFC ये पूछे

[02:26:24] जाते हैं। विश्व के तीन सबसे बड़े बैंक

[02:26:27] जेपी मॉ्गन चेस इस समय यूएस का बैंक सबसे

[02:26:31] बड़ा बैंक है। दुनिया का बहुत बड़ा बैंक

[02:26:33] माना जाता है। फिर है बैंक ऑफ अमेरिका और

[02:26:37] तीसरे नंबर पर है इंडस्ट्रियल एंड

[02:26:39] कमर्शियल बैंक ऑफ चाइना। एक जमाने में ये

[02:26:42] बैंक नंबर वन पर आ गया था। लेकिन अब वापस

[02:26:44] जेपी मॉ्गन बैंक ऑफ अमेरिका और

[02:26:47] इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल बैंक दुनिया के

[02:26:50] तीन सबसे बड़े बैंक हैं। भारत का सबसे

[02:26:53] बड़ा सरकारी बैंक पब्लिक सेक्टर का बैंक

[02:26:56] है SBI भारत का सबसे बड़ा प्राइवेट सेक्टर

[02:26:59] का बैंक है HDFC अगर हम इन दोनों से भी

[02:27:03] तुलना कर ले तो सबसे बड़े बैंक के रूप में

[02:27:05] HDFC ही आएगा। मतलब भारत का सबसे बड़ा

[02:27:09] बैंक HDFC है। भारत का सबसे बड़ा बैंक। अब

[02:27:13] बैंकों का वर्गीकरण बैंकों का

[02:27:15] क्लासिफिकेशन दो आधारों पर किया जाएगा।

[02:27:18] सबसे पहले तो हम कहेंगे कमर्शियल बैंक और

[02:27:20] दूसरे कहेंगे नॉन कमर्शियल बैंक। कमर्शियल

[02:27:24] बैंक जो लाभ के लिए काम करते हैं। नॉन

[02:27:27] कमर्शियल बैंक जो लाभ के लिए नहीं बस

[02:27:30] लोगों की मदद के लिए काम करते हैं।

[02:27:34] कमर्शियल बैंक में भी दो प्रकार के

[02:27:37] कमर्शियल बैंक है। फिर मतलब कमर्शियल बैंक

[02:27:39] भी दो प्रकार के होंगे।

[02:27:42] शेड्यूल कमर्शियल बैंक जिसको आरबीआई ने

[02:27:44] अपनी सूची में जगह दी है। और नॉन शेड्यूल

[02:27:47] कमर्शियल बैंक। क्या नॉन कमर्शियल बैंक है

[02:27:51] दुनिया में? जी हां, बहुत सारे हैं। जैसे

[02:27:53] रियलिटी में अगर हम बातचीत करें तो

[02:27:55] इस्लामी बैंक या इस्लामिक बैंक इस्लामिक

[02:27:59] बैंक जो होते हैं ना वह लाभ पर काम नहीं

[02:28:01] मतलब वो ब्याज नहीं लेते और देते हैं।

[02:28:04] इस्लामिक इस्लाम में ब्याज को लेना देना

[02:28:06] पाप कहलाता है। तो इस्लामिक बैंक जो बनाए

[02:28:09] जाते हैं उसका मेन कंसेप्ट होता है कि भई

[02:28:12] थोड़ा बहुत जो लाभ मिलेगा वो सबको दिया

[02:28:14] जाएगा जिसने पैसे जमा किए थे। तो इस्लामिक

[02:28:17] बैंक ब्याज लेते और देते नहीं हैं। वो नॉन

[02:28:21] कमर्शियल बैंक कहलाते हैं। जिसमें बैंक

[02:28:24] होल्डर्स जो होते हैं जो भी खाते खोलने

[02:28:26] वाले लोग होते हैं उन्हीं को बैंक की

[02:28:28] सदस्यता दे दी जाती है। केरल में ऐसा

[02:28:31] इस्लामिक बैंक है। नॉन शेड्यूल कमर्शियल

[02:28:34] बैंक आरबीआई का जो कानून बना हुआ था 1934

[02:28:38] का उसमें एक सूची है जिसका नाम है द्वितीय

[02:28:42] अनुसूची। एक मतलब लिस्ट है। उस लिस्ट में

[02:28:45] जो बैंक शामिल नहीं होते हैं, उन्हें कहते

[02:28:47] हैं नॉन शेड्यूल कमर्शियल बैंक। यह आरबीआई

[02:28:50] से दैनिक बैंकिंग गतिविधियों के लिए धन

[02:28:52] उधार लेने की अनुमति नहीं रखते हैं।

[02:28:54] आरबीआई द्वारा बनाए गए नियमों का कठोरता

[02:28:57] से पालन नहीं करते हैं। यहां तक कि आरबीआई

[02:29:00] के द्वारा बताया गया कैश रिजर्व रेशो या

[02:29:02] आरबीआई के पास जमा नहीं करते बल्कि खुद के

[02:29:05] पास रखते हैं। तो ऐसे बैंक जो आरबीआई की

[02:29:08] सेकंड शेड्यूल में नहीं आते।

[02:29:11] आरबीआई की दैनिक जरूरतें

[02:29:14] इनकी दैनिक जरूरतों के लिए आरबीआई इनको

[02:29:16] मदद भी नहीं करता। आरबीआई के बनाए हुए

[02:29:19] नियमों का इतना स्ट्रिक्टली फॉलो भी नहीं

[02:29:21] करते और वो सीआरआर जो रखना होता है वो

[02:29:24] आरबीआई के पास नहीं बल्कि खुद के पास रखते

[02:29:26] हैं।

[02:29:28] ऐसे बैंकों पर लोग थोड़ा विश्वास कम रखते

[02:29:31] हैं। कुछ छोटे-छोटे क्षेत्रों में अपनी

[02:29:33] मर्जी से चलाए जाते हैं।

[02:29:43] फिर है अनुसूचित कमर्शियल बैंक आरबीआई की

[02:29:46] द्वितीय अनुसूची में शामिल होंगे। बिल्कुल

[02:29:49] ठीक उल्टा कह दीजिए।

[02:29:52] सेकंड शेड्यूल में शामिल होंगे। याद रखना

[02:29:54] है। याद ही रख लीजिए इसको। दैनिक बैंकिंग

[02:29:57] गतिविधि के लिए अगर आरबीआई से इनको जरूरत

[02:29:59] पड़ती है तो आरबीआई इनकी मदद करती है।

[02:30:02] आरबीआई के दौरान जो नियम बनाए उसका कठोरता

[02:30:04] से पालन करते हैं और यह जो कैश रेशियो

[02:30:07] रेशियो होता है यह आरबीआई के पास जमा करने

[02:30:09] जाते हैं 15-15 दिनों में। हमारे देश में

[02:30:12] जितने भी बैंक आपने सुने हैं HDFC, ICICI,

[02:30:16] SBI अधिकतर जितने नाम आपने सुने सब के सब

[02:30:20] शेड्यूल बैंक में आ जाते हैं। आरबीआई

[02:30:22] अधिनियम 1934 की दूसरी अनुसूची में

[02:30:25] सूचीबद्ध होंगे वह नहीं होंगे। इनकी

[02:30:27] चुक्ता पूंजी ₹5 लाख या उससे अधिक होनी

[02:30:30] चाहिए थी। पहले ऐसा मापदंड था। लेकिन अब

[02:30:33] ₹500 करोड़ कर दिया गया है। वर्तमान में

[02:30:36] इनकी मिनिमम पूंजी ₹500 करोड़ की

[02:30:39] बातचीत होती है। वहां पर नॉन शेड्यूल के

[02:30:42] लिए ऐसा कोई कंडीशन नहीं है। अब भारतीय

[02:30:44] रिजर्व बैंक के पास सीआरआर जमा रखना पड़ता

[02:30:47] है समय-समय पर। मतलब अपना रिटर्न जमा करना

[02:30:50] पड़ता है। वहां सीआरआर जमा को अपने पास

[02:30:52] रखना होता है। रिटर्न दाखिल की कोई जरूरत

[02:30:54] नहीं होती है। आरबीआई से धन उधार लेने का

[02:30:56] अधिकार होता है। कई प्रकार की मदद मिलती

[02:30:59] है। यह आरबीआई से जनरली धन उधार नहीं

[02:31:01] प्राप्त कर पाते हैं। वे आर्थिक रूप से

[02:31:04] ज्यादा स्टेबल होते हैं। जमाकर्ताओं पर

[02:31:06] कोई बुरा असर नहीं डालते हैं। यहां जनरली

[02:31:08] रिस्क रहता है।

[02:31:14] नॉन शेड्यूल बैंक

[02:31:17] हमारे देश में जो कमर्शियल बैंक है वह कई

[02:31:20] टाइप के हैं। कमर्शियल बैंक सबसे पहले है

[02:31:22] पब्लिक। सरकार ने जो नेशनलाइजेशन किया था

[02:31:25] तो बड़ी संख्या में हमारे देश में

[02:31:27] सार्वजनिक कमर्शियल बैंक हैं। प्राइवेट

[02:31:30] कमर्शियल बैंक है। जैसे HDFC, ICICI इनका

[02:31:34] कभी नेशनलाइजेशन नहीं हुआ। या आज भी

[02:31:36] प्राइवेट एंटिटीज हैं। फॉरेन कमर्शियल

[02:31:38] बैंक हमारे देश में कई प्रकार के विदेशी

[02:31:41] बैंक भी काम कर रहे हैं। जिनकी मुख्य

[02:31:44] शाखाएं उनके अपने देश में है। लेकिन उनकी

[02:31:46] ब्रांचेस है। जैसे सिटी बैंक हो गया,

[02:31:48] एचएसबीसी वाला बैंक हो गया या फिर चार्टर

[02:31:52] एंड स्टैंडर्ड बैंक हो गया, ब्रिटेन वाला

[02:31:55] कई प्रकार के बैंक हैं। अब सरकार हमारे

[02:31:57] देश में कुछ नए बैंक भी आ गए। स्मॉल

[02:32:00] फाइनेंस बैंक आ गए हैं। पेमेंट बैंक आ गए

[02:32:02] हैं। रीजनल रूलर बैंक को अब कमर्शियल बैंक

[02:32:06] में क्लासिफाइड कर दिया गया। पहले ये

[02:32:08] कमर्शियल बैंक नहीं कहलाता था। लेकिन अब

[02:32:11] इसको कमर्शियल बैंक में क्लासिफाइड कर

[02:32:13] दिया गया है। पब्लिक सेक्टर का बैंक उसे

[02:32:16] कहेंगे जिसमें भारत सरकार की हिस्सेदारी

[02:32:18] रहेगी। SBI पंजाब नेशनल बैंक, केन बैंक,

[02:32:22] बैंक ऑफ बड़ौदा बैंक ऑफ इंडिया प्राइवेट

[02:32:25] बैंक जिसमें कि प्राइवेट लोगों का

[02:32:27] मालिकाना हक रहेगा। ICICI Bank, HDFC

[02:32:30] Bank, Axis Bank, Kotak Mahindra Bank,

[02:32:32] Yes Bank, विदेशी बैंक में स्टैंडर्ड

[02:32:35] चार्टर्ड बैंक, City Bank, HSBC बैंक,

[02:32:38] DUSHS बैंक, BNP, Pibia कई विदेशी बैंक भी

[02:32:41] हमारे देश में और रीजनल रूलर बैंक जो कि

[02:32:44] वर्तमान में भले ही संख्या में कम हो गए

[02:32:47] हैं लेकिन आज भी अवेलेबल है।

[02:32:51] आज भी मिल जाते हैं।

[02:32:54] सबसे पहले पब्लिक कमर्शियल बैंक जिसमें

[02:32:56] सरकार की हिस्सेदारी मिनिमम 51% या उससे

[02:33:00] ज्यादा होगी। वर्तमान में अब ये केवल 12

[02:33:02] है। सबसे बड़ा एसबीआई है। प्राइवेट की अगर

[02:33:05] हम बातचीत करें तो बैंकिंग विनियमन अधि

[02:33:07] अधिनियम 1949 का जो बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट

[02:33:11] है उसके अंतर्गत इनको लाइसेंस मिलता है।

[02:33:14] 51% से ज्यादा हिस्सेदारी प्राइवेट लोगों

[02:33:17] के पास होती है। वर्तमान में कुल 21 बैंक

[02:33:20] हमारे पास हैं। उधर 12 12 का उल्टा 21

[02:33:23] HDFC सबसे बड़ा बैंक है। पब्लिक सेक्टर के

[02:33:27] जो बैंक होते हैं, वह मेनली काम कर रहे

[02:33:29] होते हैं ताकि जनता तक बैंकिंग सुविधाओं

[02:33:31] को पहुंचाया जा सके। लेकिन यह जो प्राइवेट

[02:33:34] बैंक होते हैं, यह बेनिफिट कमाने के लिए

[02:33:36] काम कर रहे होते हैं। पब्लिक सेक्टर के जो

[02:33:38] बैंक होते हैं, उनके यहां पर सुविधाएं

[02:33:40] उतनी अच्छी नहीं होती है जितना कि

[02:33:42] प्राइवेट वालों के पास होती है। पब्लिक

[02:33:44] सेक्टर के जो बैंक होते हैं, वह गांवों तक

[02:33:46] पहुंचने का प्रयास करते हैं। प्राइवेट

[02:33:49] सेक्टर के बैंक का मेन मकसद लाभ कमाना

[02:33:51] होता है। इसलिए उन जगहों पर जहां उसकी

[02:33:53] जरूरत ज्यादा होती है।

[02:33:57] पब्लिक सेक्टर जो बैंक होते हैं उसमें

[02:33:59] इंटरेस्ट रेट उल्टा कम होता है जो क्योंकि

[02:34:02] वह ब्याज दर उतना अच्छा नहीं देते जबकि

[02:34:04] प्राइवेट वाले जो होते हैं वो इंटरेस्ट

[02:34:07] रेट सेविंग खाते पर ज्यादा देते हैं। मतलब

[02:34:10] बेटर तरीके से वह लोगों को बेनिफिट

[02:34:12] पहुंचाते हैं। पब्लिक सेक्टर बैंक की

[02:34:15] ग्रोथ अपॉर्चुनिटी कम होती है। प्राइवेट

[02:34:17] की ग्रोथ अपॉर्चुनिटी ज्यादा होती है।

[02:34:18] कस्टमर बेस यहां ज्यादा होता है क्योंकि

[02:34:21] यह दूर-दूर तक पहुंच जाते हैं। या कस्टमर

[02:34:23] बेस थोड़ा सा कम होता है। यहां पर जॉब

[02:34:26] सिक्योरिटी ज्यादा होती है या जॉब

[02:34:27] सिक्योरिटी लोगों की थोड़ी कम होती है

[02:34:29] क्योंकि सारा प्रमोशन सारी नौकरी मेरिट पर

[02:34:32] डिपेंड करती है। फिर विदेशी बैंक ऐसा बैंक

[02:34:35] जिसका मुख्यालय भारत के बाहर है। लेकिन

[02:34:38] भारत में किसी भी स्थान पर एक प्राइवेट

[02:34:40] संस्था के रूप में इनका एक ब्रांच है।

[02:34:43] आरबीआई के नियमों का इन्हें भी पालन करना

[02:34:45] होता है। पर यह केवल आरबीआई के नियम नहीं

[02:34:48] बल्कि अपने स हेड ऑफिस का भी कंट्रोल

[02:34:50] सुनते रहते हैं। भारत में स्थापित और

[02:34:52] रजिस्टर्ड अन्य देशों के बैंक होते हैं।

[02:34:54] वर्तमान में भारत में ऐसे कुल 44 बैंकों

[02:34:57] की शाखाएं हैं। सबसे बड़ा विदेशी बैंक जो

[02:35:00] हमारे देश में जिसकी शाखाएं सबसे ज्यादा

[02:35:03] हैं। स्टैंडर्ड चार्टर बैंक है यूके का।

[02:35:06] फिर है स्मॉल फाइनेंस बैंक। यह नए प्रकार

[02:35:09] के बैंक बनाए गए हैं 2011 में। वह वित्तीय

[02:35:13] संस्थान जो देश के बैंकिंग सुविधा रहित

[02:35:16] क्षेत्र को वित्तीय सेवाएं देंगे। जहां पर

[02:35:18] आज तक बैंकें नहीं पहुंच पाई थी वहां

[02:35:20] जाएंगे गांव में अर्धशहरी क्षेत्र में

[02:35:23] स्मॉल फाइनेंस बैंक बिल्कुल कमर्शियल बैंक

[02:35:25] ही होते हैं। बस नाम के रूप में छोटे होते

[02:35:28] हैं। मतलब इनमें जो पूंजी होती है वो

[02:35:30] थोड़ा सा कम हो सकती है। छोटी ज्यादा

[02:35:32] शाखाएं नहीं होगी। ग्रामीण क्षेत्र में

[02:35:35] काम करेंगे। सारा होगा। इसमें खाता

[02:35:38] डिपॉजिट वाला भी खोता खोला जा सकता है।

[02:35:40] सेविंग खाता भी खोला जा सकता है। यह कर्जे

[02:35:42] भी दे सकते हैं। कमर्शियल बैंक ही है। बस

[02:35:45] छोटे लेवल का नाम है। इसलिए इसका नाम

[02:35:47] स्मॉल फाइनेंस बैंक रखा है। 2011 में इसकी

[02:35:51] शुरुआत की गई थी। फाइनेंशियल इंक्लूजन

[02:35:53] करने के लिए उन लोगों तक बैंकिंग सुविधाएं

[02:35:55] पहुंचाने के लिए। वर्तमान में इसकी

[02:35:58] न्यूनतम पूंजी पहले 100 करोड़ रखी गई

[02:36:00] लेकिन अब 200 करोड़ की बातचीत कर दी गई

[02:36:02] है। इसमें प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग 75%

[02:36:06] की होती है। यह क्या होता है? प्रायोरिटी

[02:36:07] सेक्टर लेंडिंग। प्रायोरिटी सेक्टर

[02:36:09] लेंडिंग का मतलब होता है कि हमारे देश में

[02:36:12] बैंकके जब कर्जा देगी तो निश्चित भाग सबसे

[02:36:16] कमजोर लोगों को कर्जे के रूप में देगी।

[02:36:19] जिसमें एससी, एसटी, ओबीसी, एग्रीकल्चर के

[02:36:22] लोग, एजुकेशन का लोन, रिन्यूएबल एनर्जी का

[02:36:25] लोन शामिल होगा। तो ऐसे सेक्टर को उन्हें

[02:36:28] अपना कर्जा देना ही पड़ता है। उसे कहते

[02:36:31] हैं प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग। मतलब

[02:36:33] वरीयता वाला क्षेत्र जहां पर उन्हें कर्जा

[02:36:36] देना ही पड़ेगा। तो नॉर्मली हमारे देश में

[02:36:38] जो कमर्शियल बैंक होते हैं उन्हें अपने

[02:36:41] टोटल कर्जे का 40% प्रायोरिटी सेक्टर

[02:36:44] लेंडिंग के रूप में देना पड़ता है। लेकिन

[02:36:46] ऐसे स्मॉल फाइनेंशियल बैंक को 75% लोन लोन

[02:36:50] ऐसे ही लोगों को देना पड़ेगा।

[02:36:54] उनकी जो शाखाएं होगी 25% बैंकिंग शाखाएं

[02:36:57] उन जगहों पर खुलेगी जहां कभी कोई बैंक

[02:37:00] नहीं था। बैंक ऋण का 50% ऋण ₹25 लाख की

[02:37:04] सीमा से ज्यादा नहीं होगा। मतलब छोटे-छोटे

[02:37:07] ऋण ही देंगे और इसमें कोई जॉइंट वेंचर

[02:37:10] नहीं होते। बैंक के समान ही काम करते

[02:37:12] लेकिन छोटे लेवल पर काम करेंगे। बहुत बड़े

[02:37:15] लेवल पर ये काम नहीं करते हैं। एक होता है

[02:37:18] स्मॉल फाइनेंशियल बैंक और एक होता है

[02:37:20] पेमेंट बैंक। आगे हम देखते हैं पेमेंट

[02:37:22] बैंक। पेमेंट बैंक भी 2011 का कंसेप्ट था।

[02:37:26] एक वित्तीय संस्था जो उन लोगों को

[02:37:27] बुनियादी बैंकिंग सेवाएं देती है जिनके

[02:37:30] पास बैंकिंग सुविधाएं नहीं थी। ध्यान से

[02:37:32] सुनना। पेमेंट बैंक केवल जमाएं लेता रहेगा

[02:37:35] केवल जमा। वो लोन नहीं दे सकता किसी को।

[02:37:39] अब बड़ा सवाल है कि महोदय अगर वह लोन नहीं

[02:37:42] देगा तो फिर चलाएगा कैसे? ब्याज कैसे

[02:37:44] देगा? जिन्होंने कि जमाए हैं तो तो पेमेंट

[02:37:47] बैंक को अपना सारा पैसा केवल गवर्नमेंट

[02:37:50] सिक्योरिटीज में ही देना होता है या यह

[02:37:52] पेमेंट बैंक किसी बड़े कमर्शियल बैंक को

[02:37:55] लोन दे सकता है। इसका काम है लोगों से

[02:37:58] पैसे को जमा करके बैंकिंग सिस्टम में बाकी

[02:38:01] बड़े बैंकों को कर्जा देना या सरकार को

[02:38:04] कर्जा देना। पर यह किसी आम नागरिक को

[02:38:06] कर्जे नहीं दे सकता है। क्रेडिट कार्ड

[02:38:08] नहीं दे सकता है। सेविंग डेबिट कार्ड जारी

[02:38:11] कर सकता है। फिक्स्ड डिपॉजिट ले सकता है।

[02:38:14] लेकिन यह किसी को कर्जे नहीं दे सकता है।

[02:38:16] सबसे बड़ा डिफरेंस याद रखना। पेमेंट बैंक

[02:38:20] लेनदेन को सुविधाजनक बनाने पर ध्यान

[02:38:22] केंद्रित करता है। जिनके पास बैंकिंग

[02:38:24] सुविधाएं नहीं है। 2015 में आरबीआई के

[02:38:26] द्वारा 11 पेमेंट बैंक की अनुमति दी गई

[02:38:29] थी। वर्तमान में जो Paytm पेमेंट बैंक है

[02:38:32] उसको पूरी तरह से बंद करा दिया गया। उसका

[02:38:35] लाइसेंस छीन लिया गया। ₹100 करोड़ की

[02:38:37] मिनिमम पूंजी की बातचीत थी। ग्राहकों से

[02:38:40] जमा तो ले सकता है लेकिन वह किसी को लोन

[02:38:43] नहीं दे सकता है। डेबिट कार्ड ले सकता है

[02:38:45] लेकिन क्रेडिट कार्ड नहीं दे सकता है।

[02:38:47] प्रत्येक व्यक्ति तक ज्यादा से ज्यादा ₹1

[02:38:49] लाख तक की जमाएं ले सकता है। डेबिट कार्ड

[02:38:52] जारी कर सकता है। किंतु क्रेडिट कार्ड

[02:38:54] जारी नहीं कर सकता है।

[02:38:57] पेमेंट बैंक रिमोट एरियाज में बैंकिंग

[02:38:59] सुविधाएं देगा। जो लो इनकम लोग हैं उनको

[02:39:03] कहीं ना कहीं बैंकों की सुविधाएं देगा कि

[02:39:05] जमा करिए। रिटर्न अच्छे देता है डिपॉजिट

[02:39:08] पर। आसानी से ट्रांसफर हो सकता है पैसों

[02:39:11] का और सबसे ज्यादा जरूरी कि क्षेत्रीय

[02:39:13] असमानताओं को दूर करने में मदद करता है।

[02:39:16] याद रखिएगा कि जो पेमेंट बैंक होते हैं

[02:39:18] वहां पर डिपॉजिट की लिमिट होती है। रेगुलर

[02:39:20] कमर्शियल बैंक में कोई लिमिट नहीं होती

[02:39:22] है। जो स्मॉल फाइनेंशियल बैंक होता है वो

[02:39:25] सब करते हैं। लेना देना दोनों। ये केवल

[02:39:28] लेना करते हैं। देना नहीं होता इनमें। यह

[02:39:30] केवल देना किसको करेंगे? सरकार को कर्जा

[02:39:32] देंगे केवल और केवल।

[02:39:35] तो यहां पर मिनिमम 100 करोड़ की बातचीत

[02:39:37] होती है। वहां 500 करोड़ की बातचीत होती

[02:39:39] है। यहां पर एक प्रकार से टाइमिंग कम लगता

[02:39:42] है खाता खोलने में।

[02:39:45] फिर है रीजनल रूलर बैंक। इसका मेन मकसद था

[02:39:48] ग्रामीण क्षेत्र में बैंकिंग सुविधाओं को

[02:39:50] मजबूत करना। लेकिन इन्होंने काम ही अच्छा

[02:39:53] नहीं किया। पहले बड़ी संख्या में थे। फिर

[02:39:55] धीरे-धीरे कई सारे रीजनल रूलर बैंक को

[02:39:57] जोड़ दिया गया। क्योंकि इनका परफॉर्मेंस

[02:39:59] बहुत खराब रहा। 2 अक्टूबर 1975 को गांधी

[02:40:02] जयंती के दिन इसको लाया गया था।

[02:40:04] एग्रीकल्चर और रूरल एरियाज को बैंकिंग

[02:40:07] सुविधाएं, ऋण सुविधाएं उपलब्ध कराने के

[02:40:09] लिए। हर बैंक के निर्माण में 50% पैसा

[02:40:12] भारत सरकार देती थी। मतलब आरबीआई देती थी।

[02:40:15] 15% पैसा राज्य सरकार देती थी। और एक

[02:40:18] स्पॉन्सर्ड बैंक होता था जिसको प्रायोरिटी

[02:40:21] सेक्टर लेंडिंग की शर्त पूरी करनी है। वह

[02:40:23] इसको दे देते थे। इसको पैसा दे दिया तो

[02:40:25] प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग अपने आप पूरी

[02:40:27] हो जाता था। इसको अब नाबार्ड रेगुलेट करता

[02:40:30] है। इन तीन लोगों से मिलकर इस बैंक का गठन

[02:40:33] होता था। लेकिन इसका काम बहुत घटिया रहा।

[02:40:36] धीरे-धीरे इनकी संख्या कम कर दी गई। अब

[02:40:39] हमारे देश में 2025 में एक राज्य एक रीजनल

[02:40:42] रूलर बैंक का कंसेप्ट लाया गया है। जिसके

[02:40:45] तहत 10 राज्यों में और एक केंद्र शासित

[02:40:47] प्रदेश में इसको शुरू किया गया है। देश

[02:40:50] में रीजनल रूलर बैंक की संख्या अब केवल 28

[02:40:52] रह गई है। 28 सोचिए कि पहले कितने रहे

[02:40:56] होंगे? इस कदम का उद्देश्य बैंक की

[02:40:58] एफिशिएंसी को बेटर करना है। ये जो 28

[02:41:01] आरआरबी होंगे ये 700 से ज्यादा जिलों में

[02:41:03] 22,000 से ज्यादा शाखाएं खोलेंगे पर एक

[02:41:06] देश एक राज्य का केवल एक ही आरआरबी प्रमुख

[02:41:10] होगा। नई नीति वित्तीय सेवा विभाग द्वारा

[02:41:12] प्रारंभ की गई सुधारात्मक पहल है ताकि यह

[02:41:15] बेटर तरीके से काम कर सके। यह प्रक्रिया

[02:41:18] शुरुआत में 2005 में शुरू हुई भारतीय

[02:41:20] रिजर्व बैंक द्वारा गठित डॉक्टर व्यास

[02:41:22] कमेटी के रिकमेंडेशन पर इसको कहा गया था

[02:41:25] कि इसको जोड़ लीजिए अब क्योंकि यह बढ़िया

[02:41:27] परफॉर्म नहीं कर रहे हैं।

[02:41:31] 2006 से 2010 में 196 थी इनकी संख्या। अब

[02:41:36] इनकी संख्या 2010 तक आते-आते 82 हो गई।

[02:41:40] 2013 से 2015 में इनकी संख्या और कम कर दी

[02:41:43] गई केवल 56। तीसरे चरण में इनकी संख्या

[02:41:47] केवल 43 कर दी गई। और अब देखो कि चौथे चरण

[02:41:50] में अब इनकी संख्या मात्र 28 रहेगी। मतलब

[02:41:54] हर राज्य हर राज्य में केवल एक ही रहेगा।

[02:41:57] भले उसकी शाखाएं खोल दी जाएगी। उसकी

[02:41:59] शाखाएं कई तरीके से बनाई जा सकती हैं।

[02:42:02] लेकिन मेन मकसद यही रखा गया है ताकि

[02:42:05] ज्यादा से ज्यादा चीजों को बेटर किया जा

[02:42:07] सके।

[02:42:13] फिर आते हैं दूसरे प्रकार के बैंक जिसको

[02:42:15] कहते हैं कोऑपरेटिव बैंक। देखो कोऑपरेटिव

[02:42:18] बैंक का मतलब क्या है? पहले ये समझना

[02:42:20] जरूरी है। जैसे कोई एक व्यक्ति कंपनी

[02:42:23] खोलता है तो लाभ कमाने के लिए। कोऑपरेटिव

[02:42:25] बैंक में क्या होता है कि 10 लोग मिलकर

[02:42:29] एक दूसरे का सहयोग करने के मकसद से बैंक

[02:42:32] बनाते हैं। कोऑपरेटिव सहकारी। अब यहां

[02:42:36] समझना है आपको। कोऑपरेटिव जो बैंक होते

[02:42:38] हैं वह लाभ के पपस से नहीं बल्कि सहयोग के

[02:42:41] पपस से काम करते हैं। कोऑपरेटिव बैंक में

[02:42:44] कोई मालिक नहीं बनता है बल्कि अध्यक्ष

[02:42:46] बनता है। चेयरमैन बनता है। जैसे मैं बता

[02:42:50] देता हूं यहां चुनाव होते हैं। जो भी

[02:42:52] कोऑपरेटिव बैंक में खाता खोलेंगे वो उसके

[02:42:55] मेंबर कहलाएंगे। जो कोऑपरेटिव बैंक बनाने

[02:42:58] में मदद करते हैं वो उसके मेंबर कहलाएंगे।

[02:43:03] यहां पर डेमोक्रेसी के तहत लोकतांत्रिक

[02:43:05] तरीके से बैंक चलाया जाएगा। एक चेयरमैन

[02:43:09] होगा जो चुना जाएगा मतदान के माध्यम से।

[02:43:12] एक वाइस चेयरमैन होगा। बैंक का बोर्ड काम

[02:43:16] करेगा और ये सब डेमोक्रेटिक तरीके से

[02:43:18] निर्णय लेंगे कि चलो भाई बैंक को कैसे

[02:43:20] चलाना है। इनका मेन पर्पस होता है कि बैंक

[02:43:24] के कर्मचारियों की सैलरी निकल जाए और बैंक

[02:43:27] के लिए जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर की पूर्ति

[02:43:29] हो जाए। इतना पैसा बैंक में आ जाए कि इतनी

[02:43:33] व्यवस्था को हम सेट कर सके। वास्तविक रूप

[02:43:36] में यह लाभ कमाना नहीं चाहते। वैसे तो

[02:43:38] वर्तमान में बड़े स्तर पर यह भी करोड़ों

[02:43:40] रुपए कमा रहे हैं। लेकिन इनका मेन मकसद

[02:43:42] कोऑपरेशन होता है। सहयोग होता है। हमारे

[02:43:45] देश में कई सरकारी कोऑपरेटिव बैंक है। कई

[02:43:48] प्राइवेट कोऑपरेटिव बैंक हैं। प्राइवेट

[02:43:50] कोऑपरेटिव बैंक बढ़िया काम करते हैं।

[02:43:52] लेकिन यह बैंक डूब भी जाते हैं। अधिकतर

[02:43:54] बैंक जितनी डूबी है हमारे देश में वह

[02:43:57] कोऑपरेटिव बैंक ही डूबती है।

[02:44:00] उसके पीछे का रीजन क्या है? उसके पीछे का

[02:44:03] रीजन यह है क्योंकि हमारे देश में हमारे

[02:44:06] देश में वास्तविक रूप में इनको चलाने के

[02:44:10] लिए विशेषज्ञता नहीं होती है। यह

[02:44:12] डेमोक्रेटिक तरीके से चलते हैं तो कई बार

[02:44:14] डूब जाते हैं। पर अभी आरबीआई ने सुधार करा

[02:44:17] दिया। 2022-23 में नए दिशा निर्देश दे दिए

[02:44:21] कि कोई भी कोऑपरेटिव बैंक हो हर कोऑपरेटिव

[02:44:24] बैंक को हर कोऑपरेटिव बैंक में 50% जो

[02:44:29] डायरेक्टर रहेंगे वो जानकार होने चाहिए

[02:44:32] जिनको बैंक चलाने का अनुभव होगा। पहले ऐसा

[02:44:36] नहीं रखा जाता था क्योंकि लगातार

[02:44:37] कोऑपरेटिव बैंक के डूबने की खबरें आती थी।

[02:44:41] लोगों का पैसा डूब जाता था। इसलिए आप लोग

[02:44:44] याद रखिएगा कि कमर्शियल बैंक नहीं डूबते।

[02:44:47] बहुत रेयरली कभी कोई बहुत बड़ी मंदी आ जाए

[02:44:50] तब कमर्शियल बैंक डूबते हैं। कोपरेटिव

[02:44:53] बैंक के ऊपर रिस्क रहता है। लेकिन

[02:44:55] कोऑपरेटिव बैंक ब्याज भी अच्छा देते हैं

[02:44:57] इसलिए लोग कोऑपरेटिव बैंक के पास पैसा

[02:44:59] ज्यादा जमा करते हैं। हमारे देश में

[02:45:02] कोऑपरेटिव जो बैंक होते हैं वो दो प्रकार

[02:45:04] के हैं। शहरी कोऑपरेटिव बैंक और ग्रामीण

[02:45:07] कोऑपरेटिव बैंक। यह जो ग्रामीण कोऑपरेटिव

[02:45:10] बैंक है यह दो प्रकार के हैं। सरकार ने

[02:45:12] लॉन्ग टर्म के लिए कर्जे देने के लिए बनाए

[02:45:14] हैं। शॉर्ट टर्म के लिए बनाए हैं। जैसे

[02:45:17] स्टेट कोऑपरेटिव बैंक, सेंट्रल कोऑपरेटिव

[02:45:19] बैंक जो डिस्ट्रिक्ट लेवल पर काम करते हैं

[02:45:21] और प्राइमरी एग्रीकल्चर क्रेडिट

[02:45:23] सोसाइटियां प्राइमरी एग्रीकल्चर क्रेडिट

[02:45:26] सोसाइटी को हम पैक्स कहते हैं। यह बहुत

[02:45:28] महत्वपूर्ण है। प्राथमिक साख समितियां

[02:45:31] कहते हैं हम इनको। प्राथमिक

[02:45:34] कृषि साख समितियां।

[02:45:37] फिर है सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक जो

[02:45:39] डिस्ट्रिक्ट लेवल में काम करते हैं।

[02:45:41] सेंट्रल

[02:45:43] सहकारी बैंक जो कि जिस जिला स्तर पर काम

[02:45:46] करते हैं और एक राज्य स्तरीय कोऑपरेटिव

[02:45:48] बैंक होते हैं। पर जो लॉन्ग टर्म वाले

[02:45:51] होते हैं जो कि पांचप साल 10-10 साल के

[02:45:53] लिए काम करते हैं। हमारे देश में ऐसा लैंड

[02:45:56] डेवलपमेंट बैंक है जो दीर्घकालिक पैसे

[02:45:59] देता है या प्राइमरी कोऑपरेटिव एग्रीकल्चर

[02:46:02] एंड रूलर डेवलपमेंट बोर्ड हो सकते हैं।

[02:46:04] ऐसी कई अन्य संस्थाएं जो इसमें मदद करती

[02:46:07] चलती है। कोऑपरेटिव बैंक सहकारी बैंक से

[02:46:10] तात्पर्य छोटे वित्तीय संस्थान से है जिसे

[02:46:13] व्यक्तियों के एक समूह द्वारा अपनी

[02:46:16] विशिष्ट समुदाय की पूंजी आवश्यकताओं को

[02:46:19] पूरा करने के लिए शुरू किया जाता है कि भ

[02:46:21] गांवों की जरूरतों को शहर की जरूरत को

[02:46:23] किसी विशिष्ट क्षेत्र की जरूरत को पूरा

[02:46:26] करने के लिए ऐसी वित्तीय संस्थानों का

[02:46:28] स्वामित्व और नियंत्रण उनके सदस्यों के

[02:46:30] पास होता है। संचालन की देखरेख के लिए

[02:46:33] बोर्ड के सदस्यों को डेमोक्रेटिक तरीके से

[02:46:35] चुना जाता है। मतलब यहां पर पूरी तरह से

[02:46:38] डेमोक्रेसी मदद करती है। हमारे देश में 97

[02:46:41] व कॉन्स्टिट्यूशनल अमेंडमेंट 2011 में

[02:46:44] आर्टिकल 191 सी में इस बात की फ्रीडम देता

[02:46:48] है कि संघ या सहकारी समिति बनाने की

[02:46:50] फ्रीडम मिलती है। 43 बी डीपीएसपी में लिखा

[02:46:54] गया है कि सहकारी समितियों के विकास को

[02:46:57] बढ़ावा देने के लिए सरकार वचनबद्ध रहेगी।

[02:47:01] शहरी कोऑपरेटिव बैंक, अर्बन कोऑपरेटिव

[02:47:03] बैंक प्राथमिक सहकारी बैंक हैं। शहरी

[02:47:06] अर्धशहरी क्षेत्र में काम करते हैं। हमारे

[02:47:08] देश में 1500 से ज्यादा कोऑपरेटिव बैंक

[02:47:11] हैं। एकल राज्य वाले कोऑपरेटिव बैंक का

[02:47:13] रेगुलेशन संबंधित राज्य सरकार करती है।

[02:47:16] लेकिन अगर कोई कोऑपरेटिव बैंक दो राज्य,

[02:47:18] तीन राज्य, चार राज्य, कई राज्यों में

[02:47:20] फैला हुआ कोऑपरेटिव बैंक है तो उसे फिर

[02:47:23] आरबीआई कंट्रोल करती है। 2021 में आरबीआई

[02:47:26] के पूर्वी डिप्टी गवर्नर एन एस विश्वनाथन

[02:47:29] की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई कि

[02:47:32] अर्बन कोऑपरेटिव बैंक को कैसे बेहतर किया

[02:47:34] जा सके। तो उन्होंने कहा कि इसके चार लेवल

[02:47:36] बना दीजिए। जो बहुत बड़े कोऑपरेटिव बैंक

[02:47:39] है और जो बहुत छोटे कोऑपरेटिव बैंक हैं जो

[02:47:41] बहुत बड़े कोऑपरेटिव बैंक है उसका कंट्रोल

[02:47:43] सरकार ने अपने पास रखने का प्रयास किया।

[02:47:48] शहरी सहकारी बैंक की कार्यप्रणाली

[02:47:50] नियामकीय ढांचे निगरानी तंत्र को मजबूत

[02:47:52] करने और सुधारों की रूपरेखा निर्मित करने

[02:47:54] के मकसद से चार लेवल में टिए वन जिनके पास

[02:47:58] ₹100 करोड़ से ज्यादा की जमाएं होती ₹100

[02:48:00] करोड़ तक की जमाएं होती है। टियर टू 100

[02:48:03] से लेकर ₹1000 करोड़ तक की जमाएं होती है।

[02:48:06] जिनके पास ₹1000 करोड़ से लेकर ₹100 करोड़

[02:48:09] तक की जमाएं होती है और जिनके पास ₹100

[02:48:11] करोड़ से ज्यादा की जमाएं होती है। ऐसे

[02:48:14] चार टियर में अर्बन कोऑपरेटिव बैंक को

[02:48:16] बांटने की सलाह दी गई। फिर हमारे देश में

[02:48:19] सुधार कर दिया गया कोऑपरेटिव बैंक को बेटर

[02:48:22] करने के लिए। केंद्रीय सहकारिता मंत्रालय

[02:48:25] हमारे देश में एक नया मिनिस्टर मिनिस्ट्री

[02:48:27] बनाई गई थी। 2011 के 97वें संविधान संशोधन

[02:48:30] की मदद से राष्ट्रीय शहरी सहकारी वित्त और

[02:48:33] विकास निगम नाम की एक संस्था बनाई गई।

[02:48:36] नेशनल अर्बन कोऑपरेटिव फाइनेंस एंड

[02:48:39] डेवलपमेंट कॉरपोरेशन बनाया गया। आरबीआई के

[02:48:42] द्वारा सहकारी बैंकों पर गठित विश्वनाथन

[02:48:44] कमेटी के रिकमेंडेशन के आधार पर सहकारी

[02:48:47] क्षेत्र का रेगुलेशन करने के लिए एक

[02:48:49] अंब्रेला ऑर्गेनाइजेशन बनाया गया जो इसको

[02:48:52] रेगुलेट करेगा ताकि इन क्रेडिट सोसाइटियों

[02:48:55] में घपलेबाजी कम से कम हो। हमारे देश में

[02:48:58] जो रूलर कोऑपरेटिव बैंक होते हैं वो तीन

[02:49:01] प्रकार के होते हैं। एक होती है प्राइमरी

[02:49:03] क्रेडिट कमेट या पैक्स, दूसरा होता है

[02:49:06] डिस्ट्रिक्ट लेवल पर सेंट्रल कोऑपरेटिव

[02:49:08] बैंक और तीसरे होते हैं गांवों के लिए काम

[02:49:10] करने वाले स्टेट कोऑपरेटिव बैंक। इनका माई

[02:49:13] बाप होता है सेंट्रल सेंट्रल वाला और

[02:49:15] सेंट्रल का माई-बाप होता है कोऑपरेटिव

[02:49:18] वाला। मान लीजिए कि एक डिस्ट्रिक्ट में 10

[02:49:20] गांव है तो 10 गांवों की प्राइमरी

[02:49:22] सोसाइटियां जो होती हैं अगर उनको कभी

[02:49:24] पैसों की जरूरत पड़ जाए या उनके पास

[02:49:26] ज्यादा पैसा जमा हो जाए तो डिस्ट्रिक्ट

[02:49:28] लेवल के कोऑपरेटिव बैंक में जमा करेंगे।

[02:49:31] अब एक राज्य में अगर मान लो कि 40

[02:49:33] डिस्ट्रिक्ट है तो 40 डिस्ट्रिक्ट का पूरा

[02:49:35] मालिक रहेगा राज्य सहकारी बैंक और इन सबका

[02:49:38] मालिक होता है नाबार्ड।

[02:49:41] इनका मेन मकसद होता है प्राइमरी सेक्टर को

[02:49:43] बेटर करना। पिछड़े क्षेत्र के विकास में

[02:49:46] सहयोग प्रदान करना। कर्जे देकर प्राइमरी

[02:49:49] साख समितियां जो ग्रामीण स्तर की सबसे

[02:49:52] बेसिक यूनिट होती है और गांव में इनके

[02:49:54] माध्यम से बहुत से काम होते हैं। यह केवल

[02:49:57] ऋण देने का काम नहीं करते। आप अपने गांव

[02:49:59] में देखना प्राइमरी क्रेडिट कमेटियां ऋण

[02:50:01] देने का काम करती है। फर्टिलाइजर बेचने का

[02:50:04] काम करती है। राशन की दुकानें इनके

[02:50:06] कंट्रोल में होती है। और वर्तमान में जो

[02:50:09] मोदी जी की प्रधानमंत्री औषधालय आ गया है

[02:50:13] जिसमें सस्ती दवाइयां मिलती है। ये

[02:50:15] दवाइयों को खोलने का भी अधिकार अब इनको

[02:50:17] मिल गया है। तो ये मल्टीपर्पस काम करने के

[02:50:20] लिए बनाए गए हैं ताकि गांवों के विकास में

[02:50:22] इनका अपना एक योगदान रहे। यहां तक कि

[02:50:25] एमएसपी के तहत यह कई राज्यों में खरीददारी

[02:50:28] का भी काम करने में मदद करते हैं। राज्य

[02:50:31] स्तर पर राज्य सहकारी बैंक के अध्यक्षता

[02:50:33] वाली त्रिस्तरीय सहकारी ऋण संरचना की

[02:50:36] अंतिम कड़ी के रूप में त्रिस्तरीय मतलब

[02:50:38] राज्य स्तरीय कोऑपरेटिव बैंक, सेंट्रल

[02:50:40] कोऑपरेटिव बैंक और प्राइमरी क्रेडिट

[02:50:42] कमेटियां जो हम कह सकते हैं कि एक प्रकार

[02:50:46] से स्टेट लेवल की कोऑपरेटिव बैंक होता है।

[02:50:49] वहां से कर्जा डिस्ट्रिक्ट लेवल की वाली

[02:50:51] पर मिलता है और डिस्ट्रिक्ट वाले से पैक

[02:50:53] को मिल पाता है। प्राइमरी क्रेडिट

[02:50:55] कमेटियों को मिल पाता है। जिला केंद्रीय

[02:50:58] सहकारी बैंक पैक के साथ काम करते हैं। साथ

[02:51:00] ही साथ ये सीधे किसानों से जुड़े हैं। पैक

[02:51:03] द्वारा विभिन्न कृषि और कृषि गतिविधि हेतु

[02:51:06] किसानों को अल्पकालिक और मध्यम अवधि के ऋण

[02:51:08] दिए जाते हैं। सबसे पहली बार 1904 में पैक

[02:51:12] की शुरुआत हुई थी।

[02:51:15] फिर केंद्रीय या जिला सहकारी बैंक जिले

[02:51:18] में स्थित समस्त सहकारी समितियां अनिवार्य

[02:51:20] रूप से इसके मेंबर होते हैं और जिले की

[02:51:22] समस्त प्राइमरी साख समितियों को यह

[02:51:24] कंट्रोल करता है और राज्य सहकारी बैंक में

[02:51:27] सहकारी साख संगठन की सबसे सर्वोच्च बॉडी

[02:51:30] मानी जाती है और पूरे राज्य के सभी

[02:51:32] डिस्ट्रिक्ट लेवल के कोऑपरेटिव बैंक को यह

[02:51:34] कंट्रोल करते हैं। तो ये तीन चरणों का

[02:51:37] इसमें लेवल होता है। इसके अलावा ग्रामीण

[02:51:40] लेवल में दीर्घकालिक ऋण प्रदान करने के

[02:51:42] लिए कुछ संस्थाएं विशेष रूप से बनाई गई है

[02:51:44] जो गांव में जमीन खरीदने के लिए सुधार

[02:51:46] करने के लिए 3 साल 5 साल तक के ऋण उपलब्ध

[02:51:50] कराते हैं। ये सभी राज्यों ने नहीं बनाए

[02:51:52] हैं। ये कुछ राज्यों में उपलब्ध होते हैं।

[02:51:55] तो कमर्शियल बैंक जो लाभ के लिए काम करते

[02:51:57] हैं। कोऑपरेटिव बैंक जो सर्विस सेवाएं

[02:52:00] देने के लिए काम करते हैं। कोई लाभ हानि

[02:52:01] का लक्ष्य नहीं होता है। यह आरबीआई के

[02:52:04] बैंकिंग रेगुलेशन के तहत कंट्रोल किए जाते

[02:52:06] हैं। ये कोऑपरेटिव सोसाइटी के एक्ट 1965

[02:52:09] के तहत कंट्रोल किए जाते हैं। इनका टारगेट

[02:52:12] जनरल पब्लिक कॉरपोरेट्स और गवर्नमेंट होते

[02:52:15] हैं। ये एग्रीकल्चर बेस्ड और स्मॉल बिजनेस

[02:52:17] को मदद करते हैं ग्रामीण क्षेत्र में। याद

[02:52:21] रखना भले ही हमारे देश में कोऑपरेटिव बैंक

[02:52:24] गांव में बड़ी संख्या में है लेकिन इतने

[02:52:26] बड़े नहीं होते हैं। अगर पूछा जाए कि

[02:52:29] हमारे देश में एग्रीकल्चर में सबसे ज्यादा

[02:52:31] लोन कौन देता है? तो कमर्शियल बैंक। भले

[02:52:34] ही हम बात कर लेते कि कमर्शियल बैंक कम

[02:52:36] होंगे लेकिन इनकी शाखाएं ज्यादा इनका

[02:52:39] विस्तार ज्यादा इनका आकार ज्यादा है तो

[02:52:41] एसबीआई के द्वारा दिया गया कर्जा एचडीएफसी

[02:52:44] के द्वारा दिया गया कर्जा ICICI के द्वारा

[02:52:47] दिए गए कर्जे जो होंगे वो हमेशा

[02:52:49] एग्रीकल्चर में ज्यादा आएंगे नो डाउट

[02:52:51] रीजनल रूलर बैंक हमने बनाए कोऑपरेटिव बैंक

[02:52:54] बनाए गांव को और बेहतर तरीके से सुविधाएं

[02:52:56] देने के लिए लेकिन ये इतने बड़े आकार के

[02:52:59] नहीं होते हैं फिर हमारे देश में कुछ

[02:53:01] डेवलपमेंट बैंक या फाइनेंशियल

[02:53:03] इंस्टीट्यूशन भी होते हैं जो एक विशेष

[02:53:06] उद्देश्य के लिए बनाए जाते हैं। आरबीआई

[02:53:09] इसका गठन करती है ताकि देश में कोई विशेष

[02:53:11] सेक्टर को मदद करने के लिए ऐसे बैंकों का

[02:53:14] गठन किया जाता है।

[02:53:17] विकास बैंक भारत में बैंकिंग प्रणाली के

[02:53:20] अंतर्गत विशिष्ट वित्तीय संस्थान है जो

[02:53:22] भारतीय अर्थव्यवस्था के उन क्षेत्र को

[02:53:24] दीर्घकालिक वित्त और सहायता प्रदान करते

[02:53:26] हैं जिनमें रिस्क अधिक है। जिन्हें वाणिज

[02:53:29] वाणिज्यिक बैंकों से पर्याप्त ऋण नहीं मिल

[02:53:31] पाता है। एक तो इंफ्रास्ट्रक्चर बेटर करने

[02:53:34] के लिए, उद्यमशीलता, एमएसएमई को बढ़ावा

[02:53:36] देने के लिए, एक्सपोर्ट को प्रमोट करने के

[02:53:38] लिए, एग्रीकल्चर को प्रमोट करने के लिए

[02:53:40] समय-समय पर ऐसी संस्थाएं बनाई जाती है।

[02:53:43] जैसे हमारे देश में आरबीआई के द्वारा

[02:53:45] नाबार्ड बनाया गया, एकिम बनाया गया,

[02:53:50] नेशनल हाउसिंग बैंक बनाए गए, सिडबी बनाया

[02:53:52] गया, मुद्रा बैंक बनाई गई। नाबार्ड 1982

[02:53:56] में 100 करोड़ की पूंजी के साथ इसका

[02:53:58] निर्माण किया गया। 100 करोड़ की पूंजी के

[02:54:01] साथ इसका गठन किया गया। 99% पैसा

[02:54:04] गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ने दिया। 1% पैसा

[02:54:06] आरबीआई ने दिया। कोऑपरेटिव बैंक और आरआरबी

[02:54:09] का माई बाप है नाबार्ड। सभी को रेगुलेट

[02:54:12] करने का काम है। इसके अलावा किसान क्रेडिट

[02:54:14] कार्ड जैसी योजना इसी के द्वारा लाई गई और

[02:54:17] आज हमारे देश में किसान क्रेडिट कार्ड के

[02:54:19] माध्यम से किसानों को समय से पहले ऋण

[02:54:22] उपलब्ध हो जाता है। ताकि वह समय पर बुवाई

[02:54:25] कर सके। जरूरतों को पूरा कर सके। एक्सिम

[02:54:28] मतलब एक्सपोर्ट इंपोर्ट बैंक। हमारे देश

[02:54:30] में आयात निर्यात को बेटर करने के लिए

[02:54:32] मुंबई में एक बैंक आरबीआई ने खोला ताकि

[02:54:35] आयात निर्यात करने के लिए आसानी से ऋण

[02:54:37] उपलब्ध किया जा सके। जो भी नए लोग इसमें

[02:54:39] आना चाहते हैं उन्हें आसानी से सुविधाएं

[02:54:41] दी जा सके। नेशनल हाउसिंग बैंक जिसका

[02:54:44] मुख्यालय नई दिल्ली में है। मध्यम वर्ग के

[02:54:47] लोगों को मकान खरीदने के लिए ऋण आसानी से

[02:54:50] मिल सके। एक प्रकार से नॉन बैंकिंग

[02:54:52] फाइनेंशियल कंपनी के रूप में काम करता है।

[02:54:54] बैंक के रूप में नहीं बल्कि एक फाइनेंशियल

[02:54:56] कंपनी के रूप में। फिर है सिडबी। 1990 में

[02:54:59] सिडबी की स्थापना की गई थी। मुख्यालय लखनऊ

[02:55:02] में है। एमएसएमई छोटे-छोटे उद्योगों को

[02:55:05] कर्जा देता है ताकि उन लोगों की क्षमताएं

[02:55:08] बढ़ सके। रोजगार बढ़ाए जा सके। इसमें कोई

[02:55:11] खाता नहीं खुलता है। बस ये कर्जे देने के

[02:55:13] लिए बनाया गया था। इसके लिए सरकार इन्हें

[02:55:15] समय-समय पर उपलब्ध करती कराती है धन। SBI

[02:55:19] इसके अंतर्गत वर्तमान में सबसे बड़ा शेयर

[02:55:21] होल्डर बन चुका है। SBI का इसका मालिकाना

[02:55:23] हक ज्यादा है। नाबार्ड ने 1992 में बैंक

[02:55:26] लिंकेज परियोजना की शुरुआत की। माइक्रो

[02:55:29] फाइनेंशियल एक प्रकार सा प्रोजेक्ट शुरू

[02:55:32] किया। 25,000, 500, ₹1,000 का कर्जा देना

[02:55:35] जो कि दुनिया में सबसे बड़ी प्रोजेक्ट

[02:55:37] माना जाता है। नाबार्ड ने अपने पास रूलर

[02:55:40] इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड बनाया है।

[02:55:43] इसी रूलर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड

[02:55:45] जैसे मान लीजिए कि कोई बैंक प्रायोरिटी

[02:55:48] सेक्टर लेंडिंग की शर्त को पूरा नहीं करता

[02:55:50] है। मैंने आपको बताया कि HDFC भी क्यों ना

[02:55:52] हो उसे अपने कर्जे का 40% ऋण प्रायोरिटी

[02:55:56] सेक्टर लेंडिंग के तहत एग्रीकल्चर वालों

[02:55:59] को देना पड़ता है। एजुकेशन में देना पड़ता

[02:56:01] है। रिन्यूएबल एनर्जी में देना पड़ता है।

[02:56:03] एमएसएमई में देना पड़ता है। पर मान लीजिए

[02:56:06] इन्होंने अपना कर्जे का 40% नहीं दे पाया।

[02:56:09] यह अपनी शर्त पूरी नहीं कर पाया। तो जितना

[02:56:11] मान लीजिए इन्होंने 30% ही दिया था। तो

[02:56:14] 10% जो पैसा यह नहीं दे पाए यह पैसा

[02:56:17] आरआईडीएफ में आ जाएगा जो नाबार्ड के अंडर

[02:56:19] में बना हुआ है। फिर नाबार्ड इसको अपने

[02:56:22] तरीके से कर्जा देगा। अपने तरीके से इसको

[02:56:25] यूटिलाइज करेगा और फिर HDFC को इसका ब्याज

[02:56:28] दिया जाएगा। लेकिन HDFC की फ्रीडम खत्म हो

[02:56:31] जाएगी। फिर नाबार्ड इस पैसे को अपनी मर्जी

[02:56:34] से खर्च करेगा। क्योंकि HDFC ने अपनी शर्त

[02:56:36] पूरी नहीं की थी। एक एग्जांपल बता रहा हूं

[02:56:38] मैं

[02:56:40] जो प्रायोरिटी सेक्टर की प्रायोरिटी

[02:56:42] सेक्टर लेंडिंग की शर्त पूरी नहीं करते

[02:56:44] उनका बचा हुआ पैसा नाबार्ड के इस खाते में

[02:56:46] चला आता है। फिर मुद्रा बैंक 2015 में

[02:56:49] बनाया गया था। माइक्रो यूनिट डेवलपमेंट

[02:56:52] एंड रिफाइनेंस एजेंसी नॉन बैंकिंग

[02:56:55] फाइनेंशियल इंस्टट्यूट के रूप में कंपनी

[02:56:57] अधिनियम 2013 के तहत रजिस्टर्ड किया गया

[02:56:59] है। छोटे उद्यमियों को 500 से लेकर ₹1 लाख

[02:57:03] तक का यह कर्जा उपलब्ध कराता है। अब बात

[02:57:06] कर लेते हैं आरबीआई की। आरबीआई की स्थापना

[02:57:09] अगर हम बात करें तो डॉ. भीमराव अंबेडकर जी

[02:57:12] की एक किताब है क्योंकि बहुत बड़े

[02:57:13] अर्थशास्त्री भी रहे। द ओरिजिन इन इट्स

[02:57:16] सॉल्यूशन हिस्ट्री ऑफ इंडियन करेंसी एंड

[02:57:18] बैंकिंग द प्रॉब्लम ऑफ द रूपीस डॉ भीमराव

[02:57:21] अंबेडकर द्वारा दी गई सिफारिश के आधार पर

[02:57:23] इसकी शुरुआत हुई। 1926 में हिल्टन यंग यंग

[02:57:27] कमीशन भारत में रॉयल कमीशन ऑन इंडियन

[02:57:29] करेंसी एंड फाइनेंस के नाम से जाना जाता

[02:57:31] है। हिल्टन यंग कमीशन की रिकमेंडेशन के

[02:57:34] तहत आरबीआई की स्थापना का दृष्टिकोण डॉ.

[02:57:37] भीमराव अंबेडकर जी ने भी दिया था। हिल्टन

[02:57:40] यंग कमीशन ने भी दिया था। फाइनली 1934 में

[02:57:43] कानून बना और 1 अप्रैल 1935 से इसने काम

[02:57:46] करना शुरू कर दिया। पहले यह प्राइवेट होता

[02:57:49] था। 1 जनवरी 1949 को फाइनली इसे पूरी तरह

[02:57:52] से नेशनलाइज करके भारत सरकार ने अपने

[02:57:54] कब्जे में लिया। भारतीय रिजर्व बैंक के

[02:57:57] अधिनियम 1934 का सेक्शन 81 ए के अनुसार

[02:58:02] यहां पर आरबीआई का एक गवर्नर होगा जो कि

[02:58:04] सबसे बड़ा अधिकारी होगा। भारत सरकार उसको

[02:58:07] अपॉइंट करेगी। इस संबंध में स्पष्ट और

[02:58:09] औपचारिक प्रक्रिया तय अभी तक नहीं की गई

[02:58:12] है। व्यवहारिक रूप से आरबीआई के गवर्नर की

[02:58:14] नियुक्ति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली

[02:58:16] कमेटी के आधार पर की जाती है। 5 साल के

[02:58:19] लिए आरबीआई का एक गवर्नर चुना जाता है।

[02:58:22] भारत का नागरिक होना चाहिए। मिनिमम 45 एज

[02:58:25] होनी चाहिए और उसके पास 20 साल का अनुभव

[02:58:27] होना चाहिए। अर्थशास्त्र फाइनेंस या

[02:58:30] बैंकिंग सेक्टर का। शुरुआत में आरबीआई का

[02:58:33] जो सेंटर था वह कोलकाता में था। बाद में 2

[02:58:35] साल के अंतर्गत ही 1935 में कोलकाता में

[02:58:38] बनाई गई थी। 1937 में मुंबई में खोला गया।

[02:58:41] वर्तमान में आरबीआई का जो मुख्य हेड ऑफिस

[02:58:44] है वो मुंबई में है और आरबीआई के इसके

[02:58:46] अलावा भी 26 कई जगह पर इसके कार्यालय हैं।

[02:58:51] याद रखिए कमर्शियल बैंक लाभ के पर्पस से

[02:58:54] काम करते हैं। प्राइवेट सरकारी कुछ भी हो

[02:58:56] सकते हैं। इनका मेन मकसद लाभ कमाना होता

[02:58:59] है। यह किसी प्रकार से नोट जारी नहीं कर

[02:59:01] सकते हैं। यह डायरेक्टली पब्लिक से डील

[02:59:03] करते हैं। लेकिन जो सेंट्रल बैंक होता है

[02:59:06] जिसको हमने आरबीआई कहा है। यह बैंकों का

[02:59:08] बैंक होता है। केवल सरकार इसकी मालिक होती

[02:59:11] है। इसका मेन मकसद होता है बैंकों को

[02:59:14] रेगुलेट करना। जनता के हित में यह नोट

[02:59:16] जारी करता है। यह डायरेक्टली पब्लिक के

[02:59:19] साथ कोई डील नहीं करता क्योंकि डायरेक्ट

[02:59:21] इसमें पब्लिक अपने खाते नहीं खोल सकती है।

[02:59:24] यह बड़ी संख्या में हो सकते हैं। यह हर

[02:59:26] देश का केवल एक ही होता है। जैसे भारत का

[02:59:28] रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया। रिजर्व बैंक ऑफ

[02:59:31] इंडिया को चलाने के लिए बोर्ड ऑफ

[02:59:33] डायरेक्टर होते हैं जो पूरे रिजर्व बैंक

[02:59:35] ऑफ इंडिया के लिए नियम बनाते हैं। इनकी

[02:59:37] नियुक्ति भी भारत सरकार करती है। निदेशक

[02:59:40] बोर्ड में जो भी लोग आएंगे वो 4 साल के

[02:59:42] लिए चुने जाते हैं। जनरली इसमें गवर्नमेंट

[02:59:45] डायरेक्टर जो होते हैं वो पांच होते हैं।

[02:59:47] एक पूर्णकालिक गवर्नर और चार डिप्टी

[02:59:50] गवर्नर होते हैं और गैर सरकारी जो निदेशक

[02:59:54] होते हैं जो वास्तविक रूप में सरकार के

[02:59:56] द्वारा नॉमिनेटेड होते हैं और समय-समय पर

[02:59:59] बैठकों में उपस्थित होते हैं। तो फुल टाइम

[03:00:02] गवर्नर और डिप्टी गवर्नर होंगे पांच जिनको

[03:00:04] कहेंगे गवर्नमेंट गवर्नमेंट डायरेक्टर और

[03:00:07] जो नॉमिनेटेड होते हैं सरकार के द्वारा

[03:00:10] उन्हें नॉन ऑफिशियल डायरेक्टर या नॉन

[03:00:12] गवर्नमेंट डायरेक्टर के रूप में जानते

[03:00:14] हैं। इसके अलावा आरबीआई के चार लोकल बोर्ड

[03:00:17] भी हैं। चार अलग-अलग क्षेत्र में बोर्ड भी

[03:00:20] बनाए गए हैं जो चारों रीजन के बारे में

[03:00:22] जानकारी देते हैं। मुंबई, कोलकाता,

[03:00:25] चेन्नई, नई दिल्ली में इनके बोर्ड हैं।

[03:00:27] प्रत्येक लोकल बोर्ड में पांच-प मेंबर

[03:00:29] होते हैं। केंद्र सरकार उनका भी नियुक्ति

[03:00:32] करती है। जो लोकल बोर्ड होता है, वह

[03:00:34] सेंट्रल बोर्ड को जो सभी मतलब पूरे

[03:00:37] [गला साफ़ करने की आवाज़] आरबीआई का चला

[03:00:38] रहा है। उन सबको सजेशन देता है। लोकल

[03:00:40] बोर्ड एक प्रकार से उनके सजेशन से ये जो

[03:00:42] बोर्ड ऑफ डायरेक्टर थे ये सारे काम करते

[03:00:45] हैं सजेशन के आधार पर आरबीआई का काम क्या

[03:00:48] है तो भारत में सेंट्रल बैंक के रूप में

[03:00:50] काम करना एक प्रकार से हमारे देश में सभी

[03:00:53] बैंकों के संचालन में काम करना हमारे देश

[03:00:56] की मॉनिटरी पॉलिसी को लागू कराने का काम

[03:00:59] करता है। वर्तमान में बनाने का काम तो

[03:01:01] हमारे देश में मॉनिटरी कमेटी करती है। पर

[03:01:04] इसको लागू करने का काम इसके पास होता है।

[03:01:06] महंगाई को नियंत्रित करना। मनी सप्लाई

[03:01:09] मैंने आपको बताया नोट छापने का काम इसके

[03:01:11] अंडर कंट्रोल में रहेगा। एक प्रकार से

[03:01:13] सुपरविजन भी करेगा हमारे पूरे फाइनेंशियल

[03:01:16] सिस्टम का और विदेशी फॉरेन एक्सचेंज का

[03:01:19] मैनेजर भी है यह। पूरे विदेशी मुद्रा

[03:01:21] भंडार का मैनेजमेंट भी करेगा और करेंसी को

[03:01:24] जारी करने के साथ-साथ डिस्ट्रीब्यूट भी

[03:01:26] करेगा।

[03:01:28] भारत का केंद्रीय बैंक है। सरकार के सभी

[03:01:31] बैंकिंग लेनदेन जितने भी होंगे वह सब इसी

[03:01:33] के माध्यम से होंगे। भारत सरकार इसके पास

[03:01:36] अपनी नकदियां रख सकते हैं। राज्य और संघीय

[03:01:39] सरकार की ओर से जितने भी सरकारों के कर्जे

[03:01:42] होते हैं उनका मैनेजमेंट यही करता है। सभी

[03:01:45] बैंकों का संचालन बैंकों के लिए बैंक जैसे

[03:01:48] हम बैंकों के लिए कस्टमर है वैसे इसके लिए

[03:01:50] सभी बैंक कस्टमर होते हैं। इसको अंतिम

[03:01:53] उपाय के ऋणदाता के रूप में जानते हैं।

[03:01:55] क्योंकि बैंकों को जब भी पैसों की जरूरत

[03:01:57] पड़ेगी तो पहला माई बाप यही रहेगा। आरबीआई

[03:02:00] भारत में बैंकिंग क्षेत्र का रेगुलेशन

[03:02:02] करता है। 1949 के बैंकिंग एक्ट के माध्यम

[03:02:04] से इसको पावरफुल बनाया गया है। इसके

[03:02:07] नियमों का पालन न करने पर बैंकों पर यह

[03:02:09] जुर्माना लगा सकता है। पूरे बैंकों के

[03:02:11] डायरेक्टर बोर्ड को बर्खास्त कर सकता है।

[03:02:14] शेड्यूल बैंक के बैंक खाते इसके पास होते

[03:02:16] हैं। यह मॉनेटरी अथॉरिटी है। हमारे देश

[03:02:19] में मौद्रिक नीति का कारन्वयन करना,

[03:02:22] एग्जीक्यूट करना, उसको सुपरविजन करने का

[03:02:24] काम इसका है। यह बनाता नहीं है मॉनिटरी

[03:02:27] पॉलिसी। मॉनिटरी पॉलिसी बनाने का काम

[03:02:29] मॉनिटरी पॉलिसी कमेट करती है। लेकिन उसको

[03:02:31] एग्जीक्यूट करना उसे लागू करने की

[03:02:33] जिम्मेदारी इसी के पास होती है। महंगाई को

[03:02:36] कंट्रोल करने के लिए ब्याज दरों को बढ़ाता

[03:02:39] घटाते रहता है। ब्याज दरों को कम करने के

[03:02:42] लिए इसकी जिम्मेदारी होती है कि वह देखे

[03:02:44] कि देश के अंदर मनी सप्लाई ज्यादा तो नहीं

[03:02:47] हो रहा है। मनी सप्लाई को कंट्रोल करने की

[03:02:49] इसकी अपनी जिम्मेदारी होती है। तो

[03:02:51] मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने की

[03:02:53] जिम्मेदारी इसके पास है। लेकिन यह अकेले

[03:02:55] कुछ नहीं कर सकता है। मुद्रास्फीति को

[03:02:57] जिम्मेदारी दो लोगों की है। एक भारत सरकार

[03:02:59] की और एक आरबीआई की। तो याद रखिएगा कि

[03:03:01] महंगाई या मंदी की जिम्मेदारियां दो लोग

[03:03:04] कंट्रोल करेंगे। भारत सरकार फिस्कल पॉलिसी

[03:03:07] जारी करती है। राजकोशीय नीति सेंट्रल बैंक

[03:03:09] मॉनिटरी पॉलिसी के माध्यम से उसको कंट्रोल

[03:03:12] करती है। ये दोनों एक दूसरे के बगैर काम

[03:03:14] नहीं कर सकते। दोनों को एक दूसरे के सहयोग

[03:03:17] की जरूरत पड़ती है। वित्तीय प्रणाली हमारे

[03:03:20] देश में जितना फाइनेंशियल सिस्टम है फिर

[03:03:22] वो बैंकिंग सिस्टम हो सब में लोगों का

[03:03:24] विश्वास बना रहे। इसके लिए उन्हें दिशा

[03:03:26] निर्देश देते रहते हैं। हमारे देश के

[03:03:28] लोगों के पैसों के संरक्षण का एक प्रकार

[03:03:31] से उनके अंतर्गत सुरक्षा का भाव निर्मित

[03:03:34] करने की इसकी जिम्मेदारी है। जो भी विदेशी

[03:03:36] मुद्रा भंडार हमारे देश में आता है,

[03:03:38] अलग-अलग देशों की करेंसी हमारे देश में

[03:03:40] आती है, उसका अंतिम मालिक इसी के पास रहता

[03:03:42] है। यह कोशिश करता है कि हमारे देश का जो

[03:03:45] रुपया है,

[03:03:47] वह एक प्रकार से कंट्रोल में रहे,

[03:03:49] सुरक्षित रहे और इसके लिए वह लगातार स्थिर

[03:03:51] करने की कोशिश करता है। करेंसी जारी करने

[03:03:54] की जिम्मेदारी इसी के पास होती है। भारतीय

[03:03:57] सिक्का अधिनियम के तहत 1960 के कानून के

[03:04:00] तहत ₹2, ₹5, ₹10, ₹20, ₹50, ₹100, ₹200,

[03:04:05] ₹500 और ₹2000 तक के नोट छापने का अधिकार

[03:04:08] आरबीआई के पास है। वैसे तो 1934 का कानून

[03:04:11] कहता है कि आरबीआई ₹10,000 का नोट भी छाप

[03:04:14] सकता है। लेकिन अभी तक ₹20,000 तक के नोट

[03:04:16] छापे गए हैं। अब तो ₹20,000 का नोट भी बंद

[03:04:19] कर दिया है। 30 जून 2011 को 25 पैसे मूल्य

[03:04:23] वर्गों से कम मूल्य वर्ग के सिक्कों का

[03:04:25] परिचालन वापस करने का निर्णय ले लिया गया

[03:04:28] है। मतलब ऑफिशियली हमारे देश में 25 पैसों

[03:04:32] का सिक्का वैलिड करेंसी नहीं है। लीगल

[03:04:35] करेंसी नहीं है। 50 पैसों का सिक्का है।

[03:04:39] वह अलग बात है कि आज हमारे देश में प्रचलन

[03:04:41] में 50 पैसों का सिक्का नहीं है। ₹1 के

[03:04:45] नोट या सिक्के को छापने का अधिकार वित्त

[03:04:47] मंत्रालय के पास है। ₹1 के नोट पर भारत के

[03:04:50] वित्त सचिव के साइन होते हैं। नोटों की

[03:04:53] छपाई के कारखाने अगर हम देखें तो देवास

[03:04:55] मध्य प्रदेश में है। सिक्योरिटी प्रिंटिंग

[03:04:57] एंड मीटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के

[03:04:59] नेतृत्व में फाइनेंस मिनिस्ट्री चलाता है।

[03:05:02] नासिक महाराष्ट्र में है। मैसूर कर्नाटक

[03:05:05] में है। यह आरबीआई के अंडर में आता है।

[03:05:08] मैसूर कर्नाटक। नासिक और देवास सरकार

[03:05:11] वित्त मंत्रालय के कंट्रोल में आता है।

[03:05:13] मतलब उसकी देखरेख उसमें नियुक्ति या

[03:05:15] सेंट्रल गवर्नमेंट करती है। मैसूर सलबे

[03:05:18] सलबोनी पश्चिम बंगाल में यह आरबीआई के

[03:05:20] द्वारा कंट्रोल किया जाता है।

[03:05:24] आरबीआई के पास आय के स्त्रोत क्या है? तो

[03:05:26] सरकारी प्रतिभूतियों पर जो ब्याज आएगा

[03:05:29] गवर्नमेंट सिक्योरिटीज पर जो ब्याज कमाया

[03:05:31] जाता है या दिया जाता है आरबीआई भारत

[03:05:33] सरकार और राज्य सरकार की प्रतिभूतियों में

[03:05:35] निवेश करती है और इन पर प्राप्त ब्याज

[03:05:38] आरबीआई की कमाई है। मतलब सरकार को भी

[03:05:40] ब्याज देना पड़ता है आरबीआई को। भले ही

[03:05:42] आरबीआई उन्हीं का बैंक है। विदेशी मुद्रा

[03:05:44] भंडार से भी कमाई होती है। क्योंकि विदेशी

[03:05:47] मुद्रा भंडार वास्तविक रूप में जो लोग

[03:05:49] भेजते हैं पैसा उनको वह भारतीय रुपए में

[03:05:51] करेंसी में पैसे देते हैं और उसको प्राप्त

[03:05:53] कर लेते हैं। ओपन मार्केट ऑपरेशन हम आगे

[03:05:56] पढ़ेंगे कि कई बार ये गवर्नमेंट शेयर की

[03:05:58] खरीद बिक्री करते हैं बैंकों के साथ उसमें

[03:06:01] जो लाभ कमाते होंगे। 2025 में एक सवाल आया

[03:06:04] था जिसके बारे में मैं जिक्र कर रहा था।

[03:06:06] सरकारी बॉन्ड का क्रय विक्रय करके वह कमाई

[03:06:09] करते हैं। विदेशी मुद्रा का क्रय विक्रय

[03:06:12] करके वह कमाई करते हैं। इससे कमाई नहीं

[03:06:14] होती। इससे कमाई नहीं होती। लेकिन करेंसी

[03:06:16] नोटों के छापने और वितरण से भी कमाई होती

[03:06:19] है। पर हमारी माननीय यूपीएससी ने इसको

[03:06:22] नहीं माना। उन्होंने अपने ऑफिशियल आंसर

[03:06:24] में पहला और दूसरा दिया है। जबकि पिछले

[03:06:27] साल जब आंसर की दी थी तो हमने आंसर डी

[03:06:29] दिया था। क्योंकि यह भी कहीं ना कहीं जो

[03:06:31] अभी हमने कंसेप्ट पढ़ा था उससे जुड़ा हुआ

[03:06:34] था। तो डी आंसर हमने माना है लेकिन

[03:06:36] ऑफिशियल आंसर ए आया है कल की आंसर की में

[03:06:44] बैंकों [गला साफ़ करने की आवाज़] को ऋण और

[03:06:46] रेपो परिचालन वाणिज्यिक बैंकों को

[03:06:48] अल्पकालिक ऋण देने में मदद करता है।

[03:06:50] मुद्रा निर्गमन से लाभ जिसको हमने नाम

[03:06:52] बताया था सिंग्रो यरेज कहा जाता है। कम

[03:06:56] कीमत पर नोट छापना और उसकी कीमत ज्यादा

[03:06:58] लेना। अब बात करते हैं मॉनिटरी पॉलिसी। यह

[03:07:01] क्या है भाई? मैंने आपको बताया मैंने आपको

[03:07:05] बताया कि हमारे देश में एक संतुलन होना

[03:07:07] जरूरी है। किसके बीच में?

[03:07:10] M3

[03:07:13] और जीडीपी के बीच में। जीडीपी को बेटर

[03:07:17] करने के लिए हमारे देश की सरकार फिस्कल

[03:07:20] पॉलिसी लाती है। जिसको कहते हैं राजकोषीय

[03:07:22] नीति।

[03:07:26] और इसको M3 को कंट्रोल करने के लिए हमारे

[03:07:29] देश में आती है मोनेरी पॉलिसी मौद्रिक

[03:07:32] नीति। मौद्रिक नीति पहले हमारे देश में

[03:07:35] मौद्रिक नीति को आरबीआई बनाती थी। लेकिन

[03:07:38] 2016 में सरकार ने कहा कि नहीं इसको कमेट

[03:07:42] बनाएगी मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी जिसमें तीन

[03:07:45] लोग आरबीआई से आएंगे। तीन लोग गवर्नमेंट

[03:07:48] ऑफ इंडिया से भेजे जाएंगे ताकि इसके

[03:07:50] परिणाम सही तरीके से निकाले जाए। और यह

[03:07:53] कैसे कंट्रोल करेगी मनी सप्लाई को? यह मनी

[03:07:56] सप्लाई को कैसे कंट्रोल कर सकती है? नोट

[03:07:58] कम छाप कर यह नहीं कर सकती है। नोट ज्यादा

[03:08:01] छाप कर इसकी अनुमति नहीं होती है। तो यह

[03:08:04] केवल और केवल इंटरेस्ट रेट को कंट्रोल

[03:08:06] करने पर काम करती है ब्याज दरों पर।

[03:08:09] क्योंकि माना जाता है कि जब ब्याज दरें

[03:08:12] बढ़ जाती है तो कहीं ना कहीं जो पैसा है

[03:08:15] वो महंगा मिलने लग जाता है तो लोग कम पैसे

[03:08:18] लेने लग जाते हैं। तो ये केवल ब्याज दरों

[03:08:21] को कंट्रोल करने के लिए अपनी नीतियां

[03:08:23] बताती रहती है। तो मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी

[03:08:26] जो मॉनिटरी पॉलिसी या मॉनिटरी एंड क्रेडिट

[03:08:29] पॉलिसी लाती है उसमें केवल ब्याज दरों का

[03:08:32] जिक्र होता है। पहले क्या होता था? पहले

[03:08:34] नोट छापना और नोट कम छापने के अनुसार

[03:08:36] चीजों को किया जाता था। बीच में आरबीआई ने

[03:08:39] रिसर्च पेपर छापा कि इसके कारण

[03:08:41] अर्थव्यवस्था को नुकसान होता है। तो अब

[03:08:43] नोट छापने और कम की बातचीत नहीं होती है।

[03:08:46] नोट छापे जाएंगे जितना जीडीपी बढ़ता जाएगा

[03:08:49] उसके अकॉर्डिंग। लेकिन अब नए नोट के

[03:08:51] अतिरिक्त मतलब एक्स्ट्रा नोट नहीं छापे

[03:08:53] जाते या कम नोट नहीं छापे जाते बल्कि केवल

[03:08:55] इंटरेस्ट रेट को कंट्रोल करते हुए सारा

[03:08:58] कंट्रोल करने की कोशिश की जाती है।

[03:09:02] जनरली हमारे देश में मौद्रिक नीति क्रेडिट

[03:09:04] कंट्रोल करती है। ऋणों को नियंत्रित करती

[03:09:07] है क्वालिटेटिव रूप में या क्वांटिटेटिव

[03:09:09] रूप में। सबसे पहले हम बात करते हैं

[03:09:11] क्वालिटेटिव रूप में। गुणात्मक तरीके से

[03:09:14] कैसे लोगों [नाक से की जाने वाली आवाज़]

[03:09:16] तक पैसे को रोका जाए। यदि हमारे देश में

[03:09:19] लोग पैसे ज़्यादा परच अह ले रहे हैं या

[03:09:21] खरीददारी ज़्यादा कर रहे हैं जिससे आने

[03:09:24] वाले समय में वस्तुओं की मांग बढ़ेगी।

[03:09:27] वस्तुओं की मांग बढ़ेगी तो कीमतें बढ़ेगी।

[03:09:29] कीमतें बढ़ेगी तो कहीं ना कहीं महंगाई

[03:09:31] आएगी।

[03:09:36] इधर ध्यान देना सभी लोग प्लीज।

[03:09:44] [नाक से की जाने वाली आवाज़]

[03:09:48] इधर ध्यान दीजिएगा सभी लोग।

[03:09:52] देखो

[03:09:54] गुणात्मक का मतलब होता है कि जैसे इसको

[03:09:57] प्रैक्टिकली ऐसा समझो मान लीजिए कि मुझे अ

[03:10:02] किसी खेत में पता चल रहा है कि भ घास बहुत

[03:10:05] पनप रही है। घास बहुत पनप रही है। तो

[03:10:10] मैंने क्या किया कि फसल और घास इनमें से

[03:10:13] घास को ही खत्म करना है। तो यदि हम केवल

[03:10:17] घास को अलग कर दें या घास को खत्म करने के

[03:10:20] उपाय ढूंढे तो उसको क्या कहोगे आप लोग कि

[03:10:23] अच्छा गुणात्मक उपाय ढूंढे हमने और दूसरे

[03:10:26] कौन से होते हैं? मात्रात्मक उपाय।

[03:10:29] मात्रात्मक उपाय में हम क्या करते हैं कि

[03:10:31] यह नहीं सोचते हैं कि घास ही खत्म हो। हम

[03:10:34] पूरी फसल को ही खत्म कर डालते। हम कहते कि

[03:10:37] भ ना रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी। तो

[03:10:40] पूरी फसल सहित घास खत्म कर देते हैं ताकि

[03:10:44] अगली फसल को बेटर किया जा सके। इसे कहते

[03:10:46] हैं मात्रात्मक उपाय। तो गुणात्मक उपाय

[03:10:49] ज्यादा अच्छे माने जाते हैं। इनको कभी भी

[03:10:51] यूज़ किया जा सकता है क्योंकि जहां

[03:10:53] प्रॉब्लम है ये उसी पर अटैक करेंगे। लेकिन

[03:10:55] जो मात्रात्मक उपाय होते हैं ना वो ज्यादा

[03:10:58] खतरनाक होते हैं। वो बड़ी मात्रा में

[03:11:00] इंपैक्ट डालते हैं लेकिन पूरी

[03:11:02] अर्थव्यवस्था को डिस्टर्ब कर सकते हैं। तो

[03:11:05] वास्तविक रूप में आरबीआई जब भी लगता है कि

[03:11:08] बाजार में पैसों का फ्लो ज्यादा हो रहा

[03:11:10] है। वस्तुओं की डिमांड ज्यादा बढ़ रही है।

[03:11:13] लोग ज्यादा खर्च कर रहे हैं। लोग ज्यादा

[03:11:16] से ज्यादा डिमांड बढ़ा रहे हैं। तो महंगाई

[03:11:19] बढ़ सकती है। तो उसको कंट्रोल करने के लिए

[03:11:21] आरबीआई मेनली मात्रात्मक उपायों को अपनाती

[03:11:25] है। मात्रात्मक सॉरी गुणात्मक उपायों को

[03:11:28] अपनाती है। क्वालिटेटिव टूल अपनाती है।

[03:11:31] जैसे सरकार आरबीआई क्या करेगी? आरबीआई

[03:11:34] सिलेक्टेड क्रेडिट कंट्रोल कर देगी। जैसे

[03:11:37] कि ठीक है भाई टीवी खरीदने के लिए

[03:11:39] व्यक्तिगत खर्चों के लिए अब कोई ऋण नहीं

[03:11:41] मिलेगा। पर यदि आपको कोई फैक्ट्री डालनी

[03:11:44] है, यदि आपको कृषि कार्य करना है, यदि

[03:11:46] आपको कोई उद्योग डालना है, तो हम आपको ऋण

[03:11:49] देंगे ताकि उत्पादन वाले कामों के लिए ऋण

[03:11:52] मिल सके। लेकिन ऐसे कंजमशन वाले कामों के

[03:11:55] लिए ऋण ना मिल सके। वेरियस डिस्काउंट रेट।

[03:11:58] यदि आप एजुकेशन लोन ले रहे हैं, हाउस लोन

[03:12:01] ले रहे हैं तो हाउस लोन हम सस्ता देंगे।

[03:12:04] लेकिन यदि आप टीवी का लोन ले रहे हैं,

[03:12:06] फ्रिज खरीदने के लिए लोन ले रहे हैं तो हम

[03:12:08] आपको ब्याज दरें ज्यादा लेंगे।

[03:12:12] कैश [गला साफ़ करने की आवाज़] रिजर्व नगद

[03:12:14] कोषों में रियायत जैसे आपको अगर मान लीजिए

[03:12:16] कार खरीदनी है तो आपको इतना तो कैश देना

[03:12:19] पड़ेगा तभी जाकर कार खरीद पाओगे तो हम

[03:12:22] कहेंगे कि जहां पर ऐसी चीजें खरीद रहे

[03:12:24] जिसकी कोई ज्यादा जरूरत नहीं वहां ज्यादा

[03:12:26] कैश कह दो पर जो जरूरी चीजें उसके लिए कम

[03:12:29] कैश में भी लोन पर दे देंगे। पूर्वानुमति

[03:12:32] पर लोन दे देंगे। मतलब बैंकों से कह दिया

[03:12:34] जाएगा किसी पर्टिकुलर सेक्टर में मेरी

[03:12:36] अनुमति के बगैर लोन मत लेना। कई जगह पर

[03:12:39] ऋणों पर प्रतिबंध लगा दिए जाते हैं। जब भी

[03:12:42] सरकार आरबीआई को लगता है कि लोग ज्यादा

[03:12:44] खर्चा कर रहे हैं। खास करके मोबाइल

[03:12:46] खरीददारी पर दिवाली के समय जो जीरो डाउन

[03:12:49] पेमेंट वाले लोग होते हैं उनको बैन किया

[03:12:51] जाता है। आयात पूर्व जमाएं अगर कुछ लोग

[03:12:54] इंपोर्ट करने जा रहे हैं कुछ चीजों का तो

[03:12:57] इंपोर्ट के मात्रा को भी कंट्रोल करने के

[03:12:59] लिए जो इंपोर्टर हैं उनसे कुछ पैसे जमा

[03:13:01] करा दिए जाते हैं ताकि उनका मनोबल कम हो

[03:13:04] सके। या ऋणों की सीमांत आवश्यकताओं में

[03:13:07] परिवर्तन कि भ एक इतनी मिनिमम चीजें

[03:13:10] फुलफिल करोगे तभी कर्जा मिलेगा। तो जब भी

[03:13:13] आरबीआई किसी पर्टिकुलर सेक्टर को कंट्रोल

[03:13:16] करना चाहती है, पर्टिकुलर सेक्टर पर अटैक

[03:13:18] करना चाहती है ताकि लोग वहां डिमांड कम कर

[03:13:21] सके तो क्वालिटेटिव गुणात्मक उपकरणों को

[03:13:24] अपनाती है। वो ज्यादा अच्छा काम करते हैं।

[03:13:27] तो चयनित साख नियंत्रण जब देश का केंद्रीय

[03:13:29] बैंक केंद्रीय बैंक यह अनुभव करता है कि

[03:13:32] संपूर्ण अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से

[03:13:34] संचालित करने के लिए एक समान साख नियंत्रण

[03:13:37] नीति को अपनाना उचित नहीं होगा। बल्कि कुछ

[03:13:40] क्षेत्रों में उदार साख नीति लानी पड़ेगी

[03:13:42] कि भ ठीक है यहां कर्जे दे दो और अन्य

[03:13:44] क्षेत्रों में कम उदार या कठोर साख नीति

[03:13:46] कि यहां कर्जे मत दो साख का मतलब कर्जा

[03:13:50] जिसको हम क्रेडिट कहेंगे तो ऐसी अलग-अलग

[03:13:52] व्यवस्था को कहते हैं सिलेक्टेड क्रेडिट

[03:13:54] कंट्रोल विभिन्न कटौती दर इस विधि के

[03:13:57] अंतर्गत देश का केंद्रीय बैंक भिन्न-भिन्न

[03:13:59] प्रकार के विनिमय प्रपत्रों के लिए

[03:14:01] विभिन्न या अलग-अलग कटौती दर देता है।

[03:14:03] मतलब हमारे अलग-अलग डिस्काउंट रेट रहते

[03:14:06] हैं एक्सचेंज बिल के इस अर्थव्यवस्था के

[03:14:08] कुछ क्षेत्रों को तो आसानी से ऋण मिल जाता

[03:14:10] है। अन्य क्षेत्रों को कठिनता के साथ जैसे

[03:14:12] कृषि क्षेत्र को विकास के लिए अन्य

[03:14:14] क्षेत्र के अपेक्षा अधिक प्रोत्साहन देंगे

[03:14:16] तो कृषि निर्यात जो भी प्रपत्र आएंगे कृषि

[03:14:19] निर्यात वाले जो बिल आएंगे उस पर ब्याज दर

[03:14:21] कम रहेगा। फिर होता है कंसेशन इन कैश फंड।

[03:14:25] इस उपाय के अंतर्गत किसी विशेष क्षेत्र

[03:14:27] में निवेश करने वाले बैंकों को एक निश्चित

[03:14:29] राशि तक नगद रखने की छूट दी जाती है ताकि

[03:14:32] वह कभी भी उस क्षेत्र में ऋण दे सके ताकि

[03:14:35] वह आसानी से उस सेक्टर को बढ़ाया जा सके।

[03:14:38] कभी-कभी देश का केंद्रीय बैंक

[03:14:39] अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्र में साख

[03:14:41] विस्तार को सीमित करने के उद्देश्य से

[03:14:43] कमर्शियल बैंक पर कंट्रोल लगा देता है कि

[03:14:46] एक निश्चित राशि से ज्यादा यहां कर्जे मत

[03:14:48] देना ताकि उनको कहीं ना कहीं ऋणों को कम

[03:14:51] किया जा सके। आरबीआई यदि कुछ वस्तुओं की

[03:14:54] प्रतिभूतियों पर उपलब्ध ऋण की सुविधा पर

[03:14:56] रोक लगाना चाहे जैसे देश में खाद्यान्न की

[03:14:59] कीमतों में वृद्धि को रोकने के लिए रिजर्व

[03:15:01] बैंक व्यापारिक बैंकों को आदेश दे सकता है

[03:15:03] कि अनाज संग्रह हेतु अब व्यापारियों को ऋण

[03:15:06] मत दीजिएगा क्योंकि अनाज संग्रह करने के

[03:15:08] कारण महंगाई बढ़ रही होती है। उपभोक्ता

[03:15:11] साख नियमन इस प्रकार के क्रेडिट कंट्रोल

[03:15:14] में कर्जे में टिकाऊ और मूल्यवान वस्तुओं

[03:15:17] की खरीद के लिए तो ऋण कंट्रोल कर दिया

[03:15:19] जाता है। जैसे मोटर कार, टेलीविजन,

[03:15:21] मोटरसाइकिल, फ्रिज इनके जो ऋण होते थे उन

[03:15:24] पर भी नियंत्रण लाने की कोशिश की जाती है।

[03:15:27] आयात पूर्व जमाए साख नियंत्रण का यह उपाय

[03:15:29] देश में आयात को कम करने, हतोत्साहित करने

[03:15:32] के लिए किया जाता है। ताकि हमारे देश का

[03:15:34] विदेशी मुद्रा भंडार थोड़ा सा संकुचित हो

[03:15:37] सके।

[03:15:39] तो कहीं ना कहीं इसके द्वारा विशेष

[03:15:41] उद्देश्यों के लिए दी जाने वाली साख की

[03:15:43] राशि को कंट्रोल किया जाता है। फिर आते

[03:15:46] हैं मात्रात्मक उपाय। मात्रात्मक उपाय

[03:15:49] पूरी अर्थव्यवस्था पर एक जैसा असर डालने

[03:15:52] के लिए और पूरी अर्थव्यवस्था से

[03:15:55] [गला साफ़ करने की आवाज़] बड़ी मात्रा में

[03:15:56] बड़ी मात्रा में पूरी तरह से पैसों को

[03:15:59] खींचने के लिए कि भाई अर्थव्यवस्था से

[03:16:02] पूरा पैसा खींचना है ताकि हम काम कर सके।

[03:16:05] देखो इसको ऐसे प्रैक्टिकली सोचो कि ये

[03:16:08] पूरी तरह से भारत की अर्थव्यवस्था है। जब

[03:16:11] पूरी की पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था से पैसा

[03:16:14] खींचना हो पैसा खींचना हो तो मात्रात्मक

[03:16:17] उपाय पर उनको लगता है कि नहीं इस सेक्टर

[03:16:19] में ही ज्यादा पैसा आ रहा है। इस जगह पर

[03:16:22] ज्यादा पैसा आ रहा है। इस फलाना क्षेत्र

[03:16:24] में ज्यादा पैसा यूज़ हो रहा है। तो जब

[03:16:26] उन्हीं सेक्टर पर काम करेंगे तो

[03:16:28] क्वालिटेटिव सब पर एक साथ मार पड़ेगी। तो

[03:16:31] क्वांटिटेटिव क्वांटिटेटिव जो उपाय अपनाए

[03:16:34] जाते हैं मौद्रिक नीति में वह उपाय

[03:16:36] वास्तविक रूप में पूरी अर्थव्यवस्था से

[03:16:39] मुद्रा आपूर्ति को कम कर देते हैं। जो

[03:16:41] क्वांटिटेटिव मेजर होते हैं उसमें कई

[03:16:44] प्रकार के मेजर है। सबसे पहला है कैश

[03:16:46] रिजर्व रेशो को बढ़ाना। इंस्टट्यूटरी

[03:16:50] लिक्विडिटी रेशो को बढ़ाना। ओपन मार्केट

[03:16:52] ऑपरेशन की प्रोसेस को अपनाना या फिर ब्याज

[03:16:55] दरों में बैंक रेट, रेपो रेट, रिवर्स रेपो

[03:16:58] रेट, मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटीज में

[03:17:00] चेंजेस करना। आइए देखते हैं क्या सरकार

[03:17:03] क्या आरबीआई ऐसा कदम उठा सकती है या

[03:17:06] मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी क्या सजेशन दे सकती

[03:17:09] है जिससे देश में पैसों की आपूर्ति को कम

[03:17:12] किया जा सके? मेरी बात आप पुनः ध्यान से

[03:17:14] सुन लीजिए। हम इसके लिए काम कर रहे हैं कि

[03:17:17] हमारे देश में M3 और जो जीडीपी है उसके

[03:17:20] बीच में एक बैलेंस को क्रिएट कराया जा

[03:17:23] सके। अगर कहीं ऐसा लग रहा है कि ये M3 तो

[03:17:26] बड़ा होता चला जा रहा है तो इस M3 को छोटा

[03:17:29] करना जरूरी है। क्योंकि अगर M3 बड़ा हो

[03:17:32] गया और जीडीपी छोटा रह गया तो देश में आ

[03:17:34] जाएगी मुद्रास्फीति। तो हम चाहते हैं कि

[03:17:37] इसको कंट्रोल किया जाए। कंट्रोल कैसे

[03:17:39] करें? तो हम ब्याज दरों को चेंज करते हैं

[03:17:42] या फिर हम कुछ ऐसी शर्तें लगाते जिससे कि

[03:17:45] पैसा मार्केट से कम हो जाए। मार्केट से

[03:17:48] पैसा अगर कम हो गया तो अपने आप M3 का आकार

[03:17:51] छोटा हो जाएगा।

[03:17:53] M3 मतलब मनी सप्लाई जो हमने बताया था

[03:17:55] आपको।

[03:17:57] कैश रिजर्व रेशो द एवरेज डेली बैलेंस दैट

[03:18:01] ए बैंक इज रिक्वायर्ड टू मेंटेन विद द

[03:18:04] आरबीआई एस परसेंट ऑफ इट्स नेट डिमांड एंड

[03:18:08] टाइम लायबिलिटी एज ऑन द लास्ट फ्राइडे ऑफ

[03:18:11] द सेकंड प्रसीडिंग फोर्ट नाइट दैट द

[03:18:13] रिजर्व बैंक मे नोटिफाई फ्रॉम टाइम टू

[03:18:16] टाइम इन ऑफिशियल गजेट कैश रिजर्व रेशो नगद

[03:18:21] आरक्षित अनुपात क्या कहा मास्टर ने यह आइए

[03:18:24] देख लेते हैं।

[03:18:28] बैंकों को समय-समय पर आरबीआई दिशा निर्देश

[03:18:32] देती रहती है जो नगदी के रूप में उन्हें

[03:18:34] रखना होता है। किसका? नेट डिमांड एंड टाइम

[03:18:38] लायबिलिटी। नेट डिमांड टाइम लायबिलिटी का

[03:18:41] मतलब कितना इनके पास करंट अकाउंट सेविंग

[03:18:45] अकाउंट कितना फिक्स्ड डिपॉजिट करंट

[03:18:48] डिपॉजिट राफा के पास रिकरेंट डिपॉजिट और

[03:18:51] फिक्स्ड डिपॉजिट के रूप में पैसा है तो

[03:18:54] कासा और राफा के तहत जितना पैसा बैंक के

[03:18:57] पास जमा होता है भाई किसी भी मान लीजिए एक

[03:19:00] बैंक में दिन भर में मान लेते हैं कि ₹100

[03:19:03] करोड़ लोगों ने जमा किए उसमें से ₹40

[03:19:07] करोड़ निकाल भी दिए तो फाइनली नेट कितना

[03:19:11] हो गया? 60 करोड़ का डिपॉजिट हुआ। नेट

[03:19:13] कितना हुआ? 60 करोड़ का। करंट अकाउंट

[03:19:16] डिपॉजिट हुआ। करंट अकाउंट, सेविंग अकाउंट,

[03:19:19] रिकंट अकाउंट, फिक्स्ड डिपॉजिट यह सब कुछ

[03:19:22] हुआ। मान लेते हैं 60 करोड़। तो इसका एक

[03:19:25] फिक्स्ड उन्हें नगद रूप से आरबीआई के पास

[03:19:28] जमा करना पड़ता है। कहां जमा करना पड़ता

[03:19:32] है? आरबीआई के पास। आरबीआई के पास। मतलब

[03:19:36] ऐसा होता है कि भ सोमवार में इतना मंगलवार

[03:19:39] वेडनेसडे थर्सडे फ्राइडे उसके बाद सैटरडे

[03:19:42] अगर बैंक खुला रहा तो फिर मंडे ट्यूसडे

[03:19:45] वेडनेसडे थर्सडे फ्राइडे इस फ्राइडे को

[03:19:48] पूरा हिसाब किताब करके अपनी गाड़ी में

[03:19:51] नकदी भर के आरबीआई के रीजनल शाखा में जाकर

[03:19:54] यह नकदी जमा करके आएंगे और सर्टिफिकेट

[03:19:57] प्राप्त करेंगे कि हमने अपना वादा पूरा

[03:20:00] किया। हमारे देश में याद रखना कि जनरली

[03:20:03] इसकी जो मात्रा आती है वो 4% के आसपास

[03:20:07] रहती है। तो थोड़ा मैं आपको एग्जांपल से

[03:20:09] समझाना चाहूंगा।

[03:20:15] ये ऐसा क्यों करती है आरबीआई? उसका जवाब

[03:20:17] भी आपके पास रहेगा। कैश रिजर्व रेशो के

[03:20:21] रूप में मान लीजिए कि एसबीआई ने

[03:20:24] 100 करोड़

[03:20:26] फाइनली नेट डिमांड और टाइम लायबिलिटी आई

[03:20:29] थी। नेट डिमांड टाइम लायबिलिटी कितनी आई

[03:20:32] थी? ₹100 करोड़ की आई थी। उसका 4% मतलब ₹4

[03:20:37] करोड़ नगदी नोट आरबीआई के पास जमा करने

[03:20:41] जाएगी।

[03:20:43] आरबीआई के पास जमा करने जाएगी। अब ध्यान

[03:20:46] से सुनना मेरी बात।

[03:20:49] अगर सीआरआर को बढ़ा दिया जाए

[03:20:56] तो आर एसबीआई को ध्यान देना। ₹100 करोड़

[03:20:59] पर जमा करने वालों को ब्याज तो देना

[03:21:01] पड़ेगा।

[03:21:03] लेकिन 4 करोड़ तो बेचारा जमा कर चुका है

[03:21:05] आरबीआई के पास। वह कर्जे के रूप में ₹96

[03:21:09] करोड़ ही देगा अभी और उसे ₹96 करोड़ पर

[03:21:13] इतना पैसा कमा लेना है कि वह इनका ब्याज

[03:21:16] भी दे सके और अपना बैंक भी चला सके।

[03:21:21] अब इमेजिन करो सीआरआर बढ़ा दिया जो कि

[03:21:24] जनरली बढ़ाया नहीं जाता। लेकिन अगर बढ़ा

[03:21:26] दिया पूरी अर्थव्यवस्था में झटके आ जाते

[03:21:28] हैं। अगर सीआरआर को बढ़ाकर हमने 5% कर

[03:21:32] दिया तो मतलब एसबीआई के पास अब ₹100 करोड़

[03:21:37] में से ₹5 करोड़ उसे नगद रूप से जमा करने

[03:21:40] पड़ेंगे आरबीआई के पास उस पर उसे कोई

[03:21:43] ब्याज नहीं मिलेगा और मार्केट में केवल 95

[03:21:46] करोड़ ही जाएंगे। एक तो मार्केट में पैसा

[03:21:50] भी कम हो जाएगा और उस एसबीआई को इस 95

[03:21:53] करोड़ से इतना कमाना है कि इन 100 करोड़

[03:21:56] जमा करने वालों का ब्याज भी दिया जा सके

[03:21:59] और बैंक भी चलाया जा सके तो वो इंटरेस्ट

[03:22:02] रेट क्या कर देगा बढ़ा देगा इंटरेस्ट रेट

[03:22:04] बढ़ा देगा तो सीआरआर के बढ़ने से सीआरआर

[03:22:09] के बढ़ने से एक तो इंटरेस्ट रेट बढ़

[03:22:13] जाएंगे इंटरेस्ट रेट के बढ़ने से और

[03:22:15] इंटरेस्ट रेट के साथ-साथ मनी मनी सप्लाई

[03:22:18] भी कम हो जाएगा। मनी सप्लाई भी कम हो गया।

[03:22:21] इंटरेस्ट रेट भी बढ़ गया। तो मार्केट में

[03:22:24] जो लोग मकान खरीदना चाहते थे, दुकान

[03:22:26] खरीदना चाहते थे, वह बैंकों के पास कर्जे

[03:22:29] लेने के लिए आएंगे तो बैंक कहेगी कि ब्याज

[03:22:31] दरें ज्यादा हो गई है। तो कुछ लोग उनमें

[03:22:34] से मना करने लग जाएंगे कि बाद में

[03:22:36] खरीदेंगे। अभी तो कर्जा बहुत महंगा

[03:22:38] पड़ेगा। फाइनली वस्तुओं की डिमांड कम होने

[03:22:41] लग जाएगी। डिमांड कम होने लग जाएगी तो

[03:22:44] प्राइस कंट्रोल में आने लग जाएंगे। ऐसा हम

[03:22:48] सोचते हैं।

[03:22:50] तो कैश रिजर्व रेशो क्या है? बैंकों के

[03:22:55] पास जितना पैसा जमा किया जाता है, उसका एक

[03:22:58] निश्चित भाग बैंकों को आरबीआई के पास नगद

[03:23:02] रूप में जमा करना पड़ता है और उस पर उसे

[03:23:05] किसी प्रकार का कोई ब्याज नहीं मिलता है।

[03:23:09] इसके माध्यम से आरबीआई कई प्रकार के

[03:23:12] लक्ष्य साध लेती है। पहला उसको बढ़ाकर

[03:23:15] घटाकर बड़ी मात्रा में अर्थव्यवस्था से

[03:23:19] पैसों को सोख सकती है। 1% भी अगर परिवर्तन

[03:23:23] कर दे ना तो हमारे देश में आरबीआई के पास

[03:23:27] 72000 करोड़ से ज्यादा का पैसा आ जाएगा।

[03:23:31] अभी मैंने आपको कितना बड़ा आंकड़ा दिखाया

[03:23:32] था याद है ना कि इस महीने में हमारे पास

[03:23:35] M3 कितना है? तो इमेजिन करो कि कितना नगदी

[03:23:38] खींच लेगी। कितना नकदी खींच लेगी। दूसरा

[03:23:42] मनी मल्टीप्लायर भी इससे कंट्रोल होता है।

[03:23:44] मनी मल्टीप्लायर के बारे में मैंने आपको

[03:23:46] बताया था कि मैं आपको आगे बढ़ाऊंगा।

[03:23:48] इमेजिन करिए। ध्यान से देखना मैं क्या

[03:23:50] सिखाना चाह रहा हूं। हम एक कल्पना कर रहे

[03:23:53] हैं कि हमारे देश में सारे लोग बैंकों से

[03:23:56] जुड़ गए हैं। सारे लोग अब प्रैक्टिकली

[03:23:58] सोचना आरबीआई ने आरबीआई ने ₹100 का नोट

[03:24:04] छापा। आरबीआई ने ₹100 का नोट छापा। मुझे

[03:24:08] इनाम दिया कि जाओ तुमने सारे बच्चों को

[03:24:10] इंडियन इकोनॉमी बहुत बढ़िया पढ़ाया। यह

[03:24:12] ₹100 मधुकर कोटवे को मिलते हैं।

[03:24:17] ₹100 मेरे को दे दिए। ₹100 इसलिए दिए

[03:24:20] क्योंकि जन्मदिवस पर आज वास्तविक रूप में

[03:24:23] मतलब बर्थडे है मेरा तो ₹100 मुझे दे दिए।

[03:24:26] आप सोचिए कि मतलब फिर भी 12 घंटे मास्टर

[03:24:29] क्लास ले ही रहा है। तो ₹100 मुझे मिल गए।

[03:24:34] और ₹100 मुझे बर्थडे गिफ्ट के रूप में

[03:24:36] दिए। अब यह ₹100 लेकर मैं एक बैंक में

[03:24:40] गया। SBI के पास गया। ₹100 लेकर मैं कहां

[03:24:44] गया? SBI के पास। एसबीआई को मैंने ₹100

[03:24:48] दिए। एसबीआई ने क्या कहा? ध्यान से सुनना

[03:24:50] अभी इधर।

[03:24:52] ₹100 जैसे ही एसबीआई के पास आ गए तो

[03:24:55] एनडीटीएल नेट डिमांड टाइम लायबिलिटी के

[03:24:58] तहत 5% मान लेते हैं कि कितना 5% पैसा 5%

[03:25:06] पैसा

[03:25:08] पहले सुन लीजिए इसको ध्यान से सभी लोग इधर

[03:25:11] ध्यान देना

[03:25:13] 5%

[03:25:14] नेट डिमांड और टाइम लायबिलिटी के तहत यह

[03:25:18] नगद रूप से जमा करके आ जाएगा एसबीआई इधर

[03:25:21] ध्यान देना जटिल कांसेप्ट है प्लीज इधर

[03:25:23] ध्यान देना इधर

[03:25:26] 5% पैसा जमा कर दिया

[03:25:30] क्योंकि उनको तो देना पड़ेगा ना क्योंकि

[03:25:32] नियम था सीआरआर के तहत अब एसबीआई के पास

[03:25:35] ₹5 रह गए एसबीआई के पास ₹5 रह गए

[03:25:42] कितने रुपए रहे 95 अब एसबीआई ने एसबीआई ने

[03:25:46] क्या किया वह एक मोहनलाल नाम के व्यापारी

[03:25:51] को उधार दिया। मोहन लाल नाम के व्यक्ति को

[03:25:55] उधार दिया। मोहन लाल ने उससे सामान खरीदा

[03:26:01] और सामान खरीदने के बाद एक दुकानदार को

[03:26:04] दिया। दुकानदार ने वह दूसरे बैंक में

[03:26:07] पंजाब नेशनल बैंक में पैसा जमा किया। उस

[03:26:11] ₹5 का 5% 5% वैसे तो ₹4.5 के थोड़ा सा

[03:26:17] ज्यादा होगा। हम ₹5 पकड़ रहे। ₹5 पंजाब

[03:26:21] नेशनल बैंक ने पुनः आरबीआई के पास जमा कर

[03:26:24] दिया और अब पंजाब नेशनल बैंक के पास ₹90

[03:26:28] रहे। 5% [गला साफ़ करने की आवाज़]

[03:26:30] एनडीटीएल के तहत जमा करना था जो के कैश

[03:26:33] रिजर्व रेशो के तहत जमा करना था। अब यह

[03:26:36] ₹90 पंजाब नेशनल बैंक ने किसी एंथनी को दे

[03:26:40] दिया। एंथनी को दे दिया। एंथनी ने उससे

[03:26:43] स्कूल के रूप में पैसे जमा करवा दिए। अपने

[03:26:46] बच्चे की फीस के रूप में वह स्कूल वालों

[03:26:49] ने यह पैसा आईसीआईसीआई

[03:26:52] बैंक में जमा कर दिया। अब यह बैंक के पास

[03:26:55] जो पैसा डिपॉजिट हुआ उसे अपने एनडीटीएल के

[03:26:58] तहत ₹5 और जमा करने पड़ गए। अब उसके पास

[03:27:02] ₹85 रहे। ₹5 पुनः पहुंच गए यहां पर। अब यह

[03:27:07] ₹85 उसने किसी को उधार दिया होगा। फिर उस

[03:27:10] व्यक्ति ने कुछ खरीद कर बचे हुए व्यक्ति

[03:27:13] को दिया तो उस व्यक्ति ने किसी नए बैंक

[03:27:15] में जमा कर दिया। HDFC में जमा कर दिया।

[03:27:18] उस 85 में से मान लीजिए ₹5 फिर उस बैंक ने

[03:27:22] जमा कर दिए। तो आप देख पा रहे हैं।

[03:27:26] आप देख पा रहे हैं धीरेधीरे पैसा आरबीआई

[03:27:32] के पास इस नियम के तहत पहुंचता चला जा रहा

[03:27:34] है। मतलब यह ₹100 का नोट अगर सारे लोग

[03:27:40] बैंकों से जुड़ गए तो लगभग 20 गुना काम

[03:27:44] करने के बाद पूरी तरह से वापस आरबीआई के

[03:27:48] पास पहुंच जाएगा। ₹100 के रूप में पूरी

[03:27:53] तरह से ₹100 के रूप में आरबीआई के पास

[03:27:56] पुनः पहुंच जाएगा। फिर आरबीआई उसी नोट को

[03:28:00] पुनः सर्कुलेट करवा सकती है। तो ऐसा माना

[03:28:04] जाता है जैसे मैंने आपको बताया कि मनी

[03:28:06] मल्टीप्लायर

[03:28:08] मनी मल्टीप्लायर इन्वर्सली प्रोपोशनली

[03:28:11] होता है सीआरआर के। अगर सीआरआर ज्यादा हो

[03:28:14] गया तो मनी मल्टीप्लायर तेजी से कम होता

[03:28:17] है। M3 बहुत तेजी से कम हो जाएगा इसके

[03:28:20] कारण। क्योंकि M3 का मतलब क्या होता है?

[03:28:23] M3 का मतलब होता है मनी मल्टीप्लायर * M0

[03:28:27] जो रियल नोट छापे गए थे। तो रियल में अगर

[03:28:31] आरआर सीआरआर को बढ़ा दिया, कैश रिजर्व

[03:28:34] रेशो को बढ़ा दिया तो बहुत बड़े स्तर पर

[03:28:37] बदलाव आ जाते। बहुत बड़े स्तर पर परिणाम आ

[03:28:40] जाते। पूरी अर्थव्यवस्था से पैसा खींच

[03:28:43] लिया जाता है। यह बहुत ही भयानक कांसेप्ट

[03:28:46] हो जाता है। इसलिए जनरली आरबीआई इसमें

[03:28:49] जल्दी बदलाव नहीं करती है। बहुत स्टेबल

[03:28:52] रखती है इसको। दूसरा होता है स्टेटरी

[03:28:56] लिक्विडिटी रेशो एसएलआर।

[03:29:00] एसएलआर देखो जब भी कोई व्यक्ति लेनदेन

[03:29:03] करता है पैसों का तो वहां होता है रिस्क।

[03:29:06] रिस्क का मतलब एक प्रकार से कोई व्यक्ति

[03:29:09] को कर्जा दिया और उसने लौटाया नहीं तो उस

[03:29:12] रिस्क को खत्म करना जरूरी है। क्योंकि अगर

[03:29:14] वो रिस्क खत्म नहीं हुआ या कम नहीं हुआ तो

[03:29:18] बैंकके डूब सकती है। तो एनडीटीएल के तहत

[03:29:22] आरबीआई क्या कहती है कि मान लीजिए किसी

[03:29:25] बैंक के पास ₹100 करोड़ जमा हुए। उस 100

[03:29:29] करोड़ में से 4% तो आपने आरबीआई को दे

[03:29:33] दिए। अब बचा हुआ जो पैसा है एनडीटीएल का

[03:29:38] उसका एक निश्चित भाग जैसे हमारे देश में

[03:29:41] मान लीजिए 18% कितना 18% हमारे देश में यह

[03:29:46] तय किया गया कि भाई साहब यह जो पैसा है

[03:29:50] 18% ये जो पैसा है आप इसे लोन के रूप में

[03:29:54] नहीं दोगे अपने पास रखोगे अपने पास मतलब

[03:29:59] खुद बैंक अपने पास रखेगी अब देखो बैंक जब

[03:30:03] 18% % इस पैसे को अपने पास रखेगी तो नगद

[03:30:06] रखने का कोई फायदा नहीं है क्योंकि उसे

[03:30:08] उधार नहीं दिया जा सकता लेकिन जिसने पैसा

[03:30:11] जमा किया था उससे तो उसे वो तो ब्याज

[03:30:13] मांगेगा ही तो उसको यह फ्रीडम दी गई कि

[03:30:16] तुम इसे अपने पास रख सकते हो गोल्ड खरीद

[03:30:19] कर रख लो इतने का

[03:30:24] चाहो तो कैश में रख सकते हो पर रखते नहीं

[03:30:27] कैश में रख सकते हो हमें कोई दिक्कत नहीं

[03:30:29] अपने पास या गवर्नमेंट सिक्योरिटीज खरीद

[03:30:32] कर रख लो गवर्नमेंट सिक्योरिटी गवर्नमेंट

[03:30:34] ब्याज देती है ताकि थोड़ा कम देती होगी

[03:30:37] लेकिन फिर भी देती है और 100% सिक्योर

[03:30:39] होते हैं क्योंकि सरकार थोड़ी भाग जाएगी

[03:30:41] तो गवर्नमेंट सिक्योरिटीज खरीद कर रख लो

[03:30:44] तो भी चल जाएगा तो अपने पास जो पैसा

[03:30:47] उन्हें रखना पड़ता है टोटल एनडीटीएल का एक

[03:30:50] निश्चित भाग उसको कहा जाता है स्टटरी

[03:30:54] लिक्विडिटी रेशो सावधिक

[03:30:58] सावधिक तरलता अनुपात के रूप में हम इसको

[03:31:02] जानते है।

[03:31:04] एव्री बैंक शैल मेंटेन इन इंडिया एसेट द

[03:31:07] वैल्यू ऑफ़ व्हिच शैल नॉट बी लेस देन सच

[03:31:10] परसेंटेज ऑफ़ टोटल ऑफ इट्स एनडीटीएल डिमांड

[03:31:13] एंड टाइम लायबिलिटी इन इंडिया एज़ ऑन द

[03:31:15] लास्ट फ्राइडे ऑफ़ द सेकंड प्रिसीडिंग

[03:31:16] फोर्थ नाइट एज़ द रिजर्व बैंक मे बाय

[03:31:19] नोटिफिकेशन इन द ऑफिशियल गजेट स्पेसिफाई

[03:31:22] फ्रॉम टाइम टू टाइम सच एसेट शैल बी मेंटेन

[03:31:25] एज़ मे बी स्पेसिफाइड इन सच नोटिफिकेशन। या

[03:31:29] तो गवर्नमेंट सिक्योरिटीज के रूप में, कैश

[03:31:31] के रूप में या गोल्ड के रूप में आप जिसमें

[03:31:33] रखना चाहो रख सकते हो। अपने पास रखना है

[03:31:36] जिसे आप कर्जे के रूप में नहीं दे सकते।

[03:31:39] बैंक सरकार को कर्जे के रूप में गवर्नमेंट

[03:31:42] सिक्योरिटीज के रूप में दे सकती है। ओपन

[03:31:44] मार्केट ऑपरेशन का मतलब होता है समय-समय

[03:31:48] पर सरकारों को जब जरूरत पड़ती है केंद्र

[03:31:50] सरकार राज्य सरकारों को तो उनके लिए बैंक

[03:31:54] कर्जे मार्केट से लेती है गवर्नमेंट

[03:31:57] सिक्योरिटी के एवज में तो समय-समय पर

[03:32:00] हमारे देश में गवर्नमेंट सिक्योरिटी को

[03:32:03] बेचा जाता है। बेचा जाने का मतलब इमेजिन

[03:32:06] करिए। हमारे आरबीआई के गवर्नर साहब ने

[03:32:08] दुकान लगाई है किसी बाजार में कि जाओ

[03:32:12] गवर्नमेंट सिक्योरिटी खरीद लो। गवर्नमेंट

[03:32:14] सिक्योरिटी ₹ ₹1 में नहीं आती है। कोई 100

[03:32:17] करोड़ की, कोई ₹00 करोड़ की, कोई 1000

[03:32:19] करोड़ की होती है। तो इमेजिन करो

[03:32:21] गवर्नमेंट सिक्योरिटी। बस एक कागज है कि

[03:32:23] मैं धारक को वचन देता हूं कि इतने टाइम के

[03:32:26] बाद मैं इस ब्याज दर पर पैसा लौटाऊंगा। बस

[03:32:28] एक कागज किसी बैंक को दे रहे हैं और बैंक

[03:32:31] ट्रक भर के पैसा दे रहा है। ट्रक भर के

[03:32:34] इससे क्या फायदा होगा? आसानी से बाजार से

[03:32:38] पैसा खींचा जा सकता है और बैंकों के पास

[03:32:41] गवर्नमेंट सिक्योरिटी का कागज आ जाएगा।

[03:32:43] फिर सरकार उस पैसों को आरबीआई उस पैसों को

[03:32:47] सरकार को देगी। सरकार उसका उपयोग योजनाओं

[03:32:49] में करेगी। धीरे-धीरे जहां ज्यादा जरूरत

[03:32:51] है वहां ज्यादा पहुंचाएगी या रोक कर रखेगी

[03:32:54] ताकि पैसे को मार्केट से खींचा जा सके। तो

[03:32:57] याद रखना कि अगर एसएलआर को भी बढ़ा दिया

[03:33:00] जाए। एसएलआर को भी बढ़ा दिया जाए तो

[03:33:03] बैंकों के पास लोन देने की क्षमताएं कम हो

[03:33:05] जाती है। ऐसी परिस्थिति में ब्याज दर

[03:33:08] बढ़ने लग जाते हैं। ऐसे इंटरेस्ट रेट अगर

[03:33:11] इंटरेस्ट रेट बढ़ेंगे तो डिमांड वस्तुओं

[03:33:13] की कम होने लग जाएगी। प्राइस कंट्रोल होने

[03:33:16] लग जाते हैं। उसी तरीके से ओपन मार्केट

[03:33:19] ऑपरेशन के तहत यदि आरबीआई गवर्नमेंट

[03:33:22] सिक्योरिटीज को सेल करती है तो सेल करने

[03:33:26] पर मार्केट से मनी को अब्सॉर्ब कर लिया

[03:33:29] जाएगा और मनी अब्सॉर्ब हो गया तो फिर

[03:33:31] मार्केट में इंटरेस्ट रेट बढ़ेंगे।

[03:33:34] इंटरेस्ट रेट बढ़ेंगे तो डिमांड सप्लाई जो

[03:33:37] डिमांड है वह कम होने लग जाएगी। मतलब

[03:33:39] कीमतें कम होने लग जाती है। लेकिन अगर

[03:33:42] आरबीआई ओपन मार्केट ऑपरेशन के तहत

[03:33:46] गवर्नमेंट सिक्योरिटी को खरीदने लग जाए,

[03:33:48] बेचने की जगह परचेस करने लग जाए, खरीदने

[03:33:52] लग जाए कि ठीक है भ बैंकों को कहेंगे कि

[03:33:55] आप अपनी गवर्नमेंट सिक्योरिटी हमें दे दो।

[03:33:56] हम आपको पैसे दे दे रहे हैं तो मार्केट

[03:33:59] में पैसों का सप्लाई बढ़ जाएगा।

[03:34:01] लिक्विडिटी बढ़ जाएगी। सप्लाई बढ़ेगा तो

[03:34:04] इंटरेस्ट रेट कम हो जाएंगे। इंटरेस्ट रेट

[03:34:06] कम होंगे तो लोग ज्यादा से ज्यादा लोन

[03:34:08] लेने के लिए आएंगे। लोग ज्यादा लोन लेने

[03:34:10] के लिए आएंगे तो डिमांड ज्यादा बढ़ेगी

[03:34:12] वस्तुओं की। डिमांड बढ़ेगी तो कीमतें

[03:34:15] बढ़ेगी। यह भी करना पड़ता है जब मंदी का

[03:34:17] माहौल होता है तो गवर्नमेंट सिक्योरिटी को

[03:34:20] आरबीआई परचेस करती है। मंदी को खत्म करने

[03:34:22] के लिए गवर्नमेंट सिक्योरिटीज को सेल करती

[03:34:25] है। महंगाई को कंट्रोल करने के लिए। तो

[03:34:28] महंगाई को कंट्रोल करने के लिए गवर्नमेंट

[03:34:30] सिक्योरिटी को बेचा जाता है और महंदी को

[03:34:33] कंट्रोल करने के लिए गवर्नमेंट सिक्योरिटी

[03:34:35] को खरीदा जाता है आरबीआई के द्वारा।

[03:34:39] फिर होता है बैंक रेट। द रेट एट व्हिच द

[03:34:42] रिजर्व बैंक इज रेडी टू बाय और

[03:34:44] रीिडिस्काउंट बिल ऑफ एक्सचेंज अदर

[03:34:46] कमर्शियल पेपर। द बैंक रेट एक्ट एज ए पेनल

[03:34:50] रेट चार्ज ऑन द बैंक फॉर शॉर्ट फॉल इन

[03:34:52] मीटिंग देयर रिजर्व रिक्वायरमेंट कैश

[03:34:54] रिजर्व रेशो स्टेटरी लिक्विडिटी रेशो द

[03:34:57] बैंक रेट इज़ पब्लिश्ड अंडर द सेक्शन 49 ऑफ़

[03:35:00] आरबीआई एक्ट 1934 दिस रेट हैज़ बीन अलाइन

[03:35:03] विद एमएसएफ रेट एंड चेंज ऑटोमेटिकली एज़

[03:35:06] व्हेन द एमएसएफ मार्जिनल स्टैंडिंग

[03:35:08] फैसिलिटी रेट जितना रहेगा उतना ही बैंक

[03:35:11] रेट रहेगा। ध्यान से सुनना। अगर कोई भी

[03:35:13] बैंक को लगता है कि वो कैश रिजर्व रेशो को

[03:35:17] रख नहीं पा रहा है या स्टरी लिक्विडिटी

[03:35:20] रेशो को रख नहीं पा रहा है और ऐसी सिचुएशन

[03:35:23] में उसे कर्जा चाहिए आरबीआई से कर्जे

[03:35:26] चाहिए इन चीजों को पूरा करने के लिए इन

[03:35:29] जरूरतों को पूरा करने के लिए तो बैंक उसको

[03:35:33] आरबीआई उसको लोन देगा और उस लोन पर जो वह

[03:35:36] ब्याज चुकाएगा उसे नाम देंगे बैंक रेट

[03:35:40] आरबीआई को जो वह लोन लोन चुकाएगा। क्यों

[03:35:44] लोन ले रहा है? केवल वो गरीब आदमी अपने

[03:35:46] सीआरआर और एसएलआर को पूरा नहीं कर पाया।

[03:35:49] वो गरीब आदमी अपने सीआरआर और एसएलआर को

[03:35:52] पूरा नहीं कर पाया तो उसके एवज में उसने

[03:35:55] आरबीआई से कर्जा लिया। उस कर्जे के एवज

[03:35:58] में आरबीआई उसको छोड़ेगा थोड़ी उससे ब्याज

[03:36:01] मांगेगा। जो ब्याज उसे देना पड़ेगा उसको

[03:36:04] कहेंगे बैंक रेट। और वो हमारे देश में

[03:36:07] कितना रहेगा। जितना मार्जिनल स्टैंडिंग

[03:36:10] फैसिलिटी का रेट रहेगा उतना ही डिक्लेअ कर

[03:36:13] दिया जाएगा। तो यदि कोई बैंक अपने सीआरआर

[03:36:17] और एसएलआर को मेंटेन नहीं कर पा रहा है।

[03:36:20] उसकी कमी हो जा रही है तो उस पर पेनल्टी

[03:36:23] ना लग जाए। उस पर चार्ज ना लग जाए। इसके

[03:36:26] लिए वह बैंक रेट के रूप में एक प्रकार से

[03:36:29] कर्जा मांगेगा। आरबीआई से। आरबीआई उसको

[03:36:31] लोन देगी कि चलो ठीक है भाई इस ब्याज दर

[03:36:34] पर मैं आपको इसको कंट्रोल करने के लिए

[03:36:36] कर्जा देता हूं। लेकिन जल्द से जल्द सुधर

[03:36:38] जाओ।

[03:36:41] रेपो रेट रेपो रेट रिवर्स रेपो रेट

[03:36:43] मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी कई सारी

[03:36:46] चीजों को लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी

[03:36:48] कहते हैं। क्योंकि बहुत ही शॉर्ट टर्म के

[03:36:51] लिए किसी बैंक की जरूरतों को पूरा करने

[03:36:54] में यह मददगार साबित होते हैं। लिक्विडिटी

[03:36:57] एडजस्टमेंट फैसिलिटी के रूप में कई सारी

[03:37:00] सुविधाएं हमारे देश में दी जाती है। जैसे

[03:37:03] रेपो रेट की अगर हम बातचीत करें तो यह

[03:37:05] जानना बहुत जरूरी है। रिपर्चेसिंग ऑफर रेट

[03:37:09] भी इसको कहा जाता है। शॉर्ट में रेपो रेट

[03:37:11] कहते हैं। द इंटरेस्ट रेट एट व्हिच द

[03:37:13] रिजर्व बैंक प्रोवाइड लिक्विडिटी अंडर द

[03:37:16] लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी टू ऑल

[03:37:19] लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी

[03:37:21] पार्टिसिपेंट्स अगेंस्ट द कोलटरल ऑफ

[03:37:24] गवर्नमेंट एंड अदर अप्रूव सिक्योरिटी। अगर

[03:37:27] कभी मान लीजिए कि HDFC को इमीडिएटली ऐसा

[03:37:31] कोई एक व्यक्ति आ गया जो कह रहा है कि

[03:37:33] मुझे 500 करोड़ का ऋण चाहिए और HDFC की उस

[03:37:37] शाखा के पास वो ₹500 करोड़ उपलब्ध नहीं है

[03:37:40] और वो उसे कर्जा देना चाहती है क्योंकि

[03:37:42] भरोसेमंद आदमी है। तो वो ब्रांच पहले अपनी

[03:37:45] होम ब्रांच से बातचीत करेगी कि भाई मुझे

[03:37:48] दे रहे हो क्या? पर उसने कहा कि नहीं अभी

[03:37:50] हमारे पास भी नहीं है तो उस ब्रांच के पास

[03:37:52] यह हक होगा कि वो अपने माई-बाप के पास जाए

[03:37:55] आरबीआई के पास और आरबीआई से कहे कि मुझे

[03:37:59] आप 15 दिनों के लिए एक दिन से लेकर 15

[03:38:03] दिनों के लिए वह कर्जा मांगेगी कि बस 15

[03:38:06] दिन में मैं चुका दूंगा। तो 15 दिन के लिए

[03:38:09] जब वो HDFC की ब्रांच पैसे मांगने जाएगी

[03:38:13] तो आरबीआई उससे ब्याज तो लेगा ही लेकिन

[03:38:16] कर्जा किसी ना किसी कोलटरल के एवज में

[03:38:19] देगा। कोलटरल मतलब कोई ना कोई गवर्नमेंट

[03:38:22] सिक्योरिटी जो एसएलआर का हिस्सा ना हो। जो

[03:38:25] एसएलआर का हिस्सा ना हो। एक्स्ट्रा खरीद

[03:38:28] कर उसने रख ली थी। एक्स्ट्रा खरीद कर उसने

[03:38:31] रख ली थी। तब ऐसे एवज में वह आरबीआई में

[03:38:34] कोलटरल के रूप में मतलब गिरवी रखेगा अपने

[03:38:38] उस गवर्नमेंट सिक्योरिटी को या गोल्ड को

[03:38:42] और नगदी लेकर आ जाएगा आरबीआई से। आरबीआई

[03:38:45] उसको नकदी देगी 500 करोड़ लेकिन उस पर वो

[03:38:48] ब्याज दर मांगेगी।

[03:38:50] अगर वह ब्याज दर मांगेगी तो महोदय उस

[03:38:54] ब्याज दर को कहेंगे रेपो रेट। बिल्कुल

[03:38:57] बैंक रेट के जैसा ही है। लेकिन बैंक रेट

[03:38:59] इसलिए था क्योंकि वो गरीब सीआरआर और

[03:39:02] एसएलआर को ही नहीं मेंटेन कर पा रहा है।

[03:39:04] तब कर्जे ले रहा है। यहां पर मेंटेनव

[03:39:07] मेंटेन सब है पर उसको कोई अल्पकालिक जरूरत

[03:39:10] पड़ गई है। एक्स्ट्रा उसके पास एसएलआर

[03:39:12] पड़ा हुआ है। उसके एवज में वह उसके एवज

[03:39:16] में वह लोन लेना चाहता है। तब वहां पर उसे

[03:39:20] ब्याज देना पड़ेगा। उसको रेपो रेट कहेंगे।

[03:39:23] याद रखो बैंक रेट को बढ़ा दोगे या रेपो

[03:39:26] रेट को बढ़ा दोगे तो दोनों ही सिचुएशन में

[03:39:30] यह जो HDFC है इसको ब्याज ज्यादा देना

[03:39:33] पड़ेगा। मतलब इसको महंगा ऋण मिल रहा है।

[03:39:36] तो इसको महंगा ऋण मिल रहा है तो क्या यह

[03:39:38] बाजार में सस्ता दे देगा? यह तो बाजार में

[03:39:41] और भी महंगा ऋण देगा। मतलब इंटरेस्ट रेट

[03:39:44] बढ़ जाएंगे। इंटरेस्ट रेट बढ़ेंगे तो लोग

[03:39:48] इंटरेस्ट की मतलब लोन की डिमांड कम

[03:39:50] करेंगे। लोन की डिमांड कम होगी तो गुड्स

[03:39:53] एंड सर्विज की डिमांड कम होगी। गुड्स एंड

[03:39:56] सर्विज की डिमांड कम होगी तो कहीं ना कहीं

[03:39:59] प्राइस अपने आप डाउन हो जाएंगे। तो याद

[03:40:01] रखो बढ़ाना है को जब भी आप बैंक रेट को

[03:40:04] रेपो रेट को बढ़ाओगे

[03:40:07] तो देश के अंदर महंगाई को कंट्रोल किया जा

[03:40:10] सकता है। देश के अंदर मुद्रास्फीति को

[03:40:13] नियंत्रित किया जा सकता है। एक बहुत बड़ा

[03:40:16] परिवर्तन इसके कारण आ जाएगा। हम कहेंगे कि

[03:40:19] कहीं ना कहीं बाजार में सप्लाई मनी सप्लाई

[03:40:23] कम हो जाएंगे और मनी सप्लाई कम हो जाएंगे

[03:40:26] तब ऐसी परिस्थिति में वस्तुओं की मांग

[03:40:29] अपने आप कम हो जाएगी। एक होता है रिवर्स

[03:40:32] रेपो रेट। रिवर्स रेपो रेट का मतलब

[03:40:35] कभी-कभी मान लीजिए कि HDFC जैसे बैंक के

[03:40:38] पास बहुत बड़ा डिपॉजिट पैसा आ गया। 100

[03:40:42] करोड़ अचानक 2 दिन के अंदर जमा हो गए। लोग

[03:40:45] बड़ी मात्रा में विश्वास जताते हुए HDFC

[03:40:48] में एफडी करने लग गए और पैसा जमा करने लग

[03:40:51] गए। अब यह ₹100 करोड़ इतना बड़ा अमाउंट है

[03:40:54] कि अगर हम बात करें एक दिन का ब्याज, 2

[03:40:56] दिन का ब्याज, 15 दिन का ब्याज बहुत बड़ा

[03:40:59] हो जाएगा और अभी ये उतना लोन नहीं दे पा

[03:41:01] रहा है। उतना तेजी से लोन नहीं जा पा रहा

[03:41:03] है। तब ऐसी सिचुएशन में HDFC अपने माई-बाप

[03:41:07] के पास जाएगा। अपनी होम ब्रांच के बाद वह

[03:41:10] बताएगा कि चलो भाई कोई नहीं तो आरबीआई ले

[03:41:12] लेगा। आरबीआई से कहेगा। आरबीआई से कहेगा

[03:41:16] कि आप कुछ दिनों के लिए यह पैसा अपने पास

[03:41:19] रखो और मुझे कोई गवर्नमेंट सिक्योरिटी

[03:41:22] उसके एवज में दे दो। कुछ दिनों की बात है

[03:41:24] बस 10 दिन 5 दिन की और उसके एवज में

[03:41:27] आरबीआई उसको ब्याज देगी। ब्याज देगी।

[03:41:31] आरबीआई ब्याज देगी तब ऐसी सिचुएशन में

[03:41:35] HDFC का नुकसान थोड़ा सा कम होगा। आरबीआई

[03:41:39] को ब्याज देना पड़ेगा। इसलिए इसको नाम

[03:41:41] देंगे रिवर्स रेपो रेट।

[03:41:45] जब रिवर्स रेपो रेट को बढ़ा देंगे तो HDFC

[03:41:48] जैसी ये जो बैंक है इसको लगेगा कि बाजार

[03:41:51] में पैसा देंगे तो रिस्क रहेगा। ब्याज तो

[03:41:54] ठीक मिलेगा लेकिन रिस्क रहेगा। आरबीआई ने

[03:41:56] अगर रेपो रेट को बढ़ा दिया, रिवर्स रेपो

[03:41:59] रेट को बढ़ा दिया तो इसका विश्वास आरबीआई

[03:42:01] पर है कि आरबीआई कहीं भागने वाला नहीं है।

[03:42:04] तो वो ज्यादा से ज्यादा पैसा इधर रखना

[03:42:06] शुरू कर देगा और बाजार में पैसों का

[03:42:08] सप्लाई कम हो जाएगा। यह बैंकें ऐसा बहुत

[03:42:12] ज्यादा करती थी। आरबीआई को इसके बारे में

[03:42:14] रिपोर्ट पता चली कि रिवर्स रेपो रेट के

[03:42:17] तहत तो मेरे पास पैसा ज्यादा ही आने लग

[03:42:19] गया है। यह बदमाश कामकाज छोड़कर मुझे ही

[03:42:22] पैसे दे देते हैं। मैं क्या करूंगा पैसों

[03:42:24] का? ये तो मैंने इनको फैसिलिटी दी हुई थी

[03:42:26] लिक्विडिटी एडजस्टमेंट के तहत कि चलो भाई

[03:42:28] कुछ दिन की टेंशन है तो दूर कर लेना। पर

[03:42:30] ये तो कमाई करने का जरिया सोचने लग गए। तो

[03:42:33] आरबीआई ने रिवर्स रेपो रेट को बहुत डाउन

[03:42:36] करा दिया। इतना डाउन करा दिया कि आना ही

[03:42:39] नहीं मेरे पास। अगर इमरजेंसी हो तो बात

[03:42:41] समझ में आती है कि एक आध दिन में मैं मदद

[03:42:43] कर दूंगा। पर यह 810 दिन की मदद करने मत

[03:42:46] आना। और अगर आओगे तब मैं मदद करूंगा लेकिन

[03:42:48] ब्याज दर बहुत कम कर दूंगा। द इंटरेस्ट

[03:42:51] रेट एट वि द रिजर्व बैंक अब्सॉर्ब

[03:42:54] लिक्विडिटी फ्रॉम बैंक अगेंस्ट द कोलटरल

[03:42:56] ऑफ एलिजिबल गवर्नमेंट सिक्योरिटीज अंडर द

[03:42:58] लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी फॉलोइंग द

[03:43:01] इंट्रोडक्शन ऑफ स्टैंडर्ड डिपॉजिट

[03:43:03] फैसिलिटी। अब इन्होंने कह दिया कि देखो

[03:43:05] भाई ये तुम गलत कर रहे हो तो स्टैंडिंग

[03:43:08] डिपॉजिट फैसिलिटी की शुरुआत कर दी आरबीआई

[03:43:11] ने। अब नहीं कि देखो 24 घंटे के लिए अगर

[03:43:14] तुम्हें लगता हो तो जो ब्याज दर मैं पहले

[03:43:17] रिवर्स रेपो रेट में देता था अब मैं वो

[03:43:20] स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी के तहत

[03:43:22] तुम्हें दे दूंगा लेकिन 24 घंटे की

[03:43:25] इमरजेंसी है बस 24 घंटे से ज्यादा पैसा

[03:43:28] मेरे पास मत रखना 24 घंटे का ब्याज मैं दे

[03:43:31] दूंगा तुम लोगों को लेकिन 24 घंटे में तुम

[03:43:34] सुधर जाओ तुम मार्केट में बांटो पैसों को

[03:43:36] तो स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी एक नया

[03:43:39] कांसेप्ट लाया है आर आरआरआर की जगह पर अब

[03:43:42] आरआरआर को बहुत कम यूज किया जाता है। बहुत

[03:43:45] कम ब्याज दर कर दी गई। उसकी जगह पर

[03:43:48] इमरजेंसी वाला एक नया कांसेप्ट ला दिया

[03:43:50] गया। स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी जो कि

[03:43:54] आरआरआर की जगह रियल में ले रहा है। बट वो

[03:43:57] इमरजेंसी के लिए है और इसका ब्याज

[03:44:00] सामान्यतः रेपो रेट से कम ही रहेगा।

[03:44:02] क्योंकि रेपो रेट में तो आरबीआई ने उधार

[03:44:05] दिया था। रिवर्स रेपो रेट में तो ये लोग

[03:44:07] जमा करने के लिए आ रहे हैं। तो रिवर्स

[03:44:09] रेपो रेट तो बहुत कम कर दिया गया।

[03:44:11] स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी एक नया

[03:44:13] कांसेप्ट लाया गया है।

[03:44:16] लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी में

[03:44:18] एसडीएफ, एमएसएफ ये सब कुछ शामिल किया जाता

[03:44:21] है। सारे देश के कमर्शियल बैंकों को इसमें

[03:44:24] शामिल करते हैं। स्टैंडिंग डिपॉजिट

[03:44:26] फैसिलिटी कब लाया गया? महोदय 2022 में

[03:44:30] इमरजेंसी के लिए रिवर्स रेपो रेट की जगह

[03:44:33] पर एक अच्छा कांसेप्ट है यह। द रेट एट

[03:44:36] व्हिच द रिजर्व [गला साफ़ करने की आवाज़]

[03:44:37] बैंक एक्सेप्ट अनकलटराइज्ड डिपॉजिट मतलब

[03:44:40] इसमें अब कोई आपको गवर्नमेंट सिक्योरिटी

[03:44:43] नहीं देंगे। बस आप जमा कर सकते हो। ऑन

[03:44:46] ओवरनाइट बेसिस 24 घंटे के लिए फ्रॉम ऑल

[03:44:49] लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी

[03:44:51] पार्टिसिपेंट जिन-जिन को ये सुविधा दी गई

[03:44:53] है। द एसडीएफ इज़ आल्सो ए फाइनेंशियल

[03:44:55] स्टेबिलिटी टूल इन एडिशन टू इट्स रोल इन

[03:44:58] लिक्विडिटी मैनेजमेंट। द एसडीएफ रेट इस

[03:45:00] प्लेज़ अस 20.5 बेसिस पॉइंट बिलो द पॉलिसी

[03:45:04] रेपो रेट। रेपो रेट से 25 पॉइंट मतलब.25

[03:45:07] ब्याज दर कम होती है। 2022 में इसकी

[03:45:10] शुरुआत की गई है। फिर है मार्जिनल

[03:45:12] स्टैंडिंग फैसिलिटी। अगर इमरजेंसी में

[03:45:15] मात्र 24 घंटे के लिए किसी बैंक को जरूरत

[03:45:18] पड़ जाए तो वो रेपो रेट के तहत नहीं

[03:45:21] एमएसएफ के तहत लोन ले सकता है। एमएसएफ के

[03:45:25] तहत लोन ले सकता है। द परसेंट रेट एट

[03:45:29] व्हिच द बैंक कैन बोरो ऑन एन ओवरनाइट

[03:45:32] बेसिस। जैसे ओवरनाइट 24 घंटे के लिए जमा

[03:45:35] करने के लिए एसडीएफ है। वैसे ही 24 घंटे

[03:45:38] का लोन लेने के लिए भी इसके पास जरूरत

[03:45:40] रहेगी। और उसके लिए सबसे बड़ी बातचीत ये

[03:45:43] है कि एमएसएफ के तहत लोन लेने के लिए

[03:45:46] एसएलआर का गवर्नमेंट सिक्योरिटी यूज कर

[03:45:49] सकती है। गवर्नमेंट सिक्योरिटी यूज कर

[03:45:52] सकती है। और इसका फायदा यह है कि कोई

[03:45:55] इमरजेंसी सिचुएशन बैंक में आ जाए तो उसको

[03:45:58] सुधार देंगे। याद रखना आरआर को बढ़ा दो,

[03:46:01] एमएसएफ को बढ़ा दो या एसडीएफ को बढ़ा दो

[03:46:05] या रिवर्स रेपो रेट को बढ़ा दो या बैंक

[03:46:08] रेट को बढ़ा दो। किसी को भी बढ़ा दो अपने

[03:46:11] आप बाजार में ब्याज दरें बढ़ जाती है।

[03:46:13] ब्याज दरें बढ़ेगी तो बैंकों में लोन लेने

[03:46:16] वाले लोग कम हो जाएंगे। मैं बता दे रहा

[03:46:18] हूं हर चीज थोड़ा ध्यान से सुनना।

[03:46:22] सीआरआर जनरली यूज़ नहीं करते। इसके कारण

[03:46:25] पूरा मनी मल्टीप्लायर ही डिस्टर्ब हो जाता

[03:46:27] है। इसे स्टेबल रखा जाता है। पर बड़ी

[03:46:30] मात्रा में पैसा खींचना हो तो इससे बढ़िया

[03:46:32] कुछ भी नहीं है। एसएलआर इसलिए रखा गया है

[03:46:36] ताकि जो लोन देने वाले लोन लेने वाले लोग

[03:46:38] हैं वह रिस्क में रहते हैं तो थोड़ा रिस्क

[03:46:41] इससे कम होता है। पूरा का पूरा पैसा लोन

[03:46:44] के रूप में नहीं दिया जा सकता। कुछ अपने

[03:46:46] पास रखना जरूरी होता है। बैंक रेट जब आप

[03:46:50] एसएलआर और सीएलआर को सीआरआर को ही

[03:46:52] सेटिस्फाइड नहीं कर पा रहे तो भी आपको लोन

[03:46:55] देने के लिए तैयार है आरबीआई

[03:46:58] रेपो रेपो रेट कभी 15 दिन के लिए बैंकों

[03:47:02] के पास जरूरतें कोई कम हो जाती है तो उसकी

[03:47:05] मदद करने के लिए एक से 15 दिन की मदद करने

[03:47:08] के लिए रिवर्स रेपो रेट एक से 15 दिन के

[03:47:11] लिए ज्यादा पैसा उनके पास आ जाए तो

[03:47:14] डिपॉजिट लेने के लिए एमएसएफ

[03:47:18] मार्जिन स्टैंडिंग फैसिलिटी 24 घंटे की

[03:47:20] इमरजेंसी के लिए लोन देने के लिए जिसमें

[03:47:23] आपको गवर्नमेंट सिक्योरिटीज के रूप में

[03:47:25] एसएलआर की सिक्योरिटी यूज करने की अनुमति

[03:47:28] है। इसमें गवर्नमेंट सिक्योरिटीज के रूप

[03:47:30] में एसएलआर की सिक्योरिटी यूज नहीं कर

[03:47:32] सकते। एसएलआर की सिक्योरिटी यूज नहीं कर

[03:47:34] सकते हैं और एसडीएफ के रूप में स्टैंडर्ड

[03:47:39] डिपॉजिट फैसिलिटी 24 घंटे के लिए आप

[03:47:41] आरबीआई के पास पैसा डिपॉजिट कर सकते हैं।

[03:47:44] किसी इमरजेंसी [गला साफ़ करने की आवाज़]

[03:47:46] सिचुएशन में बिना किसी कोलटरल के हम आपको

[03:47:49] कुछ नहीं देंगे पर ब्याज जरूर देंगे उसके

[03:47:51] एवज में। एसडीएफ रिवर्स रेपो रेट को बहुत

[03:47:55] कम कर दिया गया। उसके पीछे का बड़ा रीजन

[03:47:57] है कि बैंकें दुरुपयोग करती थी। का अब

[03:48:00] उसकी जगह इमरजेंसी के रूप में एसडीएफ की

[03:48:02] फैसिलिटी स्टार्ट कर दी। रिवर्स रेपो रेट

[03:48:05] 15 दिनों के लिए तक के लिए होता है। 24

[03:48:07] घंटे के लिए स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी

[03:48:09] है। रेपो रेट 15 दिन के लिए होता है।

[03:48:11] इमरजेंसी के लिए एमएसएफ की फैसिलिटी शुरू

[03:48:14] कर दी गई है।

[03:48:18] ये अलग चीज है। अभी मैं इसको पढ़ाऊंगा।

[03:48:20] कैपिटल एडिक्वसी रेशियो ये अलग चीज है।

[03:48:23] यहां पर गलत है। ये सवाल अभी नहीं आना

[03:48:24] चाहिए था। ये आगे पढ़ेंगे हम लोग। जब

[03:48:26] बातचीत आएगी तो मात्रात्मक उपाय जो होते

[03:48:30] हैं क्वांटिटेटिव बैंक रेट मनी सप्लाई

[03:48:32] डिक्रीज हो जाएगा अगर हमने बढ़ा दिया इसको

[03:48:35] तो जब भी बढ़ाएंगे तो मनी सप्लाई डिक्रीज

[03:48:38] होगा जब भी बढ़ाएंगे मनी सप्लाई डिक्रीज

[03:48:40] होगा जब भी बढ़ाएंगे मनी सप्लाई डिक्रीज

[03:48:42] होगा जब भी बढ़ाएंगे मनी सप्लाई डिक्रीज

[03:48:45] होगा जब भी बढ़ाएंगे मनी सप्लाई डिक्रीज

[03:48:47] होगा मनी सप्लाई डिक्रीज होगा मनी सप्लाई

[03:48:50] डिक्रीज होता है जब भी मनी सप्लाई डिक्रीज

[03:48:53] करना हो तो इसको बढ़ा दो जब भी मनी सप्लाई

[03:48:55] बढ़ाना तो इसको घटा दो। रिवर्स इन्वर्सली

[03:48:58] प्रोपोर्शनल रिलेशन होता है।

[03:49:08] अगर कोई ऐसी मॉनिटरी पॉलिसी आती है मतलब

[03:49:11] याद रखिएगा यदि

[03:49:14] ऐसी मौद्रिक नीति आती है जो लिक्विडिटी को

[03:49:18] बढ़ाने का काम करती है। लिक्विडिटी को

[03:49:20] इनक्रीस करने का काम करती है। तो याद रखना

[03:49:23] ऐसी मॉनिटरी पॉलिसी को एक्सपेंशनरी

[03:49:27] विस्तार वाली मौद्रिक नीति कहते हैं।

[03:49:29] उसमें ब्याज दरें कम की जाती है। इसका

[03:49:32] मतलब मंदी से लड़ना होता है। इसको सॉफ्ट

[03:49:35] मॉनिटरी पॉलिसी भी कहा जाता है। लेकिन यदि

[03:49:38] ऐसी मॉनिटरी पॉलिसी आती है जिसमें ब्याज

[03:49:40] दरों को बढ़ाया जाता है तो उसको हार्ड

[03:49:42] मॉनिटरी पॉलिसी या कॉन्ट्रक्शनरी मतलब

[03:49:45] सिकुड़ने वाली मॉनिटरी पॉलिसी नाम दिया

[03:49:48] जाता है। लचीली सॉफ्ट या विस्तारवादी

[03:49:52] मौद्रिक नीति यदि मुद्रा आपूर्ति को

[03:49:54] बढ़ाना हो ब्याज दरों को कम किया जाता हो

[03:49:57] तो याद रखना कठोर या संकुचनशील मतलब

[03:50:00] अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति को कम

[03:50:02] करने घटाने के लिए ब्याज दरों को बढ़ाया

[03:50:04] जाता है। गोल क्या होगा? एक्सपेंशनरी में

[03:50:08] गोल होगा मंदी से लड़ना। वहां गोल होगा

[03:50:11] महंगाई से लड़ना। यहां ब्याज दरें कहीं ना

[03:50:13] कहीं कम होगी। यहां ब्याज दरें बढ़ाई

[03:50:16] जाएगी। शब्दों पर ध्यान दीजिएगा। इससे

[03:50:18] मुद्रास्फीति कहीं ना कहीं बढ़ती है। इससे

[03:50:20] मुद्रास्फीति कम होती है। इसका जो टाइमिंग

[03:50:23] होता है यह जनरली तब लाएंगे जब रिसेशन का

[03:50:26] टाइम होगा। यह तब लाएंगे जब यहां पर

[03:50:28] महंगाई बहुत ज्यादा होगी।

[03:50:31] यदि आरबीआई डिसाइड टू अडॉप्ट ए एक्सपानिश

[03:50:34] मॉनिटरी पॉलिसी यदि आरबीआई प्रसारवादी

[03:50:37] मौद्रिक नीति का अनुसरण करेगी तो क्या

[03:50:39] नहीं करेगी वो वैधानिक तरलता अनुपात को

[03:50:42] घटाएगी बिल्कुल घटाएगी ये तो करेगी सीमांत

[03:50:45] स्थाई सुविधा दर को बढ़ाएगी मार्जिनल

[03:50:47] स्टैंडिंग फैसिलिटी को भी घटाएगी बैंक दर

[03:50:50] को घटाएगी रेपो रेट को घटाएगी सब करेगी वो

[03:50:53] लेकिन वो बढ़ाएगी नहीं तो हम कहेंगे कि

[03:50:56] केवल दूसरा वो नहीं करेगी वो नहीं करेगी

[03:50:59] क्योंकि सब घटाने ाने की बातचीत आ जाती

[03:51:01] है। प्रायरिटी सेक्टर लेंडिंग का कांसेप्ट

[03:51:04] मैंने बताया। प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र

[03:51:07] से तात्पर्य उन क्षेत्रों से जिन्हें भारत

[03:51:09] सरकार और आरबीआई देश की मूलभूत जरूरतों के

[03:51:12] विकास के लिए जरूरी मानते हैं। इन

[03:51:15] क्षेत्रों को अन्य क्षेत्र पर प्राथमिकता

[03:51:17] वरीयता दी जाती है और ऐसी जगह पर इनके लोन

[03:51:20] देने की शर्त लगाई जाती है। 2016 में जारी

[03:51:24] आरबीआई परिप परिपत्र के अनुसार पीएसएल की

[03:51:27] आठ व्यापक श्रेणियों में कृषि सूक्ष्म लघु

[03:51:30] मध्यम उद्यम निर्यात ऋण इन क्षेत्रों को

[03:51:33] प्रायोरिटी सेक्टर के अंतर्गत रखा गया। ये

[03:51:35] पूछा जा सकता है। एग्रीकल्चर, एमएसएमई,

[03:51:38] एक्सपोर्ट, एजुकेशन, आवास,

[03:51:42] मतलब हाउसिंग लोन, सोशल इंफ्रास्ट्रक्चर,

[03:51:45] रिन्यूएबल एनर्जी इन सेक्टरों को

[03:51:47] प्रायोरिटी सेक्टर के अंतर्गत रखा गया है।

[03:51:50] यह पूछा जा सकता है।

[03:51:54] जो कमर्शियल बैंक होते हैं हमारे देश के

[03:51:56] जिनके कमर्शियल मतलब हमारे देश के जितने

[03:51:59] कमर्शियल बैंक या फॉरेन के बैंक हैं जिनकी

[03:52:02] हमारे देश में शाखाएं 20 से ज्यादा हैं

[03:52:05] उन्हें 40% मिनिमम तो टोटल प्रायोरिटी

[03:52:09] सेक्टर रखना ही पड़ता है। ऐसी शाखाएं ऐसे

[03:52:12] विदेशी बैंक जिनकी शाखाएं 20 से कम है

[03:52:15] उन्हें 40% तो रखना पड़ता है। लेकिन इसमें

[03:52:18] कोई ऐसा विभाजन नहीं है। जैसे यहां पर

[03:52:20] इसमें कंफर्म होगा कि 40% में 18%

[03:52:23] एग्रीकल्चर में जाना ही चाहिए। एमएसएमई

[03:52:26] में माइक्रो एंटरप्राइजेज को 7.5% जाना

[03:52:29] चाहिए माइक्रो को और वीक सेक्शन को 12%

[03:52:33] पैसा जाना ही चाहिए। ऐसा क्राइटेरिया होता

[03:52:35] है। फॉरेन बैंक वालों के साथ ऐसा विभाजन

[03:52:38] का कोई क्राइटेरिया नहीं होता।

[03:52:41] रीजनल रूलर बैंक को 75%

[03:52:44] प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग की शर्त पूरी

[03:52:47] करनी पड़ती है और स्मॉल फाइनेंस बैंक को

[03:52:49] पेमेंट बैंक को क्यों नहीं क्योंकि पेमेंट

[03:52:51] बैंक लोन ही नहीं दे सकता है और इसमें भी

[03:52:53] 18% ये शर्त के अलावा रीजनल रूलर बैंक को

[03:52:57] 15% वीकर सेक्शन को देना पड़ता है और

[03:53:00] स्मॉल फाइनेंस बैंक को 12% मतलब यह इतना

[03:53:03] मिनिमम तो रहेगा ही उसके बाद बचा हुआ आप

[03:53:05] कहीं पर भी दे सकते हैं।

[03:53:12] अब बात करते हैं आरबीआई की मेजर लेंडिंग

[03:53:16] रेट की। एक सेकंड एक सेकंड कुछ ज्यादा ही

[03:53:19] डिस्टरबेंस वाला।

[03:53:22] एक सेकंड।

[03:53:57] आइए ध्यान दीजिएगा।

[03:54:07] थोड़ा सा वेट कर लीजिए। 12:00 बजे तक

[03:54:09] ब्रेक लेंगे हम लोग। आपको पता है कि 12:00

[03:54:12] बजे ही ब्रेक होता है। 12 सवा5 बजे तक

[03:54:15] ब्रेक रहेगा। अभी

[03:54:19] देखो, अभी दूसरा ही टॉपिक चल रहा है। उसको

[03:54:22] तो कंप्लीट करना बहुत जरूरी है। और यह

[03:54:24] प्रीलिम्स का बहुत इंपॉर्टेंट टॉपिक है।

[03:54:26] तो अभी ब्रेक का तो दिमाग से निकाल दीजिए

[03:54:27] अभी आप लोग।

[03:54:33] इधर [गला साफ़ करने की आवाज़] ध्यान देना।

[03:54:35] पहले क्या होता था कि हमारे देश में

[03:54:39] जो बैंकें होती थी वो अपने अनुसार किसी भी

[03:54:42] कस्टमर को कोई भी ब्याज दर पर कर्जा दे

[03:54:45] देती थी। कभी किसी कस्टमर को बहुत कम

[03:54:48] ब्याज दर पर कर्ज दे देती थी और किसी को

[03:54:50] बहुत ज्यादा पर कोई ट्रांसपेरेंसी नहीं

[03:54:52] होती थी। इसका नुकसान क्या होता था कि सच

[03:54:54] में जिसको जरूरत है उसको बहुत महंगा ब्याज

[03:54:57] मिलता था और जिसको जरूरत नहीं है उसको

[03:54:59] बहुत सस्ते ब्याज पर मिल जाते थे लोन और

[03:55:02] इसका नुकसान यह भी होता था कि उससे बैंकों

[03:55:04] के हालात खराब हो जाते थे कई बार बैंकके

[03:55:06] डूब जाती थी क्योंकि जिसको बहुत अच्छा

[03:55:09] कस्टमर माना वही पैसा लेकर भाग जाता था

[03:55:11] भगोड़ा हो जाता था आम नागरिक की पहुंच से

[03:55:14] दूर होता था तो बैंक की ब्याज दरों को कि

[03:55:18] भाई जमा करने की ब्याज दर कितनी होनी

[03:55:20] चाहिए लोन देने की ब्याज दर कितनी नहीं

[03:55:22] होनी चाहिए। यह आरबीआई कंट्रोल में रखती

[03:55:25] थी। लेकिन बीच-बीच में कई कमेटियां बनी

[03:55:28] जिन्होंने कहा कि देखो भाई अगर ब्याज दर

[03:55:31] आपने बैंकों पर नहीं छोड़े तो बैंकके फिर

[03:55:34] अपनी मर्जी से फ्रीडम से काम नहीं कर

[03:55:36] पाएगी। लेकिन फिर भी एक स्टैंडर्ड तो तय

[03:55:39] करना पड़ेगा ताकि कहीं बैंकके जानबूझकर

[03:55:42] अपने रिश्तेदारों को ही ऐसा ना कर दे कि

[03:55:44] बहुत सस्ता ब्याज दे दे। क्योंकि कल के

[03:55:46] दिन पैसा तो इनका है नहीं। जनता ने जमा

[03:55:48] किया था। बैंकके डूबेगी तो जनता का पैसा

[03:55:50] डूबेगा। तो आरबीआई ने इन पर कंट्रोल करने

[03:55:54] के लिए कुछ कदम उठाए।

[03:55:56] 1994 में एक रेट तय कर दी गई कि इससे नीचे

[03:56:02] आप किसी को भी

[03:56:04] किसी को भी उधार नहीं दे सकते हैं। जिसका

[03:56:07] नाम रखा गया प्राइम लेंडिंग रेट। प्राइम

[03:56:10] लेंडिंग रेट का मतलब वो स्टैंडर्ड ब्याज

[03:56:13] दर जिससे नीचे वो किसी को कर्जा नहीं दे

[03:56:16] सकते थे। फिर इसके लिए 2003 में एक बदलाव

[03:56:20] किया गया कि भ उसका एक फार्मूला बनाया गया

[03:56:23] कि उस फार्मूले के तहत डिसाइड किया जाए

[03:56:26] जिसका [गला साफ़ करने की आवाज़] नाम रखा

[03:56:27] गया बेंचमार्क प्राइम लेंडिंग रेट। फिर

[03:56:31] 2010 में बेस रेट आ गई। 2010 में उस

[03:56:35] फार्मूले को और बेटर किया और कहा गया कि

[03:56:38] सभी बैंकके इस रेट को फॉलो करेगी। इसलिए

[03:56:41] नाम रखा 2010 में बेस रेट। 2010 में उसी

[03:56:46] बेस रेट को और बेटर करते हुए फार्मूला

[03:56:49] बनाया गया मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड बेस्ड

[03:56:52] लेंडिंग रेट एमसीएलआर

[03:56:55] एक और अच्छा फार्मूला बनाते हुए उस आधार

[03:56:58] पर तय कर दिया गया क्योंकि कई बार हमारी

[03:57:00] आरबीआई

[03:57:02] बीच-बीच में ब्याज दरों को कम कर देती थी।

[03:57:05] उसका लाभ कस्टमर को नहीं मिल पाता था। तो

[03:57:08] उन्होंने कहा कि भ उसका लाभ कस्टमर को

[03:57:10] मिलना चाहिए। इसलिए एमसीएलआर लेकर आए।

[03:57:13] लेकिन फिर हमारे देश में विदेशी क्योंकि

[03:57:15] लेनदेन होता रहता है, रुपया गिरता है,

[03:57:18] डॉलर बढ़ता है या जो भी चीजें होती है,

[03:57:21] अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का भी इंपैक्ट पड़ता

[03:57:23] है। तो अब 2019 में एमसीएलआर के साथ-साथ

[03:57:28] एक्सटर्नल बैंक बेंचमार्क लिंक रेट भी कर

[03:57:31] दिया गया है।

[03:57:35] ताकि दुनिया भर की घटनाओं के प्रभाव के

[03:57:38] साथ ब्याज दरों को जोड़ा जा सके।

[03:57:41] तो एक-ए को समझते हैं। मेनली हमें लास्ट

[03:57:44] वाले पर ज्यादा ध्यान देना है क्योंकि

[03:57:46] सवाल उसी के इर्दगिर्द रहेगा।

[03:57:51] वह दर जिस पर प्रमुख वाणिज्यिक बैंक अपने

[03:57:55] सबसे अधिक क्रेडिट योग्य ग्राहक को ऋण

[03:57:57] देता है। प्राइम लेंडिंग रेट कहलाता था।

[03:58:02] सबसे बेस्ट कस्टमर को जो सबसे कम ब्याज दर

[03:58:05] पर दे देता है। 2003 में इसकी जगह आ गया

[03:58:09] बेंचमार्क। इसके तहत बैंक ऋणों की दर फंड

[03:58:13] की वास्तविक लागत पर तय करने लगे कि देखो

[03:58:15] भाई मेरे पास जो पैसा लोग डिपॉजिट करने आ

[03:58:17] रहे हैं उसे मुझे उनको भी तो इंटरेस्ट रेट

[03:58:19] देना है। मुझे बैंक चलानी भी है। मुझे

[03:58:22] बैंक के कर्मचारियों की सैलरी भी देनी है।

[03:58:25] तो सब चीजों को ध्यान में रखते हुए एक

[03:58:27] फार्मूला बनाया गया। उसका नाम रखा गया

[03:58:29] बेंचमार्क प्राइम लेंडिंग रेट और यह सबसे

[03:58:32] लोएस्ट रेट होती है। इससे नीचे कर्जा किसी

[03:58:34] को नहीं मिल सकता है। पर आ गया फिर बेस

[03:58:37] रेट। ट्रांसपेरेंसी की कमी के कारण आरबीआई

[03:58:40] ने 2010 में बेस रेट लाया। वह न्यूनतम

[03:58:43] ब्याज दर जिस पर भारतीय बैंक ऋण दे सकती

[03:58:46] है। बेस रेट की गणना मिनिमम लाभ मार्जिन

[03:58:49] और रिटर्न पर मूल्यांकन को किया गया कि भ

[03:58:53] कितना लाभ आप कमाना चाहते उस पर भी ध्यान

[03:58:55] दिया गया। अप्रैल 2016 में आरबीआई ने बेस

[03:58:59] रेट की जगह पर ऋण दर की मिनिमम लागत के

[03:59:02] आधार पर इसका शुरुआत की जिसका नाम रखा

[03:59:05] मार्जिनल कॉस्ट ऑफ लेंडिंग रेट। अब

[03:59:08] मार्जिनल कॉस्ट का मतलब होता है कि सबसे

[03:59:10] पहले तो इंटरेस्ट रेट कितना पे करना

[03:59:12] पड़ेगा? जो भी कस्टमर ने पैसा जमा किया

[03:59:16] उसे। फिर जो सीआरआर रहेगा कैश रिजर्व रेशो

[03:59:19] के तहत आरबीआई के पास पैसा जमा करते हैं

[03:59:22] तो उसका तो खर्चा क्योंकि वो ब्याज तो

[03:59:24] मिलता नहीं है तो उसका ब्याज का बोझ भी

[03:59:26] आता है।

[03:59:30] फिर कभी-कभी लिक्विडिटी एडजस्टमेंट

[03:59:32] फैसिलिटी के तहत कर्जादा लेना पड़ता है।

[03:59:34] बैंक के परिचालन का खर्चा इन सबको जोड़कर

[03:59:38] निकाला गया। वह न्यूनतम ब्याज दर जिस पर

[03:59:41] कमर्शियल बैंक ग्राहकों को उधार दे सकता

[03:59:44] है। यह बैंकों के लिए एक आंतरिक रेफरेंस

[03:59:46] रेट होता है। एमसीएलआर की गणना ऋण अवधि के

[03:59:49] आधार पर भी होती है कि भ कितने टाइम का ऋण

[03:59:52] है? उधारकर्ता को ऋण चुकाने में कितना समय

[03:59:55] लगेगा? उससे कितनी समय अवधि के लिए ऋण

[03:59:57] लिया गया है? एमसीएलआर वास्तविक जमा दरों

[04:00:00] से जुड़ी हुई है। इसलिए जमा दरों में

[04:00:02] वृद्धि होती है। जब जब भी सेविंग खाते में

[04:00:05] डिपॉजिट में फिक्स्ड डिपॉजिट में रेट

[04:00:07] बढ़ते हैं तो एमसीएलआर भी बढ़ जाता है।

[04:00:10] मतलब अगर आरबीआई कोई ब्याज दरों को कम

[04:00:13] करेगी तो इमीडिएटली कर्जे की जो रेट है वो

[04:00:16] भी कम हो जाएंगे। इसका बड़ा बेनिफिट ये

[04:00:19] था।

[04:00:21] बेस [गला साफ़ करने की आवाज़] रेट में

[04:00:22] कॉस्ट ऑफ फंड, मार्जिन, ऑपरेशनल

[04:00:24] एक्सपेंसेस और कैश रिजर्व रेशियो सीआरआर

[04:00:27] को शामिल किया गया था। एमसीएलआर में

[04:00:29] मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड को लिया गया।

[04:00:32] टेन्योर को जोड़ा गया कि भ कितना वहां पर

[04:00:35] टाइम पीरियड है उसको भी ध्यान रखा जाए। तो

[04:00:37] ये न्यू बेस्ट रेट आकर निकल कर आ गया

[04:00:40] एमसीएलआर। उसका सबसे बड़ा बेनिफिट यह है

[04:00:44] कि जब भी आरबीआई किसी प्रकार से ब्याज

[04:00:47] दरों को कमी करेगी तो इमीडिएटली जिन लोगों

[04:00:50] ने कर्जे लिए हैं उनके भी ब्याज दर कम हो

[04:00:52] जाएंगे। अगर आरबीआई ब्याज दरों को बढ़ाएगी

[04:00:56] तो उनके भी ब्याज दर बढ़ जाएंगे। एमसीएलआर

[04:00:59] का वो बेनिफिट मिल पाएगा। इंटरनल

[04:01:02] बेंचमार्क लेंडिंग रेट पहले एक्सटर्नल को

[04:01:04] समझने से पहले इंटरनल लेते हैं।

[04:01:08] आईबीएलआर ऋण दरों का एक समूह है जिसकी

[04:01:10] गणना बैंक के वर्तमान वित्तीय अवलोकन जमा

[04:01:13] गैर निष्पादित संपत्ति आदि कारकों पर

[04:01:15] विचार करने के बाद की जाती है। जो

[04:01:18] बीपीएलआर आधार दर एमसीएलआर इत्यादि

[04:01:21] आईबीएलआर के ही उदाहरण है। जो भी हमने

[04:01:23] बेंचमार्क प्राइम लेंडिंग रेट देखा बेस

[04:01:26] रेट देखा यह सब कुछ इंटरनल बेंचमार्क

[04:01:28] लेंडिंग रेट ही कहलाते हैं। जो आरबीआई

[04:01:31] समय-समय पर फार्मूला बताते हुए कहती है कि

[04:01:33] आप अपना-अपना कैलकुलेट कर दो। इसलिए कोई

[04:01:36] बैंक सस्ता ऋण देता है, कोई बैंक महंगा ऋण

[04:01:39] देता है। वो अपनेपने अनुसार इंटरनल बैंक

[04:01:41] लेंडिंग रेट निकालते हैं। एक्सटर्नल

[04:01:44] बेंचमार्क लेंडिंग रेट 1 अक्टूबर 2019 से

[04:01:48] सभी बैंकों के लिए नए फ्लोटिंग रेट पर्सनल

[04:01:52] और

[04:01:54] रेंटल लोन एमएसएमए हेतु लोन हेतु

[04:01:56] एक्सटर्नल बेंचमार्क रेट से जोड़ना

[04:01:58] अनिवार्य कर दिया गया। एक्सटर्नल

[04:02:00] बेंचमार्क लेंडिंग रेट के तहत आरबीआई ने

[04:02:03] बैंकों को चार बाहरी बेंचमार्किंग तंत्रों

[04:02:05] में से चुनने का विकल्प दिया कि इनमें से

[04:02:08] कुछ भी चुन लो। आपको अगर बाहर से भी लोन

[04:02:11] लेना हो तो या तो आरबीआई की रेपो रेट बदल

[04:02:14] रही हो तो आप भी अपनी ब्याज दर बदलोगे या

[04:02:17] 91 डेज के जो ट्रेजरी बिल गवर्नमेंट जारी

[04:02:20] करती है उसका अगर हमने ट्रेजरी बिल बढ़ा

[04:02:22] दिया ब्याज दर तो आप अपना ब्याज बढ़ा देना

[04:02:25] या 182 के जो ट्रेजरी बिल होते हैं उनको

[04:02:28] देख लेना या फिर फाइनेंशियल बेंचमार्क

[04:02:33] इंडिया प्राइवेट लिमिटेड वित्तीय

[04:02:36] बेंचमार्क इंडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा

[04:02:38] विकसित की गई कोई भी अन्य बेंचमार्क बाजार

[04:02:41] दर जैसे मिबोर मिबोर जो मुंबई इंटर

[04:02:45] बैंकिंग ऑफर लेट कहलाता है जो बैंकके आपस

[04:02:48] में एक दूसरे को लोन देते समय यूज करता है

[04:02:51] आप उसको भी आधार मान सकते हैं। पहले केवल

[04:02:54] रेपो रेट का ही फ्रीडम था बाकी का नहीं

[04:02:56] था। अब बैंकों को ये फ्रीडम दी गई है कि

[04:02:59] देखो भाई आप इनमें से कोई भी बेंचमार्क

[04:03:02] मान लो अपने मार्जिनल कॉस्ट को निकालने के

[04:03:05] लिए ताकि ज्यादा बेटर तरीके से आपको भी

[04:03:08] फ्रीडम मिल जाए

[04:03:12] तो रेपो रेट 3 महीने का ट्रेजरी बिल छ

[04:03:15] महीने का ट्रेजरी बिल या किसी प्रकार का

[04:03:18] अन्य वाला जो फाइनेंशियल इंटरेस्ट रेट हो

[04:03:20] सकता है एक बैंक को एक से अधिक बेंचमार्क

[04:03:23] अपनाने की अनुमति नहीं है। साथ ही

[04:03:25] एक्सटर्नल बेंचमार्क के तहत ब्याज दर

[04:03:27] प्रत्येक 3 महीने में कम से कम एक बार तो

[04:03:30] ही रिीडसाइड की जाएगी।

[04:03:33] जब आरबीआई ने रेपो रिवर्स रेपो दर को कम

[04:03:35] किया तो बैंकों ने केवल कुछ सीमित लाभ ही

[04:03:38] कर्जदारों को दिए। ऐसी स्थिति में

[04:03:40] कर्जदारों को नुकसान हुआ। ऐसा क्यों कर

[04:03:42] रही है आरबीआई? क्योंकि जब आरबीआई

[04:03:44] सुविधाएं दे रही है कि ब्याज दरें कम हुई

[04:03:46] तो यह कम नहीं करते बैंक वाले। तब उनको

[04:03:49] कंट्रोल करने के लिए आरबीआई के द्वारा

[04:03:51] 2019 में रेपो दर 75 आधार अंकों की कमी की

[04:03:55] गई तो बैंकों ने एमसीएलआर में केवल 29

[04:03:57] आधार अंकों की कमी की। भाई अगर आपके लिए

[04:04:01] रेपो रेट कम हो गया है तो आपका दायित्व है

[04:04:03] कि बैंक रेट को कम कर दीजिए। लेकिन ऐसा

[04:04:05] किया नहीं इन गधों ने। बाहरी

[04:04:07] [गला साफ़ करने की आवाज़] बेंचमार्किंग को

[04:04:08] अपनाने से ब्याज दरें ट्रांसपेरेंटली हो

[04:04:11] पाएगी। उधारकर्ताओं को निश्चित ब्याज दर

[04:04:14] पर प्रत्येक बैंक के लिए प्रसार लाभ

[04:04:16] मार्जिन का पता चल पाएगा और उसे क्लेरिटी

[04:04:19] आएगी कि बैंकों को भी फ्रीडम दे दी गई और

[04:04:21] उनको अब फुलफिल करना ही पड़ेगा। तो

[04:04:24] एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट इसलिए

[04:04:26] लाया गया ताकि ट्रांसपेरेंसी को और बेटर

[04:04:29] किया जा सके।

[04:04:36] एमसीएलआर में चीजें जल्दी नहीं बदलती थी।

[04:04:38] यहां जल्दी बदलेगी। अब

[04:04:41] फाइनेंशियल बेंचमार्क इंडिया प्राइवेट

[04:04:43] लिमिटेड एक कंपनी है हमारे देश में 2014

[04:04:47] में बनाई गई थी कंपनी अधिनियम 2013 के

[04:04:50] कानून के तहत आरबीआई के द्वारा इसे एक

[04:04:53] स्वतंत्र बेंचमार्क व्यवस्थापक के रूप में

[04:04:55] मान्यता दे दी गई है मुंबई में इसका

[04:04:57] मुख्यालय है। भारतीय ब्याज दर और विदेशी

[04:05:00] मुद्रा बेंचमार्क की समीक्षा के साथ नई

[04:05:03] बेंचमार्क दरों के लिए नीतियां भी बनाता

[04:05:05] है।

[04:05:07] यह तो हुआ हमारे देश में लोन लेने के लिए।

[04:05:10] लेकिन सोचो कि हमारे देश का कोई एक बैंक

[04:05:12] है जिसे किसी विदेश के बैंक से लोन लेना

[04:05:15] है। हमारे देश का एक बैंक है जिसे किसी

[04:05:17] दूसरे बैंक से लोन लेना हो। या आपस में भी

[04:05:20] तो लोन लेना देना चलता रहता होगा। तो उसके

[04:05:23] लिए आता है लिबोर। Libोर अल्पकारिक ब्याज

[04:05:26] दरों के लिए एक बेंचमार्क होता था। एक रात

[04:05:28] से लेकर एक वर्ष के लिए। एक जमाने में

[04:05:31] लिबोर यूज किया जाता था। लंदन इंटर बैंक

[04:05:34] ऑफर रेट। ये ज्यादा समावेशी हुआ करता था

[04:05:38] जिसमें कई प्रकार की चीजें होती थी। लेकिन

[04:05:41] दुनिया में अमेरिका की फेडरल रिजर्व बैंक

[04:05:46] जितना इंपैक्ट डालती है उतना कोई नहीं

[04:05:49] डालता है। इसलिए 2022-23 में इसको भी बंद

[04:05:53] कर दिया क्योंकि अमेरिका की फेडरल रिजर्व

[04:05:56] बैंक का इंपैक्ट ज्यादा देखा जाता है

[04:05:58] दुनिया भर में। इसलिए लिबोर की जगह सॉफर आ

[04:06:02] गया है। मुंबई इंटर बैंक ऑफर रेट मिबोर

[04:06:06] भारतीय वाणिज्यिक बैंकों को दी जाने वाली

[04:06:09] ओवरनाइट ऋण दर है। मिबोर की गणना हमारे

[04:06:12] देश में 30 बड़े बैंक या जो भी प्राइमरी

[04:06:15] डीलर मतलब बैंक है उनके द्वारा जो इनपुट

[04:06:18] मिलता है कि भाई हमने इतने लोन पर इतने

[04:06:20] ब्याज दर पर दूसरी बैंक को लोन दिया उसे

[04:06:22] मिबोर ज्ञात किया जाता है। मेबोर 1998 में

[04:06:26] स्थापित किया गया था लिबोर के तर्ज पर।

[04:06:29] तो libr इंटरनेशनलली यूज होता है। मिबोर

[04:06:32] हमारे देश में बैंकके एक दूसरे को लोन

[04:06:34] देने के लिए यूज करती है। लेकिन अब लबोर

[04:06:37] की जगह सोफर आ गया। सो फर डॉलर मूल्य वाले

[04:06:40] डेरिवेटिव और ऋण के बेंचमार्क ब्याज दर

[04:06:43] है। वास्तविक रूप में जो डॉलर का इंपैक्ट

[04:06:47] या फेडरल रिजर्व बैंक की जो ब्याज दरें

[04:06:49] होती है वो दुनिया को ज्यादा प्रभावित

[04:06:52] करती है। इसलिए सोफर लाया गया है। सोफर

[04:06:55] ट्रेजरी पुनरखरीद बाजार ट्रेजरी

[04:06:58] रिपर्चेसिंग मार्केट मतलब ट्रेजरी बिल जो

[04:07:00] रेपो रेट होते हैं वहां के अमेरिका के

[04:07:03] रेपो रेट उससे जुड़ा हुआ है और इससे बेहतर

[04:07:07] माना जा रहा है लिबोर्ड से क्योंकि

[04:07:09] अमेरिका के ब्याज दरों का ज्यादा इंपैक्ट

[04:07:11] देखा जाता है क्योंकि अनुमानित उधार दरों

[04:07:14] के बजाय अवलोकन योग्य लेनदेन के डाटा पर

[04:07:16] बेस्ड है। मतलब इसमें प्रैक्टिकल चीजें

[04:07:19] दिखने लग जाती है। तो वर्तमान में

[04:07:21] इंटरनेशनल लेनदेन के लिए लिबोर नहीं बल्कि

[04:07:24] सोफर यूज़ होता है। लिबोर्ड में अमेरिकन

[04:07:27] डॉलर, जापनीज येन, चाइना का जो करेंसी था

[04:07:31] या अलग-अलग प्रकार की जो यूरोपियन करेंसी

[04:07:34] थी वो यूज़ होती थी। यहां केवल अमेरिकन

[04:07:36] डॉलर के रूप में ही और अमेरिका की ट्रेजरी

[04:07:39] बिल से जुड़ा हुआ है। वास्तविक रूप में

[04:07:42] यहां अमेरिका का प्रभुत्व खुलकर दिखने लग

[04:07:44] जाता है और रियल में उसका असर ज्यादा होता

[04:07:47] है। एक्चुअली लिबोर में क्या होता था कि

[04:07:49] कई बार अमेरिकन करेंसी के चेंजेस होने के

[04:07:52] अमेरिकन ब्याज दरों के बदलने के कारण पूरी

[04:07:54] दुनिया में हलचल मच जाती थी। लेकिन लिबोर

[04:07:57] में कोई चेंज नहीं आता था। तो ऐसा लगता था

[04:07:59] कि दुनिया कहीं और चल रही है और लिबोर

[04:08:01] कहीं और चल रहा है। सोफर में वही चीज

[04:08:03] दिखती है जो दुनिया में घटित हो रही है।

[04:08:05] अमेरिका की ब्याज दरों का सीधा असर पूरी

[04:08:08] दुनिया पर पड़ता है। इसलिए लिबोर की जगह

[04:08:10] सोफर आ गया है। भारतीय रिजर्व बैंक का सभी

[04:08:13] बैंकों को वित्तीय संस्था 1 जुलाई 2024 से

[04:08:16] लिबोर पर निर्भरता समाप्त करने के निर्देश

[04:08:18] दिए हैं। लिबोर की गणनाएं पहले बहुत आधार

[04:08:22] पर होती थी। अब सोफर यूज़ करेंगे। अब बात

[04:08:24] कर देते हैं माइक्रो फाइनेंस सेक्टर। देखो

[04:08:28] हमारे देश में यह बैंकिंग सिस्टम हम क्यों

[04:08:30] लाए थे? सबसे कमजोर व्यक्ति तक भी ऋण की

[04:08:34] व्यवस्था लाने के लिए। लेकिन क्या सच में

[04:08:36] ऐसा हो पाया?

[04:08:39] नहीं हो पाया था। तब माइक्रो फाइनेंस

[04:08:42] सेक्टर एक बहुत बड़ी चीज लाई जिसके माध्यम

[04:08:45] से गांव में महाजनों को हटाने के लिए हमने

[04:08:49] एक ऐसी व्यवस्था कायम की कि गांव के लोगों

[04:08:52] को कितना कर्जा लगता है? 50000 25000 60

[04:08:56] हजार क्योंकि जो गांव के गरीब लोग जो

[04:08:58] प्रतिदिन 400 ₹500 कमाते हैं उन लोगों के

[04:09:02] लिए यह कर्जा सफिशिएंट होता था। आज नहीं

[04:09:05] पहले की बात है। अब तो एक एक दो लाख गांव

[04:09:08] के लोगों को लगते हैं क्योंकि अब तो उतनी

[04:09:09] महंगाई आ गई है।

[04:09:12] तो इन लोगों तक इन चीजों को पहुंचाना बहुत

[04:09:15] ज्यादा जरूरी था। इसलिए हम लेकर आ गए

[04:09:18] माइक्रो फाइनेंस

[04:09:21] सेक्टर या माइक्रो फाइनेंस इंस्टीट्यूशन

[04:09:25] जो सबसे छोटे कर्जों की बात होती है। उनके

[04:09:29] लिए हम यह काम कर रहे हैं क्योंकि सबसे

[04:09:31] कमजोर वर्ग तक पहुंचना है। एक ऐसा क्षेत्र

[04:09:34] जहां छोटी बचत, छोटे ऋण, छोटे बीमा समाज

[04:09:38] के सबसे वंचित वर्ग के लिए उपलब्ध करवाए

[04:09:40] जाते हैं। सूक्ष्म वित्तीय क्षेत्र का

[04:09:42] हिस्सा माने जाते हैं जो देश में गरीबी को

[04:09:44] कम करने, महिला सशक्तिकरण, सामाजिक न्याय,

[04:09:48] वित्तीय समावेशन के कार्य को संपन्न करते

[04:09:50] हैं। माइक्रोफाइनेंस का मतलब होता है ₹

[04:09:53] लाख वार्षिक आय वाले परिवार को बिना किसी

[04:09:56] गारंटी से मिलने वाला ऋण विदाउट कोलटरल।

[04:10:01] यह पॉइंट डेफिनेशन याद रखना। यह पूछा जा

[04:10:03] सकता है। 1974 में अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर की

[04:10:07] महिलाओं को ऋण सुविधाएं प्रदान करने के

[04:10:10] लिए सबसे पहले श्री महिला सेवा सहकारी

[04:10:12] बैंक बनाया गया ताकि ऐसी मदद की जा सके।

[04:10:15] इसके एक लंबा इतिहास रहा है। 1984 में

[04:10:19] नाबार्ड ने गरीबी के उन्मूलन के लिए इस

[04:10:22] प्रकार के स्वयं सहायता ग्रह ग्रुप बनाना

[04:10:24] शुरू कर दिए। जहां 10 महिलाएं मिलकर एक

[04:10:26] छोटा उद्योग डालेगी। 10 महिलाओं को मिलकर

[04:10:29] कर्जा मिलेगा। 2002 में सेल्फ हेल्प ग्रुप

[04:10:32] को सुरक्षित ऋण देने के मानदंडों को अन्य

[04:10:35] सुरक्षित ऋणों के अनुरूप कर दिया गया।

[04:10:37] 2004 में आरबीआई के द्वारा सूक्ष्म वित्त

[04:10:40] को प्राथमिकता क्षेत्र में शामिल कर दिया

[04:10:42] गया। प्रायोरिटी सेक्टर में डाल दिया गया

[04:10:44] वित्तीय समावेशन के रूप में और 2010 में

[04:10:47] ऋणों की अनैतिक वसूली से संबंधित एक आंध्र

[04:10:50] संकट आया था जिसको कहा गया कि ये तो

[04:10:52] मारपीट करके इनसे पैसे ले रहे थे। तब इसको

[04:10:55] रोका गया कि ये गलत चीज है। 2012 में

[04:10:58] मालेगाम कमेटी ने रिकमेंडेशन दी और आरबीआई

[04:11:01] को नए नियम बनाने के लिए कहा। 2014 में

[04:11:04] बंधन बैंक को बैंकिंग लाइसेंस दिया गया जो

[04:11:07] एक जमाने में माइक्रोफाइनेंस सेक्टर में

[04:11:09] काम करता था। आरबीआई ने माइक्रोफाइनेंस

[04:11:12] नेटवर्क बनाया। एक रेगुलेटरी बॉडी बनाई।

[04:11:15] माइक्रोफाइनेंस रेगुलेटरी बॉडी एमएफआईए

[04:11:20] सरकार द्वारा छोटे व्यवसायों को वित्त

[04:11:22] पोषित करने के लिए स्मॉल फाइनेंस को

[04:11:25] प्रमोट करने के लिए मुद्रा बैंक की

[04:11:27] स्थापना की गई। तो सूक्ष्म वित्तीय ऋण

[04:11:30] नेताओं में याद रखिएगा प्राइमरी साख समिति

[04:11:32] या कमर्शियल बैंक सभी मदद करते हैं। बस हम

[04:11:35] बात करते हैं नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल

[04:11:37] कंपनी में माइक्रो फाइनेंशियल

[04:11:38] इंस्टीट्यूशन की। माइक्रो फाइनेंसियल

[04:11:41] इंस्टिट्यूशन मालेगा समिति के अनुसार ऐसी

[04:11:44] संस्थाएं जो कंपनी अधिनियम के तहत

[04:11:46] रजिस्टर्ड है। मिनिमम ₹ करोड़ का फंड लेकर

[04:11:51] बैठी है। एसएचजी या जॉइंट लायबिलिटी ग्रुप

[04:11:54] को लोन देगी। जॉइंट लायबिलिटी ग्रुप मतलब

[04:11:56] ऐसा ग्रुप होता है जिसमें ऋण तो एक ही

[04:11:59] व्यक्ति को मिलता है लेकिन जवाबदेहिता सभी

[04:12:01] की होती है।

[04:12:04] एसएचजी में सब लोग मिलकर एक काम धंधे पर

[04:12:07] लगते हैं। जॉइंट लायबिलिटी ग्रुप में 10

[04:12:09] लोग होते हैं। 10 लोग मिलकर लोन एक ही

[04:12:11] व्यक्ति को मिलता है। लेकिन जिम्मेदारी

[04:12:13] सबकी होती है। तो वो व्यक्ति उसको धोखा

[04:12:15] नहीं दे सकता। इसलिए फिर वो बैंकों को

[04:12:17] पैसा चुकाताता ही है। क्योंकि अगर उसको

[04:12:20] धोखा दे दिया तो वो गांव के लोग उसको

[04:12:21] पीटेंगे अच्छे से। इसलिए समय-समय पर ऐसी

[04:12:24] योजनाएं लाई जाती है जिससे चीजों को बेटर

[04:12:27] किया जा सके।

[04:12:30] माइक्रो फाइनेंस इंस्टीट्यूशन

[04:12:32] [गला साफ़ करने की आवाज़]

[04:12:34] एनबीएफसी कंपनी अधिनियम 1956 के तहत

[04:12:36] रजिस्टर्ड एक कंपनी है जिसका मुख्य

[04:12:38] व्यवसाय किसी योजना या व्यवस्था के तहत एक

[04:12:40] मुस्तों में योगदान के माध्यम से या किसी

[04:12:43] अन्य तरीके से जमा प्राप्त करना है।

[04:12:45] एनबीएफसी का प्रमुख कार्य उधार देना।

[04:12:47] विभिन्न प्रकार के शेयर, प्रतिभूति, बीमा,

[04:12:50] कारोबार, चिट फंड से जुड़ा हुआ वह काम

[04:12:52] करते हैं। वह चेक जारी नहीं करते हैं। वह

[04:12:54] कोई बैंक के जैसा काम नहीं करते। नॉन

[04:12:57] बैंकिंग कंपनियों के रूप में पैसों का

[04:12:59] लेनदेन करते हैं। आरबीआई के एक्ट के

[04:13:01] अकॉर्डिंग बिना आरबीआई से रजिस्टर्ड किए

[04:13:03] और बिना ₹10 करोड़ की शुद्ध स्वामित्व

[04:13:05] वाली निधि के एनबीएफसी के रूप में व्यवसाय

[04:13:07] नहीं कर सकते हैं। मतलब आपको रजिस्टर्ड

[04:13:10] करना ही पड़ेगा। कंपनी के कम से कम 1/3

[04:13:13] निदेशकों के पास फाइनेंशियल सेक्टर का

[04:13:15] अनुभव होना चाहिए। अगर एनबीएफसी है तो

[04:13:17] कंपनी को कुल संपत्ति सकल आय का 50% से

[04:13:20] ज्यादा पैसा इधर-उधर की गतिविधियों से

[04:13:23] कमाना चाहिए। जैसे कि शेयर मार्केट से

[04:13:25] कमाना चाहिए। सलाह देकर कमाना चाहिए।

[04:13:30] हमारे देश में एनबीएफसी का मतलब होता है

[04:13:33] जो बैंकिंग सुविधाएं तो दे सकती है लेकिन

[04:13:36] केवल कुछ ही जैसे लोन देने का काम जैसे

[04:13:38] मुथोट Finance याद रखिए, Bajaj Finance

[04:13:41] याद रखिए। हमारे देश में कई सारे ऐसी

[04:13:43] प्राइवेट कंपनियां है जो कर्जा देने का

[04:13:45] काम करती है। एनबीएफसी कर्जा देने का काम

[04:13:48] करती है। फिर आरबीआई उसको कंट्रोल क्यों

[04:13:51] कर रही है? वो तो पैसे जमा ही नहीं ले रही

[04:13:53] है। एनबीएफसी तो पैसे जमा कर लेती ही नहीं

[04:13:56] है। फिर आरबीआई इसको कंट्रोल क्यों कर रही

[04:13:58] है? जरूरी है क्योंकि एनबीएफसी अधिकतर

[04:14:02] एनबीएफसीियों ने कर्जे भारत के कमर्शियल

[04:14:05] बैंकों से लिए हैं। अगर एनबीएफसी के हालात

[04:14:08] खराब हो गए तो कमर्शियल बैंक के हालात

[04:14:09] खराब होंगे और कमर्शियल बैंकों के खुद के

[04:14:11] तो पैसे हैं नहीं। सब जनता ने जमा किए हुए

[04:14:14] हैं। तो एनबीएफसी को भी रेगुलेट करना

[04:14:16] पड़ता है आरबीआई को ताकि जनता का पैसा

[04:14:18] सुरक्षित रहे।

[04:14:21] यह चेक जारी नहीं कर सकते हैं। यह किसी

[04:14:24] प्रकार से जमाएं जनरली नहीं लेते हैं।

[04:14:26] डिमांड डिपॉजिट तो कभी भी नहीं ले सकते।

[04:14:28] बैंक सब ले सकती हैं।

[04:14:32] एनबीएफसी के लिए कोई रिजर्व

[04:14:34] [गला साफ़ करने की आवाज़] रेशो मेंटेन

[04:14:35] नहीं करना पड़ता है। डिपॉजिट इंश्योरेंस

[04:14:37] फैसिलिटी नहीं दे सकते हैं। क्रेडिट

[04:14:40] क्रिएशन के बारे में अगर हम बातचीत करें

[04:14:41] तो कई प्रकार की चीजें इनके पास सुविधाओं

[04:14:44] के रूप में नहीं होती है। एनबीएफसी होते

[04:14:46] हैं एसेट फाइनेंशियल कंपनी। एसेट

[04:14:49] फाइनेंशियल कंपनी एक एनबीएफसी है जिसका

[04:14:51] मुख्य व्यवसाय भौतिक संपत्तियों को वित्त

[04:14:53] पोषित करना है। जैसे कोई ट्रैक्टर खरीदना

[04:14:56] चाहता है, कोई कार खरीदना चाहता है, कोई

[04:14:59] ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में कुछ खरीदना चाहता

[04:15:01] है तो उनको वो लोन देते हैं। इनको कहते

[04:15:02] हैं एसेट फाइनेंसियल कंपनी जैसे Mahindra

[04:15:05] एंड Mahindra Finance सर्विस लिमिटेड बहुत

[04:15:08] सारी है। Bajaj Finance LED है, Reliance

[04:15:11] Capital है, श्रीराम कैपिटल है, इंडियन

[04:15:13] रेलवे Finance कॉरपोरेशन है, छोला है,

[04:15:16] Tata वाला मोटर Finance है, पीएफसी है,

[04:15:19] LNT Finance सर्विज है, मुथूट Finance है,

[04:15:22] Mahindra Finance है। ये सब ऑटोमोबाइल

[04:15:24] इंडस्ट्री में काम करते हैं। दूसरे होते

[04:15:26] हैं वेंचर कैपिटल। वेंचर कैपिटल निजी

[04:15:29] इक्विटी का एक रूप है। दीर्घकालिक विकास

[04:15:31] क्षमता वाले स्टार्टअप कंपनियों को छोटे

[04:15:33] व्यवसायों के लिए वित्त पोषण का काम करते

[04:15:36] हैं। वेंचर कैपिटल मतलब

[04:15:38] ऐसी कंपनियां जो नए-नए स्टार्टअप में

[04:15:41] इन्वेस्टमेंट करती है और उन कंपनियों को

[04:15:44] पैसा बड़े-बड़े उद्योगपति देते हैं कि चलो

[04:15:46] भाई इस पैसे को अच्छे से इन्वेस्टमेंट

[04:15:47] करके देखो कमाई करके ला सकते हो का एंजेल

[04:15:51] कैपिटल एjल कैपिटल मतलब कोई एक व्यक्ति

[04:15:54] किसी कंपनी को शुरू करने के लिए जो मदद

[04:15:57] करता है जैसे शार्क टैंक में जो लोग बैठते

[04:15:59] हैं वो अपने आप को एंजेल समझते हैं

[04:16:01] क्योंकि उसके तहत काम करते हैं। पर शार्क

[04:16:04] टैंक में वेंचर कैपिटल के तहत भी काम होता

[04:16:06] है। क्योंकि वह जो बैठे हुए शार्क टैंक

[04:16:08] में लोग हैं उनके पैसे किसी कंपनियों में

[04:16:10] लगे होते हैं। उन कंपनियों को निर्देश

[04:16:12] देते हैं कि यहां पैसा लगा। एंजल में वह

[04:16:14] व्यक्ति भगवान के स्वरूप उस कंपनी का

[04:16:17] जितना उद्धार करना उसके लिए आ जाता है।

[04:16:21] लोन कंपनियां कोई भी कंपनी जो एक वित्तीय

[04:16:23] संस्थान जो अपने प्रमुख व्यवसाय के रूप

[04:16:25] में लोन का लेनदेन करती है जैसे आदitya

[04:16:27] बिरला फाइनेंस Mahindra Finance ये सब लोन

[04:16:31] कंपनियां होती है। इंफ्रास्ट्रक्चर

[04:16:33] फाइनेंस कंपनियां अपनी कुल संपत्ति का कम

[04:16:36] से कम 75% इंफ्रास्ट्रक्चर में कर्जे देने

[04:16:39] में देती है। जैसे किसी सड़क निर्माण में

[04:16:42] वो इन्वेस्टमेंट करती है और फिर उसके जो

[04:16:44] टैक्स वसूला जाएगा उसमें अपना काम करती

[04:16:46] है।

[04:16:50] बहुत सारे हैं। इंडिया इंफ्रास्ट्रक्चर

[04:16:52] फाइनेंसियल कंपनी लिमिटेड

[04:16:55] एक गैर जमा स्वीकार करने वाली कंपनियां जो

[04:16:58] होती है एक प्रकार से हम कह सकते हैं

[04:17:01] नॉन डिपॉजिट टेकिंग एनबीएफसी इंगेज्ड इन द

[04:17:04] प्रिंसिपल बिज़नेस ऑफ फैक्टरिंग। फैक्टरिंग

[04:17:07] एक वित्तीय लेनदेन है जहा एक कंपनी चालान

[04:17:09] को किसी तीसरे पक्ष को छूट पर बेचती है।

[04:17:12] मतलब मान लीजिए कि एक मेडिकल वाला स्टोर

[04:17:15] है जिसने माल उठाया है या उसने एक प्रकार

[04:17:19] से कहीं से माल लाया है। लेकिन अभी उसके

[04:17:22] पास इमीडिएट पैसा नहीं है। तो वह ऐसी जगह

[04:17:25] पर उतना माल के लिए पैसा ले सकता है उधार।

[04:17:28] उसे फैक्टरिंग कंपनियां कहते हैं जो केवल

[04:17:30] मदद करती है कुछ छोटे-छोटे समय पीरियड के

[04:17:32] लिए।

[04:17:36] हाउसिंग फाइनेंस कंपनी जैसे नेशनल हाउसिंग

[04:17:38] बैंक एक एनबीएफसी है जो मकान खरीदने में

[04:17:41] लोन देती है। चिट फंड कंपनियां चिट फंड

[04:17:44] कंपनियां एक्चुअल में एक अच्छा कार्यक्रम

[04:17:46] है जिसमें क्या किया जाता है जैसे 10 लोग

[04:17:48] मिलकर चिट फंड चिट फंड मतलब कोई इनामी

[04:17:51] योजना नहीं होती है चिट फंड ऐसा होता है

[04:17:53] जैसे मान लीजिए मैं चिट फंड का मैनेजर हूं

[04:17:56] 10 लोगों से मैंने ₹10000 जमा किए 10

[04:18:00] लोगों से ₹10000 जमा किए कितना हो गया

[04:18:03] ₹10000 अगर 10 लोगों से जमा किए तो ₹10

[04:18:07] अब उसमें क्या करेंगे किसी एक का चिट निकल

[04:18:10] जाएगा जिसको उसको ₹8,000 दिए जाएंगे।

[04:18:14] कितने मिल गए उसको? ₹8,000 मिल गए। बच गए

[04:18:18] ₹2000। ₹2000 में ₹500 मैं लूंगा क्योंकि

[04:18:22] मैं मैनेजर हूं। इस सबको सिस्टम चला रहा

[04:18:24] हूं। और जो ₹1500 है वो ₹1500 10 लोगों को

[04:18:29] ₹150 के रूप में मैं लौटा दूंगा। अब उसका

[04:18:32] फायदा क्या होगा?

[04:18:34] उसका फायदा यह होगा कि ₹150 एक प्रकार से

[04:18:38] उनका ब्याज हो गया। इसमें वो पार्टी कर

[04:18:40] लेते हैं सब लोग। कभी-कभी खाना पीना खाने

[04:18:42] चले जाते हैं। ऐसा होता है और ₹8,000 मिल

[04:18:45] गए। फिर अब अगली बार दूसरी महीने में चिट

[04:18:47] निकलेगी। तो ऐसे 10 लोग 10 महीने की चिट

[04:18:50] निकालेंगे। जो व्यक्ति लास्ट में सबसे

[04:18:52] ज्यादा चिट निकालेगा सबसे लास्ट में तो आप

[04:18:54] देखेंगे कि ₹8000 के साथ-साथ उस व्यक्ति

[04:18:57] को ₹15-150 भी मिलते चले गए थे। तो उसको

[04:19:00] ज्यादा समय तक पैसा रखने के कारण ज्यादा

[04:19:03] पैसा मिलेगा। जिसको शुरुआत में मिल गया

[04:19:05] होगा उसके लिए एक प्रकार से अब पैसा खत्म

[04:19:08] होता जाता है कि भाई डेढ़-150000 तो उसको

[04:19:10] मिलेंगे लेकिन उसको कहीं ना कहीं डेढ़-150

[04:19:12] का वो बेनिफिट कम मिलने लग जाता है। चिट

[04:19:15] फंड कोई बुरी चीज नहीं थी। भाई गरीब लोग

[04:19:18] आपस में अगर जुट जाएंगे 100 लोग 10 लोग 20

[04:19:21] लोग तो एक दूसरे की मदद ही कर रहे होते

[04:19:23] हैं। इसमें एक मैनेजर होता है। चिट फंड

[04:19:26] में बदमाशियां होने लगी वो बात अलग है।

[04:19:28] हमारे देश में अगर कोई चिट फंड ₹100 करोड़

[04:19:31] से ज्यादा का है तो बगैर आरबीआई की अनुमति

[04:19:33] के या सेबी की अनुमति के वो चलाया नहीं जा

[04:19:36] सकता है। सेबी को पावर दे दी गई है। ₹100

[04:19:39] करोड़ से ज्यादा की कोई भी योजना होगी तो

[04:19:41] सेबी को अनुमति लेनी पड़ती है जो शेयर

[04:19:45] मार्केट देखती है। हमारे देश में चिट फंड

[04:19:47] का संचालन राज्य सरकारों के नियमों के तहत

[04:19:50] होता है। इसका माई-बाप राज्य सरकारें होती

[04:19:52] है। जो भी उन्होंने नियम बनाए होंगे।

[04:19:55] मॉर्गेज [गला साफ़ करने की आवाज़] गारंटी

[04:19:56] कंपनियां किसी वस्तु जैसे सोने के बदले

[04:19:59] में कर्जा देना, गाड़ी कार के बदले में

[04:20:01] कर्जा देना, घर के बदले में कर्जा देने

[04:20:04] वाले लोगों को बंधक गारंटी कंपनियां कहते

[04:20:06] हैं। मॉर्गेज गारंटी कंपनी कहते हैं। कौन

[04:20:10] है इनके नियामक? तो हमारे देश में जो भी

[04:20:13] आरबीआई के रजिस्टर्ड नॉन बैंकिंग

[04:20:15] फाइनेंशियल कंपनियां हैं जो कहीं ना कहीं

[04:20:18] आवास क्षेत्र में ऋण देती है। नेशनल

[04:20:20] हाउसिंग बैंक उनका माई बाप है। आरबीआई के

[04:20:23] साथ पंजीकृत जितने भी लोग हैं जो लोन देती

[04:20:26] है। मर्चेंट बैंक कंपनी, वेंचर कैपिटल फंड

[04:20:29] कंपनी, स्टॉक ब्रोकिंग ये सब सेबी के पास

[04:20:32] आ जाती है। निधि मंत कंपनियां, म्यूच्यूल

[04:20:35] बेनिफिट कंपनियां कॉर्पोरेट मिनिस्ट्री के

[04:20:37] अंतर्गत आ जाती है। चिट फंड कंपनियों का

[04:20:39] रेगुलेटरी बॉडी राज्य सरकार है। बीमा

[04:20:41] कंपनियों का इरेडा है और गैर बैंकिंग गैर

[04:20:45] वित्तीय कंपनियां सब की सब अपने

[04:20:47] मिनिस्ट्री कॉर्पोरेट मिनिस्ट्री के

[04:20:49] अंतर्गत आती है। अगर वो फाइनेंशियल से

[04:20:51] जुड़ी हुई नहीं है तो

[04:20:53] नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल के लिए भी चार

[04:20:56] टियर कंस्ट्रक्शन की बात हुई थी। कुछ नॉन

[04:20:58] बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां काफी बड़ी बन

[04:21:00] गई थी। तो उसके लिए 2021 में आरबीआई ने एक

[04:21:03] सुधार की बातचीत कही थी ताकि उनमें सभी पर

[04:21:06] कंट्रोल ना किया जाए। जो बड़ी एनबीएफसी है

[04:21:08] उन पर कंट्रोल किया जाए।

[04:21:12] 2018-19 में आईएलएनएफसी ने उच्च रिस्क

[04:21:15] वाले निवेश किए जिससे अव्यवस्थित और

[04:21:17] असुरक्षित परियोजनाओं में पूंजी लगा दी।

[04:21:20] यह वो कंपनी है। इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग

[04:21:22] एंड फाइनेंशियल सर्विस जैसी बड़ी एनबीएफसी

[04:21:25] संकट में आ गई थी। तो इतनी बड़ी कंपनी जब

[04:21:27] संकट में आएगी तो बड़े बैंकों का कर्जा

[04:21:29] लेकर बैठी है। ये पूरा बैंक संकट में आ

[04:21:32] जाएगा। पता चल रहा है कि बैंक ही डूब गया।

[04:21:34] तो इस एनबीएफसी के खराब हो जाने के बाद

[04:21:37] आरबीआई ने कहा कि चलो अब इनको भी कंट्रोल

[04:21:40] करना पड़ेगा। तो उन्होंने कुछ नए दिशा

[04:21:41] निर्देश दिए। जब निवेशक ने अपनी रकम वापसी

[04:21:44] मांगना शुरू की तो बैंकों ने इसे वित्तीय

[04:21:46] संकट के रूप में देखा तो यह तरलता संकट और

[04:21:49] गहरा गया। इस संदर्भ में आरबीआई द्वारा

[04:21:51] गठित उषा थरोट कमेटी के रिकमेंडेशन के

[04:21:53] आधार पर एनबीएफसी के विनियमन के लिए चार

[04:21:56] टियर स्ट्रक्चर को अपनाया गया। 30 दिनों

[04:21:58] के लिए लिक्विडिटी अनुपात लागू किया गया।

[04:22:01] ₹1000 करोड़ या उससे अधिक की परिसंपत्ति

[04:22:03] वाली एनबीएफसी का वार्षिक आधार पर

[04:22:05] निरीक्षण भी किया गया। तो चार टियर में

[04:22:08] ऐसी एनबीएफसी जिनके पास बहुत पैसा कम होता

[04:22:10] है ठीक-ठाक काम कर रही होती है। मतलब

[04:22:13] ₹1000 करोड़ से कम का लेनदेन होता है

[04:22:15] उनमें उतना कंट्रोल नहीं रखा गया। ऐसी टॉप

[04:22:18] लेवल की एनबीएफसी जो बहुत बड़ी हो चुकी है

[04:22:21] उस पर पूरी तरह से आरबीआई का कंट्रोल कर

[04:22:23] दिया गया।

[04:22:25] चार ट बेस लेयर, मिडिल लेयर, अपर लेयर और

[04:22:28] टॉप लेयर की नॉन बैंकिंग फाइनेंशियल

[04:22:30] कंपनियां बना दी गई।

[04:22:34] भारत में नेशनलाइजेशन का इतिहास देख

[04:22:37] लीजिए। थोड़ा सा टाइम एक्सटेंड करेंगे हम

[04:22:41] 12:00 बजे 12:30 तक। लेकिन आप बिल्कुल

[04:22:44] सिंसियर रहिएगा। यह सेक्टर बहुत

[04:22:47] इंपॉर्टेंट है जहां से सवाल आते ही हैं

[04:22:49] प्रीलिम्स में। बैंकों का राष्ट्रीयकरण

[04:22:51] मतलब निजी बैंकों का नियंत्रण और

[04:22:54] स्वामित्व सरकार के हाथों में ट्रांसफर

[04:22:56] करना। सबसे पहले 1969 में 20 बैंकों का

[04:22:59] नेशनलाइजेशन हुआ जिनकी प्रॉपर्टी 50 करोड़

[04:23:02] की थी।

[04:23:03] [खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़]

[04:23:04] जो 14 बैंक शुरुआत में किए गए। फिर बाद

[04:23:06] में पांच छह बैंक और जोड़े गए जिनकी

[04:23:09] प्रॉपर्टी 200 करोड़। मतलब कुल छह बैंकों

[04:23:11] का नेशनलाइजेशन अभी तक हो चुका है। 1969

[04:23:15] से लेकर सबसे पहला राष्ट्रीयकरण वैसे तो 1

[04:23:18] जनवरी 1949 को आरबीआई का हुआ। सेकंड

[04:23:21] नेशनलाइजेशन एसबीआई का हुआ। 1969 में 14

[04:23:25] बैंकों का 1980 में छह बैंकों का

[04:23:27] नेशनलाइजेशन हुआ।

[04:23:30] बैंकों की कार्यप्रणाली को बेटर करने के

[04:23:32] लिए क्योंकि बैंक लंबे समय तक मध्यम वर्ग

[04:23:35] से दूर रही तो उसको सुधारने के लिए 1991

[04:23:37] में नरसिमम कमेटी बनाई गई थी। नरसिमम

[04:23:40] कमेटी ने पब्लिक सेक्टर की बैंक और नॉन

[04:23:43] परफॉर्मिंग एसेट ऐसे लोन जो वसूले नहीं

[04:23:46] जाते उनको सुधारने के लिए कई रिकमेंडेशन

[04:23:48] दी। फिर 1997 में नरसिमम कमेटी सेकंड बनाई

[04:23:53] गई। ये आरबीआई के गवर्नर रह चुके हैं बहुत

[04:23:55] जानेमाने। रुपए की परिवर्तन परिवर्तनीयता

[04:23:58] मतलब अब हमारा देश का मार्केट ओपन हो गया

[04:24:01] था। आराम से हमारे देश में इन्वेस्टमेंट

[04:24:03] होने लग गए थे विदेशों से। तो क्या रुपए

[04:24:06] को डॉलर में बदलना डॉलर को रुपए में बदलना

[04:24:09] कितनी भी फ्रीडम दे दी जाए? ऐसा कर दिया

[04:24:12] जाए कि कोई व्यक्ति कितना भी डॉलर खरीद

[04:24:14] सके और कितना भी रुपया हमारे देश में खरीद

[04:24:16] पर खरीद सके तो इसकी अनुमति दी जाए। तो

[04:24:19] हमारे देश में इसके लिए नरसिमम कमिटी

[04:24:21] सेकंड ने रिकमेंडेशन दी थी। उन्होंने कहा

[04:24:23] था कि एफडीआई सब जगह मत लेकर आइए लेकिन जो

[04:24:26] एक्सपोर्ट इंपोर्ट कर रहे हैं उसमें

[04:24:28] अनुमति दे दीजिए जितना करना हो। तो इसे हम

[04:24:31] कहते हैं पार्शियल रुपए की कन्वर्टिबिलिटी

[04:24:33] का अनुमति दिया गया। ब्रॉड बैंकिंग का

[04:24:36] कांसेप्ट इन्होंने डाला था कि बड़े-बड़े

[04:24:37] बैंकों को जोड़कर बड़े बैंक बना दीजिए।

[04:24:40] उन्हीं के रिकमेंडेशन से बैंकों को बना

[04:24:42] जोड़ा गया था 2020 में। तो 1997 में

[04:24:45] नरसिमम कमेटी ने कई रिकमेंडेशन दिए थे।

[04:24:49] पर 2014-15 के बाद से नए रिफॉर्म की

[04:24:52] बातचीत की जा रही है जिसको कहा जा रहा है

[04:24:54] सेकंड जनरेशन रिफॉर्म। सबसे पहले तो

[04:24:57] डीरेगुलेशन बैंकों को फ्रीडम ज्यादा

[04:24:59] दीजिए। डिफरेंशिएशन बैंकों का विभेदीकरण

[04:25:02] करिए। डायवर्सिफिकेशन बैंक के कई जगह बेटर

[04:25:06] काम कर सके और बैंकों में कहीं ना कहीं

[04:25:08] विघटन का मतलब होता है जो भी उनकी

[04:25:11] प्रॉब्लम्स है उसको डिॉल्व करवा दीजिए।

[04:25:14] पीजे नायक कमेटी 2014 में बनाई गई थी।

[04:25:17] सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बोर्ड का

[04:25:19] शासन करने के लिए मैं बता दे रहा हूं

[04:25:21] आपको। एक्चुअल में हमारे देश में जो

[04:25:23] एसबीआई है, पंजाब नेशनल बैंक है, बैंक ऑफ

[04:25:27] इंडिया है, बैंक ऑफ बड़ौदा है। मुझे एक

[04:25:30] बात बताओ इसका मालिक कौन है भाई? सरकार।

[04:25:34] तो ये बेचारे बड़े त्रस्त हैं। एक तरफ इन

[04:25:37] पर सरकार का नियंत्रण होता है। दूसरी तरफ

[04:25:40] आरबीआई सुनने को तैयार नहीं है। आरबीआई का

[04:25:43] नियंत्रण होता है। तो यह बहुत ज्यादा

[04:25:45] टेंशन में इस कारण से बढ़िया काम नहीं कर

[04:25:47] पाते थे। तो पीजे नायक कमेटी बनाई गई कि

[04:25:50] पब्लिक सेक्टर के बैंक में जो बोर्ड होते

[04:25:53] हैं बोर्ड उनका गठन कैसे किया जाए और जो

[04:25:56] बोर्ड है उन पर कंट्रोल किसका रहेगा?

[04:25:59] समिति के सुझाव के आधार पर मिशन इंद्रधनुष

[04:26:02] लागू किया गया। मिशन इंद्रधनुष लाया गया

[04:26:05] था पब्लिक सेक्टर बैंकों को बेटर करने के

[04:26:07] लिए। मिशन इंद्रधनुष के तहत सार्वजनिक

[04:26:10] क्षेत्र के बैंकों की हेल्थ को बेटर करने

[04:26:12] के लिए सात उपाय अपनाए गए। मिशन इंद्रधनुष

[04:26:16] 2.0 के तहत सात प्रावधान अंग्रेजी के

[04:26:18] अक्षर ए से शुरू होकर जी पर खत्म होते

[04:26:21] हैं। इसलिए ए टू जी ऑफ बैंकिंग सेक्टर

[04:26:24] रिफॉर्म भी इसको कहा जाता है मिशन

[04:26:26] इंद्रधनुष को। सबसे पहले तो जो भी पब्लिक

[04:26:30] सेक्टर के बैंक में निर्देशक होगा उसका

[04:26:33] अपॉइंटमेंट में सरकार का हस्तक्षेप नहीं

[04:26:35] होना चाहिए। उसका अपॉइंटमेंट कौन करेगा?

[04:26:38] बैंक बोर्ड ब्यूरो करेगा। कैपिटलाइजेशन वे

[04:26:42] चाहे तो अपने शेयर बेचकर मार्केट से पैसा

[04:26:44] उठा सकते हैं। उन्हें तनाव मुक्त करना,

[04:26:47] डिस्ट्रेसिंग, उनका सशक्तिकरण करना,

[04:26:50] एंपावरमेंट, उनके अंदर उत्तरदायित्व की

[04:26:53] भावना लाना और प्रशासनिक सुधार करना। तो ए

[04:26:56] बी सी डी अपॉइंटमेंट, बैंक बोर्ड ब्यूरो

[04:26:58] कैपिटलाइजेशन, डिस्ट्रेसिंग, एंपावरमेंट,

[04:27:01] फ्रेमवर्क ऑफ अकाउंटेबिलिटी और गवर्नमेंट

[04:27:03] गवर्नेंस रिफॉर्म यह पब्लिक सेक्टर के

[04:27:06] बैंकों के लिए पीजे नायक कमेटी बनाई गई

[04:27:09] थी। जिसने मिशन इंद्रधनुष के तहत इन

[04:27:11] सुधारों पर काम करने के रिकमेंडेशन दिए।

[04:27:14] नियुक्ति का मतलब था कि सार्वजनिक क्षेत्र

[04:27:16] के बैंकों का नेतृत्व अध्यक्ष और प्रबंध

[04:27:18] निदेशक के पास होगा। अध्यक्ष और प्रबंधक

[04:27:22] दोनों अधिकारी एक ही व्यक्ति के पास

[04:27:24] नियुक्ति संबंधी सुधार के तहत तय किया गया

[04:27:26] कि अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक पद को दो

[04:27:28] हिस्सों में बांटा जाए। अध्यक्ष का काम

[04:27:31] अलग रहेगा। प्रबंध निदेशक का काम अलग

[04:27:33] रहेगा। चेयरमैन अलग रहेगा, मैनेजिंग

[04:27:35] डायरेक्टर अलग रहेगा। इसके अलावा तीसरा पद

[04:27:38] भी बनाया गया। नॉन गैर कार्यकारी अध्यक्ष

[04:27:41] जिसका नाम रख काम था कि नॉन एग्जीक्यूटिव

[04:27:44] चेयरमैन जो जनता के द्वारा जनता ने जितना

[04:27:47] भी आपका शेयर खरीद के रखा है उसके लिए वो

[04:27:49] काम करेगा। इन पदों पर नियुक्तियां उन

[04:27:52] बैंक से बाहर की भी की जा सकती है।

[04:27:55] बैंक बोर्ड ब्यूरो बनाया गया था जिससे कहा

[04:27:58] गया था कि यह उच्च पदों पर सभी

[04:28:00] नियुक्तियों के लिए सजेशन देगा कि किस

[04:28:02] व्यक्ति को डायरेक्टर बनाएं। किस व्यक्ति

[04:28:04] को चेयरमैन बनाएं। पूंजी जुटाने के लिए वह

[04:28:07] अपने शेयर को बेच सकते थे। एनपीए की

[04:28:10] प्रॉब्लम को सुधारने के लिए जो कर्जे वो

[04:28:12] वसूल नहीं कर पाए उसके लिए कुछ उपाय करने

[04:28:14] की बातचीत हुई थी। बैड बैंक की कल्पना की

[04:28:17] गई थी। फिर इसके अलावा पैरा बैंकिंग

[04:28:20] सुविधाओं की बातचीत हुई थी कि वह एटीएम के

[04:28:22] लिए मर्चेंट बैंकिंग के लिए फैक्टरिंग

[04:28:24] करने के लिए जो मैंने बताए नॉन बैंकिंग

[04:28:27] में भी मदद कर सकते हैं। पैरा बैंकिंग से

[04:28:29] तात्पर्य उन वित्तीय सेवाओं से है जो बैंक

[04:28:31] अपनी नियमित बैंक के गतिविधियों के अलावा

[04:28:33] करते हैं। बीमा बेचना पेंशन फंड जैसे

[04:28:36] ICICI इंश्योरेंस भी बेचता है। HDFC

[04:28:39] इंश्योरेंस भी बेचता है। म्यूच्यूल फंड भी

[04:28:41] बेचता है। इनके भी काम करने की अनुमति

[04:28:43] मिलती है। इनको कहते हैं पैरा बैंकिंग

[04:28:45] सर्विज। ये पूछा जा सकता है पैरा बैंकिंग

[04:28:47] सर्विज का मतलब फिर उनको सशक्तिकरण करना

[04:28:51] उनके अंदर रिस्पांसिबिलिटी लाना और

[04:28:52] प्रशासनिक सुधार को प्रेरित करना भारत

[04:28:55] सरकार के द्वारा 2016 में बैंक बोर्ड

[04:28:57] ब्यूरो बनाया गया था पीजीआई कमेटी की

[04:28:59] रिकमेंडेशन पर और यह हमारे देश में पब्लिक

[04:29:02] सेक्टर में ज्यादा से ज्यादा संस्थाओं में

[04:29:05] निदेशक डायरेक्टर सबकी नियुक्ति करता था

[04:29:09] पर उसको फिर खत्म कर दिया गया क्योंकि वो

[04:29:11] टेंपरेरी बनाया गया था फाइनेंशियल सर्विस

[04:29:14] इंस्टीट्यूशन ब्यूरो ब्यूरो 1 जनवरी 2022

[04:29:16] को वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग

[04:29:19] के अंतर्गत बनाया गया। सरकार के स्वामित्व

[04:29:21] वाले जितने भी सरकारी संस्थान हैं उन सभी

[04:29:24] के बड़े पदों की नियुक्ति अब कौन करेगा?

[04:29:27] फाइनेंशियल

[04:29:29] सर्विसेस इंस्टीट्यूशनल ब्यूरो। हमारे देश

[04:29:32] में जितने भी बड़े सरकारी बैंक हैं

[04:29:36] एसबीआई, बैंक ऑफ बड़ौदा, पंजाब नेशनल बैंक

[04:29:40] या बैंक ऑफ इंडिया इनके डायरेक्टर कौन

[04:29:43] रहेंगे? इनका अध्यक्ष कौन रहेगा? इन सबका

[04:29:45] कंट्रोल इन्हीं के पास रहता है। केंद्र

[04:29:48] सरकार के द्वारा नामित एक इसमें अध्यक्ष

[04:29:50] होता है। वित्त सेवा विभाग का सेक्रेटरी

[04:29:53] रहता है। फाइनेंशियल सर्विस का इरडाई का

[04:29:55] अध्यक्ष रहेगा। डिप्टी गवर्नर रहेगा।

[04:29:57] आरबीआई का बैंकिंग क्षेत्र के तीन

[04:29:59] विशेषज्ञ रहेंगे और तीन बीमा क्षेत्र के

[04:30:02] विशेषज्ञ रहेंगे।

[04:30:06] और यह किसकी जगह पर लाया गया है? बैंक

[04:30:09] बोर्ड ब्यूरो की जगह पर। पहले बैंक बोर्ड

[04:30:11] ब्यूरो यही काम करते थे। अब यह परमानेंट

[04:30:13] संस्था बन गई है जो पब्लिक सेक्टर के

[04:30:16] बैंकों में बड़े पदों का निर्णय लेगी कि

[04:30:18] किसको अध्यक्ष बनाना है। याद रखिएगा कि

[04:30:22] पहले ये निर्णय लिया जाता था प्रधानमंत्री

[04:30:24] कार्यालय से लेकिन अब यह तय करेंगे ताकि

[04:30:26] ज्यादा विशेषज्ञता योग्य लोग आ सके। फिर

[04:30:30] बात कर लेते हैं नॉन परफॉर्मिंग एसेट। नॉन

[04:30:33] परफॉर्मिंग एसेट जिसको एनपीए कहा जाता है।

[04:30:36] जब कोई भी व्यक्ति अपने कर्जे का ब्याज या

[04:30:40] मूलधन 90 दिन तक नहीं दे पाता है तो

[04:30:44] धीरे-धीरे वह एनपीए में कन्वर्ट होने लग

[04:30:46] जाता है। आइए देखते हैं ये पूरा एनपीए का

[04:30:50] कांसेप्ट क्या है? एनपीए की पूरी की पूरी

[04:30:53] कंडीशन क्या है? उस पर भी चर्चाएं करने लग

[04:30:56] जाते हैं।

[04:31:00] नॉन परफॉर्मिंग एसेट अगर कोई लोन जिसका

[04:31:03] ब्याज भी ना दिया गया हो पिछले 90 दिनों

[04:31:05] तक तो उसको एनपीए कहते हैं। एनपीए उन ऋण

[04:31:08] को संदर्भित करता है जिसका मूलधन या ब्याज

[04:31:10] भुगतान 90 दिनों की अवधि से बकाया है।

[04:31:13] ब्याज भुगतान की अवधि के आधार पर एनपीए को

[04:31:16] निम्नलिखित तीन श्रेणियों में बांटते हैं।

[04:31:18] सबसे पहला होता है सब स्टैंडर्ड एसेट। फिर

[04:31:21] होता है डाउटफुल एसेट। अगर फिर भी पैसा ना

[04:31:23] मिल पाए तो लॉस एसेट

[04:31:26] स्पेशल मेंशन अकाउंट बैंक द्वारा उन खातों

[04:31:29] को पहचानने के लिए उपयोग किया जाने वाला

[04:31:31] वर्गीकरण जिसका एनपीए बनने का रिस्क होता

[04:31:34] है। अगर मान लीजिए कि 30 दिन या लगभग उसके

[04:31:38] आसपास पैसा तो इसको कहते हैं कि स्पेशल

[04:31:40] मेंशन अकाउंट नहीं रखा जाएगा उसे या रखा

[04:31:43] जाएगा। स्पेशल मेंशन अकाउंट जीरो 30 दिन

[04:31:46] की देरी हो जाए। अगर 31 से 60 दिन की देरी

[04:31:49] हो जाए तो स्पेशल मेंशन अकाउंट वन में रखा

[04:31:52] जाता है। 61 से 90 दिन की देरी हो जाए तो

[04:31:55] स्पेशल मेंशन अकाउंट टू में रखा जाता है।

[04:31:58] सब स्टैंडर्ड एसेट ऐसी परिसंपत्तियां

[04:32:00] जिन्हें 12 महीने या उससे कम अवधि के लिए

[04:32:03] एनपीए के रूप में वर्गीकृत किया गया। मतलब

[04:32:06] सबसे पहले तो एनपीए बन गया था 90 दिन में।

[04:32:09] [गला साफ़ करने की आवाज़]

[04:32:09] फिर भी अगर उसके बाद भी 12 महीने तक वो

[04:32:12] पैसा वसूल नहीं कर पाया तो सब स्टैंडर्ड

[04:32:15] एसेट में चला जाएगा। ऐसी परिसंपत्तियां

[04:32:18] जिन्हें 12 महीने से ज्यादा हो जाए ऐसी सब

[04:32:22] स्टैंडर्ड एसेट को डाउटफुल एसेट कहते हैं।

[04:32:25] मतलब अब एनपीए 12 महीने से ज्यादा का हो

[04:32:27] गया। तो ज्यादा हो गया मतलब अब वो डाउटफुल

[04:32:30] एसेट में आ गया है। और अगर ऐसी संपत्तियां

[04:32:33] जिनकी वसूली की अब बहुत कोई उम्मीद नहीं

[04:32:35] बची है। बहुत टाइम हो गया। कर्जा भी नहीं

[04:32:38] आया ना मूल ब्याज आया तो हम समझ जाते कि

[04:32:41] यह लॉस एसेट हो गया।

[04:32:43] तो स्टैंडर्ड एसेट जहां पर कहीं ना कहीं

[04:32:46] ब्याज और समय-समय पर सब भुगतान होता है या

[04:32:50] कभी-कभी एक से 90 दिन का डिले भी हो जाता

[04:32:52] है उसे स्ट्रेस कहते हैं। स्पेशल मेंशन

[04:32:55] अकाउंट स्पेशल मेंशन अकाउंट मैंने आपको जो

[04:32:57] बताया पर जो नॉन परफॉर्मिंग एसेट होते हैं

[04:33:00] जहां 90 दिन से ज्यादा की देरी हो चुकी

[04:33:02] है। अगर वो एनपीए 12 महीने तक रख गया।

[04:33:06] मतलब मान लीजिए जिस दिन वो एनपीए डिक्लेअ

[04:33:08] हुआ था उसके बाद 12 महीने तक एनपीए रहा तो

[04:33:11] पहले उसको सब स्टैंडर्ड के रूप में

[04:33:13] कैटेगराइज करते हैं। 12 महीने से ज्यादा

[04:33:15] हो गया तो उसको कहते हैं डाउटफुल एसेट और

[04:33:17] अब उसकी रिकवरी नहीं हो सकती तो हम कहते

[04:33:20] हैं कि गया वो पैसा वापस नहीं आ सकता है।

[04:33:23] एनपीए के समाधान के लिए बैड बैंक की

[04:33:26] कल्पना की जाती है। एनपीए के समाधान के

[04:33:28] लिए बैंकों के विलय की बात करते हैं।

[04:33:30] बैंकों का निजीकरण की बात करते हैं। मतलब

[04:33:33] प्राइवेटाइजेशन करने की बातचीत की जाती

[04:33:35] है। बैंकों के मर्ज करने की बातचीत की

[04:33:38] जाती है। सब उपाय है। बैड बैंक एक आर्थिक

[04:33:41] अवधारणा है जिसके अंतर्गत आर्थिक संकट के

[04:33:43] समय घाटे में चल रहे बैंकों द्वारा अपनी

[04:33:45] देता एक नए बैंक को ट्रांसफर कर दी जाती

[04:33:47] है। बैड बैंक कर्ज में फंसे बैंकों की

[04:33:50] राशि को एक निश्चित समय के लिए खरीद लेता

[04:33:52] है और बैंक की देता को एक निश्चित समय तक

[04:33:54] धारण करता है। मतलब एक निश्चित समय के बाद

[04:33:57] वह बैंकों का वसूल करके उसे लौटाते चलता

[04:33:59] है। किसी भी देश में बैड बैंक 10 से 15

[04:34:02] साल के लिए बनते हैं। निरंतर नहीं काम

[04:34:04] करते ये। बैड बैंक हमारे देश में भी दबाव

[04:34:08] चल रहा था लेकिन नहीं बनाया गया। बैड बैंक

[04:34:10] की अवधारणा सबसे पहले 1988 में अमेरिका के

[04:34:13] मेलोन नामक बैंक के संदर्भ में प्रस्तुत

[04:34:15] की गई थी। जिसने आर्थिक घाटे से उठने के

[04:34:18] लिए ऐसा कदम उठाया था। भारत में बैड बैंक

[04:34:21] के बारे में 2017 में पहले चर्चाएं शुरू

[04:34:23] हुई थी। पर 2018 में फाइनली तय किया गया

[04:34:26] कि नहीं बैड बैंक नहीं बनाना है हमारे देश

[04:34:28] में। हमारे देश में एक कानून है सारफेसी

[04:34:31] एक्ट जिसके तहत कर्जों को वसूल करने के

[04:34:34] अधिकार दिए जाते हैं बैंकों को ताकि वह

[04:34:36] संपत्ति को उठा सकती है। सारफेसी एक्ट के

[04:34:40] तहत बिना न्यायालय हस्तक्षेप के अगर किसी

[04:34:43] बैंक का पैसा आपने टाइम पर नहीं चुकाया तो

[04:34:46] वह बैंक आपकी प्रॉपर्टी ज्त कर सकता है।

[04:34:49] किसान का खेत जप्त करने की अनुमति नहीं है

[04:34:52] सारफेसी एक्ट में। उसके लिए न्यायालय ही

[04:34:54] जाना पड़ेगा। क्या सरकार निजी बैंक के

[04:34:57] संदर्भ में गठित बैड बैंक में निवेश कर

[04:34:59] सकती है? सरकार बैड बैंक बनाने में मदद कर

[04:35:01] सकती है।

[04:35:03] बैंकों का विलय जब दो बड़े-बड़े बैंक आपस

[04:35:06] में जुड़ेंगे तो उनके पास ज्यादा पूंजी

[04:35:08] आएगी। ज्यादा पूंजी आएगी तो जो थोड़ा बहुत

[04:35:11] नुकसान हुआ है उसकी भरपाई बेटर तरीके से

[04:35:13] हो सकती है। ऐसा माना जाता है।

[04:35:16] बैंकों के विलय संबंधी याद रखना हमारे देश

[04:35:19] में बैंकों के विलय के लिए बहुत से कदम

[04:35:21] उठाने पड़ते हैं। सबसे पहले तो हमारे देश

[04:35:23] का जो बैंकिंग अधिनियम है उसकी अनुमति

[04:35:26] लेनी पड़ती है। बैंकों के विलय हेतु सभी

[04:35:29] पक्षों के कम से कम 2/3 शेयर होल्डर की

[04:35:31] अनुमति चाहिए। जितने भी लोगों के पास शेयर

[04:35:34] हैं उनमें से 2/3 लोगों ने अनुमति देनी

[04:35:36] चाहिए और सबसे ज्यादा जरूरी है कंपटीशन

[04:35:39] कमीशन ऑफ इंडिया इसकी भी अनुमति लेनी

[04:35:42] पड़ती है।

[04:35:46] मतलब पहले इसकी अनुमति लेनी नहीं पड़ती थी

[04:35:48] लेकिन अब लेनी पड़ती है। मतलब अब इसको भी

[04:35:50] चेंज कर दिया गया है कि विलय की सिफारिश

[04:35:52] के लिए जरूरी है।

[04:35:56] भारत में सार्वजनिक बैंकों का विलय सबसे

[04:35:58] पहले 199394

[04:36:00] में पंजाब नेशनल बैंक और न्यू इंडिया बैंक

[04:36:03] का विलय हुआ।

[04:36:06] ये देश का पहला विलय था। 2004 में ओरिएंटल

[04:36:09] बैंक ऑफ कॉमर्स और ग्लोबल ट्रस्ट बैंक का

[04:36:12] विलय हो गया। 2008 में स्टेट बैंक ऑफ

[04:36:15] सौराष्ट्र और 2010 में स्टेट बैंक ऑफ

[04:36:17] इंदौर का विलय हो गया। 2010 में

[04:36:23] 2017 में कई सारे जितने एसबीआई के सहयोगी

[04:36:26] थे सबका विलय हुआ। 2018 में विजय बैंक

[04:36:29] देना बैंक बैंक ऑफ बड़ौदा में मिल गए।

[04:36:32] ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स यूनाइटेड बैंक ऑफ

[04:36:34] इंडिया का पंजाब नेशनल बैंक में विलय हो

[04:36:36] गया। सिंडिकेट बैंक का बैंक में विलय हुआ।

[04:36:39] आंध्रा बैंक का कॉरपोरेशन बैंक का यूनियन

[04:36:42] बैंक में विलय हुआ। आंध्रा बैंक और

[04:36:44] कॉरपोरेशन बैंक का यूनियन बैंक में विलय

[04:36:46] हुआ। इलाहाबाद बैंक का इंडियन बैंक में

[04:36:48] विलय कर दिया गया क्योंकि हम चाहते हैं

[04:36:51] बड़े बैंक बने। बैंकों के प्राइवेटाइजेशन

[04:36:54] नेशनलाइजेशन का उल्टा होता है जिसमें

[04:36:57] सरकार अपनी हिस्सेदारी को बेचने लग जाती

[04:36:59] है ताकि ज्यादा से ज्यादा बैंकों की

[04:37:02] एफिशिएंसी को बेटर किया जा सके। तो जब आप

[04:37:04] प्राइवेट हाथों में अपनी हिस्सेदारी देते

[04:37:06] हैं तो उसको प्राइवेटाइजेशन कहते हैं।

[04:37:09] डिसन्वेस्टमेंट में केवल सार्वजनिक

[04:37:11] क्षेत्र की कंपनी में हिस्सेदारी कम कम

[04:37:13] होती है। जबकि प्राइवेटाइजेशन में कंपनी

[04:37:15] को पूरी तरह निजी क्षेत्र को सौंपा जाता

[04:37:17] है। ध्यान से सुनना। अगर सरकार अपने शेयर

[04:37:22] प्राइवेट लोगों को बेचे लेकिन पूरी तरह से

[04:37:25] कंट्रोल अपने हाथ में ही रखे तो इसको कहते

[04:37:28] हैं डिसइन्वेस्टमेंट विनिवेश।

[04:37:31] लेकिन सरकार यदि कंपनी के शेयर भी बेचे

[04:37:34] अपनी कंपनी सरकारी कंपनी के शेयर भी बेचे

[04:37:37] और मैनेजमेंट भी उनको देने लग जाए तो इसको

[04:37:40] कहते हैं प्राइवेटाइजेशन जैसे एयर इंडिया

[04:37:43] का प्राइवेटाइजेशन हो गया जैसे आईडीबीआई

[04:37:46] का प्राइवेटाइजेशन हो गया पर अगर सरकार

[04:37:49] डिसन्वेस्टमेंट करेगी जैसे मान लीजिए कोई

[04:37:52] रेलवे स्टेशन सरकार ने 10 साल के लिए किसी

[04:37:54] को दिया लेकिन उसका मालिकाना हक अभी भी

[04:37:57] अपने पास रखा हुआ है तो उसको कहते हैं

[04:37:59] डिसइन्वेस्टमेंट

[04:38:00] डिस इस इन्वेस्टमेंट में सरकार बेचती नहीं

[04:38:03] है बल्कि कुछ समय के लिए या कुछ हिस्सा

[04:38:05] किसी को देती है लेकिन सब कुछ कंट्रोल

[04:38:07] अपने पास रखती है।

[04:38:12] इसके अलावा हमारे देश में फिर प्र्प

[04:38:14] करेक्टिव एक्शन फ्रेमवर्क आया। कमजोर बैंक

[04:38:17] की आरबीआई की निगरानी सूची को संदर्भित

[04:38:19] करता है। जब किसी बैंक के पास रिस्क का

[04:38:21] सामना कम कर करने के लिए पर्याप्त पूंजी

[04:38:23] नहीं होती है तो आरबीआई उसे इस इस लिस्ट

[04:38:26] में डाल देता है और उसे उम्मीद की जाती है

[04:38:29] कि कुछ समय के लिए उस बैंक की कुछ बैंकिंग

[04:38:30] गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है।

[04:38:32] जैसे पेमेंट बैंक पर काम किया गया था।

[04:38:36] जॉइंट लीडर फोरम इट वाज़ डिज़ टू प्रिवेंट द

[04:38:39] यूज़ ऑफ लोन फ्रॉम वन बैंक टू रिपे लोन टेक

[04:38:42] टेकन फ्रॉम अदर बैंक। इसमें एक बैंक से

[04:38:44] लिए गए ऋण का उपयोग अन्य बैंकों से लिए गए

[04:38:46] ऋण को चुकाने के लिए डिजाइन किया गया था।

[04:38:49] तो इसे बंद करवाया गया कि भाई यह नहीं

[04:38:51] चलेगा। रणनीतिक ऋण पुनर्गठन इसके तहत जिन

[04:38:54] कॉरपोरेट ने बैंकों से ऋण लिया है वह उस

[04:38:57] ऋण को चुकाने में असमर्थ है तो बैंक आंशिक

[04:39:00] या पूर्ण ऋण को इक्विटी शेयर में बदल सकता

[04:39:02] है। मतलब उस कंपनी को अपने कब्जे में ले

[04:39:04] लेगा। परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा इसमें

[04:39:07] उन परिसंपत्तियों की जांच की जाती है जो

[04:39:09] भविष्य में स्ट्रेस में हो सकती है। मतलब

[04:39:11] वो लौटा नहीं सकेंगे कर्जे।

[04:39:14] इसके लिए एनपीए की पहचान के लिए

[04:39:16] रिकॉग्निशन रेोल्यूशन, रिकैपिटलाइजेशन

[04:39:18] रिफॉर्म चार सुधारों की बातचीत की जाती

[04:39:21] है। 2017 में बैंकिंग सुधार से जुड़ी हुई

[04:39:24] बड़ी समिति आए। दामोदर समिति 2011 में

[04:39:27] बैंक खातों में न्यूनतम राशि बनाए रखने की

[04:39:30] अनिवार्यता को समाप्त करने की रिकमेंडेशन

[04:39:32] इन्होंने दी थी कि भाई यह क्या लगा रखा है

[04:39:34] हमारे देश में जो गरीब आदमी है उसके पास

[04:39:36] ₹5000 होते हैं वो अपने बैंक खाते में

[04:39:39] रखेगा जब जरूरत होगी तब निकाल सकेगा नो

[04:39:42] फ्रीिल अकाउंट

[04:39:46] जीरो फ्रीिल अकाउंट जीरो फ्रिल का मतलब

[04:39:49] होता है कोई जमा पैसा ना रहे तब भी बैंक

[04:39:52] खाता रहेगा उर्जित पटेल कमेट 2013 में बनी

[04:39:56] थी। मॉनिटरी पॉलिसी को बेटर करने के लिए

[04:39:58] रिकमेंडेशन दिए थे। नचिकेत मोर कमेटी ने

[04:40:01] छोटे व्यवसाय कम आय वाले परिवारों के लिए

[04:40:03] वित्तीय सेवाओं की बातचीत की थी। जस्टिस

[04:40:06] एमबी शाह कमेटी ने काले धन की जांच की बात

[04:40:09] कही थी। दीपक मोहंती कमेटी ने वित्तीय

[04:40:11] समावेशन पर काम किया था। रतन पी वटल कमेटी

[04:40:14] ने डिजिटल भुगतान प्रणाली को बढ़ावा देने

[04:40:17] की बातचीत की थी। नंदन नीलकेनी कमेटी ने

[04:40:19] डिजिटल भुगतान प्रणाली पर पुनः रिसर्च की

[04:40:22] बातचीत कही। शामला गोपीनाथ कमेटी नए

[04:40:25] बैंकों के लाइसेंसिंग और स्क्रीनिंग के

[04:40:27] लिए बनाई गई थी 2021 में खास करके स्मॉल

[04:40:30] फाइनेंसियल बैंक में नए लाइसेंस देने के

[04:40:32] लिए 3 साल के लिए बनाई गई थी। फिर आते हैं

[04:40:35] बेसल स्टैंडर्ड। एक तरफ तो हमारे देश में

[04:40:38] आरबीआई बैंकों को रेगुलेट करने में कोई

[04:40:40] कोर कसर नहीं छोड़ती। लेकिन दुनिया में

[04:40:43] सभी बैंकों के लिए कुछ मानक बनाए गए हैं।

[04:40:46] ताकि बैंकिंग सिस्टम दुनिया का बढ़िया से

[04:40:49] काम कर सके। क्योंकि वर्तमान में अब सभी

[04:40:51] बैंक एक दूसरे से कहीं ना कहीं जुड़े हुए

[04:40:53] हैं। तो इस इंटरनेशनल स्टैंडर्ड को बासेल

[04:40:57] स्टैंडर्ड या बेसल स्टैंडर्ड कहते हैं।

[04:41:00] बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ा हुआ

[04:41:01] अंतरराष्ट्रीय मानक है। गैर बाध्यकारी

[04:41:04] होता है। बैंकिंग परवेक्षण पर बेसल कमेटी

[04:41:07] इसको देती है। बेसल कमेटी बैंकिंग

[04:41:10] परवेक्षण पर बेसल कमेटी जिसको कहते हैं 19

[04:41:14] 98 में 1998 में बेसल वन दिया था। 2004

[04:41:18] में बेसल टू दिया था। 2010 में बेसल तीन

[04:41:21] दिया था। शायद अब बेसल चार आ जाएगा।

[04:41:24] [नाक से की जाने वाली आवाज़]

[04:41:26] [गला साफ़ करने की आवाज़][खांसने की आवाज़]

[04:41:26] ये जो बेसल कमेटी है बहुत पुरानी कमेटी

[04:41:29] है। पहले 1974 में यूरोपियन देशों के 10

[04:41:33] देशों के गवर्नर ने मिलकर बनाई थी। बाद

[04:41:35] में अब इसमें आरबीआई भी शामिल हो गया।

[04:41:37] दुनिया भर के 45 देशों के गवर्नर इसमें आ

[04:41:40] गए हैं। जो सब मिलकर तय करते हैं बुद्धि

[04:41:43] का उपयोग करते हुए कि कैसा बैंकिंग सिस्टम

[04:41:45] दुनिया भर में होना चाहिए।

[04:41:49] जो भी वह नियम लाते उसको बेसल नॉर्म कहते

[04:41:51] हैं। अभी तक उन्होंने तीन बार नियम लाए

[04:41:53] हैं। इन्होंने कुछ कंडीशंस के साथ कई

[04:41:56] प्रकार की चीजों को जोड़ा है। सबसे

[04:41:58] इंपॉर्टेंट है ये जो रिस्क वेटेड एसेट

[04:42:03] होता है। न्यूनतम पूंजी राशि से जुड़ा

[04:42:05] होता है जो बैंकों के पास बैंक की उधार

[04:42:08] गतिविधियों से होने वाले रिस्क के सापेक्ष

[04:42:10] होता है। ध्यान से सुनना।

[04:42:12] रिस्क वेटेड एसेट का मतलब होता है जैसे

[04:42:15] मान लीजिए किसी को हमने एजुकेशन लोन दिया।

[04:42:19] किसी को हाउसिंग लोन दिया, किसी को हमने

[04:42:22] कार लोन दिया या किसी को हमने अलग लोन

[04:42:26] दिया कि भाई चलो अपने विदेश घूमने के लिए

[04:42:29] लोन दे दिया। तो जो कार लोन है वह सबसे लो

[04:42:33] रिस्क वाला है। लो रिस्क वाला क्यों है

[04:42:35] भाई? समय पर पैसा नहीं चुकाया। कार उठा के

[04:42:38] ले आएंगे। कार आसानी से बिक जाएगी। तो हम

[04:42:41] कहेंगे कि रिस्क वेटेज इसमें 10% का है।

[04:42:45] हाउसिंग में भी हम अगर लोन देंगे तो हम

[04:42:47] कहेंगे भ अगर लोन नहीं चुकाया तो मकान उठा

[04:42:50] लेंगे। तो यहां पर 15% का ज्यादा से

[04:42:52] ज्यादा रिस्क हो सकता है। लेकिन जब वो

[04:42:55] विदेश घूम कर आया और उसने पैसा नहीं

[04:42:57] चुकाया तो हम उसका क्या बिगाड़ लेंगे? तो

[04:42:59] हम कहेंगे कि यहां रिस्क है 50%। एजुकेशन

[04:43:03] के बाद जनरली वो पैसा चुका देगा। लेकिन

[04:43:05] मान लो एजुकेशन के बाद बेचारे को नौकरी

[04:43:08] नहीं लगी तो फिर यहां रिस्क कहेंगे 30%

[04:43:12] है।

[04:43:13] हर लोन के साथ रिस्क तो रहता ही है। उस

[04:43:17] रिस्क को वेटेज देने का मतलब होता है

[04:43:20] रिस्क वेटेड एसेट। फिर संपत्ति देखी जाती

[04:43:23] है। बैंकों से कहा जाता है कि अगर आपके

[04:43:26] पास मान लो 100 करोड़ आपने एजुकेशन में

[04:43:28] लोन दिया है तो ₹30 करोड़ आपके रिस्क

[04:43:31] वेटेड एसेट आ जाएंगे। अगर ₹100 करोड़ आपने

[04:43:34] मकानों के रूप में लोन दिया है तो ₹15

[04:43:37] करोड़ का रिस्क वेटेड है। अगर आपने कार

[04:43:39] लोन के रूप में ₹100 करोड़ दिए तो 10

[04:43:42] करोड़ रिस्क वेटेड हो गया। 100 करोड़ का

[04:43:45] आपने अगर विदेशी घूमने के लिए लोन दिया था

[04:43:47] तो उसमें 50 करोड़ का रिस्क वेटेड हो गया।

[04:43:50] मतलब मोटे तौर पर अगर हम बातचीत करें तो

[04:43:53] 105 करोड़ का वेटेज रिस्क वेटेड एसेट हो

[04:43:57] जाएगा। इनका टोटल 400 करोड़ का ऋण दिया

[04:44:00] था। उनमें से 105 करोड़ का रिस्क है ऐसा

[04:44:04] माना जाएगा।

[04:44:06] तब इसी को रिस्क वेटेड एसेट को रिस्क कम

[04:44:11] करने के लिए कैपिटल एडिक्वसी रेशो की

[04:44:14] बातचीत की जाती है। याद रखना कैपिटल

[04:44:16] एडिक्वसी रेशो कैपिटल

[04:44:20] कैश रिजर्व रेशो सीआरआर अलग चीज है जो

[04:44:24] हमने देखा था। यह कैपिटल एडिक्वसी रेशियो

[04:44:28] है कि किसी बैंक के पास जब रिस्क वेटेड

[04:44:32] एसेट होता है तो कहीं ना कहीं उसके पास

[04:44:34] कुछ तो होना चाहिए। इसको ऐसी कहानी समझो।

[04:44:37] मेरी बात ध्यान से सुनना। मैं एक कहानी

[04:44:38] बता रहा हूं। उस कहानी से जल्दी समझ में

[04:44:41] आएगी मेरी बात।

[04:44:44] एक महाजन पकड़ लेते हैं। एक महाजन जो लोन

[04:44:47] देता है। महाजन के पास खुद का ₹1 करोड़

[04:44:51] है। महाजन के पास खुद का ₹1 करोड़ है। वो

[04:44:54] लोन दे रहा है। किसी को भी ए को लोन दिया,

[04:44:56] बी को दिया, सी को दिया, डी को लोन दिया।

[04:44:59] फिर वो लोन वसूलेगा या नहीं वसूल पाएगा वो

[04:45:01] उसकी मर्जी। हम कहेंगे कोई दिक्कत नहीं

[04:45:03] भाई। जैसा चाहो वैसा कर लो।

[04:45:06] ठीक है। पर अब महाजन ने क्या किया कि

[04:45:10] महाजन ने यह माहौल बना दिया कि देखो पैसा

[04:45:14] उधार देकर बड़ी मोटी कमाई हो पाती है। तो

[04:45:17] महाजन के पास चार लोग चले आए। चार लोग चले

[04:45:21] आए। एक्स वाई जेड

[04:45:25] एम चार लोग चले आए। सब ने एक एक करोड़

[04:45:29] महाजन को दिए। सबने एक एक करोड़ महाजन को

[04:45:33] दिए। अब महाजन के पास टोटल ₹5 करोड़ हो

[04:45:37] गए। अब यह ज्यादा लोन देगा। अब जब यह

[04:45:41] ज्यादा लोन देगा तो कल के दिन अगर वह लोन

[04:45:45] की वसूली नहीं कर पाया तो महाजन तो हाथ

[04:45:48] खड़े कर देगा कि भाई मैं लोन ही नहीं वसूल

[04:45:50] कर पाया। मैं कहां से लौट आऊं? अब हम क्या

[04:45:53] कहेंगे कि देखो भाई तुम पर भरोसा किया है

[04:45:56] हमने। तुम ऐसा करो तुम्हारा जो भी प्रॉफिट

[04:45:59] होगा या जो भी तुम्हारे पास प्रॉफिट रहेगा

[04:46:02] उसका तुम लगभग ₹1 करोड़ यहां पर रख लो

[04:46:06] ताकि कल के दिन अगर तुम वैसा वसूल नहीं कर

[04:46:09] पाए तो जिन लोगों ने तुम पर भरोसा किया था

[04:46:12] उन्हें कुछ तो पैसा मिल जाएगा क्योंकि ऐसा

[04:46:15] तो नहीं है कि पूरा 5 करोड़ डूब जाएगा 5

[04:46:18] करोड़ में से 4 करोड़ रुपया वसूल हो गया

[04:46:21] एक करोड़ का नुकसान हुआ पर एक करोड़ उसने

[04:46:23] जो रखा था ना

[04:46:26] एडिक्वसी के रूप में पर्याप्तता के रूप

[04:46:28] में उससे इन लोगों को लौटा दिया जाएगा

[04:46:31] ताकि महाजन कहीं ना कहीं इस पर भरोसा करके

[04:46:35] इन लोगों को नुकसान ना हो जाए।

[04:46:38] तो ये जो ₹1 करोड़ महाजन ने अपने

[04:46:41] प्रॉपर्टी में से रखा हुआ था उसे कहते हैं

[04:46:44] कैपिटल एडिक्वसी रेशो।

[04:46:47] कैपिटल एडिक्वसी रेशो

[04:46:51] या कैपिटल टू रिस्क वेटेड एसेट रेशो कारा

[04:46:54] भी कहते हैं। एक प्रतिशत है जो किसी बैंक

[04:46:57] की पूंजी की तुलना उसके जोखिम भारित

[04:47:00] परिसंपत्ति से करके उसे वित्तीय स्वास्थ्य

[04:47:03] को मापता है। कि वो कितना कैपिटल एडिक्वसी

[04:47:07] रेशियो रखेगा यह उस पर रखा जाता है कि भ

[04:47:10] जितना रिस्क में है उसका एक निश्चित पैसा

[04:47:14] तुम्हें अपने प्रॉफिट में से अपनी

[04:47:16] प्रॉपर्टी में से रखना पड़ेगा ताकि कल के

[04:47:19] दिन कुछ भी हो जाए तो नुकसान ज्यादा ना

[04:47:21] रहे। तो इसको कहते हैं कैपिटल ऑफ बैंक।

[04:47:25] कैपिटल का मतलब बैंक की इक्विटी शेयर और

[04:47:28] बैंकों ने जो भी कर्जे दिए होंगे किसी को

[04:47:31] अपने पैसे से उसे कहेंगे इक्विटी और डेप्ट

[04:47:33] को मिलाकर कहेंगे कैपिटल। कैपिटल ऑफ़ बैंक

[04:47:37] डिवाइड बाय रिस्क वेटेड एसेट। रिस्क वेटेड

[04:47:43] एसेट कि उसका रिस्क कितना था? मैंने रिस्क

[04:47:46] वेटेड एसेट बताया था कि टोटल कितना लोन

[04:47:48] दिया था और कितना रिस्क था। इसका जो

[04:47:51] रेश्यो निकाला जाता है उसको कहते हैं

[04:47:53] कैपिटल एडिक्वसी रेशो। जितना ज्यादा रिस्क

[04:47:57] वेटेड एसेट रहेगा उतना ही ज्यादा उसे

[04:48:01] कैपिटल एडिक्वसी रेशो रखना पड़ेगा। जैसे

[04:48:04] फॉर एग्जांपल

[04:48:07] एक व्यक्ति ने ₹5,000 का कैश रखा है तो

[04:48:10] कोई रिस्क नहीं है। गवर्नमेंट सिक्योरिटी

[04:48:12] में ₹000 करोड़ दिए कोई रिस्क नहीं है।

[04:48:15] हाउसिंग लोन में ₹15,000 ₹15,000 करोड़

[04:48:18] दिए हैं। वेटेज 50% का है तो 7500 करोड़।

[04:48:24] बिजनेस लोन में वेटेज 100% का पकड़ लिया

[04:48:26] है। पर्सनल लोन में वेटेज 12 25% की ब्याज

[04:48:30] भी ना आए तो 5000 करोड़। तो टोटल 12,500

[04:48:34] करोड़ उसका रिस्क वेटेड हो गया। तो रिस्क

[04:48:36] वेटेड एसेट हो गया 12,500 करोड़। अब उसके

[04:48:40] अकॉर्डिंग अगर अगर बेसल मानक कहता है कि

[04:48:44] उसे 10% पैसा अपनी प्रॉपर्टी का रखना

[04:48:47] पड़ेगा। तो 12,500 का 10% इसका मतलब यह हो

[04:48:52] गया कि कहीं ना कहीं उसे ₹150 करोड़ की

[04:48:56] प्रॉपर्टी संभाल कर रखनी पड़ेगी। कल के

[04:48:59] दिन अगर वो पैसा लौट कर नहीं आया तो जनता

[04:49:02] को तो लौटाना पड़ेगा। तो उसे कहेंगे

[04:49:04] एलिजिबल कैपिटल। एलिजिबल कैपिटल 1250

[04:49:07] करोड़ का आएगा। तो रिस्क वेटेड एसेट इनू

[04:49:11] कैपिटल एडिक्वसी रेशो जो तय किया गया था

[04:49:15] वो होगा एलिजिबल कैपिटल कि भाई इतना

[04:49:18] कैपिटल तो आपको अपने पास रखना पड़ेगा।

[04:49:20] महाजन वाली कहानी याद रखना कल के दिन ये

[04:49:23] टूट जाए तो इसमें अनुमति दी जाती है कि

[04:49:26] चलो टियर वन का मतलब होता है कि इक्विटी

[04:49:28] शेयर के रूप में भी आप रख सकते हो चलेगा

[04:49:30] ताकि कल के दिन तुम्हें कंपनी बेचना भी

[04:49:33] पड़े तो भी वसूली की जा सके। टियर टियर वन

[04:49:36] का मतलब होता है कंपनी या किसी बैंक का

[04:49:38] कोर कैपिटल जिसमें शेयर मार्केट में उनके

[04:49:40] जो शेयर होते हैं उन सबको रखते हैं। टियर

[04:49:43] टू में कुछ अलग प्रकार के पैसे जो होते

[04:49:45] हैं वो रखे जाते हैं। इतना डिटेल में नहीं

[04:49:47] याद रखना लेकिन ये जरूर याद रखना। टियर वन

[04:49:49] और टियर टू के कैपिटल की बातचीत आती है।

[04:49:52] लिक्विडिटी कवरेज रेशो एलसीआर के तहत

[04:49:55] बैंकों को 30 दिन की अवधि में नगदी

[04:49:57] बहिरप्रवाह को झेलने के लिए न्यूनतम

[04:49:59] मात्रा में तरल परिसंपत्तियां बनानी रखनी

[04:50:01] पड़ती है। परिभाषा बहुत सिंपल है। यह पूछा

[04:50:03] जा सकता है। कभी भी बैंक में डिमांड बढ़

[04:50:07] सकती है नकदी की। कभी भी लोग पैसे लेने आ

[04:50:09] सकते हैं। तो एक उन्हें अपने पास नकदी

[04:50:11] पैसा रखना ही पड़ता है। उसको कहते हैं

[04:50:14] लिक्विडिटी कवरेज रेशो। फिर आता है कैपिटल

[04:50:17] कंजर्वेशन बफर। पूंजी बफर अनिवार्य पूंजी

[04:50:21] है जिसे वित्तीय संस्थानों को अन्य

[04:50:22] न्यूनतम पूंजी आवश्यकताओं के अतिरिक्त

[04:50:25] रखना पड़ता है। कैपिटल एडिक्वसी

[04:50:28] रेश्यो के बावजूद भी

[04:50:31] उन्हें कुछ एक्स्ट्रा पूंजी रखनी पड़ती

[04:50:34] है। कब? जब माहौल अच्छा है, जब दुनिया

[04:50:37] अच्छी चल रही है, बिजनेस अच्छा चल रहा है,

[04:50:39] तब कुछ एक एक्स्ट्रा पैसा रखो भाई संभाल

[04:50:42] कर। कैपिटल एडिक्वेसी रेशियो तो रखना ही

[04:50:44] है। लेकिन जब सिचुएशन अच्छी है तो उसको

[04:50:47] रखो। जब सिचुएशन खराब होगी तब उसको

[04:50:49] यूटिलाइज कर लेना।

[04:50:51] यह सुनिश्चित करता है कि बैंक सामान्य समय

[04:50:54] के दौरान पूंजी बफर का निर्माण करें जिससे

[04:50:56] तनाव की स्थिति के दौरान नुकसान को कम

[04:50:58] किया जा सके। यह सब क्यों कर रहे हम लोग?

[04:51:01] ताकि बैंकिंग व्यवस्था में बैंक ना डूबे।

[04:51:04] जब बैंक डूबेंगे तो लोगों का भरोसा

[04:51:07] डूबेगा। भरोसा डूबेगा तो देश की पूरी

[04:51:09] अर्थव्यवस्था संकट में आ सकती है। व्यापार

[04:51:12] चक्र से जुड़े हुए रिस्क को कम करने के

[04:51:14] लिए भी एक बफर बनाने की बातचीत आती है।

[04:51:16] मंदी चल रहा हो तो मंदी के समय में एक अलग

[04:51:19] बफर बना के रखिए कि भ वो यूज़ होगा। जब

[04:51:22] अच्छी चल रही चीजें तो अलग बफर। तो ये

[04:51:24] केवल और केवल काउंटर साइक्लिक कैपिटल बफर

[04:51:27] व्यापार चक्र के लिए होता है। और यह जो

[04:51:29] पूंजी संरक्षण बफर आपके आपका खुद का

[04:51:32] व्यापार में कोई संकट आ जाए, बैंक में आग

[04:51:34] लग जाए, चोरी हो जाए तो उसके समय काम आ

[04:51:37] जाएगा। कैपिटल एडिक्वसी रेशो के अलावा

[04:51:40] बातचीत है। 1998 में 1988 में पहली बार

[04:51:44] बेसल वन लाया गया था जो 1998 तक में लागू

[04:51:47] हुआ था। 2004 में बेसल दो लागू किया गया

[04:51:50] था। बेसल तीन अमेरिका के 2007-8 के संकट

[04:51:54] के बाद लाया गया था। भारत में बेसल तीन 1

[04:51:57] अप्रैल 2021 से लागू हुआ है। वैसे तो लागू

[04:52:00] होने वाला था 2019 से लेकिन कोरोना आ गया।

[04:52:03] इस कारण से टाइम बहुत मिल गया। 1 अप्रैल

[04:52:05] 2021 से अब बेसल तीन चल रहा है। बेसल तीन

[04:52:08] में तीन पिलर रखे गए हैं। वित्तीय और

[04:52:11] आर्थिक स्थिरता से उत्पन्न होने वाले

[04:52:13] उतार-चढ़ाव को अवशोषित करने की बैंकिंग

[04:52:15] क्षमता को सुधारना मतलब मंदी और महंगाई से

[04:52:17] सुधारना। बैंकिंग क्षेत्र के रिस्क को

[04:52:20] मैनेज करने के लिए उसके गवर्नेंस को बेटर

[04:52:23] करना और बैंकों की ट्रांसपेरेंसी करना

[04:52:26] ताकि बैंक अपनी रिपोर्टें जनता के सामने

[04:52:28] लाती रहे। तब उसे ट्रांसपेरेंटली काम करना

[04:52:31] पड़ेगा।

[04:52:33] तो तीन बेसिस है उसके मिनिमम रेगुलेटरी

[04:52:36] कैपिटल रिक्वायरमेंट बेस्ड ऑन रिस्क रिस्क

[04:52:39] वेटेड एसेट सप्लीमेंट्री रिव्य्यू प्रोसेस

[04:52:42] और मार्केट डिसिप्लिन मार्केट डिसिप्लिन

[04:52:44] मतलब जनता के सामने अपनी सारी रिपोर्टें

[04:52:46] पब्लिश करो। फिर है बैंकिंग लोकपाल। अगर

[04:52:49] जनता बैंकों के सिस्टम से नाराज है, कोई

[04:52:52] शिकायत दर्ज करना चाहती है तो यहां शिकायत

[04:52:54] दर्ज करिए। [गला साफ़ करने की आवाज़] जैसे

[04:52:55] कोई बैंक आपका चेक पास नहीं कर रहा हो,

[04:52:57] कोई बैंक आपकी नकदी जमा नहीं कर रहा हो,

[04:53:00] कोई बैंक आपको परेशान कर रहा हो तो

[04:53:02] बैंकिंग एंबुसमेंट लोकपाल जिसको कहते हैं

[04:53:05] उसके पास आप शिकायत कर सकते हैं। बैंकिंग

[04:53:08] लोकपाल भारत सरकार द्वारा ग्राहकों की

[04:53:10] समस्या और शिकायतों को दूर करने के लिए

[04:53:12] आरबीआई के द्वारा बनाया गया है। बैंकिंग

[04:53:14] लोकपाल योजना 2006 में लाई गई थी। 1995 से

[04:53:18] वैसे शुरू कर दी गई बैंकिंग लोकपाल पद पर

[04:53:21] नियुक्त होने के लिए व्यक्ति कानूनी

[04:53:23] बैंकिंग वित्तीय सेवा या लोक सेवा में

[04:53:25] उच्च पदों पर रह चुका हो। कार्यकाल 3 साल

[04:53:28] किंतु 2 वर्ष तक एक्सटेंशन दिया जा सकता

[04:53:31] है। 5 साल या 65 साल तक रहेगा। बिना किसी

[04:53:34] शुल्क के आपकी मदद करता है और इसके आदेश

[04:53:38] बिल्कुल क्वासी जुडिशरी होते हैं। अर्ध

[04:53:40] न्यायिक संस्था जैसे होते हैं। इसके

[04:53:43] अंतर्गत सारे के सारे कमर्शियल बैंक,

[04:53:45] रीजनल रूलर बैंक, अनुसूचित कोऑपरेटिव बैंक

[04:53:48] और एनबीएफसी भी शामिल है। जिनकी आप शिकायत

[04:53:51] कर सकते हैं। विदेशी नागरिक भी लोकपाल के

[04:53:54] समक्ष अपनी शिकायत दर्ज कर सकता है। अगर

[04:53:56] भारत के बैंक उसके साथ सही नहीं कर रहे

[04:53:58] हैं। 2021 के तहत इंटीग्रेटेड लोकपाल

[04:54:01] योजना लाई गई ताकि तीन लोकपाल योजनाओं को

[04:54:04] जोड़ा जा सके। बैंकिंग लोकपाल 2006 बनाया

[04:54:07] गया था। गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के

[04:54:09] लिए लोकपाल योजना 2018 में आई थी और

[04:54:12] डिजिटल लेनदेन के लिए लोकपाल योजना 2019

[04:54:14] में आ गई थी। तीनों को जोड़कर अब एक ही

[04:54:16] लोकपाल है जो सब देखता है हमारे देश में।

[04:54:19] एक ही लोकपाल बस टर्मिनोलॉजी बचे हैं

[04:54:22] सिविल। सिविल एक प्रकार का स्कोर होता है

[04:54:25] जो 300 से 900 के बीच में आता है जो बताता

[04:54:28] है कि व्यक्ति टाइम पर कर्जा लेता है तो

[04:54:31] टाइम पर चुकाताता है कि नहीं। व्यक्ति के

[04:54:33] बैंक खाते में ट्रांजैक्शन कैसे होते हैं?

[04:54:35] व्यक्ति कितना सक्षम है कर्जों को चुकाने

[04:54:38] के लिए। क्रेडिट इंफॉर्मेशन ब्यूरो

[04:54:41] लिमिटेड या सिविल के द्वारा इसे जा दिया

[04:54:44] जाता है। वर्ष 2000 में लाया गया ताकि

[04:54:46] भारत में आसानी से किसी को ऋण दिया जा

[04:54:49] सके। भारत का पहला क्रेडिट इंफॉर्मेशन

[04:54:52] कंपनी रही। सिविल में पब्लिक और प्राइवेट

[04:54:54] सेक्टर के बैंक गैर बैंकिंग वित्तीय

[04:54:56] संस्था और हाउसिंग फाइनेंसियल सहित 900 से

[04:54:59] ज्यादा लोग हैं। सिविल वाणिज्यिक और

[04:55:01] उपभोक्ता वित्त से जुड़ा हुआ डाटा एकत्रित

[04:55:03] करते स्कोर जारी करती है जिसको सिविल

[04:55:05] स्कोर कहते हैं। बैंक ऋण मंजूर करेगा या

[04:55:08] नहीं इसे तय करने के लिए सिविल स्कोर बहुत

[04:55:10] महत्वपूर्ण माना जाता है।

[04:55:13] सिविल स्कोर तीन अंकों का होता है। किसी

[04:55:16] व्यक्ति अपने कर्ज की अदायगी कैसे की? कई

[04:55:18] तरह के बिलों का भुगतान करने में उसका

[04:55:20] व्यवहार कैसा रहा इन सब पर ध्यान दिया

[04:55:22] जाता है। सिविल का स्कोर 300 से 900 होता

[04:55:24] है। 300 खराब 900 सबसे बेस्ट माना जाता है

[04:55:28] कि इस व्यक्ति को तो कर्जा दे सकते हैं।

[04:55:30] फिर है डेबिट कार्ड। डेबिट कार्ड मतलब एक

[04:55:32] प्रकार से आपके बैंक में जो सेविंग खाते

[04:55:35] में पैसा है उसको निकालने के लिए कार्ड

[04:55:37] दिया जाता है। जब चाहे तब आप एटीएम से

[04:55:39] पैसा निकाल सकते हैं। खरीददारी कर सकते

[04:55:41] हैं। एक प्लास्टिक मनी के रूप में काम

[04:55:44] करता है। क्रेडिट कार्ड का मतलब होता है

[04:55:46] कि आपके खाते में कोई पैसा नहीं। फिर भी

[04:55:49] एक लोन [गला साफ़ करने की आवाज़] के रूप

[04:55:50] में हम आपको प्लास्टिक कार्ड दे रहे हैं।

[04:55:52] जब भी पैसों की जरूरत हो तो आप क्रेडिट

[04:55:54] कार्ड के तहत खरीदारी कर सकते हैं। डेबिट

[04:55:58] कार्ड आपके बैंक खाते से जुड़ा होता है।

[04:55:59] यह बैंक खाते से जुड़ा डायरेक्ट नहीं होता

[04:56:01] है। इससे आपका क्रेडिट स्कोर पर कोई असर

[04:56:04] नहीं पड़ता। इस पर क्रेडिट स्कोर पर सीधा

[04:56:06] असर पड़ेगा।

[04:56:09] फिर है प्रीपेड कार्ड।

[04:56:11] प्रीपेड कार्ड अभी नया कांसेप्ट है। एक

[04:56:13] प्रकार से भुगतान कार्ड होता है। जैसे

[04:56:15] पहले एक निश्चित राशि डाली जाती है।

[04:56:17] प्रीपेड कार्ड का मतलब होता है जैसे आपने

[04:56:19] पहले से एक कार्ड में पैसे डालकर दे दिए

[04:56:21] और घर वालों में किसी को दे दिए कि जाओ

[04:56:23] खर्च कर सकते हो। अब आप यह सब जगह चलने लग

[04:56:25] जाता है दुकानों में। तो ये प्रीपेड कार्ड

[04:56:28] अभी आए नहीं उतनी संख्या में जितना हम सोच

[04:56:30] रहे थे।

[04:56:31] [गला साफ़ करने की आवाज़][खांसने की आवाज़]

[04:56:32] यह बैंक खाते से जुड़े नहीं होते। बस

[04:56:34] इसमें एक पैसा डालकर आप खर्चा कर सकते

[04:56:37] हैं। फिर है स्मार्ट कार्ड ऐसा कोई कार्ड

[04:56:40] जो एक प्रकार से स्मार्ट कार्ड चिप से

[04:56:43] जुड़ा होता है। सुरक्षा होती है। कांटेक्ट

[04:56:46] लेस इसमें लेना देना किया जा सकता है। एक

[04:56:48] भौतिक कार्ड है जिसमें एंबेडेड एकीकृत चिप

[04:56:51] होती है जो सुरक्षा टोकन के रूप में काम

[04:56:53] करती है। छेड़छान छेड़खानी को रोका जा

[04:56:55] सकता है। इससे पॉइंट ऑफ सेल मशीन पीओपी

[04:56:59] ऐसी मशीनें जिनके पास होती है उनको पीओपी

[04:57:01] कहते हैं। जहां से क्रेडिट कार्ड से या

[04:57:04] डेबिट कार्ड से लेनदेन किया जा सकता है।

[04:57:08] [गला साफ़ करने की आवाज़][खांसने की आवाज़]

[04:57:12] एफिशिएंसी बढ़ जाती है। बिजनेस करना आसान

[04:57:14] हो जाता है। व्यापारी छूट दर मर्चेंट

[04:57:17] डिस्काउंट रेट एमडीआर वह लागत है जो

[04:57:19] व्यापारी द्वारा बैंक को अपने ग्राहकों से

[04:57:21] डिजिटल भुगतान से डिजिटल माध्यम से भुगतान

[04:57:24] स्वीकार करने के लिए चुकाई जाती है।

[04:57:26] एमडीआर लेनदेन राशि के प्रतिशत में व्यक्त

[04:57:28] की जाती है। [गला साफ़ करने की आवाज़] अगर

[04:57:29] आप कभी आपने इस पे पूछा होगा कोई दुकानदार

[04:57:32] आप कहेगा कि 2% इसमें पैसा एक्स्ट्रा लग

[04:57:34] जाता है तो उस एक्स्ट्रा पैसे का मतलब वो

[04:57:37] होता है मर्चेंट डिस्काउंट रेट। वास्तविक

[04:57:40] रूप में कई सारे मर्चेंट खुद इसका वहन

[04:57:42] करते हैं। कुछ जगह मर्चेंट कहता है कि हम

[04:57:44] नहीं करेंगे। आपको 2% ज्यादा देना पड़ता

[04:57:46] है। कई दुकानदारों के द्वारा यह खुद वहन

[04:57:49] नहीं किया जाता।

[04:57:55] फिर है स्वफ्ट कोड।

[04:57:58] यदि आप अंतरराष्ट्रीय बैंक से कोई पैसा

[04:58:02] मांग रहे हैं, किसी अंतरराष्ट्रीय मित्र

[04:58:03] से कोई पैसा अपने खाते में डालना चाहते

[04:58:06] हैं या YouTube का चैनल खोलने के बाद आप

[04:58:08] YouTube को मोनेटाइज करेंगे। मतलब YouTube

[04:58:11] से कमाई करना शुरू करेंगे तो YouTube आपके

[04:58:13] पैसे खाते में डालने के लिए आपको स्वफ्ट

[04:58:16] कोड मांगेगा। ये एक अंतरराष्ट्रीय कोड

[04:58:18] होता है। हर बैंक को दिया जाता है। जो

[04:58:21] होता है एक प्रकार से लेटर में बैंक कोड।

[04:58:24] यह होता है कंट्री कोड। उसके बाद होता है

[04:58:26] लोकेशन कोड और ब्रांच कोड।

[04:58:30] यह आठ [गला साफ़ करने की आवाज़] से लेकर

[04:58:31] 11 डिजिट का हो सकता है। Swift कोड

[04:58:34] सोसाइटी फॉर वर्ल्ड वाइड इंटर बैंक

[04:58:36] फाइनेंशियल टेलीकम्युनिकेशन के द्वारा

[04:58:39] लाया गया है। आजकल इसके लिए बिजनेस

[04:58:42] आइडेंटिफायर कोड भी यूज करते हैं। यह कोड

[04:58:44] बैंक के बीच धन धन स्थानांतरण की सुविधा

[04:58:46] प्रदान करता है। अंतर अंतरराष्ट्रीय

[04:58:48] व्यापार में। swift या बीआईसी कोड आठ से

[04:58:51] 11 अक्षरों का होता है। बैंक कोड इसमें

[04:58:54] पहले चार अक्षर बैंक के को प्रतिनिधित्व

[04:58:56] दर्शाते हैं। जिसमें बैंक का नाम हो सकता

[04:58:59] है। फिर अगले दो अक्षर में उस देश को

[04:59:01] इंडिकेट करता है। अगले दो अक्षर उस शहर को

[04:59:04] दर्शाते हैं और अगले तीन अक्षर अगर उस शहर

[04:59:06] में दो-तीन ब्रांच है तो उस ब्रांच के कोड

[04:59:09] को दर्शाता है। ये आज के जमाने में बहुत

[04:59:11] कॉमन हो गया है। अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में

[04:59:13] इसकी जरूरत पड़ती है।

[04:59:18] कोर बैंकिंग सॉल्यूशन। कोर बैंकिंग

[04:59:21] सॉल्यूशन का मतलब होता है किसी एक बैंक का

[04:59:24] बाकी बैंकों की शाखाओं के साथ जुड़ना।

[04:59:27] बैंक शाखाओं की नेटवर्किंग जो ग्राहकों को

[04:59:29] अपने खातों का प्रबंधन दुनिया के किसी भी

[04:59:32] हिस्से में दे सकता है। जैसे

[04:59:39] मेरा दिल्ली में खाता है। लेकिन मैं अपने

[04:59:42] होमटाउन की शाखा में जाकर वहां पर पैसा

[04:59:44] जमा कर सकता हूं, निकाल सकता हूं। तो इसे

[04:59:47] कहते हैं कोर बैंकिंग कर दिया भाई कि सारे

[04:59:49] बैंकों की शाखाओं को उस बैंक की सभी

[04:59:52] शाखाओं को आपस में जोड़ दिया ताकि सहूलियत

[04:59:54] ज्यादा बेटर हो।

[04:59:57] केवाईसी [गला साफ़ करने की आवाज़] मतलब नो

[04:59:59] योर कस्टमर अपने ग्राहक के बारे में जानना

[05:00:02] उसके पते की सही जानकारी उसका पैन कार्ड

[05:00:05] उसके आधार कार्ड की जानकारी को अपडेट करते

[05:00:07] रहना। कहते केवाईसी अपडेट कर दिया केवाईसी

[05:00:10] कहलाता है।

[05:00:13] ₹ का नोट [गला साफ़ करने की आवाज़] मीडिया

[05:00:16] रिपोर्ट के अनुसार ₹ का नोट पहली बार 2007

[05:00:19] में फिफ्थ पिलर नाम के एक एनजीओ ने शुरू

[05:00:21] किया। यह नोट भ्रष्टाचार के खिलाफ असहयोग

[05:00:24] का एक अहिंसक हथियार था। भ्रष्टाचार को

[05:00:26] रोकने के लिए एनजीओ ने ₹ का नोट शुरू किया

[05:00:29] था कि भ हम इस नोट को देंगे जो भ्रष्टाचार

[05:00:31] के रूप में काम करेगा। नेशनल पेमेंट

[05:00:34] कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया बहुत बड़ी कंपनी

[05:00:36] हमारे देश की ये आरबीआई ने बनाई है 2008

[05:00:39] में

[05:00:45] कंपनी अधिनियम 2013 की सेक्शन आठ के तहत

[05:00:48] रजिस्टर्ड है। एक गैर लाभकारी संगठन है।

[05:00:52] भारत में जितने भी एटीएम है वो एटीएम में

[05:00:54] इसका बहुत बड़ा योगदान है। और ऐसा नहीं

[05:00:57] नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया एटीएम

[05:01:00] के साथ-साथ कई प्रकार की रुपए वाली जो

[05:01:03] रुपए कार्ड बनाया उसमें भी बहुत बड़ा

[05:01:04] योगदान निभाया।

[05:01:07] रुपए कार्ड बनाने में शुरुआत की इसने। देश

[05:01:10] में वित्तीय समावेशन में बहुत बड़ा योगदान

[05:01:12] निभाया है। बिल्कुल दोनों बातें सही है।

[05:01:16] 2016 में नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ

[05:01:20] इंडिया ने यूपीआई ऐप बनाया। ये जितने भी

[05:01:23] PhonePe, Paytm या जितने भी आपने डिजिटल

[05:01:27] वॉलेट आप यूज करते होंगे सब यूपीआई से ही

[05:01:30] काम करते हैं। यूपीआई वो मेन इंटरफेस है।

[05:01:33] यह बाकी तो सपोर्टिव सिस्टम के रूप में

[05:01:35] काम कर रहे हैं। जैसे मान लीजिए कि एक

[05:01:37] प्लेटफार्म है जहां एक बस स्टॉप है जहां

[05:01:39] प्राइवेट बसें भी आती है, सरकारी बसें भी

[05:01:42] आती है। तो यूपीआई बस स्टॉप है एक प्रकार

[05:01:45] से जहां से बसें चलती है। तो यूपीआई एक

[05:01:48] ऐसा सॉफ्टवेयर है जिसका कनेक्शन सभी

[05:01:51] बैंकों का डिजिटल कनेक्शन कर पाया।

[05:01:53] PhonePe यूपीआई की मदद से सुविधाओं को

[05:01:56] बेटर देता है या फिर बाकी जो प्राइवेट

[05:01:58] Paytm वाला बेटर कर सकता है। और भी भारत

[05:02:01] पे जैसे कई लोग आ गए। पर यूपीआई मेन

[05:02:04] इंटरफेस है, मेन सॉफ्टवेयर है जो सारे

[05:02:06] चीजों में मददगार होता है। भारत सरकार ने

[05:02:09] यूपीआई के यूज के लिए अपना प्राइवेट अपना

[05:02:12] सरकारी ऐप बनाया जिसका नाम था भीम ऐप जो

[05:02:15] डिजिटल वॉलेट था। एक डिजिटल और वास्तविक

[05:02:18] समय भुगतान प्रणाली है जिसको एनपीसीआई ने

[05:02:21] 2016 में विकसित किया। हमारे देश ने इसने

[05:02:24] बहुत बड़ी क्रांति ला के दी है। ऑनलाइन

[05:02:26] भुगतान के लिए मोबाइल वॉलेट की। अब इसके

[05:02:28] कारण कोई जरूरत नहीं होती है। मतलब आपके

[05:02:30] पास अगर यूपीआई है तो आप डायरेक्ट खाते

[05:02:33] में पैसा ले सकते हैं। कोई मोबाइल वॉलेट

[05:02:35] रखने की जरूरत नहीं होती है। इसके लिए

[05:02:37] लाया गया था। जबकि वर्तमान में सबसे

[05:02:39] ज्यादा मोबाइल वॉलेट इसका उपयोग कर रहे

[05:02:41] हैं। 2023 में यूपीआई के माध्यम से ₹ लाख

[05:02:44] करोड़ के 100 अरब से अधिक लेनदेन हुए। यह

[05:02:47] बहुत बड़ी बातचीत है।

[05:02:52] यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस अब यूपीआई 2.0

[05:02:56] लाया गया है ताकि आसानी से मर्चेंट के साथ

[05:02:59] बिजनेस अकाउंट के साथ जोड़ा जा सके।

[05:03:02] क्यूआर कोड रिलीज किया जा सकता है। आसानी

[05:03:04] से व्यापार करना सरल किया जा सकता है।

[05:03:09] ओवरड्राफ्ट फैसिलिटी भी दे दी गई है। वन

[05:03:12] टाइम मैंडेट कर दिया गया। बस नेशनल पेमेंट

[05:03:16] कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया ने स्पष्ट किया कि

[05:03:18] बैंक खाते से बैंक खाता आधारित यूपीआई

[05:03:20] भुगतान के लिए कोई शुल्क नहीं होगा। मतलब

[05:03:22] अभी भी यूपीआई के लिए कोई ज्यादा मतलब कोई

[05:03:24] शुल्क नहीं लिया जाता है। 2024 में फ्रांस

[05:03:28] ने यूपीआई को हमारे देश के यूपीआई को लागू

[05:03:30] किया। सितंबर 2023 में जापान के हिताची

[05:03:33] लिमिटेड कंपनी ने इसके अंतर्गत काम शुरू

[05:03:36] कर दिया। 2023 में Paytm भारत का पहला

[05:03:39] यूपीआई लाइट शुरू करने वाला बैंक बना।

[05:03:42] यूपीआई लाइट का मतलब होता है कोई ओटीपी

[05:03:45] कोई पिन डाले बगैर ही लेनदेन शुरू होगा।

[05:03:47] छोटे लेवल का यूपीआई लाइट का मतलब छोटे

[05:03:50] लेवल का लेनदेन आसानी से बिना किसी पिन के

[05:03:53] होने लग जाता है। यूपीआई ऑनलाइन भुगतान के

[05:03:56] लिए मोबाइल वॉलेट की आवश्यक नहीं होंगे।

[05:03:59] इसीलिए लाया गया था ताकि हमें कोई वॉलेट

[05:04:02] की जरूरत ना पड़े। डिजिटल लेनदेन सीधा

[05:04:04] खाते से खाते में हो सके।

[05:04:07] फिर है भीम ऐप जो यूपीआई की मदद से सरकार

[05:04:10] का वॉलेट है। एक प्रकार से एक प्रकार से

[05:04:13] याद रखना भीम एक ऐप है जो PhonePe Paytm

[05:04:17] जैसा सरकारी वॉलेट है। यह भी एनपीसीआई ने

[05:04:19] बनाया। लेकिन सबका माईबाप यूपीआई है।

[05:04:22] यूपीआई की मदद से ही PhonePe भी पैसा

[05:04:25] ट्रांसफर करवा सकता है। अगर यूपीआई खराब

[05:04:28] हो गया तो PhonePe खत्म। मतलब फिर उनके

[05:04:30] अपने डिजिटल वॉलेट रहेंगे। बस उतना ही काम

[05:04:33] कर पाएंगे। Paytm हो, फोन पे हो, भीम

[05:04:36] यूपीआई हो सब इसी तरीके से काम कर पाते

[05:04:39] हैं। यदि किसी व्यक्ति के पास विभिन्न

[05:04:41] बैंकों में बैंक खाते हैं तो व्यक्ति को

[05:04:43] अलग-अलग यूपीआई ऐप या वर्चुअल पेमेंट

[05:04:46] एड्रेस का उपयोग करना पड़ता है। जैसे

[05:04:48] अलग-अलग यूपीआई एड्रेस होते हैं। भीम ऐप

[05:04:50] का प्रयोग करने के लिए स्मार्टफोन इंटरनेट

[05:04:52] की बाध्यता अनिवार्य नहीं है। साधारण फोन

[05:04:55] से भी हम इसको चला सकते हैं। एक पर्टिकुलर

[05:04:58] स्टार#श

[05:04:59] स्टार 99# नंबर के माध्यम से भी यह काम

[05:05:03] करता है।

[05:05:06] भीम ऐप उपयोग करने वालों के लिए यूपीआई

[05:05:08] सक्षम बैंक खाते किसी धन को हस्तांतरण

[05:05:10] करना संभव बनाते हैं। जहां चिप पिन डेबिट

[05:05:14] कार्ड में प्रमाणीकरण चार घटक होते हैं।

[05:05:16] भीम ऐप में प्रमाणीकरण के लिए केवल दो ही

[05:05:18] ऑथेंटिकेशन फैक्टर होते हैं। मतलब एक

[05:05:21] प्रकार से डेबिट कार्ड की हम बात करें तो

[05:05:23] उसमें भी दो ही चीजें पिन को देना पड़ता

[05:05:25] है। केवल और केवल पहला सही था।

[05:05:29] फिर है एनईएफटी नेशनल इलेक्ट्रॉनिक फंड

[05:05:32] ट्रांसफर। यदि ₹ लाख से कम का फंड

[05:05:34] ट्रांसफर एक बैंक से दूसरे बैंक में करना

[05:05:36] हो तो एनईएफटी करिएगा। अगर 2 लाख से लेकर

[05:05:39] 20 करोड़ 100 करोड़ का ट्रांसफर करना है

[05:05:42] तो आरटीजीएस करेंगे। रियल टाइम ग्रॉस

[05:05:44] सेटलमेंट ये बिल्कुल 30 मिनट के अंतर्गत

[05:05:47] इमीडिएटली पैसा अकाउंट में पहुंचाने की

[05:05:50] क्षमता रखता है। बड़ा अमाउंट तो ये रियल

[05:05:52] टाइम ग्रॉस सेटलमेंट ज्यादा यूज़ किया

[05:05:54] जाता है। अब 24 घंटे सातों दिन उपलब्ध है।

[05:05:56] पहले केवल वर्किंग डेज में उपलब्ध था। पर

[05:05:59] याद रखना आरटीजीएस मिनिमम ₹ लाख से ज्यादा

[05:06:02] की बातचीत आएगी।

[05:06:04] इसमें थोड़ा टाइम लगता है और 2 लाख से कम

[05:06:06] का ट्रांसफर होता है। अब एक नई चीज शुरुआत

[05:06:09] कर दी। एनएफटी के लिए भी 24 घंटे की

[05:06:11] शुरुआत कर दी गई। अब इसकी जगह पर एक नई

[05:06:13] चीज आ गई है। इंस्टेंट मनी ट्रांसफर

[05:06:15] आईएमपीएस

[05:06:17] इंस्टेंट मनी ट्रांसफर की बातचीत आ गई है।

[05:06:20] एटीएम एक प्रकार से कैश मशीन है जहां से

[05:06:23] नगद निकाला जा सकता है। वाइट लेबल एटीएम

[05:06:27] ऐसे एटीएम होते हैं जो किसी थर्ड पार्टी

[05:06:29] के द्वारा चलाए जाते हैं। बैंकों को इसे

[05:06:32] वो किराए पर देता है। ब्राउन लेबल एटीएम

[05:06:35] ऐसे होते हैं जिसका ऑपरेशन और मेंटेनेंस

[05:06:38] थर्ड पार्टी के द्वारा कराया जाता है।

[05:06:40] मतलब मेंटेनेंस ऑपरेशन थर्ड पार्टी के

[05:06:42] द्वारा किया है। लेकिन वो बैंक मालिक उसका

[05:06:44] होती है। वाइट एटीएम में मालिक और ऑपरेशन

[05:06:47] सब कुछ थर्ड पार्टी करती है। ग्रीन लेबल

[05:06:50] एटीएम ऐसे होते हैं जो एग्रीकल्चर

[05:06:52] ट्रांजैक्शन में यूज़ होते हैं। ऑरेंज

[05:06:53] लेबर एटीएम ऐसे होते हैं जिसमें शेयरों की

[05:06:56] खरीद बिक्री हो सकती है। येलो लेबल एटीएम

[05:06:58] में आप जैसे Amazon, Flipkart हुआ इनसे

[05:07:02] खरीद बिक्री कर सकते हैं। और पिंक लेवल

[05:07:05] एटीएम ऐसी होती है जिनमें केवल महिलाएं

[05:07:07] प्रवेश कर सकती है। वीजा और मास्टर कार्ड

[05:07:10] ये सब प्राइवेट मध्यस्थ कंपनियां होती है

[05:07:13] जो इस क्रेडिट कार्ड, डेबिट कार्ड का सब

[05:07:15] कुछ जाल संभालती है। अलग से एक अपना

[05:07:18] सिस्टम बना लेती है जिसमें बैंकों पर बोझ

[05:07:20] नहीं आता है। बैंकके इनके माध्यम से सारे

[05:07:22] काम करवा लेते हैं। जो भी प्लास्टिक मनी

[05:07:24] के रूप में होंगे। यह वीजा और मेस्टर

[05:07:27] कार्ड है। वीजा कार्ड लगभग 200 से ज्यादा

[05:07:30] देशों तक में एक्सेप्टेबल है। यह भी लगभग

[05:07:32] 210 से ज्यादा देशों में एक्सेप्टेबल है।

[05:07:35] दोनों के दोनों प्राइवेट कंपनियों के काम

[05:07:37] है।

[05:07:39] अगर आप ब्याज कोई लोन लेने जाते हैं तो दो

[05:07:42] प्रकार के ब्याज रेट होते हैं। फिक्स रेट

[05:07:44] पूरे लोन की अवधि में ब्याज रेट नहीं

[05:07:46] बदलेगा और फ्लोटिंग रेट। जैसे ही सरकार के

[05:07:49] ब्याज दर कम होंगे तो उनका भी ब्याज दर कम

[05:07:52] होगा। बढ़ेंगे तो उनका भी ब्याज दर

[05:07:54] बढ़ेगा। इसे कहते हैं फ्लोटिंग रेट। यहां

[05:07:56] पर हमेशा ब्याज दर सेम रहता है।

[05:08:00] ईएमआई का मतलब होता है इक्विटेड मंथली

[05:08:03] इंस्टॉलमेंट। जो भी आपने कर्जा लिया है

[05:08:05] उसे हर महीने चुकाने को कहते हैं ईएमआई।

[05:08:10] पैन कार्ड 2.0 2025 में डिक्लेअ किया गया

[05:08:14] है कि एक ई गवर्नेंस योजना के तहत हमारे

[05:08:16] देश में नए पैन कार्ड आएंगे जो ज्यादा

[05:08:18] एडवांस और बेटर होंगे। ई फाइलिंग पोर्टल

[05:08:22] सब जगह पर इसको आसानी से काम कर पाएंगे।

[05:08:25] मौजूदा पैन कार्ड को पेन 2.0 के तहत नए

[05:08:28] पेन के लिए आवेदन करने की जरूरत नहीं

[05:08:30] होगी। यह अपने आप पहुंचा दिए जाएंगे लोगों

[05:08:32] तक।

[05:08:34] पेन का विचार भारत सरकार 1972 में लाई थी।

[05:08:37] 1961 के इनकम टैक्स अधिनियम में। सेक्शन

[05:08:40] 139 ए के तहत इसको कंपलसरी किया गया था।

[05:08:44] पहले वैकल्पिक था बाद में इसको कंपलसरी कर

[05:08:46] दिया गया पैन कार्ड को।

[05:08:50] अब बात करते हैं फाइनेंशियल मार्केट।

[05:08:53] फाइनेंशियल मार्केट से अभिप्राय जहां पर

[05:08:55] बड़ी मात्रा में अल्पकालिक और दीर्घकालिक

[05:08:58] स्तर पर मुद्रा संपत्ति या सिक्योरिटीज का

[05:09:02] लेनदेन होता है। देखो हम लोग जो मार्केट

[05:09:05] में पैसा जमा कर रहे हैं। हम सब लोग

[05:09:08] रिटेलर में काम करते हैं। लेकिन याद

[05:09:10] रखिएगा

[05:09:12] [गला साफ़ करने की आवाज़] हमसे भी बड़ा

[05:09:13] लेनदेन करने वाले बैंक लो होते हैं।

[05:09:16] सरकारें होती है। जो करोड़ों रुपए का

[05:09:19] लेनदेन डेली करते हैं। ऐसे मार्केट को

[05:09:22] फाइनेंशियल मार्केट कहते हैं। जैसे एक

[05:09:24] प्रकार से समझ लीजिए थोक मार्केट है यह।

[05:09:27] हमारे जैसे बाजार होते हैं तो जिसमें

[05:09:29] सब्जी मंडी एक छोटी सी मंडी होती है। फिर

[05:09:31] सब्जी मंडी एक थोक मंडी भी होती है। वैसे

[05:09:34] पैसों का भी एक थोक मंडी होता है। थोक

[05:09:37] मंडी मतलब ऐसा दिखता नहीं है कहीं पर। पर

[05:09:39] जो देश के अंदर जितने बैंक है वो बड़े

[05:09:41] स्तर पर पैसों का लेनदेन करते हैं। ऐसे

[05:09:44] थोक मार्केट की हम बातचीत करने जा रहे

[05:09:47] हैं। वित्तीय बाजार के मुख्य काम है हमारे

[05:09:50] देश में निवेशकों और उधारकर्ताओं के बीच

[05:09:52] समझौते को करना। पैसों का लेनदेन,

[05:09:54] लिक्विडिटी को बनाए रखना। दो प्रकार के

[05:09:57] फाइनेंशियल मार्केट है। एक है मनी मार्केट

[05:10:00] और एक है कैपिटल मार्केट। अल्पकालिक

[05:10:02] लेनदेन के लिए, दीर्घकालिक लेनदेन के लिए।

[05:10:05] मनी मार्केट कम ड्यूरेशन का होता है। 365

[05:10:08] से कम दिनों में लेनदेन होता है।

[05:10:09] लिक्विडिटी ज्यादा होती है। थोक बाजार

[05:10:12] कहलाता है पैसों का। अनऑर्गनाइज्ड होता

[05:10:14] है। मतलब जैसे शेयर मार्केट में कोई स्टॉक

[05:10:16] एक्सचेंज में खरीद बिक्री होती है। ऐसा

[05:10:18] यहां नहीं होता। यहां पर तो चलता ही रहता

[05:10:21] है।

[05:10:21] [गला साफ़ करने की आवाज़][खांसने की आवाज़]

[05:10:22] बैंकों का फोन कॉल के थ्रू, मेल के थ्रू

[05:10:25] बस डायरेक्ट लेनदेन होता है और यहां रिस्क

[05:10:28] बहुत कम माना जाता है क्योंकि कम टाइम

[05:10:30] रहता है। यह व्यापक वित्तीय बाजार के उस

[05:10:33] हिस्से को संदर्भित करता है जिसमें एक दिन

[05:10:35] से लेकर एक वर्ष तक की परिपक्वता वाली

[05:10:37] अत्याधिक तरल और अल्पकालिक वित्तीय

[05:10:39] परिसंपत्तियों का कारोबार होता है। इसमें

[05:10:42] दो लोग होते हैं। एक खरीदार और लोन देने

[05:10:44] वाला। क्रेता से तात्पर्य उन व्यापारी

[05:10:47] उद्योगपतियों से है जो मुद्रा बाजार में

[05:10:49] पैसा उधार लेते हैं और विक्रेता से

[05:10:51] अभिप्राय है जो उधार देते हैं।

[05:10:57] मनी [गला साफ़ करने की आवाज़] मार्केट में

[05:10:58] इंटरेस्ट रेट काफी अच्छा मिल जाता है।

[05:11:00] उत्पादकता बेटर होती है। सेफ इन्वेस्टमेंट

[05:11:02] होता है। एक्सेसिबिलिटी होती है। लेकिन

[05:11:05] डिसएडवांटेज भी है क्योंकि यहां पर मनी

[05:11:07] मार्केट में मिनिमम बैलेंस रिक्वायरमेंट

[05:11:10] की बातचीत आ जाती है। विड्रॉल लिमिटेड

[05:11:12] होते हैं। कई प्रकार की चीजें इसमें आती

[05:11:14] है। मनी मार्केट में आरबीआई बहुत बड़ा

[05:11:17] पार्टिसिपेंट है। सरकार की तरफ से काम

[05:11:19] करती है। कमर्शियल बैंक, नॉन बैंकिंग,

[05:11:21] फाइनेंशियल कंपनियां, इंश्योरेंस

[05:11:24] कंपनियां, म्यूच्यूल फंड कंपनियां और

[05:11:26] कोऑपरेटिव बैंक मनी मार्केट में

[05:11:28] पार्टिसिपेट करते हैं। ये बड़े बड़े लेवल

[05:11:31] पर पैसों का लेनदेन करते हैं। हम लोग कैसे

[05:11:33] हैं? ₹1 लाख, दो लाख जमा करने जाएंगे। यह

[05:11:36] 100-100 ₹200 करोड़ एक-ए दिन में इंटरचेंज

[05:11:39] करने वाले लोग हैं। भाई आरबीआई द्वारा

[05:11:41] बाजार में सरकार की तरफ से निम्नलिखित

[05:11:44] उपकरणों को बेचा जाता है मनी मार्केट। मनी

[05:11:46] मार्केट मतलब एक साल से कम में ट्रेजरी

[05:11:48] बिल, दिनांकित सह प्रतिभूतियां, कैश

[05:11:52] मैनेजमेंट बिल और वे एंड मींस एडवांस।

[05:11:59] ट्रेजरी बिल सरकारी गवर्नमेंट सिक्योरिटीज

[05:12:02] है। देखो गवर्नमेंट सिक्योरिटी और कुछ

[05:12:04] नहीं है। एक कागज है जिस पर लिखा है मैं

[05:12:06] धारक को वचन देता हूं कि इतने ब्याज पर

[05:12:08] इतना पैसा दूंगा या फिर इतना डिस्काउंट दे

[05:12:11] रहा हूं और मैं जब खरीदूंगा तो पूरा पैसे

[05:12:13] में खरीदूंगा। मनी बिल हमारे देश में 91

[05:12:16] डेज, 182 डेज और 364 डेज के रूप में आते

[05:12:20] हैं। आधा-आधा करते चलना। सरकारी

[05:12:22] प्रतिभूतियों में डिस्काउंट पर खरीदा जाता

[05:12:25] है। जैसे मान लो कि यह 100 करोड़ की होगी

[05:12:27] तो 95 करोड़ में ही 95 करोड़ आपको देने

[05:12:31] पड़ेंगे। जब वापस लेने जाओगे तो 100 करोड़

[05:12:34] पूरे मिलेंगे। ट्रेजरी बिल पर फिलहाल में

[05:12:37] 7 1/2 से लेकर 12 1/2% तक का डिस्काउंट

[05:12:40] मिलता है। केंद्रीय सरकार की ओर से आरबीआई

[05:12:43] जारी करती है। राज्य सरकारों को ट्रेजरी

[05:12:46] बिल जारी करने का अधिकार नहीं है। राज्य

[05:12:50] सरकारों को ट्रेजरी बिल जारी करने का

[05:12:52] अधिकार नहीं केवल केंद्र सरकार को अधिकार

[05:12:55] है। छूट पर जारी किया जाता है और मैच्योर

[05:12:57] होने पर पूरा अंकित मूल्य जो भी मेंशन था

[05:13:00] वह प्राइस देना पड़ता है। तो इसके लिए

[05:13:02] इसको डिस्काउंटेड बिल भी कहते हैं। बैंक

[05:13:05] ट्रेजरी बिल को एसएलआर के रूप में रख सकते

[05:13:07] हैं। एसएलआर हम पढ़ चुके हैं। रेपो के तहत

[05:13:09] ऋण प्राप्त करने के लिए आरबीआई को ट्रेजरी

[05:13:11] बिल भी दे सकते हैं। रेपो के तहत मतलब वो

[05:13:15] एक्स्ट्रा खरीदे होंगे तो ट्रेजरी बिल

[05:13:17] मिनिमम ₹25,000 से ₹25,000 के मल्टीप्लाई

[05:13:20] में अवेलेबल किए जाते हैं। ₹1000 का

[05:13:23] ट्रेजरी बिल ₹10,000 का ट्रेजरी बिल है।

[05:13:26] मान लीजिए तो ₹9,500 में खरीदा जाएगा।

[05:13:29] लेकिन जब मैच्योर हो जाएगा तो पूरा

[05:13:31] ₹10,000 ही मिलेगा।

[05:13:34] ₹10000

[05:13:39] इस प्रकार यह गैर ब्याजकारी होती है।

[05:13:41] इसमें कोई ब्याज नहीं मिलता। ब्याज नहीं

[05:13:43] मिलता इसलिए इसको जीरो कूपन कहते हैं।

[05:13:45] कूपन शब्द का मतलब होता है ब्याज का

[05:13:48] ब्याज। महीना खत्म होने पर वो कागज आप

[05:13:52] लेकर जाएंगे और ब्याज प्राप्त कर सकते।

[05:13:53] इसको कहते हैं जीरो कूपन या जीरो ब्याज

[05:13:57] वाले जीरो कूपन बॉन्ड भी इसको कहा जाता है

[05:14:00] या जीरो कूपन बिल कहे तो ज्यादा बेटर है

[05:14:03] बिल मतलब अल्प अवधि के लिए बॉन्ड मतलब

[05:14:05] दीर्घ अवधि के लिए बॉन्ड

[05:14:08] ट्रेजरी बिल तीन तरीके के होते हैं देख

[05:14:10] चुके हम लोग टाइम पीरियड के आधार पर

[05:14:13] भारतीय रिजर्व बैंक के द्वारा भारत सरकार

[05:14:15] की प्रतिभूतियों का प्रबंधन और प्रयोजन

[05:14:17] होता है किंतु किसी एक राज्य सरकार की

[05:14:20] प्रतिभूतियों का नहीं भारत सरकार जारी

[05:14:22] करता है राज्य सरकारें कोई जारी नहीं करती

[05:14:25] और ट्रेजरी बिल अपने भट्टे पर दिए जाते,

[05:14:28] डिस्काउंट पर दिए जाते हैं। आंसर आएगा

[05:14:31] केवल और केवल दूसरा और तीसरा। रिजर्व बैंक

[05:14:34] इंडिया मैनेज एंड सर्विज गवर्नमेंट ऑफ

[05:14:38] इंडिया सिक्योरिटीज बट नॉट एनी स्टेट

[05:14:40] गवर्नमेंट सिक्योरिटीज। नहीं राज्य

[05:14:42] सरकारों को भी अलग-अलग प्रतिभूतियों में

[05:14:44] सलाह देती है, मदद करती है। ट्रेजरी बिल

[05:14:46] में नहीं करती। लेकिन बाकी गवर्नमेंट

[05:14:48] सिक्योरिटी में तो मदद करेगी।

[05:14:52] फिर है कैश मैनेजमेंट बिल सीएमबी। यह

[05:14:55] केंद्र सरकार की टेंपरेरी जरूरतों के लिए

[05:14:58] धन जुटाने के लिए भारत सरकार की ओर से

[05:15:01] आरबीआई द्वारा बेचे जाने वाली एक बिल ही

[05:15:04] है। यह ट्रेजरी बिल के जैसे होता है।

[05:15:07] लेकिन इसका कार्यकाल 91 दिन से कम होता

[05:15:10] है। मतलब अगर 91 दिन या उससे ज्यादा

[05:15:13] निकालना है तो ट्रेजरी बिल निकाल लेंगे।

[05:15:15] अगर कम तीन महीनों से कम के लिए चाहिए तो

[05:15:17] यह निकालेंगे। भारत सरकार की अल्पकालिक

[05:15:20] जरूरतों को पूरा करने के लिए कैश

[05:15:22] मैनेजमेंट बिल आरबीआई द्वारा नीलामी के

[05:15:24] माध्यम से अंकित मूल्य पर छूट पर बेचे

[05:15:26] जाते हैं। मतलब वही डिस्काउंट पर बेचे

[05:15:28] जाते हैं। लेकिन बहुत ही कम टाइम के लिए

[05:15:30] 90 दिनों से कम के लिए

[05:15:33] आरबीआई बैंक वाले एसएलआर के रूप में इसे

[05:15:35] रख सकते हैं। फिर है वे एंड मींस एडवांस।

[05:15:39] वे और मींस एडवांस को आरबीआई और भारत

[05:15:41] सरकार के बीच एक समझौते के रूप में पेश

[05:15:43] किया जाता है। हमारे देश में कोई भी राज्य

[05:15:47] सरकार कोई भी केंद्र सरकार को इमरजेंसी

[05:15:50] में पैसों की जरूरत पड़ जाए तो ऐसी

[05:15:53] सिचुएशन में वह आरबीआई से उधार लेती है।

[05:15:56] तीन महीनों के लिए ब्याज चुकाना पड़ता है।

[05:15:59] सरकारों को भी डब्ल्यूएमए आरबीआई अधिनियम

[05:16:02] के सेक्शन 175 के तहत आरबीआई द्वारा सरकार

[05:16:04] और केंद्र और राज्य को टेंपरेरी ऋण

[05:16:07] ओवरड्राफ्ट की सुविधा दी थी। जैसे हमारे

[05:16:09] खाते से हम पैसा खत्म हो जाए फिर भी निकाल

[05:16:12] सकते हैं। वैसी ही सुविधा दी गई है। यह

[05:16:14] सरकारों को सरकारों को डब्ल्यूएमए ने

[05:16:17] तदर्थ ट्रेजरी बिल प्रणाली को का स्थान

[05:16:19] लिया। मतलब पहले एडहॉक ट्रेजरी बिल हुआ

[05:16:22] करते थे। उसको खत्म करके डब्ल्यूएमए डाल

[05:16:24] दिया गया। एडॉक ट्रेजरी बिल का उपयोग

[05:16:27] सरकार द्वारा किसी विशेष उद्देश्य के

[05:16:29] अल्पकालिक व्यय को पूरा करने के लिए किया

[05:16:32] जाता है। वेज एंड मींस एडवांस को सरकार के

[05:16:35] लिए वित्त स्त्रोत के रूप में नहीं माना

[05:16:37] जाता बल्कि इसका लक्ष्य सरकार के व्यय और

[05:16:39] अपेक्षित प्राप्तियों के बीच इमंबैलेंस को

[05:16:42] दूर करना है। मतलब यह कभी नहीं माना जाएगा

[05:16:44] कि यह सरकार ने ऋण प्राप्त किया बल्कि

[05:16:47] माना जाता है कि सरकार को ओवरड्राफ्ट की

[05:16:49] फैसिलिटी दे दी गई है जो 3 महीने में

[05:16:51] सरकार चुका देगी। तो एक प्रकार से वो अपनी

[05:16:54] इमरजेंसी को पूरा करती है। इसे सरकार अपने

[05:16:56] कभी भी अकाउंटिंग में कर्जे के रूप में

[05:16:59] शामिल नहीं करती है।

[05:17:04] 90 दिन के भीतर पैसा लौटाना पड़ता है। अगर

[05:17:07] 90 दिन से ज्यादा हो जाए तो फिर उसको

[05:17:09] ओवरड्राफ्ट माना जाएगा। एक प्रकार से

[05:17:11] कर्जा माना जाएगा और फिर उस पर ब्याज लिया

[05:17:14] जाता है। ब्याज मतलब वह भी आरबीआई द्वारा

[05:17:17] लिए जाने वाले ब्याज दर रेपो दर के बराबर

[05:17:20] होता है और अगर ओवरड्राफ्ट हो जाए तो रेपो

[05:17:22] रेट से भी 2% ज्यादा ब्याज देना पड़ता है

[05:17:24] ओवरड्राफ्ट में।

[05:17:27] फिर है मनी मार्केट के इंस्ट्रूमेंट जो

[05:17:30] सरकार के अलावा किसी और संस्थाओं के

[05:17:32] द्वारा यूज किए जाते हैं। क्योंकि सरकार

[05:17:34] के अलावा भी कई सारे बैंकके एक दूसरे के

[05:17:37] साथ पैसों का लेनदेन करते हैं। इधर ध्यान

[05:17:40] देना सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट, कमर्शियल

[05:17:43] पेपर, कॉल मनी, नोटिस मनी, टर्म मनी ये सब

[05:17:47] पैसों का लेनदेन होते रहता है। प्रतिदिन

[05:17:50] बैंकों के बीच में, बड़े-बड़े बैंकों के

[05:17:52] बीच में। सबसे पहले सर्टिफिकेट ऑफ

[05:17:54] डिपॉजिट। कमर्शियल वाणिज्यिक बैंक और अन्य

[05:17:58] वित्तीय संस्थाओं के द्वारा एक उपाय

[05:18:00] अपनाया गया जिसके अंतर्गत आरबीआई द्वारा

[05:18:03] अल्पकालिक धन जुटाने की अनुमति दी जाती है

[05:18:06] कि ठीक है भाई अपनी जरूरतों को पूरा करने

[05:18:08] के लिए आप इसकी खरीद बिक्री कर सकते हैं।

[05:18:10] कोऑपरेटिव बैंक रीजनल रूलर बैंक को

[05:18:13] कमर्शियल सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट जारी करने

[05:18:15] की अनुमति नहीं है। सीडी को ₹5 लाख के

[05:18:19] मल्टीपाई में जारी किया जाता है। इन्हें

[05:18:22] अंकित मूल्य पर छूट पर जारी किया जाता है

[05:18:24] और समूल सममूल्य अंकित मूल्य पर वापस किया

[05:18:28] जाता है 7 दिन से लेकर 1 वर्ष के लिए मान

[05:18:32] लीजिए HDFC को HDFC को ICICI से कर्जा

[05:18:37] चाहिए तो सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट जारी

[05:18:40] करेगा ICIC सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट को

[05:18:42] उपयोग करेगा भविष्य में उससे कमाई भी कर

[05:18:45] लेगा

[05:18:47] परिपक्वता तिथि से पहले सीडी वापस लेने पर

[05:18:50] जुर्माना लगाया जाता है। बाकी सीडी के एवज

[05:18:52] में ऋण प्रदान करने की अनुमति नहीं होती

[05:18:55] है। मतलब ICICI उस सीडी के एवज में किसी

[05:18:58] से लोन नहीं मांग सकता है। बाकी अगर पहले

[05:19:01] ही जमा कर दिया तो भी पेनल्टी लगाई जा

[05:19:03] सकती है। यह बैंकके आपस में आपस में

[05:19:06] करोड़ों रुपए का लेनदेन करते हैं। इस आधार

[05:19:09] पर फिर है कमर्शियल पेपर। बड़े जो

[05:19:12] कंपनियां होती हैं, बड़ी कंपनियां जो

[05:19:15] बैंकके होती है, जो फाइनेंशियल कंपनियां

[05:19:17] होती है, वह जारी करती हैं। एक प्रकार से

[05:19:21] अनसिक्यर्ड होती है। अल्पकालिक ऋण के रूप

[05:19:24] में मानी जाती है। कंपनियां प्राथमिक डीलर

[05:19:28] वित्तीय संस्थान अपनी अल्पकालिक निधि

[05:19:30] आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जारी करती

[05:19:32] है। 5 लाख के गुणज में जारी की जाती है।

[05:19:36] मिनिमम ₹5 लाख होनी चाहिए। इस पर ब्याज

[05:19:39] रेट मिलता है। सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट पर

[05:19:42] ब्याज नहीं मिला था। डिस्काउंट मिला था।

[05:19:44] कमर्शियल पेपर पर ब्याज मिलता है। 7 दिन

[05:19:48] से 1 वर्ष के लिए। फिर होते हैं कॉल मनी,

[05:19:52] नोटिस मनी, टर्म मनी। कॉल मनी मतलब 1 दिन

[05:19:54] के लिए उधार लिया जाए। 1 दिन के लिए। इसका

[05:19:58] उपयोग आरबीआई, एसडीएफ और एमएसएफ के रूप

[05:20:00] में भी करते हैं। आरबीआई ने भी ऐसा उधार

[05:20:02] दिया या आपस में भी कर सकते हैं। उसको कॉल

[05:20:04] मनी कहेंगे। एक दिन के लिए जो उधारी ली

[05:20:07] जाती है उसको कॉल मनी कहते हैं। 2 से 14

[05:20:10] दिन के लिए उधार लिया जाए तो उसको नोटिस

[05:20:12] मनी कहते हैं। और 15 दिन से एक साल के लिए

[05:20:15] लिया जाए तो वो टर्म मनी कहलाता है। और

[05:20:17] टर्म मनी में कई प्रकार के सर्टिफिकेट ऑफ

[05:20:19] डिपॉजिट और बाकी चीजें आती हैं।

[05:20:23] ओवर दी काउंटर। ओवर दी काउंटर। जैसे मैंने

[05:20:26] आपको बताया कि स्टॉक एक्सचेंज जो होते हैं

[05:20:29] वो एक प्रकार से जगह है जहां से शेयर

[05:20:32] मार्केट से शेयरों की खरीद बिक्री होती

[05:20:34] है। देखेंगे हम शेयर क्या होते हैं। लेकिन

[05:20:36] जनरली ओवर द काउंटर में ऐसा कोई मार्केट

[05:20:39] नहीं होता है। बल्कि बस फोन कॉल पर बातचीत

[05:20:42] की जाती है। मेल कर दिया जाता है और इस

[05:20:45] डिजिटल माध्यम से ही लेनदेन किया जाता है।

[05:20:48] डिजिटल माध्यम से ओवर द काउंटर बाजार एक

[05:20:51] डिसेंट्रलाइज बाजार है। साहब बिना किसी

[05:20:53] एक्सचेंज की निगरानी के सीधे दो पक्ष के

[05:20:55] बीच में लेनदेन होता है। इसमें कोई थर्ड

[05:20:58] पार्टी नहीं होती है। क्रेता विक्रेता

[05:20:59] सीधे बातचीत कर लेते हैं। कोई फिजिकल जगह

[05:21:02] नहीं होती। सब इलेक्ट्रॉनिक डिजिटलाइजेशन

[05:21:04] होता है। 24 से ये चलता रहता है।

[05:21:08] ओवर दी काउंटर

[05:21:12] कोटराइज बोरोइंग एंड लेंडिंग ऑब्लिगेशन।

[05:21:14] सीबीएलओ से तात्पर्य उधार लेने वाला और

[05:21:16] उधार देने वाला दोनों अपनी-अपनी

[05:21:18] जिम्मेदारी का पालन करेंगे। एक प्रकार से

[05:21:20] दोनों एक जिम्मेदारी पूर्वक काम करते हैं।

[05:21:23] इसको कहते हैं कि भ एक प्रकार से इंटर

[05:21:26] बैंक कॉल मनी मार्केट का उपयोग करके

[05:21:28] प्रतिबंधित लोगों को अल्पकालिक मुद्रा

[05:21:30] बाजार में भाग लेने की अनुमति देता है?

[05:21:36] भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में

[05:21:38] सपार्श्वकृत उधार लेनदेन संबंधित दायित्व

[05:21:40] निम्नलिखित में से किसके इंस्ट्रूमेंट है?

[05:21:44] तो हम कहेंगे कि मनी मार्केट का

[05:21:45] इंस्ट्रूमेंट है यह।

[05:21:48] मनी मार्केट में इसको यूज किया जाता है।

[05:21:52] फिर मुद्रा बाजार में सुधारों के लिए दो

[05:21:54] कमेटियां बनी थी। सुखमय चक्रवर्ती कमेटी

[05:21:57] बहुत पुरानी और नरसिमम कमेटी ने भी

[05:21:58] रिकमेंडेशन दिए थे।

[05:22:02] दूसरा बाजार है कैपिटल मार्केट।

[05:22:07] कंप्लीट

[05:22:09] दूसरा बाजार है कैपिटल मार्केट। कंप्लीट

[05:22:09] कर ले या ब्रेक ले बता दीजिए।

[05:22:20] क्योंकि अब यहां से शेयर मार्केट की हम

[05:22:22] बातचीत करेंगे।

[05:22:28] अब यहां से शेयर मार्केट के बारे में

[05:22:30] बातचीत करेंगे।

[05:22:43] ठीक है।

[05:22:45] थोड़ा बड़ा है कैपिटल मार्केट पूरा एक बच

[05:22:48] सकता है फिर ठीक है तो ब्रेक है अभी

[05:22:54] [हंसी]

[05:22:58] 12:30 बजे पुनः मुलाकात करते हैं हम लोग

[06:02:24] रिफ्रेश कर दीजिएगा।

[06:02:26] [गला साफ़ करने की आवाज़]

[06:02:27] तो अब हम बात करने जा रहे हैं कैपिटल

[06:02:29] मार्केट के बारे में। कैपिटल मार्केट

[06:02:32] वास्तविक रूप में जो हमारा फाइनेंशियल

[06:02:35] मार्केट होता है उसका दीर्घकालिक अवधि का

[06:02:39] मार्केट है। क्या इसका मतलब यह नहीं कि

[06:02:41] शेयर खरीदने के बाद एक साल के बाद ही बेच

[06:02:43] सकते हैं। ऐसा नहीं होता है। पर जनरली आप

[06:02:45] उसे एक साल से ज्यादा समय के लिए रख सकते

[06:02:48] हैं। लेकिन जो मनी मार्केट था उसमें हम

[06:02:50] पैसा एक साल से ज्यादा के लिए नहीं रख

[06:02:53] सकते हैं। कैपिटल मार्केट में सबसे

[06:02:55] महत्वपूर्ण होते हैं कि आम नागरिक भी

[06:02:58] पार्टिसिपेंट होते हैं और यह बहुत ही

[06:03:00] ज्यादा ऑर्गेनाइज सेक्टर होता है।

[06:03:04] इसमें सरकार भी पार्टिसिपेट करती है। आम

[06:03:07] नागरिक भी पार्टिसिपेंट करते हैं। आइए

[06:03:09] देखते हैं कैपिटल मार्केट और उससे जुड़ी

[06:03:11] हुई सारी बातें।

[06:03:14] ऐसा वित्तीय बाजार जहां पर 1 वर्ष से अधिक

[06:03:17] की दीर्घकालिक वित्तीय प्रतिभूतियां।

[06:03:19] प्रतिभूतियों का मतलब होता है फाइनेंशियल

[06:03:21] इंस्ट्रूमेंट। डिबेंचर शेयर की क्रय

[06:03:24] विक्रय होता है। एक वर्ष से ज्यादा समय के

[06:03:27] लिए हम जनरली खरीद बिक्री की बातचीत करते

[06:03:30] हैं।

[06:03:32] वे सभी प्रतिभागी

[06:03:33] [गला साफ़ करने की आवाज़]

[06:03:34] जो बाजार मुद्रा बाजार में थे वो यहां पर

[06:03:36] भी है। लेकिन एक आम नागरिक भी इसमें

[06:03:38] रहेगा। इसके अलावा एक आम नागरिक भी रहेगा।

[06:03:41] पूरी तरह से ऑर्गेनाइज्ड है। सिक्योरिटी

[06:03:44] थोड़ी सी कम रहती है। लिक्विडिटी थोड़ी सी

[06:03:46] कम रहती है। लेकिन रिटर्न की उम्मीद

[06:03:48] ज्यादा रखी जाती है। मनी मार्केट इज ए

[06:03:51] मार्केट फॉर शॉर्ट टर्म फंड्स। द

[06:03:53] मैच्योरिटी ऑफ दिस इंस्ट्रूमेंट। जो भी

[06:03:56] इसमें यूज किए जाने वाले होते हैं, वह 1

[06:03:58] दिन से लेकर 12 महीने के होते हैं। यहां

[06:04:00] 12 महीने से ज्यादा के लिए होते हैं।

[06:04:03] इंस्ट्रूमेंट दैट आर डील इन मनी मार्केट

[06:04:05] आर मेनली ट्रेजरी बिल, कमर्शियल पेपर,

[06:04:08] सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट या शेयर, डिबेंचर,

[06:04:11] गवर्नमेंट बॉन्ड सब यूज़ होते हैं।

[06:04:14] अगर हम बातचीत करें तो जो मनी मार्केट

[06:04:17] होता है, इसका कोई लोकेशन नहीं होता। इसका

[06:04:19] बकायदा स्टॉक एक्सचेंज में सारी चीजें

[06:04:21] होती है और काउंटर ऑफ द जो होता है उसके

[06:04:25] माध्यम से भी मतलब फोन कॉल के माध्यम से

[06:04:28] भी चीजें होती है। मुद्रा बाजार के सभी

[06:04:30] प्रतिभागियों के साथ-साथ आम नागरिक भी

[06:04:33] इसमें पार्टिसिपेंट होता है। बूंजी बाजार

[06:04:35] में सरकार की तरफ से आरबीआई जीरो कूपन

[06:04:38] बॉन्ड और डेटेड सिक्योरिटी जारी करती है।

[06:04:41] वर्तमान में केंद्र और राज्य सरकारों के

[06:04:43] अलावा नगर निगम भी बॉन्ड जारी करने लग गए

[06:04:46] हैं। यह राज्य सरकारों के लिए भी अवेलेबल

[06:04:49] रहते हैं बॉन्ड। कुछ वैश्विक संस्थाएं

[06:04:51] भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर को बेटर करने के

[06:04:53] लिए भी जैसे वर्ल्ड बैंक ने भी कुछ बॉन्ड

[06:04:56] जारी किए हैं इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए।

[06:05:00] इसमें बॉन्ड खरीद बिक्री होते हैं। शेयरों

[06:05:02] की खरीद बिक्री होती है। डिबेंचर्स की

[06:05:04] खरीद बिक्री होती है। म्यूच्यूल फंड्स,

[06:05:07] डेरिवेटिव, एक्सचेंज ट्रेडेड फंड। ये नए

[06:05:10] प्रकार के म्यूचल फंड जैसे काम करते हैं।

[06:05:13] एक्सचेंज ट्रेडेड फंड ईटीएफ कहते हैं हम

[06:05:16] इनको। यह ऐसे ऋण पत्र होते हैं जो सरकार

[06:05:18] अथवा सरकारी संस्था अथवा बड़ी वित्तीय

[06:05:21] संस्थानों के द्वारा जारी किए जाते हैं।

[06:05:23] सरकार के द्वारा जीरो कूपन बॉन्ड

[06:05:25] गवर्नमेंट सिक्योरिटी जारी की जाती है। तो

[06:05:27] नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया के द्वारा

[06:05:29] दिल्ली मुंबई एक्सप्रेस परियोजना के लिए

[06:05:32] ग्रीन बॉन्ड जारी किए गए हैं। बॉन्ड का

[06:05:35] मतलब लंबे समय के बाद हम पैसा लौटाएंगे।

[06:05:38] ऋण पत्र है मतलब ब्याज आपको दिया जाएगा या

[06:05:42] फिर डिस्काउंट दिया जाएगा। फिर हम लंबे

[06:05:44] समय के बाद पैसा लौटाते हैं।

[06:05:47] कूपन का मतलब मैंने आपको कहा था ब्याज का

[06:05:49] एक कूपन होता था। अगर कहीं पर ब्याज नहीं

[06:05:52] डिस्काउंट में मिलेगा तो जीरो कूपन कह

[06:05:54] सकते हैं। एक ऋण निवेश जो ब्याज नहीं देता

[06:05:57] है। इसमें अंकित मूल्य पर छूट मिलती है।

[06:05:59] जैसे ट्रेजरी बिल होते थे। अल्पकालिक में

[06:06:01] दीर्घकालिक के लिए जीरो कूपन बॉन्ड होते

[06:06:03] हैं। बस टाइमिंग का डिफरेंस होता है। यहां

[06:06:06] पर एक साल से ज्यादा के समय के बाद मिलेगा

[06:06:08] और ठीक-ठाक पैसे की कमाई हो जाती है। खरीद

[06:06:11] मूल्य और अंकित मूल्य के बीच का अंतर

[06:06:13] निवेशक का लाभ होता है। फिर डेटेड

[06:06:16] सिक्योरिटीज जिनको गिल्ट एजेट सिक्योरिटीज

[06:06:19] भी कहते हैं। ऐसी प्रतिभूतियां जो एक

[06:06:21] निश्चित अथवा फ्लोटिंग ब्याज दर होता है।

[06:06:23] मतलब एक प्रकार से हो सकता है कि ब्याज दर

[06:06:25] बदलता रहे समय के साथ या फिर हो सकता है

[06:06:28] फिक्स्ड इंटरेस्ट रेट रहे। पर इसमें कूपन

[06:06:31] मिलेंगे आपको बकायदा आपको इंटरेस्ट की

[06:06:33] कमाई होगी। जितने की है उतने की खरीदी और

[06:06:35] बेची जाएगी।

[06:06:38] भुगतान अंकित मूल्य पर अर्धवार्षिक आधार

[06:06:40] पर किया जाता है। सामान्यतः 5 वर्ष से

[06:06:43] लेकर 40 वर्ष तक के लिए इनका टेन्योर होता

[06:06:46] है। भारत सरकार की ओर से आरबीआई राज्य

[06:06:49] सरकार के बाजार उधार प्रोग्राम के एक भाग

[06:06:51] के रूप में नीलामी की जाती है। राज्य

[06:06:53] सरकारें भी इसमें पैसों की मांग करती है।

[06:06:55] यहां तक कि लोकल बॉडीज भी इन प्रतिभूतियों

[06:06:58] की गणना बैंकों द्वारा एसएलआर बनाए रखने

[06:07:00] के लिए की जाती है। मतलब एसएलआर के लिए वह

[06:07:02] खरीद बेचते रह सकते हैं। भारत में केंद्र

[06:07:05] सरकार ट्रेजरी बिल बॉन्ड या दिनांकित

[06:07:07] प्रतिभूतियां दोनों जारी कर सकती है। जबकि

[06:07:09] राज्य सरकार केवल बॉन्ड या डेटेड

[06:07:12] सिक्योरिटी जारी कर सकते हैं। राज्य विकास

[06:07:15] निगम राज्य विकास ऋण इसको कहते हैं।

[06:07:18] सरकारी प्रतिभूतियों में व्यवहारिक रूप से

[06:07:20] डिफॉल्टर का रिस्क नहीं होता है। क्योंकि

[06:07:22] सरकार कभी ना कभी पैसा तो चुकाएगी। इसलिए

[06:07:24] डिफॉल्टर होने की कोई बातचीत नहीं रहती

[06:07:26] है। जैसे सरकार ने इनफ्लेशन इंडेक्ट

[06:07:30] इंडेक्सेस बॉन्ड लाया था। मुद्रास्फीति

[06:07:33] अनुक्रमित बंद पत्र लाए थे। यह क्या थे?

[06:07:38] मुद्रास्फीति के स्तर से प्रभावित हुए

[06:07:41] बिना नियत रिटर्न प्रदान करना और निवेशक

[06:07:43] को माइक्रोइकोनॉमिक रिस्क के विरुद्ध

[06:07:45] सुरक्षा देना। आईआईबी निवेशकों को मतलब जो

[06:07:49] भी उसको खरीदेगा उसको निवेशक कहते हैं।

[06:07:52] मुद्रास्फीति से बचाने में मदद करने के

[06:07:54] लिए डिजाइन किए गए। इनकी सबसे बड़ी

[06:07:56] विशेषता थी कि इसमें निवेशक को

[06:07:57] मुद्रास्फीति के संबंध में कोई चिंता नहीं

[06:07:59] होगी क्योंकि इसमें मूलधन और ब्याज भुगतान

[06:08:02] मुद्रास्फीति की दर के साथ बढ़ता और घटता

[06:08:05] है। इसका मतलब यह है कि अगर महंगाई है तो

[06:08:07] इंटरेस्ट रेट ज्यादा मिलेगा। कम है तो

[06:08:09] इंटरेस्ट रेट कम मिलेगा। सरकारी

[06:08:11] प्रतिभूतियों के रूप में आईआईबी तरलता के

[06:08:14] लिए पात्र माने जाते हैं। न्यूनतम निवेश

[06:08:16] राशि ₹5000 या उसके मल्टीप्लाई में होते

[06:08:19] हैं। व्यक्तिगत निवेश निवेशक प्रतिवर्ष ₹1

[06:08:21] लाख तक जबकि इंस्टीट्यूशन जो होते हैं वह

[06:08:24] ₹25 लाख तक बैंक हो गई, नॉन बैंकिंग

[06:08:26] फाइनेंशियल कंपनियां हो गई। आईआईबी के

[06:08:29] संदर्भ में ऋण ऋण लेते समय अंकित मूल्य

[06:08:31] अर्थात कूपन दरों को कम या अधिक किया भी

[06:08:33] जा सकता है। मतलब डिस्काउंट भी दिया जा

[06:08:35] सकता है।

[06:08:38] 1997 में इस तरीके के लाए गए थे। अब इसको

[06:08:41] थोड़ा सा और बेटर किया गया है। सीआईबी ने

[06:08:45] सीआईबी ने मुद्रास्फीति सुरक्षा केवल

[06:08:47] मूलधन पर दी थी। ब्याज भुगतान पर नहीं।

[06:08:50] यद्यपि आईआईबी मूलधन और ब्याज भुगतान

[06:08:52] दोनों पर मुद्रास्फीति से सुरक्षा प्रदान

[06:08:54] करते हैं। यदि आईआईबी द्वितीयक बाजारों

[06:08:56] में बेचे जाते हैं और लाभ कमाया जाता है

[06:08:59] तो पूंजीगत लाभ कर देना पड़ता है। इसका

[06:09:01] मतलब हुआ कि यदि कोई व्यक्ति आईआईबी

[06:09:04] खरीदने के बाद उसे पुनः बेचता है या फिर

[06:09:06] आईआईबी से जो लाभ कमाया जाएगा उस पर आपको

[06:09:09] टैक्स तो देना ही पड़ेगा। कैपिटल गेन

[06:09:11] टैक्स देना पड़ता है। मुद्रास्फीति सहलग्न

[06:09:14] बॉन्ड जिसको इनफ्लेशन इंडेक्सेस बॉन्ड

[06:09:17] कहते हैं। सरकार के अपने ऋण ग्रहण पर कूपन

[06:09:20] दरों को कम कर सकती है। डिस्काउंट दे सकती

[06:09:23] है। आईआईबी निवेशक को मुद्रास्फीति के

[06:09:26] बारे में अनिश्चितता से सुरक्षा देता है।

[06:09:28] आईआईबी पर प्राप्त ब्याज साथ ही पूंजीगत

[06:09:30] लाभ कर योग्य नहीं होते। तो कर योग्य होते

[06:09:33] हैं। कैपिटल गेन टैक्स देना पड़ता है।

[06:09:35] मतलब आंसर आएगा केवल पहला और दूसरा।

[06:09:39] फिर है सोवेरियन गोल्ड बंड 2015 में

[06:09:42] केंद्रीय वित्त मंत्रालय के द्वारा लाया

[06:09:44] गया था स्वर्ण बंड सरकारी प्रतिभूति

[06:09:47] अधिनियम 2006 के तहत आरबीआई भारत सरकार के

[06:09:50] स्टॉक के रूप में आरबीआई यहां काम करेगी

[06:09:52] जो भी गोल्ड की बात हो रही है बॉन्ड की

[06:09:55] परिपक्वता अवधि 8 वर्ष पांचव छठवें और

[06:09:58] सातवें वर्ष में इससे बाहर निकलने का

[06:09:59] अनुमति रहेगा मतलब लॉकिंग पीरियड 5 साल का

[06:10:02] है ब्याज की दर 2ाई% होगी ब्या का उपयोग

[06:10:05] ऋण के लिए गारंटी के रूप में किया जा सकता

[06:10:07] है योजना के तहत न्यूनतम 1 ग्राम और

[06:10:09] अधिकतम 500 ग्राम सोने के मूल्य का बॉन्ड

[06:10:12] खरीदा जा सकता है। जैसे हमारे देश में कई

[06:10:15] सारे लोग सोना निवेश के रूप में खरीदते

[06:10:18] हैं कि चलो भाई भविष्य में रिस्क आएगा तो

[06:10:20] संकट के समय में हम सोना खरीद लेंगे। अब

[06:10:23] हमारे देश में सोना हमें आयात करना पड़ता

[06:10:25] है। तो सरकार एक बॉन्ड लेकर आई थी कि ठीक

[06:10:28] है भाई सोना मत खरीदो। सोने की जगह पर

[06:10:30] आपको कितना सोना खरीदना है? मान लीजिए

[06:10:32] किसी आदमी ने कहा कि मुझे 10 ग्राम का

[06:10:34] सोना खरीदना है। अब 10 ग्राम का सोना

[06:10:36] कितने का हो गया? मान लीजिए कि 10 ग्राम

[06:10:38] का सोना ₹1.5 लाख का है तो ₹1.5 लाख वह

[06:10:42] सरकार को देगा। सरकार एक कागज पर लिखकर दे

[06:10:44] देगी कि भाई साहब ने इस रेट से 10 ग्राम

[06:10:47] का सोना हमसे खरीदा है।

[06:10:50] फिर 5 साल के बाद अब सोने का जो भी भाव

[06:10:52] होगा जो भी भाव होगा उस करंट प्राइस पर

[06:10:56] आपको रिटर्न मिलेगा। मतलब अगर भाव बढ़ गया

[06:10:58] है तो वह एक नई कीमत मिलेगी। साथ ही साथ

[06:11:01] ढाई साल के [गला साफ़ करने की आवाज़]

[06:11:01] ब्याज के हिसाब से भी एक्स्ट्रा पैसा

[06:11:03] मिलेगा। इसका मतलब सरकार का दोहरा फायदा

[06:11:06] हुआ। एक तो सोने का आयात भी कम हो जाएगा

[06:11:09] और दूसरा सरकार को नकदी भी मिल जाएगी। साथ

[06:11:13] ही साथ जनता का भी फायदा हुआ क्योंकि जब

[06:11:15] वो सोना खरीदता है तो बनाने का खर्चा कई

[06:11:17] सारी चीजें का खर्चा देना पड़ता है। यहां

[06:11:20] कुछ भी नहीं रखेंगे। तो जनता को भी सोने

[06:11:23] के बराबर का इन्वेस्टमेंट करने का मौका

[06:11:25] मिल गया। यह काफी सफल भी हुआ। शुरुआत में

[06:11:28] तो जब सोना सस्ता था तो लोगों ने खरीद

[06:11:30] लिया और अब सरकार ने इसको इसलिए रुकवा

[06:11:32] दिया क्योंकि इतनी कीमत ज्यादा बढ़ गई

[06:11:34] सोने की कि सरकार के लिए तकलीफदायक हो

[06:11:37] सकता है। तो 1 ग्राम से लेकर 500 ग्राम तक

[06:11:40] के बॉन्ड जारी किए जा सकते हैं। मंदिर तथा

[06:11:43] घरों में जमा गोल्ड की विशाल मात्रा को

[06:11:45] उत्पादन कार्य में लगाना। इसका एक और

[06:11:47] लक्ष्य था। यदि किसी व्यक्ति के पास अपने

[06:11:49] घर में सोना है तो सोने के एवज में भी

[06:11:53] नकदी प्राप्त की जा सकती है।

[06:11:56] फिर आया ग्रीन बॉन्ड। ग्रीन बॉन्ड का

[06:11:58] सिंपल सा मतलब यह है कि जब हम पर्यावरणीय

[06:12:01] कामों के लिए निवेशक से प्राप्त पैसों का

[06:12:03] उपयोग करेंगे। हमारे देश में वर्तमान में

[06:12:06] एनवायरमेंट के लिए कई सारे बॉन्ड जारी किए

[06:12:08] गए हैं। जिसको ग्रीन बॉन्ड के रूप में हम

[06:12:10] जानते हैं। ग्रीन बॉन्ड आर फिक्स्ड इनकम

[06:12:13] फाइनेंशियल

[06:12:14] इंस्ट्रूमेंट इशूड बाय इशू टू फंड

[06:12:17] प्रोजेक्ट विद ए नेचुरली पॉजिटिव इंपैक्ट

[06:12:20] ऑन द एनवायरमेंट एंड क्लाइमेट चेंज।

[06:12:24] अच्छा काम है इसलिए लोग आगे आएंगे।

[06:12:26] सिग्निफिकेंट कैपिटल मिल पाएगा। ऐसे कामों

[06:12:28] के लिए फॉरेन इन्वेस्टमेंट अट्रैक्ट हो

[06:12:30] पाएगा। ग्रीन बॉन्ड से प्राप्त आय का

[06:12:33] उपयोग जीवाश्म ईंधन के निष्कर्षण उत्पादन

[06:12:35] वितरण के लिए जहां मुख्य ऊर्जा स्त्रोत

[06:12:37] जीवाश्म ईंधन होता है के साथ-साथ परमाणु

[06:12:40] ऊर्जा परियोजना के लिए नहीं किया जा सकता।

[06:12:43] मतलब इसको छोड़कर करिए आप और भारत सरकार

[06:12:46] के द्वारा सोवेन ग्रीन बॉन्ड में विदेशी

[06:12:48] निवेश पर कोई बैंड नहीं है। सोवेयन ग्रीन

[06:12:50] बॉन्ड पूरी तरह से सुलभ मार्ग के तहत

[06:12:52] निर्दिष्ट प्रतिभूतियों के रूप में खरीदा

[06:12:55] जा सकता है। हमारे देश में इसको रेपो रेट

[06:12:58] के लिए या रेपो के तहत पैसा अगर आपको लोन

[06:13:01] के रूप में चाहिए बैंकों को बैंक आरबीआई

[06:13:04] से तब इसको यूज़ कर सकते हैं।

[06:13:07] नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने दिल्ली

[06:13:10] मुंबई एक्सप्रेस परियोजना पर पर्यावरणुकूल

[06:13:12] उपायों को लागू करने के लिए ₹1000 करोड़

[06:13:14] के सोवेन ग्रीन बॉन्ड को जारी किया है।

[06:13:17] इन्वेस्टर इन्वेस्ट करेंगे। पैसा ब्याज

[06:13:19] मिलेगा उन लोगों को। नगर निगम बॉन्ड

[06:13:22] सरकारी सरकारी या अर्ध सरकारी संस्था

[06:13:25] द्वारा जारी ऋण प्रतिभूतियां जिन्हें

[06:13:27] नागरिक परियोजनाओं के लिए धन की आवश्यकता

[06:13:29] होती है। सबसे पहले अहमदाबाद नगर निगम ने

[06:13:32] इस तरीके का ऑफरिंग लाया था। 2023 में

[06:13:34] बेंगलुरु ने लाया है। कई लोग लेकर आ चुके

[06:13:36] हैं। इंदौर, सूरत ऐसे कई सारे नगर निगम

[06:13:40] हैं। सोशल बॉन्ड एक प्रकार का वित्तीय

[06:13:42] साधन या निवेश माध्यम है जो सरकारों,

[06:13:44] कंपनियों और संगठनों द्वारा किसी विशिष्ट

[06:13:46] सामाजिक या पर्यावरणीय उद्देश्य वाली

[06:13:49] परियोजना या पहलों के लिए पूंजी जुटाने के

[06:13:51] लिए जारी किया जाता है। मतलब कोई सामाजिक

[06:13:53] परियोजना हो कि भारत सरकार के सभी स्कूलों

[06:13:56] में हम पेयजल का प्रबंध करना चाहते हैं तो

[06:13:58] उसके लिए सरकार को ₹700 करोड़ की जरूरत है

[06:14:01] या ₹7000 करोड़ की जरूरत है। तो जनता उसको

[06:14:03] खरीदेगी बॉन्ड को पैसा मिलेगा सर जनता को

[06:14:06] पैसा रिटर्न भी मिलता है ब्याज भी मिलता

[06:14:08] है ऐसा नहीं है कि कोई दान दिया जा रहा है

[06:14:10] बॉन्ड में

[06:14:15] इसी वर्ष नाबार्ड द्वारा देश का पहला

[06:14:17] सामाजिक बॉन्ड शेयर बाजार बीएसई में

[06:14:20] सूचीबद्ध किया गया नाबार्ड द्वारा

[06:14:22] आधिकारिक बयान के अनुसार यह देश में

[06:14:24] नाबार्ड का पहला बाहरी रूप से प्रमाणित

[06:14:26] ट्रिपल ए रेटेड सामाजिक बॉन्ड है। क्रिसिल

[06:14:28] और इरा के द्वारा इसे ट्रिपल ए रेटिंग दी

[06:14:31] गई थी। फिर आया मसाला बॉन्ड। मसाला बॉन्ड

[06:14:33] भारत के बाहर की बॉन्ड है जो एक्चुअल में

[06:14:36] विदेशी मुद्रा की बजाय भारतीय मुद्रा में

[06:14:38] निर्दिष्ट किया जाता है। मसाला बॉन्ड रुपए

[06:14:40] में अंकित बॉन्ड होते हैं। मसाला बॉन्ड का

[06:14:43] उद्देश्य भारत में बुनियादी ढांचा

[06:14:44] परियोजनाओं को वित्त पोषित करना।

[06:14:46] इंफ्रास्ट्रक्चर को बेटर करने के लिए

[06:14:49] मसाला नाम इसलिए रखा गया क्योंकि भारतीय

[06:14:51] मसालों की अपनी एक पहचान है। इस कारण से

[06:14:53] इसका नाम मसाला बॉन्ड रखा गया। इसका

[06:14:55] बेनिफिट यह होगा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर

[06:14:58] भारतीय करेंसी भारतीय रुपए की पहचान

[06:15:00] बढ़ेगी।

[06:15:02] 2019 में केरल लंदन स्टॉक एक्सचेंज पर

[06:15:04] ₹2150 करोड़ के मसाला बॉन्ड जारी करने

[06:15:07] वाला पहला भारतीय राज्य बन गया। सार्वजनिक

[06:15:10] क्षेत्र के केरल इंफ्रास्ट्रक्चर

[06:15:11] इन्वेस्टमेंट फंड बोर्ड ने विदेशी बाजार

[06:15:13] में धन जुटाने के लिए बॉन्ड जारी किए थे।

[06:15:15] मतलब सरकारों की अनुमति से यह बॉन्ड जारी

[06:15:18] करेंगे राज्य सरकारें। 2019 में केरल

[06:15:21] इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट फंड के

[06:15:23] द्वारा मसाला बॉन्ड जारी करने वाला पहला

[06:15:25] राज्य बना।

[06:15:28] फिर है सोवेरियन ब्लू बॉन्ड। सेशल्स

[06:15:31] गणराज्य ने संधारणीय समुद्री और मछली पालन

[06:15:33] परियोजनाओं को समर्थन देने के लिए ब्लू

[06:15:36] बॉन्ड जारी किया। अब सेशल जैसा देश मछली

[06:15:39] उत्पादन के लिए जाना जाता है तो उसने ब्लू

[06:15:41] बॉन्ड लाया है। ऐसे अलग-अलग देशों ने

[06:15:43] अलग-अलग बॉन्ड लाए हैं। फिर होता है शेयर।

[06:15:46] शेयर क्या होता है? इसे समझ लेते हैं। एक

[06:15:49] व्यक्ति के पास मान लीजिए ध्यान से सुनना।

[06:15:52] एक व्यक्ति के पास मान लीजिए कि 10 एकड़

[06:15:54] जमीन है। 10 एकड़ जमीन कोई एक व्यक्ति

[06:15:58] खरीद नहीं पा रहा है। तो उस व्यक्ति ने

[06:16:00] क्या किया? जमीन पर छोटे-छोटे प्लॉट बना

[06:16:02] दिए। हजार स्क्वायर फीट के प्लॉट बना दिए।

[06:16:06] जमीन पर कई सारे और उन प्लॉट को बेचा गया।

[06:16:09] तो जब उन जमीन के प्लॉट को बेचा गया तो

[06:16:12] जमीन का एक हिस्सा मात्र है जिसको हम

[06:16:15] अंग्रेजी में जमीन का शेयर कहेंगे। तो ठीक

[06:16:18] ऐसा ही कोई जब व्यक्ति कंपनी खोलना चाहता

[06:16:21] है ध्यान से देखना।

[06:16:24] मान लीजिए मैं ₹100 करोड़ का भारत में एक

[06:16:29] एजुकेशन सिस्टम में स्कूल एजुकेशन में

[06:16:33] प्रवेश करना चाहता हूं। मुझे ₹100 करोड़

[06:16:35] चाहिए। तो पहला तो विकल्प यह कि मैं अपने

[06:16:38] जेब के 100 करोड़ लगाऊं। एक अच्छा

[06:16:40] बिजनेसमैन कभी भी ऐसा नहीं करेगा कि अपने

[06:16:42] पैसे लगाएगा। थोड़ा-बड़ा हिस्सा लेगा वो

[06:16:45] लेकिन पूरा पैसा अपना कभी नहीं लगाता है।

[06:16:48] दूसरा विकल्प यह है कि मैं बैंक से लोन

[06:16:50] लेने के लिए जाऊं। बैंक से लोन लेने के

[06:16:53] लिए जाऊं। तीसरा विकल्प यह है कि मैं कुछ

[06:16:56] बड़े-बड़े अमीर लोगों को जानता हूं। अडानी

[06:16:59] अंबानी उनके साथ मेरे रिश्ते हैं। मान

[06:17:01] लीजिए तो मैंने उनसे बातचीत की कि भ आप

[06:17:03] इन्वेस्टमेंट करिए पार्टनरशिप के रूप में

[06:17:05] 50% पार्टनरशिप आपकी रहेगी। उन्होंने कहा

[06:17:08] कि हमारे ऑलरेडी स्कूल चल रहे हैं। हम नया

[06:17:10] क्यों करेंगे? तो उन्होंने भी मना कर

[06:17:12] दिया। फिर चौथा तरीका मेरे पास यह है कि

[06:17:15] अगर मैं चाहूं तो अपने विदेशी व्यक्ति से

[06:17:18] बातचीत मित्र से बातचीत कर सकता हूं। उनसे

[06:17:20] कह सकता हूं कि आप एफडीआई के तहत या

[06:17:22] इन्वेस्टमेंट करो। बहुत मुनाफा है आज के

[06:17:24] जमाने में भारत में पढ़ाई लिखाई में।

[06:17:28] मान लीजिए उन्होंने मना कर दिया। पांचवा

[06:17:31] तरीका फिर यह है कि मैं क्या करूंगा कि

[06:17:33] कंपनी का गठन करूंगा और उस 100 करोड़ को

[06:17:37] ₹100 करोड़ को एक करोड़ में तोड़ दूंगा।

[06:17:41] एक करोड़ में टुकड़ों में बांट दूंगा। एक

[06:17:43] करोड़ टुकड़े में जो एक टुकड़ा है उसका

[06:17:46] नाम होगा शेयर। उसकी कीमत हो गई ₹100।

[06:17:49] उसकी कीमत कितनी हो गई? ₹100। अब मैं इस

[06:17:52] शेयर को मार्केट में बेचने के लिए

[06:17:54] निकालूंगा। जो व्यक्ति ₹100 देगा उसे एक

[06:17:57] शेयर मिल जाएगा। जो व्यक्ति ₹200 देगा उसे

[06:18:00] दो शेयर मिल जाएगा। जितना उसका हिस्सा

[06:18:03] रहेगा उतना भविष्य में प्रॉफिट जब कमा

[06:18:06] होगा। मान लीजिए 100 करोड़ पर मैंने ₹1

[06:18:08] करोड़ की कमाई की तो हर एक शेयर होल्डर को

[06:18:11] ₹1 एक मिल जाएगा। क्योंकि 1 करोड़ शेयर थे

[06:18:14] तो हर एक व्यक्ति को ₹1 का मुनाफा दे

[06:18:16] दूंगा मैं। किसी के पास 100 शेयर थे तो

[06:18:19] उसे ₹100 का मुनाफा मिल जाएगा। किसी के

[06:18:21] पास 1000 शेयर थे तो उसे ₹1000 का मुनाफा

[06:18:24] मिल जाएगा। इसी तरीके से

[06:18:27] साथ ही साथ इसी तरीके से फायदा क्या होगा

[06:18:30] कि मुझे पैसा भी मिल गया। जनता को मालिक

[06:18:33] भी बना दिया। जो भी शेयर होल्डर्स है उनको

[06:18:36] भी जो डायरेक्टर बोर्ड रहेगा उनका एक

[06:18:38] व्यक्ति हमेशा रहेगा जो सारी बातचीत

[06:18:41] करेगा। तो शेयर मतलब कंपनी का एक छोटा सा

[06:18:43] हिस्सा एक प्रकार से मालिकाना हक। यदि

[06:18:46] कंपनी डूबती है तो सभी लोग डूबेंगे हम के

[06:18:49] सब के सब भाई क्योंकि सभी मालिक बन गए थे

[06:18:51] तो मालिक तो डूबेंगे अगर कंपनी डूबेगी तो

[06:18:54] लेकिन अगर यहीं पर कंपनी लोन लेती है तो

[06:18:57] कंपनी के डूबने पर भी लोन नहीं छूटता

[06:19:00] [गला साफ़ करने की आवाज़] है। लोन तब भी

[06:19:01] करना पड़ता है। अगर आप मालिक बनना

[06:19:04] चाहते हो तो फिर आपको लॉस भी उठाना पड़

[06:19:06] सकता है।

[06:19:08] ए शेयर इज़ द स्मालेस्ट यूनिट दैट ए कंपनी

[06:19:11] कैन बी डिवाइडेड इंटू व्हेन ए बिज़नेस वांट

[06:19:14] टू रेज़ कैपिटल टू एक्सपेंड इट्स ऑफर ए

[06:19:16] पोर्शन ऑफ इट्स ओनरशिप इन द फॉर्म ऑफ शेयर

[06:19:19] टू इन्वेस्टर द फाउंडर डिसाइडेड व्हाट

[06:19:22] परसेंटेज ऑफ शेयर टू कीप अमोंग देमसेल्व

[06:19:24] एंड हाउ मेनी टू ऑफर इन्वेस्टर्स। सो कुछ

[06:19:27] मात्रा में अपने पास मालिकाना हक रखेगा और

[06:19:30] अधिकतर पैसा वो बेच देगा। अधिकतर शेयर वो

[06:19:33] बेच देगा। शेयरों को व्यापक रूप से दो

[06:19:35] भागों में बांटा जाता है। एक होते हैं

[06:19:37] इक्विटी शेयर। इक्विटी शेयर मतलब जब कंपनी

[06:19:40] को बराबरी में ब्रेक किया जाता है और

[06:19:42] दूसरे होते हैं प्रेफरेंस शेयर। प्रेफरेंस

[06:19:44] शेयर मतलब ऑलरेडी जिनके पास इक्विटी शेयर

[06:19:46] है उन्हें प्रेफरेंस दिया जाता है। इन

[06:19:49] शेयरों की बिक्री आम नागरिकों के लिए दो

[06:19:51] स्थानों पर की जाती है। एक होती है

[06:19:53] प्राइमरी मार्केट और एक होता है सेकेंडरी

[06:19:55] मार्केट। प्राइमरी मार्केट का मतलब होता

[06:19:57] है जब कंपनी नई-नई बनी होगी। इसके लिए कोई

[06:20:00] स्टॉक एक्सचेंज नहीं होता है। यह जनरली

[06:20:02] आपका डायरेक्ट किसी के साथ कांटेक्ट था तो

[06:20:04] जब कंपनी बनी हुई होगी तब आप उसको खरीद

[06:20:07] सकते हैं। जैसे अनअकडमी अभी लिस्टेड नहीं

[06:20:10] है लेकिन मेरे पास Unacademy के शेयर हैं।

[06:20:12] तो जब भविष्य में कंपनी लिस्टेड की जाएगी

[06:20:14] तब जाकर वो सेकेंडरी मार्केट में खरीद

[06:20:17] बिक्री होगी। प्राइमरी मार्केट मतलब जैसी

[06:20:19] नई गाड़ियां खरीदने के लिए एक शोरूम होता

[06:20:21] है वैसे ही प्राइमरी मार्केट के अंतर्गत

[06:20:24] शेयरों की खरीद बिक्री होती है। कई सारी

[06:20:26] वेबसाइट है। कई सारी कंपनियां है जो

[06:20:29] डायरेक्ट ऑफर देती है इन्वेस्टमेंट करने

[06:20:31] का पर वो लिस्टेड नहीं है अभी स्टॉक

[06:20:33] एक्सचेंज में मतलब उसके शेयरों की अभी

[06:20:34] खरीद बिक्री नहीं हो सकती है।

[06:20:38] दूसरा होता है सेकेंडरी मार्केट जहां पर

[06:20:40] पुराने जो ऑलरेडी खरीदे हुए शेयर हैं उसकी

[06:20:43] खरीद बिक्री हो सकती है। इसे न्यू इशू

[06:20:46] मार्केट के नाम से जानते हैं। यहां केवल

[06:20:47] नई प्रतिभूतियां जारी की जाती है जो पहली

[06:20:50] बार जारी होगी। इसमें बाजार में निवेशक,

[06:20:52] बैंक, फाइनेंशियल कंपनियां, इंश्योरेंस

[06:20:54] कंपनियां, म्यूच्यूल फंड और एक पर्सनल आम

[06:20:56] नागरिक भी होते हैं। सेकेंडरी मार्केट

[06:20:59] स्टॉक एक्सचेंज या शेयर बाजार के नाम से

[06:21:01] जानते हैं। बाजार एक निर्देश स्थान पर

[06:21:03] स्थित होते हैं। जैसे भारत में मुंबई में

[06:21:05] नेशनल स्टॉक एक्सचेंज है, बॉम्बे स्टॉक

[06:21:07] एक्सचेंज है। ये बाजार एक निश्चित स्थान

[06:21:10] पर होते हैं जहां पर इनकी खरीद बिक्री

[06:21:11] होती है। अब क्योंकि डिजिटलाइज हो गया।

[06:21:13] पहले तो फिजिकली वहीं पर होता था। अब यहां

[06:21:16] पर घर बैठे भी हम खरीदारी वहां से कर सकते

[06:21:18] हैं। स्टॉक एक्सचेंज या शेयर बाजार और कुछ

[06:21:21] नहीं है। एक मंडी है जहां कंपनी के वो

[06:21:24] छोटे-छोटे टुकड़े हर दिन खरीदे और बेचे

[06:21:26] जाते हैं। कुछ की कीमत ज्यादा बढ़ जाती

[06:21:28] है। कुछ की कीमत गिर जाती है। वो दिन

[06:21:30] प्रतिदिन में चलते रहता है। मतलब कंपनी के

[06:21:33] वो छोटे-छोटे टुकड़े जो ऑलरेडी बेचे गए थे

[06:21:35] उसको फिर से बेचने की प्रोसेस होती है।

[06:21:38] शेयर बाजार सार्वजनिक रूप से कारोबार करने

[06:21:40] वाली कंपनी में इक्विटी शेयर के व्यापार

[06:21:42] हेतु खरीदारी और विक्रेताओं को एक स्थान

[06:21:44] देता है। शेयर बाजार

[06:21:45] [गला साफ़ करने की आवाज़] एक प्रकार से

[06:21:46] फ्रीडम देता है कि भई चलो ठीक है आप अगर

[06:21:48] अपने पास नहीं रखना चाहते किसी और को बेच

[06:21:50] दीजिए सस्ता महंगा जैसा बेच सकते हैं।

[06:21:55] शेयर मार्केट इज ए मार्केट प्लेस वेयर

[06:21:57] बायर एंड सेलर कम टुगेदर टू ट्रेड स्टॉक।

[06:22:00] स्टॉक मार्केट या शेयर मार्केट के रूप में

[06:22:02] हम उसे जानते हैं। हमारे देश का सबसे

[06:22:04] पुराना स्टॉक एक्सचेंज जहां पर ऐसी खरीद

[06:22:06] बिक्री लंबे टाइम से चल रही है। बॉम्बे

[06:22:08] स्टॉक एक्सचेंज बीएसई कहते हैं। 1875 में

[06:22:11] इसकी शुरुआत की गई थी। बीएसई एशिया का

[06:22:14] सबसे पहला एक्सचेंज था। भारत का सबसे बड़ा

[06:22:17] एक प्रकार से प्रतिभूति बाजार है। लेकिन

[06:22:20] वर्तमान में सब मामलों में नेशनल स्टॉक

[06:22:22] एक्सचेंज सबसे बड़ा शेयर मार्केट है भारत

[06:22:25] का। याद रखिएगा। आधार वर्ष 7879 है। उसकी

[06:22:30] तुलना में आज कितना बढ़ा कितना घटा उसको

[06:22:33] देखते हुए याद रखिएगा जो भी शेयर मार्केट

[06:22:35] में ग्रोथ होती है या शेयर मार्केट गिरता

[06:22:38] है पिछले दिन की तुलना में क्या हुआ चेंज

[06:22:41] उसके आधार पर बताया जाता है कि आज शेयर

[06:22:43] मार्केट बढ़ा कि घटा और जो वैल्यू दिखाई

[06:22:47] जा रही है शेयर मार्केट की जैसे हम कहते

[06:22:49] हैं कि इस समय बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज

[06:22:52] 74000 अंक पर है तो ये 74000 का मतलब हुआ

[06:22:56] 7879 की तुलना में इतना गुना बड़ा हो गया

[06:22:59] है।

[06:23:02] इसका [गला साफ़ करने की आवाज़] जो इंडेक्स

[06:23:03] होता है उसको सेंसेक्स कहते हैं। ससेक्स

[06:23:05] और कुछ नहीं। वैसे तो इसमें कई कंपनियां

[06:23:08] है बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में रजिस्टर्ड।

[06:23:10] लेकिन जो टॉप 30 कंपनियां हैं उन कंपनियों

[06:23:13] का जो भी एवरेज एंड कीमतों में आता है उसी

[06:23:17] को कहते हैं ससेक्स। तो ससेक्स मान लो 700

[06:23:19] पॉइंट गिर गया। इसका मतलब हुआ कि ये टॉप

[06:23:22] 30 कंपनियां गिर गई। हो सकता है बाकी बची

[06:23:24] हुई कंपनियों ने बहुत बढ़िया परफॉर्म किया

[06:23:26] होगा। क्या हो सकता है ससेक्स 700 पॉइंट

[06:23:28] बढ़ गया तो ये 330 बड़ी कंपनियों का

[06:23:31] वैल्यू बढ़ गया पर इसका मतलब ये नहीं है

[06:23:33] कि बाकी कंपनियां भी इतनी बड़ी हो सकता है

[06:23:35] बाकी सभी वैल्यू गिर गई होगी तो केवल 30

[06:23:38] कंपनियों का जो वेटेड एवरेज निकाला जाता

[06:23:40] है उसे ससेक्स कहते हैं। सेंसेक्स का मतलब

[06:23:43] होता है 30 टॉप कंपनियों का जो चेंजेस आ

[06:23:46] रहा है एवरेजन उसको बताया जाता है। ऐसे ही

[06:23:49] बीएसई [गला साफ़ करने की आवाज़]

[06:23:50] 100 भी इसी को दर्शाते हैं। 8384 से इसकी

[06:23:53] शुरुआत हुई मतलब एक प्रकार से बेस ईयर

[06:23:55] इसको लेते हुए 1989 में लांच किया गया।

[06:23:58] बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज की जो 100 सबसे

[06:24:00] बड़ी कंपनियां होगी उसके आधार पर इसको

[06:24:02] मापा जाता है। देखा जाता है कितना अंक यह

[06:24:05] बढ़ा कितना अंक घटा है। फिर है नेशनल

[06:24:08] स्टॉक एक्सचेंज। भारतीय बाजार में सबसे

[06:24:10] बड़ा वित्तीय बाजार। याद रखना सब मामलों

[06:24:12] में सबसे बड़ा हो गया। अभी फास्ट भी हो

[06:24:15] गया। कंप्यूटराइज करने वाला भी हो गया।

[06:24:17] मुंबई में ही है यह। हाई पावर्ड स्टडी

[06:24:19] ग्रुप की सिफारिश पार कर गया था। जिसकी

[06:24:21] स्थापना भारत सरकार ने शेयर बाजार में

[06:24:23] भागीदारी को आसान करने के लिए की।

[06:24:25] इलेक्ट्रॉनिक डिजिटलाइजेशन की शुरुआत हुई।

[06:24:28] इंटरनेट ट्रेडिंग शुरुआत हुई 2002 में।

[06:24:30] IDBI इसका प्रमोटर है। मतलब इसका निर्माण

[06:24:33] करने में IDBI का बड़ा रोल रहा है। इसके

[06:24:35] सूचकांक को निफ्टी कहते हैं।

[06:24:40] निफ्टी मतलब इस स्टॉक एक्सचेंज में जो

[06:24:42] कंपनियां रजिस्टर्ड है उसमें 50 कंपनियां

[06:24:45] अधिकतर कंपनियां यहां पर भी और वहां पर भी

[06:24:47] रजिस्टर्ड है। ऐसी कुछ कंपनियां हो सकती

[06:24:49] है जो यहां रजिस्टर्ड है वहां नहीं है। जो

[06:24:51] वहां हो सकती है। यहां नहीं है। ऐसी भी कई

[06:24:54] कंपनियां हैं।

[06:24:56] इसे स्टैंडर्ड एंड पुअर क्रिसिल नेशनल

[06:24:58] एक्सचेंज नेशनल इंडेक्स 50 कहते हैं। 50

[06:25:01] कंपनियों में आने वाला परिवर्तन इसका आधार

[06:25:04] वर्ष 1995 है। तो सेंसेक्स वास्तव में

[06:25:08] मात्र 30 कंपनियों का हिसाब किताब है और

[06:25:12] ससेक्स में जो बेस वैल्यू है वो 100 है।

[06:25:16] निफ्टी का बेस वैल्यू 1000 है। स्टॉक

[06:25:18] एक्सचेंज सेंसिटिविटी इंडेक्स कहते हैं।

[06:25:20] नेशनल स्टॉक एक्सचेंज 50 कहते हैं।

[06:25:24] यह 1978 79 बेस ईयर है। 95 का बेस ईयर

[06:25:29] यहां पर माना गया है।

[06:25:33] यहां पर सेक्टर 13 के आसपास कवर किए थे।

[06:25:35] निफ्टी में लगभग 24 अलग-अलग सेक्टर की

[06:25:38] कंपनियां कवर की गई। यहां पर 30 कंपनियां

[06:25:40] यहां 50 कंपनियों की बातचीत है।

[06:25:45] फिर है न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज अमेरिका

[06:25:47] का जो काफी मतलब पुराना भी है। 1817 में

[06:25:52] इसकी स्थापना हुई थी। लार्जेस्ट स्टॉक

[06:25:55] एक्सचेंज माना जाता है दुनिया का वैल्यू

[06:25:57] के आधार पर। अमेरिका का एक और है नाक

[06:26:00] नेशनल एसोसिएशन ऑफ सिक्योरिटीज डीलर एंड

[06:26:02] ऑटोमेटेड कोटेशन अमेरिका का स्टॉक

[06:26:04] एक्सचेंज है 1971 में बिल्कुल लेटेस्ट

[06:26:07] बनाया गया जैसा हमारा नेशनल स्टॉक

[06:26:08] एक्सचेंज बनाया गया था। दुनिया में दूसरा

[06:26:11] सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज माना जाता है

[06:26:13] कैपिटलाइजेशन के आधार पर। यहां पर Apple,

[06:26:16] Google, Microsoft, Amazon, Intel जैसी

[06:26:18] बड़ी कंपनियां सूचीबद्ध हैं। बुल और बियर।

[06:26:22] ऐसा व्यक्ति जो यह सोचकर शेयर खरीदे कि

[06:26:24] भविष्य में उसकी कीमत बढ़ेगी उसे कहते हैं

[06:26:27] बुल। ऐसा व्यक्ति जो यह सोचकर बेच दे कि

[06:26:30] भविष्य में कीमतें गिरेगी उसे कहते हैं

[06:26:31] बियर।

[06:26:37] बुल और बियर।

[06:26:41] स्टग। स्टक एक ऐसा मतलब स्टक एक्चुअल में

[06:26:45] हिरन की प्रजाति को कहते हैं जो प्राइमरी

[06:26:47] मार्केट में जो किसी ऐसी कंपनी के शेयर

[06:26:50] खरीद रहा हो जो अनलिस्टेड है तो वो तो

[06:26:52] भविष्य में बढ़ेगा उस उम्मीद से नहीं खरीद

[06:26:54] रहा है बल्कि वो इसलिए खरीद रहा है

[06:26:56] क्योंकि कंपनी प्रॉफिट में आएगी तो उसको

[06:26:57] मुनाफा कुछ ना कुछ तो होगा जब कंपनी

[06:27:00] शेयरों को मुनाफा देती है तो उसको

[06:27:02] डिविडेंड कहते हैं लाभांश कहते हैं लाभ का

[06:27:05] अंश लाभांश

[06:27:07] निवेशक शेयरों की कीमत में वृद्धि या

[06:27:09] शेयरों की कीमत में गिरावट की संभावना

[06:27:11] व्यक्त नहीं करता उसे स्टक कहते हैं।

[06:27:13] मार्केट कैपिटलाइजेशन का मतलब होता है कि

[06:27:16] मार्केट में टोटल नंबर ऑफ शेयर कितने हैं

[06:27:18] और उस शेयर की वैल्यू कितनी है? उस दोनों

[06:27:21] का मल्टीप्लिकेशन एम कैप कहलाता है। एम

[06:27:24] कैप का मतलब होता है एक प्रकार से उस

[06:27:26] कंपनी का वैल्यू्यूएशन उस कंपनी की औकात

[06:27:29] उस कंपनी की वैल्यू

[06:27:33] करंट मार्केट प्राइस पर शेयर टोटल नंबर ऑफ

[06:27:36] आउटस्टैंडिंग शेयर मतलब टोटल शेयर कितने

[06:27:39] हैं? इंसाइडर ट्रेडिंग हमारे देश में इसको

[06:27:41] प्रतिबंधित किया गया है। कुछ लोगों को

[06:27:44] कंपनी के वास्तविक कंडीशन के बारे में पता

[06:27:46] होता है। जब उन्हें पता हो जाता है कि

[06:27:48] कंपनी की वास्तविक कंडीशन क्या है? वैसे

[06:27:51] तो बोलते हैं कि प्रतिबंधात्मक है लेकिन

[06:27:53] आपको लगता है क्या प्रैक्टिकली कि मुझे एक

[06:27:55] बात बताना जो व्यक्ति कंपनी के अंदर है

[06:27:57] जिसके शेयर मार्केट में लिस्टेड किए गए

[06:28:00] हैं। अगर उसे पता है कि कंपनी का प्रॉफिट

[06:28:03] बढ़ने वाला है तो क्या वो कंपनी के शेयर

[06:28:05] खरीद के नहीं रखेगा मार्केट में ऑलरेडी?

[06:28:07] तो जनरली हम कहते कि इंसाइडर ट्रेडिंग बंद

[06:28:10] है हमारे देश में। लेकिन इसको पकड़ना बड़ा

[06:28:13] मुश्किल है कि वो इंसाइडर कर रहा था कि

[06:28:15] अपने एनालिसिस से काम कर रहा था।

[06:28:25] मतलब कंपनी के अंदर बैठा हुआ वह व्यक्ति

[06:28:28] जिसको कंपनी की पूरी जानकारी होती है जो

[06:28:31] डायरेक्टर बोर्ड पर होते हैं बड़े-बड़े

[06:28:33] पदों पर होते हैं उन्हें उनके शेयरों की

[06:28:36] खरीद बिक्री से रोकना

[06:28:38] शेयर की पुनरखरीद कभी-कभी कंपनियों के

[06:28:41] शेयर तेजी से गिरने लग जाते हैं तो

[06:28:43] कंपनियां क्या करती कि अपने शेयर की

[06:28:44] वैल्यू्यूएशन को बेटर करने के लिए वापस

[06:28:46] परचेसिंग करती है और रुपए में लौटा देती

[06:28:48] है। जैसे अभी बीच-बीच में Infosys ने पर

[06:28:51] रिपर्चेसिंग किया था शेयरों का

[06:28:56] मतलब उल्टा करना बेचने की जगह खरीदने का

[06:28:59] काम करना। स्टॉक डिविडेंड का मतलब होता है

[06:29:01] अगर आपने शेयर खरीदा तो आपको प्रॉफिट दिया

[06:29:03] जाएगा। जो भी प्रॉफिट कमाया गया होगा। ऐसा

[06:29:06] नहीं कि हर कंपनी प्रॉफिट देती है। कई

[06:29:08] कंपनियां ऐसी जो प्रॉफिट नहीं देती। जैसे

[06:29:10] dमar का जो शेयर है वह dमar वाले ने आज तक

[06:29:13] कभी प्रॉफिट नहीं दिया है।

[06:29:19] प्राइमरी डीलर एक बैंक या अन्य वित्तीय

[06:29:21] संस्थान है जो राष्ट्र राष्ट्रीय सरकार के

[06:29:24] साथ-साथ प्रतिभूतियों का व्यापार करने की

[06:29:26] मंजूरी देते हैं। डीमेट खाता डीमटेटरलाइज

[06:29:29] खाता शेयरों या प्रतिभूतियों का

[06:29:31] इलेक्ट्रॉनिक रूप से रखने की सुविधा है।

[06:29:34] जो भी आप शेयर मार्केट से खरीद बिक्री कर

[06:29:36] रहे स्टॉक एक्सचेंज से जो भी खरीद बिक्री

[06:29:38] कर रहे हो उसको आप जब अपने खाते में

[06:29:40] मेंटेन करते हो उस खाते को डीमेट कहते

[06:29:42] हैं। यह भी बिल्कुल बैंक जैसा ही खाता

[06:29:44] होता है। जैसे हमने देखा है

[06:29:51] हमारे बैंक में जैसे खाते होते हैं वैसे

[06:29:53] ही ये स्टॉक एक्सचेंज का खाता होता है।

[06:29:57] फिर आते हैं डिबेंचर। डिबेंचर होते हैं ऋण

[06:30:00] पत्र। जो लोग शेयर खरीद कर मालिक नहीं

[06:30:03] बनना चाहते हैं फिर भी वो कर्जा तो दे

[06:30:05] सकते हैं। इस पर उन्हें इंटरेस्ट मिलेगा।

[06:30:08] प्याज कमाएंगे अच्छा सा। और अगर कंपनी डूब

[06:30:11] भी जाए तब भी कंपनी को इस इनको तो पैसा

[06:30:13] लौटाना पड़ता है।

[06:30:17] यह कंपनी द्वारा जारी ऋण उपकरण होते हैं

[06:30:19] जिनके ब्याज की दर निश्चित होती है जो

[06:30:21] सामान्यत अनसिक्यर्ड मानी जाती है क्योंकि

[06:30:23] कंपनी डूब सकती है तो संभावनाएं थोड़ी सी

[06:30:26] रहता है रिस्क रहता है। यह मध्यकालिक और

[06:30:28] दीर्घकालिक हो सकते हैं। परिपक्वता तिथि

[06:30:31] पर पुन पूर्ण पुनर्भुगतान योग्य होते हैं।

[06:30:34] बहुत से निवेशक ऋण पत्र को प्राथमिकता

[06:30:36] देते क्योंकि एफडी से ज़्यादा ब्याज इसमें

[06:30:38] मिलता है। वर्तमान में हमारे देश में अब

[06:30:40] बड़ी संख्या में लोग डिबेंचर खरीदने लग गए

[06:30:43] हैं।

[06:30:46] कुछ डिबेंचर ऐसे होते हैं कि अगर कंपनी

[06:30:48] मौका देती है कि हमारे डिबेंचर अगर हम

[06:30:50] नहीं मतलब आप चाहे तो इसे शेयर में

[06:30:52] कन्वर्ट कर दीजिएगा। उनको कन्वर्टेबल

[06:30:54] डिबेंचर कहते हैं। कुछ ऐसे नहीं देते तो

[06:30:57] नॉन कन्वर्टेबल कहलाते हैं। फिर है म्यूचल

[06:31:01] फंड। म्यूचल फंड और कुछ नहीं है। शेयर

[06:31:03] मार्केट में इन्वेस्टमेंट करने के लिए

[06:31:05] आपके पास नॉलेज होना चाहिए, जानकारियां

[06:31:07] होनी चाहिए, सूचना होनी चाहिए। आपने

[06:31:09] रिसर्च करना चाहिए। पर आप चाहते हैं कि

[06:31:11] नहीं इतना काम मेरे पास है कि मैं यह काम

[06:31:13] नहीं कर सकता हूं। लेकिन मुझे

[06:31:14] इन्वेस्टमेंट करना है

[06:31:16] तो कुछ समझदार लोग मिलकर एक बास्केट बना

[06:31:20] देते हैं और उस बास्केट को जब खरीदा और

[06:31:22] बेचा जाता है तो उसको म्यूच्यूल फंड कहते

[06:31:24] हैं। म्यूचुअल मिलकर फंड तैयार करना और

[06:31:26] फिर म्यूचुअली अंडरस्टैंडिंग से खरीद

[06:31:28] बिक्री करते हैं समझदार लोग। म्यूचल फंड

[06:31:31] एक वित्तीय उपकरण है जिसमें धन का एक कोश

[06:31:33] या पुल बनाने के लिए कई निवेशक धन एकत्र

[06:31:35] करते हैं।

[06:31:38] फिर पेशेवर प्रबंधकों द्वारा मैनेजर के

[06:31:41] द्वारा आय और पूंजी की वृद्धि के लिए

[06:31:43] वित्तीय परिसंपत्तियों में निवेश करते

[06:31:45] हैं। स्टॉक में, डिबेंचर में प्रत्येक

[06:31:47] निवेशक यूनिट का स्वामित्व रखता है।

[06:31:49] यूनिटों के रूप में इसे दिया जाता है। इस

[06:31:52] पुल से सजित आया लाभांश को फंड मैनेजर के

[06:31:54] प्रबंधन खर्च को निकालने के बाद

[06:31:56] इन्वेस्टरों को दे दिया जाता है।

[06:31:59] तो यह चलता है कि चलो भाई कोई समझदार

[06:32:01] व्यक्ति खर्च करेगा।

[06:32:05] म्यूचल फंड कई प्रकार के हो सकते हैं।

[06:32:07] इक्विटी फंड के रूप में, हाइब्रिड बैलेंस

[06:32:09] फंड के रूप में, हाइब्रिड बैलेंस मिश्रित

[06:32:12] फंड के रूप में, मिक्स्ड फंड के रूप में,

[06:32:14] मिक्स्ड फंड के रूप में मुद्रा बाजार या

[06:32:17] अल्पकालिक फंड मनी मार्केट या शॉर्ट टर्म

[06:32:19] फंड भी होते हैं। इंटरनेशनल फंड भी होते

[06:32:21] हैं। इक्विटी लिंक सेविंग स्कीम भी होती

[06:32:24] है कि चलो भाई सेविंग भी होता जाएगा और

[06:32:26] आपका इन्वेस्टमेंट भी होगा।

[06:32:29] इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट

[06:32:33] आईएआईटी

[06:32:35] म्यूचल फंड की तरह एक सामूहिक निवेश योजना

[06:32:38] है। म्यूच्यूल फंड इक्विटी शेयर में निवेश

[06:32:41] करते हैं और अवसर प्रदान करते हैं। जबकि

[06:32:43] इनवि सड़क और बिजली जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर

[06:32:46] वाली परियोजनाओं में इन्वेस्टमेंट करते

[06:32:48] हैं और यहां से कमाई करके इन्वेस्टर को

[06:32:51] देते हैं। यह भी सेबी से रजिस्टर्ड होते

[06:32:54] हैं। म्यूच्यूल फंड के जैसे ही है। लेकिन

[06:32:55] म्यूच्यूल फंड मेनली शेयर मार्केट में

[06:32:57] स्टॉक एक्सचेंज में काम करेंगे। ये ऐसी

[06:33:00] प्रोजेक्ट में पैसा लगाएंगे जहां से

[06:33:02] रिटर्न ज्यादा आएगा।

[06:33:04] एक इनिशियल पब्लिक ऑफर में न्यूनतम निवेश

[06:33:07] राशि ₹1 लाख तक रख सकते हैं। आईपीओ के

[06:33:10] माध्यम से स्टॉक की तरह एक्सचेंज में भी

[06:33:12] इन्वेस्ट इनविट सूचीबद्ध होते हैं। स्टॉक

[06:33:14] एक्सचेंज में सूचीबद्ध इनविट है। आईआरबी

[06:33:17] इनविट फंड इंडिया ग्रिड ट्रस्ट इन लोगों

[06:33:19] ने स्टॉक एक्सचेंज में रजिस्टर्ड किया हुआ

[06:33:22] है। तो आप चाहे तो ऐसा म्यूचल फंड भी खरीद

[06:33:24] सकते हैं। इनविट वाला सारफेसी अधिनियम के

[06:33:27] तहत उधारकर्ता के रूप में मान्यता प्राप्त

[06:33:29] है कि यह ऐसा काम कर सकते हैं। अपने शुद्ध

[06:33:32] नगदी प्रवाह का 90% निवेशक को वितरित करना

[06:33:35] जरूरी होता है। जो भी आएगा राजस्व उत्पन्न

[06:33:38] करने वाले बुनियादी ढांचा संपत्ति में

[06:33:40] न्यूनतम 80% निवेश करना जरूरी होता है कि

[06:33:42] इंफ्रास्ट्रक्चर में इन्वेस्टमेंट करेंगे।

[06:33:54] याद रखिएगा कि वह शेयर मार्केट हो, किसी

[06:33:57] भी प्रकार की चीज हो, आपको कहीं ना कहीं

[06:34:00] इंटरेस्ट तो देना ही मतलब कहीं ना कहीं

[06:34:02] टैक्स तो पे करना ही पड़ेगा। तो पैसा जो

[06:34:05] भी आएगा वो टैक्स के अंतर्गत ही जाता है

[06:34:08] और इन्हें कहीं ना कहीं हम कह सकते हैं कि

[06:34:10] इंटरेस्ट रेट सारफेसी एक्ट के तहत इनको

[06:34:13] अनुमति दी गई है।

[06:34:16] फिर है रियलस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट।

[06:34:19] आरईआईटी अचल संपत्ति से जुड़ी

[06:34:21] प्रतिभूतियां है जो सूचीबद्ध होने के बाद

[06:34:24] स्टॉक एक्सचेंज पर इनका भी कारोबार किया

[06:34:26] जा सकता है। यह भी एक प्रकार से म्यूचल

[06:34:28] फंड के जैसा ही है। इसमें हालांकि म्यूचल

[06:34:31] फंड के माध्यम से अंतर्नित संपत्ति बॉन्ड

[06:34:33] स्टॉक सोने में निवेश होती है। इनमें जो

[06:34:36] भी संपत्तियां इन्वेस्टमेंट होगी वो रियल

[06:34:38] स्टेट में होगी। रियल स्टेट मतलब

[06:34:43] कोई बहुत बड़ी रिहायशी बिल्डिंग बन रही

[06:34:45] होगी। कोई कमर्शियल बिल्डिंग बन रही होगी।

[06:34:47] तो बिल्डिंग के लिए जैसे अभी हमने देखा यह

[06:34:51] जो भाई साहब होते हैं यह इंफ्रास्ट्रक्चर

[06:34:53] में पैसा खर्च करते हैं। म्यूच्यूल फंड के

[06:34:55] जैसे लोग इन्वेस्ट करते हैं इसके अंदर। ये

[06:34:58] रियल सेक्टर के लिए बनाया गया

[06:35:00] इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट है। म्यूच्यूल फंड के

[06:35:02] जैसा ही लोग मिलकर इन्वेस्टमेंट कर रहे

[06:35:04] हैं। म्यूच्यूल फंड में शेयर मार्केट में

[06:35:06] ज्यादा कॉमन है। यह थोड़े कम कॉमन है।

[06:35:09] लेकिन मुनाफा इसमें भी काफी अच्छा होता

[06:35:11] है।

[06:35:13] अब नए जो आ गए वह ईटीएफ है। ईटीएफ क्या

[06:35:16] होता है? जैसे मान लीजिए कि हम एक शेयर

[06:35:19] खरीदते हैं, दो शेयर खरीदते तो तकलीफ होती

[06:35:21] है। मुझे एक बात बताओ। ससेक्स में 30 बड़ी

[06:35:24] कंपनियां हैं या जो नेशनल इंडेक्स है

[06:35:28] हमारा उसमें ससेक्स की 100 बड़ी बॉम्बे

[06:35:31] स्टॉक एक्सचेंज की 100 बड़ी कंपनियां हैं

[06:35:33] या एनएससी की 50 बड़ी कंपनियां। तो इमेजिन

[06:35:37] करिए कि अगर मैं इन 30 कंपनियों के दो-दो

[06:35:40] दो-दो शेयर खरीद लूं एक साथ तो ससेक्स

[06:35:44] बढ़ेगा। मेरे सबके शेयरों की वैल्यू

[06:35:46] बढ़ेगी। ओवरऑल कहीं ना कहीं सबकी वैल्यू

[06:35:49] बढ़ेगी। तो जब कोई व्यक्ति

[06:35:53] कई सारे कई सारे शेयरों को एक साथ खरीदता

[06:35:58] है गुलदस्ते के रूप में उसे कहते हैं

[06:36:00] ईटीएफ। ईटीएफ मतलब एक्सचेंज ट्रेडेड फंड।

[06:36:04] जो भी एक्सचेंज पर कंपनियां है उसका एक

[06:36:06] ग्रुप बना दिया। गुलदस्ता बना दिया। उस

[06:36:09] गुलदस्ते को खरीद लीजिए। जैसे मैं आपको एक

[06:36:12] एग्जांपल देता हूं। जैसे अभी सिल्वर ईटीएफ

[06:36:15] चल रहा है बहुत ज्यादा। सिल्वर ईटीएफ की

[06:36:17] प्रतिदिन लोग खरीददारी करने लग गए हैं।

[06:36:20] तो सिल्वर ईटीएफ का सिंपल सा मतलब यह है

[06:36:23] कि जहां पर भी सिल्वर से जुड़ी हुई जितने

[06:36:26] भी शेयर मार्केट है उन सबके शेयरों को

[06:36:28] खरीद कर एक ईटीएफ बना दिया गया। फिर उसके

[06:36:31] यूनिट को बेचा जाता है ₹20, ₹10, ₹30 ऐसे

[06:36:34] हिसाब से अगर कंपनियों के शेयर बढ़ते तो

[06:36:37] सबके शेयर बढ़ जाएंगे। तो ये आजकल ज्यादा

[06:36:39] चल रहा है और ये ज्यादा सिक्योर मानी जाती

[06:36:41] है क्योंकि सभी कंपनियां एक साथ डूबेगी तो

[06:36:44] नहीं तो सभी कंपनियां अगर डूबेगी नहीं तो

[06:36:47] चांसेस रहते हैं कि प्रॉफिट ठीक-ठाक मिलता

[06:36:49] है। मतलब यह काफी डिमांडेबल है इस समय।

[06:36:53] ईटीएफ निवेश फंड है जिनमें बिल्कुल

[06:36:55] व्यक्तिगत स्टॉक की तरह स्टॉक एक्सचेंज पर

[06:36:57] कारोबार होता है। ईटीएफ निवेशक को

[06:36:58] व्यक्तिगत प्रतिभूति खरीदे बिना अपने

[06:37:00] पोर्टफोलियो में डायवर्सिटी लाने का एक

[06:37:02] तरीका होता है। मतलब आप एक ही बार में

[06:37:05] ईटीएफ खरीद लेते हैं। जैसे मैंने मैं बता

[06:37:08] देता हूं। मैंने

[06:37:08] [नाक से की जाने वाली आवाज़] सिल्वर ईटीएफ

[06:37:09] भी लेकर रखा हुआ है। मैंने पब्लिक जो

[06:37:12] कंपनियां है उसका ईटीएफ भी लेकर रखा हुआ

[06:37:15] है। ससेक्स वाला मैं ये सजेशन दे रहा हूं।

[06:37:17] ईटीएफ फिर भी सिक्योर माने जाते हैं। बाकी

[06:37:20] की तुलना में रिस्क तो सभी में है। खतरा

[06:37:23] तो सभी में फिर भी ईटीएफ को थोड़ा बेटर

[06:37:27] माना जाता है म्यूच्यूल फंड के तुलना में।

[06:37:29] ऐसा कई लोग कहते हैं।

[06:37:34] हैेज फंड का मतलब होता है जहां अमीर लोग

[06:37:37] बड़े-बड़े फंड देते हैं। एक एक करोड़ ₹2

[06:37:39] करोड़ देकर अपना प्रोडक्ट अपनी कमाई

[06:37:42] बढ़ाने के लिए करते हैं। उन्हें हैेज फंड

[06:37:44] कहते हैं। म्यूच्यूल फंड में क्या होता है

[06:37:46] कि आप छोटा-छोटा पैसा देकर एक प्रकार से

[06:37:49] थर्ड पार्टी के थ्रू काम कराते हैं और

[06:37:51] ईटीएफ में आप डायरेक्टली स्टॉक मार्केट

[06:37:54] में ही पार्टिसिपेट कर रहे हैं। लो कॉस्ट

[06:37:57] पर ठीक-ठाक मार्केट में आप काम कर लेते

[06:38:00] हैं।

[06:38:02] डेरिवेटिव डेरिवेटिव इसका मतलब होता है कि

[06:38:05] इन्हीं चीजों को फिर खरीद बिक्री करके फिर

[06:38:08] कुछ नई चीज बनाई जाए तो उन्हें डेरिवेटिव

[06:38:11] कहते हैं। वित्पन्न एक वित्तीय उपकरण है

[06:38:13] जिनका मूल्य एक या अधिक मूलभूत परिसंपत्ति

[06:38:16] या प्रतिभूतियों से प्राप्त होता है। उनकी

[06:38:18] खुद की कोई वैल्यू नहीं है। बस उन पर लिखे

[06:38:20] गए वैल्यूस के कारण उसका कोई नाम होता है।

[06:38:23] जैसे मेन होता है शेयर बंद पत्र, सूचकांक

[06:38:27] इंडेक्स, मुद्रा, सोना, चांदी, चीनी, कॉफी

[06:38:29] इत्यादि वस्तुओं के एवज में कोई चीज

[06:38:32] निर्मित हो रही होगी। जिस कागज पर उसकी

[06:38:34] कीमतें मेंशन होती है, उसकी भी खरीद

[06:38:36] बिक्री हो सकती है।

[06:38:39] यह डेरिवेटिव चार टाइप के होते हैं।

[06:38:41] फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट, फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट,

[06:38:43] ऑप्शन और स्वैप। मतलब एक प्रकार से वायदा

[06:38:46] अनुबंध होते हैं। आगामी अनुबंध होते हैं।

[06:38:48] जैसे कोई व्यक्ति इसको ऐसे समझिएगा। कोई

[06:38:51] व्यक्ति सोना नहीं खरीदना चाहता है। लेकिन

[06:38:54] वह सोना 1 महीने के बाद खरीदने का एक वादा

[06:38:57] ले सकता है। इस कीमत पर मैं लूंगा ताकि

[06:39:00] सामने वाला व्यक्ति टेंशन फ्री रहेगा।

[06:39:03] बढ़े या घटे इतने कीमत में जाएगा ही। यह

[06:39:05] इसलिए ले रहा है क्योंकि उसको भी उम्मीद

[06:39:07] है कि शायद भविष्य में बढ़ जाए तो मुझे

[06:39:08] सस्ते में मिल जाएगा। इस तरीके से वो जो

[06:39:11] कागज जाएगा उसकी फिर वो खरीद बिक्री करते

[06:39:14] रहते हैं। उसको कहते हैं डेरिवेटिव। ना

[06:39:16] सोना रियल में खरीद बिक्री नहीं हो रहा

[06:39:17] है। वह सोने का कागज खरीद बिक्री हो रहा

[06:39:19] है।

[06:39:23] वायदा अनुबंध फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट यह

[06:39:26] निश्चित कीमत और तिथि पर किसी विशिष्ट

[06:39:28] परिसंपत्ति को खरीदने बेचने के लिए दो

[06:39:30] पक्षों के बीच का समझौता या अनुबंध होता

[06:39:32] है। ओवर दी काउंटर होता है। कोई बिचोलिया

[06:39:34] नहीं रहता है तो रिस्क रहेगा। जैसे किसान

[06:39:37] क्या कर सकते हैं? कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग

[06:39:39] कर सकते हैं कि भाई हमारा जो भी उत्पादन

[06:39:41] होगा फलाना कंपनी को हम बेचेंगे। तो उसे

[06:39:43] कहते हैं कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग। तो

[06:39:45] कॉन्ट्रैक्ट मतलब पहले से ही डिसाइड है पर

[06:39:47] ऑन द ओवर द काउंटर हुआ है। कोई स्टॉक

[06:39:49] एक्सचेंज नहीं है। अगर यहीं पर स्टॉक

[06:39:52] एक्सचेंज आ जाए बीच में गारंटर बन जाए तो

[06:39:55] फिर वहां पर किसी एक को नुकसान किसी एक को

[06:39:58] फायदा उठाना ही पड़ता है। तो उसे कहते हैं

[06:40:00] फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट। बस इतना सा अंतर यह

[06:40:02] है कि यहां पर जो भी कॉन्ट्रैक्ट हो रहे

[06:40:05] हैं उसमें मध्यस्थ के रूप में कहीं ना

[06:40:08] कहीं स्टॉक एक्सचेंज रहेगा। कुछ नियमों का

[06:40:10] पालन करना पड़ेगा।

[06:40:13] यह एक ऐसा कॉन्ट्रैक्ट होता है जहां

[06:40:15] खरीदार को एक निश्चित समय अवधि के दौरान

[06:40:17] एक निश्चित कीमत पर पर मूलभूत

[06:40:19] परिसंपत्तियां या तो खरीदनी पड़ेगी या

[06:40:22] बेचनी पड़ेगी। उसका एक विकल्प होता है।

[06:40:24] मानने की बाध्यता खरीदार के लिए अनुबंध को

[06:40:27] मानने की बाध्यता होती है। ऑप्शन का भी

[06:40:29] कारोबार स्टॉक एक्सचेंज में होता है। यह

[06:40:31] अगर इसको करना चाहते हो तो मैं आपको बता

[06:40:33] दूं कि आप पहले अच्छे से ट्रेन हो जाइए।

[06:40:36] स्टॉक मार्केट में तभी ऑप्शन की ट्रेनिंग

[06:40:38] में उतरिएगा। ऑप्शन में हम ये वादा उम्मीद

[06:40:41] करते हैं कि आज से 10 दिन बाद शेयर

[06:40:43] मार्केट बढ़ जाएगा। आज से 10 दिन बाद शेयर

[06:40:46] मार्केट गिर जाएगा। यदि तुम्हारा दिमाग

[06:40:48] सही ढंग से काम करता है और सही तरीके से

[06:40:50] एनालिसिस कर पाता है तो आप ऑप्शन ट्रेडिंग

[06:40:53] में बता सकते हो कि सच में आपकी बात सही

[06:40:55] साबित होगी या गलत। सही साबित हुई तो

[06:40:57] मुनाफा मिलेगा। गलत साबित हुई तो नुकसान

[06:40:59] होगा। एक प्रेडिक्शन है। मतलब जैसे भविष्य

[06:41:02] का प्रेडिक्शन करना होता है। एक भविष्य के

[06:41:04] प्रेडिक्शन का ये तरीका माना जाता है।

[06:41:07] विनिमय ऐसे डेरिवेटिव होते हैं जो विभिन्न

[06:41:10] प्रकार के रिस्क प्रबंधन में उपयोग होते

[06:41:12] हैं। सामान्यतः ब्याज दर रिस्क और मुद्रा

[06:41:14] रिस्क को प्रबंध करने के लिए यूज़ करते

[06:41:16] हैं। दो पक्षों के बीच में विभिन्न

[06:41:18] वित्तीय उपकरण के पूर्व सहमत नगद प्रवाह

[06:41:21] के विनिमय के लिए अनुबंध होते हैं। मैं

[06:41:22] इसको बता देता हूं। ये जितने भी स्वैप

[06:41:25] होते हैं भाई आप कोई चीज जैसे बार्टर

[06:41:28] सिस्टम काम करता था एक चीज के बदले में

[06:41:30] दूसरी चीज खरीद कर लाना तो वैसे ही

[06:41:32] डेरिवेटिव में अगर आपके पास कोई

[06:41:34] सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट है या किसी के पास

[06:41:37] कुछ और है तो उन्हें लगता है एक दूसरे को

[06:41:39] लग रहा है कि भ मैं ज्यादा कमाऊंगा सामने

[06:41:41] वाले की तुलना में तो सामने वाले का

[06:41:43] इंस्ट्रूमेंट खरीद लेगा स्वाइप करना

[06:41:45] एक्सचेंज करने ऐसी बातचीत इसमें रहती है

[06:41:50] यह नाम जरूर याद रखिएगा फॉरवर्ड

[06:41:52] कॉन्ट्रैक्ट फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट, ऑप्शन और

[06:41:54] स्वैप यह भविष्यवर्ती चीजों की ओर ध्यान

[06:41:56] देते हैं। अब बात कर लेते हैं रेगुलेटरी

[06:41:59] बॉडी। हमारे देश में रेगुलेटरी बॉडी के

[06:42:02] रूप में पूरे शेयर मार्केट को कंट्रोल

[06:42:04] करने का काम करती है सेबी। सिक्योरिटीज

[06:42:06] एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया। अगर इससे

[06:42:08] कोई नाराजगी आपकी है तो आप सिक्योरिटी

[06:42:10] एफिलिएट ट्रिब्यूनल में जा सकते हैं।

[06:42:12] हमारे देश में मर्ज करना हो कंपनियों को

[06:42:15] तो कंपटीशन कमीशन ऑफ इंडिया की अनुमति

[06:42:17] लेनी पड़ती है। सेबी के अस्तित्व में आने

[06:42:20] से पहले पूंजी निर्गम नियंत्रण भारतीय

[06:42:22] प्रतिभूति बाजार का नियामक प्राधिकरण है।

[06:42:26] 1947 में इसके पहले

[06:42:29] एक संस्था हुआ करती थी। लेकिन फिर इसे

[06:42:32] 1988 में बनाया गया। सुधारों को ध्यान में

[06:42:34] रखते हुए।

[06:42:36] 1988 में कार्यकारी आदेश के रूप में बनाया

[06:42:39] गया। बाद में 1992 में संसद में कानून

[06:42:42] पारित करके इसको सावधिक बनाया गया। मुंबई

[06:42:44] में इसका मुख्यालय है। चार रीजनल ऑफिस भी

[06:42:47] इसके खोले गए। नौ सदस्यों वाला एक पूरा

[06:42:50] मतलब एक तरीके से संस्थान है। भारत सरकार

[06:42:54] द्वारा नामित एक अध्यक्ष होता है। दो

[06:42:56] सदस्य कंपनी अधिनियम 2013 के वित्त और

[06:42:58] प्रशासन से संबंधित केंद्रीय मंत्रालय से

[06:43:01] भेजे जाते हैं। एक सदस्य आरबीआई से जाता

[06:43:03] है। पांच अन्य सदस्य जिसमें तीन

[06:43:05] पूर्णकालिक सदस्य होते हैं।

[06:43:08] बातचीत करते हैं। देखते हैं कि स्टॉक

[06:43:10] मार्केट सही काम कर रहा है कि नहीं। कोई

[06:43:12] बदमाशी तो नहीं कर रहा है। प्रतिभूतियों

[06:43:15] में इन्वेस्टर के हितों की रक्षा करना।

[06:43:17] सेबी के द्वारा दिए गए आदेश कौसी जुडिशरी

[06:43:19] जैसे काम करते हैं, फॉलो करने पड़ते हैं।

[06:43:23] 2014 में नियम संशोधन करते हुए डाल दिया

[06:43:25] गया कि अब ₹100 करोड़ या उससे अधिक की

[06:43:27] राशि कोई भी जमा करने जा रहा हो भारतीय

[06:43:30] लोगों से तो उसे सेबी के अंडर आना ही

[06:43:32] पड़ेगा। उसे सेबी के नियमों का पालन करना

[06:43:35] ही पड़ता है। मतलब सेबी के अंतर्गत उसको

[06:43:37] रजिस्टर्ड करना ही पड़ेगा। अगर हमारे देश

[06:43:40] में ₹100 करोड़ से ज्यादा का कोई भी

[06:43:43] इन्वेस्टमेंट करना चाहता है तो

[06:43:46] फिर है सिक्योरिटीज एफिलिएट ट्रिब्यूनल।

[06:43:49] सेबी [गला साफ़ करने की आवाज़] के

[06:43:50] प्रावधानों के तहत स्थापित एक और वैधानिक

[06:43:52] बॉडी है। यह मुंबई में है। एक प्रकार की

[06:43:55] जुडिशरी बॉडी है ये। केंद्र सरकार द्वारा

[06:43:57] प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण के पीठासीन

[06:44:00] अधिकारी को भारत का मुख्य न्यायाधीश उसके

[06:44:02] द्वारा नामित किसी अन्य व्यक्ति के

[06:44:03] परामर्श से नियुक्त होता है। न्यायाधिकरण

[06:44:06] के पास सिविल कोर्ट के जैसी शक्तियां होती

[06:44:08] है और इसके निर्णय के विरुद्ध सीधा

[06:44:10] सुप्रीम कोर्ट में ही मामला जाएगा। इसका

[06:44:12] मतलब हो गया कि हाई कोर्ट के बराबर का

[06:44:14] दर्जा इसका।

[06:44:17] कई बार आपको अगर नाराजगी है पेंशन फंड

[06:44:20] नियामक रेगुलेटरी बॉडी से इरडाई की

[06:44:22] रेगुलेटरी बॉडी ने सही निर्णय नहीं दिए तो

[06:44:25] आप इसमें शिकायत दर्ज कर सकते हैं। तो

[06:44:26] सेबी के खिलाफ इसमें शिकायत दर्ज हो सकती

[06:44:28] है। पीएफआरडीए के खिलाफ शिकायत दर्ज हो

[06:44:31] सकती है। इरडाई के खिलाफ शिकायत दर्ज हो

[06:44:33] सकती है। फिर भी अगर आप संतुष्ट नहीं तो

[06:44:35] फिर हाई सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं। फिर

[06:44:38] है कंपटीशन कमीशन ऑफ इंडिया 2002 में

[06:44:40] कानून बनाकर बनाया गया और इसका गठन 2009

[06:44:43] में हुआ। इसका मेन काम होता है कि किसी भी

[06:44:46] क्षेत्र में मोनोपोली ना हो जाए। मतलब कोई

[06:44:48] एक कंपनी डोमिनेंट ना हो जाए। इस पर ध्यान

[06:44:51] देना। इसके अध्यक्ष सदस्य बनने के लिए

[06:44:53] उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रह चुका हो या

[06:44:56] उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के पद पर

[06:44:57] नियुक्त होने की योग्यता रखता हो।

[06:45:00] इंटरनेशनल व्यापार, अर्थशास्त्र जैसे विषय

[06:45:02] में उसके पास नॉलेज हो तभी रख सकते हैं।

[06:45:04] फिर क्रेडिट रेटिंग एक प्रकार से कंपनी और

[06:45:07] व्यक्ति के ऋण की कितनी क्षमता है कि वो

[06:45:11] ऋण प्राप्त कर सकता है। उधारकर्ता की साख

[06:45:13] का एक मात्रात्मक मूल्यांकन है।

[06:45:17] सोवेरियन क्रेडिट रेटिंग याद रखना

[06:45:19] सोवेरियन क्रेडिट रेटिंग देश का क्रेडिट

[06:45:22] रेटिंग कि भ भारत की क्रेडिट रेटिंग कैसी

[06:45:24] है? पाकिस्तान की क्रेडिट रेटिंग कैसी है?

[06:45:28] सरकारों की भी क्रेडिट रेटिंग तय करने की

[06:45:30] क्षमता होती है। सोवेन क्रेडिट रेटिंग कुछ

[06:45:32] अंतरराष्ट्रीय स्तर की कंपनियां इस तरीके

[06:45:35] की क्रेडिट रेटिंग को जारी करती है।

[06:45:37] क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां हमारे देश में

[06:45:39] कई सारी हैं जो नागरिकों के लिए कंपनियों

[06:45:42] के लिए क्रेडिट रेटिंग जारी करती है। इनका

[06:45:44] रेगुलेशन भी सेबी के अंतर्गत ही आता है।

[06:45:46] सेबी इसको रेगुलेट करती है कि कहीं यह

[06:45:48] बदमाशी से किसी कंपनी को प्रमोट तो नहीं

[06:45:51] कर रहे हैं। वैश्विक क्रेडिट रेटिंग

[06:45:53] उद्योग तीन एजेंसियों के साथ अत्याधिक

[06:45:55] केंद्रित है। दुनिया भर में जो फेमस

[06:45:57] क्रेडिट रेटिंग है मुडीज वाली है मुडीज

[06:46:00] स्टैंडर्ड एंड पुअर्स वाली है और फिच ये

[06:46:03] अंतरराष्ट्रीय स्तर की क्रेडिट रेटिंग

[06:46:05] एजेंसियां है जो दुनिया भर में बहुत

[06:46:07] नामीगनामी मानी जाती है।

[06:46:10] क्रेडिट रेटिंग एजेंसी को अलग-अलग स्तर पर

[06:46:13] रेगुलेट किया जाता है। 2006 का क्रेडिट

[06:46:15] रेटिंग एजेंसी सुधार अधिनियम उनकी आंतरिक

[06:46:17] प्रक्रिया रिकॉर्ड कीपिंग व्यवसायिक

[06:46:18] प्रथाओं को नियंत्रित करता है और कहीं ना

[06:46:21] कहीं सेबी को यह पावर दी गई है। भारत की

[06:46:24] प्रमुख क्रेडिट रेटिंग एजेंसी में क्रिसिल

[06:46:26] है। भारत की पहली क्रेडिट रेटिंग एजेंसी

[06:46:28] 1988 में बनाई गई थी। फिर इरा बनाई गई।

[06:46:31] फिर अब केयर बना दी गई है। सिविल बना दी

[06:46:34] गई है। सिविल 2000 में स्थापित भारत का

[06:46:36] पहला क्रेडिट सूचना ब्यूरो है जो उपभोक्ता

[06:46:39] और उधारकर्ताओं के क्रेडिट संबंधी सूचनाएं

[06:46:41] देता है। दुनिया में फिच रेटिंग एजेंसी

[06:46:44] यूके की है। स्टैंडर्ड एंड पुअर यूएसए की

[06:46:46] है। मुडीज यूएसए की है जो पूरी दुनिया की

[06:46:49] सरकारों को भी क्रेडिट रेटिंग देती है।

[06:47:02] जो क्रेडिट ट्रेडिंग एजेंसी का रेगुलेटर

[06:47:04] है वो हमारे देश में सेबी है मेनली

[06:47:10] सिविल हम देख चुके थे सिविल के बारे में

[06:47:12] अभी हमने चर्चाएं कर चुके हैं।

[06:47:16] नेशनल सिक्योरिटी डिपॉजिटरी लिमिटेड

[06:47:18] वर्तमान में जो डीमेट खाते में शेयर आपको

[06:47:21] दिखाए जाते हैं वो शेयर केवल एक नंबर

[06:47:24] मात्र होते हैं। रियल में शेयर कहां

[06:47:26] उपस्थित है? तो हमारे देश में दो

[06:47:28] डिपॉजिटरी है जिनके पास रियल शेयर है।

[06:47:31] भारत में प्राथमिक प्रतिभूति भंडार 1996

[06:47:34] में बनाया गया। इलेक्ट्रॉनिक रूप से

[06:47:37] परिसंपत्तियों को रखना और भारतीय

[06:47:39] प्रतिभूति बाजार में निवेशक जारीकर्ता

[06:47:42] मध्यस्थ लोगों को डिपॉजिटरी सेवाएं प्रदान

[06:47:45] करना। नेशनल सिक्योरिटी डिपॉजिटरी लिमिटेड

[06:47:47] रियल में शेयर इन्हीं के पास होते हैं।

[06:47:49] हमारे पास केवल उनका नंबर होता है। उसके

[06:47:52] अलावा सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विज लिमिटेड

[06:47:54] सीडीएसएलबी सेम काम करती है बॉम्बे स्टॉक

[06:47:57] एक्सचेंज के लिए। यह काम करती है नेशनल

[06:47:59] स्टॉक एक्सचेंज के लिए। जब भी मैं शेयर

[06:48:02] खरीदता हूं नेशनल स्टॉक एक्सचेंज से तो

[06:48:04] मुझे इनका मैसेज आता है अगले दिन कि मेरे

[06:48:05] पास इतने शेयर आ चुके हैं। जब भी मैं

[06:48:08] बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज से शेयर खरीदता हूं

[06:48:10] तो इनका मैसेज आता है मेरे पास।

[06:48:20] सीडीएसएल के पास 10 करोड़ डीमेट खाते हैं

[06:48:24] नवंबर 2023 के अकॉर्डिंग अब इनके पास

[06:48:26] जनरली अब इनके शेयर खाते बहुत तेजी से

[06:48:29] बढ़ते जा रहे हैं एनएसडीएल के। अब हम बात

[06:48:32] कर रहे हैं एक छोटा सा जो टॉपिक है

[06:48:33] इंश्योरेंस। इंश्योरेंस होता क्या है रियल

[06:48:36] में? कोई भी ऐसी प्रक्रिया जो रिस्क को कम

[06:48:39] कर दे उसे हम इंश्योरेंस कहते हैं। जैसे

[06:48:41] जॉइंट फैमिली का निर्माण होना भी एक

[06:48:44] प्रकार का इंश्योरेंस था पुराने जमाने

[06:48:46] में। इंश्योरेंस मतलब जो रिस्क को कम करने

[06:48:50] की प्रक्रियाएं होती है। बीमा दो पक्षों

[06:48:53] के बीच एक कानूनी समझौता है जो बीमा कंपनी

[06:48:56] और व्यक्ति के बीच में एक समझौता है। बीमा

[06:48:59] कंपनी बीमाकृत आकस्मिकता के होने पर बीमित

[06:49:02] व्यक्ति के घाटे को कम करने का वादा करती

[06:49:04] है कि कोई इमरजेंसी हो जाए तो मैं प्रॉमिस

[06:49:06] करता हूं कि मैं आपके समय उस समय खड़ा

[06:49:09] रहूंगा। लेकिन उसके एवज में वह प्रति

[06:49:12] महीने या प्रतिवर्ष एक प्रीमियम लेता है।

[06:49:14] एक पेमेंट लेता है।

[06:49:17] आकस्मिकता कोई भी घटना हो सकती है जो

[06:49:19] जिसमें नुकसान होता होगा। बीमा धारक की

[06:49:22] मृत्यु संपत्ति का नुकसान हो सकता है।

[06:49:25] जोखिम से सुरक्षा रिस्क से एक प्रकार से

[06:49:27] सिक्योरिटी देता है। सहकारिता की भावना पर

[06:49:30] आधारित है कि चलो एक दूसरे की मदद इसके

[06:49:32] माध्यम से हो जाती है। बीमा का इतिहास

[06:49:35] आधुनिक बीमा 13वीं शताब्दी से माना जाता

[06:49:37] है। जब पहली बार समुद्रिक बीमे की शुरुआत

[06:49:40] हुई थी जब जहाज जाते थे और कई बार लौट कर

[06:49:42] नहीं आते थे।

[06:49:44] हमारे देश में आधुनिक स्वरूप 1653 में

[06:49:48] माना जाता है। जब लंदन के विलियम गिबान्स

[06:49:51] का एक वर्ष का जीवन बीमा शुरू किया गया

[06:49:53] था। लंदन में हमारे देश में नहीं दुनिया

[06:49:55] में 1653 में बीमा की उत्पत्ति वैसे तो

[06:49:59] हमारे देश में बहुत पुरानी है। लेकिन 1818

[06:50:01] में ओरिएंटल लाइफ बीमा कंपनी भारत की धरती

[06:50:04] पर काम करने वाली पहली इंश्योरेंस कंपनी

[06:50:06] थी। 1870 में मुंबई म्यूच्यूल लाइफ बीमा

[06:50:10] सोसाइटी बनाई गई। जिसमें भारत की पहली

[06:50:12] जीवन बीमा कंपनी जिसने अपना व्यापार शुरू

[06:50:15] किया।

[06:50:16] 1912 में इंडियन लाइफ बीमा कंपनीज एक्ट

[06:50:19] पारित किया गया।

[06:50:23] अंग्रेजों के द्वारा। 1928 में इंडियन

[06:50:26] लाइफ बीमा कंपनीज एक्ट लागू हुआ। 1938 में

[06:50:28] बीमा एक्ट के द्वारा जनता के अधिकारों की

[06:50:31] सुरक्षा हेतु

[06:50:34] पहले से मौजूद कानून का एकीकरण और संशोधन

[06:50:37] किया गया। जीवन बीमा निगम अधिनियम 1956 5

[06:50:41] करोड़ की पूंजी निवेश और राष्ट्रीयकरण

[06:50:44] करके भारत सरकार ने 245 भारतीय और विदेशी

[06:50:47] बीमा और प्रोविडेंट सोसाइटी को अपने अधीन

[06:50:50] कर लिया। मतलब 1956 में

[06:50:54] एलआईसी बना और एलआईसी कैसे बना?

[06:50:58] राष्ट्रीयकरण से नेशनलाइजेशन से। 245

[06:51:03] कंपनियों को जोड़कर सरकार ने एक कंपनी बना

[06:51:06] दी। फिर आया जनरल इंश्योरेंस। जनरल

[06:51:08] इंश्योरेंस का मतलब गाड़ी का इंश्योरेंस,

[06:51:11] बाइक का इंश्योरेंस, कार का इंश्योरेंस,

[06:51:13] हेल्थ इंश्योरेंस सब कुछ इंश्योरेंस को

[06:51:15] जनरल कहते हैं। बस जीवन इंश्योरेंस को हम

[06:51:17] जब बात करते हैं तो उसको लाइफ इंश्योरेंस

[06:51:19] में डालेंगे। कोलकाता में ब्रिटिश सरकार

[06:51:22] के द्वारा 1850 में इस पहली जनरल बीमा

[06:51:24] कंपनी की शुरुआत हुई। 1960 में इंडियन

[06:51:28] मर्चेंटाइल बीमा लिमिटेड ने जनरल बीमा

[06:51:30] बिजनेस के सभी वर्गों के साथ काम करना

[06:51:32] शुरू किया। 1972 में हमारे देश में जनरल

[06:51:36] इंश्योरेंस कंपनी का निर्माण हुआ।

[06:51:39] नेशनलाइजेशन के द्वारा। जितनी भी जनरल

[06:51:42] बीमा करने वाली कंपनियां थी उनका

[06:51:44] नेशनलाइजेशन हो गया। आज हमारे देश में

[06:51:46] जनरल इंश्योरेंस कंपनी इकलौती पुनर्ब बीमा

[06:51:49] कंपनी। इकलौती पुनर बीमा मतलब बीमा

[06:51:52] कंपनियों का भी बीमा करने की ताकत जीआईसी

[06:51:55] के पास होती है। बीमा कंपनियों का बीमा

[06:51:58] करने की।

[06:52:02] 107 निवेशकों को आपस में मिलाकर चार

[06:52:04] कंपनियों का समूह बना। फिर उसके बाद नेशनल

[06:52:07] इंश्योरेंस कंपनी, न्यू इंडिया इंश्योरेंस

[06:52:09] कंपनी, ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी,

[06:52:11] यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी बनी। तो

[06:52:14] याद रखिए 1813 में पहली बार ओरिएंटल लाइफ

[06:52:17] इंश्योरेंस कंपनी भारत में आई। उसके बाद

[06:52:20] भारत में 1850 के आसपास जनरल इंश्योरेंस

[06:52:23] कंपनी आई। 1817 में फर्स्ट इंडियन लाइफ

[06:52:26] इंश्योरेंस कंपनी जो भारतीय कंपनी थी।

[06:52:29] 1956 में नेशनलाइजेशन करा के एलआईसी बनाया

[06:52:32] गया। 1972 में जीआईसी बनाया गया। 1972 में

[06:52:37] चार बड़ी कंपनियां और बनी जो कि

[06:52:40] इंश्योरेंस से जुड़ा हुआ काम करेगी। 1999

[06:52:43] में हमारे देश में इंश्योरेंस की कंपनियों

[06:52:46] को रेगुलेट करने के लिए एक संस्था बनाई

[06:52:48] गई। इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट

[06:52:50] अथॉरिटी ऑफ इंडिया क्योंकि अब प्राइवेट

[06:52:52] कंपनियां भी आ गई थी।

[06:52:55] प्राइवेट प्लेयर को 1994 में अनुमति दी गई

[06:52:58] थी और 2015 में एक प्रकार से 2019 में

[06:53:03] एफडीआई की अनुमति दे दी गई थी बीमा कंपनी

[06:53:06] में एक प्रकार से सरकारी रूट से अब

[06:53:09] ऑटोमेटिक रूट से भी इसी साल की खबर है कि

[06:53:12] 100% एफडीआई की अनुमति दे दी गई है। भारत

[06:53:15] सरकार ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन नियम 2019

[06:53:18] में संशोधन करते हुए बीमा क्षेत्र में

[06:53:20] स्वचलित मार्ग के तहत 100% एफडीआई की

[06:53:23] अनुमति दी है। सबका बीमा सबकी रक्षा

[06:53:26] अधिनियम के तहत इसको लाया गया। अब हमारे

[06:53:28] देश में बीमा सेक्टर में 100% एफडीआई की

[06:53:31] अनुमति आ गई है। लाइफ इंश्योरेंस और जनरल

[06:53:34] इंश्योरेंस। लाइफ इंश्योरेंस में मृत्यु

[06:53:37] के बाद परिवार के सदस्यों के लिए वित्तीय

[06:53:39] स्वतंत्रता सुनिश्चित करने का लक्ष्य होता

[06:53:41] है। मृत्यु या विकलांगता की स्थिति में

[06:53:44] वित्तीय मुआवजा इसमें मिलता है। इसको कहते

[06:53:46] हैं लाइफ इंश्योरेंस।

[06:53:49] फिर होता है टर्म इंश्योरेंस भी ऐसा ही

[06:53:51] होता है। टर्म इंश्योरेंस लाइफ इंश्योरेंस

[06:53:53] का एक भाग है। इसमें क्या होता है कि ऐसा

[06:53:56] किया जाता है कि भ अगर मैं मर गया तो इतना

[06:53:58] करोड़ रुपए मिलेगा मेरे घर वालों को। वो

[06:54:00] तो टर्म इंश्योरेंस कहलाता है और अगर

[06:54:02] उसमें बच गए तो जो पैसा कंपनी को दिया था

[06:54:05] वो कंपनी का हो गया। फिर उसमें रिटर्न

[06:54:07] वटर्न नहीं आते हैं। लाइफ इंश्योरेंस में

[06:54:09] कई सारे ऐसे प्लान भी होते हैं जिसमें अगर

[06:54:11] बच गए तो आपको बुढ़ापे में रिटर्न मिलेगा।

[06:54:14] नहीं बच पाए तो इतना पैसा मिल जाएगा।

[06:54:20] यूलिप नाम की विशेष प्रकार के इंश्योरेंस

[06:54:23] होते हैं। जिसमें जो पैसा इन्वेस्टमेंट

[06:54:24] किया जाता है वह शेयर मार्केट में होता

[06:54:26] है। तो मुनाफा ठीक-ठाक मिल जाता है। जनरल

[06:54:29] इंश्योरेंस का मतलब होता है सामान्य बीमा

[06:54:31] के अलावा मतलब जो

[06:54:33] जीवन बीमा के अलावा जितने भी बीमा होते

[06:54:36] हैं सब जनरल इंश्योरेंस कहलाते हैं। मतलब

[06:54:38] मृत्यु के अलावा कोई भी इंश्योरेंस जैसे

[06:54:41] बीमारी वाला है, हेल्थ इंश्योरेंस है तो

[06:54:43] हेल्थ इंश्योरेंस को हम क्या नाम देंगे?

[06:54:45] जनरल इंश्योरेंस। किसी गाड़ी का

[06:54:48] इंश्योरेंस बनाना है, किसी प्रकार के

[06:54:50] चिकित्सा उपकरण का बनाना है, आंख चोरी

[06:54:53] यहां तक कि यात्रा के दौरान का इंश्योरेंस

[06:54:55] बनाना है तो हम उसे भी एक प्रकार से

[06:54:57] कहेंगे कि वह जनरल इंश्योरेंस में आएगा।

[06:55:02] सामान्य बीमा लगभग किसी भी चीज हर चीज का

[06:55:04] कवर कर सकता है। हेल्थ इंश्योरेंस होता

[06:55:06] है, फायर इंश्योरेंस होता है, ट्रेवल

[06:55:09] इंश्योरेंस जब आप ट्रेन से यात्रा करते

[06:55:10] हैं या फिर प्लेन से यात्रा करते हैं तो

[06:55:12] उसका भी इंश्योरेंस होता है। गाड़ियों के

[06:55:14] इंश्योरेंस होते हैं। सब जनरल इंश्योरेंस

[06:55:16] कहलाते हैं। मकान का इंश्योरेंस हो सकता

[06:55:18] है। 1993 में मल्होत्रा कमेटी बनाई थी

[06:55:22] क्योंकि मल्होत्रा कमेटी ने कहा था कि

[06:55:24] केवल एक कंपनी हमारे देश में LIC है।

[06:55:26] इसमें कई सारी और कंपनियां प्राइवेट आने

[06:55:29] दीजिए तब जाकर चीजें बेटर होगी। इन्होंने

[06:55:31] ही नाम कहा था कि रेगुलेटरी बॉडी बना

[06:55:33] दीजिएगा। मल्होत्रा कमेटी हमारे देश में

[06:55:36] एक प्रकार से इंश्योरेंस के सुधारों के

[06:55:38] लिए बनाई गई थी। भारतीय बीमा विनियामक और

[06:55:41] विकास प्राधिकरण इंश्योरेंस रेगुलेटरी एंड

[06:55:44] डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया। इरडाई जैसा

[06:55:46] एक और नाम याद रखना। याद रखिएगा कि इरडाई

[06:55:50] के जैसी एक और चीज होती है जिसको हम कहते

[06:55:53] हैं रिन्यूएबल एनर्जी वाली एजेंसी। ये भी

[06:55:56] हमारे देश में काम करती है। उसका नाम भी

[06:55:57] इरडाई कहते हैं। लेकिन वो रिन्यूएबल

[06:56:00] एनर्जी के लिए सरकार की सबसे बड़ी

[06:56:02] रेगुलेटरी बॉडी है।

[06:56:05] भारतीय बीमा विनियाक और विकास प्राधिकरण

[06:56:08] 1999 में बनाया गया। बीमा नियामक विकास

[06:56:11] प्राधिकरण अधिनियम 1999 की सेक्शन चार के

[06:56:13] तहत एक सावधिक बॉडी मुख्यालय हैदराबाद में

[06:56:16] है। अगर आपको कोई कंपनी इंश्योरेंस कराने

[06:56:19] के बाद क्लेम नहीं दे पा रही है। हेल्थ

[06:56:21] इंश्योरेंस हो या कोई भी कंपनी तो इन पे

[06:56:23] शिकायत कर सकते आप लोग। जब भी कोई कंपनी

[06:56:26] आपको हेल्थ इंश्योरेंस के फायदे ना दे तो

[06:56:28] आप उनको कहिएगा कि हम इरडाई जाएंगे। बीमा

[06:56:31] धारकों के हितों की सुरक्षा करना

[06:56:33] इर्रेगुलिटीज को दूर करना होता है। इसमें

[06:56:36] भी 10 मेंबर होते हैं। एक अध्यक्ष, पांच

[06:56:38] पूर्णकालिक सदस्य और चार अंशकालिक सदस्य

[06:56:41] होते हैं।

[06:56:46] सेबी और इरडाई में झगड़ा हो गया था। यूलिप

[06:56:49] जो थे यूलिप इंश्योरेंस वो वास्तविक रूप

[06:56:51] में एक ऐसे इंश्योरेंस थे जिसका पैसा शेयर

[06:56:54] मार्केट में इन्वेस्टमेंट होता था। तो

[06:56:55] सेबी ने कहा भाई मुझसे तो अनुमति ली नहीं।

[06:56:58] इरडाई ने कहा कि मुझसे अनुमति ली मतलब हो

[06:57:00] गया काम झगड़ा हो गया इनके बीच में।

[06:57:02] फाइनली सुप्रीम कोर्ट ने यूलिप की पावर

[06:57:05] इरडाई को दे दी है। मतलब इरडाई के पास

[06:57:07] फाइनली आज ये ताकत है यूलिप से जुड़े हुए

[06:57:10] कार्यक्रमों को लाने की। काफी लंबा झगड़ा

[06:57:12] था। इंश्योरेंस में भी ओब्समैन है, लोकपाल

[06:57:15] हैं। यदि कोई व्यक्ति इंश्योरेंस कंपनी या

[06:57:19] ज्यादा प्रीमियम ले रही है या फिर बदमाशी

[06:57:21] कर रही है

[06:57:23] तो इनमें आप शिकायत कर सकते हैं।

[06:57:31] 3 महीने के भीतर समस्या का समाधान कर देता

[06:57:34] है। तो दो चैप्टर कंप्लीट हो चुके हैं।

[06:57:36] आइए सबसे पहले देख लेते हैं अर्थव्यवस्था

[06:57:39] से जुड़ी हुई चुनौतियां। छोटे-छोटे टॉपिक

[06:57:41] हैं। पावर्टी, अनइंप्लॉयमेंट और इनफ्लेशन।

[06:57:44] तीन टॉपिक हमें पढ़ने हैं। शुरुआत करते

[06:57:46] हैं। सबसे पहले हम शुरुआत करने जा रहे हैं

[06:57:50] पावर्टी की।

[06:57:52] मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार गरीबी मात्र

[06:57:55] धन की कमी नहीं है बल्कि विकल्प और अवसर

[06:57:58] की कमी है। जिसको जीवन निर्धनता कहते हैं

[06:58:01] जो गरिमामय जीवन के लिए जरूरी है।

[06:58:04] अकॉर्डिंग टू द ह्यूमन डेवलपमेंट रिपोर्ट

[06:58:06] पावर्टी इज नॉट जस्ट द लेक ऑफ मनी बट द

[06:58:09] लेक ऑफ चॉइस। भाई उसके पास विकल्प बहुत कम

[06:58:12] बचे हैं। अपॉर्चुनिटीज व्हिच आर नेसेसरी अ

[06:58:15] डिग्निफाइड लाइफ। जीवन के लिए न्यूनतम

[06:58:18] उपभोग आवश्यकताओं को प्राप्त न करने की

[06:58:20] स्थिति को गरीबी कहते हैं। एक और परिभाषा

[06:58:23] न्यूनतम उपभोग की आवश्यकता का मतलब रोटी,

[06:58:26] कपड़ा, मकान और वर्तमान में स्वास्थ्य,

[06:58:28] शिक्षा, पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर की

[06:58:30] बातचीत है। रेगनर नर्क से कहते हैं कोई

[06:58:33] व्यक्ति इसलिए गरीब है क्योंकि वह गरीब

[06:58:35] है। बहुत अजीब सी बातचीत। वो इसलिए कहना

[06:58:38] चाह रहा है ऐसा।

[06:58:40] आज जो व्यक्ति आपको गरीब दिख रहा है उसके

[06:58:43] पीछे का कारण उसका इतिहास है। क्योंकि

[06:58:46] उसके बचपन में उसके पिताजी गरीब थे। उस

[06:58:48] कारण से उसकी शिक्षा अच्छी नहीं हो पाई।

[06:58:51] उसके स्वास्थ्य अच्छा नहीं रह पाया। उसे

[06:58:54] वह बेहतर विकल्प नहीं मिल पाए। फाइनली

[06:58:57] उसका बेहतर विकास नहीं हो पाया तो वह

[06:58:59] गरीबी में रह गया। गरीबी क्षमताओं का अभाव

[06:59:02] है। पावर्टी इज ए लेक ऑफ कैपेबिलिटी।

[06:59:05] वास्तविक रूप में किसी व्यक्ति में वह

[06:59:07] क्षमताएं विकसित नहीं हो पाई। उसके कारण

[06:59:09] से हम कहते हैं कि गरीबी आ गई।

[06:59:13] गरीबी का प्रकार कई आधारों पर वर्गीकृत

[06:59:16] किया जाता है। जैसे ऑलवेज पुअर कुछ भी हो

[06:59:19] जाए समय कितना बदल जाए वह हमेशा ही गरीबी

[06:59:21] में दुचक्र में रहता है। यूजुअली पुअर

[06:59:24] कभी-कभी ऐसा होता है कि इतना पैसा आ जाता

[06:59:27] है कि गरीबी से बाहर निकल जाता है। उसे

[06:59:30] कहते हैं कि यूजुअली पुअर अधिकतर टाइम

[06:59:32] गरीब रहता है। चर्निंग पुअर। चर्निंग पुअर

[06:59:35] मतलब उतार-चढ़ाव। कभी गरीबी में आ जाता

[06:59:37] है, कभी गरीबी में फंस जाता है, कभी आ

[06:59:39] जाता है, कभी फंस जाता है। तो हम इसे कहते

[06:59:42] हैं कि चर्निंग पुअर है और ऑकेशनली पुअर

[06:59:45] ऐसा कभी एकद बार होता है अन्यथा वो ठीक

[06:59:48] है। गरीबी रेखा से ऊपर रहता है। कभी-कभी

[06:59:50] जिंदगी तकलीफदायक आ जाती है और नेवर पुअर

[06:59:54] कुछ भी हो जाए किसी भी प्रकार की घटना आ

[06:59:56] जाए वह कभी गरीब नहीं हो सकता। जैसे कि

[06:59:58] अडानी और अंबानी।

[07:00:03] गरीबों का मापन के आधार पर गरीबी तीन

[07:00:06] प्रकार की बताई गई है। एब्सोल्यूट

[07:00:08] पावर्टी, रिलेटिव पावर्टी और

[07:00:10] मल्टीडायमेंशनल पावर्टी। एब्सोल्यूट

[07:00:13] पावर्टी। एब्सोल्यूट पावर्टी का मकसद यह

[07:00:16] होता है कि भ एक मिनिमम लाइन तय कर लीजिए

[07:00:19] कि इसके नीचे जो लोग कमाई कर रहे होंगे वो

[07:00:22] गरीब होंगे। इनको कहते हैं हेड काउंटिंग

[07:00:25] गरीबी। ऐसे लोगों को हम गिन लेते हैं बस

[07:00:28] कि भाई देखो गरीब कितने लोग हैं तो गिन

[07:00:30] सकते हैं। हम तय कर लेते हैं कि इतना

[07:00:32] रुपया प्रतिदिन अगर नहीं कमाता है तो गरीब

[07:00:35] होगा तो उसे कहेंगे एब्सोल्यूट पावर्टी।

[07:00:38] निरपेक्ष गरीबी से अभिप्राय ऐसी गरीबी से

[07:00:40] है जिसमें व्यक्ति के पास न्यूनतम आर्थिक

[07:00:42] संसाधन भी नहीं होते हैं। विश्व बैंक के

[07:00:45] अनुसार यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन $.15

[07:00:50] खर्च नहीं कर पाता है मतलब खर्च नहीं कर

[07:00:52] पा रहा है। इतना पैसा खर्च नहीं कर पा रहा

[07:00:55] है तो गरीब है। भारत में इस गरीबी को

[07:00:57] मापने के लिए एक गरीबी रेखा का निर्धारण

[07:01:00] किया गया है। निर्धनता रेखा कहते हैं हम

[07:01:02] उसे एक पैमाना जिसके आधार पर यह तय होता

[07:01:04] है कि गरीब कौन है। सबसे पहले 1962 में एक

[07:01:08] वर्किंग ग्रुप था जिसने शुरुआत की थी ₹20

[07:01:10] और ₹25 प्रति महीना। यह बहुत पुरानी

[07:01:13] बातचीत है।

[07:01:16] फिर आया वीएम और एन रथ फार्मूला 1971 वन।

[07:01:21] इन्होंने कहा कि ग्रामीण और शहरी स्तर पर

[07:01:23] गरीबी को मापने के लिए रुपया नहीं। इतने

[07:01:26] भोजन की बातचीत होनी चाहिए कि इतना भोजन

[07:01:28] जिनको ना मिले वह गरीब है। मैं कहूंगा

[07:01:31] इतना भोजन जिसको ना मिले वह भूखा है।

[07:01:33] भुखमरी है। गरीबी तो और भी बहुत बड़ी चीज

[07:01:36] है भाई। केवल भोजन मिल जाना मुझे बताओ कि

[07:01:38] एक व्यक्ति को भीख मांगकर अगर पर्याप्त

[07:01:41] भोजन मिल जा रहा है तो क्या हम कह दें कि

[07:01:42] वो अमीर है। यह तो गरीबी नहीं है। भुखमरी

[07:01:45] की बातचीत है। सबसे खराब स्थिति की बातचीत

[07:01:48] है। इससे नीचे भी अब कोई चीज हो सकती है?

[07:01:51] फिर 1979 में अलग कमेटी आई जिन्होंने शहरी

[07:01:56] और ग्रामीण क्षेत्र के लिए ग्रामीण और

[07:01:58] शहरी क्षेत्र के लिए प्रयास किया कि भाई

[07:02:01] अलग-अलग गरीबी का मापन किया जाए। फिर 1993

[07:02:04] में लकड़वाला कमेटी आई। इन्होंने एक नई

[07:02:06] बात कही कि जो बिहार में गरीबी की लाइन है

[07:02:09] वो महाराष्ट्र में गरीबी की लाइन नहीं हो

[07:02:11] सकती है। तो हर राज्य के लिए अलग-अलग

[07:02:13] गरीबी की लाइन मेजर करिए। गांव के लिए

[07:02:15] अलग, शहर के लिए अलग। 2009 में सुरेश

[07:02:17] तेंदुलकर कमेटी आई थी जिन्होंने कहा था कि

[07:02:20] ₹1000 प्रति व्यक्ति प्रति माह अगर कोई

[07:02:23] व्यक्ति खर्च कर पा रहा है मासिक उपभोग को

[07:02:26] उन्होंने आधार बनाया था। सुरेश तेंदुलकर

[07:02:28] कमेटी इनकी भी काफी क्रिटिसिज्म हुआ था।

[07:02:30] फिर 2012 में सी रंगराजजन कमेटी आई थी।

[07:02:34] उसके बाद पिछले 14 वर्षों में कोई कमेटी

[07:02:36] आई नहीं। शहरी क्षेत्र में ₹1407 प्रति

[07:02:39] व्यक्ति प्रतिमाह और ग्रामीण क्षेत्र के

[07:02:42] लिए ₹972 प्रति व्यक्ति प्रतिमाह जो खर्च

[07:02:46] ना कर सके वो गरीब लोग हैं। इसके

[07:02:48] अकॉर्डिंग 2012 में हमारे देश में 21.9%

[07:02:52] जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे थी। यह फाइनल

[07:02:56] डेफिनेशन याद रखनी है। सी रंगराजजन कमेट

[07:03:00] सी रंगराजजन कमेट

[07:03:03] हमारे देश में रंगराजजन कमेटी के

[07:03:05] अकॉर्डिंग ये 2011-12

[07:03:07] के डाटा हैं। अब वर्तमान में हमारे देश

[07:03:10] में गरीबी कम हो गई है। ऐसे कई सारे

[07:03:12] आंकड़े आए हैं। बट किसी के पास ऑफिशियल

[07:03:14] डाटा नहीं है। भारत में गरीबी रेखा के लिए

[07:03:17] स्वीकृत कैलोरी आवश्यकता 2400 और 2100 की

[07:03:20] है। वैसे यह गलत था। अब इसको पूछा जाना

[07:03:23] लगभग नामुमकिन है।

[07:03:26] मिश्रित संदर्भ अवधि के आधार पर मासिक

[07:03:29] प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय के संदर्भ में

[07:03:31] गरीबी के परिकलन की सिफारिश सबसे पहले

[07:03:34] तेंदुलकर साहब ने की थी और उसके बाद फिर

[07:03:36] रंगराजन कमेटी ने उसको लाया था। मल्टी

[07:03:40] डायमेंशनल पावर्टी ये अच्छा कैलकुलेशन है।

[07:03:43] इसमें केवल रुपए की बातचीत नहीं होती।

[07:03:45] मल्टीडाइमेंशनल में हम देखते हैं कि उनके

[07:03:47] घर में खाना पकाने के लिए ईंधन कौन सा

[07:03:49] यूज़ हो रहा है। घर में पक्का मकान है कि

[07:03:51] नहीं। शिक्षा, स्वास्थ्य, जीवन स्तर की

[07:03:54] चीजें कैसी हैं?

[07:03:57] 2010 में यूनाइटेड नेशन डेवलपमेंट

[07:04:00] प्रोग्राम और ओपीएचआई के द्वारा विकसित है

[07:04:03] मल्टीडायमेंशनल पावर्टी इंडेक्स।

[07:04:07] मल्टी डायमेंशनल पावर्टी इंडेक्स 112

[07:04:10] विकासशील देशों का आकलन किया जाता है। सभी

[07:04:12] अमीर देशों का नहीं केवल 112 डेवलपिंग

[07:04:14] कंट्रीज का। इसके तीन डायमेंशन है। तीन

[07:04:17] डायमेंशन कौन से? शिक्षा, स्वास्थ्य और

[07:04:19] लिविंग स्टैंडर्ड। इन तीनों को 10

[07:04:22] इंडिकेटर में बांटा गया है। तीन डायरे तीन

[07:04:25] डायमेंशन कौन से? हेल्थ, एजुकेशन

[07:04:27] स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग। और इन डायमेंशन में

[07:04:30] 10 स्टैंडर्ड इंडिकेटर्स है। हेल्थ में

[07:04:32] न्यूट्रिशन और चाइल्ड मोटलिटी। क्योंकि

[07:04:35] गरीबी तभी होगी अगर गरीबी है तो

[07:04:37] न्यूट्रिशन पर्याप्त नहीं मिलेगा। बाल

[07:04:39] मृत्यु दर ज्यादा होगी। एजुकेशन में कितने

[07:04:42] साल तक वो पढ़ रहे हैं? कितनी अटेंडेंस

[07:04:45] है? और स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग में कुकिंग

[07:04:47] फ्यूल कौन सा है? क्या वहां शौचालय की

[07:04:50] सुविधा है? क्या स्वच्छ पीने का पानी है?

[07:04:52] बिजली का कनेक्शन है कि नहीं है? मकान खुद

[07:04:55] का है कि नहीं? प्रॉपर्टी है कि नहीं?

[07:05:02] न्यूट्रिशन का मतलब होता है कोई भी

[07:05:04] व्यक्ति जिसकी उम्र 70 साल से कम है अगर

[07:05:07] उसके पास न्यूट्रिशन की कमी है तो वह अंडर

[07:05:10] न्यूट्रिश कहलाएगा।

[07:05:12] 18 साल से कम उम्र में जिनकी मृत्यु हो

[07:05:15] जाती है उन्हें चाइल्ड मोटिलिटी में

[07:05:16] रखेंगे। अगर कोई भी व्यक्ति छ साल का है

[07:05:20] और वह स्कूल नहीं जा पा रहा है तो हम

[07:05:23] इसमें ईयर ऑफ स्कूलिंग में गरीबी में डाल

[07:05:25] देंगे।

[07:05:34] यूएनडीपी के समर्थन में ऑक्सफोर्ड पावर्टी

[07:05:38] एंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनिशिएटिव ओपीएचआई

[07:05:42] ने जो मल्टीडाइमेंशनल पावर्टी इंडेक्स

[07:05:45] बनाया 2012 में करंट अफेयर में था ये तो

[07:05:48] इसमें किनको लिया गया है पारिवारिक स्तर

[07:05:50] पर शिक्षा स्वास्थ्य संपत्ति और सेवाओं से

[07:05:53] वंचन राष्ट्रीय स्तर पर परचेसिंग पेरिटी

[07:05:56] तो दूसरा तो बिल्कुल भी नहीं होगा। हम

[07:05:58] कहेंगे दूसरा तो बिल्कुल भी नहीं आ सकता

[07:06:00] है।

[07:06:03] राष्ट्रीय स्तर पर बजट घाटे की मात्रा भी

[07:06:06] नहीं। केवल और केवल आंसर आएगा। पहली वाली

[07:06:08] बात इसमें शामिल की जाएगी।

[07:06:12] इस सूचकांक में कुल 109 देशों में 6.3 अरब

[07:06:15] जनसंख्या का आकलन किया गया। 1.1 अरब लोग

[07:06:19] लगभग 18.3%

[07:06:21] को सीवियर मल्टीडायमेंशनल पावर्टी में रखा

[07:06:24] गया।

[07:06:26] विश्व के लगभग 2/3 गरीब लोग मध्यम आय वाले

[07:06:29] देश में रहते हैं। जिसमें 55% निम्न मध्यम

[07:06:32] आय वाले में और 9% उच्च मध्यम आय वाले

[07:06:35] देशों में रहते हैं। 2017-1 से 21-22 की

[07:06:38] अवधि में बहुआयामी गरीबी में सबसे अधिक

[07:06:40] कमी दर्ज की गई। इसके बाद क्रमशः कंबोड

[07:06:44] बेनिन में कंबोडिया और तंजानिया में ऐसा

[07:06:46] हुआ। वर्तमान में खाना पकाने के लिए लगभग

[07:06:50] 97 करोड़ लोगों के पास

[07:06:53] स्वच्छ ईंधन नहीं है।

[07:06:55] 87 करोड़ लोगों के पास मकान नहीं है। 83

[07:06:59] करोड़ लोगों के पास शौचालय नहीं है। 63

[07:07:03] करोड़ लोग कुपोषण से ग्रसित हैं। और 48

[07:07:06] करोड़ लोग ऐसे बच्चे ऐसे जिन्हें विद्यालय

[07:07:08] जाने का मौका नहीं मिला।

[07:07:13] इस सूचकांक में पहली बार औपचारिक रूप से

[07:07:15] स्वीकार किया गया कि गरीबी और जलवायु एक

[07:07:17] दूसरे से जुड़े हुए हैं।

[07:07:27] जहां चार हज्स आते हैं, वहां गरीबी का

[07:07:31] आंकड़ा देखिए कितना ज्यादा है। जहां

[07:07:33] आपदाएं जितनी ज्यादा आती है, वहां गरीबी

[07:07:35] उतनी ज्यादा होगी। जहां आपदाएं कम आती है

[07:07:38] वहां गरीबी कम हो जाती है। ऐसा इनका मानना

[07:07:41] है।

[07:07:48] भारत में बहुआयामी गरीबी 20056 में जहां

[07:07:51] 55.1%

[07:07:53] थी। अब केवल 16.4%

[07:07:56] रह गई है। एक बहुत बड़ा परिवर्तन आया है।

[07:08:00] इसके पीछे का कारण है जनधन खाता, आधार और

[07:08:03] मोबाइल चैन।

[07:08:06] भारत के बड़े क्षेत्रों में अब गरीबी

[07:08:08] अत्याधिक माप तापन बाढ़, वायु प्रदूषण

[07:08:11] जैसी मिश्रित जलवायु चुनौतियों का सामना

[07:08:13] कर रही है। भारत में बहुआयामी गरीबी

[07:08:16] सूचकांक का मान 0.069 है। भारत में कुल

[07:08:19] गरीबी की तीव्रता अभी भी मौजूद है। लेकिन

[07:08:21] पहले की तुलना में कम है। याद रखना नंबर

[07:08:24] के आधार पर हमसे ज्यादा गरीब दुनिया में

[07:08:26] कहीं पर भी नहीं। नंबर के आधार पर भारत की

[07:08:29] 16.4%

[07:08:30] जनसंख्या बहुआयामी गरीबी में है और जिसमें

[07:08:33] 4.2%

[07:08:35] जनसंख्या गंभीर बहुआयामी गरीबी में हैं।

[07:08:38] भारत में कुल बहुआयामी गरीबी में

[07:08:40] स्वास्थ्य क्षेत्र में एजुकेशन में और

[07:08:43] लिविंग स्टैंडर्ड के मामले में इतने

[07:08:45] प्रतिशत लोग गरीबी में हैं।

[07:08:50] 18.7%

[07:08:51] जनसंख्या सेंसिटिव है। जो अगर समय पर काम

[07:08:54] नहीं किया गया तो यह भी गरीबी में आ

[07:08:56] जाएंगे।

[07:09:01] 5.3%

[07:09:03] जनसंख्या ऐसी है जो $3 प्रतिदिन से कम

[07:09:06] जीवन यापन में अपना जीवन यापन चला रहे

[07:09:09] हैं।

[07:09:15] हमारे देश में नीति आयोग ने ऐसा ही नेशनल

[07:09:18] मल्टीडायमेंशनल पावर्टी इंडेक्स रखा हुआ

[07:09:21] है। 10 की जगह पर 12 इंडिकेटर है। वही तीन

[07:09:24] चीजें इसमें डाले हैं। दो नए क्या जोड़े

[07:09:26] इन्होंने? बैंक खाता है कि नहीं और मैटरनल

[07:09:30] हेल्थ कैसी है इस आधार पर उन्होंने डिसाइड

[07:09:32] किया है। तो हेल्थ में न्यूट्रिशन, चाइल्ड

[07:09:35] मोटिटी और मैटरनल हेल्थ एक नया सेगमेंट

[07:09:37] जोड़ा गया है। और यह जो स्टैंडर्ड ऑफ

[07:09:40] लिविंग था स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग में बैंक

[07:09:42] अकाउंट है कि नहीं इसको भी जोड़ा गया है।

[07:09:59] बहुआयामी गरीबी सूचकांक में निम्नलिखित

[07:10:01] में से कौन सा संकेतक शामिल किया गया है?

[07:10:05] तो स्कूली शिक्षा की बातचीत अगर हम कहें

[07:10:07] तो आंसर आएगा।

[07:10:19] हमारे देश में अभी पहला संस्करण इसका 2021

[07:10:22] में आया था। दूसरा 2023 में उसके बाद अभी

[07:10:24] आया नहीं है। राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी

[07:10:27] सूचकांक 2023 दूसरी बार जब पब्लिश किया

[07:10:31] गया था जिसमें बताया गया है राज्य वाइज

[07:10:33] क्या स्थितियां हैं। फिर है सापेक्ष

[07:10:36] गरीबी। देखो सापेक्ष गरीबी सब जगह मिलेगी।

[07:10:39] अमीर देश हो, गरीब देश हो सब जगह।

[07:10:41] सापेक्षिक गरीबी का मतलब कि हमें नहीं पता

[07:10:44] कि वो व्यक्ति कितना गरीब है। पर हमें यह

[07:10:46] जरूर पता है कि वो देश के अन्य लोगों की

[07:10:48] तुलना में कम पैसे कमाता है। जिसको हम

[07:10:51] रिक्वेस्ट रियली कहते हैं इनकलिटी,

[07:10:53] असमानता। तो जब किसी भी देश में लोगों की

[07:10:58] तुलना की जाती है एक प्रकार से सापेक्षिक

[07:11:02] रूप से किसी से तुलना करते हुए तो हम इसे

[07:11:04] कहते हैं सापेक्ष गरीबी। सापेक्ष गरीबी को

[07:11:07] लॉरेंज कर्व और गिनी कोफिशिएंट से मापा

[07:11:10] जाता है। लॉरेंज ने लॉरेंज कर्व में 1905

[07:11:14] में इसे बनाया गया था। किसी देश के लोगों

[07:11:16] के बीच की आय विषमता को मापने के लिए वक्र

[07:11:19] का प्रत्येक बिंदु उन व्यक्तियों को

[07:11:20] दर्शाता है जो एक निश्चित आय स्तर से नीचे

[07:11:23] जीवन यापन करते हैं। जैसे लॉरेंज कर्व की

[07:11:26] अगर हम बातचीत करें तो इसको ऐसे समझिएगा।

[07:11:28] ये है हमारे देश की मान लीजिए जनसंख्या।

[07:11:35] ये 20% जनसंख्या, 40% जनसंख्या, 60%

[07:11:40] जनसंख्या, 80% जनसंख्या और 100% जनसंख्या।

[07:11:44] यह है हमारे देश के लोगों की इनकम। 20%

[07:11:48] इनकम, 40% इनकम, 60% इनकम, 80% इनकम, 100%

[07:11:52] इनकम। देखो, प्रैक्टिकली यह बात सही है कि

[07:11:56] अगर हमारे देश में 20% लोग 20% पैसा कमाते

[07:12:00] हैं। ध्यान से सुनना मेरी बात।

[07:12:06] यदि हमारे देश में 20% लोग 20 पैसा 20%

[07:12:10] पैसा कमाते तो हम कहेंगे कोई असमानता नहीं

[07:12:13] है।

[07:12:21] यह आइडियली होना चाहिए। ऐसा

[07:12:24] आइडियली ये ऐसा होना चाहिए था।

[07:12:27] 40% जनसंख्या 40% देश की कमाई करें। 60%

[07:12:33] जनसंख्या 60% कमाई करें। 80% जनसंख्या 80%

[07:12:38] की कमाई करें और 100% जनसंख्या 100% की

[07:12:42] कमाई करें। लेकिन ऐसा प्रैक्टिकली नहीं

[07:12:45] होता। हमारे देश में 20% जनसंख्या केवल

[07:12:51] 10% की ही कमाई कर पाती है।

[07:12:55] 40% जनसंख्या 20% की कमाई कर पाती है। 60%

[07:13:01] जनसंख्या

[07:13:04] 30% की कमाई कर पाती है। इसका मतलब जो

[07:13:08] अभागे लोग हैं उनकी कमाई औसतन बहुत कम

[07:13:12] होती है और जो अमीर लोग हैं उनकी कमाई

[07:13:14] औसतन बहुत ज्यादा होती है। तो इनका जो ये

[07:13:18] जो डिफरेंस ये जो कर्व आ रहा है इसको

[07:13:21] लॉरेंज कर्व कहते हैं। इसको इक्विटी ऑफ

[07:13:25] लाइन कहते हैं। और इस कर्व का जो एरिया

[07:13:28] मेजर किया जाता है एरिया उस आधार पर

[07:13:31] डिसाइड करते हैं गिनी कोफिशिएंट को। इटली

[07:13:34] के कोराडो गिनी द्वारा 1912 में विकसित

[07:13:37] किसी देश के धनी और निर्धन लोगों की आय या

[07:13:40] संपदा में विद्यमान अंतर को मापने का एक

[07:13:43] उपाय। आय में वितरण की विषमता को मापने की

[07:13:46] सबसे प्रचलित विधि है। गिनी गुणांक जीरो

[07:13:48] से वन होता है। जीरो का मतलब है पूर्ण

[07:13:51] समानता। कहीं वहां असमानताएं नहीं है। और

[07:13:54] वन का मतलब है कि पूर्ण रूप से असमानता।

[07:13:57] सब लोग पूरा पैसा एक व्यक्ति के पास है और

[07:14:00] पूरा 99% जनसंख्या के पास कुछ भी नहीं है।

[07:14:03] इसे रेश्यो के रूप में कैलकुलेट करते हैं।

[07:14:06] मान लीजिए ये रियल लाइन है जो और ये

[07:14:09] वास्तविक लाइन है। मतलब ये स्टैंडर्ड लाइन

[07:14:11] है और ये वास्तविक लाइन है। तो ये जो

[07:14:13] एरिया आ रहा है इसको नाम A दिया। नीचे का

[07:14:16] एरिया जो नाम है उसको B दे दिया। तो इसका

[07:14:19] जितना गैप आता जाएगा उसे नाम देंगे a और

[07:14:22] जो टोटल का दोनों जोड़ आ जाएगा उसे a + b

[07:14:26] इन दोनों के अनुपात को गिनी कोफिशिएंट

[07:14:28] कहेंगे। इमेजिन करिए कि अगर वास्तविक लाइन

[07:14:32] ही स्टैंडर्ड लाइन के बराबर आ जाए तो a की

[07:14:35] वैल्यू जीरो हो जाएगी।

[07:14:38] a की वैल्यू ज़ीरो हो जाएगी। तो ओवरऑल ज़ीरो

[07:14:41] आ जाएगा। का गिनी कोफिशिएंट मतलब कोई

[07:14:43] असमानता नहीं है और जितना ज्यादा असमानता

[07:14:46] ज्यादा होगी a की वैल्यू उतनी ही बड़ी

[07:14:49] होती चली जाएगी। तो a की वैल्यू जितनी

[07:14:52] बड़ी रहेगी मतलब मैक्सिमम a की वैल्यू हो

[07:14:55] सकता है इतनी हो जाए। तो ऐसी सिचुएशन में

[07:14:58] हम मानेंगे कि सबसे ज्यादा असमानता उस देश

[07:15:02] में है। तो गिनी कोफिशिएंट जीरो रहेगा तो

[07:15:05] समानता वन रहेगा तो असमानता।

[07:15:08] लॉरेंज कर्व और गिनी कोिशंट का संबंध

[07:15:11] किससे है? सापेक्षिक गरीबी से है।

[07:15:15] गरीबी क्यों आ जाती है किसी देश में? हो

[07:15:18] सकता है कि बहुत लंबे समय तक अमीर देशों

[07:15:20] ने उसका शोषण किया हो। उस देश का जीडीपी

[07:15:23] बहुत कम हो। एग्रीकल्चर पर डिपेंडेंसी

[07:15:26] ज्यादा हो और उसमें उत्पादकता अच्छी ना

[07:15:28] हो। इकोनॉमिकल डेवलपमेंट अच्छा ना हो रहा

[07:15:31] हो। जनसंख्या बहुत ज्यादा हो। महंगाई

[07:15:33] ज्यादा हो। इनकम का डिस्ट्रीब्यूशन सही

[07:15:36] तरीके से ना हो। कुछ लोगों के पास संसाधन

[07:15:38] पूरी तरह से जमा हो गए हो। बेरोजगारी या

[07:15:41] फिर हो सकता है कि सरकार पर्याप्त रूप से

[07:15:44] इन्वेस्टमेंट ना कर रही हो।

[07:15:46] इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव, अकुशल संसाधन,

[07:15:49] सामाजिक कारक, जातिगत भेदभाव, जलवायु,

[07:15:52] पर्यावरणीय कारक, भौगोलिक कारक। अब जैसे

[07:15:55] भारत जैसा देश ट्रॉपिकल क्षेत्र में आता

[07:15:57] है तो गर्मी के समय में यहां काम करना

[07:15:59] मुश्किल हो जाता है। लेकिन वे लोग जो यहां

[07:16:02] पर रहते होंगे वो तब भी बढ़िया से काम कर

[07:16:04] रहे होंगे क्योंकि यहां इतनी गर्मी नहीं

[07:16:06] हो रही है।

[07:16:08] शिक्षा, जन जागरूकता का अभाव, सरकारी

[07:16:11] नीतियों का दोषपूर्ण क्रियान्वयन,

[07:16:13] भ्रष्टाचार ये सब के सब गरीबी के लिए

[07:16:15] जिम्मेदार कारक कहलाते हैं। किसी

[07:16:18] अर्थव्यवस्था में निर्धनता की समस्या के

[07:16:21] प्रमुख कारण क्या है? कैपिटल फॉर्मेशन

[07:16:23] नहीं हो रहा होगा, इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं

[07:16:25] होगा, डिमांड की कमी होगी, अधिक जनसंख्या

[07:16:29] होगी। तो याद रखिएगा कि कहीं पर भी अगर हम

[07:16:32] बात करें तो डिमांड ये उत्तर देखा जाए ये

[07:16:38] वाला गलत ऑप्शन आ गया।

[07:16:42] तो हम कहेंगे कि 1 2 3 4 की चीजें उतनी

[07:16:45] प्रॉपर्ली चीजें विकसित नहीं हो पाई।

[07:16:47] जनसंख्या ज्यादा हो गई। इन सबको हम नाम

[07:16:50] देते हैं कि यहां पर गरीबी आ गई। दूसरा

[07:16:52] टॉपिक है अनइंप्लॉयमेंट।

[07:16:54] अनइंप्लॉयमेंट मतलब अपनी मर्जी से अगर वो

[07:16:57] काम नहीं कर रहा है तो उसे कहते हैं

[07:16:59] स्वैच्छिक बेरोजगारी। वह हमारे लिए चिंता

[07:17:01] की बातचीत नहीं है। पर अगर कोई व्यक्ति सच

[07:17:04] में काम करना चाहता है लेकिन फिर भी उसको

[07:17:06] रोजगार नहीं मिल रहा है तो वह बेरोजगारी

[07:17:08] अनैच्छिक इनवॉलंटरी कहलाती है। वो ज्यादा

[07:17:11] खतरनाक है। वर्ल्ड बैंक के अनुसार

[07:17:13] बेरोजगारी का अर्थ है श्रम शक्ति के उस

[07:17:16] हिस्से से जो बिना काम के लेकिन रोजगार के

[07:17:19] लिए उपलब्ध है। रोजगार की तलाश कर रहा है।

[07:17:22] इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन। बेरोजगारी

[07:17:24] में रोजगार से बाहर होना, काम के लिए

[07:17:26] उपलब्ध होना, सक्रिय रूप से काम की तलाश

[07:17:29] करना शामिल है कि भाई काम भी ढूंढ रहा है

[07:17:31] लेकिन फिर भी काम नहीं मिल रहा है। सक्रिय

[07:17:34] रूप से कोई काम करे लेकिन फिर भी काम ना

[07:17:36] मिले तब जाकर हम उसे कहते हैं कि वह

[07:17:39] बेरोजगार कहलाएगा। वह बेरोजगार कहलाएगा।

[07:17:45] तो ऐच्छिक बेरोजगारी कोई अपनी मर्जी से ही

[07:17:48] काम नहीं करना चाहता है। कोई दिक्कत नहीं

[07:17:50] है। अनैच्छिक बेरोजगारी काम करना चाहता है

[07:17:53] लेकिन फिर भी काम नहीं मिल पा रहा। याद

[07:17:55] रखिएगा अर्थशास्त्र में केवल अनैच्छिक

[07:17:57] बेरोजगारी का ही वर्णन किया जाएगा। हमारे

[07:18:00] देश में या दुनिया भर में कार्यकारी

[07:18:02] जनसंख्या मतलब काम करने योग्य जनसंख्या

[07:18:05] किसे कहते हैं? 15 से 64 साल के व्यक्ति

[07:18:08] को हम काम करने योग्य कहते हैं। अगर वह

[07:18:11] हेल्दी है और काम करने की योग्यता रखता है

[07:18:14] तो इसे कहते हैं वर्किंग पापुलेशन।

[07:18:18] लेकिन इनमें से सारे लोग इच्छा व्यक्त

[07:18:20] नहीं करते काम करने की। कुछ लोग आराम करना

[07:18:23] चाहते हैं जिनका काम करने का मन नहीं है।

[07:18:26] तो वर्किंग पापुलेशन में से अगर वॉलंटरी

[07:18:29] अनइंप्लॉयमेंट को हटा दे तो हमें मिल जाता

[07:18:32] है लेबर फ़। लेबर फोर्स मतलब 15 से 64 वर्ष

[07:18:36] का कोई भी स्वस्थ व्यक्ति जो कार्य करने

[07:18:38] की योग्यता क्षमता के साथ इच्छा भी रखता

[07:18:42] है। इसका मतलब हो गया कि वेंटरी

[07:18:45] अनइंप्लॉयमेंट का मतलब यह रहेगा कि

[07:18:48] वर्किंग पापुलेशन में से लेबर फोर्स को

[07:18:51] हटा दीजिए तो अपनी मर्जी से

[07:18:56] वह बेरोजगार है। लेकिन लेबर फोर्स का ऐसा

[07:19:00] व्यक्ति जिसको रोजगार मिल गया। जिसको

[07:19:05] रोजगार मिल गया वह वर्क फोर्स में आ

[07:19:08] जाएगा। तो लेबर फोर्स में से वर्क फोर्स

[07:19:10] को माइनस करेंगे तो हमें मिल जाएगा

[07:19:13] अनइंप्लॉयमेंट

[07:19:15] जो हमारे लिए चिंता की बातचीत है कि

[07:19:17] बेचारे की इच्छा भी थी लेकिन काम नहीं मिल

[07:19:19] पाया। तो वर्क फ़ोर्स का मतलब होता है श्रम

[07:19:22] बल में आने वाला वह व्यक्ति जिसको रोजगार

[07:19:24] मिल चुका है उसे कहते हैं कार्य बल। श्रम

[07:19:27] बल में से कार्य बल को माइनस करेंगे तो

[07:19:29] बेरोजगार लोग पता चल जाएंगे। श्रम बल के

[07:19:32] अंतर्गत आने वाला व्यक्ति प्लस न्यूनतम

[07:19:35] वेतन पर भी कार्य ना मिलने वाले व्यक्ति

[07:19:37] को हम कहते हैं कि वह बेरोजगार है। जब

[07:19:39] किसी देश में कार्य करने वाली जनशक्ति

[07:19:42] अधिक हो और काम करने के लिए राजी होते हुए

[07:19:44] भी लोगों को प्रचलित मजदूरी पर काम ना

[07:19:46] मिले तो उसे बेरोजगार कहा जाता है।

[07:19:48] बेरोजगारी का होना या ना होना श्रम की

[07:19:51] मांग और उसकी आपूर्ति के बीच स्थिर अनुपात

[07:19:53] पर निर्भर करता है।

[07:20:28] पूर्ण रोजगार पूर्ण रोजगार उस स्थिति को

[07:20:31] संदर्भित करते हैं जिसमें प्रत्येक सक्षम

[07:20:34] व्यक्ति जो प्रचलित मजदूरी दर पर काम करने

[07:20:36] का इच्छुक था सबको काम मिल गया। ऐसा देखो

[07:20:40] पूर्ण रोजगार में भी ऐच्छिक बेरोजगार तो

[07:20:43] रहेंगे लेकिन जो इच्छा व्यक्त कर रहे थे

[07:20:45] काम करने की उनको अगर रोजगार मिल गया तो

[07:20:48] हम उसे कहेंगे कि पूर्ण रोजगार आ गया है।

[07:20:51] किस पूर्ण रोजगार को अनैच्छिक बेरोजगारी

[07:20:54] के अनुपस्थिति के रूप में परिभाषित करते

[07:20:56] हैं कि भ जो लोग इच्छा से काम करना चाहते

[07:21:00] थे वे लोग अब बेरोजगार नहीं है। फुल

[07:21:03] एंप्लॉयमेंट एब्सेंस ऑफ इनवोलेंटरी

[07:21:05] अनइंप्लॉयमेंट। इनवोलंटरी अनइंप्लॉयमेंट

[07:21:07] तो कभी खत्म होगा ही नहीं। वैसे तो

[07:21:10] सवित्मक रोजगार ऐसा रोजगार जिसमें किसी

[07:21:13] कर्मचारी को काम करने से पहले कॉन्ट्रैक्ट

[07:21:15] की शर्तों पर साइन करना पड़ता है उसे कहते

[07:21:17] हैं कॉन्ट्रकुअल एंप्लॉयमेंट। बेरोजगारी

[07:21:20] कितने प्रकार की होती है? सबसे पहली होती

[07:21:23] है चक्रीय बेरोजगारी। बाजार अर्थव्यवस्था

[07:21:26] के अंतर्गत मंदी के समय आने वाली

[07:21:28] बेरोजगारी चक्रीय बेरोजगारी कहलाती है।

[07:21:30] मंदी फिर कुछ टाइम में चली जाती है।

[07:21:32] कंफर्म है। मौसमी बेरोजगारी वर्ष के कुछ

[07:21:36] निश्चित मौसम में काम नहीं मिलता। जैसे

[07:21:38] कृषि क्षेत्र में गर्मी के समय में काम

[07:21:40] नहीं मिल पाता है। घर्षण जनित या

[07:21:43] प्रतिरोधात्मक बेरोजगारी। किसी कर्मचारी

[07:21:46] द्वारा एक रोजगार छोड़कर दूसरे रोजगार को

[07:21:49] प्राप्त करने के बीच का अंतराल। ये

[07:21:51] बेरोजगारी खराब नहीं होती। इसमें क्या

[07:21:53] करता है वो? ज्यादा सैलरी की उम्मीद में

[07:21:56] दूसरी जगह जॉब करने का विकल्प ढूंढता है।

[07:21:58] तो एक नौकरी को छोड़कर दूसरी नौकरी को

[07:22:01] प्राप्त करने के बीच में जब वो बेरोजगार

[07:22:04] रहा तो उसको कहते हैं एक प्रकार से

[07:22:06] फिक्शनल बेरोजगारी।

[07:22:10] दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली के कारण तकनीकी

[07:22:12] कुशलता में कमी के कारण जैसे हमारे देश

[07:22:15] में आजकल इंजीनियरिंग करने के बावजूद भी

[07:22:17] व्यक्ति के पास उस विषय का इंजीनियरिंग

[07:22:19] नॉलेज नहीं होता है। तो अगर शिक्षा की

[07:22:21] ड्रॉबैक पद्धति के कारण वह बिल्कुल उस

[07:22:24] टेक्नोलॉजिकल स्किल को प्राप्त नहीं कर

[07:22:27] पाया तो एजुकेटेड अनइंप्लॉयमेंट कहलाता

[07:22:29] है। प्रौद्योगिकी में बदलाव के कारण जैसे

[07:22:31] अब वर्तमान में एआई की डिमांड बढ़ चुकी

[07:22:34] है। वर्तमान में एआई बेस्ड काम करने वाले

[07:22:36] लोगों की मांग बढ़ गई है तो उसे कहते हैं

[07:22:38] टेक्नोलॉजिकल अनइंप्लॉयमेंट कि भाई वहां

[07:22:41] तकनीक अपग्रेड अपग्रेडेशन तो हुआ लेकिन

[07:22:44] जनता अपग्रेड नहीं हो पाई। फिर होती है

[07:22:46] संरचनात्मक बेरोजगारी। बाजार में उपलब्ध

[07:22:49] नौकरी और श्रमिकों के कौशल के बीच असंतुलन

[07:22:52] के कारण भारत में इस प्रकार की बेरोजगारी

[07:22:54] बहुत ज्यादा है। बाजार में डिमांड बहुत है

[07:22:57] लेकिन उस टाइप के लोग नहीं मिल पा रहे

[07:22:59] हैं। तो इस कारण से बेरोजगार हो गए वो लोग

[07:23:02] क्योंकि उन्हें उस उस स्किल आती नहीं है।

[07:23:05] फिर होती है डिसगाइस्ड अनइंप्लॉयमेंट।

[07:23:07] प्रछन्न बेरोजगारी। श्रमिक रोजगार में तो

[07:23:10] होता है लेकिन उसकी सीमांत उत्पादकता

[07:23:12] शून्य होती है हमारे देश में कृषि क्षेत्र

[07:23:14] में। परिवार के पूरे लोग मिलकर किता

[07:23:17] किसानी कर रहे हैं। जबकि जरूरत एक आदमी की

[07:23:19] थी। चार लोग कर रहे हैं काम। अगर तीन लोग

[07:23:22] काम ना भी करें तब भी कोई उत्पादन पर फर्क

[07:23:25] नहीं पड़ेगा। तो इसे कहते हैं डिसगाइज्ड

[07:23:27] या एक प्रकार से प्रछन्न बेरोजगारी।

[07:23:32] प्रछन्न बेरोजगारी का सामान्य अर्थ क्या

[07:23:35] होता है?

[07:24:02] उत्पादकता शून्य होगी।

[07:24:05] श्रम बल के अंतर्गत आने वाला वह व्यक्ति

[07:24:08] जिसे न्यूनतम वेतन पर भी काम ना मिले इसे

[07:24:10] कहते हैं ओपन या डायरेक्ट अनइंप्लॉयमेंट।

[07:24:14] पुरानी या परंपरागत बेरोजगारी। कार्य बल

[07:24:17] के बढ़ने के कारण रोजगार के अवसरों का

[07:24:19] सीमित हो जाना। मतलब एक प्रकार से

[07:24:22] जनसंख्या बढ़ गई और फिर बेरोजगारी आ गई।

[07:24:25] वलनेरेबल एंप्लॉयमेंट लोग बिना उचित नौकरी

[07:24:28] या कॉन्ट्रैक्ट के अनौपचारिक रूप से काम

[07:24:30] कर रहे हैं और इसलिए उनके पास अपने कार्य

[07:24:32] के संबंध में कोई कानूनी सुरक्षा नहीं है।

[07:24:34] इन व्यक्तियों को बेरोजगार माना जाता है

[07:24:36] क्योंकि उनके कार्य का रिकॉर्ड कहीं पर भी

[07:24:38] नहीं होता है। सुभेद्य रोजगार कहते हैं।

[07:24:41] मतलब भाई ठीक है उन्हें रोजगार भले ही मिल

[07:24:43] रहा है लेकिन वह कभी भी बेरोजगार हो सकते

[07:24:45] हैं। सेंसिटिव हैं। बेरोजगारी के कारण

[07:24:48] क्या है? कुटिर और लघु उद्योग नहीं है

[07:24:50] क्योंकि सबसे ज्यादा रोजगार कृषि के बाद

[07:24:52] अगर देता है तो एमएसएमई डिपेंडेंसी अगर

[07:24:55] कृषि पर ज्यादा होगी और इंडस्ट्रियल

[07:24:57] डेवलपमेंट नहीं होगा तो प्रॉब्लम आएगी

[07:25:00] श्रम की गतिहीनता श्रम अपने आप को अपडेट

[07:25:03] नहीं कर पाया सोशल कॉजेस कई प्रकार के

[07:25:06] सामाजिक कारण जिसमें स्किल डेवलपमेंट नहीं

[07:25:08] सीख पाए एजुकेशन सिस्टम का कहीं ना कहीं

[07:25:11] खराब रहना जनसंख्या का ज्यादा बढ़ना

[07:25:13] तकनीकी प्रगति के कारण मशीनीकरण इतना

[07:25:16] ज्यादा हुआ कि लोग मशीन मशीनों से ही

[07:25:18] ज्यादा काम करने लग गए। एआई और रोबोटिक्स

[07:25:21] जैसी चीजें हो सकती है। कोरोना जैसी

[07:25:23] महामारियां, सरकारी नीतियों का दोषपूर्ण

[07:25:25] क्रियान्वयन।

[07:25:27] बेरोजगारी को मापते कैसे हैं? बेरोजगारी

[07:25:31] लोगों की संख्या बराबर श्रमबल माइनस

[07:25:33] कार्यबल। कि भाई कितने लोगों को रोजगार

[07:25:35] मिल गया उनको हटा दो और जो इच्छा रखते थे

[07:25:37] टोटल लोगों में से हटाने के बाद जो बच गया

[07:25:39] वो बेरोजगार है। बेरोजगारी दर को मापा

[07:25:42] जाता है कि बेरोजगार व्यक्तियों की संख्या

[07:25:44] कितनी है और कुल श्रमबल कितना है? मतलब

[07:25:47] कुल लोगों की संख्या जो काम करने की इच्छा

[07:25:49] व्यक्त कर रहे हैं। बेरोजगार व्यक्तियों

[07:25:52] की संख्या का मतलब रहेगा एक प्रकार से

[07:25:55] बेरोजगार लोगों की संख्या और 15 वर्ष से

[07:25:57] अधिक कुल जनसंख्या को हम कहते हैं

[07:25:58] बेरोजगारी का अनुपात। फिर है लेबर फोर्स

[07:26:02] पार्टिसिपेशन रेट। श्रम बल टोटल श्रम बल

[07:26:05] में कितने लोग हैं और 15 वर्ष से अधिक आयु

[07:26:07] की संख्या कुल कितनी है? जैसे इमेजिन करिए

[07:26:10] 15 वर्ष से कुल ज्यादा लोग 100 हैं और 100

[07:26:13] में से लगभग 80 लोग काम करना चाहते हैं।

[07:26:16] तो हम कहेंगे कि काम करना चाहते मतलब 80%

[07:26:21] लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट है। वर्क

[07:26:24] फोर्स पार्टिसिपेशन रेट एक प्रकार से

[07:26:26] कितने लोगों को काम मिल पाया? यह तो इच्छा

[07:26:29] रखने वाले हैं। लेकिन काम केवल 60% लोगों

[07:26:32] को ही मिला। तो 60% वर्क फोर्स

[07:26:35] पार्टिसिपेशन रेट है। 20% बेरोजगारी की दर

[07:26:39] हो जाएगी।

[07:26:43] बेरोजगारी की तीव्रता वास्तविक जीडीपी के

[07:26:46] प्रति लाख पर रोजगार प्राप्त व्यक्तियों

[07:26:48] की संख्या मतलब जीडीपी का ₹1 लाख उत्पादन

[07:26:51] होने के लिए कितने लोगों की जरूरत पड़ती

[07:26:54] है और श्रमिक जनसंख्या अनुपात जनसंख्या

[07:26:56] में नियोजित व्यक्तियों का वह प्रतिशत जो

[07:26:59] वास्तविक रूप में काम करने के अब योग्य हो

[07:27:02] चुके हैं।

[07:27:08] भारत में बेरोजगारी को मापने का काम

[07:27:11] मिनिस्ट्री ऑफ लेबर एंड एंप्लॉयमेंट वालों

[07:27:14] का है।

[07:27:16] नेशनल स्टैटिकल ऑफिस का है।

[07:27:20] रोजगार कार्यालय डाटा का है। भारतीय

[07:27:23] अर्थव्यवस्था निगरानी केंद्र सीएमई का है।

[07:27:26] और सेंसस डाटा भी इसको दर्शाते हैं। श्रम

[07:27:29] और श्रम ब्यूरो रोजगार प्रशिक्षण

[07:27:31] महानिदेशालय के माध्यम से समय-समय पर

[07:27:34] सर्वे कराया जाता है। एनएसओ समय-समय पर

[07:27:37] सर्वे कराते हैं जिससे पता चलता है कि

[07:27:39] क्या चीजें हैं। एनएसओ 2019 में बनाया गया

[07:27:43] क्योंकि पहले तो दो ऑफिस हुआ करते थे।

[07:27:45] सेंट्रल स्टैटिकल ऑफिस और नेशनल सैंपल एंड

[07:27:48] सर्वे ऑफिस। इन दोनों को जोड़कर 2019 में

[07:27:50] एनएसओ बना दिया गया है। एनएसओ हमारे देश

[07:27:53] में केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम

[07:27:56] कार्वयन मंत्रालय के अंतर्गत एक संस्था

[07:27:58] है। यहां का जो सेक्रेटरी होता है इसे

[07:28:00] भारत का मुख्य सांख्यिकी वित्त कहते हैं।

[07:28:04] इस मंत्रालय का मुख्य सांख्यिकी विद मतलब

[07:28:07] भारत का सांख्यिक विद जैसे भारत के चीफ

[07:28:09] जस्टिस ऑफ इंडिया होते हैं। भारत का

[07:28:11] इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया होता है। वैसे ही

[07:28:14] भारत का चीफ स्टिकल ऑफिसर कहलाता है यहां

[07:28:17] का सेक्रेटरी।

[07:28:25] बेरोजगारी को मापने की दो तरीके होते हैं।

[07:28:27] एक होता है सामान्य स्थिति, यूजुअल

[07:28:29] स्टेटस, वर्तमान साप्ताहिक स्थिति और

[07:28:32] वर्तमान दैनिक स्थिति।

[07:28:35] पीरियडिक लेबर फोर्स सर्वे। भारत में

[07:28:38] रोजगार और बेरोजगारी की स्थिति को मापने

[07:28:40] के सर्वे को कहते हैं। केंद्रीय सांख्यिकी

[07:28:43] कार्यक्रम मंत्रालय के अंतर्गत एनएसओ इसको

[07:28:45] मापता है। प्रतिवर्ष सामान्य स्थिति

[07:28:49] वर्तमान साप्ताहिक स्थिति का उपयोग करके

[07:28:51] श्रम बल भागीदारी दर और जन श्रमिक

[07:28:53] जनसंख्या अनुपात और बेरोजगारी दर को मापा

[07:28:56] जाता है। यह जो पीरियडिक लेबर फोर्स सर्वे

[07:29:00] होता है, इसके पीछे दो मकसद होते हैं। एक

[07:29:02] तो साप्ताहिक स्थिति को भी मापने की कोशिश

[07:29:05] की जाती है। प्रत्येक 3 महीने के अंतराल

[07:29:07] पर शहरी क्षेत्र में और सामान्य स्थिति

[07:29:10] में हम एक प्रकार से मापदंडों का उपयोग

[07:29:13] करके गांव और शहरों की बेरोजगारी का

[07:29:15] मेजरमेंट करते हैं। सामान्य स्थिति का

[07:29:18] मतलब होता है कि सर्वेक्षण के दौरान पिछले

[07:29:20] 1 साल में यदि 30 दिन या उससे अधिक का

[07:29:23] कार्य मिला हो तो उसे रोजगार में संलिप्त

[07:29:26] व्यक्ति कह देते हैं। मतलब हम कह दे कि

[07:29:28] भाई तुम तो रोजगार वाले हो। 1 साल में 1

[07:29:30] महीने का काम मिल जाए। सर्वेक्षण के दौरान

[07:29:33] पिछले एक सप्ताह में यदि एक दिन के लिए भी

[07:29:36] 1 घंटे का काम मिला हो तब भी हम कहेंगे कि

[07:29:39] वह तो साप्ताहिक रूप से काम मिल रहा है।

[07:29:42] सर्वे के दौरान यदि कोई व्यक्ति किसी दिन

[07:29:44] में न्यूनतम 4 घंटे का कार्य प्राप्त कर

[07:29:47] लेता हो तो उसे कहेंगे कि वर्तमान दैनिक

[07:29:50] स्थिति में वो रोजगार है। यह साप्ताहिक

[07:29:52] रोजगार और यह दैनिक। दैनिक में 4 घंटे

[07:29:54] सप्ताह में किसी एक दिन मिलना चाहिए।

[07:29:58] आंकड़ों के अनुसार भारत में श्रमिक

[07:30:00] जनसंख्या कितनी है हमारे देश में? तो लगभग

[07:30:03] 58.2%

[07:30:06] पुरुषों में श्रमिक महिलाओं में श्रमिक

[07:30:09] क्योंकि इच्छा रखने वाले लोग होने चाहिए।

[07:30:12] ग्रामीण बेरोजगारी 2.5% है। शहरी

[07:30:14] बेरोजगारी 5.1% है। महिला बेरोजगारी 3.2%

[07:30:18] है। पुरुष बेरोजगारी भी 3.2% है। हमारे

[07:30:21] देश के लेटेस्ट डाटा है।

[07:30:24] बेरोजगारी गणना पद्धति में सुधार के लिए

[07:30:27] कई सुझाव दिए गए हैं कि अब आप इस पद्धति

[07:30:29] में डाटा थोड़ा सा बेटर तरीके से लीजिए।

[07:30:34] सॉल्यूशन क्या है? अगर बेरोजगारी को खत्म

[07:30:37] करना है तो स्किल डेवलपमेंट कराइए।

[07:30:39] विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ाइए। ऑटोमेशन

[07:30:42] टेक्नोलॉजिकल डेवलपमेंट को बेस्ट करने की

[07:30:44] कोशिश करिए। अनऑर्गनाइज सेक्टर को

[07:30:46] ऑर्गेनाइज सेक्टर में कन्वर्ट करने की

[07:30:48] बातचीत करिए ताकि सुरक्षा रहे काम के

[07:30:50] कामों में। इनोवेशन और एंटरप्रेन्योरशिप

[07:30:53] को बढ़ाने की कोशिश करिए। गिग वर्कर यह

[07:30:56] हमारे देश में नए प्रकार के काम वाले लोग

[07:30:58] हैं जो कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर काम करते

[07:31:00] हैं। जैसे डिलीवरी का काम करने वाले

[07:31:03] ब्लिंकिट पर Zeptotो पर जो 10-10 मिनट की

[07:31:05] डिलीवरी करते हैं। sविg पर, Zomato पर जो

[07:31:08] काम करने वाले लोग हैं या मैं जो अनअकडमी

[07:31:10] पर काम करता हूं। ये गिग वर्कर होते हैं

[07:31:12] जो कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर काम करते हैं।

[07:31:15] इनकी कोई फिक्स्ड मतलब सैलरी वाली बातचीत

[07:31:19] नहीं होती। गिग अर्थव्यवस्था शब्द का पहली

[07:31:21] बार उपयोग 2009 में पत्रकार टीना ब्राउन

[07:31:24] द्वारा किया गया था। गिग अर्थव्यवस्था एक

[07:31:26] ऐसी आर्थिक व्यवस्था है जिसमें कामकाजी

[07:31:29] लोग टेंपरेरी ठेके पर कॉन्ट्रैक्ट बेसिस

[07:31:32] पर परियोजना पर काम करते हैं। इस प्रकार

[07:31:35] की व्यवस्था में लोग स्वतंत्र रूप से

[07:31:37] छोटे-छोटे कार्य करते हैं जिन्हें गिक्स

[07:31:39] कहते हैं। गिग अर्थव्यवस्था में काम करने

[07:31:41] लोग अधिक लचीलापन और फ्लेक्सिबिलिटी रखते

[07:31:43] हैं। ग्रीक श्रमिक वह श्रमिक होता है जो

[07:31:45] गिग अर्थव्यवस्था का हिस्सा होता है।

[07:31:50] द्विक श्रमिक अपनी सेवाएं विभिन्न कामों

[07:31:52] में Ola Uber ड्राइवर के रूप में अर्बन

[07:31:55] क्लैप में जो काम कर रहे हैं यह सब कुछ

[07:31:57] गिग वर्कर्स कहलाते हैं। इर्रेगुलर इनकम

[07:32:00] होती है। थोड़ा सा बेनिफिट उतना बेहतर

[07:32:03] नहीं होता है। पर एक है कि फ्लेक्सिबिलिटी

[07:32:05] काफी ज्यादा होती है। अपने अकॉर्डिंग काम

[07:32:07] करते हैं। अपनी मर्जी का काम कर सकते हैं।

[07:32:10] इंडिपेंडेंसी ज्यादा मिलती है और वर्क

[07:32:13] लाइफ बैलेंस ज्यादा बेटर हो पाता है।

[07:32:17] 2020 में हमारे देश की संसद ने गिग

[07:32:20] वर्करों को भी सोशल सिक्योरिटी देने के

[07:32:22] लिए कानून में संशोधन कर दिया है।

[07:32:25] राजस्थान गिग श्रमिकों को सुरक्षा देने

[07:32:27] वाला पहला राज्य बन चुका है। अब बात करते

[07:32:31] हैं इनफ्लेशन मुद्रास्फीति। देखो

[07:32:35] मुद्रास्फीति इनफ्लेशन एक प्रकार से

[07:32:38] कीमतों का ज्यादा बढ़ जाना है या एक

[07:32:41] प्रकार से देश में एम3 का ज्यादा बढ़

[07:32:44] जाना। मैंने आपको बार-बार पढ़ाया कि अगर

[07:32:46] किसी भी देश में मुद्रा की आपूर्ति ज्यादा

[07:32:50] हो जाती है और उतना वस्तु सेवा का उत्पादन

[07:32:53] नहीं होता है तो इससे महंगाई आती है।

[07:32:56] महंगाई का अर्थ क्या है? मुद्रास्फीति के

[07:32:59] कारक क्या है? मुद्रास्फीति के प्रकार

[07:33:01] क्या है? इन सभी चीजों पर हम बातचीत कर

[07:33:03] रहे हैं।

[07:33:05] मुद्रास्फीति का मतलब होता है मनी का बढ़

[07:33:08] जाना, मुद्रा आपूर्ति का बढ़ जाना या

[07:33:10] वस्तु और सेवाओं के मूल्य का बढ़ना। वैसे

[07:33:14] इसको कहते हैं मुद्रास्फीति रियल में कि

[07:33:16] मुद्रा पैसों का आपूर्ति बढ़ जाना

[07:33:19] इनफ्लेशन इनफ्लेट हो गया फैल गया वस्तु

[07:33:23] सेवा के मूल्य को बढ़ने को हम महंगाई कह

[07:33:26] सकते हैं। मुद्रास्फीति का तात्पर्य

[07:33:28] अर्थव्यवस्था में विभिन्न वस्तु सेवाओं की

[07:33:30] कीमतें लगातार बढ़ जाती है। अर्थव्यवस्था

[07:33:33] में मुद्रा की आपूर्ति बढ़ने के कारण

[07:33:35] मुद्रा की कीमतों में गिरावट हो गई।

[07:33:37] मुद्रा की कीमत कैसे गिर गई? इमेजिन करिए

[07:33:40] कि एक पेन आज ₹100 का था जिसको मैं खरीद

[07:33:43] सकता था। अगले साल यह ₹120 का हो गया।

[07:33:46] मैंने ₹100 बैंक में डाले थे। वह अगले साल

[07:33:49] ₹105 में बदल गए। लेकिन आज मेरे ₹15 की

[07:33:53] औकात ₹120 वाले पेन खरीदने की नहीं रही।

[07:33:56] मतलब रुपए की वैल्यू्यूएशन कम हो गई और

[07:33:59] वस्तु की वैल्यू्यूएशन बढ़ गई। तो इसे

[07:34:01] कहते हैं कि एक प्रकार से मुद्रा की कीमत

[07:34:04] का गिरना है। मुद्रास्फीति मुख्य रूप से

[07:34:07] डिमांड पुल के कारण, सप्लाई पुश के कारण

[07:34:10] या अदर फैक्टर्स के कारण हो सकता है। मांग

[07:34:12] प्रेरित का मतलब होता है कि एक प्रकार से

[07:34:15] मांग बढ़ जाने के कारण कीमतें बढ़ गई।

[07:34:18] आपूर्ति का मतलब होता है कि आपूर्ति में

[07:34:20] कमी आ जाने के कारण कीमतें बढ़ गई। और

[07:34:23] अन्य कारक का मतलब हो सकता है हड़ताल हो

[07:34:25] गई होगी या फिर मानसून खराब आ गया होगा या

[07:34:29] फिर हो सकता है कि पेट्रोल डीजल की कीमतें

[07:34:32] बढ़ गई होगी।

[07:34:35] समग्र मांग और खपत में वृद्धि के कारण

[07:34:37] वस्तु और सेवाओं की कीमतों में वृद्धि को

[07:34:40] मांग प्रेरित मुद्रास्फीति कहा जाता है।

[07:34:42] मतलब ओवरऑल डिमांड बहुत ज्यादा बढ़ गई।

[07:34:45] डिमांड बढ़ जाने के पीछे कई कारण हो सकते

[07:34:48] हैं। लोगों के पास हो सकता है टैक्स कम लग

[07:34:50] गया हो तो लोगों के पास ज्यादा पैसा बच

[07:34:52] गया होगा या हो सकता है मांग बढ़ने का

[07:34:55] कारण है कि जनसंख्या बढ़ गई होगी या हो

[07:34:57] सकता है कि मांग बढ़ने का पीछे का रीजन यह

[07:35:00] है कि लोग अब उसको ज्यादा खरीदने लग गए

[07:35:02] होंगे। कई कारण हो सकते हैं किसी वस्तु की

[07:35:04] मांग बढ़ने के। तो मुख्य रूप से मांग

[07:35:07] बढ़ने को जब हम कहेंगे प्रायो जाए

[07:35:09] डिस्पोजेबल इनकम। टैक्स देने के बाद जनता

[07:35:12] के पास जो पैसा बचता है उसको डिस्पोजेबल

[07:35:14] इनकम कहते हैं। कभी-कभी वह ज्यादा हो जाती

[07:35:17] है।

[07:35:19] तो क्यों हो जाती है मांग बढ़ने का कारण?

[07:35:21] सस्ती मौद्रिक नीति। हो सकता है बैंक ने

[07:35:24] ही जानबूझकर M3 को बढ़ाने की कोशिश कर दी

[07:35:27] है। नोट छाप दिए होंगे ज्यादा मात्रा में।

[07:35:30] या फिर हो सकता है सरकार ने ही इतने

[07:35:32] ज्यादा बड़े-बड़े प्रोजेक्ट लेकर आ गई कि

[07:35:34] सभी लोगों को रोजगार मिलने लग गया। सभी

[07:35:37] लोगों के जेब में पैसा पहुंचने लग गया। तो

[07:35:39] सरकार जब बहुत ज्यादा पब्लिक एक्सपेंडिचर

[07:35:41] कर देती है तब भी ऐसा हो सकता है या सरकार

[07:35:45] मतलब ब्लैक मनी बढ़ गया हो चोरी छिपे पैसा

[07:35:48] बाजार में ज्यादा बढ़ रहा हो देखादे अगर

[07:35:51] पड़ोसी ने अपने बेटे की शादी में बेटी की

[07:35:53] शादी में 1 करोड़ खर्च किया है तो हम भी

[07:35:55] 10 करोड़ खर्च करेंगे इसे देखादेखी कहते

[07:35:58] हैं या हो सकता है विदेशों से बड़ी मात्रा

[07:36:01] में पैसा आया हो विदेशों से जमीनें खरीदी

[07:36:03] जा रही हो भारत में महंगे कीमतों पर जितनी

[07:36:07] कीमत थी उससे कई गुना ज्यादा ज्यादा कीमत

[07:36:09] मिल रही है तो इसके कारण भी महंगाई बढ़

[07:36:11] सकती है। नोट छापे जा रहे हो बगैर कारण के

[07:36:15] सरकार नोट छाप रही है। कृषि उत्पादन बढ़ा

[07:36:17] नहीं रही है। टैक्स कम कर दिया हो।

[07:36:20] सार्वजनिक ऋणों में कमी आ गई। सरकार ने जो

[07:36:23] ट्रेजरी बिल जारी करके सरकार पैसा वसूलती

[07:36:25] थी वो वसूला ही नहीं। इस बार जनसंख्या बढ़

[07:36:28] गई होगी। या फिर हो सकता है कि एक्सपोर्ट

[07:36:30] बढ़ गया होगा। एक्सपोर्ट बढ़ने के कारण

[07:36:32] कमाई बढ़ गई। कमाई बढ़ जाने के कारण लोग

[07:36:35] ज्यादा खरीददारी करने लग गए। तो हम इसे

[07:36:38] कहते हैं कि मांग बढ़ गई। मांग बढ़ने के

[07:36:41] कारण कहीं ना कहीं महंगाई आएगी। मांग

[07:36:43] बढ़ेगी। सस्ती मौद्रिक नीति ये चीजें जब

[07:36:46] मैंने ब्याज दरों को घटाने की बातचीत कही

[07:36:48] थी।

[07:36:52] काला धन प्रदर्शन प्रभाव निवेश में

[07:36:55] वृद्धि। घाटे की वित्त व्यवस्था का मतलब

[07:36:57] होता है सरकार घाटे को पूरा करने के लिए

[07:36:59] नए नोट छापने लग जाती है।

[07:37:03] जनसंख्या वृद्धि जैसा कोई मामला आ जाए तब

[07:37:05] भी हम वहां पर कहेंगे कि एक प्रकार से

[07:37:08] महंगाई आ जाएगी। सप्लाई सप्लाई का मतलब अब

[07:37:11] आपूर्ति कम हो गई है। मांग कुछ बढ़ी नहीं।

[07:37:14] मांग तो उतनी ही है।

[07:37:20] पूर्ति प्रेरित ये गलत है।

[07:37:28] मांग प्रेरित मतलब एक प्रकार से मांग का

[07:37:32] कोई लेना देना नहीं है लेकिन सप्लाई ही

[07:37:34] नहीं हो पाया। यह स्थिति तब उत्पन्न होती

[07:37:36] है जब अर्थव्यवस्था में मांग आपूर्ति से

[07:37:39] अधिक हो जाती है। जिसके कारण वस्तु और

[07:37:41] सेवाओं की कीमतें बढ़ जाती है। तो यह मांग

[07:37:44] की बात थी बता रहा है। अभी सप्लाई का मतलब

[07:37:46] है सप्लाई कम हो गया। अब सप्लाई क्यों कम

[07:37:48] हुआ होगा? हो सकता है कि विचारों का

[07:37:51] उत्पादन ही ना हुआ हो। जैसे कि मानसून

[07:37:54] खराब आ गया हो। हो सकता है कि हड़ताल या

[07:37:57] किसी प्रकार से कंपनी बंद पड़ गई हो। हो

[07:38:00] सकता है कुछ लोग कालाबाजारी कर रहे हो। हो

[07:38:03] सकता है सरकार ने इतने ज्यादा टैक्स लगा

[07:38:05] दिए कि लोगों ने उत्पादन करना ही बंद कर

[07:38:07] दिया।

[07:38:10] हो सकता है इतनी कठोर मौद्रिक नीति लेकर आ

[07:38:13] गए कि जनता के पास रोन लेने के लिए विकल्प

[07:38:16] ही नहीं बचे तो जनता ने उत्पादन ही करना

[07:38:18] बंद कर दिया। सरकार ने किसानों को सब्सिडी

[07:38:21] नहीं दी तो किसानों ने उत्पादन नहीं किया

[07:38:23] या फिर इतना ज्यादा हमने निर्यात कर दिया

[07:38:25] कि मा सप्लाई कम कर कर गए। इतना ज्यादा

[07:38:28] निर्यात हो गया कि हम देश के अंदर ही

[07:38:30] सप्लाई नहीं कर पाए। मानसून खराब हो जाने

[07:38:33] से कच्चे माल की आपूर्ति में कमी बीज आदि

[07:38:36] खराब होने से उत्पादन नहीं हुआ। औद्योगिक

[07:38:38] हड़ताल, विवाद, कच्चे माल की आपूर्ति का

[07:38:41] कम होना। जानबूझकर लोगों ने कोई चीज अपने

[07:38:45] पास जमा करके रख दी हो। सरकार ने इतना

[07:38:48] ज्यादा टैक्स लगा दिया कि जनता के पास

[07:38:51] पैसा ही नहीं बचा तो उत्पादन काम ही नहीं

[07:38:53] हो पाए। सब्सिडी में कमी आ गई। आयात

[07:38:56] निर्यात में प्रॉब्लम आ गई।

[07:38:59] आयात मतलब किया ही नहीं सरकार ने। इसके

[07:39:02] अलावा कभी-कभी मजदूरी बढ़ जाती है।

[07:39:04] कभी-कभी मजदूरी के बढ़ने के कारण उस वस्तु

[07:39:07] के उत्पादन का खर्च बढ़ जाता है। इसलिए

[07:39:09] कीमतें बढ़ जाती है। या फिर पेट्रोल की

[07:39:12] कीमतें बढ़ जाती है। जैसे अभी युद्ध की

[07:39:14] स्थिति आ जाती है। कच्चे माल की कीमतों

[07:39:17] में वृद्धि हो जाती है। कच्चे माल की

[07:39:19] कीमतें बढ़ जाती है तो बना हुआ माल भी

[07:39:21] महंगा हो जाएगा। इनडायरेक्ट टैक्सेस

[07:39:23] जीएसटी पहले 5% लगता था। मान लो सीधा 18%

[07:39:28] पर आ गई वो चीज तो कीमत अपने आप बढ़

[07:39:30] जाएगी। या हो सकता है कि ऐसे

[07:39:32] अंतरराष्ट्रीय तनाव इजराइल, ईरान, अमेरिका

[07:39:34] के युद्ध जो चल रहे होंगे या फिर हो सकता

[07:39:37] है कि वो कच्चा तेल की सप्लाई बेटर ना हो

[07:39:39] रही हो। मुद्रास्फीति को कई आधारों पर

[07:39:42] वर्गीकृत किया जाता है। सबसे पहला है

[07:39:45] सरकारी नियंत्रण के आधार पर। यदि सरकार

[07:39:48] मुद्रास्फीति को पूरी तरह से कंट्रोल करने

[07:39:51] के लिए अपने अनुसार कीमतें तय करने लग

[07:39:54] जाए। जैसे कि हमारे देश में अनाज की

[07:39:57] कीमतों को सरकार ज्यादा बढ़ने नहीं देती

[07:39:59] है। क्योंकि राशन की दुकानें सस्ते दामों

[07:40:02] पर अनाज उपलब्ध कराती रहती है। तो ऐसी

[07:40:04] मुद्रास्फीति जो सरकार के द्वारा पूरी

[07:40:08] कंट्रोल की जाती है उसे कहते हैं कंट्रोल

[07:40:10] इनफ्लेशन। अनियंत्रित मुद्रास्फीति जैसे

[07:40:14] एसी की कीमत, टीवी की कीमत, फ्रिज की कीमत

[07:40:18] कितनी भी बढ़ जाए कार की कीमत कितनी बढ़

[07:40:21] जाए सरकार उस पर ध्यान नहीं देती है। तो

[07:40:23] उसे कहते हैं अनकंट्रोल इनफ्लेशन। गुड्स

[07:40:25] वाइड्स गुड्स जो होते हैं, श्वेत वस्तुएं

[07:40:27] जो होती है, दिखावी वाली जो वस्तुएं होती

[07:40:30] है उन पर जो सरकार ध्यान नहीं देती उन्हें

[07:40:33] कहते हैं अनकंट्रोल इनफ्लेशन।

[07:40:38] यदि मुद्रास्फीति बहुत ही लो रेट से बढ़

[07:40:42] रही हो जैसे कि 1% से भी कम दर से

[07:40:45] मुद्रास्फीति बढ़ती है तो उसे कहते हैं

[07:40:48] कपिंग इनफ्लेशन रेंगती हुई मुद्रास्फीति

[07:40:52] विकसित देशों के लिए अच्छी मानी जाती है।

[07:40:54] चलती हुई मुद्रास्फीति वॉकिंग इनफ्लेशन

[07:40:57] जहां पर मुद्रास्फीति लगभग 2 से 6% के बीच

[07:41:01] में बढ़ रही होगी। भारत के लिए काफी अच्छी

[07:41:03] मुद्रास्फीति मानी जाती है। क्यों?

[07:41:05] क्योंकि मुद्रास्फीति रहेगी तो उत्पादक का

[07:41:08] मनोबल रहेगा। मनोबल रहेगा तो ज्यादा से

[07:41:10] ज्यादा और उत्पादन काम करेगा। उत्पादन काम

[07:41:13] करेगा तो रोजगार बढ़ेंगे। रोजगार बढ़ेंगे

[07:41:15] तो लोगों के पास आमदनी आएगी। तो होना

[07:41:18] चाहिए थोड़ी बहुत मुद्रास्फीति। एक आवश्यक

[07:41:20] बुराई है ये। तो लगभग इतनी होती तो हम

[07:41:22] इसको कहते वॉकिंग इनफ्लेशन रनिंग

[07:41:25] इनफ्लेशन। अगर कीमतें 10% 12% इस तरीके से

[07:41:29] बढ़ने लग जाए तो हम इसको कहते हैं कि

[07:41:31] दौड़ती हुई मुद्रास्फीति है। ये किसी भी

[07:41:33] अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी नहीं होती है।

[07:41:35] इससे नुकसान होता है। नागरिकों की सेविंग

[07:41:38] खत्म हो जाती है। और हाइपर इनफ्लेशन डंस

[07:41:41] मारती हुई मुद्रास्फीति सबसे बुरी स्थिति

[07:41:44] होती है। जब कीमतें 80% 100% 200% से

[07:41:48] बढ़ने लग जाए किसी प्रकार की भयानक स्थिति

[07:41:51] के कारण तो इसको कहते हैं

[07:41:54] डंस मारती हुई मुद्रास्फीति। याद रखिएगा

[07:41:57] जो डंस मारती हुई मुद्रास्फीति होती है

[07:42:00] सबसे बुरी मुद्रास्फीति मानी जाती है।

[07:42:02] पूरी अर्थव्यवस्था को ही संकट में लेकर आ

[07:42:06] जाती है। इसे कंट्रोल करना नामुमकिन सा हो

[07:42:08] जाता है। मुद्रास्फीति को मापने के आधार

[07:42:11] पर कोर मुद्रास्फीति में मापा जाता है।

[07:42:14] कोर का मतलब होता है जनरली हम जानते हैं

[07:42:16] कि प्रतिदिन तेल की कीमतें, खाद्यान्न की

[07:42:19] कीमतें, सब्जियों की कीमतें बढ़ती रहती

[07:42:21] है। लेकिन प्रतिदिन जूते चप्पल की कीमत,

[07:42:24] मैन्युफैक्चरिंग आइटम की कीमत तो नहीं

[07:42:25] बदलती। तो ईंधन और खाद्यान्न की कीमतों को

[07:42:29] छोड़ दो। बाकी चीजों की कीमतें कितनी

[07:42:32] प्रतिदिन बदली है उसको कहते हैं कोर

[07:42:34] इनफ्लेशन। और अगर हम सबकी निकाल रहे हैं

[07:42:37] खाद्यान्न, ईंधन, मैन्युफैक्चरिंग आइटम

[07:42:40] सबकी कीमतें कितनी बड़ी तो हम उसे कहते

[07:42:42] हैं हेडलाइन इनफ्लेशन।

[07:42:51] नियंत्रित मुद्रास्फीति समाजवादी

[07:42:54] अर्थव्यवस्था में पाई जाती है। भारतीय

[07:42:55] अर्थव्यवस्था में एक प्रकार से मिश्रित है

[07:42:57] तो समाजवादी लक्षण भी मिलते हैं। इसे

[07:43:00] दाबित प्रकार की मुद्रास्फीति भी कहते

[07:43:02] हैं। जैसे भारत में अनाज, सब्जी, फसलों के

[07:43:04] क्षेत्र में। इस प्रकार की मुद्रास्फीति

[07:43:07] सरकार द्वारा प्रत्यक्ष नियंत्रित होती

[07:43:08] है। भारत में सामान्यत यह कृषि क्षेत्र

[07:43:11] में मिलती है।

[07:43:22] [अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़]

[07:43:22] अनकंट्रोल का मतलब इस संदर्भ में सरकार

[07:43:25] द्वारा किसी प्रकार का कोई हस्तक्षेप नहीं

[07:43:27] किया जाता है। अनियंत्रित प्रकार की

[07:43:29] मुद्रास्फीति मुख्यतः पूंजीवादी

[07:43:31] अर्थव्यवस्था में मिलती है। सरकार कहती है

[07:43:32] जो होना है वह होने दो। अनकंट्रोल

[07:43:35] मुद्रास्फीति हमारे देश में वाइट थिंग्स

[07:43:37] में मिलती है। फ्रिज के अंदर, एसी के अंदर

[07:43:39] जो लोग वर्तमान में स्टेटस सिंबल के रूप

[07:43:42] में लेते हैं। सोना, चांदी, पेट्रोलियम

[07:43:44] उत्पाद में अब हमारे देश में अनकंट्रोल

[07:43:46] है। क्योंकि अब हमारे देश में सरकार

[07:43:47] उन्हें कंट्रोल नहीं करती है। फिर उसकी

[07:43:50] गति के आधार पर रेंगती हुई यदि कीमतें 2%

[07:43:54] से कम तक होती है तो ऐसी मुद्रास्फीति को

[07:43:56] रेंगती हुई कहते हैं। विकसित देशों के लिए

[07:43:58] अच्छी मानी जाती है। 2 से 10% होती है तो

[07:44:01] चलती हुई मुद्रास्फीति कहते हैं। भारत में

[07:44:03] इस प्रकार की मुद्रास्फीति है। 10 से लेकर

[07:44:06] 80% तक कीमतें बढ़ जाए तो इसको दौड़ती भी

[07:44:09] कहेंगे। ये अच्छी नहीं मानी जाती है। और

[07:44:11] डंस मारती हुई इनफ्लेशन जहां कीमतें और भी

[07:44:14] भयानक बढ़ जाए पूरी अर्थव्यवस्था को ठप कर

[07:44:17] देती है। फिर है हेडलाइन इनफ्लेशन। यह

[07:44:20] उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के जितने भी हम

[07:44:22] वस्तुओं को लेकर आए हैं कंज्यूमर प्राइस

[07:44:24] इंडेक्स की सभी की कीमतों को बताएगी। तो

[07:44:27] हेडलाइन कहलाएगी वस्तु सेवा सब कीमतों में

[07:44:30] हुआ परिवर्तन है।

[07:44:34] और कोर इनफ्लेशन का मतलब होता है कोर

[07:44:36] इनफ्लेशन में हम क्या करते हैं? तो खाद्य

[07:44:39] और ऊर्जा की वस्तुओं को हटा देते हैं।

[07:44:41] क्योंकि कोर इनफ्लेशन में खाद्य और ईंधन

[07:44:43] की कीमतें प्रतिदिन बदलती रहती है। तो कोर

[07:44:46] इनफ्लेशन में हम इनफ्लेशन का वो आंकड़ा

[07:44:49] प्राप्त करते हैं जो रियल में कीमतों में

[07:44:51] बदलाव को दर्शाता है।

[07:45:08] तो हेडलाइन सभी के लिए है। कोर मतलब केवल

[07:45:11] और केवल ऐसी चीजें जो मैन्युफैक्चरिंग

[07:45:14] आइटम के लिए होते हैं। कोर अगर बदल रहा है

[07:45:16] तो इसका मतलब सच में महंगाई बदल रही है।

[07:45:21] मुद्रास्फीति को मापते कैसे? तो हमारे देश

[07:45:24] में महंगाई को मापने के लिए तीन इंडेक्स

[07:45:26] बनाए गए हैं। होलसेल प्राइस इंडेक्स

[07:45:29] डब्ल्यूपीआई, कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स

[07:45:31] सीपीआई और जीडीपी डिफ्लेक्टर।

[07:45:36] होलसेल प्राइस इंडेक्स डब्ल्यूपीआई होलसेल

[07:45:39] बल्क प्रोड्यूस करते हैं। मतलब एक प्रकार

[07:45:42] से ऐसे लोग जो बड़ी मात्रा में चीजों को

[07:45:44] खरीदते बेचते हैं उन्हें होलसेलर कहते

[07:45:46] हैं। उनको कीमतें कितनी बढ़ती हुई मिल रही

[07:45:49] है उसको कहते हैं कि होलसेल प्राइस

[07:45:51] इंडेक्स निकाल दीजिए। इंडेक्स इसलिए

[07:45:53] क्योंकि कई सारे आइटमों की कीमतों का

[07:45:55] एवरेज निकालेंगे। थोक मूल्य सूचकांक मासिक

[07:45:59] आधार पर थोक कीमतों में परिवर्तन को मापता

[07:46:02] है। मासिक आधार पर। अब ये मंथली रिलीज

[07:46:05] किया जाता है। भारत में सबसे पहले 1942

[07:46:07] में इसको शुरू किया गया था। हमारे देश में

[07:46:10] याद रखिएगा डीपीआईआईटी इसके लिए जिम्मेदार

[07:46:13] होता है। 2012 में भारत सरकार ने थोक

[07:46:16] मूल्य सूचकांक की कार्य पद्धति समीक्षा के

[07:46:18] लिए डॉ. सोमित्र चौधरी कार्य समूह की

[07:46:21] नियुक्ति की थी। वर्तमान में हमारे पास

[07:46:24] 697 आइटम्स हमने शामिल किए क्योंकि कोई एक

[07:46:27] वस्तु के आधार पर तो महंगाई तय नहीं होगी।

[07:46:30] तो लगभग एक समूह बनाया जाता है। एक टोकरी

[07:46:32] ली जाती है। उसमें कुछ आइटम डाले जाते

[07:46:34] हैं। उसके आधार पर उनकी कीमतों को निकाला

[07:46:36] जाता है।

[07:46:40] आधार वर्ष आधार वर्ष का मतलब होता है कि

[07:46:43] हम किस वर्ष की तुलना में परिवर्तनों को

[07:46:46] निकालेंगे। किस वर्ष की तुलना में जिस

[07:46:50] आधार वर्ष वह वर्ष है जिस आधार पर हम

[07:46:52] अर्थव्यवस्था की मुद्रास्फीति की गणना

[07:46:54] करते हैं कि चलो भाई वो वाली कीमतें हमारे

[07:46:57] लिए जीरो हो गई और बाकी कीमतें फिर उसके

[07:46:59] अकॉर्डिंग परिवर्तन को बताएगी। आधार वर्ष

[07:47:02] जितना पुराना होगा महंगाई उतनी ज्यादा

[07:47:04] महसूस होगी।

[07:47:07] पर याद रखिएगा या एक छोटी सी बात सभी को

[07:47:09] मैं समझा दूं। भले ही जैसे हमारे देश में

[07:47:12] आधार वर्ष अब बढ़ा दिया गया है। अब 697

[07:47:16] वस्तुओं के साथ-साथ अब 21-22 को आधार वर्ष

[07:47:19] लेने वाले हैं। अगर आपको याद हो तो यहां

[07:47:22] मैं एक छोटी सी बात बता देता हूं।

[07:47:28] जैसे 2025 26 या 2627 में मुझे महंगाई

[07:47:33] निकालनी है। ध्यान से सुनना।

[07:47:36] आधार वर्ष मान लेते हैं कि 2122 है। ठीक

[07:47:40] है? ध्यान से सुनिएगा मेरी बात। तो ऐसा मत

[07:47:43] सोचिएगा कि 2026 27 में हम महंगाई जब

[07:47:47] निकालेंगे तो 21-22 से तुलना करेंगे। नहीं

[07:47:50] कभी भी नहीं। यह बात ध्यान से सुन लेना।

[07:47:53] जब हम डब्ल्यूपीआई निकालेंगे तो जैसे यह

[07:47:56] चल रहा है मई का महीना। अप्रैल का महीने

[07:47:59] में हम देखेंगे। मार्च के महीने में हम

[07:48:02] देखेंगे। अब मार्च के महीने की तुलना में

[07:48:05] अप्रैल के महीने में कीमतें कितनी बढ़ी वह

[07:48:08] एक अलग महंगाई हो जाएगी और पिछले साल में

[07:48:12] पिछले साल में अप्रैल के महीने में जो

[07:48:15] कीमतें थी इस साल अप्रैल के महीने में जो

[07:48:18] कीमतें हैं वो वार्षिक महंगाई को

[07:48:20] दर्शाएगी। तो याद रखिएगा भले ही आधार वर्ष

[07:48:24] यह रहता है जिससे हम तुलना करते हुए सारी

[07:48:27] बातचीत करेंगे।

[07:48:29] लेकिन लेकिन हम इसका मतलब यह ना सोचिएगा

[07:48:32] कि आधार वर्ष से तुलना करते हुए महंगाई की

[07:48:35] दर बताई जाती है। जैसे मैं अगर आपसे कहूं

[07:48:37] कि हमारे देश में महंगाई 4% है तो इसका

[07:48:40] मतलब पिछले साल की तुलना में आज के महीने

[07:48:43] में कीमतें 4% ज्यादा हो गई। यह बात ध्यान

[07:48:47] से सुनिएगा। इसका मतलब यह नहीं होता है कि

[07:48:50] आधार वर्ष की तुलना में कीमत इतनी हो गई

[07:48:52] है।

[07:48:56] आधार वर्ष अब बदल दिया गया है। इसी साल

[07:48:59] अगर हम बातचीत करें हमारे देश में

[07:49:01] प्राथमिक वस्तुएं जब 100 ये 697 वस्तुएं

[07:49:05] शामिल की गई तो इसमें प्राथमिक वस्तुओं

[07:49:07] लगभग 117 हैं। उनको वेटेज दिया गया। वेटेज

[07:49:11] मतलब उनका महत्व कितना है? क्योंकि हर चीज

[07:49:13] की कीमतों का प्रभाव सभी व्यक्ति पर एक

[07:49:15] जैसा तो नहीं होगा। जैसे टूथपेस्ट की कीमत

[07:49:18] के बढ़ने का प्रभाव और टमाटर की कीमत के

[07:49:21] बढ़ने का प्रभाव एक जैसा तो नहीं होगा।

[07:49:23] किसी चीज का वेटेज बहुत ज्यादा है।

[07:49:25] टूथपेस्ट बड़े मुश्किल से इतना ही यूज़

[07:49:27] होगा लेकिन टमाटर तो एक-ए किलो यूज़ होगा।

[07:49:29] तो वेटेज मतलब उसके महत्व को ध्यान में

[07:49:31] रखते हुए वेटेज दिया गया है। तो प्राथमिक

[07:49:34] वस्तुओं को वेटेज इतना दिया गया है। ईंधन

[07:49:36] और शक्ति वाली वस्तुओं को एक वेटेज इतना

[07:49:39] दिया गया है और जो विनिर्मित वस्तुएं

[07:49:41] इसमें वेटेज इतना दिया गया है। इसमें

[07:49:44] सर्विस सेक्टर को जगह नहीं दी गई है।

[07:49:46] प्राथमिक वस्तुएं जो कि लोगों की जिंदगी

[07:49:48] को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है उसके

[07:49:50] वेटेज को कम दिया गया है और

[07:49:52] मैन्युफैक्चरिंग वस्तुएं लोगों को इतना

[07:49:54] प्रभावित नहीं करती उनको वेटेज ज्यादा दे

[07:49:56] दिया गया। इसका क्रिटिसिज्म है। प्राथमिक

[07:49:58] क्षेत्र को कम वेटेज देना भी इसकी एक

[07:50:00] आलोचना है। थोक कीमतों पर आधारित है।

[07:50:02] जनरली थोक कीमतें उतनी तेजी से नहीं बदलती

[07:50:05] जितनी कि कस्टमर तक आती हुई चीजों की

[07:50:07] कीमतें बढ़ती है। सर्विस सेक्टर को इसमें

[07:50:10] शामिल नहीं किया गया है।

[07:50:13] समग्र रूप से अर्थव्यवस्था के लिए थोक

[07:50:15] लेनदेन पर मुद्रास्फीति का अनुमान हो जाता

[07:50:17] है तो अंदाजा लग जाता है सरकार को कि समय

[07:50:20] पर काम कर लेंगे तो शायद जनता तक कीमतें

[07:50:22] उतना प्रभाव नहीं आएगा। डब्ल्यूपीआई

[07:50:25] द्वारा सरकार उपभोक्ता मुद्रास्फीति के

[07:50:27] रूप में सुरक्षित रखती है। जीडीपी के

[07:50:28] अनुमापन के लिए डब्ल्यूपीआई अभी भी यूज

[07:50:31] करते हैं। वैश्विक निवेशक किसी देश में

[07:50:33] इन्वेस्टमेंट करते समय डब्ल्यूपीआई को

[07:50:35] देखते हैं। लेकिन दुनिया में अधिकतर लोग

[07:50:37] डब्ल्यूपीआई का उपयोग नहीं कर रहे हैं।

[07:50:39] दुनिया के अधिकतर लोग पीपीआई प्रोड्यूसर

[07:50:42] प्राइस इंडेक्स का उपयोग करते हैं।

[07:50:44] प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स में एक बड़ा

[07:50:46] बेनिफिट देख लीजिए। देखो प्रोड्यूसर

[07:50:49] प्राइस इंडेक्स में सर्विस सेक्टर को भी

[07:50:51] शामिल किया गया है। प्रोड्यूसर प्राइस

[07:50:53] इंडेक्स में कौन सी वस्तु देश के भीतर बनी

[07:50:56] और कौन सी वस्तु आयातित है उसका अलग-अलग

[07:50:59] महंगाई पता चलता है। होलसेल में ऐसे थोड़ी

[07:51:02] पता चलता है। होलसेल वाले से बस हम कीमत

[07:51:04] पूछ रहे होते हैं। उसे ये थोड़ी पूछते हैं

[07:51:05] कि तुमने देश में से खरीदा था कि बाहर से

[07:51:07] खरीदा था। तो होलसेल प्राइस इंडेक्स

[07:51:10] इंपोर्ट की गई और देश के अंदर बनी हुई

[07:51:12] चीजों के अंतर्गत आने वाले डिफरेंस को

[07:51:15] नहीं बताता है। प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स

[07:51:17] को बताता है और यह सीधा निर्माण करने वाली

[07:51:20] जगह का ही वर्णन करता है प्रोड्यूसर का।

[07:51:23] पीपीआई उत्पादकों के दृष्टिकोण से कीमत

[07:51:26] परिवर्तन को मापता है। पीपीआई उत्पादकों

[07:51:28] को प्राप्त होने वाली कीमतों में औसत

[07:51:30] परिवर्तन को मापता है। जो कीमतें उस वस्तु

[07:51:33] सेवा को घरेलू बाजार में बेचा गया,

[07:51:35] निर्यात किया गया कि आयात किया गया सब

[07:51:37] बताता है। वस्तु सेवाएं दोनों शामिल की गई

[07:51:40] है। और डब्ल्यूपीआई में कई बार डबल

[07:51:42] काउंटिंग हो जाती है। लेकिन पीपीआई में

[07:51:44] डबल काउंटिंग नहीं होती है। कोई टैक्स

[07:51:46] काउंटिंग नहीं होते हैं। डब्ल्यूपीआई में

[07:51:48] कई बार इनडायरेक्ट टैक्स काउंट हो जाते

[07:51:51] हैं। तो क्यों हमारा देश पीपीआई पर स्विच

[07:51:53] नहीं कर रहा है? तो कई बार कमेटियां बनी

[07:51:55] है 2014 में बीएन गोलदार कमेटी बनी थी।

[07:51:59] उन्होंने कहा था कि हमें धीरे-धीरे पीपीआई

[07:52:01] में शिफ्ट हो जाना चाहिए। पहले

[07:52:03] डब्ल्यूपीआई को सुधार दीजिए और फिर पीपीआई

[07:52:05] पर आ जाइए। सर्विस सेक्टर जो हमारे जीडीपी

[07:52:08] का 55% है वह डब्ल्यूपीआई में शामिल नहीं

[07:52:10] किया गया। तो डब्ल्यूपीआई के आंकड़े

[07:52:12] भ्रामक माने जाते हैं। इसलिए कई सारे लोग

[07:52:15] डब्ल्यूपीआई के आंकड़ों को उतना बेटर नहीं

[07:52:17] मानते हैं।

[07:52:21] होलसेल प्राइस इंडेक्स रमेश चंद समिति की

[07:52:24] अध्यक्षता में 18 सदस्यों का एक पैनल बैठा

[07:52:27] जिन्होंने कहा है कि अब आधार वर्ष को बदल

[07:52:29] देते हैं और पीपीआई में स्विच करने के लिए

[07:52:31] रोड मैप बनाया गया था। यह होलसेल प्राइस

[07:52:34] इंडेक्स के एवज में बातचीत की गई थी।

[07:52:38] अभी सीपीआई पढ़ने के बाद इस सवाल का जवाब

[07:52:41] देंगे तो ज्यादा बेटर आएगा। कंज्यूमर

[07:52:43] प्राइस इंडेक्स कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स

[07:52:46] सांख्यिक और कार्यक्रम कार्वयन मंत्रालय

[07:52:49] के तत्वाधान में याद रखिएगा सांख्यिक और

[07:52:52] कार्यक्रम कार्य मंत्रालय के तत्वाधान में

[07:52:55] अब एनएसओ जारी करेगा एनएसओ

[07:52:59] यह भी मासिक आधार पर खुदरा कीमतें जो

[07:53:02] कस्टमर को कंज्यूमर को मिलती है उस कीमतों

[07:53:04] को कैलकुलेट करता है। इसमें वस्तु सेवाएं

[07:53:08] दोनों शामिल है। एक ही प्रकार के या

[07:53:10] सजातीय उपभोक्ता के समूह पर फोकस करते

[07:53:13] हैं। ऐसे उपभोक्ता जो वस्तु टोकरी के

[07:53:15] संदर्भ में एक तरह से जुड़े होते हैं।

[07:53:17] मतलब हम सब कह सकते हैं इसमें ज्यादा

[07:53:19] डायवर्सिफाइड चीजों को शामिल किया गया है।

[07:53:25] जितनी भी भारत में आरबीआई पॉलिसी लाती है,

[07:53:28] वह आरबीआई पॉलिसी सीपीआई को देखकर ही लाती

[07:53:31] है। सीपीआई के आधार पर आरबीआई कठ मौद्रिक

[07:53:33] नीति में बदलाव कर सकती है। मतलब मॉनिटरी

[07:53:36] पॉलिसी कमेटी।

[07:53:38] केंद्रीय सांख्यिक और कार्यक्रम कार

[07:53:40] मंत्रालय ने औपचारिक रूप से 12 फरवरी 2026

[07:53:43] को भारत की कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स की नई

[07:53:45] श्रंखलाएं जारी कर दी है। अब आधार वर्ष

[07:53:48] 2324 कर दिया गया है। आधार वर्ष नोट कर

[07:53:51] लीजिएगा। नया आया है इसी साल। 23 24 नया

[07:53:54] आधार वर्ष बना दिया गया है हमारे देश में

[07:53:58] क्योंकि पुराना आधार वर्ष 111 बहुत पुराना

[07:54:00] भी हो गया था और आधार वर्ष ऐसा होना चाहिए

[07:54:03] जिसमें उतार-चढ़ाव ज्यादा ना हुए हो। 1920

[07:54:06] इसलिए नहीं ले सकते क्योंकि बहुत ज्यादा

[07:54:07] उतार-चढ़ाव हो गए थे। 212 भी ठीक नहीं था।

[07:54:10] 2324 फिर भी ठीक माना गया है आधार वर्ष।

[07:54:15] अब 111 से 2324 आधार वर्ष हो गया।

[07:54:18] कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स में आइटम 299 से

[07:54:21] बढ़कर 358 कर दिए गए हैं। पहले 1465

[07:54:25] गांवों से डाटा लिया जाता था और 1395

[07:54:29] शहरों के साथ डाटा अब लिया जा रहा है।

[07:54:31] मतलब 1465 गांवों से 1395 शहरों से और 12

[07:54:35] ऑनलाइन बाजारों से कीमतों को लिया जाएगा

[07:54:38] ताकि कीमतों को भी तो देखना पड़ेगा कहां

[07:54:41] से कीमतें आ रही हैं। खाद्य भार में कमी

[07:54:44] कर दी गई है। 46 से घटाकर अब 37% कर दिया

[07:54:47] है। खाद्यान्न भार को बहुत ज्यादा दे दिया

[07:54:49] गया था। वेटेज यहां पर

[07:54:53] आवास भार में सुधार किया गया और गांव का

[07:54:56] आवास भार एक जमाने में जीरो माना जाता था।

[07:54:58] कहते थे कि गांव में तो कोई भी व्यक्ति

[07:55:00] झोपड़ी डालकर रह लेगा। लेकिन अब गांव के

[07:55:03] भी वेटेज लिए गए हैं आवास के क्योंकि गांव

[07:55:05] में भी अब कोई भी व्यक्ति फ्री में झोपड़ी

[07:55:08] कहीं भी नहीं बना सकता है। तो पुराना

[07:55:10] कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स जो बनाया जाता था

[07:55:13] अब नया कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स याद

[07:55:16] रखिएगा 23 24 के आधार पर बनेगा। 358

[07:55:19] वस्तुओं को शामिल किया गया है। खाद्य और

[07:55:22] पेय पदार्थ का भार घटाया गया है। आवास का

[07:55:25] भार बढ़ाया गया है। दोनों जगह पर हाउस रेट

[07:55:28] इंडेक्स केवल पहले शहर में होता था। दोनों

[07:55:31] जगह पर आएगा। ग्रामीण शहरी के अलावा 12

[07:55:34] ऑनलाइन मार्केट भी लिए गए हैं। बहुत सारा

[07:55:36] परिवर्तन आया है इसमें।

[07:55:45] सबसे ज्यादा वेटेज एक जमाने में 45% फूड

[07:55:50] और बेवरेज को दिया गया था। कम कर दिया गया

[07:55:52] है। अब रियल में हमारे देश में खाद्यान्न

[07:55:55] वाली चीजों पर कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स का

[07:55:57] कैलकुलेशन करते समय 36% का वेटेज दिया

[07:56:00] जाएगा। पान तंबाकू इन टॉक्सिकेंट को 2.99

[07:56:04] का वेटेज दिया गया है। कपड़े और फुटवेयर

[07:56:07] को 6.38 का वेटेज दिया गया है। हाउसिंग

[07:56:11] वाटर इलेक्ट्रिसिटी गैस और अदर फ्यूल के

[07:56:13] लिए अदर ईंधन के लिए 17.67 का वेटेज दिया

[07:56:17] गया है। फर्नीचर हाउसहोल्ड इक्विपमेंट

[07:56:20] रूटीन हाउसहोल्ड मेंटेनेंस को 4.47 का

[07:56:23] वेटेज हेल्थ को ट्रांसपोर्ट मतलब इनकी

[07:56:26] कीमतों में परिवर्तन को इतना महत्व दिया

[07:56:28] गया है। इंफॉर्मेशन कम्युनिकेशन के लिए,

[07:56:31] रिकक्रिएशन स्पोर्ट्स एंड कल्चर के लिए,

[07:56:34] एजुकेशन सर्विसेस के लिए, रेस्टोरेंट एंड

[07:56:37] अकोमोडेशन सर्विसेज को भी शामिल किया गया

[07:56:39] है। पर्सनल केयर, सोशल प्रोडक्शन इन

[07:56:42] सर्विज को भी वेटेज दिया गया है। तो दो

[07:56:45] वेटेज याद रखिएगा। एक तो फूड बेवरेज सबसे

[07:56:47] हाईएस्ट रहेगा और सबसे कम वेटेज की अगर

[07:56:50] बात करें तो पान, तंबाकू इन टॉक्सिकेंट को

[07:56:53] वेटेज दिया गया है। नई सीपीआई श्रंखला

[07:56:56] महंगाई को अधिक यथार्थ रूप से मापेगी।

[07:56:58] खाद्य भार घटने से मौसम जन्य उतार-चढ़ाव

[07:57:01] का प्रभाव कम होगा ताकि आरबी आरबीआई को भी

[07:57:05] निर्णय लेने में सुविधा होगी। नई सीपीआई

[07:57:08] श्रंखला भारत के संरचनात्मक परिवर्तन को

[07:57:10] भी दर्शाती है।

[07:57:13] सीपीआई फूड इंडेक्स जो स्पेशली हमने बनाना

[07:57:16] शुरू कर दिया है खाद्यान्नों की कीमतों को

[07:57:19] बताने के लिए उसमें लगभग हमने 34.2%

[07:57:22] का वेटेज दिया है अनाज और उत्पाद वाली

[07:57:25] चीजें जो ओरिजिनल सीपीआई में है उन चीजों

[07:57:27] को इसमें शामिल किया गया है। जीडीपी

[07:57:30] डिफ्लेक्टर का मतलब होता है कि रियल

[07:57:32] जीडीपी वास्तविक रूप में जीडीपी कितनी आई

[07:57:35] बेस की प्राइस पर बेस प्राइस पर स्थिर

[07:57:38] कीमतों पर

[07:57:44] और नॉमिनल जीडीपी का मतलब यह होता है एक

[07:57:47] प्रकार से कि करंट करंट प्राइस पर कितनी

[07:57:51] आई है चालू कीमतों पर कितना आया है चालू

[07:57:54] कीमतों पर तो चालू कीमत बटे स्थिर कीमत

[07:57:57] उसके इन 100 कर देंगे तो जीडीपी

[07:58:00] डिफ्लेक्टर से पता चल जाएगा कीमतें कितनी

[07:58:02] बढ़ गई है। फिर हमारे देश में इंडस्ट्री

[07:58:05] इंडेक्स ऑफ इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन ये

[07:58:08] एक्चुअल में महंगाई नहीं बताता है बल्कि

[07:58:10] यह बताता है कि देश में इंडस्ट्री का

[07:58:13] हालचाल क्या है। अगर इंडस्ट्री का हालचाल

[07:58:16] अच्छा है तो हम कहते हैं उत्पादन अच्छा

[07:58:17] होगा। उत्पादन अच्छा होगा तो महंगाई

[07:58:19] कंट्रोल होगी। लेकिन ये महंगाई नहीं बताता

[07:58:21] आईआईपी। एक संकेतक है जो एक निश्चित अवधि

[07:58:24] के दौरान औद्योगिक उत्पादों के उत्पादन की

[07:58:26] मात्रा में परिवर्तन को दर्शाता है। एनएसओ

[07:58:29] इसको मेजर करता है। इंडस्ट्रियल इंडेक्स

[07:58:33] सूचकांक पद्धति में भी बदलाव किया गया।

[07:58:35] इसका भी आधार वर्ष अब 22 23 कर दिया गया

[07:58:37] है।

[07:58:42] नए उद्योग भी इसमें शामिल किए जाने की

[07:58:44] बातचीत है। [गला साफ़ करने की आवाज़]

[07:58:50] नई प्रणाली के अंतर्गत यदि कोई कारखाना

[07:58:52] लगातार तीन माह तक उत्पादन नहीं करता है

[07:58:54] तो उसकी समीक्षा की जाएगी कि आखिर उत्पादन

[07:58:57] क्यों नहीं कर रहा है।

[07:58:59] फिर है इंडेक्स ऑफ एट कोर इंडस्ट्रीज। एट

[07:59:02] कोर इंडस्ट्रीज ऐसे आठ उद्योग होते हैं जो

[07:59:06] आईआईपी में सबसे ज्यादा वेटेज रखते हैं और

[07:59:11] टोटल आईआईपी का 37% से लेकर 40% तक वेटेज

[07:59:16] इन्हीं आठ उद्योगों का है। तो इन आठ

[07:59:18] उद्योगों पर ज्यादा ध्यान देना जरूरी है

[07:59:20] क्योंकि इन आठ उद्योगों में कोई उत्पादन

[07:59:22] में गिरावट आ जाए तो भविष्य में बहुत

[07:59:25] नुकसान हो सकता है। सप्लाई बहुत कम हो

[07:59:28] सकता है। इस कारण से एट कोर इंडस्ट्री का

[07:59:31] अलग से इंडेक्स बनाया जाता है। आठ कोर

[07:59:34] उद्योग अर्थात कोयला, कच्चा तेल, नेचुरल

[07:59:36] गैस, रिफाइनरी प्रोडक्ट, फर्टिलाइजर,

[07:59:38] इस्पात, सीमेंट, बिजली के उत्पादन के लिए

[07:59:41] आठ प्रमुख उद्योग जिनका टोटल आईआईपी में

[07:59:44] 40% से ज्यादा का वेटेज होता है।

[07:59:51] सांख्यिकी कार्यक्रम कार्य मंत्रालय ने

[07:59:53] खबर जारी की थी कि प्रत्येक महीने की 12

[07:59:55] तारीख को शाम 5:30 बजे खुद्रा

[07:59:57] मुद्रास्फीति संबंधित उपभोक्ता मूल्य

[08:00:00] सूचकांक और औद्योगिक उत्पादन सूचकांक के

[08:00:02] आंकड़े जारी करने के समय में बदलाव करते

[08:00:05] हुए शाम 4:00 बजे जारी करने की घोषणा कर

[08:00:07] दी गई है। मंत्रालय आंकड़े जारी करते समय

[08:00:10] बाजार के बाद समय के बाद रखने के लिए कई

[08:00:13] अभ्यदन प्राप्त हुए क्योंकि विदेशी मुद्रा

[08:00:15] बाजार और सरकारी बॉन्ड बाजार शाम 5:00 बजे

[08:00:18] बंद होते हैं। मंत्रालय के अनुसार आंकड़े

[08:00:20] जारी करने के समय सीपीआई आईआईपी डाटा तक

[08:00:23] पहुंच के लिए अधिक समय प्रदान करने की

[08:00:25] व्यवस्था की जाएगी।

[08:00:30] मुद्रास्फीति का प्रभाव क्या है? देखो

[08:00:32] मुद्रास्फीति हमेशा खराब नहीं होती। जिन

[08:00:35] लोगों ने भी कर्जे लिए हैं, कर्जे लिए

[08:00:38] हैं, उनके लिए महंगाई बहुत अच्छी होती है।

[08:00:40] जैसे सोचो आज आज आपके शहर में जो भी नए

[08:00:44] कॉलोनियां बन रही है, नए मकान बन रहे हैं।

[08:00:47] अगर पिताजी ने, माताजी ने, दादा-दादी ने

[08:00:50] आज से 15 साल पहले कर्जा लेकर ही सही।

[08:00:52] वहां जमीन खरीद ली होती तो आज कितनी

[08:00:55] करोड़ों में जमीनें बिकती। तो महंगाई जब

[08:00:58] भी आती है तो कर्जा लेने वाले को फायदा

[08:01:00] होता है। देने वाले को नुकसान होता है।

[08:01:02] निवेशकर्ता को फायदा होता है क्योंकि

[08:01:04] ज्यादा मुनाफा कमाया जाता है। उद्योगपतिय

[08:01:07] उद्यमियों को फायदा होता है क्योंकि वह

[08:01:09] कमाई ज्यादा कर पाते हैं। किसान भी

[08:01:11] उत्पादक समूह में आते हैं तो किसानों को

[08:01:13] भी फायदा होता है। सरकार को भी फायदा होता

[08:01:16] है। ज्यादा टैक्स कलेक्ट हो पाता है। बैंक

[08:01:18] और बीमा कंपनियों को फायदा होता है

[08:01:20] क्योंकि इंश्योरेंस ज्यादा से ज्यादा

[08:01:21] बिकने लग जाते हैं। बैंक का कामकाज अच्छा

[08:01:24] होता है और एंप्लॉयमेंट बेटर हो जाता है।

[08:01:28] लेकिन नेगेटिव जो ऋणदाता होता है उस पर

[08:01:30] बुरा असर पड़ता है। मध्यम वर्ग पर सबसे

[08:01:32] बुरा असर पड़ता है क्योंकि मध्यम वर्ग की

[08:01:34] जितनी सेविंग थी वो सेविंग खत्म होने लग

[08:01:37] जाती है। सबसे बुरी तरह से अगर प्रभावित

[08:01:40] होता है तो वास्तविक रूप में मध्यम वर्ग

[08:01:43] है जो सबसे बुरी तरह से प्रभावित होगा।

[08:01:46] सार्वजनिक खर्च मुद्रास्फीति के कारण

[08:01:48] सरकारी परिसंपत्तियों पर व्यय बढ़ जाता

[08:01:50] है। क्योंकि महंगाई बढ़ती है तो सरकार ने

[08:01:53] जो प्रोजेक्ट सोचा था कि इतने रुपए में

[08:01:55] कंप्लीट होगा उसकी लागत बढ़ जाती है तो

[08:01:57] सरकार का खर्च बढ़ जाता है। बैलेंस ऑफ

[08:01:59] पेमेंट क्योंकि महंगाई बढ़ती है तो सरकार

[08:02:01] फिर आयात करने लग जाती है। तो इस कारण से

[08:02:04] बैलेंस ऑफ पेमेंट बिगड़ जाता है। महंगाई

[08:02:07] बढ़ती है तो अनसर्टेनिटी बढ़ती है। बाजार

[08:02:09] को समझ में नहीं आता है। कोई कुछ भी

[08:02:10] खरीदने लग जाता है। इनकम इक्वलिटी की

[08:02:13] बातचीत करें वो खराब हो जाएगी। कि गरीब और

[08:02:15] गरीब अमीर और अमीर हो जाता है और इसके

[08:02:18] कारण बढ़ता है भ्रष्टाचार।

[08:02:22] महोदय फिलिप्स ने बेरोजगारी दर और

[08:02:24] मुद्रास्फीति के बीच में

[08:02:25] व्युत्क्रमानुपाती संबंध कहा था। उन्होंने

[08:02:27] कहा था कि इनफ्लेशन रेट जितनी ज्यादा होगी

[08:02:30] उतना ही ज्यादा कम अनइंप्लॉयमेंट रहेगा।

[08:02:33] मतलब अनइंप्लॉयमेंट और इनफ्लेशन रेट में

[08:02:36] इन्वर्सली रिलेशन है। मुद्रास्फीति ज्यादा

[08:02:39] होगी तो उद्योगपति ज्यादा उद्योग डालेंगे।

[08:02:41] ज्यादा उद्योग डालेंगे तो ज्यादा रोजगार

[08:02:43] होगा। अपने आप एंप्लॉयमेंट बढ़ जाएगा और

[08:02:46] बेरोजगारी कम हो जाएगी। तो फिलिप साहब के

[08:02:50] अकॉर्डिंग उन्होंने व्युत्क्रमानुपाती का

[08:02:51] एक ग्राफ बनाया। व्युत्क्रमानुपाती का

[08:02:54] ग्राफ याद रखना। जैसे जब मुद्रा बेरोजगारी

[08:02:57] की दर 3% थी तो मुद्रास्फीति 5% तक थी। जब

[08:03:02] बेरोजगारी की दर 6% हुई क्योंकि उस समय

[08:03:06] मुद्रास्फीति मात्र 2% रही। तो जब भी

[08:03:09] महंगाई कम होगी तो बेरोजगारी बढ़ेगी।

[08:03:12] महंगाई अगर बढ़ेगी तो बेरोजगारी कम होगी।

[08:03:15] यह बात ध्यान देना। इसलिए कहा जाता है कि

[08:03:17] मुद्रास्फीति ना तो बहुत ज्यादा होनी

[08:03:20] चाहिए ना बहुत ही कम। फिर है एंजल वक्र।

[08:03:23] एंजल वक्र एक ग्राफ है जो दिखाता है कि आय

[08:03:26] के बढ़ने पर उपभोक्ता किसी वस्तु या सेवा

[08:03:28] पर खर्च कैसे बदलता है। जैसे जैसे-जैसे

[08:03:32] लोगों की कमाई बढ़ती है। याद रखना

[08:03:34] खाद्यान्न पर होने वाला खर्च प्रतिशत में

[08:03:37] कम होता जाता है। कैसे?

[08:03:40] एक व्यक्ति जो ₹1000 प्रति महीना कमाता

[08:03:43] है। एक व्यक्ति जो ₹10 प्रति महीना कमाता

[08:03:46] है। एक व्यक्ति जो ₹1 लाख प्रति महीना

[08:03:49] कमाता है। ₹5000 समझ लेते हैं। एक व्यक्ति

[08:03:53] जो ₹5000 प्रति महीना कमाता है। वह अपने

[08:03:56] कमाई का लगभग 60%

[08:03:59] मतलब ₹3000

[08:04:01] अपने परिवार के खानेपीने पर खर्च करता है।

[08:04:05] ₹10,000 वाला हो सकता है कि वह 50% तक

[08:04:09] पैसा खर्च कर देगा। ₹5,000 खर्च करेगा।

[08:04:12] खाना पीना थोड़ा अच्छा खाएगा। ₹1 लाख वाला

[08:04:16] अगर ₹00 भी खर्च करता होगा तो मात्र 20%

[08:04:21] ही तो खर्चा हो पाएगा। और जो व्यक्ति ₹1

[08:04:24] करोड़ कमा रहा है। अगर वह व्यक्ति ₹1 लाख

[08:04:28] महीने का भी ₹1 लाख महीने का ₹1 करोड़

[08:04:31] महीने का कमा रहा है। ₹1 लाख महीने का भी

[08:04:33] खाना खाता होगा। कितना भी तरीके से तब भी

[08:04:36] मात्र 1% ही खाद्यान्न पर खर्च होता है।

[08:04:40] मेरे प्यारे लाल लालियों जैसे-जैसे लोगों

[08:04:43] की कमाई बढ़ती है खाद्यान्न पर प्रतिशत

[08:04:46] खर्चा बहुत तेजी से घटता घट जाता है।

[08:04:49] लेकिन जो व्यक्ति कम कमा रहा है उसका

[08:04:52] खर्चा कहां कम हो जाता है? शिक्षा में

[08:04:54] स्वास्थ्य में और इनका खर्चा शिक्षा और

[08:04:57] स्वास्थ्य में ज्यादा होगा। मनोरंजन पर

[08:04:59] ज्यादा होगा। मतलब सेवाओं पर ज्यादा खर्च

[08:05:02] किए जाते हैं।

[08:05:08] तो एंजेल कहते हैं कि आय बढ़ने पर भोजन पर

[08:05:11] खर्च की जाने वाली प्रतिशत मात्रा कम होती

[08:05:14] जाती है।

[08:05:17] मुद्रास्फीति को कंट्रोल करने के दो लोगों

[08:05:19] की जिम्मेदारी है। मौद्रिक उपाय मॉनिटरी

[08:05:22] पॉलिसी के तहत काम कदम उठाए जाएंगे और

[08:05:24] राजकोशीय उपाय सरकार कदम उठाएगी। मोनेरी

[08:05:28] पॉलिसी मैंने आपको बताया कि मौद्रिक नीति

[08:05:30] समिति मौद्रिक नीति लाएगी जिसको आरबीआई

[08:05:32] लागू करवाती है। कई प्रकार की ब्याज दरों

[08:05:35] को बढ़ाएगी जिससे बाजार में कहीं ना कहीं

[08:05:37] पैसों का नियंत्रण हो सके। साख कंट्रोल

[08:05:40] करेगी। मात्रात्मक और गुणात्मक उपाय

[08:05:42] अपनाएगी। हमने इस बारे में चर्चाएं ऑलरेडी

[08:05:45] कंप्लीट कर दी थी। फिर होते हैं राजकोषीय

[08:05:49] उपाय। राजकोशीषीय उपाय मतलब सरकार क्या

[08:05:51] करती है? सरकार अपने सार्वजनिक व्यय में

[08:05:53] कमी करती है। जैसे सरकार अब गाड़ियां कम

[08:05:56] चलाएगी। प्रधानमंत्री के इसमें भी हो सकता

[08:05:59] है आने वाले समय में महंगाई बढ़े तो सरकार

[08:06:01] अपने खर्चों को कम करेगी। हर तरीके से

[08:06:04] खर्चों को कम करने का प्रयास किया जाएगा।

[08:06:09] अगर जनता के पास ज्यादा पैसा है तो बैंकों

[08:06:12] से बैंकों के पास जो पैसा आएगा उसे सरकार

[08:06:14] खुद ही ट्रेजरी बिल जारी करके अपने पास रख

[08:06:17] लेगी। करोड़ों में वृद्धि कर सकती है।

[08:06:19] टैक्स को बढ़ा सकती है। घाटे की वित्त

[08:06:22] व्यवस्था मतलब घाटा कम करेगी। नए नोट नहीं

[08:06:24] छापेगी। डीमोनेटाइजेशन किया जा सकता है

[08:06:28] ताकि जिन लोगों के पास काला धन है वो काला

[08:06:30] धन वाइट में कन्वर्ट हो जाए। कन्वर्ट हो

[08:06:33] जाए। दैट मींस वो खत्म हो जाएगा। अब जिनके

[08:06:35] पास पैसा बचेगा वो सब वाइट रहना चाहिए।

[08:06:38] इसके अलावा सरकार उत्पादन बढ़ाने पर काम

[08:06:40] कर सकती है। इंफ्रास्ट्रक्चर बेटर कर सकती

[08:06:42] है। सप्लाई चेन को अच्छा करेगी ताकि कहीं

[08:06:45] पर भी कमी ना हो जाए वस्तुओं की और फॉरेन

[08:06:48] पॉलिसी को बेस्ट करने की कोशिश करेगी।

[08:06:50] मुद्रास्फीति का उल्टा कम होता है।

[08:06:53] अवस्फीति

[08:06:56] अवस्फीति समय के साथ मुद्रास्फीति में

[08:06:58] परिवर्तन की दर को दर्शाती है। समय के साथ

[08:07:01] मुद्रास्फीति की दर अगर घटती है लेकिन वह

[08:07:04] फिर भी महंगाई हो तब भी हम कहते हैं कि वह

[08:07:06] अवस्फीति है। मतलब डिसइफ्लेशन जैसे पहले

[08:07:10] महंगाई 10% थी, अब 8% आ गई, फिर 6% आ गई,

[08:07:13] फिर 4% आ गई। तो हम कहेंगे कि देखो भाई

[08:07:16] अवस्फीति की स्थिति है, डिसइफ्लेशन है,

[08:07:19] महंगाई है लेकिन कम हो रही है। लेकिन याद

[08:07:22] रखना मंदी का मतलब कीमतें पहले की तुलना

[08:07:25] में कम हो जाए। यदि भारत में जनवरी में

[08:07:28] मुद्रास्फीति की दर 5% थी लेकिन मार्च में

[08:07:31] घटकर 4% हो जाए तो हम इसे कहेंगे कि

[08:07:33] अवस्फीति हो गई। लेकिन जो अपस्फीति होती

[08:07:37] है, मंदी होती है वो खराब सिचुएशन है।

[08:07:39] मंदी का मतलब ये टेंपरेरी चलता रहता है कि

[08:07:42] कीमतों में थोड़ा सा गिरावट आ गई है।

[08:07:45] डिफ्लेशन का मतलब होता है प्राइस लेबर ही

[08:07:47] गिर गया। यह बहुत खतरनाक होता है। ये बहुत

[08:07:50] रेयरली मिलेगा। जैसे 1930 में मंदी आई थी।

[08:07:53] 20078 में एक बड़ी मंदी आई थी। तो इसमें

[08:07:56] क्या होता है? कीमतें पहले की तुलना में

[08:07:58] सस्ती हो जाती है और रुपए की वैल्यू महंगी

[08:08:01] हो जाती है। एक होता है स्टेकफ्लेशन

[08:08:04] मुद्रास्फीति जनित मंदी। कभी-कभी

[08:08:07] अर्थव्यवस्था के एक सेक्टर में कीमतें

[08:08:10] तेजी से बढ़ रही है और दूसरे सेक्टर में

[08:08:13] हो सकता है कि चीजें उतनी बेटर ना हो।

[08:08:16] इसका मतलब यह होता है कि कभी-कभी ऐसा होने

[08:08:18] लग जाता है कि एक तरफ तो बेरोजगारी भी बढ़

[08:08:21] रही है। बेरोजगारी भी बढ़ रही है और एक

[08:08:24] तरफ कीमतें भी आसमान छू रही है। हो सकता

[08:08:27] है सीमेंट इंडस्ट्री या बाकी इंडस्ट्री

[08:08:29] कमजोर हो जाए और इस कारण से बेरोजगारी बढ़

[08:08:32] जाए और इधर खाद्यान्न की कीमतें बढ़ जाए।

[08:08:35] उत्पादन भी ना हो।

[08:08:38] जब मंदी या स्टग्नेशन और मुद्रास्फीति

[08:08:42] दोनों एक साथ घटित होती है। अर्थव्यवस्था

[08:08:44] का ऐसा दौड़ जिसमें कोई समृद्धि नहीं

[08:08:45] होती। बेरोजगारी अपेक्षा से ज्यादा होती

[08:08:48] है और साथ ही साथ जीडीपी उत्पादन भी कम

[08:08:50] होने लग जाता है। सामान्यतः जब बेरोजगारी

[08:08:53] आती है तो व्यय और वस्तुओं की कीमतों में

[08:08:55] गिरावट आती है। लेकिन बेरोजगारी भी आ रही

[08:08:58] है और कीमतें भी बढ़ रही है तो इसको कहते

[08:09:00] हैं घर्षणजनित महंगाई। स्टेकफ्लेशन।

[08:09:04] स्टेफ्लेशन एक दुर्लभ घटना है। कभी-कभी

[08:09:06] अर्थव्यवस्था के दो सेक्टर में अलग-अलग

[08:09:08] चीजें मिलती है। फिर मैंने गिफिंस के बारे

[08:09:10] में बताया था कि जब भी किसी वस्तु की

[08:09:13] डिमांड बढ़ती है तो कीमतें बढ़ने लग जाती

[08:09:16] है। लेकिन अगर कीमतें बढ़ने के कारण

[08:09:18] डिमांड बढ़ने लग जाए तो उसे कहते हैं

[08:09:20] गिफिन गुड्स।

[08:09:22] प्रोटीन मुद्रास्फीति दालों की कीमतें

[08:09:24] बढ़ने के कारण होने वाला प्रभाव। आारीय

[08:09:27] वर्ष का मतलब होता है कि किस आधार किस

[08:09:30] वर्ष की तुलना में हम सब चीजों को निकाल

[08:09:32] रहे होते हैं।

[08:09:40] सिंपल सा है कि पिछले किस वर्ष की तुलना

[08:09:42] में हम कीमत निकाले। इकोनॉमिकल साइकिल

[08:09:44] मतलब एक व्यापार चक्र जहां पर मंदी आती

[08:09:47] है। फिर बूम आता है। मतलब रिकवरी होती है।

[08:09:50] फिर बूम आता है। चलते रहता है। रिसेशन

[08:09:53] आएगा। फिर रिकवरी होगी। फिर बूम आएगा। फिर

[08:09:56] रिसेशन आएगा। फिर चलता रहेगा यह प्रोसेस।

[08:10:02] मंदी, तकनीकी मंदी चलते रहती है चीजें।

[08:10:09] जब भी मंदी आएगी तो सरकार क्या करेगी? एक

[08:10:12] तरीके से ब्याज दरों को कम करना चाहती है

[08:10:15] या फिर अगर सरकार मंदी से निपटना चाहती है

[08:10:18] तो अपने सार्वजनिक परियोजनाओं में खर्च

[08:10:20] बढ़ा देगी ताकि जनता के पास ज्यादा से

[08:10:23] ज्यादा पैसा पहुंचना चाहिए।

[08:10:32] अब हम बात करने जा रहे हैं नेशनल इनकम।

[08:10:35] अभी बजट और राजकोशीय नीति क्योंकि हम

[08:10:38] ऑलरेडी कंप्लीट कर चुके होंगे फिर भी उसके

[08:10:40] कुछ शब्दावली पर जरूर ध्यान देंगे। नेशनल

[08:10:43] इनकम राष्ट्रीय आय आगे बढ़ने से पहले एक

[08:10:46] बार फिर से देखो थोड़ा कठिन और टेक्निकल

[08:10:49] विषय है तो थोड़ा डिप्रेशन आ सकता है पर

[08:10:51] आप तनाव मत लीजिए। मैंने आपसे बार-बार कहा

[08:10:54] है जब भी स्ट्रेस आए गहरी सांस लेंगे 10

[08:10:58] बार 12 बार गहरी सांस लेंगे और छोड़ेंगे।

[08:11:01] थोड़ा मुस्कुराइए। थोड़ा सा चिल्लाना शुरू

[08:11:03] कर दीजिए आसपास मुस्कुराते हुए। चिल्लाने

[08:11:06] का मतलब मुस्कुराते हुए आवाजें करिए जोर

[08:11:09] से ताकि आपके अंदर का तनाव खत्म हो जाए।

[08:11:30] थोड़ा रिलैक्स हो जाइए आप लोग।

[08:11:51] [गला साफ़ करने की आवाज़]

[08:11:54] नहीं अभी ब्रेक नहीं लेंगे। अभी ब्रेक

[08:11:56] नहीं लेंगे।

[08:11:57] [गला साफ़ करने की आवाज़]

[08:11:59] थोड़ा सा इस टॉपिक को खींच लेते हैं। इसके

[08:12:01] बाद ब्रेक लेंगे।

[08:12:03] [गला साफ़ करने की आवाज़]

[08:12:09] नहीं ब्रेक अभी नहीं थोड़ा सा ब्रेक रोक

[08:12:11] दीजिए अभी

[08:12:14] क्योंकि इसके बाद फिर जब मैं ब्रेक लूंगा

[08:12:15] तो फिर ज्यादा टाइम चला जाएगा और चीजें

[08:12:18] ज्यादा कवर करनी है।

[08:12:21] मोबाइल की बैटरी अगर खत्म हो रही है तो आप

[08:12:23] चार्जिंग लगा दीजिए। नेशनल इनकम। नेशनल

[08:12:27] इनकम मतलब हमारे देश के लोग मिलकर एक साल

[08:12:31] में कितनी कमाई करते हैं? कितना उत्पादन

[08:12:34] करते हैं? उत्पादन वास्तविक रूप में नेशनल

[08:12:37] इनकम का मतलब होता है एक साल में कितनी

[08:12:40] वस्तु और सेवाएं हमने पैदा की। हमारे देश

[08:12:42] में प्रॉपर्टी कितनी है? उसको कैलकुलेट

[08:12:44] नहीं करते हैं। हमारे देश के लोगों ने

[08:12:46] मिलकर कुल कितनी वस्तु सेवाओं का उत्पादन

[08:12:49] किया उसको नेशनल इनकम कहते हैं। हम इसको

[08:12:52] रुपए में कैलकुलेट करते हैं। भाई रुपए में

[08:12:54] कन्वर्ट करते हैं। कितना क्विंटल गेहूं,

[08:12:55] कितना क्विंटल चावल, कितनी कारें बनाई,

[08:12:58] कितनी सुई बनाई, कितनी कुर्सियां बनाई,

[08:13:00] कितनी सर्विज दी डॉक्टर ने, मास्टर ने,

[08:13:03] रेलवे ने, जितनी सर्विज दी, सबकी कीमतों

[08:13:06] को निकाला जाता है। तो हम नेशनल इनकम के

[08:13:09] बारे में बातचीत करने जा रहे हैं।

[08:13:13] राष्ट्रीय आय किसी देश की संपूर्ण आर्थिक

[08:13:15] गतिविधियों का परिणाम होती है जो देश की

[08:13:18] कुल उत्पादनता और आय को दर्शाती है। उन

[08:13:20] सभी वस्तु और सेवाओं का मूल्य होता है जो

[08:13:22] एक निश्चित समय में देश की आर्थिक सीमा के

[08:13:24] भीतर उत्पादित होती है। सबसे पहले दादा

[08:13:27] भाई नौरोजी ने एक प्रकार से विचार व्यक्त

[08:13:29] किया था। फिर समय-समय पर भारत में

[08:13:32] राष्ट्रीय आय की वैज्ञानिक गणना का शेप

[08:13:34] प्रोफेसर के आरवी राव को जाता है।

[08:13:36] जिन्होंने नेशनल इनकम इन ब्रिटिश इंडिया

[08:13:38] ₹62 प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष के अकॉर्डिंग

[08:13:41] कैलकुलेट किया था। कई लोगों ने ऐसे प्रयास

[08:13:44] किए लेकिन 1949 में राष्ट्रीय आय की गणना

[08:13:47] के लिए पहले एक आधिकारिक प्रयास हुआ। एक

[08:13:49] नेशनल इनकम कमेटी बनाई गई। अध्यक्ष बने

[08:13:52] पीसी महालनोबिस। 29 जून को इनके नाम पर हम

[08:13:56] अपने देश में स्टैटिक्स डे सेलिब्रेट करते

[08:13:59] हैं। इसके सदस्य थे डी आर गाडगिल वी के

[08:14:02] आरवी राव 194849 के भारत के राष्ट्रीय आयग

[08:14:06] गणना में 8710 करोड़ जीडीपी कैलकुलेट किया

[08:14:10] गया था और व्यक्तियों की प्रति व्यक्ति आय

[08:14:13] ₹246 कैलकुलेट की गई थी। बाद में केंद्रीय

[08:14:17] सांख्यिकी कार्यालय के तहत काम होने लगा।

[08:14:20] अब हमारे देश में एनएसओ बन चुका है।

[08:14:22] अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नोबेल पुरस्कार

[08:14:24] विजेता साइमन कुजनेट्स ने सबसे पहले नेशनल

[08:14:27] आय की कांसेप्ट को पेश किया था 1950 में

[08:14:30] कुजनेट्स वक्र विकसित किए गए थे। आर्थिक

[08:14:33] विकास और असमानता को दर्शाने के लिए

[08:14:36] जिसमें उन्होंने कहा था कि शुरुआत में

[08:14:37] असमानताएं विकास के साथ बढ़ती जाएगी। फिर

[08:14:40] एक समय के बाद आर्थिक असमानताएं कम होने

[08:14:43] लग जाएगी। जब तक आर्थिक असमानताएं बढ़ रही

[08:14:46] है, विकासशील है, जब समाप्त होने लग जाएगी

[08:14:49] तो विकसित अर्थव्यवस्था कहलाएगी। कुजनेट्स

[08:14:52] वर्क आर्थिक विकास शुरू में अधिक असमानता

[08:14:54] की ओर और बाद में असमानताओं में कमी आती

[08:14:56] है। ये कुजनेट्स आपका कर्व है।

[08:15:00] अब पहले मैं आपको एक सिंपल सी बात बता दे

[08:15:02] रहा हूं। कुछ बातें आपके दिमाग में होनी

[08:15:05] चाहिए। देखो हम सबसे पहले कैलकुलेट क्या

[08:15:08] करते हैं? हम सबसे पहले कैलकुलेट करते हैं

[08:15:10] एक साल में भारत की सीमा के भीतर। अब आप

[08:15:13] कहेंगे भारत की सीमा मतलब जो मैप हम बनाते

[08:15:16] हैं उस मैप के अलावा भी भारत की सीमा

[08:15:19] कैलकुलेट की जाती है। मैं बता देता हूं

[08:15:22] उसके अलावा भी भारत की सीमा का मतलब क्या

[08:15:25] रहेगा? भारत के 200 नॉटिकल माइल तक का

[08:15:29] पूरा एरिया समझ लीजिए आप इसके अंतर्गत

[08:15:31] आएगा।

[08:15:33] 200 नहीं पर 12 नॉटिकल तो गारंटेड 200 में

[08:15:36] इसलिए क्योंकि संसाधन भी जब भारत लेता है

[08:15:38] तो वहां से भी आते हैं चीजें। इसके अलावा

[08:15:41] भारत में भारत का कोई भी हवाई जहाज जो

[08:15:45] भारत की प्राइवेट कंपनी का क्यों ना हो वह

[08:15:47] कहीं पर है। भारत की जितने भी एंबेसडर

[08:15:50] अलग-अलग देशों में राजदूत है उनके जो भी

[08:15:53] मकान है वहां जो भी काम हो रहा है सब भारत

[08:15:55] में कैलकुलेट होता है।

[08:15:57] तो जीडीपी का मतलब क्या है? ग्रॉस

[08:16:00] डोमेस्टिक प्रोडक्ट। डोमेस्टिक है। घर का

[08:16:03] घर का भाई किसने बनाया हमें नहीं पता पर

[08:16:05] घर में बना है। तो हमारे देश की सीमा के

[08:16:08] अंतर्गत प्राइवेट सरकार, विदेशी, स्वदेशी

[08:16:13] जो भी व्यक्ति देश के भीतर में उत्पादन कर

[08:16:16] रहा हो तो उसको कहते हैं जीडीपी। क्या

[08:16:18] कहते हैं? जीडीपी। और फिर हम क्या करते

[08:16:21] हैं? ध्यान से सुनना मेरी बात। हम उस

[08:16:23] उत्पादन को कि गेहूं का उत्पादन कितना

[08:16:26] हुआ? चावल का उत्पादन कितना हुआ? कारें

[08:16:28] कितनी बन पाई या फिर बाइक कितनी बन पाई?

[08:16:31] इन सबको कैलकुलेट जब करते हैं तो उसको नाम

[08:16:33] देते हैं कि भाई हमने जीडीपी कैलकुलेट

[08:16:35] किया। लेकिन ये अच्छा नहीं लगेगा। इतना

[08:16:37] क्विंटल चावल, इतना किलो, इतना क्विंटल

[08:16:40] गेहूं का उत्पादन हुआ, इतनी कारें बन गई,

[08:16:42] इतनी कुर्सियां बन गई, इतनी टीवी बन गई तो

[08:16:44] अच्छा नहीं लगेगा। तो हम सबको रुपए में

[08:16:46] बदल देते हैं। उनका एमआरपी निकालते हैं

[08:16:50] एमआरपी। और एमआरपी निकाल कर हम रख देते

[08:16:53] हैं भाई कि देखो इतनी कीमत है इसकी। तो

[08:16:56] इसको कह देंगे हम लोग कि हमने क्या

[08:16:57] निकाला? ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट एट

[08:17:00] मार्केट प्राइस। क्योंकि एमआरपी पर निकाला

[08:17:02] तो मार्केट प्राइस पर कहेंगे हम लोग। ठीक

[08:17:05] है?

[08:17:07] [नाक से की जाने वाली आवाज़]

[08:17:07] सबसे पहली बात हमने जीडीपी कैलकुलेट कर

[08:17:10] दिया। सिंपल सा हिसाब है। एक साल में देश

[08:17:12] की सीमा के भीतर कितनी वस्तु सेवाओं का

[08:17:14] उत्पादन हुआ। उसकी मौद्रिक मूल्य को उसके

[08:17:17] बाजार कीमत को हम कैलकुलेट कर देते हैं।

[08:17:19] उसको कहते हैं जीडीपी। बहुत सिंपल सी बात

[08:17:21] है।

[08:17:24] देश के भीतर हर चीज जितनी बनी थी सबको

[08:17:27] कैलकुलेट कर रहे हैं। ध्यान से सुनना मेरी

[08:17:29] बात।

[08:17:31] जो चीजें एक साल पिछले एक साल में बनी थी

[08:17:35] हम उनकी आज कीमत कैलकुलेट कर रहे हैं। आज

[08:17:39] मुझे बताओ चीजें कई ऐसी होती है जो जितनी

[08:17:42] एक साल पुरानी हो गई तो सस्ती हो गई होगी।

[08:17:45] कुछ महंगी हो गई होगी। जैसे सोना एक साल

[08:17:48] पहले की तुलना में आज महंगा हो गया होगा।

[08:17:50] तो हम क्या करते हैं? एक और कैलकुलेशन को

[08:17:54] बेटर करने के लिए इस जीडीपी को नेट में

[08:17:57] बदलने के लिए एनडीपी में बदलने के लिए

[08:18:00] मार्केट प्राइस पर हम डेप्रिसिएशन को

[08:18:03] माइनस करते हैं। तो एनडीपी का मतलब एनडीपी

[08:18:06] मार्केट प्राइस का मतलब जीडीपी मार्केट

[08:18:09] प्राइस में से डेप्रिसिएशन को माइनस कर

[08:18:11] देंगे। डेप्रिसिएशन का मतलब इस एक साल में

[08:18:14] कई सारी वस्तु सेवाएं घिस गई होगी। तो एक

[08:18:17] साल से हमने उत्पादन करके शायद अब उसकी

[08:18:19] कीमत आज एक कार जो है पिछले एक छ महीने से

[08:18:22] चल रही होगी तो उसकी कीमत उतनी तो नहीं रह

[08:18:24] गई होगी। बाइक की कीमत उतनी नहीं रही

[08:18:27] होगी। कुर्सी की कीमत उतनी नहीं रही होगी।

[08:18:29] हो सकता है सोने की कीमत बढ़ गई, चांदी की

[08:18:31] बढ़ गई, कुछ कीमतें बढ़ गई होगी, कुछ की

[08:18:33] कम हो गई होगी। तो रिजल्टेंट डेप्रिसिएशन

[08:18:36] निकाला जाता है, मूल्यहास निकाला जाता है

[08:18:38] और नेट वैल्यू निकाली जाती है। इसको क्या

[08:18:40] कहेंगे हम लोग? नेट। नेट मतलब शुद्ध।

[08:18:46] यहां तक कोई दिक्कत है? अब मेरी एक बात

[08:18:49] ध्यान से सुनना। यह आपने जो मार्केट

[08:18:52] प्राइस निकाला है क्या सच में इतने वस्तु

[08:18:55] सेवाओं का इतने रुपए का उत्पादन किया

[08:18:58] हमने? क्योंकि इस मार्केट प्राइस में हमने

[08:19:01] सरकार के द्वारा लगाए गए टैक्सेस को कीमत

[08:19:04] मान लिया था। और भाई सरकार ने जो टैक्स

[08:19:07] लगाया वह उसकी कीमत हो सकती है पर उसका

[08:19:10] वास्तविक उत्पादक वैल्यू थोड़ी हो सकता

[08:19:12] है। अगर एक व्यक्ति ने एक कार बनाई थी जो

[08:19:16] ₹1 लाख की थी। सरकार ने टैक्स लगाया था ₹

[08:19:19] लाख का तो आपने ₹12 लाख की कीमत ले ली।

[08:19:22] क्या वो अच्छी बात है क्या? उसकी रियल

[08:19:24] कीमत ₹1 लाख थोड़ी है। उत्पादन तो ₹1 लाख

[08:19:28] का हुआ ना। टैक्स थोड़ी उत्पादन कहलाता

[08:19:30] है। हमने कहा ये गलत चीज है भाई। मैंने

[08:19:33] कहा कि ये क्या है? गलत चीज है। तो फिर

[08:19:36] हमने क्या करना चाहिए? टैक्सेस को हटाना

[08:19:39] चाहिए। तो हमने कहा देखो भाई अगर आपको अगर

[08:19:43] आपको जीडीपी मार्केट प्राइस की जगह पर सही

[08:19:47] निकालना है तो जीडीपी एट फैक्टर कॉस्ट

[08:19:49] निकालो। फैक्टर कॉस्ट का मतलब कि रियल में

[08:19:52] कितने का उत्पादन हुआ? तो हम क्या कहेंगे?

[08:19:55] जीडीपी मार्केट प्राइस में से टैक्सेस को

[08:19:58] इनडायरेक्ट टैक्सेस को जो भी टैक्सेस लगाए

[08:20:01] थे उनको हटाओ।

[08:20:04] लेकिन एक और चीज एक और चीज मेरी बात ध्यान

[08:20:06] से सुनना

[08:20:10] हमने कहा भाई यूरिया यूरिया कितना

[08:20:12] उत्पादित हुआ तो यूरिया मान लेते हैं कि

[08:20:15] 100 टन पैदा हुआ था हमने मार्केट से कीमत

[08:20:18] निकाली कि मार्केट में कीमत क्या है तो

[08:20:20] मार्केट में कीमत पता चली कि एक क्विंटल

[08:20:23] यूरिया की कीमत मान लेते हैं कि ₹1500 है

[08:20:26] हमने कहा बहुत ठीक है ₹1500 के हिसाब से

[08:20:29] निकाल दो कितना हुआ और फिर पता चला कि

[08:20:32] 1500 रियल में नहीं है। रियल में तो उसकी

[08:20:35] कीमत ₹3000 है। पर सरकार ने सब्सिडी दे दी

[08:20:39] थी। सरकार ने कहा था कि चलो भाई ₹1500

[08:20:42] मेरी तरफ से मैं दे दूंगा ताकि मार्केट

[08:20:44] में सस्ता रहे और किसान बेचारा खरीद सके।

[08:20:48] तो सब्सिडी के कारण हमने उसकी रियल कीमत

[08:20:50] तो ली नहीं। जबकि रियल उत्पादन तो ₹3000

[08:20:52] का था वो।

[08:20:54] तो हम क्या करते हैं कि टैक्सेस को हटा

[08:20:56] देते हैं। इनडायरेक्ट टैक्सेस को हटा देते

[08:20:59] हैं और सब्सिडी को जोड़ देते हैं। जब हमें

[08:21:02] ये चीज रिजल्टेंट मिलती है तो हम इसको

[08:21:04] कहते हैं कि ये जीडीपी एट फैक्टर कॉस्ट

[08:21:06] है। क्योंकि मार्केट प्राइस पर जो हमने

[08:21:09] निकाला मार्केट प्राइस पर जो हमने निकाला

[08:21:12] वो रियल उत्पादन की वैल्यू नहीं है। रियल

[08:21:15] उत्पादन तो ये है। रियल उत्पादन तो ये है।

[08:21:19] अब इसी में से अगर हमने डेप्रिसिएशन को

[08:21:21] हटा दिया जीडीपी फैक्टर कॉस्ट में से

[08:21:24] डेप्रिसिएशन को हटा दिया तो एनडीपी आ

[08:21:26] जाएगा। एनडीपी फैक्टर कॉस्ट आ जाएगा। नेट

[08:21:30] डोमेस्टिक प्रोडक्ट आ जाएगा फैक्टर कॉस्ट

[08:21:32] वाला। तो फैक्टर कॉस्ट क्यों निकाला जाता

[08:21:35] है? क्योंकि रियल उत्पादन टैक्सेस थोड़ी

[08:21:39] है भाई हमारा।

[08:21:41] और सब्सिडी तो कीमतों को कम करके दिखाया

[08:21:43] था। बढ़ाकर बताएंगे। दूसरी बड़ी बात

[08:21:49] इस पूरी कहानी में इस पूरी कहानी में एक

[08:21:53] जगह और गलती हुई है।

[08:21:57] हमारे देश में एडडास वाला हो गया। हमारे

[08:22:01] देश में

[08:22:03] मान लीजिए कि iPhone वाले ने फोन बनाया।

[08:22:06] तो क्या ये हमारे देश का प्रोडक्ट है

[08:22:09] क्या? क्या यहां पर जिसने भी उत्पादन किया

[08:22:12] है वो अपना मुनाफा सब चीजें लेकर जाएगा कि

[08:22:15] नहीं जाएगा? तो यह जो चीजें आप कह रहे थे

[08:22:18] कि यह डोमेस्टिक है, डोमेस्टिक है, यह

[08:22:21] डोमेस्टिक ठीक है।

[08:22:23] डोमेस्टिक ठीक है। लेकिन यह हमारा सच में

[08:22:26] नहीं है। यह विदेशी लोगों का है। विदेशी

[08:22:29] लोग फाइनली उसे अपने देश में लेकर जाएंगे।

[08:22:32] ऐसे ही हमारे देश वे लोग भी बाहर कमाई

[08:22:35] करने गए होंगे। उत्पादन करके कंपनियां

[08:22:37] डाली होगी। जगवार हैं। बाहर कई कंपनियां

[08:22:40] हमारे भारतीयों की होगी। तो वे भी

[08:22:42] भारतीयों को पैसा डालेंगे लाएंगे। तो फिर

[08:22:45] हम क्या करते हैं? जीडीपी में से एनडीपी

[08:22:49] निकाल दे। एनडीपी निकालने के बाद एनडीपी

[08:22:52] फैक्टर कॉस्ट में से हम रिजल्टेन

[08:22:55] नेट इनकम नेट इनकम फ्रॉम अब्रॉड को जोड़

[08:22:59] देंगे। नेट इनकम कितना पैसा गया, कितना

[08:23:02] विदेशों से आया। पैसा मतलब हमारे देश के

[08:23:05] उत्पादकों ने कितना लाया और विदेशी

[08:23:07] उत्पादक हमारे देश से कितना लेकर गए। इसको

[08:23:10] जब हम जोड़ देंगे जोड़ देंगे नेट इनकम

[08:23:13] फ्रॉम अब्रॉड को तब हम उसको नाम देंगे कि

[08:23:16] अब वो डोमेस्टिक नहीं रहा। अब वह नेशनल

[08:23:19] प्रोडक्ट बन गया है। राष्ट्रीय उत्पाद बन

[08:23:22] गया है। नेशनल प्रोडक्ट बन गया है।

[08:23:28] इस नेशनल प्रोडक्ट को ही नेशनल इनकम

[08:23:31] कहेंगे रियल में। इसी को हम नाम देंगे

[08:23:34] नेशनल इनकम। नेशनल इनकम नाम देंगे मेरे

[08:23:38] प्यारे लाल लालियों। तो जीडीपी बड़ा सिंपल

[08:23:42] सा लॉजिक है। अब यहां एक बड़ी इंटरेस्टिंग

[08:23:44] चीज और मैं बता रहा हूं। देखो जीडीपी

[08:23:46] कैलकुलेशन कोई बहुत भयानक सी चीज नहीं है।

[08:23:49] हम केवल और केवल क्या करने जा रहे होते?

[08:23:51] जीडीपी कैलकुलेशन में अपने देश का कुल

[08:23:54] वस्तु सेवाओं का मौद्रिक मूल्य निकाल रहे

[08:23:57] होते। फिर हमने गलती क्या कर दी थी?

[08:23:59] मार्केट प्राइस ले लिया था। पर मार्केट

[08:24:01] प्राइस में तो इनकम टैक्स भी जोड़ दिए गए

[08:24:03] थे। हमने कहा उसको हटाओ फिर निकालो। तो

[08:24:05] हमने क्या निकाला? फैक्टर कॉस्ट पे

[08:24:07] निकाला। फैक्टर कॉस्ट को निकालते समय हमने

[08:24:10] गलती कर दी कि हमने सारी कीमतें ले ली। आज

[08:24:12] तो उसकी कीमत कम ज्यादा हो गई होगी। तो

[08:24:14] डेप्रिसिएशन को हटाकर नेट निकाला। नेट

[08:24:17] निकालने के बावजूद भी एक बड़ी गलती क्या

[08:24:19] लग रही है? एक बड़ी गलती लग रही है कि

[08:24:21] इसमें विदेशी लोगों ने जो उत्पादन किया था

[08:24:24] वो हमारा थोड़ी होगा भाई। हम उसको हटा

[08:24:27] देंगे। हम उसको क्या कर देंगे? हटा देंगे।

[08:24:29] और नेट इनकम फ्रॉम अब्रॉड देखेंगे कि

[08:24:32] हमारे से कितना चला गया और कितना हमारे

[08:24:34] देश में लाया गया। उनको जोड़ेंगे तब पता

[08:24:36] चलेगा। अगर वो नेगेटिव हो जाता है। मान लो

[08:24:38] कि ज्यादा चला गया होगा तो हमारा जो

[08:24:41] जीडीपी तो बड़ा रहेगा लेकिन एनएपी जो

[08:24:44] रहेगा वो छोटा रहेगा। एनडीपी तो बड़ा

[08:24:46] रहेगा। एनएपी छोटा रहेगा। नेशनल इनकम

[08:24:49] नेशनल प्रोडक्ट छोटा रहेगा। अगर ज्यादा

[08:24:51] पैसा चला जा रहा है तो। अब एक मिस्टेक

[08:24:55] क्या हुई? जरा ध्यान से सुनना। मेरी बात

[08:24:57] ध्यान से सुनना। और कितने लोगों तक आज

[08:24:59] पहली बार बात पहुंच पाती है वो जरूर बताना

[08:25:01] मुझे कि सर पहली बारी थी लेकिन बिल्कुल

[08:25:04] क्लेरिटी में आ गई। सब्सिडी हो तो उसको

[08:25:06] जोड़ देंगे। अगर इनकम टैक्स था तो उसको

[08:25:09] हटा देंगे। जैसे हटाएंगे तो फैक्टर कॉस्ट

[08:25:11] निकल कर आ जाएगा। प्रैक्टिकली फैक्टर

[08:25:13] कॉस्ट ज्यादा जरूरी है क्योंकि वो सही

[08:25:15] उत्पादन है। लेकिन देखो अभी एक और मिस्टेक

[08:25:17] क्या हुई?

[08:25:23] इनफ्लेशन एडजस्टमेंट नहीं हुआ है। अभी

[08:25:26] महंगाई का

[08:25:29] एडजस्टमेंट नहीं हुआ। इनफ्लेशन को अभी

[08:25:32] हमने एडजस्ट नहीं किया। सर ये क्या है

[08:25:34] इनफ्लेशन एडजस्टमेंट? आइए जरा ध्यान से

[08:25:37] सुनना।

[08:25:38] जीडीपी मतलब ये जो भी हम कैलकुलेशन कर रहे

[08:25:42] हैं पूरी कहानी में हम देश के भीतर कितनी

[08:25:45] वस्तु और सेवाओं का उत्पादन हुआ। उसका

[08:25:48] मौद्रिक मूल्य निकाल रहे हैं। मौद्रिक

[08:25:50] मूल्य निकाल रहे हैं। ध्यान से सुनना मेरी

[08:25:52] बात। अब

[08:25:53] ध्यान से सुनना मेरी बात। तो मान लीजिए कि

[08:25:57] आज हमारे देश में मान लीजिए कि 100 किलो

[08:26:02] चावल का उत्पादन हुआ। मैंने उसका एमआरपी

[08:26:06] ले लिया कि भ मार्केट में चावल का भाव है

[08:26:08] ₹10। मैंने कहा ₹1000 का उत्पादन हुआ। फिर

[08:26:12] मैंने कहा अरे ₹10 नहीं था। रियल में तो

[08:26:14] उसमें ₹40 का तो टैक्स सरकार का था। तो

[08:26:17] हमने कहा भाई मतलब ₹960 का उत्पादन हुआ।

[08:26:20] मैंने कहा ₹960 का उत्पादन हुआ।

[08:26:24] लेकिन इसमें गलती हुई

[08:26:28] क्योंकि यहां वास्तविक रूप में यह आंकड़े

[08:26:31] नहीं बताए जा रहे हैं। दुनिया वालों को यह

[08:26:33] नहीं बता रहे। हम लोग कह रहे कि हमारे देश

[08:26:35] का जीडीपी 960 है। हम यह बता रहे दुनिया

[08:26:37] वालों को ये करंट प्राइस पर हमने निकाला

[08:26:41] है। हो सकता है ये जो 960 हमें दिख रहा है

[08:26:43] वह वर्तमान की कीमतों के कारण दिख रहा है।

[08:26:50] तब हम क्या करते हैं?

[08:26:53] वस्तुएं आज की लेंगे। आज कितना वस्तुओं का

[08:26:56] उत्पादन हुआ है? पिछले एक साल में कितना

[08:26:58] उत्पादन हुआ? कीमत कांस्टेंट लेंगे।

[08:27:01] 2011-12 वाली कीमत ले लेंगे।

[08:27:05] अब आज उत्पादन यह हुआ मान लेते हैं कि आज

[08:27:08] उत्पादन हमारा टोटल 100 कि.ग्र. का हुआ और

[08:27:12] कीमतें हमने ली। उस जमाने में ₹5 का था।

[08:27:15] तो हमने कहा भाई ₹500 और सरकार का टैक्स

[08:27:18] ₹40 था। तो हमने कहा भाई टोटल ₹460

[08:27:23] का जीडीपी हमारा बना है कांस्टेंट प्राइस

[08:27:26] पर। यह रियल में हमारा उत्पादन दर्शा रहा

[08:27:29] है। यह करंट प्राइस की वैल्यू दर्शा रहा

[08:27:32] था। यह ज्यादा इसलिए दर्शा रहा था क्योंकि

[08:27:35] कीमतें ज्यादा बढ़ गई थी। उत्पादन ज्यादा

[08:27:38] नहीं बढ़ा था। यह रियल में उत्पादन को

[08:27:40] दर्शाएगा। हो सकता है उस जमाने में हम

[08:27:42] केवल 50 किलो ही पैदा कर पाते थे और उस

[08:27:45] समय केवल ₹250 उसमें टैक्स चला जाता था।

[08:27:48] तो ₹210 का उत्पादन होता था। अब उत्पादन

[08:27:52] हमें रियल में दिखाई देगा कितना बढ़ गया।

[08:27:54] मैं यह कहना चाहता हूं मेरे प्यारे लाल

[08:27:57] लालियों कि वास्तविक रूप में महंगाई के

[08:28:01] कारण भी कई बार जीडीपी जरूरत से बड़ा दिख

[08:28:04] जाता है। इस गलती को सुधारने के लिए हम

[08:28:07] कांस्टेंट प्राइस पर कीमतों को कांस्टेंट

[08:28:10] प्राइस पर लेकर जीडीपी का कैलकुलेशन करते

[08:28:13] हैं। उसे रियल जीडीपी कहते हैं। रियल

[08:28:16] जीडीपी वास्तविक जीडीपी क्योंकि उसमें

[08:28:19] हमने महंगाई को एडजस्ट किया है। महंगाई के

[08:28:23] कारण जो आपने बढ़ा चढ़ाकर बता दिया कि हम

[08:28:25] तो करोड़ों कमा रहे हैं। अरे गधो वो तो

[08:28:28] महंगाई के कारण ज्यादा करोड़ों दिख रहा है

[08:28:30] ना। रियल प्रोडक्शन गेहूं, चावल, प्याज,

[08:28:33] कुर्सी, कार इन सबका तो कम ही हुआ था। अगर

[08:28:36] देखा जाए तब हम कहेंगे कि अच्छा इसके लिए

[08:28:39] रियल जीडीपी कैलकुलेट किया जाता है। और ये

[08:28:42] जो करंट प्राइस पर कैलकुलेट किया गया इसको

[08:28:44] कहते हैं नॉमिनल जीडीपी। नाम मात्र का

[08:28:47] जीडीपी। नॉमिनल जीडीपी और रियल जीडीपी के

[08:28:50] अनुपात को तो महंगाई कहते कि इतनी महंगाई

[08:28:52] थी मतलब हमारे देश में क्या ये पॉइंट आपके

[08:28:55] समझ में आ रहा है?

[08:28:59] क्या ये बात आप समझ पा रहे हैं?

[08:29:11] कितने लोगों को अब यह बात समझ में आ रही

[08:29:13] है?

[08:29:27] कितने लोगों को अब वास्तविक रूप में समझ

[08:29:29] में आ रहा है कि अच्छा

[08:29:32] कांस्टेंट प्राइस पर इसलिए निकालते हैं

[08:29:34] फैक्टर कॉस्ट इसलिए निकालते हैं। नेट

[08:29:38] इसलिए निकालते हैं। रीज़न समझ में आ रहे है

[08:29:40] कि हर चीज के निकालने के पीछे एक लॉजिक

[08:29:43] है। एक कारण है। कोई अपनी मर्जी से कुछ भी

[08:29:46] नहीं कर रहा है। सब के सब लॉजिक है उसके

[08:29:49] अंतर्गत। सब चीजों के पीछे का लॉजिक है।

[08:29:52] तो आइए जरा देखते हैं। जीडीपी एक वर्ष के

[08:29:54] दौरान देश के आर्थिक सीमा के भीतर

[08:29:56] उत्पादित अंतिम वस्तु और सेवाओं का कुल

[08:29:58] बाजार मूल्य होता है। जीडीपी की गणना

[08:30:01] बाजार कीमत पर की जाती है। इसे बाजार

[08:30:03] कीमतों पर जीडीपी के रूप में मानते हैं।

[08:30:05] जीडीपी में इस बात पर ध्यान दिया जाता है

[08:30:07] कि उत्पादन कहां हो रहा है? कौन कर रहा

[08:30:10] है? से कोई मतलब नहीं होता है। जीडीपी सभी

[08:30:12] घरेलू उत्पादन का उत्पादनों का मापन करता

[08:30:15] है। राष्ट्रीयता का नहीं। इसमें यह सीमा

[08:30:18] सब कुछ शामिल की जाती है। 200 नॉटिकल माइल

[08:30:20] तक का पूरा क्षेत्र इसमें शामिल करते हैं।

[08:30:23] जैसे ये इंटरमीडिएट गुड है और यह फाइनल

[08:30:26] गुड है।

[08:30:30] नाम मात्र का जीडीपी। जब एक वर्ष में

[08:30:32] उत्पादित वस्तु और सेवाओं के मूल्य की

[08:30:34] गणना बाजार कीमतों पर की जाती है तो नाम

[08:30:36] मात्र का जीडीपी कहता है। नाम मात्र का

[08:30:39] जीडीपी ज्यादा होगा क्योंकि इसमें महंगाई

[08:30:41] भी जुड़ जाती है। नाम मात्र की नॉमिनल

[08:30:44] जीडीपी चालू वर्ष में वित्त वस्तु और

[08:30:46] सेवाओं की कीमतें गुना में चालू वर्ष में

[08:30:48] उत्पादित वस्तु और सेवाओं की मात्रा

[08:30:51] वास्तविक जीडीपी गणना ज्यादा बेटर होता है

[08:30:54] क्योंकि इसमें एडजस्टमेंट किया जाता है।

[08:30:55] इनफ्लेशन का मूल्य में उतार-चढ़ाव को

[08:30:57] छोड़कर वास्तविक उत्पादन की गणना होती है।

[08:31:00] दीर्घकालिक समय के लिए आधार वर्ष में

[08:31:02] वस्तु सेवा की कीमत इनू चालू वर्ष में

[08:31:05] वस्तु और सेवाओं की मात्रा रियल जीडीपी

[08:31:09] वास्तविक जीडीपी है और उसी को कैलकुलेट

[08:31:11] करते हुए रियल जीडीपी माना जाता है।

[08:31:12] पोटेंशियल जीडीपी एक नया शब्द है। अगर

[08:31:15] किसी देश की अर्थव्यवस्था में पूर्ण

[08:31:17] रोजगार की स्थिति हो तो उस समय जो उत्पादन

[08:31:20] मिलता है उसको पूर्ण रोजगार को रियल जीडी

[08:31:23] पोटेंशियल जीडीपी के रूप में कहते हैं।

[08:31:25] पूर्ण रोजगार मतलब मैंने बताया था कि

[08:31:27] प्रचलित मजदूरी दर पर सबको काम मिल रहा

[08:31:29] है।

[08:31:33] ग्रीन जीडीपी अगर किसी जीडीपी में

[08:31:35] पर्यावरणीय नुकसान और प्राकृतिक नुकसान को

[08:31:38] डेप्रिसिएशन के रूप में हटा दिया जाए तो

[08:31:40] उसको ग्रीन जीडीपी कहते हैं। मतलब नेट

[08:31:43] डोमेस्टिक प्रोडक्ट जो आया था उसमें से भी

[08:31:46] अगर पर्यावरणीय क्षति को हटा दिया जाए कि

[08:31:49] भाई आपने मान लीजिए आपने मान लीजिए कि 100

[08:31:54] 100 करोड़ की कारें बनाई लेकिन 100 करोड़

[08:31:57] की कारें बनाने से इतना प्रदूषण फैला दिया

[08:32:00] कि इस प्रदूषण के कारण 100 लोग बीमार हो

[08:32:02] गए उनको इलाज करना पड़ा और उनको ₹1 करोड़

[08:32:06] का खर्च आया तो एक करोड़ उत्पादन तो हुआ

[08:32:08] नहीं वो तो नुकसान हुआ हम लोगों का तब हम

[08:32:11] कहते कि फिर आपने जो जीडी जीडीपी निकाला

[08:32:13] उसको ग्रीन जीडीपी कहते हैं। जीडीपी में

[08:32:15] से पर्यावरणीय नुकसान प्राकृतिक संसाधनों

[08:32:18] की हानि को हटाने के बाद जो प्राप्त होता

[08:32:20] है उसे ग्रीन जीडीपी कहते हैं। ग्रीन

[08:32:22] जीडीपी का मतलब होता है मोनेटाइजेशन ऑफ

[08:32:25] लॉस ऑफ बायोडायवर्सिटी। जैव विविधता का

[08:32:27] कितना हानि हुआ? जलवायु परिवर्तन का क्या

[08:32:30] कॉस्ट रहा? उन सबको कैलकुलेट इसमें करना

[08:32:33] पड़ता है। फिर आता है फैक्टर कॉस्ट।

[08:32:35] मार्केट प्राइस में से इनडायरेक्ट टैक्स

[08:32:37] और सब्सिडी को जोड़ देते। यह हमने समझ

[08:32:39] लिया लॉजिक इसके पीछे का क्या कारण था?

[08:32:44] फिर नेट इनकम अगर हम निकालना चाह रहे हैं

[08:32:47] ग्रॉस नेशनल प्रोडक्ट मतलब पूरे देश का

[08:32:51] वास्तविक उत्पाद निकालना चाहते तो

[08:32:53] एक्सपोर्ट माइनस इंपोर्ट या नेट इनकम

[08:32:55] फ्रॉम अब्रॉड को कह देंगे हम लोग नेट इनकम

[08:33:00] शुद्ध राष्ट्रीय उत्पाद वर्ष के दौरान

[08:33:02] अर्थव्यवस्था के शुद्ध उत्पादन के मूल्य

[08:33:04] को दर्शाता है।

[08:33:07] याद रखिएगा कि यह जो नेट नेशनल प्रोडक्ट

[08:33:11] एट फैक्टर कॉस्ट होता है इसी को देश की

[08:33:13] राष्ट्रीय आय कह कहते हैं। प्रति व्यक्ति

[08:33:16] आय अगर आपको निकालनी है तो आप निकाल

[08:33:19] दीजिए। जितने भी आपने नेट नेशनल प्रोडक्ट

[08:33:21] निकाला उसे जनसंख्या से डिवाइड कर दीजिए

[08:33:23] तो आपको पर कैपिटा इनकम पता चल जाएगा। पर

[08:33:27] कैपिटा इनकम।

[08:33:29] हमारे देश में एनसीआरटी ने कुछ फार्मूले

[08:33:31] दिए। वो फार्मूले हम आगे देखेंगे कि क्या

[08:33:33] निकाला जाता है। फैक्टर कॉस्ट में नेट इन

[08:33:36] जो इनडायरेक्ट टैक्सेस को हटाया जाता है।

[08:33:38] इनडायरेक्ट टैक्सेस मतलब नेट का मतलब

[08:33:41] सब्सिडी को जोड़ने के बाद जो फाइनल आएगा

[08:33:54] ये जो एनएपी होता है जो कि फैक्टर कॉस्ट

[08:33:58] के रूप में निकाला जा रहा है। इसी को

[08:33:59] नेशनल इनकम कहा जाता है। फिर इसी तरीके से

[08:34:03] जीवी जीडीपी जो मार्केट प्राइस पर निकाला

[08:34:05] है उसको जीवीएट मार्केट प्राइस कहते हैं।

[08:34:08] अगर जीवीए के मार्केट प्राइस में से

[08:34:10] प्रोडक्ट टैक्स हटा दिए जाए। प्रोडक्ट

[08:34:11] टैक्स मतलब वस्तु पर लगने वाले टैक्स नेट

[08:34:14] प्रोडक्ट टैक्स जो हमने हटाए थे रियल में

[08:34:17] उसको कहते हैं जीवीए एट बेसिक प्राइस।

[08:34:19] जीवीए बेसिक प्राइस में से प्रोडक्शन

[08:34:21] टैक्स हटाए जाए जो किसी वॉल्यूम पर लगते

[08:34:23] हैं तो उसे हम कहते हैं जीवीए एट फैक्टर

[08:34:25] कॉस्ट।

[08:34:29] व्यक्तिगत आय पर्सनल इनकम एक वर्ष में

[08:34:31] प्रत्यक्ष करों के भुगतान से पहले सभी

[08:34:33] स्त्रोतों से किसी देश के व्यक्तियों

[08:34:35] द्वारा प्राप्त कुल आय को कहते हैं।

[08:34:37] पर्सनल इनकम मतलब जिस भी तरीके से पैसा आ

[08:34:39] रहा होगा उन सभी को जोड़ेंगे तो पर्सनल

[08:34:42] इनकम आ जाएगी।

[08:34:44] अगर आप पर्सनल इनकम को जोड़ेंगे तो पर्सनल

[08:34:46] इनकम में ऐसे पर्सनल इनकम निकाल जोड़कर भी

[08:34:50] नेशनल इनकम को ज्ञात किया जा सकता है।

[08:34:52] डिस्पोजेबल इनकम बहुत इंपॉर्टेंट है।

[08:34:55] व्यक्ति ने जितना पैसा कमाया उनमें से

[08:34:57] टैक्स पे कर दिया डायरेक्ट टैक्स। तो अब

[08:35:00] उसके पास जो पैसा बच गया उसको कहते हैं

[08:35:02] डिस्पोजेबल इनकम। जो खर्च करने के लिए

[08:35:04] यूज़ कर सकता है वो।

[08:35:09] टोटल इनकम रिसीव बाय इंडिविजुअल फ्रॉम ऑल

[08:35:11] सोर्सेस बिफोर एनी डिडक्शन पर्सनल इनकम

[08:35:14] इनकम रिमेनिंग आफ्टर टैक्स एंड मैंडेटरी

[08:35:16] डिडक्शंस हम जब कैलकुलेट करते हैं इसको तो

[08:35:19] टोटल अर्निंग लेते हैं सभी प्रकार की

[08:35:22] डिस्पोजेबल में हम टैक्सेस को हटा देते

[08:35:24] हैं पर्सनल इनकम में से

[08:35:26] परचेसिंग पावर पेरिटी परचेसिंग पावर

[08:35:29] पेरिटी का मतलब बड़ा सिंपल सा है कि हम

[08:35:32] अमेरिका और भारत के बीच में $195

[08:35:36] का मानते है पर रियल में यह ₹95 का $1 और

[08:35:41] डॉलर की सप्लाई डिमांड के कारण है। लेकिन

[08:35:43] रियल में क्या सच में $195 की औकात रखता

[08:35:47] है? तो इसको लिए क्या करेंगे हम लोग?

[08:35:49] अमेरिका में एक बास्केट खरीदने जाएंगे।

[08:35:52] बास्केट जिसमें फल फ्रूट होंगे जिसमें

[08:35:55] कपड़े होंगे, शूज होंगे, किताबें होगी,

[08:35:57] स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएं होगी और

[08:36:00] देखेंगे बास्केट अमेरिका में कितने में

[08:36:02] आया। पता चला कि बास्केट अमेरिका में $

[08:36:04] में आया। हमने अपने देश में इसको देखा तो

[08:36:07] हमें पता चला कि बास्केट भारत में ₹2000

[08:36:10] में आया तो हम कहेंगे कि भारत में ₹00 की

[08:36:14] परचेसिंग पावर ₹2000 के बराबर है। तो हम

[08:36:18] कहेंगे कि मतलब $1 की परचेसिंग पावर मात्र

[08:36:21] ₹20 के बराबर है। क्योंकि भारत की

[08:36:23] परिस्थिति अलग है। परचेसिंग पावर पेरिटी

[08:36:26] से तात्पर्य विभिन्न देशों के मुद्राओं की

[08:36:28] तुलना करते समय यह देखना कि एक देश की

[08:36:31] मुद्रा में कितनी वस्तु और सेवाएं खरीदी

[08:36:33] जा सकती है। उसी वस्तु या सेवा को दूसरे

[08:36:36] देश की मुद्रा में खरीदने के लिए कितने

[08:36:37] राशि की जरूरत पड़ेगी। इसका उपयोग करके हम

[08:36:40] बता सकते हैं कि वास्तविक रूप में $1 डॉलर

[08:36:43] कितने रुपए के बराबर की औकात रखता है?

[08:36:46] परचेसिंग पावर पैरिटी के आधार पर दुनिया

[08:36:48] की सबसे बड़ी इकॉनमी चाइना है। सेकंड नंबर

[08:36:51] की इकॉनमी अमेरिका है और थर्ड नंबर की

[08:36:54] इकॉनमी इंडिया है।

[08:36:58] लेकिन अगर हम $195

[08:37:01] का पकड़े तो पहले नंबर की इकॉनमी अमेरिकन

[08:37:05] है। दूसरे नंबर की इकॉनमी में चाइना आ

[08:37:07] जाता है। और ऐसी सिचुएशन में हम पांचवें

[08:37:10] छठवें पर चले जाते हैं। चौथे तक भी आ जाते

[08:37:13] लेकिन पांचव छठवें पर पहुंच जाते हैं। फिर

[08:37:24] नेशनल इनकम को मापने के लिए ये तो सब बताए

[08:37:27] हुए परिभाषाएं हैं। मापने के लिए क्या

[08:37:29] करते हैं? हमारे देश के जो अर्थशास्त्री

[08:37:31] होते हैं वो इनकम मेथड या डिस्ट्रीब्यूशन

[08:37:34] मेथड का उपयोग करते हैं या वो एक्सपेंडिचर

[08:37:36] मेथड या टोटल एक्सपेंडिचर मेथड का उपयोग

[08:37:39] करते हैं। तीनों मेथड से उत्तर एक ही जैसा

[08:37:42] आएगा लेकिन थोड़ा बहुत डिफरेंस निकलता ही

[08:37:44] उसको त्रुटियां कहते हैं। और तीसरा होता

[08:37:46] है वैल्यू एडिशन मेथड, जीवीए वाला मेथड।

[08:37:49] तीन तरीके से जीडीपी कैलकुलेट किया जाता

[08:37:52] है।

[08:37:54] इनकम मेथड में हम जनरली शब्द यूज़ करते हैं

[08:37:56] प्राइम। प्राइम का मतलब एक प्रकार से

[08:37:59] एक-एक चीजें है कि भाई कितना इन्वेस्टमेंट

[08:38:01] किया गया था। कितना एक प्रकार से वेजेस आए

[08:38:05] थे। उन सबको जोड़ा जाता है। एक्सपेंडिचर

[08:38:08] मेथड में गवर्नमेंट का कितना था मतलब

[08:38:11] एक्सपेंडिचर आम नागरिकों का कितना था? उन

[08:38:13] सब एक्सपेंडिचर को निकालते हैं। और वैल्यू

[08:38:16] एडिशन में आउटपुट की वैल्यू कीमत कितनी आई

[08:38:19] और इंटरमीडिएट की कीमत कितनी आई? तो

[08:38:22] एक्सपेंडिचर मेथड में हम क्या करते हैं?

[08:38:24] एक्सपेंडिचर में हम देखते हैं कि कंजमशन

[08:38:27] कितना हुआ। हमारे देश में लोगों ने कितना

[08:38:29] सामान खाया, पिया, यूज किया। गवर्नमेंट ने

[08:38:32] कितना यूज कर लिया। इन्वेस्टमेंट के रूप

[08:38:34] में सरकार और नागरिक ने कितना

[08:38:36] इन्वेस्टमेंट किया? वैल्यू कितनी चेंज हुई

[08:38:39] स्टॉक की? एक्सपोर्ट कितना हुआ? इंपोर्ट

[08:38:41] कितना हुआ? सबको हटाने के बाद यह जीडीपी

[08:38:44] कैलकुलेट किया जाता है। दूसरा तरीका होता

[08:38:46] है फैक्टर इनकम। इनकम फ्रॉम पीपल जॉब एंड

[08:38:50] सेल्फ एंप्लॉयड। जो मजदूरी कर रहे हैं या

[08:38:53] सैलरी पर लोग हैं उनकी इनकम कितनी हुई?

[08:38:56] प्राइवेट सेक्टर में टोटल कंपनियों को

[08:38:58] प्रॉफिट कितना हुआ और रेंट से कितनी

[08:39:00] ओनरशिप ने रेंट प्राप्त कर लिया? इन सबको

[08:39:03] हम इनकम के रूप में जोड़ते हैं। ये दोनों

[08:39:05] सेम ही आएंगे। थोड़ा बहुत डिफरेंस आता है।

[08:39:07] उसको त्रुटि कहते हैं हम लोग। और जीडीपी

[08:39:10] वैल्यू आउटपुट क्या होगा कि सभी सेक्टर

[08:39:12] में प्राइमरी, सेकेंडरी, मैन्युफैक्चरिंग,

[08:39:14] चतुर्थक में फाइनल

[08:39:16] [गला साफ़ करने की आवाज़] कितनी चीजें बनी

[08:39:17] और कितनी चीजें रॉ मटेरियल के रूप में लगी

[08:39:19] उनके डिफरेंस को निकालते हैं तो ग्रॉस

[08:39:21] वैल्यू एडिशन आ जाता है।

[08:39:25] ग्रॉस वैल्यू एडिशन आ जाता है। ये सब

[08:39:28] इसमें इंक्लूड किया जाता है कैलकुलेशन की

[08:39:30] मेथड्स में।

[08:39:35] ग्रॉस वैल्यू एडिशन

[08:39:38] जीवीए

[08:39:44] केंद्रीय सांख्यिकी कार्यक्रम कारण कार्य

[08:39:46] मंत्रालय ने 2022-23 को आधार वर्ष माना

[08:39:49] है। आधार वर्ष पूछा जा सकता है। जो पुराने

[08:39:52] आधार वर्ष को संशोधित करते हुए जीडीपी

[08:39:55] कैलकुलेशन की बात कर रहे हैं हम लोग।

[08:39:58] साथ ही साथ कई प्रकार के सुधारों की

[08:40:00] बातचीत इसमें कही गई है ताकि हम इंटरनेशनल

[08:40:03] लेवल पर जो हमारे ऊपर आरोप लगते हैं कि हम

[08:40:05] आंकड़े सही नहीं देते तो शायद आंकड़े आने

[08:40:07] वाले टाइम में सही दिए जाएंगे।

[08:40:12] वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही में

[08:40:16] जीडीपी ग्रोथ रेट। जीडीपी ग्रोथ रेट का

[08:40:18] मतलब होता है पिछली बार की तुलना में इस

[08:40:20] बार जीडीपी कितना ज्यादा आएगा। तो ग्रोथ

[08:40:22] रेट अलग होता है। जीडीपी अलग होता है। याद

[08:40:24] रखना ग्रोथ रेट मतलब बढ़ा कितना उसको

[08:40:26] दर्शाने की कोशिश होती है।

[08:40:30] कर जीडीपी रेशो माना जाता है कि एक संकेतक

[08:40:33] है। जीडीपी के बढ़ने पर टैक्स भी बढ़ता

[08:40:36] है। लेकिन अगर जीडीपी बढ़े लेकिन टैक्स ना

[08:40:39] बढ़े। इसका मतलब यह माना जाता है कि पैसों

[08:40:41] का वितरण सही नहीं हो रहा है।

[08:40:50] हाइट टैक्स जीडीपी अनुपात यह संकेत देता

[08:40:52] है कि सरकार के पास अच्छे वित्तीय संसाधन

[08:40:54] है। जबकि कम अनुपात वित्तीय स्थिरता का

[08:40:56] कारण बन सकते हैं।

[08:41:00] निरपेक्ष और प्रति व्यक्ति वास्तविक जी

[08:41:02] एनपी की वृद्धि आर्थिक विकास की ऊंची दर

[08:41:05] का संकेत नहीं होती है। भले ही जीडीपी

[08:41:07] बहुत तेजी से बढ़ रहा हो, रियल जीएनपी बढ़

[08:41:10] रहा हो, लेकिन फिर भी हम आर्थिक विकास

[08:41:11] नहीं मानते क्योंकि उसका कारण है कि लोगों

[08:41:14] तक वह पैसा पहुंच रहा है कि नहीं? क्योंकि

[08:41:16] कुछ ही लोगों के हाथ में संसाधन होंगे तो

[08:41:18] करेंगे क्या? औद्योगिक उत्पादन कृषि

[08:41:21] उत्पादन के साथ-साथ बढ़ने में विफल रहा।

[08:41:23] कृषि उत्पादन औद्योगिक उत्पादन के साथ

[08:41:25] बढ़ने में विफल रहा। निर्धनता और

[08:41:27] बेरोजगारी में वृद्धि हुई। अगर किसी देश

[08:41:29] में निर्धनता और बेरोजगारी में वृद्धि हो

[08:41:31] रही है। भले ही जीडीपी कितना है बढ़ा दो

[08:41:34] किसी काम की नहीं है। फिर वो अर्थव्यवस्था

[08:41:37] उच्च बचत वाली अर्थव्यवस्था होते हुए भी

[08:41:39] किस कारण से पूंजी निर्माण महत्वपूर्ण

[08:41:41] उत्पादन वृद्धि में परिणत नहीं होता है?

[08:41:43] रिजल्ट इन सिग्निफिकेंट इनक्रीस। बीइंग

[08:41:45] हाई सेविंग इकॉनमी होने के बावजूद कैपिटल

[08:41:48] फॉरमेशन मे नॉट रिजल्ट इन सिग्निफिकेंट

[08:41:50] इनक्रीस। तो उसका सबसे बड़ा कारण है हमारे

[08:41:53] देश में हाई कैपिटल लग जाना। देखो हमारे

[08:41:56] देश में ₹100 लगाएंगे तब ₹2 की कमाई होती

[08:41:59] है। अमेरिका में ₹100 लगाओगे तब ₹40 की

[08:42:02] कमाई हो रही है। तो अमेरिका में लोग

[08:42:04] ज्यादा उद्योग लगाना पसंद करेंगे। तो जब

[08:42:06] आपको बहुत कम उत्पादन मिले और पैसा ज्यादा

[08:42:09] लग जाए तो इसको कहते हैं कि यहां पर हाई

[08:42:11] कैपिटल आउटपुट रेशो का घटनाक्रम होता है।

[08:42:16] किसी देश में कड़ से जीडीपी के अनुपात में

[08:42:19] कमी आए तो आर्थिक वृद्धि दर धीमी होगी।

[08:42:21] राष्ट्रीय आय का इक्विटेबल वितरण होगा

[08:42:24] नहीं। हम कहेंगे कि ऐसा बिल्कुल नहीं हो

[08:42:26] सकता है इक्विटेबल वितरण बल्कि हम कहेंगे

[08:42:29] कि नेशनल जो ग्रोथ रेट है वो कम हो गई है।

[08:42:33] भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में पिछले

[08:42:35] दशक में अब देखो ऐसा सवाल अगर आ जाए यह तो

[08:42:38] बहुत पुराना सवाल है 2015 का लेकिन अभी 26

[08:42:41] में हल कर रहे हैं हम लोग तो 26 में हम

[08:42:43] कहेंगे पिछले दशक में ऐसा हुआ ही नहीं कि

[08:42:45] जीडीपी लगातार बढ़ेगा पॉसिबल ही नहीं

[08:42:47] कोरोना आया था पिछले दशक में लगातार

[08:42:50] जीडीपी की वैल्यू रुपए में बढ़ गई कोरोना

[08:42:52] आया था सब कम हुआ था तो हम कहेंगे दोनों

[08:42:54] बातें गलत है

[08:42:57] लेकिन उस समय बाजार कीमतों पर जीडीपी

[08:43:00] लगातार बढ़ गया है तो हम कहेंगे कि हां

[08:43:03] लगातार बढ़ा होगा। क्यों? यह 2015 का सवाल

[08:43:06] है। 5 से 15 के बीच में ऐसी कोई घटना नहीं

[08:43:08] हुई थी। लेकिन यहां पर तो जीडीपी रुपए की

[08:43:11] चीज में भी कम हो गया था। कोरोना के दौर

[08:43:13] में।

[08:43:16] एक्स देश में कोई एक्स देश है जहां आर्थिक

[08:43:18] समृद्धि अनिवार्य रूप से होगी। अगर उसमें

[08:43:22] एक प्रकार से पूंजी निर्माण होगा। जब

[08:43:25] कैपिटल फॉर्मेशन होता है तो आर्थिक

[08:43:27] समृद्धि गारंटेड होती है।

[08:43:31] राष्ट्रीय आय अगर किसी देश की पूछी जाए कि

[08:43:34] किसी देश की राष्ट्रीय आय क्या है? तो

[08:43:36] उत्पादित अंतिम वस्तु और सेवाओं के कुल

[08:43:38] मौद्रिक मूल्य को राष्ट्रीय आय के रूप में

[08:43:40] बोल देते हैं। अब हम बात कर रहे हैं बजट

[08:43:43] और राजकोषीय नीति की अगले चैप्टर की। अब

[08:43:47] मुझे बताइए

[08:43:51] क्या ब्रेक की जरूरत है?

[08:43:56] ऐसा करते हैं।

[08:44:01] छोटा ब्रेक ले लेते हैं।

[08:44:06] 3:35 पर पुनः मुलाकात करेंगे हम लोग।

[08:44:18] 3:35 पर पुनः मुलाकात करेंगे। 335 3:40 पर

[08:44:22] पुनः मुलाकात करेंगे। इस पर आ जाएंगे।

[08:44:25] जैसे ही यह कंप्लीट हो जाएगा तो फिर हमारे

[08:44:27] पास कुछ ज्यादा मतलब बचेगी नहीं चीजें।

[08:44:30] जल्दी-जल्दी चीजें खत्म हो जाएगी। फिर

[08:44:37] रिलैक्स हो जाइए आप लोग। तब तक

[09:05:57] रिफ्रेश कर दीजिएगा।

[09:06:00] रिफ्रेश कर दीजिएगा।

[09:06:04] आइए अब हम जो बात करने जा रहे हैं

[09:06:10] वह बजट और फिस्कल पॉलिसी की बात करने जा

[09:06:14] रहे हैं। बजट और फिस्कल पॉलिसी क्या होती

[09:06:16] है? सरकार के द्वारा जो नीतियां लाई जाती

[09:06:18] है। सबसे पहले जानते हैं पब्लिक फाइनेंस।

[09:06:21] पब्लिक का मतलब होता है सार्वजनिक सरकार

[09:06:24] से जुड़ा हुआ। सार्वजनिक धन की प्राप्ति

[09:06:27] और भुगतान से जुड़े हुआ एक कांसेप्ट जो

[09:06:29] पूरी तरह से बजट के माध्यम से कंट्रोल

[09:06:31] किया जाता है।

[09:06:33] पब्लिक फाइनेंस इज स्टडी ऑफ फाइनेंस

[09:06:36] रिलेटेड टू गवर्नमेंट एंटटीज जिसमें सरकार

[09:06:38] से जुड़ी हुई सारी चीजें होती है। इसमें

[09:06:40] पब्लिक इनकम मतलब सरकार की आय सरकार का

[09:06:43] व्यय, सरकार का ऋण और फाइनेंशियल प्रशासन

[09:06:47] सरकार कैसे चला रही सब चीजों को देखते

[09:06:49] हैं। याद रखो जीडीपी मतलब देश ने कितना

[09:06:52] कमाया और बजट मतलब सरकार के पास कितनी

[09:06:56] कमाई आई।

[09:06:58] पब्लिक फाइनेंस में पब्लिक एक्सपेंडिचर की

[09:07:01] बातचीत होती है। रेवेन्यू एक्सपेंडिचर,

[09:07:02] कैपिटल एक्सपेंडिचर, डेवलपमेंट

[09:07:04] एक्सपेंडिचर, नॉन डेवलपमेंट एक्सपेंडिचर।

[09:07:07] पब्लिक रेवेन्यू में टैक्स रेवेन्यू, नॉन

[09:07:09] टैक्स रेवेन्यू, टैक्स रेवेन्यू में

[09:07:11] डायरेक्ट और इनडायरेक्ट टैक्स के बारे में

[09:07:12] बातचीत करेंगे। पब्लिक डेप्ट, एक्सटर्नल

[09:07:15] और इंटरनल कर्जा कितना हुआ? फिस्कल पॉलिसी

[09:07:17] में पब्लिक एक्सपेंडिचर, पब्लिक रेवेन्यू

[09:07:20] और पब्लिक डेप्ट इन तीनों के बारे में हम

[09:07:22] बातचीत भी करते हैं और फाइनेंशियल

[09:07:25] एडमिनिस्ट्रेशन के बारे में चर्चाएं करते

[09:07:27] हैं। राजकोशीय नीति फिस्कल पॉलिसी

[09:07:30] राजकोशीय नीति पब्लिक फाइनेंस का एक भाग

[09:07:32] है। फिस्कल एक लेटिन शब्द है जिसका अर्थ

[09:07:35] होता है सरकार या खजाना। मूलत सरकार के आय

[09:07:38] वैसे से जुड़े हुई चीजों को हम देखते हैं।

[09:07:40] राजकोशीय नीति इसके अंतर्गत आएगी।

[09:07:43] याद रखिएगा कि राजकोशीय नीति वास्तविक रूप

[09:07:46] में मौद्रिक नीति से ज्यादा इंपॉर्टेंट है

[09:07:48] क्योंकि मौद्रिक नीति केवल मुद्रास्फीति

[09:07:51] को नियंत्रित कर सकती है लेकिन राजकोशीय

[09:07:53] नीति मुद्रास्फीति को न कंट्रोल भी कर

[09:07:55] सकती है और मंदी को भी नियंत्रित करने की

[09:07:58] क्षमता रखती है।

[09:08:00] फिस्कल पॉलिसी सरकार के द्वारा लाई जाने

[09:08:03] वाली ऐसी पॉलिसी जिससे सरकार पूरे के पूरे

[09:08:05] इकोसिस्टम को बूस्ट कर सकती है।

[09:08:09] इसमें राजकोशीय सरकार की प्राप्तियां क्या

[09:08:12] है? सरकार के खर्च क्या है और ऋण कौन-कौन

[09:08:14] से सरकार ने लिए हैं। राजकोशीय नीति का

[09:08:16] उपयोग करने की प्रक्रिया में कोई देश

[09:08:18] अधिशेष घाटे या संतुलित बजट में चलता है

[09:08:21] कि भ देश अगर संतुलित बजट मतलब जितना आया

[09:08:23] उतना गया। अधिशेष का मतलब कमाई ज्यादा

[09:08:26] सरकार की है लेकिन खर्चे सरकार के कम हो

[09:08:28] रहे होंगे और घाटे का बजट मतलब खर्चा

[09:08:32] ज्यादा हो रहा है और कमाई कम हो रही होती

[09:08:34] है।

[09:08:36] हमारे देश में केंद्र सरकार हो या राज्य

[09:08:38] सरकार हो आर्टिकल 266 वन कहता है कि

[09:08:40] प्रत्येक सरकार का अपना एक बैंक खाता

[09:08:43] होगा। जैसे हमारा एक सेविंग खाता होता है

[09:08:45] वैसे सरकार का एक खाता होता है। जिसको

[09:08:47] संचित निधि कंसोलिडेटेड फंड कहते हैं। यह

[09:08:50] सरकार का खजाना है। पर किसी तहखाने में

[09:08:52] नहीं होगा। बैंकों में खाते के रूप में

[09:08:54] अवेलेबल रहता है। यहां से पैसा निकालना है

[09:08:57] तो केंद्र सरकार को इसमें से पैसा खर्च

[09:08:59] करने के लिए पार्लियामेंट की अनुमति की

[09:09:01] जरूरत पड़ती है। राज्य सरकारों को अपने

[09:09:03] विधायक विधानसभा की अनुमति की जरूरत पड़ती

[09:09:06] है। इसके अलावा हमारे देश की सरकारों के

[09:09:08] पास एक पब्लिक अकाउंट भी होता है। जिसमें

[09:09:11] जनता का पैसा कुछ समय के लिए रखा जाता है।

[09:09:13] फिर वो लौटाया जाता है। जैसे प्रोविडेंट

[09:09:15] फंड का पैसा हो गया, जो पोस्ट ऑफिस की

[09:09:18] सेविंग होती है वो सब इसमें जाती है

[09:09:20] क्योंकि जनता को कभी ना कभी लौटानी है।

[09:09:23] किसी ने जमानत का पैसा जो दिया होता है वो

[09:09:25] जमानत का पैसा भी इसी में होता है क्योंकि

[09:09:27] अगर सजा एक प्रकार से हो जाता है कि वो

[09:09:30] व्यक्ति बेगुनाह साबित हुआ तो उस जमानत का

[09:09:32] पैसा भी लौटाना पड़ता है। और एक

[09:09:35] कंटिंजेंसी फंड हमारे देश में बनाया गया

[09:09:38] ताकि सरकार को ज्यादा टाइम ना लगे। किसी

[09:09:40] इमरजेंसी में सिचुएशन को कंट्रोल करने के

[09:09:42] लिए पैसों की जो जरूरत पड़ती है। लेटिन

[09:09:44] शब्द में पहले इसको बुलगा कहते थे। फ्रेंच

[09:09:47] में इसका नाम बोगेट हो गया। फिर इसको

[09:09:49] अंग्रेजी में बोजेट कहने लगे और अब

[09:09:51] वर्तमान में ये शब्द बजट कहलाया गया।

[09:09:54] भारतीय संविधान में बजट शब्द का कहीं पर

[09:09:56] भी उल्लेख नहीं है। भारतीय संविधान में

[09:09:58] बजट कहीं पर नहीं है। भारतीय संविधान में

[09:10:01] मूल ढांचा शब्द कहीं पर नहीं है। भारतीय

[09:10:03] संविधान में कैबिनेट शब्द केवल एक ही बार

[09:10:06] आया। वह भी 44वें संविधान संशोधन के बाद।

[09:10:09] आर्टिकल 112 में लिखा गया है वार्षिक

[09:10:11] वित्तीय विवरण।

[09:10:15] सरकार की आय और व्यय के विवरण का एक

[09:10:17] दस्तावेज है इनकम और एक्सपेंडिचर का। बजट

[09:10:21] में हम तीन साल की बातचीत करते हैं। करंट

[09:10:23] ईयर, नेक्स्ट ईयर और बैक ईयर। बैक ईयर के

[09:10:26] लगभग अनंतिम डाटा आ जाते हैं। अंतिम नहीं

[09:10:29] अंतिम से ठीक पहले के करंट ईयर के लगभग

[09:10:32] संशोधित डाटा आ जाते हैं। और नेक्स्ट ईयर

[09:10:35] के अनुमानित डाटा हम पेश करते हैं। तो

[09:10:37] इसके अनुमानित ईयर होते हैं। अनुमानित

[09:10:39] डाटा। इसके संशोधित डाटा होते हैं और इसके

[09:10:43] अनंतिम डाटा आते हैं। अनंतिम

[09:10:48] बजट का कंपोनेंट बजट दो प्रकार का बना

[09:10:51] होता है। एक होता है राजस्व बजट और एक

[09:10:53] होता है पूंजीगत बजट। राजस्व बजट में दो

[09:10:56] चीजें होती है। राजस्व प्राप्तियां और

[09:10:58] राजस्व व्यय। राजस्व प्राप्तियां मतलब

[09:11:00] रेवेन्यू रिसीप्ट और राजस्व व्यय का मतलब

[09:11:03] रेवेन्यू एक्सपेंडिचर। तो रेवेन्यू

[09:11:05] रिसीप्ट और रेवेन्यू एक्सपेंडिचर। देखो

[09:11:08] राजस्व का मतलब होता है ऐसी कोई भी

[09:11:11] प्राप्ति या खर्च जो एक निश्चित

[09:11:13] फ्रीक्वेंसी में होती है। जैसे इसको

[09:11:15] समझिएगा। एक भैंस हमने अगर खरीदी तो इसको

[09:11:19] कहेंगे कि हमने खर्चा किया खरीदी है तो

[09:11:22] पूंजीगत व्यय कहलाएगा ये।

[09:11:26] लेकिन उस भैंस से प्रतिदिन दूध प्राप्त

[09:11:28] होगा जिसको बेचकर कमाई होगी घर में। तो हर

[09:11:31] दिन जब दूध बेचकर कमाई होगी तो उस हर दिन

[09:11:34] की कमाई को हम कहेंगे कि वो राजस्व

[09:11:36] प्राप्तियां है। राजस्व प्राप्तियों में

[09:11:39] फ्रीक्वेंसी एक निश्चित फ्रीक्वेंसी पर

[09:11:41] पैसा आते रहता है और सबसे बड़ी बातचीत है

[09:11:44] कि ना तो हमारी कोई देनारी कम होती है या

[09:11:47] देनदारी बढ़ती नहीं ना कम होती है। और ना

[09:11:50] ही हम पर कोई कर्जा बढ़ता है ना कर्जा कोई

[09:11:53] कम होता है। जब भी हम राजस्व की बात

[09:11:55] करेंगे

[09:11:58] राजस्व प्राप्तियां होना बहुत अच्छी बात

[09:12:00] मानी जाती है। जिस देश की राजस्व

[09:12:02] प्राप्तियां बहुत अच्छी होती है वो देश की

[09:12:05] सरकार अच्छी मानी जाती है। वो देश अच्छा

[09:12:07] माना जाता है। कमाई अच्छी मानी जाती है।

[09:12:10] और याद रखिए कि कैपिटल एक्सपेंडिचर कोई

[09:12:12] बुरे नहीं है। कैपिटल एक्सपेंडिचर अच्छे

[09:12:14] माने जाते हैं। जब उससे देश में सड़कें

[09:12:16] बनती है, स्कूल बनते हैं, अस्पताल बनते

[09:12:18] हैं। देश का विकास होता है। जैसे मुर्गी

[09:12:21] प्रतिदिन अगर अंडे दे रही तो अंडे बेचकर

[09:12:23] जो कमाई होगी उसको रेवेन्यू प्राप्तियां

[09:12:25] कहेंगे।

[09:12:27] वैसे ही रेवेन्यू एक्सपेंडिचर होते हैं

[09:12:30] सरकार के। हर महीने सैलरी देनी पड़ती है।

[09:12:32] हर महीने पेंशन देनी पड़ती है। हर महीने

[09:12:35] एक निश्चित फ्रीक्वेंसी पर जो खर्चा होता

[09:12:38] है ये कम से कम होना चाहिए। ये रेवेन्यू

[09:12:40] एक्सपेंडिचर कहलाता है।

[09:12:44] रेवेन्यू इनकम ठीक इनकम नहीं मानी जाती

[09:12:46] है। मान लो भैंस को बेच दिया तो जो कमाई

[09:12:49] की क्योंकि अब तो आपका पूरा का पूरा एक

[09:12:52] प्रकार से जो कमाई करने की चीज थी वही चली

[09:12:55] गई। मुर्गी को ही बेच दिया। मकान का रेंट

[09:12:58] आ रहा है तो रेवेन्यू रिसीप्ट है। पर मकान

[09:13:01] पूरा बेचकर आपने पैसा कमाया वो पूंजीगत

[09:13:04] कैपिटल रिसीप्ट है। कैपिटल रिसीप्ट ज्यादा

[09:13:06] नहीं आनी चाहिए। क्योंकि इसमें या तो आप

[09:13:09] कर्जे लेकर कैपिटल रिसीप्ट को बढ़ा रहे

[09:13:11] होते हैं या फिर आप अपनी प्रॉपर्टी को बेच

[09:13:13] रहे होते हैं। कैपिटल वर्ड कहां मतलब? या

[09:13:16] तो प्रॉपर्टी बढ़ रही होगी या घट रही होगी

[09:13:19] या कर्जा बढ़ रहा होगा या कर्जा घट रहा

[09:13:21] होगा। तो इनको हम कैपिटल बजट के अंतर्गत

[09:13:24] रखते हैं। यहां ऐसा कोई भी तकलीफदायक चीज

[09:13:27] नहीं होती है। रेवेन्यू रिसीप्ट की अगर हम

[09:13:29] बातचीत करें तो रेवेन्यू रिसीप्ट में ही

[09:13:32] दो प्रकार का रेवेन्यू रिसीप्ट हमें

[09:13:34] प्राप्त होता है। एक होता है टैक्स

[09:13:37] रेवेन्यू और एक होता है नॉन टैक्स

[09:13:38] रेवेन्यू। नॉन टैक्स रेवेन्यू का मतलब जो

[09:13:41] भी सरकार को ब्याज प्राप्त होगा सरकार ने

[09:13:43] भी तो किसी को उधार दिया होगा। तो उसे

[09:13:45] प्राप्त किया तो इंटरेस्ट जो भी मिल गया

[09:13:47] होगा जो भी सरकार की कंपनियां प्रॉफिट

[09:13:50] कमाती होगी जो भी सरकार किसी प्रकार के

[09:13:53] फीस और फाइन लगाती होगी या सरकार को जिस

[09:13:56] भी तरीके से अनुदान मिलता होगा

[09:13:58] अंतरराष्ट्रीय स्तर से कोई दान मिल जाता

[09:14:00] होगा तो उन सबको हम कहते हैं कि नॉन टैक्स

[09:14:02] रिसीप्ट है ये। टैक्स रिसीप्ट में

[09:14:05] डायरेक्ट और इनडायरेक्ट टैक्सेस होते हैं।

[09:14:07] डायरेक्ट टैक्स का मतलब जिस पर टैक्स

[09:14:09] लगाया गया वही पे करेगा। जैसे इनकम टैक्स,

[09:14:12] कॉर्पोरेट टैक्स, वेल्थ टैक्स,

[09:14:14] एक्सपेंडिचर टैक्स, स्टेट ड्यूटी, गिफ्ट

[09:14:16] टैक्स। इनडायरेक्ट टैक्स लगाया किसी और पर

[09:14:19] जाता है। देता कोई और है। जैसे जीएसटी,

[09:14:22] एक्साइज ड्यूटी या हमारे देश में कस्टम

[09:14:25] ड्यूटी या हमारे देश में व्हीकल टैक्स

[09:14:27] लगाते गाड़ी पर है। पर देना वाला खरीदार

[09:14:30] होता है।

[09:14:32] राजस्व प्राप्तियां वह प्राप्तियां जिससे

[09:14:35] ना तो किसी दायित्व का सृजन होता है ना ही

[09:14:37] सरकार की संपत्ति में कोई कमी आती है।

[09:14:40] पॉइंट टू बी नोटेड बहुत इंपॉर्टेंट। और यह

[09:14:43] प्राप्तियां जितनी ज्यादा होगी उतनी अच्छी

[09:14:45] रहेगी। नियमित होगी। आवड़ती प्रकृति की

[09:14:48] होती है जो सरकार को समय-समय पर मिलती

[09:14:50] रहती है। ना सरकार पर कोई कर्जा बढ़ा ना

[09:14:53] सरकार की कोई प्रॉपर्टी बेचनी पड़ी। फिर

[09:14:56] भी कमाई हो गई। जैसे टैक्स की जितनी कमाई

[09:14:58] होती है वो सारी की सारी चीजों को हम एक

[09:15:01] प्रकार से कहते हैं कि यह हमारे लिए एक

[09:15:03] प्रकार से रेवेन्यू रिसीप्ट होता है।

[09:15:06] रेवेन्यू रिसीप्ट दो प्रकार का रहेगा। एक

[09:15:08] तो टैक्स वाला और एक नॉन टैक्स वाला।

[09:15:11] देखते हैं टैक्स वाले को पहले।

[09:15:14] टैक्स क्यों लगाए जाते हैं? सरकार

[09:15:16] सार्वजनिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के

[09:15:19] लिए संसाधन जुटाती है और उसे टैक्स के

[09:15:21] माध्यम से पूरा करती है। लेकिन टैक्स

[09:15:23] लगाने का एक और बड़ा कारण होता है इनकम

[09:15:26] डिस्पैरिटी को कम करना। ज्यादा कमाने

[09:15:28] वालों से ज्यादा हिस्सा छीन लेना। कम

[09:15:30] कमाने वालों से कम हिस्सा छीन लेना ताकि

[09:15:32] इनकम डिस्पैरिटी को कम किया जा सके। आय की

[09:15:35] असमानताओं को दूर किया जा सके। व्यक्ति,

[09:15:38] परिवार, फर्म, अन्य संस्थागत इकाइयों

[09:15:41] द्वारा सार्वजनिक व्यय को पूरा करने के

[09:15:43] लिए सरकार को किया जाने वाला अनिवार्य

[09:15:45] भुगतान सरकार द्वारा कानूनी रूप से

[09:15:48] अधिरोपित होता है। करदाता द्वारा अनिवार्य

[09:15:50] भुगतान अन्यथा कानूनी कारवाही हो सकती है।

[09:15:53] टैक्स कई प्रकार के होते हैं। आइए एक-एक

[09:15:56] शब्द को देखते हैं। प्रपोर्शनल टैक्स,

[09:15:58] प्रोग्रेसिव टैक्स, रिग्रेसिव टैक्स,

[09:16:00] वैल्यू एडेड टैक्स, स्पेसिफिक टैक्स,

[09:16:02] डायरेक्ट टैक्स, इनडायरेक्ट टैक्स। सबसे

[09:16:04] पहले हम बात करते हैं अनुपातिक कर।

[09:16:08] प्रोपोशनल टैक्स अ प्रोपोशनल टैक्स टेक द

[09:16:11] सेम परसेंटेज ऑफ इनकम फ्रॉम एवरीवन

[09:16:14] रिगार्डलेस हाउ मच और हाउ लिटिल दे अर्न।

[09:16:18] जब कोई टैक्स किसी भी व्यक्ति से बराबरी

[09:16:21] मात्रा में लिया जाता है। भले ही वो कितना

[09:16:23] भी कमाने वाला हो या कितना भी कम या

[09:16:25] ज्यादा कमाने वाला हो तो हम उसे कहते हैं

[09:16:27] कि वो प्रोपोशनल टैक्स है। लेकिन

[09:16:30] प्रोग्रेसिव टैक्स। प्रोग्रेसिव टैक्स की

[09:16:32] क्या बातचीत होती है? इनकम चेंज भले ही

[09:16:35] होगी लेकिन टैक्स चेंज नहीं होगा।

[09:16:37] प्रोपोर्शनल टैक्स। प्रोग्रेसिव टैक्स का

[09:16:39] मतलब होता है कि ऐसा टैक्स जो अमीर लोगों

[09:16:43] से ज्यादा और गरीब लोगों से कम लिया जाता

[09:16:45] है। जैसे इनकम टैक्स जो ज्यादा कमाएगा

[09:16:48] उससे ज्यादा टैक्स। जो कम कमाएगा उससे कम

[09:16:51] टैक्स उसे कहते हैं प्रगतिशील कर।

[09:16:53] प्रोग्रेसिव टैक्स। प्रगतिशील कर। ज्यादा

[09:16:56] कमाने वालों से ज्यादा टैक्स। दूसरा होता

[09:16:59] है

[09:17:00] रिग्रेसिव टैक्स। ज्यादा कमाने वालों से

[09:17:03] कम टैक्स और कम कमाने वालों से ज्यादा

[09:17:06] टैक्स जैसे जीएसटी। जीएसटी एक रिग्रेसिव

[09:17:10] टैक्स है। मुझे बताइए कि अंबानी जी अगर

[09:17:14] iPhone खरीदने जा रहे हैं तो iPhone पर जो

[09:17:18] टैक्स पे करना है वो 18% का है। और मान

[09:17:22] लीजिए कि बेचारा एक मध्यम वर्ग का व्यक्ति

[09:17:24] मेरे जैसा गरीब व्यक्ति जो दिन रात 121

[09:17:29] घंटे पढ़ाकर मेहनत करके ईमानदारी से पैसे

[09:17:32] कमाने के बाद भी 18% टैक्स पे कर रहा है।

[09:17:35] तो मुझे भी 18% और इनको भी 18% इनकी कमाई

[09:17:40] के प्रपोर्शन में यह 18% क्या है? कुछ भी

[09:17:42] नहीं। पर मेरी कमाई के प्रपोर्शन में 18%

[09:17:45] मेरे लिए बहुत ज्यादा हो जाता है। तो कम

[09:17:48] कमाने वाले पर ज्यादा टैक्स हो गया

[09:17:52] परसेंटेज वाइज और ज्यादा कमाने वाले पर कम

[09:17:54] टैक्स हो गया। तो जनरली जो अमीर लोगों पर

[09:17:59] ज्यादा टैक्स लगे और गरीब पर कम तो

[09:18:01] प्रोग्रेसिव अमीर पर कम लग अमीर पर ज्यादा

[09:18:04] कम लगे और गरीब पर ज्यादा लगे तो

[09:18:06] रिग्रेसिव अमीर गरीब कुछ भी हो सब उतना ही

[09:18:09] देना है।

[09:18:11] तो प्रपोर्शनल टैक्स कहलाता है। प्रपोशनल

[09:18:14] टैक्स कहलाता है। मतलब हम अगर टैक्स की

[09:18:18] बातचीत करते हैं तो फिर होता है ऐड वेलोरम

[09:18:21] टैक्स। ऐड वेलोरम टैक्स क्या होता है?

[09:18:24] वस्तु के मूल्य के प्रतिशत के रूप में

[09:18:26] लगाया जाएगा ना कि वस्तु की मात्रा के

[09:18:28] आधार पर। जैसे टीवी आपने कौन सा खरीदा है

[09:18:33] या फोन कौन सा खरीदा है? ये नहीं कि फोन

[09:18:35] का फोन बड़ा है या छोटा है। जैसे हो सकता

[09:18:38] है Samsung का फोन बड़ा फोन आता होगा और

[09:18:41] iPhone का छोटा फोन आता होगा लेकिन iPhone

[09:18:43] पर ज्यादा टैक्स लिया जा सके। ऐसा भी हो

[09:18:45] सकता है। तो हम जब वैल्यू पर टैक्स लेते

[09:18:48] हैं, कीमत के आधार पर टैक्स लेते हैं तो

[09:18:51] उसको कहते हैं जीएसटी या कस्टम ड्यूटी।

[09:18:53] कस्टम ड्यूटी या जीएसटी टैक्स वैल्यू के

[09:18:56] आधार पर लगाए जाते हैं। बड़े और छोटे के

[09:18:59] आधार पर नहीं लगाते कि वो ज्यादा चीज है,

[09:19:01] बड़ी चीज है। हम केवल वैल्यू के आधार पर

[09:19:04] जब टैक्स लगाएंगे तो एडवलोरम टैक्स

[09:19:06] कहलाएगा।

[09:19:09] सेल टैक्स, प्रॉपर्टी टैक्स वैल्यू के

[09:19:11] आधार पर लगाए जाते हैं। एडवलोरम टैक्स,

[09:19:14] स्पेसिफिक टैक्स। यह ऐसे टैक्स होते हैं

[09:19:17] जो कीमत पर नहीं लगते। वॉल्यूम पर लगते

[09:19:19] हैं। जैसे किसी मोहल जैसे किसी शहर में जो

[09:19:22] चुंगी कर देना होता है, दुकान कितनी बड़ी

[09:19:24] लगाई है उसके आधार पर। वस्तु की इकाई,

[09:19:27] मात्रा या आकार, वजन के आधार पर ना कि

[09:19:29] उसके मूल्य के आधार पर। मतलब जैसे मान

[09:19:32] लीजिए कि मैं कोई सामान ट्रांसपोर्ट कराना

[09:19:35] चाहता हूं। तो सामान ट्रांसपोर्टेशन में

[09:19:37] सामान अगर बड़ा है भले ही वो कितना भी

[09:19:39] सस्ता क्यों ना हो तो ज्यादा टैक्स लगेगा।

[09:19:41] सामान अगर छोटा है भले ही वो कितना भी

[09:19:43] महंगा क्यों ना हो कम टैक्स लगेगा तो

[09:19:46] स्पेसिफिक टैक्स कहलाएगा। एडवेलोरम वैल्यू

[09:19:49] पर बेस्ड होता है। स्पेसिफिक टैक्स

[09:19:51] वॉल्यूम पर बेस्ड होता है। यह प्रोडक्शन

[09:19:53] या फिर एक प्रकार से वॉल्यूम पर आधारित

[09:19:55] टैक्स होते हैं। जैसे पेट्रोल पर लगने

[09:19:59] वाली एक्साइज ड्यूटी आप कितना पेट्रोल

[09:20:01] खरीदेंगे उस आधार पर टैक्स लगेगा। जैसे

[09:20:04] जीएसटी कितनी कीमत है उस आधार पर टैक्स

[09:20:06] लगता है। तो वास्तविक रूप में जो एडवलोरम

[09:20:09] टैक्स होते हैं कई बार उनको प्रोग्रेसिव

[09:20:11] कहते हैं और जो स्पेसिफिक टैक्स होते हैं

[09:20:14] उन्हें कई बार रिग्रेसिव टैक्स कह देते

[09:20:16] हैं। डायरेक्ट टैक्स का मतलब होता है जिस

[09:20:18] पर टैक्स लगाया गया उसी ने टैक्स पे कर

[09:20:20] दिया है। तो कराघात और करापात एक ही

[09:20:23] व्यक्ति होता है। मतलब इंसिडेंट और

[09:20:26] इंपैक्ट एक ही व्यक्ति पर होता है। यह

[09:20:28] किसी दूसरे व्यक्ति पर ट्रांसफर नहीं किया

[09:20:30] जा सकता है। हमारे देश में डायरेक्ट टैक्स

[09:20:34] डायरेक्ट टैक्स एक बोर्ड है। अह सेंट्रल

[09:20:37] बोर्ड ऑफ़ डायरेक्ट टैक्स यह पूरी तरह से

[09:20:39] वित्त मंत्रालय में इसकी वसूली का पॉलिसी

[09:20:42] बनाता है।

[09:20:47] आयकर जिसमें सबसे फेमस है इनकम टैक्स।

[09:20:49] हमारे देश में इनकम टैक्स के लिए कानून

[09:20:51] बनाया गया 1961 के द्वारा जिसके तहत इनकम

[09:20:54] टैक्स का डिसीजन लिया जाता है। कर योग्य

[09:20:56] आय अर्थात सकल आय ऋण आय कर अधिनियम के

[09:20:59] अनुसार अनुमानित मनो मानक कटौती और छूट पर

[09:21:02] लगाई जाती है। मतलब एक भी जितना पैसा आ

[09:21:04] गया उसके अनुसार। फिर इनकम टैक्स में

[09:21:07] हमारे देश में इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार

[09:21:09] होता है कि कितना कमा रहा है। अगर कोई

[09:21:11] व्यक्ति वर्तमान में ₹12 लाख से ज्यादा

[09:21:13] नहीं कमाता है तो जीरो टैक्स हो जाता है

[09:21:15] रियल में। लेकिन 12 लाख से ₹1 कमा दिया

[09:21:18] उसने तो उसे फिर 5 लाख की छूट मिलेगी। फिर

[09:21:21] वह 5 से लेकर 7.5 लाख के रूप में 2.5%

[09:21:24] देगा। 7.5 से लेकर 10 लाख के रूप में 5%

[09:21:28] देगा। 10 लाख से लेकर 15 लाख के रूप में

[09:21:31] वह 7.5% देगा। जो ज्यादा पैसा कमाते हैं

[09:21:34] उन पर सरचार्ज भी लगाया जाता है। जब

[09:21:36] स्पेसिफिक से ज्यादा लिमिट से पैसा कमाते

[09:21:39] हैं और कुछ स्पेशल पर्पस के लिए भी

[09:21:42] एक्स्ट्रा टैक्स लगाते हैं उन्हें सेस

[09:21:43] कहते हैं। जब स्पेशल पर्पस के लिए लगाए तो

[09:21:46] सेस जरूरत से ज्यादा कमाए तो सरचार्ज

[09:21:50] टैक्स कमाई पर लगता है। सेस जो होता है वो

[09:21:53] टैक्स के अमाउंट पर लगाया जाता है। बोथ अ

[09:21:56] सेस एंड सरचार्ज आर लेवी बाय द सेंट्रल

[09:21:58] गवर्नमेंट। बोथ आर कलेक्टेड डिपॉजिट इन द

[09:22:00] कंसोलिडेटेड फंड। नन ऑफ दिस कैन बी

[09:22:03] शेयरर्ड बाय स्टेट गवर्नमेंट। मतलब

[09:22:04] राज्यों में इसकी हिस्सेदारी नहीं होती।

[09:22:06] राज्य अपने लगा सकते हैं लेकिन राज्यों को

[09:22:08] इसमें कोई हिस्सेदारी नहीं मिलती है। सेस

[09:22:11] रेट फिक्स्ड होता है। सरचार्ज का रेट

[09:22:14] बदलते रहता है। जैसे-जैसे ज्यादा कमाएंगे

[09:22:17] जो भी सेस कैलकुलेट किया जाता है, उसके

[09:22:19] पीछे का एक कारण है। कोई पर्पस होता है।

[09:22:21] इसमें ऐसा कोई पर्पसपस नहीं होता है। स

[09:22:24] अथॉरिटीज़ कैलकुलेट सेस ऑन द सरचार्ज एंड द

[09:22:27] टोटल टैक्स। सरचार्ज इज़ कैलकुलेटेड ऑन द

[09:22:30] टोटल टैक्स अमाउंट। मतलब मान लीजिए कि कोई

[09:22:32] व्यक्ति का टैक्स ₹1 लाख हो रहा होगा।

[09:22:35] टैक्स ₹1 लाख हो रहा है। उस पर 4% का

[09:22:38] सरचार्ज हो गया तो ₹14,000

[09:22:41] टोटल टैक्स हो जाएगा। फिर उस पर शेष 2%

[09:22:44] लिया जाएगा। तो टोटल का 2% लिया जाएगा।

[09:22:50] यह पब्लिक वेलफेयर के लिए होता है। एक

[09:22:52] प्रकार से हाई अर्निंग व्यक्ति से ज्यादा

[09:22:54] पैसा छीनने का तरीका है। कॉरपोरेट टैक्स

[09:22:57] निगमित कर कंपनियों के प्रॉफिट पर लगता

[09:22:59] है। हमारे देश में कंपनियों के प्रॉफिट पर

[09:23:02] लगने वाले टैक्स को कॉरपोरेट टैक्स कहते

[09:23:04] हैं। हमारे देश की सरकार इनकम टैक्स और

[09:23:07] कॉर्पोरेट टैक्स को मिलाकर सबसे ज्यादा

[09:23:09] पैसा कमाती है। कराधान के उद्देश्य से

[09:23:12] कंपनी को एक अलग इकाई माना जाता है और

[09:23:14] इसलिए उसके स्वामियों के व्यक्तिगत आयकर

[09:23:16] से अलग कंपनी को टैक्स पे करना पड़ता है।

[09:23:19] कंपनी अधिनियम 2019 के अंतर्गत भारत में

[09:23:22] पंजीकृत कंपनियां कॉरपोरेट कर का भुगतान

[09:23:24] करने के लिए उत्तरदाई है। 25% टैक्स देना

[09:23:27] पड़ता है। मिनिमम अल्टरनेटिव टैक्स कई बार

[09:23:30] हमारे देश की जो कंपनियां है कई प्रकार की

[09:23:32] छूट के कारण टैक्स जीरो पे जीरो पे करने

[09:23:36] की शर्त पर आ जाती है। तब ऐसी सिचुएशन में

[09:23:38] अगर कितनी भी छूट मिल जाए तब भी आपको

[09:23:40] मिनिमम अल्टरनेटिव टैक्स तो जमा करना ही

[09:23:43] पड़ेगा। भले ही आप कितना भी छूट प्राप्त

[09:23:45] कर ले।

[09:23:47] सिक्योरिटी ट्रांजिशन टैक्स एसटीटी ये

[09:23:50] 2004 में लाया गया था। जब आप शेयर मार्केट

[09:23:53] में लेनदेन करते हैं तो लेनदेन के समय

[09:23:56] सरकार टैक्स लेती है। जैसे जो लोग ऑप्शंस

[09:23:59] लेते हैं या फिर ट्रेड करते रहते हैं डेली

[09:24:02] का उन्हें ये टैक्स देना ही पड़ता है। उसी

[09:24:05] समय जब खरीद बिक्री होती है उसी समय लगा

[09:24:07] दिया जाता है। कैपिटल गेन टैक्स। जब आप

[09:24:10] शेयर मार्केट से मुनाफा कमाते हैं तो

[09:24:12] मुनाफा कमाने पर जो आपको टैक्स देना पड़ता

[09:24:14] है उसे कहते हैं कैपिटल गेन टैक्स। एक ऐसा

[09:24:17] टैक्स जो किसी पूंजीगत परिसंपत्ति को

[09:24:19] बेचने से अर्जित लाभ पर लगाया जाता है। यह

[09:24:22] अलग टैक्स होता है इनकम टैक्स की तुलना

[09:24:24] में।

[09:24:27] Google टैक्स या इक्वलाइजेशन टैक्स एक

[09:24:30] प्रकार से एक नए प्रकार के टैक्स की बात

[09:24:32] की तो 1 जून 2016 को लागू किया गया था।

[09:24:35] अखिल रंजन कमेटी के रिकमेंडेशन पर

[09:24:37] डायरेक्ट टैक्स का एक प्रकार है। Google

[09:24:40] कर डिजिटल कंपनियों द्वारा उन क्षेत्रों

[09:24:42] में प्रदान किया गया जो डिजिटल सेवाओं से

[09:24:44] होने वाली आय पर लगाया जाता है। जैसे

[09:24:46] Google ऐड चलाता है। हमारे भारतीयों से

[09:24:48] पैसा कमाता है तो उसे टैक्स देना पड़ेगा

[09:24:51] इंडिया में। भारत के कारोबारियों द्वारा

[09:24:53] विदेशी ऑनलाइन कंपनी ई-कॉमर्स कंपनी से

[09:24:55] डिजिटल सेवा या उत्पाद की खरीदारी पर

[09:24:58] वसूला जाता है ताकि हमारे देश में वह कमाई

[09:25:01] कर रहे तो टैक्स दे। 12 डिजिटल सेवाएं

[09:25:03] भारतीय कंपनी द्वारा उनके द्वारा प्रदान

[09:25:05] किए गए ऑनलाइन विज्ञापन सहित बिना स्थाई

[09:25:08] प्रतिष्ठान भले ही Google का कोई ऑफिस ना

[09:25:10] हो, Facebook का कोई ऑफिस ना हो लेकिन फिर

[09:25:12] भी उन्हें टैक्स देना पड़ेगा। 6% की दर पर

[09:25:15] ये टैक्स देना पड़ता है।

[09:25:18] और ऐसे लोगों पर लगेंगे जो 1 लाख से

[09:25:20] ज्यादा का ऐसी सर्विज लेते होते हैं।

[09:25:26] भारत इस तरीके का टैक्स वसूल करने वाला

[09:25:28] पहला देश था। आमतौर पर Amazon टैक्स के

[09:25:31] रूप में जाना जाता है। 2.0 को इक्वलाइजेंस

[09:25:35] लेवी 2.0 को 2020 में पेश किया गया था जो

[09:25:37] सीधे अनिवासियों पर लगता है।

[09:25:41] प्रत्यक्ष कर के लाभ और नुकसान प्रत्यक्ष

[09:25:44] कर का नुकसान क्या है? टैक्स की रेट काफी

[09:25:46] ज्यादा होती है। थोड़ा वसूलना भी

[09:25:48] कॉम्प्लिकेटेड होता है। कर चोड़ी की

[09:25:50] संभावनाएं होती है। जो लाभ होता है,

[09:25:53] सामाजिक समानता इससे देश में आ जाती है।

[09:25:56] सरकार के पास इनकम आ जाती है। गरीब और

[09:25:58] कमजोर वर्ग को मदद मिल पाती है और

[09:26:01] राष्ट्रीय विकास में योगदान दे पाते हैं।

[09:26:03] अमीर लोग

[09:26:06] इनडायरेक्ट टैक्स जिसमें लगाया टैक्स किसी

[09:26:08] और पर जाता है। वसूला किसी और से आता है।

[09:26:10] जितना वस्तु सेवाओं पर लगने वाला जीएसटी

[09:26:13] वाला टैक्स है। एक्साइज ड्यूटी है, कस्टम

[09:26:15] ड्यूटी है। अप्रत्यक्ष कर वह कर होते हैं

[09:26:17] जो उपभोक्ता द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से

[09:26:19] सरकार को चुकाए जाते हैं। यानी यह कर

[09:26:21] प्रोडक्ट और सर्विस पर लगते हैं ना कि

[09:26:24] सीधे व्यक्ति पर। इस प्रकार के करों को

[09:26:26] उत्पादक या व्यापारी द्वारा संग्रहित किया

[09:26:28] जाता है और अंत में उपभोक्ता से वसूला

[09:26:30] जाता है। इसके लिए भी हमारे देश में

[09:26:32] इनडायरेक्ट टैक्स एंड कस्टम बोर्ड बनाया

[09:26:35] गया है। प्रत्यक्ष कर कर का भुगतान

[09:26:38] दायित्व करने वाला मतलब देने वाला और लागू

[09:26:41] होने वाला एक ही व्यक्ति होता है। यहां पर

[09:26:43] कोई ट्रांसफर नहीं हो सकता। इनडायरेक्ट

[09:26:45] टैक्स में वो ट्रांसफर किया जा सकता है।

[09:26:47] इनकम टैक्स, कॉर्पोरेट टैक्स, जीएसटी

[09:26:50] टैक्स, मनोरंजन टैक्स यह प्रगतिशील होता

[09:26:52] है। यह प्रतिगामी होता है। ऐसा माना जाता

[09:26:54] है। इसमें प्रशासन को ज्यादा खर्च करना

[09:26:56] पड़ता है वसूली में। उसमें उतना वसूली का

[09:26:58] पैसा नहीं लगता है।

[09:27:02] अप्रत्यक्ष कर हमारे देश में अभी भी बचे

[09:27:05] हुए हैं। पहले तो बहुत सारे थे लेकिन अब

[09:27:07] जीएसटी ने बहुत सारे करों को ले लिया।

[09:27:09] इसके अलावा कस्टम ड्यूटी है जो विदेशों से

[09:27:11] आयात आता है। मोटर व्हीकल टैक्स अभी

[09:27:14] जीएसटी के अंतर्गत नहीं कार खरीदने जाओगे

[09:27:16] तो उसका अलग टैक्स देना पड़ता है। कस्टम

[09:27:19] ड्यूटी पर सरचार्ज की बात करें, कस्टम सेस

[09:27:21] की बात करें, स्टम्प ड्यूटी अलग है।

[09:27:23] एक्साइज पेट्रोल अल्कोहल पर जीएसटी नहीं

[09:27:26] लगता है। एक्साइज ड्यूटी लगता है। जीएसटी

[09:27:30] एक का अप्रत्यक्ष कर है जिसे वस्तु सेवाओं

[09:27:32] पर लगाया जाता है। भारत को एक मार्केट

[09:27:34] बनाने के लिए पूरे देश में एक जैसा टैक्स

[09:27:36] लगाने की शुरुआत 1 जुलाई 2017 को हुई थी।

[09:27:39] अगले साल 10 साल हो जाएंगे इसके। 101वां

[09:27:42] संविधान संशोधन एक राष्ट्र एक कर प्रणाली

[09:27:45] समवर्ती सूची का विषय है और साथ ही साथ

[09:27:48] याद रखिए कि इसको पारित करने के लिए आधे

[09:27:50] राज्यों की अनुमति जरूरी थी। इसलिए इसको

[09:27:52] पारित करना थोड़ा मुश्किल था। बहुत सारे

[09:27:55] टैक्स इसमें शामिल हो गए। वेट, ऑक्टेराई,

[09:27:57] लोकल टैक्स, एंट्री टैक्स, लग्जरी टैक्स,

[09:27:59] एंटरटेनमेंट टैक्स कई प्रकार के एक्साइज

[09:28:02] ड्यूटी भी इन केस के अंदर चले गए। पर

[09:28:04] पेट्रोल और अल्कोहल की एक्साइज ड्यूटी अभी

[09:28:06] भी अलग है। [गला साफ़ करने की आवाज़]

[09:28:08] कास्केडिंग इफेक्ट का मतलब होता है कि कई

[09:28:10] बार वस्तु पर कई प्रकार के टैक्स के कारण

[09:28:12] उसकी कीमतें बढ़ जाती थी। तो इसको लाने के

[09:28:15] लिए लाया गया था। जीएसटी के अंतर्गत कर

[09:28:17] योग्य घटना, वस्तुओं, सेवाओं की आपूर्ति,

[09:28:20] निर्माण, बिक्री आदि महत्वपूर्ण नहीं

[09:28:22] होते। बस इंपॉर्टेंट होता है कहां खरीदा

[09:28:24] गया मोटे तौर पर तीन प्रकार का जीएसटी

[09:28:27] लगाया गया है सेंट्रल जीएसटी जो कि

[09:28:29] सेंट्रल गवर्नमेंट का हिस्सा होता है

[09:28:30] उसमें स्टेट जीएसटी उस राज्य का हिस्सा

[09:28:32] होता है अगर कहीं पर भी जीएसटी के लेनदेन

[09:28:35] में दो या दो से ज्यादा राज्य इनवॉल्वड है

[09:28:38] मतलब उसका उत्पादन किसी और राज्य में हुआ

[09:28:40] खरीद बेचा कहीं और राज्य में गया तो उसमें

[09:28:42] आईजीएसटी होता है इंटीग्रेटेड होता है

[09:28:44] जिसमें राज्य के जो राज्य इनवॉल्व थे उसके

[09:28:47] सबके बीच में पैसों का बंटवारा होता है

[09:28:50] हमारे देश में आर्टिकल 271 31 के अनुसार

[09:28:52] संसद को सरचार्ज लगाने की शक्ति है जो

[09:28:54] जीएसटी के अतिरिक्त वसूला जाता है। जीएसटी

[09:28:58] काउंसिल बनाई गई है हमारे देश में 101वें

[09:29:00] संविधान संशोधन के तहत आर्टिकल 279 ए में

[09:29:04] जीएसटी काउंसिल कांसेप्ट लाया गया। पहली

[09:29:06] बार सभी राज्यों के वित्त मंत्री या

[09:29:09] मुख्यमंत्री जो भी उसमें वित्त से जुड़े

[09:29:12] हुए मैटर लेते होंगे वो इसके सदस्य होते

[09:29:14] हैं। इसका अध्यक्ष केंद्रीय वित्त मंत्री

[09:29:16] होता है। 28 और तीन 31 जगह के कुल लोग

[09:29:20] यहां पर मिलकर सदस्य बनते हैं। जीएसटी

[09:29:23] काउंसिल में 75% भारित बहुमत होता है।

[09:29:26] मतलब कोई भी प्रस्ताव तभी पारित होगा जब

[09:29:29] 75% बहुमत स्वीकार करेगा। जिसमें केंद्र

[09:29:33] सरकार अकेले को 33% की वोटिंग राइट्स दिया

[09:29:36] गया है। मतलब केंद्र सरकार ने अगर हां कह

[09:29:39] दिया तो 33% लोगों ने हां कह दिया और

[09:29:42] केंद्र सरकार ने अगर ना कह दिया तो वीटो

[09:29:45] पावर है। मतलब फिर पूरे राज्य मिलकर भी

[09:29:47] कोई निर्णय नहीं ले सकती है। जीएसटी परिषद

[09:29:50] की सिफारिशें बाध्यकारी नहीं होती है।

[09:29:53] इस साल हमारे देश में अभी नया बना ये जीएस

[09:29:57] जीएसटीएटी

[09:29:59] गुड एंड सर्विस टैक्स एफिलिएट ट्रिब्यूनल

[09:30:01] एक न्यायालय है। यदि जीएसटी का आप पर कोई

[09:30:05] फाइन लगाया गया और आपको संतुष्टि नहीं है

[09:30:07] तो इस न्यायालय में आप अपील कर सकते हैं

[09:30:09] सरकार के खिलाफ। केंद्रीय वित्त मंत्री

[09:30:11] द्वारा वस्तु और सेवा कर अपीलीय

[09:30:13] न्यायाधिकरण का औपचारिक शुभारंभ हुआ। वैसे

[09:30:16] तो ये 2017 के जीएसटी कानून से था लेकिन

[09:30:19] बना नहीं था। यह अब बनाया गया है हमारे

[09:30:21] देश में। नई दिल्ली में इसकी एक मेन

[09:30:24] ब्रांच है। इसके अलावा 45 स्थानों पर 31

[09:30:27] राज्यों में 45 जगह पर इसकी ब्रांच बनाई

[09:30:30] गई है। यह भी केंद्र सरकार तय करेगी इसमें

[09:30:34] कि इसके कैसे कार्यप्रणाली होगी। हर एक

[09:30:36] ब्रांच में दो न्यायिक सदस्य होंगे। एक

[09:30:38] टेक्निकल और एक राज्य स्तरीय टेक्निकल

[09:30:41] सदस्य भी होगा। एक प्रकार से डिजिटल

[09:30:43] प्लेटफार्म है जिसमें पूरी तरह से ऑनलाइन

[09:30:46] सुनवाई की जा सकती है। ऑनलाइन आप

[09:30:48] पार्टिसिपेट कर सकते हैं। नेशनल

[09:30:50] इंफॉर्मेशन सेंटर के सहयोग से इसका पूरा

[09:30:52] का पूरा ऑनलाइन प्लेटफार्म डिजाइन किया

[09:30:55] गया है।

[09:30:57] जीएसटी 1.0 जीएसटी में बहुत सारे वेरिएबल

[09:31:01] थे। वर्तमान में हमारे देश में अब जीएसटी

[09:31:03] की दरों में केवल 18% और 5% ही जीएसटी की

[09:31:06] दरें बच गई है। पहले 12% और 28% जैसी

[09:31:09] जीएसटी भी हुआ करती थी। 2 0 के तहत कई

[09:31:13] प्रकार के सुधार कर दिए गए हैं। इनवॉइसिंग

[09:31:15] और त्वरित रिफंड की भी बातचीत आ गई है।

[09:31:17] उपरोक्त कमियों को दूर करने के लिए जीएसटी

[09:31:19] व्यवस्था को अधिक प्रभावी और लक्षणमुखी

[09:31:22] बनाने के लिए जीएसटी 2.0 लेकर आ गई। टैक्स

[09:31:25] स्लेव अब कम हो गए। बहुत सारे जो लग्जरी

[09:31:28] टैक्स थे, अवगुण टैक्स थे वो रहने दिए गए

[09:31:31] हैं। पूरी तरह से कर मुक्त वस्तुएं बना दी

[09:31:34] गई है। कई सारी चीजों में व्यापक कटौतियां

[09:31:37] कर दी गई है। एमएसएमई एग्रीकल्चर वाले

[09:31:40] लोगों को राहत दी गई है। बीमा में टैक्स

[09:31:42] जीएसटी जीरो कर दिया गया है।

[09:31:48] तो पहले क्या होता था? एक प्रकार से हम कह

[09:31:51] सकते हैं कि 18% टैक्स, 12% टैक्स ऐसी कई

[09:31:54] लिमिट होती थी। अब अधिकतर चीजों को या तो

[09:31:57] 5% में कन्वर्ट कर दिया गया है या फिर 18%

[09:32:00] में कन्वर्ट कर दिया गया है। तो बहुत सारी

[09:32:03] चीजें एग्रीकल्चर की जो एसेंशियल गुड्स थे

[09:32:05] उनको 5% में हम लेकर आ गए। ट्रैक्टर टायर

[09:32:09] ट्रैक्टर टायर बायोपेस्टिसाइड

[09:32:12] ड्रिप इरीगेशन सिस्टम एग्रीकल्चर जुड़ी

[09:32:14] हुई चीजें सब 5% टैक्स में आ गई। अब हेयर

[09:32:17] ऑयल, शैंपू, टूथपेस्ट, बटर, घी, चीज़ ये सब

[09:32:21] के सब जितनी जरूरी चीजें थी अब 5% के

[09:32:24] टैक्स में आ गई है।

[09:32:28] जितनी भी चीजें [गला साफ़ करने की आवाज़]

[09:32:29] हेल्थ सेक्टर की थी जैसे इंश्योरेंस उस पर

[09:32:32] 18% टैक्स होता था। जीरो कर दिया गया।

[09:32:35] थर्मामीटर, मेडिकल, ग्रेड, ऑक्सीजंस ये सब

[09:32:38] 12% में हुआ करते थे। जीरो 5% में आ गए।

[09:32:42] पेट्रोल, पेट्रोल, हाइब्रिड, एलपीजी,

[09:32:44] सीएनजी कारें जिनकी एक्सीड 1200 सीसी या

[09:32:48] उसके आसपास रहती थी उन पर भी टैक्सेस को

[09:32:51] कम कर दिया गया। थ्री व्हीकल पर भी

[09:32:53] टैक्सेस कम कर दिए गए हैं। उनके युक्तियों

[09:32:55] पर एक प्रकार से कहे तो तो कई सारे जो

[09:32:58] टैक्सेस थे जैसे मैप, ग्लोब, पेंसिल,

[09:33:02] शार्पनर, एक्सरसाइज एक्सरसाइज बुक्स,

[09:33:05] नोटबुक इन पर टैक्स जीरो कर दिया गया। एसी

[09:33:08] पर टेलीविजन जो बड़े हुआ करते थे उन पर

[09:33:11] 28% का टैक्स होता था। वह 18% में आ गए।

[09:33:15] जीएसटी की चार स्लैब पांच 12 18 28 को

[09:33:18] घटाकर अब दो ही स्लैब बची है। पांच और 18%

[09:33:21] कर दी गई है। चार स्लैब की जगह दो स्लैब

[09:33:23] करने से वस्तुओं का वर्गीकरण थोड़ा आसान

[09:33:25] होगा और रियल में हम जो सोच कर आए थे वही

[09:33:28] चीजें रहेगी। सरकार ने एक नई श्रेणी 40%

[09:33:31] कर दी है। इसमें वो वस्तुएं आती है जो

[09:33:33] विलासितापूर्ण या समाज के लिए अहितकर मानी

[09:33:35] जाती है। जैसे महंगी कारें, बड़ी लग्जरी

[09:33:38] गाड़ियां, प्राइवेट प्लेन, पान मसाला,

[09:33:41] गुटखा, सिगरेट, चीनी मिलाई गई वस्तुएं,

[09:33:43] कुछ केयर अल्कोहलिक पेय पदार्थ। यह दर

[09:33:46] इसलिए रखी ताकि आवश्यक वस्तुएं सस्ती रहे

[09:33:48] और विलासिता हानिकारक वस्तुएं महंगी हो

[09:33:51] जाए। सरकार ने कई वस्तुओं पर जीएसटी पूरी

[09:33:54] तरह से खत्म कर दिया है। खास करके बीमा पर

[09:33:56] पूरी तरह से जीएसटी जीरो कर दिया गया है।

[09:33:59] जीएसटी 2.0 के तहत जीएसटी अब कई जगह हटा

[09:34:02] दिया गया है। कर दरों में व्यापक कमी आई

[09:34:05] है। 18 28% अब 18% में आ चुके हैं। कई 18

[09:34:08] और 12% जीरो में या 5% में आ गए हैं। एयर

[09:34:12] कंडीशन को अब एक प्रकार से वाइट थिंग्स

[09:34:15] नहीं कहते तो उनका टैक्सेस कम कर दिया गया

[09:34:17] है। एग्रीकल्चर के कई सारे इक्विपमेंट अब

[09:34:20] 5% टैक्स में लेकर आ गए। एमएसएमई की कई

[09:34:23] चीजें 5% टैक्स में आ गई है। यह सब जीएसटी

[09:34:26] 2.0 के अंतर्गत सुधार कर दिया गया है।

[09:34:28] छोटे व्यापारी जिनका टर्नओवर ₹40 लाख से

[09:34:32] कम कहे रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को

[09:34:33] ऑप्शनल बना दिया गया कि भ ठीक है आप

[09:34:36] रजिस्ट्रेशन ना भी करना चाहो तो चलेगा।

[09:34:40] छोटे व्यापारियों के लिए ई इनवॉइसिंग को

[09:34:42] सरल और ऑटोमेटिक बनाया गया। वो मोबाइल ऐप

[09:34:44] या सरल सॉफ्टवेयर से ही बना सकते हैं।

[09:34:47] निर्माण सामग्री में भी बहुत सारी चीजें

[09:34:49] जो 28% में थी अब केवल 18% जीएसटी में आ

[09:34:52] गई हैं। कंपनसेशन अधिनियम के तहत यह

[09:34:55] केंद्र और राज्य के बीच राजस्व वाणी की

[09:34:57] भरपाई के लिए एक टेंपरेरी व्यवस्था थी।

[09:34:59] जिसे शुरू में 5 वर्ष के लिए लागू किया

[09:35:01] गया था।

[09:35:03] सरकार के अनुसार इसके सात लाभ होंगे। सेवन

[09:35:05] पिलर्स के बारे में सरकार ने कहा है।

[09:35:08] बिल्डिंग ऑन द सक्सेस ऑफ जीएसटी वन नेशन

[09:35:10] वन टैक्स टैक्स पेयर का बेस बढ़ेगा। दो

[09:35:14] सैंपल हो गए 5% और 18% रैशनलाइजिंग रेट

[09:35:18] फॉर फेयर टैक्सेशन ज्यादा आसानी से अब आप

[09:35:21] सही चीजों पर सही टैक्स लगा रखा गया है।

[09:35:24] सिंपलीफाइंग फाइलिंग थ्रू टेक्नोलॉजी

[09:35:27] डिजिटल टेक्नोलॉजी और एआई का उपयोग पुटिंग

[09:35:30] कंज्यूमर फर्स्ट कंज्यूमर को सबसे पहले

[09:35:32] अग्रणी रोल दिया गया है। इंपारविंग

[09:35:35] एमएसएमई और मैन्युफैक्चरिंग स्ट्रांगर

[09:35:38] स्टेट स्ट्रंगर भारत यह पूछा जा सकता है

[09:35:41] सब और लोअर टैक्स मतलब हायर स्पेंडिंग

[09:35:44] एक देश एक कर सरल कर संरचना आसान

[09:35:48] रजिस्ट्रेशन ई इनवाइंसिंग एआई निगरानी

[09:35:50] आवश्यक वस्तुओं पर जीरो से 5% एमएसएमई

[09:35:54] सशक्त मेक इन इंडिया को बढ़ावा राज्यों की

[09:35:56] आय और मांग में वृद्धि कम टैक्स से ज्यादा

[09:35:58] खरीद और उद्योग की वृद्धि की बातचीत की गई

[09:36:01] है। फिर पॉपकॉर्न टैक्स थोड़ा सा चर्चाओं

[09:36:04] में था। इसलिए चर्चाओं में था क्योंकि

[09:36:06] पहले क्या हुआ था? नमक और मसाले के साथ

[09:36:08] अगर मिश्रित है तो 5% का जीएसटी देना

[09:36:11] पड़ेगा। अगर पूर्व पैकेज्ड है या ब्रांडेड

[09:36:14] है तो 12% देना पड़ेगा और 18% अगर कैरेमल

[09:36:17] है चीनी वाला है तो दुनिया वालों ने बहुत

[09:36:19] मजाक उड़ाया। एक तरफ तो आप कह रहे हैं कि

[09:36:22] हम टैक्स को सरल कर रहे हैं। अब पॉपकॉर्न

[09:36:23] में तीन तरीके का टैक्स लगा दिया गया था।

[09:36:26] तो इस कारण से इसको पॉपकॉर्न टैक्स के रूप

[09:36:28] में नाम दिया गया था। रियल में एक आलोचना

[09:36:31] भी है। अब ये 12% वाली चीज खत्म हो गई है।

[09:36:38] कर [गला साफ़ करने की आवाज़] राजस्व में

[09:36:39] कम होने के साथ जटिलता भी बढ़ जाएगी। तो

[09:36:42] फाइनली इसको भी सुधार दिया गया। ईवे बिल

[09:36:45] एक प्रकार से कोई वस्तु आप यहां से खरीद

[09:36:47] रहे हैं दिल्ली से और उसे लखनऊ भेजना है

[09:36:49] तो ईवे बिल लगेगा। वो जीएसटी के तहत ईवे

[09:36:52] बिल निकाल दिया जाता है। जो व्यक्ति बेचता

[09:36:54] है वो ईवे बिल भी आपको दे देता है। कम

[09:36:56] मूल्य की वस्तु हेतु ईवे बिल अनिवार्य

[09:36:59] नहीं है। 500 से कम मूल्य की वस्तुओं के

[09:37:01] लिए 200 कि.मी. के लिए ईवे बिल 1 दिन के

[09:37:04] लिए होता है। 200 से 300 कि.मी. के लिए 3

[09:37:07] दिन होता है। 300 से 500 कि.मी. के लिए 5

[09:37:09] दिन होता है। 500 से 1000 कि.मी. के लिए

[09:37:11] 10 दिन होता है। 1000 कि.मी. से अधिक के

[09:37:14] लिए 15 दिन तक का ईवे बिल होता है। हमारे

[09:37:17] देश में इंटरनेशनल सिस्टम फॉर कमोडिटी

[09:37:19] डिस्क्रिप्शन एंड प्रोडक्ट नोमेनक्लेचर की

[09:37:21] शुरुआत की गई जो कि 1998 में विश्व सीमा

[09:37:25] संगठन ने शुरुआत की थी। इसके तहत वस्तुओं

[09:37:28] की पहचान होना थोड़ा आसान होता है।

[09:37:30] अंतरराष्ट्रीय व्यापार में बहुत ही ज्यादा

[09:37:32] जरूरी होते हैं। एचएसएन कोड और एसएससी

[09:37:35] कोड। एचएसएन का मतलब होता है हार्मोनाइज

[09:37:38] सिस्टम नोमेनक्लेचर और एसएससी का मतलब

[09:37:41] होता है सर्विस अकाउंटिंग कोड अंडर

[09:37:43] जीएसटी।

[09:37:45] अंडरस्टैंडिंग एस एसएसी कोड फॉर एग्जांपल

[09:37:49] इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी की अगर सर्विस आप

[09:37:52] दे रहे हैं इंटरनेशनलली इंपोर्ट एक्सपोर्ट

[09:37:55] कर रहे हैं इस सेवा को तो इसका कोड है

[09:37:57] 998314

[09:37:59] फर्स्ट टू डिजिट दिखाता है एक प्रकार से

[09:38:02] 99 का मतलब यह सर्विस की बातचीत है। फिर

[09:38:05] उसके बाद 83 दिखाता है कि यह आईटी सेक्टर

[09:38:08] की बातचीत है और 14 दिखाता है कि डिजिटल

[09:38:11] नेचर में यह डिजाइन और डेवलपमेंट सर्विसेज

[09:38:14] हैं। तो इसलिए 998314 लिखा कि समझ जाते

[09:38:17] हैं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कि ये किस

[09:38:19] तरीके का कोड रहेगा। फिर वैसे ही एचएसए

[09:38:22] कोड भी होता है जैसे ब्राउन राइस के लिए

[09:38:25] 10620

[09:38:27] अपनाया जाता है। इसमें वास्तविक रूप में

[09:38:30] 10 का मतलब होता है कि अनाज की बातचीत कर

[09:38:32] रहा है। 06 की बात कर रहा है कि ये चावल

[09:38:35] की बात कर रहा है और 20 का मतलब बता रहा

[09:38:37] है कि यह ब्राउन राइस की बातचीत कर रहा

[09:38:39] है। जिससे कि पता चल पाता है कि वास्तविक

[09:38:42] रूप में यह प्रोडक्ट कौन सा है।

[09:38:45] कुछ जगह पर यह छ डिजिट का होता है। कुछ

[09:38:47] जगह पर 10 डिजिट का होता है।

[09:38:50] तो वस्तुओं के लिए एचएसए कोड होता है।

[09:38:52] सर्विज के लिए एसएससी कोड होते हैं।

[09:38:54] दुनिया में इंटरनेशनल व्यापार के लिए

[09:38:56] टैक्स बोनसी ये थोड़ा शब्द ध्यान से सुन

[09:38:59] लीजिएगा। जीडीपी में परिवर्तन के प्रति कर

[09:39:02] राजस्व की वृद्धि अनुक्र क्रियाशीलता को

[09:39:05] दर्शाता है। इसका मतलब होता है कि अगर

[09:39:08] जीडीपी 1% से बढ़ जाए। जीडीपी में कितनी

[09:39:12] ग्रोथ पर कितने टैक्स की वृद्धि हो गई।

[09:39:15] मतलब मान लीजिए जीडीपी 10% से बढ़ा और

[09:39:18] टैक्स कलेक्शन भी 10% से बढ़ गया तो हम

[09:39:21] कहेंगे कि यहां तो 100% की बॉयसी है भाई

[09:39:24] 100% मतलब जितना बढ़ता है उतना यहां भी

[09:39:26] बढ़ जाता है लेकिन ऐसा होता नहीं है या

[09:39:29] जीडीपी या राष्ट्रीय आय में वृद्धि के

[09:39:31] प्रति उत्तर में कितना राजस्व जुटाने की

[09:39:34] दक्षता होती है कितना टैक्स बढ़ जाता है

[09:39:36] उसको कहते हैं टैक्स बॉयसी अगर देश के

[09:39:39] अंदर जीडीपी बढ़े और टैक्स भी बढ़ जाए तो

[09:39:41] समझ जाइएगा टैक्स बॉयसी अच्छी है लेकिन

[09:39:43] जीडीपी ज्यादा बढ़े लेकिन लेकिन टैक्स

[09:39:45] उतना ना बढ़े तो कम है टैक्स बोनसी। फिर एक

[09:39:48] है पिगोवियन कर। पिगोवियन कर किसी भी

[09:39:50] सामान के लेनदेन पर लगाए जाने वाला कर है

[09:39:53] जो नकारात्मक बाहरी कारक का सृजन करता है।

[09:39:56] एक नकारात्मक बाहरी कारक एक ऐसी लागत है

[09:39:58] जिससे एक आर्थिक लेनदेन के परिणाम स्वरूप

[09:40:01] तीसरे पक्ष द्वारा भुगतना पड़ता है।

[09:40:04] यह तब होता है जब माल की खपत या उत्पादन

[09:40:07] किसी तीसरे पक्ष के लिए हानिकारक प्रभाव

[09:40:09] का कारण बनती है। एक पिगोवियन कर का

[09:40:11] उद्देश्य उन वस्तु या सेवाओं के निर्माता

[09:40:13] पर कर लगाना जो समाज के लिए बुरा असर

[09:40:16] डालती है। अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि

[09:40:18] पर्यावरण प्रदूषण जैसी नकारात्मक

[09:40:20] बाह्यताओं के लिए भी हम पिगोवियन टैक्स

[09:40:24] लगा सकते हैं। मतलब कोई ऐसा टैक्स जो किसी

[09:40:28] ऐसी वस्तु पर कोई ऐसा टैक्स लगा दिया जाता

[09:40:30] है जिसके उपभोग के कारण उत्पादन के कारण

[09:40:33] समाज को नुकसान होने लग जाता है तो उसके

[09:40:36] लिए पिगोवियन टैक्स लगाया जाता है।

[09:40:39] पिगोवियन टैक्स किसी नेगेटिव जैसे

[09:40:42] पर्यावरण प्रदूषण के लिए पिगोवियन टैक्स

[09:40:44] की कल्पना की जा सकती है कि जो लोग

[09:40:45] प्रदूषण ज्यादा पैदा करते हैं। टोबिनकर

[09:40:48] नोबेल पुरस्कार विजेता जेम्स टोबिन के

[09:40:50] द्वारा प्रस्तावित है। जो भी विदेशी

[09:40:53] लेनदेन होते हैं। कभी-कभी अंतरराष्ट्रीय

[09:40:55] स्तर पर रुपए की खरीददारी या बिक्री

[09:40:58] ज्यादा मात्रा में हो जाती है तो उसके लिए

[09:41:00] फिर रोकने के लिए टैक्स लिया जा सकता है।

[09:41:07] [गला साफ़ करने की आवाज़]

[09:41:08] टोबिन टैक्स मूल रूप से अल्पकालिक मुद्रा

[09:41:11] सट्टेबाजी को दंडित करने के इरादे से

[09:41:13] लगाते हैं। टोबिन कर का अर्थ है वित्तीय

[09:41:16] क्षेत्र के प्रतिभागियों को किसी दिए गए

[09:41:18] देश की मुद्रा की स्थिरता को नियंत्रित

[09:41:20] करने के साधन के रूप में। मतलब अगर कोई

[09:41:22] बहुत बड़ी मात्रा में रुपया खरीदे और बेचे

[09:41:25] तब टोबिन टैक्स लगाया जा सकता है ताकि ऐसी

[09:41:27] प्रवृत्तियों को अंकुश लगे। टैक्स चोरी एक

[09:41:30] अपराधिक व्यवहार है। व्यक्ति जानबूझकर

[09:41:32] टैक्स का भुगतान नहीं करता। लेकिन टैक्स

[09:41:34] परिहार किसी तरीके से नियमों का पालन करते

[09:41:38] हुए अपने टैक्स को कम से कम करवाना टैक्स

[09:41:41] परिहार टैक्स अवॉयडेंस कहलाता है। इसमें

[09:41:43] कोई कानून का उल्लंघन नहीं होता है।

[09:41:47] टैक्स अवॉयडेंस लीगल है। आप जो भी लूप होल

[09:41:50] होते हैं उसको पहचानते हैं और उसके आधार

[09:41:52] पर अपने टैक्स को कम करते हैं। इसमें किसी

[09:41:54] प्रकार की पेनल्टी या इंप्रज़मेंट नहीं

[09:41:56] होता है क्योंकि रूल्स टूटे नहीं गए हैं।

[09:41:58] लेकिन टैक्स एवीजन इललीगल होता है। एंजल

[09:42:02] टैक्स स्टार्टअप कंपनियां अपने बिजनेस को

[09:42:05] बढ़ाने के लिए फंड जुटाती है और इसके लिए

[09:42:07] पैसे देने वाली कंपनियां किसी संस्था को

[09:42:09] शेयर जारी करती है। ज्यादातर मामलों में

[09:42:12] शेयर तय कीमत की तुलना में बहुत काफी अधिक

[09:42:14] कीमत पर जानबूझ के जारी किए जाते हैं। इस

[09:42:17] प्रकार शेयर बेचने से हुई अतिरिक्त राशि

[09:42:19] को इनकम माना जाता है और इस इनकम पर जो

[09:42:21] टैक्स लगता है उसे एंजेल टैक्स कहते हैं।

[09:42:24] स्टार्टअप को इस तरह मिली राशि को एंजेल

[09:42:26] फंड कहते हैं। जिसके बाद आयकर विभाग एंजेल

[09:42:28] टैक्स वसूलता है। 2012 में एंजेल टैक्स

[09:42:31] लाया गया है। jal टेक समझ गए। कोई भी

[09:42:34] कंपनी अपने शेयर किसी इन्वेस्टर को देती

[09:42:37] है और उसके एवज में जो पैसा प्राप्त करती

[09:42:40] है उस पर उसे टैक्स देना पड़ेगा।

[09:42:44] एक अच्छा टैक्स कौन सा टैक्स सिस्टम माना

[09:42:46] जाएगा जहां फ्लेक्सिबिलिटी होगी,

[09:42:48] ट्रांसपेरेंसी होगी, एफिशिएंसी होगी,

[09:42:50] फेयरनेस होगी और सरल से सरल कानून होंगे।

[09:42:53] सरल कानून संबंधी सरलता होगी,

[09:42:56] ट्रांसपेरेंसी होगी, निष्पक्षता होगी,

[09:42:58] पर्याप्तता होगी। इन सभी को देखते हैं।

[09:43:00] टैक्स इलास्टिसिटी यह कर की दर में

[09:43:03] परिवर्तन के कारण कर संग्रह में परिवर्तन

[09:43:05] के अनुक्रियाशीलता की मात्रा की माप है।

[09:43:07] मतलब कर की दर में परिवर्तन। टैक्स

[09:43:10] इलास्टिसिटी का मतलब कि अगर टैक्स की रेट

[09:43:13] बढ़ा दी जाए तो फिर कितना टैक्स बढ़ पाया?

[09:43:15] इसको कहते टैक्स इलास्टिसिटी। जीडीपी

[09:43:18] बढ़ने पर कितना टैक्स बढ़ा? वो है बॉयसी।

[09:43:21] और टैक्स की रेट में परिवर्तन करने पर

[09:43:24] कितना टैक्स बढ़ गया? इसके लिए लॉफर साहब

[09:43:27] ने एक बहुत अच्छा चित्र दिया था। उन्होंने

[09:43:29] कहा था कि यदि आप शुरुआत में टैक्स की रेट

[09:43:32] बढ़ाएंगे तो टैक्स की पहले दर बढ़ने पर

[09:43:35] टैक्स कलेक्शन बढ़ता जाएगा। लेकिन एक समय

[09:43:38] के बाद अगर आपने टैक्स की रेट बहुत ज्यादा

[09:43:40] कर दी तो लोग टैक्स चोरी करना शुरू कर

[09:43:42] देते हैं। तो भले ही आप टैक्स की रेट

[09:43:44] बढ़ाते चले जाओ लेकिन टैक्स कलेक्शन कम

[09:43:47] होने लग जाता है। तो इसको नाम दिया था

[09:43:49] लॉफर कर्व। आर्थर लॉफर ने पेश किया था

[09:43:53] उल्टे यू आकार। उल्टे यू आकार का होता है।

[09:43:57] वक्र बताता है कि जैसे-जैसे कर की दर

[09:44:00] बढ़ती है, कर राजस्व में वृद्धि होती है।

[09:44:02] हालांकि अधिकतम बिंदु पर पहुंचने के बाद

[09:44:05] कर दर में आगे और वृद्धि के साथ राजस्व कम

[09:44:08] होने लगता है। क्योंकि कर लोग कई सारे लोग

[09:44:10] अब कर चुकाने से बचते हैं। तो एक प्रकार

[09:44:13] से शुरुआत में आप टैक्स रेट बढ़ाएंगे,

[09:44:15] टैक्स कलेक्शन बढ़ेगा, टैक्स रेट

[09:44:16] बढ़ाएंगे, टैक्स कलेक्शन बढ़ेगा, टैक्स

[09:44:18] रेट बढ़ाएंगे, टैक्स कलेक्शन मैक्सिमम

[09:44:20] होगा। लेकिन उसके बाद अगर आपने ज्यादा

[09:44:23] टैक्स बढ़ा दिया सोचिए कि आपने 100% ही

[09:44:25] टैक्स लगा दिया तो कोई भी टैक्स जमा नहीं

[09:44:27] करेगा। वो कहेगा अब ऐसे भी मुझे जेल जाने

[09:44:29] के लिए मैं तैयार हूं क्योंकि मैं कमाई

[09:44:31] करूं और पूरा पैसा दे दूं। तो लॉफर्ड साहब

[09:44:34] कहते हैं कि टैक्स को अधिकतम करने के लिए

[09:44:36] ना तो टैक्स की रेट बहुत ज्यादा होनी

[09:44:38] चाहिए ना बहुत ही कम। एक ऐसी रेट ढूंढिए

[09:44:41] जहां पर टैक्स कलेक्शन ज्यादा से ज्यादा

[09:44:42] हो सकता है और यही कारण है कि हमारे देश

[09:44:45] की सरकारें कुछ छूट भी दे देती है। नॉन

[09:44:49] टैक्स रेवेन्यू नॉन हम बजट पढ़ रहे हैं।

[09:44:52] बजट में टैक्स रेवेन्यू पढ़ा हमने

[09:44:54] रेवेन्यू रिसीप्ट में नॉन टैक्स रेवेन्यू।

[09:44:56] नॉन टैक्स रेवेन्यू में कई चीजें आती है।

[09:44:58] जो ब्याज कमा रही है देश की सरकारें किसी

[09:45:00] को उधार देने पर वो सब आते हैं। इसमें

[09:45:02] जुर्माना, अर्थदंड, शुल्क, अनुदान, उपहार

[09:45:05] सब आता है। कंपनियों के लाभ आते हैं। कई

[09:45:08] प्रकार के टैक्स जो फाइन लिए जाते हैं वो

[09:45:12] सब कुछ इसके अंतर्गत शामिल किया जाता है।

[09:45:14] फिर आते हैं कैपिटल रिसीप्ट। कैपिटल

[09:45:16] रिसीप्ट सरकार की ऐसी कमाइयां होती है जो

[09:45:19] सरकार ने या तो कर्जा प्राप्त करके ली

[09:45:21] होगी या अपनी प्रॉपर्टी बेचकर। ये अच्छी

[09:45:23] नहीं मानी जाती है। यह कम से कम होनी

[09:45:25] चाहिए। वह प्राप्तियां जिनसे सरकार पर या

[09:45:28] तो किसी दायित्व का सृजन होता है या सरकार

[09:45:30] की प्रॉपर्टी कम होती है। ऋण सृजन पूंजीगत

[09:45:34] प्राप्तियां कर्जे लेकर या फिर बेचकर आपने

[09:45:37] अपनी प्रॉपर्टी बेच दी, अपनी कंपनियां बेच

[09:45:40] दी सरकार की तो हम कहेंगे कैपिटल रिसीप्ट

[09:45:42] भले ही होगा

[09:45:45] लेकिन ये अच्छा नहीं माना जाता है। फिर हम

[09:45:47] बात करते हैं एक्सपेंडिचर की। राजस्व

[09:45:50] व्यय। दैनिक जो खर्चे सरकार कर रही है

[09:45:52] उसको राजस्व व्यय कहते हैं। और सरकार जब

[09:45:55] किसी प्रकार की कैपिटल का सृजन करती है

[09:45:58] सड़क का निर्माण हॉस्पिटल का निर्माण

[09:46:00] स्कूल का निर्माण वो पूंजीगत खर्चे होते

[09:46:03] हैं वो काफी अच्छे माने जाते हैं। याद

[09:46:05] रखिएगा कि रेवेन्यू रिसीप्ट में याद

[09:46:08] रखिएगा कि रेवेन्यू और कैपिटल रिसीप्ट में

[09:46:10] रेवेन्यू रिसीप्ट अच्छी मानी जाती है।

[09:46:12] कैपिटल रिसीप्ट खराब मानी जाती है।

[09:46:14] एक्सपेंडिचर में कैपिटल एक्सपेंडिचर अच्छी

[09:46:16] मानी जाती है। रेवेन्यू एक्सपेंडिचर खराब

[09:46:18] माने जाते हैं। ऐसे खर्च जो ना तो सरकार

[09:46:21] की देनदारी कम करते हैं ना ही किसी प्रकार

[09:46:23] की परिसंपत्ति का सृजन करते हैं। यह एक

[09:46:26] प्रकार से दैनिक खर्चे होते हैं जो सरकार

[09:46:28] के द्वारा समय-समय पर भुगतान होते हैं।

[09:46:29] जैसे ब्याज का भुगतान करना सरकार ने जो

[09:46:32] कर्जा लिया था। सब्सिडीियों के रूप में

[09:46:34] मदद करना सरकार का जो डिफेंस का खर्च जो

[09:46:37] सैलरी के रूप में जाता है। अगर कोई राफेल

[09:46:40] खरीदा गया होगा तो वह पूंजीगत खर्चों में

[09:46:42] आएगा। केंद्र द्वारा राज्यों को जो अनुदान

[09:46:44] दिया जाता है विधायिका के बिना केंद्र

[09:46:47] शासित प्रदेशों का राजस्व व्यय जहां पर

[09:46:49] विधायिकाएं नहीं होती। भारत सरकार के डाक

[09:46:51] विभाग का डाक घाटा, कल्याणकारी योजनाओं से

[09:46:54] जुड़े हुए सरकार के खर्च सब राजस्व खर्चे

[09:46:56] होते हैं। कैपिटल एक्सपेंडिचर सरकार के वह

[09:46:59] व्यय जिसके फलस्वरूप भौतिक या वित्तीय

[09:47:01] परिसंपत्तियों का सृजन होता है। सरकार ने

[09:47:04] या तो अपना कर्जा चुका दिया होता है। तो

[09:47:06] ऋणों को चुकाना पूंजीगत व्यय होता है। एक

[09:47:09] मु व्यय होता है। केंद्र सरकार द्वारा

[09:47:10] राज्यों को नए ऋणों का विस्तार करना मतलब

[09:47:14] नए कर्जे देना। सार्वजनिक उद्यमों को

[09:47:16] कर्जे देना। सिंचाई परियोजना पर हुआ जो

[09:47:19] व्यय होता है भूमि अधिग्रह के लिए भवन

[09:47:21] निर्माण के लिए मशीनरी खरीदने के लिए जो

[09:47:23] खर्चे होते हैं

[09:47:26] कैपिटल एक्सपेंडिचर अच्छा माना जाता है।

[09:47:28] अब अगर कहीं पर भी एक्सपेंडिचर की वैल्यू

[09:47:31] ज्यादा है और इनकम की वैल्यू कम है तो

[09:47:34] एक्सपेंडिचर माइनस इनकम मतलब डेफिशिएट

[09:47:37] आमदनी अठननी खर्चा रुपया। डेफिशिएट

[09:47:40] पॉजिटिव होगा। पॉजिटिव इसलिए होगा क्योंकि

[09:47:43] हमेशा ही वो अपने आप में एक नेगेटिव शब्द

[09:47:45] होता है। तो यहां पर क्या होगा हमेशा ही?

[09:47:48] सबसे पहला है राजकोशीय घाटा। राजकोशीय

[09:47:51] घाटे का सिंपल सा मतलब है देनदारियां।

[09:47:54] सरकार के ऊपर कुल कितनी देनदारियां है?

[09:47:56] उसी को हम कहते हैं फिस्कल डेफिशिएट। पर

[09:47:59] रेवेन्यू डेफिशिएट का मतलब होता है कि

[09:48:01] आपने रेवेन्यू एक्सपेंडिचर कितना किया और

[09:48:03] रेवेन्यू रिसीप्ट कितना आया। यह आइडियली

[09:48:05] जीरो होना चाहिए। वैसे तो लेकिन फिर भी

[09:48:08] थोड़ा बहुत बढ़ भी गया तो चल जाता है

[09:48:10] लेकिन ज्यादा नहीं बढ़ना चाहिए। इफेक्टिव

[09:48:13] रेवेन्यू डेफिशिट इसलिए निकालना पड़ता है

[09:48:15] क्योंकि रेवेन्यू एक्सपेंडिचर में सब्सिड

[09:48:18] जो राज्यों को अनुदान दिया गया था उसको

[09:48:21] हमने रेवेन्यू एक्सपेंडिचर माना है। लेकिन

[09:48:24] कई बार राज्य सरकारें इस अनुदान से अपने

[09:48:26] यहां पर स्कूल बनाते हैं, हॉस्पिटल बनाते

[09:48:29] हैं। अपने यहां पर सड़क बनाते हैं। तो ये

[09:48:31] तो एक प्रकार से कैपिटल एक्सपेंडिचर हो

[09:48:33] गया। तो ऐसे अनुदान जिससे कोई कैपिटल

[09:48:37] एक्सपेंडिचर हुआ होगा तो हम इसे कहते कि भ

[09:48:40] यहां पर ये जो रेवेन्यू एक्सपेंडिचर है ये

[09:48:41] गलत है। अच्छा रेवेन्यू एक्सपेंडिचर था।

[09:48:44] ये कोई खराब नहीं था। तो इफेक्टिव

[09:48:47] रेवेन्यू एक्सपेंडिचर इसको हटाने के बाद

[09:48:50] मिलेगा और फिर रेवेन्यू रिसीप्ट की बातचीत

[09:48:52] आएगी। यह एग्जैक्टली जीरो ही होना चाहिए।

[09:48:55] तभी बेस्ट माना जाएगा।

[09:48:58] प्राइमरी डेफिशिएट का मतलब होता है फिसिकल

[09:49:00] डेफिशिएट। जितना भी देनदारियां है उसमें

[09:49:03] से ब्याज का भुगतान हटा दीजिए। इंटरेस्ट

[09:49:06] रेट जितना पे किया था क्योंकि ये जो ब्याज

[09:49:08] भुगतान कर रहे हैं ये केवल एक सरकार के

[09:49:10] पाप थोड़ी है। पिछले कई सरकारों ने कर्जे

[09:49:13] ले लेकर ये पाप किया है। तो ऐसे डिफरेंस

[09:49:16] को हम नाम देते हैं प्राइमरी डेफिशिएट।

[09:49:18] प्राइमरी डेफिशिएट इसलिए क्योंकि वर्तमान

[09:49:20] सरकार की जिम्मेदारी कितनी है वो पता चलती

[09:49:23] है। एक होता है मुद्रीकृत घाटा जिसमें

[09:49:26] सरकार नए नोट छपवा देती है वो गलत माना

[09:49:28] जाता है। तो फिस्कल डेफिसिट का मतलब होता

[09:49:30] है सरकार की आय और कुल व्यय का अंतर या

[09:49:33] कुल व्यय और आय का अंतर। लेकिन

[09:49:36] प्राप्तियों में हम ऋण को नहीं लेते हैं।

[09:49:38] सिंपल सा राजकोशीय घाटा मतलब सरकार की

[09:49:41] कितनी लायबिलिटी है? सरकार ने कितने कर्जे

[09:49:44] लिए हैं? क्योंकि फाइनली सरकार इस घाटे को

[09:49:46] जीरो करने के लिए कर्जे लेगी। तो जितना

[09:49:49] कर्जा लिया उतना ही मान लिया जाएगा

[09:49:51] राजकोशीय घाटा। भारत में राजकोशीय घाटा

[09:49:54] इसलिए ज्यादा है क्योंकि अभी हम डेवलपिंग

[09:49:55] कंट्रीज हैं। लगातार एक्सपेंडिचर हो रहा

[09:49:58] है। एग्रीकल्चर पर हमारी डिपेंडेंसी अभी

[09:50:00] भी ठीक-ठाक है और इंडस्ट्रियल ग्रोथ उतनी

[09:50:02] फास्ट नहीं हुई। हमारे यहां पर लेबल की

[09:50:04] प्रोडक्टिविटी इतनी अच्छी नहीं है। कैपिटल

[09:50:07] फॉर्मेशन उतना बेटर नहीं हो पाता है।

[09:50:09] असमानताएं बहुत ज्यादा है तो सरकार को कई

[09:50:12] प्रकार की कल्याणकारी योजनाएं लगानी पड़ती

[09:50:14] है। इंफ्रास्ट्रक्चर अभी-अभी हम बना ही

[09:50:16] रहे हैं सड़कों का जाल तो एक बार खर्चा

[09:50:19] होगा ही इसलिए हमारे यहां पर राजकोशीय

[09:50:21] घाटा होता ही है।

[09:50:24] राजकोशीय घाटे का मतलब सरकार के ऊपर

[09:50:26] कर्जों का ज्यादा होना। ये बुरा नहीं है

[09:50:28] लेकिन ये एक समय लिमिट से ज्यादा हो जाए

[09:50:30] तो बुरा है। अगर ये खर्चे इसलिए हो रहे

[09:50:33] हैं क्योंकि सरकार को अपने राजस्व खर्चे

[09:50:35] रेवेन्यू एक्सपेंडिचर करने के लिए सरकार

[09:50:37] को पैसों की जरूरत पड़ रही तो सबसे खतरनाक

[09:50:40] माना जाता है ये।

[09:50:42] हमारे देश में 3% को आइडियल मानते हैं।

[09:50:45] सब्सिडी को तार्किक बनाया जाए। सब्सिडी हर

[09:50:48] जगह ना दी जाए। साथ ही साथ एक प्रकार से

[09:50:50] राजस्व व्यय को कम किया जाए ताकि राजकोषय

[09:50:53] घाटे कम हो। इन अर्थव्यवस्था में टैक्स के

[09:50:56] बेस को बढ़ाया जाए, कर चोरी को रोकने की

[09:50:59] कोशिश की जाए तो इससे रेवेन्यू सरकार का

[09:51:01] बढ़ेगा। कहीं ना कहीं घाटा कम होगा।

[09:51:04] रेवेन्यू डेफिशिट राजस्व प्राप्तियों की

[09:51:06] तुलना में व्यय का ज्यादा होना। तो राजस्व

[09:51:08] व्यय माइनस राजस्व प्राप्तियां रेवेन्यू

[09:51:11] एक्सपेंडिचर माइनस रेवेन्यू रिसीप्ट।

[09:51:14] इफेक्टिव रेवेन्यू रिसीप्ट 2012-13 के बजट

[09:51:17] में आई थी। क्यों? क्योंकि राज्यों और

[09:51:19] यूनियन टेरिटरी को जब अनुदान दिया जाता है

[09:51:21] तो उसमें से कुछ ऐसे अनुदान होते हैं

[09:51:23] जिससे कि कैपिटल का फॉर्मेशन हो गया। तो

[09:51:25] प्रभावी राजस्व घाटे का मतलब होता है कि

[09:51:27] राजस्व घाटे में से वो पैसा हटा दीजिए

[09:51:29] जिसमें से पूंजीगत परिसंपत्तियों का सृजन

[09:51:32] हुआ। यह प्रभावी राजस्व घाटा जीरो ही होना

[09:51:35] चाहिए। प्राइमरी डेफिसिट का मतलब होता है

[09:51:37] कि फिसिकल डेफिशिट जो देनदारियां है उसमें

[09:51:40] से ब्याज का भुगतान कितना करना पड़ा उसको

[09:51:43] छोड़कर इसको निकाल दीजिए जो वर्तमान सरकार

[09:51:45] की जिम्मेदारी दर्शाएगा। 9394 से इसको

[09:51:48] कैलकुलेट करते हैं। आरबीआई से केंद्र

[09:51:51] सरकार द्वारा नई मुद्रा के मुद्रण के

[09:51:53] माध्यम से ली गई उधारी यह सबसे बुरा माना

[09:51:55] जाता है कि नए नोट छापकर कर्जे लिए गए। यह

[09:51:58] बिल्कुल भी अच्छी बात नहीं होती है पूरी

[09:52:00] अर्थव्यवस्था के लिए।

[09:52:02] घाटे की वित्त व्यवस्था को सार्वजनिक ऋण

[09:52:04] नोट नई मृदा के सृजन के माध्यम से बजटीय

[09:52:07] घाटे के वित्त पोषण के रूप में परिभाषित

[09:52:09] करती है। यदि घाटे को हम नए नोट छापकर

[09:52:12] पूरा कर रहे हैं तो सबसे बुरी स्थिति मानी

[09:52:14] जाती है। घाटे की वित्त व्यवस्था। मंदी के

[09:52:16] उपचार में ठीक-ठाक हो सकती है। लेकिन बाकी

[09:52:18] जगह पर बिल्कुल कारगर नहीं होती है।

[09:52:20] सब्सिडी देने के लिए, कुल मांग को बढ़ाने

[09:52:22] के लिए, ब्याज भुगतान के लिए, नए नोट

[09:52:25] छापना बिल्कुल भी ठीक नहीं माना जाता है।

[09:52:27] इससे महंगाई बढ़ सकती है। बचत और निवेश

[09:52:30] बुरी तरह से प्रभावित हो सकते हैं। बैलेंस

[09:52:33] ऑफ पेमेंट क्योंकि फिर आयात ज्यादा करना

[09:52:35] पड़ेगा। महंगाई बढ़ जाएगी तो इसलिए पूरी

[09:52:38] तरह से हर जगह पर यह बुरा माना जाता है।

[09:52:43] बेस्ट होता है कम राजस्व व्यय और उच्च

[09:52:45] पूंजीगत व्यय।

[09:52:48] 202627 में हमारा बजट का कुल आकार मतलब

[09:52:51] सरकार के पास अब कुल 53.5 लाख करोड़ सरकार

[09:52:55] का बजट हो गया है। जिसमें से गैर ऋण

[09:52:58] प्राप्तियां 36 लाख करोड़ की है। गैर ऋण

[09:53:00] प्राप्तियां मतलब एक प्रकार से ऐसी जिसमें

[09:53:03] कर्जे नहीं लिए गए हैं। सरकार ने बेच

[09:53:06] बेचकर चीजों को प्राप्त किया है। व्यय भी

[09:53:08] उतना ही रहेगा। केंद्र की शुद्ध कर

[09:53:11] प्राप्तियां 28.7 लाख करोड़ रही। 2627 में

[09:53:15] जीडीपी का 4.3%

[09:53:17] राजकोशीय घाटा रहने का अनुमान है जो कि

[09:53:20] 2526 में 4.4 था। 2627 में ऋण से जीडीपी

[09:53:24] अनुपात 55.6%

[09:53:27] रहने का अनुमान है। 2526 में ऋण से जीडीपी

[09:53:30] अनुपात 56.1 था तो सुधार की उम्मीदें कर

[09:53:33] रहे हैं। सार्वजनिक पूंजीगत व्यय वित्त

[09:53:36] वर्ष में पब्लिक कैपिटल एक्सपेंडिचर जो कि

[09:53:38] पहले ₹ लाख करोड़ से बढ़कर अब 11.2 लाख

[09:53:42] करोड़ तक हो गया। यह एक अच्छी चीज है जो

[09:53:44] यह स्पष्ट कर रहा है कि सरकार कैपिटल

[09:53:46] फॉर्मेशन पर ज्यादा ध्यान दे रही है।

[09:53:50] उधार और देनदारियों में लगभग 24% पैसा

[09:53:54] मतलब उधार और देनदारियों से आता है। इनकम

[09:53:57] टैक्स और निगम कर दोनों जोड़ देंगे तो

[09:53:59] लगभग 39% पैसा यहीं से आता है। जाता कहां

[09:54:02] पर है? तो राज्यों के करों में हिस्सेदारी

[09:54:04] में 22% अनुदान राज्यों को जाता है और

[09:54:07] ब्याज भुगतान में 20%

[09:54:10] और 17% केंद्र योजनाओं में खर्च होता है।

[09:54:13] राजस्व प्राप्तियां कितनी हुई? इसको लिखने

[09:54:16] की जरूरत नहीं। इसको याद रखने की जरूरत

[09:54:18] नहीं। लेकिन ये आंकड़े ज्यादा जरूरी हैं।

[09:54:20] ये आंकड़े ज्यादा जरूरी हैं।

[09:54:26] बाकी इंडियन इकोनॉमी में हमने बताया बजट

[09:54:28] के बारे में। उसको एक बार पुनः देख

[09:54:30] लीजिएगा। सर्वे को एक बार जरूर देख

[09:54:32] लीजिएगा।

[09:54:34] अब बात कर लेते हैं बैलेंस ऑफ पेमेंट।

[09:54:36] इसलिए पहले करा दे रहा हूं। उसका सबसे

[09:54:38] बड़ा कारण है क्योंकि बैलेंस ऑफ पेमेंट

[09:54:40] में बहुत सी चीजें छूट गई थी। बैलेंस ऑफ

[09:54:43] पेमेंट क्या होता है वो समझते हैं। बैलेंस

[09:54:46] ऑफ पेमेंट हमेशा बैलेंस होगा, जीरो होगा।

[09:54:49] वो भले ही किसी तरीके से जीरो किया जाएगा।

[09:54:52] एक देश का दुनिया भर के सभी देशों के साथ

[09:54:54] कितना वित्तीय लेनदेन हुआ। उसी को हम

[09:54:57] बैलेंस ऑफ पेमेंट के रूप में समझाते हैं।

[09:55:05] किसी देश के निवासियों का विश्व के साथ एक

[09:55:08] निश्चित समय का मौद्रिक लेखाजोखा। एक

[09:55:11] निश्चित समय का मौद्रिक लेखाजोखे का मतलब

[09:55:14] हुआ कि दुनिया भर के देशों के साथ क्या

[09:55:16] खोया, क्या पाया हमने?

[09:55:19] अगर हम अपने देश में दुनिया भर से कितनी

[09:55:23] सामान खरीद रहे, कितना सामान का कीमत उनको

[09:55:26] पे कर रहे हैं, कितना सामान बेच रहे,

[09:55:28] कितना कमाई कर रहे हैं, इसका हिसाब किताब

[09:55:30] [गला साफ़ करने की आवाज़] बैलेंस ऑफ

[09:55:30] पेमेंट है।

[09:55:36] एक देश का विश्व के अन्य देशों के साथ

[09:55:38] वार्षिक आयात निर्यात का विवरण भुगतान

[09:55:41] संतुलन हमेशा संतुलित होता है। मतलब

[09:55:43] परिणाम हमेशा शून्य लाया जाता है।

[09:55:47] किसी देश का भुगतान संतुलन किसका

[09:55:49] व्यवस्थित अभिलेख है? किसी निर्धारित समय

[09:55:51] के दौरान सामान्यतः एक वर्ष में किसी देश

[09:55:54] का समस्त आयात और निर्यात का लेनदेन, किसी

[09:55:57] वर्ष में एक देश का निर्यात की गई

[09:55:59] वस्तुएं, किसी देश की सरकार और दूसरे देश

[09:56:02] की सरकार के बीच का लेनदेन नहीं सरकार

[09:56:04] नहीं पूरे नागरिकों को जोड़ दीजिए। एक देश

[09:56:06] से दूसरे देश का पूंजी का संचलन बल्कि सब

[09:56:09] कुछ कितना आया कितना गया इसको कहते हैं

[09:56:12] बैलेंस ऑफ पेमेंट इसमें दो खाते होते हैं

[09:56:15] करंट अकाउंट और कैपिटल अकाउंट आइए देखते

[09:56:18] हैं भुगतान संतुलन में दो खाते होते हैं

[09:56:21] एक होता है चालू खाता चालू खाते का सिंपल

[09:56:24] सा मतलब ये है जो एक साल के अंतर्गत

[09:56:27] सेटलमेंट हो जाता है इसमें भी दो खाते

[09:56:30] होते हैं चालू खाते में एक साल के अंतर्गत

[09:56:32] सेटलमेंट इसमें भी दो होते हैं दृश्य मदे

[09:56:34] और अदृश्य मदे विजिबल और इनविज़िबल

[09:56:41] मतलब दृश्य मददों का मतलब वस्तुओं का

[09:56:44] कितना आयात हुआ वस्तुओं का कितना निर्यात

[09:56:49] हुआ। इस मामले में हमारी स्थिति बहुत

[09:56:52] अच्छी नहीं है। इस मामले में हम दुनिया भर

[09:56:54] को जितना सामान बेचते हैं, जितनी वस्तु

[09:56:57] सेवाओं को बेच पाते हैं, उससे भी ज्यादा

[09:57:01] बुरी चीज क्या हो जाती है?

[09:57:06] उससे भी ज्यादा हम मंगवा लेते हैं। फिर वह

[09:57:09] पेट्रोल हो सकता है, पोना हो सकता है या

[09:57:13] फिर हम कह सकते हैं कि अन्य ईंधन के साधन

[09:57:16] हो सकते हैं। अन्य तेल खाने का तेल हो

[09:57:19] सकता है। यह हम आयात बड़ी मात्रा में इतना

[09:57:22] करते हैं कि जितना बेच लेते फिर भी कमाई

[09:57:25] नहीं हो पाती है। हम इस दृश्य में इस चालू

[09:57:29] खाते के इस हिस्से में घाटे में ही रहते

[09:57:31] हैं। घाटे में ही रहते हैं। चाइना इस

[09:57:34] हिस्से में बहुत सरप्लस में है और चाइना

[09:57:36] के सरप्लस के कारण हमेशा ही चाइना को

[09:57:40] बैलेंस ऑफ पेमेंट में बड़ा बेनिफिट होता

[09:57:43] है। हमारा इसमें घाटा बहुत बड़ा है। लेकिन

[09:57:47] इनविज़िबल में जितनी सेवाएं हम देते हैं

[09:57:49] जैसे कि आईटी सेक्टर की सेवाएं हम देते

[09:57:52] हैं। जितना भी ब्याज हम लेते देते हैं।

[09:57:54] मतलब जितना ब्याज जाता है जितना ब्याज आता

[09:57:57] है उसको ओवरऑल डिविडेंड लाभांश जितना

[09:58:00] लाभांश यहां से जाता है विदेशी कंपनियों

[09:58:03] को और भारतीय कंपनियों का आता है और

[09:58:05] अनुदान इस मामले में हम फिर भी ठीक-ठाक

[09:58:08] है। बहुत ज्यादा ठीक-ठाक नहीं है। इतने

[09:58:11] ठीक-ठाक नहीं कि इस घाटे को कंप्लीट कर

[09:58:13] सके। तब भी रिजल्टेड करंट खाते में हमारा

[09:58:17] घाटा चल रहा है। पॉइंट टू बी नोटेड

[09:58:21] हमारा देश बैलेंस ऑफ पेमेंट का जो चालू

[09:58:25] खाता है उसमें घाटे में रहता है। खास करके

[09:58:29] दृश्य मधु में हमारा इंपोर्ट बहुत ज्यादा

[09:58:33] और एक्सपोर्ट उतना नहीं है। इतना बड़ा

[09:58:37] घाटा हम झेलते हैं कि हम इसमें थोड़े बहुत

[09:58:39] सरप्लस में होने के बावजूद भी कोई बहुत

[09:58:42] बड़ा बेनिफिट नहीं उठा पाते हैं।

[09:58:46] दूसरा होता है पूंजी खाता। दूसरा होता है

[09:58:50] पूंजी खाता। विदेशी ऋण प्रत्यक्ष विदेशी

[09:58:54] निवेश मतलब एक्सटर्नल डेप्ट का मतलब

[09:58:56] विदेशी ऋण का मतलब आप क्या कहेंगे? विदेशी

[09:58:59] ऋण। विदेशी ऋण मतलब हमने जितना दिया जितना

[09:59:02] लिया काहे कहीं से फॉरेन डायरेक्ट

[09:59:05] इन्वेस्टमेंट एनआरआई डिपॉजिट जो भी विदेश

[09:59:08] में हमारे देश के लोग गए हैं और हमारे देश

[09:59:10] की जितनी भी प्रॉपर्टीज जिससे भी जो भी

[09:59:13] कमाई होती होगी तो ये सब कैपिटल अकाउंट

[09:59:16] में आता है और इसमें हम सरप्लस में हैं।

[09:59:18] लेकिन ये सरप्लस अच्छा नहीं है। ध्यान से

[09:59:20] सुनना मेरी बात।

[09:59:23] हम अपने

[09:59:26] दृश्य खाते के घाटे को इन सब की मदद से

[09:59:29] पूरा करते हैं। अगर कोई देश

[09:59:33] अपने दृश्य खाते को दृश्य खाते के घाटे को

[09:59:38] पूरा करने के लिए

[09:59:40] इस तरीके के विदेशी ऋण का सहारा लेता है

[09:59:44] तो उसे कहते हैं कि बैलेंस ऑफ पेमेंट का

[09:59:47] संकट आ गया इस देश में। तो इसे कहते हैं

[09:59:50] कि बैलेंस ऑफ पेमेंट का संकट आ गया इस देश

[09:59:54] में तो लेकिन यदि हम एफडीआई की मदद से उसे

[09:59:57] संतुलित कर देते हैं तो इसे कहते हैं कि

[10:00:00] बैलेंस ऑफ पेमेंट भले ही खराब स्थिति में

[10:00:03] है लेकिन फिर भी नियंत्रित है क्योंकि

[10:00:06] इतना एफडीआई हम ला लेकर आ जा रहे हैं कि

[10:00:09] फाइनली सबको संतुलित कर रहा है। भारत अभी

[10:00:12] इस स्थिति में है। 1991 में भारत इस

[10:00:15] स्थिति में पहुंच गया था। हम चाहते हैं कि

[10:00:18] हम प्लस में आ जाए। हमारे देश से ज्यादा

[10:00:21] पैसा भले ही जा रहा हो लेकिन उससे ज्यादा

[10:00:24] पैसा देश के अंदर आना चाहिए। जैसे चाइना

[10:00:26] की स्थिति है।

[10:00:29] कौन-कौन से कैपिटल अकाउंट में आते हैं?

[10:00:31] कौन-कौन से कैपिटल अकाउंट में आएंगे? तो

[10:00:33] विदेशों से लिया गया ऋण प्रत्यक्ष विदेशी

[10:00:36] निवेश जो रिमिटेंस दिया जाता है और जो

[10:00:39] पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट होता है याद

[10:00:41] रखिएगा कि कैपिटल अकाउंट की जब भी हम

[10:00:44] बातचीत करते हैं एनआरआई का एनआरआई के

[10:00:46] द्वारा जो डिपॉजिट किए जाते हैं लेकिन जो

[10:00:49] एनआरआई के द्वारा याद रखिएगा कि जो

[10:00:52] रिमिटेंस आता है एनआरआई के द्वारा जो

[10:00:54] रिमिटेंस आता है वो वास्तविक रूप में चालू

[10:00:58] खाते में आ जाता है रिमिटेंस जो उन्होंने

[10:01:01] अपने रिश्तेदारों को पैसा भेजा होता है

[10:01:03] क्योंकि वह एक प्रकार से हम कह सकते हैं

[10:01:05] कि उनका जमा नहीं है बल्कि वह रिश्तेदारों

[10:01:07] तक पहुंच जाता है। तो 124 कैपिटल में आएगा

[10:01:11] जबकि रिमिटेंस वास्तविक रूप में चालू खाते

[10:01:14] का हिस्सा बन जाता है। ये सब के सब एक

[10:01:17] प्रकार से कैपिटल अकाउंट का हिस्सा बन

[10:01:19] जाते हैं। भुगतान संतुलन के संदर्भ में

[10:01:23] निम्नलिखित में से कौन से चालू खाते में

[10:01:25] आएंगे? तो व्यापार संतुलन आयात निर्यात

[10:01:28] विदेशी परिसंपत्तियां इसमें बिल्कुल भी

[10:01:30] नहीं आएगी।

[10:01:32] चालू खाते में नहीं आएगी। अदृश्य संतुलन

[10:01:36] बिल्कुल यह आएगा और स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स

[10:01:39] जो आईएमएफ ने हमें दिए हुए हैं वो कैपिटल

[10:01:42] अकाउंट में आते हैं। तो आंसर आएगा पहला और

[10:01:45] तीसरा।

[10:01:47] तो बैलेंस ऑफ ट्रेड का मतलब होता है दो

[10:01:50] खाते। एक होता है चालू खाता, एक होता है

[10:01:52] कैपिटल अकाउंट। चालू खाते में वस्तुओं का,

[10:01:55] सर्विसेज का और ट्रांसफर ऑफ पेमेंट्स को

[10:01:57] शामिल किया जाता है। और कैपिटल अकाउंट की

[10:02:00] जब हम बात करेंगे तो एफडीआई, एफपीआई,

[10:02:03] एक्सटर्नल जो कर्जे लिए होते हैं, जो

[10:02:05] डिपॉजिट आते हैं या अन्य तरीके से जो पैसा

[10:02:08] आता है। चालू खाता दृश्य चालू खाता

[10:02:11] व्यापार खाते के नाम से जाना जाता है। इसे

[10:02:13] व्यापार इंपोर्ट एक्सपोर्ट को व्यापार

[10:02:15] खाता कहते हैं। इससे कोई देनदारियां नहीं

[10:02:18] बढ़ती। चालू खाते के अंतर्गत मुख्यत तीन

[10:02:20] प्रकार के लेनदेन होते हैं। पहला वस्तु और

[10:02:22] सेवाओं का आयात निर्यात। दूसरा कर्मचारी

[10:02:25] और विदेशी निवेश से प्राप्त आय खर्च।

[10:02:28] तीसरा विदेशों से प्राप्त अनुदान राशि या

[10:02:30] हमारे जो भी विदेशों में रिश्तेदार थे

[10:02:33] उनसे मिलने वाला जितना भी रिमिटेंस है सब

[10:02:35] हम उसी के अंतर्गत शामिल करते हैं।

[10:02:40] इसमें देश के निवासियों द्वारा किसी वित्त

[10:02:42] वर्ष में शेष विश्व के साथ किए गए वस्तु

[10:02:45] सेवाओं के लेनदेन उसकी आय सम्मिलित होती

[10:02:47] है। चालू खाता बैलेंस अगर हम देखें तो

[10:02:50] हमारा इसमें घाटा चल रहा है और उसमें

[10:02:53] अदृश्य वाले में हम सरप्लस में हैं। केवल

[10:02:55] भौतिक वस्तु दृश्य मदों के आयात निर्यात

[10:02:58] के मूल्य के मध्य अंतर को व्यापार शेष कहा

[10:03:00] जाता है। बैलेंस ऑफ ट्रेड कहते हैं

[10:03:03] वस्तुओं के आयात निर्यात को। आईएमएफ के

[10:03:05] अनुसार आयात निर्यात के मूल्य की गणना

[10:03:07] फ्री ऑन बोर्ड व्यवस्था के आधार पर की

[10:03:10] जानी चाहिए। किंतु भारत में आंकड़ों की

[10:03:12] सटीकता के अभाव के कारण आयात मूल्य की

[10:03:14] गणना सीआईएफ अर्थात कॉस्ट इंश्योरेंस और

[10:03:18] माल के ढुलाई भाड़े के आधार पर की जाती

[10:03:21] है।

[10:03:23] निर्यात मूल्य की गणना फ्री ऑफ बोर्ड के

[10:03:26] आधार पर की जाती है। तो आयात हम कॉस्ट

[10:03:28] इंश्योरेंस और फ्रेट के आधार पर करते हैं।

[10:03:35] हमारे देश में जो चालू खाता है उस चालू

[10:03:38] खाते के लिए रुपए की पूरी परिवर्तनीयता दे

[10:03:41] दी गई है। जितना भी रुपया डॉलर में बदलना

[10:03:43] है सबकी अनुमति है। लेकिन जो कैपिटल

[10:03:46] अकाउंट होता है जिसमें एफडीआई की बातचीत

[10:03:49] आती है। अभी वहां पर 100% की अनुमति सब

[10:03:51] जगह नहीं दी गई है।

[10:03:56] भारत के बैलेंस ऑफ पेमेंट प्रणाली में 13

[10:03:59] मधुों में सम्मिलित सेवाएं हैं। ट्रेवलिंग

[10:04:02] करना, परिवहन करना। इसलिए सरकार ने कहा

[10:04:04] होगा कि अंतर अंतरराष्ट्रीय यात्राएं जो

[10:04:07] जरूरत की ना हो कम करिए।

[10:04:17] तो हमारे देश में सबसे बुरी स्थिति है कि

[10:04:19] हम चालू खाते के घाटा में हैं। चालू खाते

[10:04:22] में और करंट अकाउंट में कैपिटल अकाउंट में

[10:04:25] हम सरप्लस में हैं।

[10:04:30] वित्त प्रेषण रिमिटेंस वह धन है जो किसी

[10:04:33] अन्य पार्टी के द्वारा दूसरे देश में बैठे

[10:04:35] हुए किसी [गला साफ़ करने की आवाज़]

[10:04:36] भारतीयों को भेजा जाता है। जो रिश्तेदार

[10:04:38] भेजते हैं। भारत विश्व का सबसे ज्यादा

[10:04:40] रिमिटेंस प्राप्त करने वाला देश है जो

[10:04:43] 134.4

[10:04:46] मिलियन अमेरिकी डॉलर बिलियन अमेरिकी डॉलर

[10:04:48] तक पहुंच चुका है। बिलियन अमेरिकी डॉलर तक

[10:04:53] रंगराजन समिति 1993 के अनुसार जीडीपी का

[10:04:57] 2% होना चाहिए। करंट अकाउंट डेफिशिएट।

[10:05:00] हमारे देश में चालू खाते का जो घाटा होता

[10:05:03] है वह हमारे जीडीपी के 2% से ज्यादा नहीं

[10:05:06] होना चाहिए। आरबीआई और सरकार के अनुसार 3%

[10:05:10] तक संभाला जा सकता है। वाईवी रेड्डी के

[10:05:13] अनुसार भारत को 0% सीएडी का लक्ष्य रखना

[10:05:16] चाहिए क्योंकि ऐसा करना से किसी भी प्रकार

[10:05:18] के घाटे से उभरा जा सकता है। लेकिन यह

[10:05:20] बहुत मुश्किल है भारत के लिए तभी संभव

[10:05:22] होगा जब हमारे देश के लोग ज्यादा से

[10:05:25] ज्यादा निर्यात करेंगे और कम से कम आयात

[10:05:27] करेंगे। ऐसा खाता जिसमें पैसों के लेनदेन

[10:05:30] से देनदारी घटिया या बढ़ती है। इसमें

[10:05:32] विदेशी ऋण प्रत्यक्ष विदेशी निवेश एनआरआई

[10:05:34] जमाएं विदेशी प्रॉपर्टीज आती है। भारत

[10:05:37] इसमें अच्छी स्थिति में है। लेकिन भारत की

[10:05:39] स्थिति अच्छी होने का कारण एफडीआई है।

[10:05:41] देखो एफडीआई बुरी चीज नहीं है। लेकिन आप

[10:05:44] यह मत भूलिए कि जितना एफडीआई आएगा उतनी ही

[10:05:47] वो कंपनियां भारत में विदेशी लोग खोलेंगे।

[10:05:50] उतना मुनाफा वो लेकर जाएगा तो कहीं ना

[10:05:52] कहीं नुकसान तो होगा ही। साथ ही साथ वो

[10:05:54] कभी भी जा सकता है। जब देश में माहौल खराब

[10:05:57] होगा वो इमीडिएटली भाग जाएगा। यह कभी भी

[10:06:00] जा सकता है। साथ ही साथ एक बड़ी प्रॉब्लम

[10:06:02] यह है कि यह तभी काम का होगा जब हमारे देश

[10:06:06] के लोग स्किल्ड होंगे। उससे सीखेंगे और

[10:06:08] कुछ नया अपना उद्योग धंधा डालेंगे।

[10:06:12] लेकिन देश के लोग अगर स्किल्ड नहीं हुए तो

[10:06:14] इसका कोई लाभ हमें मिल नहीं पाता। इसलिए

[10:06:16] एफडीआई पर निर्भर रहना बुरा नहीं है पर

[10:06:19] केवल एफडीआई पर निर्भर रहना खतरनाक हो

[10:06:21] सकता है। इसलिए कोशिश करिए कि देश के

[10:06:24] लोगों का द्वारा ही चीजों का निर्माण किया

[10:06:26] जाए।

[10:06:30] पूंजी खाता शेष बैलेंस विदेशी फॉरेन

[10:06:33] इन्वेस्टमेंट कर्जे या फिर बैंक कैपिटल हम

[10:06:36] फॉरेन इन्वेस्टमेंट की अगर बात करें तो

[10:06:38] फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट और

[10:06:40] पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट दोनों आते हैं।

[10:06:42] फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट का मतलब होता

[10:06:44] है देखो वास्तविक रूप में डायरेक्ट

[10:06:46] इन्वेस्टमेंट जब मैं शब्द यूज करता हूं

[10:06:48] इसका सीधा सा मतलब है कि अगर कोई विदेश का

[10:06:51] व्यक्ति ऐसे पैसे डाल रहा है जिससे देश

[10:06:53] में रोजगार बढ़ने लग जाए जिससे कि देश के

[10:06:56] अंदर एक प्रकार से एंप्लॉयमेंट का सृजन

[10:06:59] होने लग जाए तो रियल में वो फॉरेन

[10:07:01] डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट है जो अर्थव्यवस्था

[10:07:04] के रियल सेक्टर को प्रभावित करता है। पर

[10:07:06] जो फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट होते

[10:07:08] हैं उससे कोई रोजगार नहीं बढ़ते हैं बल्कि

[10:07:10] वह केवल मोनेटाइज सेक्टर को प्रभावित करता

[10:07:13] है। कीमतों को बढ़ाने की काम करता है। वह

[10:07:15] उतने अच्छा नहीं माना जाता। इससे शेष

[10:07:18] विश्व में परिसंपत्ति की खरीदारी का बोध

[10:07:20] होता है। जिससे संपत्ति पर नियंत्रण

[10:07:22] प्राप्त होता है। अमेरिका में Reliance

[10:07:24] द्वारा कंपनी खरीदना या मायाराम समिति की

[10:07:26] अनुशंसा के अनुसार एफडीआई की निम्नलिखित

[10:07:28] परिभाषा है। यदि किसी लिस्टेड कंपनी में

[10:07:31] प्रदत इक्विटी पूंजी जारी होने के बाद

[10:07:33] विदेशी निवेश कंपनी में 10% या उससे अधिक

[10:07:36] हिस्सा लिया होता है तो उसे एफडीआई माना

[10:07:39] जाए।

[10:07:40] वही किसी गैर सूचीबद्ध कंपनी में किसी भी

[10:07:43] सीमा तक भले ही वह प्रदत पूंजी का एक या

[10:07:45] 2% हो एफडीआई निवेश माना जाएगा। लिस्टेड

[10:07:48] है तो 10% के ऊपर वाली चीज अनलिस्टेड है

[10:07:51] तो कितना भी हो जाए फिर वो एफडीआई माना

[10:07:53] जाएगा। कोई निवेश एफडीआई है या

[10:07:55] पोर्टफोलियो निवेश या निवेश के प्रतिशत से

[10:07:57] निर्धारित होता है। यदि किसी सूचीबद्ध

[10:07:59] कंपनी में 10% से कम है तो उसको

[10:08:01] पोर्टफोलियो निवेश कहते हैं। लेकिन याद

[10:08:04] रखना मैं जो परिभाषा बता रहा हूं वो ध्यान

[10:08:06] दीजिएगा। यह पूछा जा सकता है। डायरेक्ट

[10:08:09] इन्वेस्टमेंट ऐसे इन्वेस्टमेंट को कहते

[10:08:11] हैं जिससे देश के वास्तविक सेक्टर में ना

[10:08:15] केवल उत्पादन बढ़ता है बल्कि रोजगार में

[10:08:19] वृद्धि होती है। और जो पोर्टफोलियो

[10:08:21] इन्वेस्टमेंट होते हैं उसमें कोई ऐसे

[10:08:23] बदलाव नहीं आते हैं। फिर इन्वेस्टमेंट भी

[10:08:25] दो तरीके का होता है। ब्राउन फील्ड

[10:08:27] इन्वेस्टमेंट। अगर कोई विदेशी कंपनी हमारे

[10:08:30] देश की कोई पुरानी कंपनी को खरीद कर बस

[10:08:33] मालिक बदल रहा है तो इसको ब्राउन फील्ड

[10:08:35] इन्वेस्टमेंट कहते हैं। पुरानी चीज का नए

[10:08:38] तरीके से प्रस्तुतीकरण ब्राउन फील्ड

[10:08:40] कहलाता है। पर अगर कोई नई चीज का निर्माण

[10:08:42] किया जा रहा है तो उसको कहते हैं ग्रीन

[10:08:44] फील्ड इन्वेस्टमेंट। यह निवेश तब होता है

[10:08:46] जब बहुराष्ट्रीय कंपनी विदेश में नए

[10:08:48] कारखाने या नए स्टोर खोलती है। ब्राउन

[10:08:51] फील्ड के ठीक विपरीत सब कुछ नया रहेगा।

[10:08:55] ग्रीन फील्ड इन्वेस्टमेंट ज्यादा बेटर

[10:08:57] माना जाता है। भारत में एफडीआई दो तरीकों

[10:09:00] से आ सकता है। एक तो आरबीआई की अनुमति से

[10:09:02] जब आता है तो उसको ऑटोमेटिक रूट कहते हैं।

[10:09:04] और एक एक जब दिल्ली के रूट से आता है

[10:09:07] वित्त मंत्रालय की अनुमति लेकर आता है तो

[10:09:09] उसको स एक प्रकार से सरकारी रूट कहते हैं।

[10:09:12] स्वचलित मार्ग। इसके लिए सरकार या आरबीआई

[10:09:14] की अनुमति पहले नहीं लेनी पड़ती किंतु

[10:09:16] आरबीआई से प्रत्यक्ष अनुमति लेनी पड़ती

[10:09:19] है। मतलब पहले आरबीआई से अनुमति लेनी

[10:09:22] पड़ती है। सरकार से अनुमति नहीं लेनी

[10:09:24] पड़ती। उल्लेख भारत सरकार द्वारा समय-समय

[10:09:27] पर बताया जाता है कि इसमें कितने प्रतिशत

[10:09:29] तक वह अनु एक प्रकार से एफडीआई ले सकते

[10:09:32] हैं। जैसे इंश्योरेंस पहले 74% तक एफडीआई

[10:09:36] यहां पर था। अब 100% कर दिया गया। उन

[10:09:38] गतिविधियों के लिए भारत सरकार से अनुमति

[10:09:40] लेनी पड़ती है जहां ऑटोमेटिक मार्ग से

[10:09:42] ज्यादा पैसा बहुत बड़े अमाउंट में पैसा आ

[10:09:45] रहा हो। 2000 करोड़, 5000 करोड़ तब सरकारी

[10:09:48] मार्ग की ओर रुख लेना पड़ता है। पहले

[10:09:50] विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड को इसकी

[10:09:52] देखरेख की जिम्मेदारी दी गई थी। फॉरेन

[10:09:54] इन्वेस्टमेंट प्रमोशनल बोर्ड यह सब कुछ

[10:09:56] देखता था। 2017 में इस बोर्ड को खत्म कर

[10:09:59] दिया। इस बोर्ड को समाप्त करने से भारत

[10:10:01] में एफडीआई आने का मार्ग और सरल हो गया।

[10:10:03] ऐसा कहा गया। भारतीय कंपनी को भले ही

[10:10:05] स्वचालित या सरकारी मार्ग जिस प्रकार से

[10:10:07] भी एफडीआई प्राप्त हो रहा हो किंतु उसे

[10:10:09] एफडीआई नीति के प्रावधानों का पालन करना

[10:10:11] पड़ता है।

[10:10:14] भारत में एफडीआई लॉटरी सेक्टर में अभी भी

[10:10:16] नहीं है। जुआ सट्टेबाजी में अभी भी नहीं

[10:10:18] है। चिट फंड में अभी भी नहीं है। किसी

[10:10:20] प्रकार की निधि कंपनियों में नहीं है। या

[10:10:23] फिर ट्रांसफर ट्रेडिंग एंड ट्रांसफरेबल

[10:10:25] डेवलपमेंट राइट्स में नहीं है। सिगड़

[10:10:27] सिगरेट तंबाकू इन चीजों में नहीं है।

[10:10:30] परमाणु ऊर्जा में अब आ गया है। परमाणु

[10:10:32] ऊर्जा में अब आ गया। इसी साल अगर आपको याद

[10:10:35] हो शांति विधेयक पारित किया गया है। शांति

[10:10:37] विधेयक अब इसमें एफडीआई आ गया है। इसी साल

[10:10:41] शांति विधेयक के माध्यम से इसको लाया गया

[10:10:43] है।

[10:10:48] जब राज्य सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना

[10:10:51] जैसे सड़क को चौड़ा करना, मेट्रो रेल आदि

[10:10:53] के विकास के लिए भूमि का अधिग्रह करती है

[10:10:55] तो करती है तो मुआवजा नहीं देती। ऐसी

[10:10:58] सिचुएशन में कोई एफडीआई की अनुमति नहीं दी

[10:11:00] गई है।

[10:11:04] मुआवजे के बदले सरकार द्वारा भूमि मालिक

[10:11:07] को एक विकास अधिकार प्रमाण पत्र जारी किया

[10:11:09] जाता है। भूमि मालिक को उसके अधिकृत भूमि

[10:11:11] के बदले में एक अतिरिक्त निर्मित क्षेत्र

[10:11:13] मिल जाता है। मतलब मुआवजे की जगह कुछ

[10:11:15] चीजें दी जाती है। पर इसमें अभी एफडीआई की

[10:11:17] अनुमति नहीं दी गई है। फिर है फॉरेन

[10:11:19] पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट। ये लोग सीधा

[10:11:21] शेयर मार्केट में इन्वेस्टमेंट करते हैं।

[10:11:23] पहले हमारे देश में शेयर मार्केट में किसी

[10:11:25] भी फॉरेनर को इन्वेस्टमेंट करने की अनुमति

[10:11:27] थी। पता चला बाद में कि इसमें तो

[10:11:29] आतंकवादियों का पैसा लगा हुआ है जो हमारे

[10:11:32] शेयर मार्केट को से कमाई भी कर रहे हैं और

[10:11:34] हम ही को नुकसान पहुंचा रहे हैं। तो फिर

[10:11:36] इस पर भी हमने कई प्रकार के रेस्ट्रिक्शन

[10:11:38] लगा दिए। पोर्टफोलियो निवेश का अर्थ होता

[10:11:40] है विश्व के शेष भागों में परिसंपत्तियों

[10:11:42] की खरीदारी करना परंतु उस पर नियंत्रण

[10:11:44] नहीं होता है। मतलब एक प्रकार से वह कंपनी

[10:11:47] में कोई इंटरफेयर नहीं करते। बस शेयर

[10:11:49] मार्केट से खरीद कमाई को बढ़ा देते हैं।

[10:11:54] Reliance द्वारा किसी विदेशी कंपनी के कुछ

[10:11:56] शेयर खरीदना या किसी व्यक्ति द्वारा

[10:11:58] खरीदना निवेश किस माध्यम का आसानी से

[10:12:00] व्यापार किया जा सकता है। पोर्टफोलियो

[10:12:02] निवेश को अब दो श्रेणी में बांटते हैं। एक

[10:12:04] तो फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टमेंट है।

[10:12:07] जब से मोदी जी ने यह कहा है कि कम सोना

[10:12:09] खरीदिए। पेट्रोल डीजल कम खर्च करिए।

[10:12:14] शेयर मार्केट से फॉरेन इंस्टीट्यूशनल

[10:12:17] इन्वेस्टमेंट ऐसे भाग रहे हैं जैसे डूबती

[10:12:20] जहाज से पक्षी उड़ जाते हैं। बड़े तेजी से

[10:12:24] उन्होंने भारत के शेयर बेचना शुरू कर दिए।

[10:12:26] जैसे कि भयानक संकट आने वाला है। तो फॉरेन

[10:12:30] इन्वेस्टमेंट इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टमेंट

[10:12:32] जैसे ये विदेश में जो बैंकें होती हैं

[10:12:35] विदेश में जो इंस्टीट्यूशन होते हैं उनके

[10:12:38] माध्यम से वहां के नागरिक हमारे देश के

[10:12:41] शेयर मार्केट में खरीददारी कर सकते हैं।

[10:12:44] तो उन्हें कहते हैं एफआईआई।

[10:12:46] इसके अलावा डिपॉजिटरी रिसीप्ट के माध्यम

[10:12:49] से इन्वेस्टमेंट किया जा सकता है। अमेरिका

[10:12:51] का व्यक्ति अमेरिकन डिपॉजिटरी रिसीप्ट,

[10:12:54] ग्लोबल डिपॉजिटरी रिसीप्ट, इंडियन

[10:12:55] डिपॉजिटरी रिसीप्ट के माध्यम से एफआईआई

[10:12:59] इसे विदेशी व्यक्ति या विदेशी संस्थागत

[10:13:01] निवेशक द्वारा अन्य राष्ट्र की कंपनी में

[10:13:03] इन्वेस्टमेंट किया जाता है। एफआईआई

[10:13:06] लघुकालीन प्रकृति के होते हैं। हॉट मनी

[10:13:08] होता है। जहां ज्यादा लाभ मिलेगा वहां चले

[10:13:10] आते हैं। भारत में एफआईआई को सेबी के

[10:13:12] द्वारा रेगुलेट किया जाता है और कहीं ना

[10:13:15] कहीं सेबी देखता है कि एफआईआई सही है या

[10:13:17] गलत है। फिर आती है डिपॉजिटरी रिसीप्ट के

[10:13:20] माध्यम से कई अन्य देश के लोग भी रिसीप्ट

[10:13:23] मतलब एक प्रकार से डिपॉजिशन कर सकते हैं।

[10:13:27] इसको कहते हैं एक प्रकार से ग्लोबल

[10:13:29] डिपॉजिटरी रिसीप्ट, अमेरिकन डिपॉजिटरी

[10:13:31] रिसीप्ट या इंडियन डिपॉजिटरी रिसीप्ट।

[10:13:34] देखो सिंपल सी बातचीत मैं बता दे रहा हूं।

[10:13:36] मतलब मान लीजिए कि मैं नई कंपनी खोलना

[10:13:39] चाहता हूं। वापिस एग्जांपल 100 करोड़ की

[10:13:41] मैं एक स्कूल डालना चाहता हूं। पूरे

[10:13:43] ब्रांचेस डालना चाहता हूं। मैंने भारत में

[10:13:46] निवेश मैंने भारत में निवेश के लिए बातचीत

[10:13:49] कही कि शेयर मैं बेच दूंगा लेकिन भारत में

[10:13:51] मेरे शेयर किसी ने नहीं खरीदे। तो मैं

[10:13:54] अमेरिका के मार्केट में गया और अमेरिका के

[10:13:56] मार्केट में मुझे उम्मीद थी कि लोग मुझ पर

[10:13:59] यकीन करेंगे। तो अमेरिका के लोग मेरी

[10:14:02] कंपनी में अमेरिकन डिपॉजिटरी रिसीप्ट खरीद

[10:14:05] कर इन्वेस्टमेंट खरीद कर सकते हैं। तो जब

[10:14:08] अमेरिका का व्यक्ति भारत के किसी कंपनी

[10:14:11] में इन्वेस्टमेंट करना चाहता है। ये

[10:14:13] इन्वेस्टमेंट शेयर नहीं है। मैं अभी नए-नए

[10:14:16] शेयर जारी कर रहा हूं तब वो खरीदना चाहते

[10:14:18] हैं तो ये अमेरिकन डिपॉजिट रिसीप्ट है।

[10:14:21] अगर मेरी कंपनी जिस दिन लिस्टेड हो जाएगी

[10:14:23] उस दिन तो वह अलग तरीके से स्टॉक एक्सचेंज

[10:14:25] से खरीदेंगे। यहां कोई स्टॉक एक्सचेंज

[10:14:28] नहीं है। बस मैंने भरोसा दिलाया है और

[10:14:30] यहां की कोई अमेरिकन बैंक है जिसने मेरी

[10:14:32] मदद की है। वो अमेरिकन बैंक वो अमेरिकन

[10:14:35] डिपॉजिटरी रिसीप्ट बेचेगी और उसके एवज में

[10:14:38] अमेरिका का डॉलर मेरे पास आना शुरू हो

[10:14:40] जाएगा।

[10:14:42] यही अगर मैं अपना शेयर निकाल दूं मतलब अभी

[10:14:44] नई-नई कंपनी बना रहा हूं। यूरोप में अगर

[10:14:47] जाऊंगा तो उसको कहेंगे ग्लोबल डिपॉजिटरी

[10:14:49] रिसीप्ट। सेम तरीके से अगर कोई अमेरिका की

[10:14:52] कंपनी, यूरोप की कंपनी भारतीयों का भरोसा

[10:14:55] जीतना चाहती है कि भ आप मेरे कंपनी में

[10:14:58] इन्वेस्टमेंट करो तो वो इंडियन डिपॉजिटरी

[10:15:00] रिसीप्ट के तहत प्राप्त कर पाएंगे इन

[10:15:03] चीजों को।

[10:15:05] राइट इशू कंपनी जब अपने ही पूंजी जुटाने

[10:15:09] के माध्यम से अपने मौजूदा शेयर धारकों को

[10:15:11] एक्स्ट्रा शेयर देती है तो इसको राइट इशू

[10:15:13] कहते हैं।

[10:15:16] फिर कर्जों के रूप में एक्सटर्नल कमर्शियल

[10:15:19] बोरोइंग होता है। एक्सटर्नल असिस्टेंट

[10:15:21] होता है। ट्रेड क्रेडिट होता है। ईसीबी

[10:15:24] अंतरराष्ट्रीय बाजार से लिया जाने वाला

[10:15:27] कमर्शियल लोन होता है। ईसीबी कौन ले सकता

[10:15:29] है? एफडीआई प्राप्त करने के पात्र सभी

[10:15:32] संस्थाएं ईसीबी ले सकती है। जैसे हमारे

[10:15:34] देश में कोई कंपनी जो एफडीआई के तहत पैसा

[10:15:37] प्राप्त कर सकती थी वह भी बाहर से कर्जे

[10:15:39] ले सकती है।

[10:15:43] इनको अनुमति लेनी पड़ती है एक्सिम बैंक की

[10:15:46] सिडबी बैंक की। भारत के लिए एक्सिम बैंक

[10:15:48] को भी ईसीबी लेने की अनुमति है। ईसीबी की

[10:15:50] परिपक्वता अवधि 3 वर्ष तक हो सकती है। कुछ

[10:15:53] मामलों में छूट भी मिल सकती है। यह ऋण

[10:15:55] सहायता की दृष्टि से दिए जाते हैं। इनकी

[10:15:57] ब्याज दर कम होती है। मैच्योरिटी अवधि भी

[10:15:59] ज्यादा होती है। हमारे देश को कई बार

[10:16:02] वर्ल्ड बैंक देश को यह कंपनियों को मिलता

[10:16:05] है। ये हमारे देश को कई बार वर्ल्ड बैंक

[10:16:07] आईएमएफ ऋण देता है। कुछ अन्य देशों की

[10:16:10] सरकारें ऋण देती है। बटरल ऋण हम लेना पसंद

[10:16:13] नहीं करते क्योंकि बटरल ऋण जब लेते हैं ना

[10:16:15] तो कई सारी शर्तें वो देश हम पर लगा सकता

[10:16:18] है। हमारी संप्रभुता का हनन हो सकता है।

[10:16:23] और व्यापार ऋण किसी आयातक को विदेशी

[10:16:25] आपूर्ति बैंक, वित्तीय संस्थान और अन्य

[10:16:28] अनुमति प्राप्त मा उधारकर्ताओं के द्वारा

[10:16:30] दिए जाते हैं। मतलब व्यापार करने के लिए

[10:16:32] इंपोर्ट एक्सपोर्ट के लिए जो ऋण होता है।

[10:16:37] बैंकिंग कैपिटल ट्रांजैक्शन या विदेशी

[10:16:40] मुद्रा के अधिकृत डीलर के रूप में सेवा

[10:16:42] देने वाले वाणिज्यिक बैंक अन्य सहकारी

[10:16:44] बैंकों की बाह्य वित्तीय परिसंपत्त यां

[10:16:46] देनदारी संबंधित लेने में लेनदेन करने में

[10:16:50] मदद करते हैं। एनआरआई डिपॉजिट इसके

[10:16:51] अंतर्गत शामिल किए जाते हैं। इसमें कई

[10:16:54] प्रकार के खाते खोले जाते हैं विदेशी

[10:16:56] बैंकों में जो हमारे बैंकों के साथ टाई अप

[10:16:58] करते चलते हैं।

[10:17:14] क्रेडिट आइटम का मतलब होता है हमने जो

[10:17:16] निर्यात किया है, जो कमाई प्राप्त की है,

[10:17:18] जो पैसा हमें मिला है, और डेबिट का मतलब

[10:17:22] होता है जो आयात किया हमने, जो पैसा

[10:17:24] उन्हें पे किया है,

[10:17:28] बैलेंस ऑफ पेमेंट फाइनली जीरो आएगा। याद

[10:17:30] रखिएगा क्योंकि हमारा चालू खाता घाटे में

[10:17:33] है। पूंजी खाते में हम सरप्लस में हैं।

[10:17:35] फाइनली ज़ीरो आता है। जीरो लाने के लिए हम

[10:17:38] क्या कर रहे हैं उसके अकॉर्डिंग देखा

[10:17:39] जाएगा। यदि हम जीरो लाने के लिए कर्जे ले

[10:17:42] रहे हैं तो यह संकट की स्थिति है। जीरो

[10:17:45] लाने के लिए एफडीआई बढ़ा रहे हैं तो

[10:17:47] नियंत्रित स्थिति है। और अच्छी स्थिति कब

[10:17:49] है? जब हम इस जीरो की जगह पर मतलब ज़ीरो

[10:17:53] लाने के लिए हम उधार दे रहे किसी को उधार

[10:17:56] देकर ज़ीरो ला रहे हैं। तो यह सरप्लस की

[10:17:58] स्थिति मानी जाती है। यदि चालू खाता

[10:18:01] सकारात्मक और पूंजी खाता नकारात्मक

[10:18:03] नकारात्मक स्थिति में हो तो यह

[10:18:05] अर्थव्यवस्था के लिए अनुकूल स्थिति होती

[10:18:07] है। इससे हमारे देश के लोग धनी होंगे। यदि

[10:18:10] चालू खाता नकारात्मक पूंजी खाता सकारात्मक

[10:18:13] स्थिति में हो तो इसको प्रतिकूल स्थिति

[10:18:15] कहते हैं। हालांकि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश

[10:18:18] और एनआरआई जमाओं द्वारा यह संतुलित हो जाए

[10:18:20] तो इसको प्रतिकूल होकर भी नियंत्रित कहते

[10:18:22] हैं। यदि भुगतान संतुलन को संतुलित करने

[10:18:25] के लिए ऋण लेना पड़े तो इस भुगतान संतुलन

[10:18:28] संकट कहते हैं। भारत 1991 में ऐसी स्थिति

[10:18:31] में पहुंचा था। हम नहीं चाहते कि ऐसा कभी

[10:18:34] फिर से हो।

[10:18:44] देश की वित्तीय और आर्थिक स्थिति का पता

[10:18:47] चल जाता है। देश कितना दूसरे देशों के

[10:18:49] सामान पर निर्भर है उसकी भी जानकारी होने

[10:18:52] लग जाती है। इस कारण से बैलेंस ऑफ पेमेंट

[10:18:54] में हम इसको यूज़ करते चलते हैं। करंट

[10:18:56] अकाउंट बैलेंस, करंट अकाउंट सरप्लस, करंट

[10:18:59] अकाउंट डेफिशिएट, करंट अकाउंट में फायदा

[10:19:02] है, नुकसान है। तो उसके बाद हम कह सकते

[10:19:04] हैं कि कैपिटल अकाउंट के बारे में बातचीत

[10:19:07] इसमें की जाती है। जुड़वा घाटा, दोहरा

[10:19:10] घाटा। किसी भी अर्थव्यवस्था में बजटीय

[10:19:12] घाटा और भुगतान संतुलन के चालू खाते के

[10:19:15] साथ-साथ उपलब्ध हो तो इसे जुड़वा घाटा

[10:19:17] कहते हैं। हमारे देश में जुड़वा घाटा है।

[10:19:19] एक तो करंट अकाउंट में भी हमारा घाटा चल

[10:19:22] रहा है और बजट में भी हमारे घाटे की

[10:19:24] स्थिति आ रही है। तो इसको कहते हैं ट्विंस

[10:19:26] डेफिशिएट। करंट अकाउंट डेफिशिएट भी और

[10:19:29] फिस्कल डेफिशिट भी। राजकोशीय घाटा भी।

[10:19:35] तो कई प्रकार के आर्थिक उपाय अपनाने पड़ते

[10:19:37] हैं। सरकार फिर उदारीकरण लाती है। विदेशी

[10:19:41] एफडीआई को अनुमति अनुमति देती है। देश के

[10:19:43] अंदर उत्पादन को बढ़ाने के लिए औद्योगीकरण

[10:19:45] को बढ़ाने के लिए काम करती है। हमारे देश

[10:19:48] में बड़े स्तर पर बदलाव आए थे। सच में

[10:19:51] मनमोहन जी की जो सरकार थी और मतलब एक

[10:19:54] प्रकार से नरसिम राव की सरकार के दौरान

[10:19:56] मनमोहन जी जैसे अह देश के लिए वित्त

[10:19:58] मंत्री मिल गई। हमारे लिए खुशकिस्मती की

[10:20:00] बातचीत थी कि उस संकट की घड़ी में उस महान

[10:20:04] व्यक्ति ने अपनी बुद्धिमत्ता का उपयोग

[10:20:06] करते हुए देश को उस संकट से उबारने में

[10:20:08] बहुत बड़ा योगदान निभाया। भले ही उनको

[10:20:10] उनका इतना महत्व नहीं दिया गया।

[10:20:14] आयात में कमी की जाए। इंपोर्ट को कम किया

[10:20:17] जाए। निर्यात को बढ़ाने की कोशिश की जाए।

[10:20:20] कोशिश की जाए कि हमारे देश में लोग कम से

[10:20:22] कम मतलब बर्बादी करें। घरेलू मुद्रा का

[10:20:26] अवमूल्यन करना किया जाता है जानबूझ के

[10:20:28] ताकि एक्सपोर्ट और सस्ता हो सके। निर्यात

[10:20:31] को प्रोत्साहित किया जाए। आयात को

[10:20:33] हतोत्साहित किया जाए। ये सब करने की कोशिश

[10:20:35] इसमें की जाती है। अर्थव्यवस्था के

[10:20:38] क्षेत्र और अर्थव्यवस्था के नए क्षेत्र

[10:20:40] इनको हम एक साथ ले रहे हैं। बस 1 मिनट का

[10:20:43] समय मुझे दीजिएगा।

[10:22:51] अभी अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक नहीं कर

[10:22:53] रहे। पहले इसको कंप्लीट कर लेते हैं।

[10:22:55] प्रमुख वैश्विक संस्थाएं। यह ज्यादा

[10:22:57] इंपॉर्टेंट है प्रीलिम्स के लिए भुगतान

[10:23:00] पेमेंट करने के बाद और फिर इसको केवल

[10:23:02] फाइनली कर लेंगे क्योंकि इसमें एग्रीकल्चर

[10:23:04] हम ऑलरेडी कर चुके तो ज्यादा सेक्टर इसमें

[10:23:06] नहीं आएंगे। पहले हम प्रमुख वैश्विक

[10:23:08] संस्थाओं के बारे में कर लेते हैं। बस 1

[10:23:10] मिनट का समय मैं लूंगा। पानी की व्यवस्था

[10:23:13] कर लूं मैं अपने लिए।

[10:25:02] [गला साफ़ करने की आवाज़]

[10:25:04] अब हम बात करने जा रहे हैं महत्वपूर्ण

[10:25:06] संस्थाओं में वर्ल्ड बैंक आईएमएफ डब्ल्यू

[10:25:09] टीओ के बारे में जो कि थोड़ी सी

[10:25:11] महत्वपूर्ण हो जाती है। वर्ल्ड बैंक जिसको

[10:25:14] एक जमाने में आईबीआरडी के नाम से जानते

[10:25:17] थे। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब यूरोप

[10:25:20] और अन्य क्षेत्र जितने भी थे उन सभी में

[10:25:23] विकास के लिए बहुत ज्यादा विकल्प नहीं बच

[10:25:26] गए थे। ऐसी परिस्थिति में इसका निर्माण

[10:25:28] करना बहुत जरूरी हो गया था ताकि युद्ध से

[10:25:31] प्रभावित देशों के पुनर्निर्माण के लिए

[10:25:33] पूंजी जुटाई जा सके। दुनिया भर में इकोनमी

[10:25:36] को स्टेबल करने की कोशिश की जा सके।

[10:25:39] विकासशील देशों का जो भी उदयमान हो रहा था

[10:25:41] उनको विकास में मदद की जा सके।

[10:25:45] विश्व बैंक की स्थापना द्वितीय विश्व

[10:25:46] युद्ध के बाद हुई थी। खास करके 1944 में

[10:25:50] अमेरिका के न्यू हेमशायर के ब्रिटेन वुड्स

[10:25:52] नामक स्थान पर एक सम्मेलन आयोजित हुआ। 44

[10:25:55] देशों ने 1944 में एक सम्मेलन में तीन

[10:25:58] संस्थाओं के निर्माण की बातें शुरू हुई।

[10:26:00] पहला वर्ल्ड बैंक की दूसरा इंडियन

[10:26:03] इंटरनेशनल मोनेरी फंड की बैलेंस ऑफ पेमेंट

[10:26:06] को बैलेंस करने के लिए और तीसरा इंटरनेशनल

[10:26:09] ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन की। इंटरनेशनल ट्रेड

[10:26:12] ऑर्गेनाइजेशन इसलिए नहीं बन पाया था

[10:26:13] क्योंकि सर्वसम्मति नहीं हो पाई। तो दो ही

[10:26:16] संस्थाएं बन पाई थी। इस सम्मेलन का

[10:26:19] उद्देश्य युद्ध से प्रभावित हुई वैश्विक

[10:26:21] अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण वैश्विक

[10:26:22] वित्तीय व्यवस्था को स्थिर करने के लिए

[10:26:24] किया गया। इस सम्मेलन के फलस्वरूप जुलाई

[10:26:26] 1944 में अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष आईएमएफ

[10:26:30] बैलेंस ऑफ पेमेंट को बैलेंस करने के समय

[10:26:32] मदद करने के लिए और इंटरनेशनल

[10:26:35] रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट बैंक

[10:26:37] आईबीआरडी का गठन किया गया।

[10:26:41] [हंसी]

[10:26:41] 25 जून 1946 [गला साफ़ करने की आवाज़]

[10:26:43] को ऑफिशियली इसकी शुरुआत हुई। आईबीआरडी को

[10:26:45] ही बाद में विश्व बैंक के रूप में जाना

[10:26:47] जाने लगा। भारत ब्रिटेन वुड सम्मेलन के 44

[10:26:50] मूल हस्ताक्षरकर्ताओं में से था और

[10:26:52] वाशिंगटन डीसी में सम्मेलन हुआ था। मतलब

[10:26:54] भारत इसके संस्थापक सदस्यों में रहा है।

[10:26:57] विश्व बैंक का उस समय उद्देश्य था

[10:26:59] प्रभावित देशों का पुनर्निर्माण करना,

[10:27:02] वैश्विक व्यापार को प्रोत्साहित करना,

[10:27:04] इकोनॉमिकल स्टेबिलिटी लाना, प्राइवेट

[10:27:07] इन्वेस्टमेंट को भी प्रमोट करना और

[10:27:09] विकासशील देशों की सहायता करना। जुलाई

[10:27:12] 1944 में ब्रिटेन वुड सम्मेलन के तहत जब

[10:27:15] लाया गया तो इसका मेन काम था दुनिया को

[10:27:17] फिर से निर्मित करना। 1968 से 81 में इसका

[10:27:20] मेन काम हुआ गरीबी को दूर करना। इकोनमी इन

[10:27:23] ट्रांजिशन एंड स्ट्रक्चरल एडजस्टमेंट 1982

[10:27:26] से 94 में परिवर्तन करना, लिबरलाइजेशन

[10:27:29] करना और 1995 के बाद सस्टेनेबल डेवलपमेंट

[10:27:32] और ग्लोबल पार्टनरशिप पर यह काम करता है।

[10:27:35] विश्व बैंक के वर्तमान उद्देश्य समय के

[10:27:37] साथ विकसित हुए। अब यह गरीबी उन्मूलन सतत

[10:27:40] विकास पर केंद्रित है। 2030 तक चरम गरीबी

[10:27:43] जहां प्रति व्यक्ति $.5 प्रतिदिन से कम

[10:27:46] कमाता है। इसको समाप्त करने का लक्ष्य

[10:27:48] लेकर आया है। निम्न और मध्यम आय वाले

[10:27:50] देशों में 40% आबादी की आय बढ़ाने का यह

[10:27:53] लक्ष्य लेकर आया है। सस्टेनेबल डेवलपमेंट,

[10:27:56] इकोनॉमिकल डेवलपमेंट और टेक्निकल सपोर्ट

[10:27:58] करने का मकसद यह लेकर रखता है।

[10:28:02] वर्ल्ड बैंक में मुख्य रूप से दो संस्थाएं

[10:28:04] काम करती है। आईबीआरडी जो कि शुरुआत से ही

[10:28:06] बनी हुई बाद में इंटरनेशनल डेवलपमेंट

[10:28:09] एसोसिएशन बनाया गया था विकासशील देशों और

[10:28:11] गरीब देशों की सीधी मदद करने के लिए।

[10:28:13] इसमें इंटरेस्ट रेट बिल्कुल नहीं के बराबर

[10:28:15] और समय अवधि बहुत ज्यादा दी जाती है।

[10:28:17] वर्तमान में वर्ल्ड बैंक ग्रुप का मतलब जब

[10:28:20] भी कहेंगे तो पांच संस्थाओं को वर्ल्ड

[10:28:22] बैंक ग्रुप कहते हैं। एक तो इंटरनेशनल

[10:28:24] बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड डेवलपमेंट,

[10:28:26] इंटरनेशनल डेवलपमेंट एसोसिएशन, इंटरनेशनल

[10:28:29] फाइनेंस कॉरपोरेशन।

[10:28:32] यह प्राइवेट संस्थानों को मदद करने के लिए

[10:28:34] बनाया गया है। बहुपक्षीय निवेश गारंटी

[10:28:37] योजना मेगा मल्टीलटरल इन्वेस्टमेंट गारंटी

[10:28:40] एजेंसी। ये एक प्रकार से विदेशी कंपनियों

[10:28:43] को कॉन्फिडेंस देता है कि आप किसी भी गरीब

[10:28:45] देश में इन्वेस्टमेंट करो। कोई सन टेंशन

[10:28:48] की बात नहीं है। और यह है इंटरनेशनल सेंटर

[10:28:50] फॉर सेटलमेंट ऑफ इन्वेस्टमेंट डिस्प्यूट।

[10:28:53] अगर कोई सेट डिस्प्यूट हो जाता है तो यह

[10:28:55] संस्थाएं उस डिस्प्यूट को रिजॉल्व करने

[10:28:57] में मदद करती है। भारत इसका सदस्य नहीं है

[10:28:58] क्योंकि भारत का आरोप है कि यह विकसित

[10:29:01] देशों के बारे में ही चर्चाएं ज्यादा करता

[10:29:03] है। भारत इन चारों का सदस्य है। भारत ने

[10:29:06] चारों की सदस्यता लेकर रखी हुई है।

[10:29:08] फाइनेंसिंग फॉर मिडिल इनकम डेवलपिंग

[10:29:11] कंट्रीज। इंटरनेशनल डेवलपमेंट एसोसिएशन

[10:29:14] फाइनेंसिंग फॉर लो इनकम डेवलपिंग कंट्रीज

[10:29:16] सबसे ज्यादा गरीब देशों को मदद करता है यह

[10:29:19] इंटरनेशनल बैंक फॉर रिकंस्ट्रक्शन एंड

[10:29:21] डेवलपमेंट में आईएफसी जो है वो इन

[10:29:24] इन्वेस्टमेंट एडवाइज़री सर्विज देता है

[10:29:27] प्राइवेट सेक्टर के डेवलपमेंट के लिए

[10:29:29] पॉलिटिकल रिस्क इंश्योरेंस क्रेडिट एनहांस

[10:29:32] गारंटी देता है मेगा कि कोई देश में अगर

[10:29:35] सरकारें बदल गई तब भी इन्वेस्टमेंट कहीं

[10:29:37] नहीं जाएगा और एक प्रकार से डिस्प्यूट को

[10:29:39] रिॉल्व करने के लिए आईबीआरडीओ और आईडीए

[10:29:42] दोनों को मिलाकर वर्ल्ड बैंक कहते हैं

[10:29:43] क्योंकि ये दोनों का ऑफिस भी अलग-अलग

[10:29:45] नहीं। एक ही ऑफिस में दोनों काम करती है।

[10:29:47] एक ही बिल्डिंग में

[10:29:49] वर्ल्ड बैंक ग्रुप के नाम से हम इनको

[10:29:51] जानते हैं। आईबीआरडी वास्तविक रूप में

[10:29:54] 1944 के सम्मेलन से यही बना था। 189 मेंबर

[10:29:58] इसके देश हैं। मध्यम और ऋण योग्य गरीब

[10:30:00] देशों को ऋण गारंटी प्रदान करता है या ऋण

[10:30:02] भी देता है। इंफ्रास्ट्रक्चर एजुकेशन,

[10:30:04] हेल्थ और क्लाइमेट के लिए नंबर ऑफ कंट्री

[10:30:07] एक बार पुनः देख लेना। वो ओरिजिनल वेबसाइट

[10:30:09] से वैश्विक वित्तीय बाजारों से पूंजी

[10:30:12] जुटाना और ट्रिपल ए क्रेडिट रेटिंग रखता

[10:30:14] है। यह

[10:30:16] कंट्री को स्ट्रेटजी बनाने में, लोन देने

[10:30:19] में या किसी प्रकार के फाइनेंशियल रिस्क

[10:30:21] में भी मदद करता है। दूसरा है इंटरनेशनल

[10:30:24] डेवलपमेंट एसोसिएशन। 1960 में इसका

[10:30:26] निर्माण किया गया। भारत इसका संस्थापक

[10:30:28] सदस्य रहा। दुनिया के 75 सबसे गरीब देशों

[10:30:31] को रियायती ऋण शून्य या कम ब्याज दर पर

[10:30:34] अनुदान प्रदान करता है। प्राइमरी एजुकेशन

[10:30:37] हेल्थ सेक्टर स्वच्छ जल कृषि में निवेश के

[10:30:39] रूप में दाता देशों के योगदान और आईबीआरडी

[10:30:41] की आय से पैसा प्राप्त करता है। मतलब

[10:30:44] इसमें दाता देश फ्री में पैसा देते रहते

[10:30:46] हैं। गरीब देशों को आसान शर्त पर उदारता

[10:30:49] पूर्वक दीर्घकालिक ऋण प्रदान करता है।

[10:30:51] इसलिए इसे गरीब देशों की सबसे मददगार

[10:30:54] खिड़की कहते हैं। अमेरिका के सेनेटर

[10:30:56] मोन्रेन ने इसका विचार रखा था। आईडीए को

[10:30:59] विश्व बैंक की रियायती ऋण देने वाली

[10:31:01] खिड़की उदार ऋण की खिड़की भी कहते हैं।

[10:31:03] लोकल लोन लिबरल लोन विंडो या कंसेशन लोन

[10:31:06] विंडो कहते हैं। आईडीए विश्व बैंक की वह

[10:31:08] संस्था है जो दुनिया के सबसे गरीब देशों

[10:31:10] की मदद करती है।

[10:31:13] इसमें 30 से 38 साल तक का पुनर्भुगतान

[10:31:16] टाइम पीरियड दिया जाता है। इसमें भी 510

[10:31:18] साल की पुनः छूट मिल सकती है। इंटरनेशनल

[10:31:20] फाइनेंस कॉरपोरेशन यह बाद में 1956 में

[10:31:24] बनाया गया। 186 इसके सदस्य देश है।

[10:31:26] प्राइवेट क्षेत्र की कंपनियों को ऋण और

[10:31:29] इन्वेस्टमेंट में मदद करता है यह ताकि

[10:31:31] प्राइवेट कंपनियां नौकरी सृजन कर सके।

[10:31:34] निजीकरण को बढ़ावा दे सके। बाजार मजबूत हो

[10:31:37] सके। ये कैपिटलिस्टिक इकोनमी का सपोर्ट

[10:31:39] समर्थन करते हैं। ये विकासशील देशों में

[10:31:42] विशेषकर निजी क्षेत्र पर केंद्रित है।

[10:31:44] आईएफसी 100 से अधिक विकासशील देशों में

[10:31:46] उभरते बाजार में कंपनी और वित्तीय

[10:31:48] संस्थानों को रोजगार सजित करने, कर राजस्व

[10:31:51] जुटाने, कॉर्पोरेट प्रशासन, पर्यावरण

[10:31:54] प्रदर्शन में सुधार करने और उनके स्थानीय

[10:31:56] समुदाय में योगदान करने में सहायता देता

[10:31:58] है। सामान्यतः 7 से 12 वर्ष की परिपक्वता

[10:32:01] वाले व्यवसाय और निजी परियोजनाओं को ऋण

[10:32:03] प्रदान करता है। फिर है मल्टीलटरल

[10:32:06] इन्वेस्टमेंट गारंटी एजेंसी। 1988 में

[10:32:09] विकासशील देशों में गैर वाणिज्यिक जोखिमों

[10:32:11] के विरुद्ध निवेश बीमा के सार्वजनिक और

[10:32:13] निजी स्त्रोत के पूरक है। इसका मतलब यह

[10:32:16] होता है कि मान लीजिए कि कोई अमीर देश

[10:32:18] अफगानिस्तान में या किसी भी देश में

[10:32:20] इन्वेस्टमेंट कर रही है कोई प्राइवेट

[10:32:21] कंपनी और सरकार बदल जाए वहां पर पॉलिटिकल

[10:32:24] शिफ्ट हो जाए। जैसे बांग्लादेश में हुआ,

[10:32:27] जैसे नेपाल में हुआ तो ऐसी सिचुएशन में

[10:32:29] उनका इन्वेस्टमेंट खतरे में नहीं आएगा। ये

[10:32:32] बैंक गारंटी लेती है। अगर वो लॉस में चली

[10:32:34] गई कंपनी तो वो नहीं गारंटी लेती है।

[10:32:36] लेकिन अगर कोई पॉलिटिकल शिफ्ट हो रहा है

[10:32:38] तब उसकी गारंटी लेती है ताकि वहां पर जो

[10:32:41] अमीर अमीर कंपनियां है या अमीर लोग जो हैं

[10:32:44] वो इन्वेस्टमेंट करने से घबराए नहीं।

[10:32:48] जैसे युद्ध मुद्रास्टेबिलिटी इनको ध्यान

[10:32:51] में रखते हुए और लास्ट होती है इंटरनेशनल

[10:32:54] सेंटर फॉर सेटलमेंट ऑफ इन्वेस्टमेंट

[10:32:56] डिस्प्यूट। 1966 में बनाया गया। 158 देश

[10:33:00] है। भारत इसका सदस्य नहीं है। यह एक

[10:33:02] प्रकार से झगड़ों का सुलझाला सुलझाती है।

[10:33:05] खास करके देश और इन्वेस्टर्स के बीच में

[10:33:07] अगर कोई डिस्प्यूट आ जाता है तो सुलह करती

[10:33:10] है। मध्यस्थता करती है। इसमें

[10:33:16] तो हम कह सकते हैं 1944 में बनी उभरती

[10:33:20] अर्थव्यवस्था को ऋण देती है। कई जगह पर

[10:33:22] आईडीए गरीब देशों को बहुत ही कम ब्याज दर

[10:33:25] पर बिल्कुल जीरो पर देती है। निजी क्षेत्र

[10:33:27] को प्रमोट करने के लिए, विदेशी निवेशकों

[10:33:30] के रिस्क से सुरक्षा देने के लिए, खास

[10:33:32] करके पॉलिटिकल रिस्क से और यह निवेश

[10:33:35] विवादों का समाधान करने के लिए मध्यस्था

[10:33:37] का काम करती है।

[10:33:40] वर्ल्ड बैंक को चलाने के लिए एक निदेशक

[10:33:42] मंडल होता है। इन

[10:33:44] [गला साफ़ करने की आवाज़] सबको चलाने के

[10:33:45] लिए एक निदेशक मंडल होता है। क्योंकि

[10:33:47] डिस्प्यूट सेटलमेंट बॉडी तो समय-समय पर

[10:33:49] बनेगी जब उसके सामने मामले आते हैं।

[10:33:52] कार्यकारी निदेशकों का यह बोर्ड विश्व

[10:33:54] बैंक समूह के सामान्य संचालन की

[10:33:55] जिम्मेदारी देता है। सदस्यों का

[10:33:57] प्रतिनिधित्व बोर्ड ऑफ गवर्नेंस करता है।

[10:33:59] बोर्ड में एक अध्यक्ष और 24 कार्यकारी

[10:34:02] सदस्य होते हैं। तो एक प्रकार से एक इसमें

[10:34:06] चेयरमैन होता है और 24 एग्जीक्यूटिव लोग

[10:34:08] होते हैं। यह हर दिन का कामकाज देखते हैं।

[10:34:11] ये बिल्कुल प्रॉपर अथॉरिटी होते हैं जो सब

[10:34:14] कुछ करेंगे। और इनकी नियुक्ति कौन करते

[10:34:16] हैं? इनकी नियुक्ति सदस्य देश करते हैं।

[10:34:19] हर सदस्य देश से वित्त मंत्री कई बार इनके

[10:34:21] सम्मेलनों में जाता है। 25 सदस्यों से

[10:34:24] मिलकर बना है कार्यकारी बोर्ड। इनमें से

[10:34:26] पांच परमानेंट मेंबर हैं क्योंकि इनका

[10:34:28] इतना ज्यादा कंट्रीब्यूशन है कि उनको एक

[10:34:32] सीटें दे दी गई है। अमेरिका, जापान,

[10:34:34] जर्मनी, फ्रांस, यूके को एक-एक परमानेंट

[10:34:36] सदस्य दे दिए गए हैं। बाकी जो लोग होते

[10:34:39] हैं 19 वो चुने जाते हैं। 19 इसलिए

[10:34:43] क्योंकि एक अध्यक्ष हुआ और 19 निदेशक

[10:34:45] होंगे जो चुने जाएंगे। विश्व का सबसे बड़ा

[10:34:48] शेयरक इसके विश्व बैंक का सबसे बड़ा शेयर

[10:34:51] इसके अध्यक्ष का नाम प्रस्तावित करता है

[10:34:53] जो कि अमेरिका होता है। अमेरिका विश्व

[10:34:55] बैंक का सबसे बड़ा शेयरक है। अतः अब तक

[10:34:58] इसके सभी अध्यक्ष अमेरिकी रहे हैं। विश्व

[10:35:00] बैंक समूह का अध्यक्ष निदेशक मंडल की

[10:35:02] बैठकों की अध्यक्षता करता है और संगठन के

[10:35:04] सामान्य संचालन की देखरेख करता है।

[10:35:06] अमेरिका का दबदबा इसमें

[10:35:09] 5 साल के लिए एक बार पुन नियुक्ति हो सकता

[10:35:12] है। अजय बंगा को 2023 में 5 साल के लिए

[10:35:14] नियुक्त किया गया। लेकिन याद रखना अजयभंगा

[10:35:16] भारतीय मूल के जरूर हैं लेकिन वो अमेरिका

[10:35:19] की तरफ से 2007 में अमेरिका की नागरिकता

[10:35:22] मिल चुकी है तो अमेरिका की तरफ से अपॉइंट

[10:35:24] किए गए हैं। अजय बंगा भले ही भारतीय

[10:35:27] व्यक्ति हैं। भारत कई बार निदेशक मंडल की

[10:35:29] स्थाई सदस्य रह चुका है। वर्तमान में भारत

[10:35:32] का प्रतिनिधित्व एक कार्यकारी निदेशक

[10:35:34] द्वारा किया जाता है जो दक्षिण एशियाई

[10:35:35] समूह को दर्शाता है। भारत की तरफ से एक

[10:35:38] व्यक्ति जो जाता है वह नेपाल, भूटान,

[10:35:40] बांग्लादेश, भारत इन सभी देशों के इन सभी

[10:35:44] देशों का प्रतिनिधित्व करता है। एक प्रकार

[10:35:46] से क्या काम है निदेशक मंडल का? पॉलिसी

[10:35:49] बनाना, ऋण और अनुदान प्रस्तावों को

[10:35:51] स्वीकृति देना। किस देश को कर्जा देना है?

[10:35:53] विश्व बैंक की परियोजना कार्यक्रमों की

[10:35:55] निगरानी करना, सदस्य देशों के साथ

[10:35:57] कोऑर्डिनेशन करना। विश्व बैंक के सदस्य

[10:36:00] देशों का भारांश और मतदान प्रणाली। यहां

[10:36:03] पर वोटिंग सिस्टम ऐसा है कि जिस देश ने

[10:36:05] जितना ज्यादा पैसा दिया है वह उतना ही

[10:36:07] वोटिंग राइट रखता है। अमेरिका के पास सबसे

[10:36:10] ज्यादा वोटिंग राइट्स हैं और इस दुनिया

[10:36:12] में कोई भी प्रस्ताव अगर वर्ल्ड बैंक में

[10:36:16] पारित होगा वो तभी होगा जब 85% मतदान

[10:36:19] होगा। मतलब खास करके वर्ल्ड बैंक के

[10:36:21] संविधान को यदि बदलना है तो 85% लोगों की

[10:36:24] अनुमति चाहिए। अगर अकेला अमेरिका मना कर

[10:36:27] दे तो सुधार नहीं हो सकते हैं। जापान का

[10:36:30] वोटिंग राइट सेकंड नंबर पर चीन का, जर्मनी

[10:36:32] का, फ्रांस का, फिर यूके का। ये यूके और

[10:36:36] फ्रांस का लगभग बराबरी का वोटिंग राइट्स

[10:36:38] हैं।

[10:36:41] तो इनके एक-एक व्यक्ति एक प्रकार से भेजे

[10:36:43] जाते हैं। डायरेक्टर इनमें से एक-एक

[10:36:45] व्यक्ति भेजता है। पांच लोग इनके भेजे

[10:36:47] जाते हैं। छह लोग इनके भेजे जाते हैं।

[10:36:49] क्यों? क्योंकि ये लोगों का वेटेज इतना

[10:36:52] ज्यादा है। बाकी फिर झुंड में देश मिलकर

[10:36:54] एक-एक व्यक्ति को भेजते हैं। आईबीआरडी और

[10:36:57] आईडीए में पूंजी अंशदान के आधार पर तय

[10:36:59] होता है। 20% तत्काल भुगतान करना पड़ता है

[10:37:02] और 80% जब मांगा जाएगा वर्ल्ड बैंक के

[10:37:04] द्वारा तब पैसा देना पड़ता है। तो जो देश

[10:37:07] ज्यादा कंट्रीब्यूट करेगा उसको वोटिंग

[10:37:08] राइट ज्यादा मिलेगा। मतदान शक्ति सदस्य

[10:37:11] देशों के शेयर के अनुपात में तय होती है।

[10:37:13] निर्णय लेते समय बहुमत की जरूरत पड़ती है

[10:37:15] और बहुमत एक व्यक्ति का एक वोट नहीं होता

[10:37:18] है। जिस देश का जितना वोटिंग राइट्स है

[10:37:20] उतना वोटिंग वैल्यू कैलकुलेट होगी। वर्ल्ड

[10:37:22] बैंक के संविधान में संशोधन करने के जैसे

[10:37:25] प्रमुख निर्णय के लिए 85% मतों की

[10:37:27] आवश्यकता होती है। तो इस प्रकार अमेरिका

[10:37:29] को वीटो पावर है क्योंकि अमेरिका के अकेले

[10:37:32] के पास 15% से ज्यादा वीटो 15% ज्यादा वोट

[10:37:35] वैल्यू है। अमेरिका ने मना कर दिया तो कुछ

[10:37:37] नहीं कर सकता कोई। विकासशील देशों की

[10:37:39] मतदान शक्ति बहुत लिमिटेड है जिसके कारण

[10:37:42] इसमें लगातार मांग उठ रही है कि इसको

[10:37:43] सुधारा जाए। इसमें कोटा सिस्टम चलता है।

[10:37:47] प्रत्येक सदस्य देश को अपनी आर्थिक क्षमता

[10:37:49] के आधार पर पूंजी योगदान करना होता है। यह

[10:37:51] कोटा शेयर धारिता मतदान शक्ति निर्धारित

[10:37:54] करता है। भारत में आईबीआरडी का लगभग 3%

[10:37:57] शेयर है और आईडीए में अब भारत लगातार दान

[10:38:00] कर रहा होता है। इससे कोई लोन नहीं लेता

[10:38:02] है आईडीए से। वर्ल्ड बैंक द्वारा जारी की

[10:38:04] जाने वाली प्रमुख रिपोर्ट कौन सी है?

[10:38:06] वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट, पावर्टी एंड

[10:38:09] शेयरर्ड प्रोस्पेरिटी रिपोर्ट, वर्ल्ड

[10:38:11] इकोनॉमिकल प्रोस्पेक्ट, लॉजिस्टिक

[10:38:13] परफॉर्मेंस इंडेक्स और ह्यूमन कैपिटल

[10:38:16] इंडेक्स। यह वर्ल्ड बैंक हर साल पब्लिश

[10:38:19] करता है। फिर आते हैं आईएमएफ। आईएमएफ

[10:38:22] क्यों बनाया गया था? आईएमएफ इसलिए बनाया

[10:38:24] गया ताकि बैलेंस ऑफ पेमेंट में अगर कहीं

[10:38:26] पर बैलेंस नहीं हो पा रहा है तो उस देश की

[10:38:29] मदद की जाए। जैसे 1991 में हमारी मदद की

[10:38:32] थी। पर बहुत शर्तें लगाता है ये गंदा

[10:38:34] आदमी। गंदा संस्थान आईएमएफ एक अंतर सरकारी

[10:38:37] वित्तीय संस्था है जिसका उद्देश्य विश्व

[10:38:39] स्तर पर मौद्रिक सहयोग को बढ़ावा देना है।

[10:38:41] वैश्विक वाणिज्यिक संतुलन बनाए रखना है और

[10:38:44] सदस्यों को अस्थाई वित्तीय सहायता देना

[10:38:46] है। पर यह कई प्रकार की योजनाओं में भी

[10:38:49] पैसा देता है। ऐसा नहीं कि केवल

[10:38:52] संकट के समय ही कुछ योजनाओं में भी यह

[10:38:54] पैसा दे सकता है।

[10:38:57] आईएमएफ की स्थापना का ऐतिहासिक संदर्भ

[10:38:59] सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद इकोनॉमिकल

[10:39:01] स्टेबिलिटी के लिए आया। 1930 के दशक की

[10:39:04] महामंदी और युद्ध ने वैश्विक अर्थव्यवस्था

[10:39:06] को अनस्टेबल कर दिया था। विभिन्न देशों की

[10:39:08] मुद्राओं के बीच अस्थिर विनिमय दरे और

[10:39:10] व्यापार संरक्षणवाद ने वैश्विक व्यापार को

[10:39:12] प्रभावित किया। इस संदर्भ में ब्रिटेन वुड

[10:39:14] सम्मेलन में इसका गठन किया गया। इसलिए

[10:39:17] इसको ब्रिटेन वुड्स की एक प्रकार से दूसरी

[10:39:20] या जुड़वा बहन कहते हैं वर्ल्ड बैंक की।

[10:39:22] 29 27 दिसंबर 1945 को अस्तित्व में आया।

[10:39:26] इसके पहले 29 सदस्य देश ने इसके समझौते पर

[10:39:29] साइन किए। भारत इसके संस्थापक सदस्यों में

[10:39:32] शामिल रहा। वाशिंगटन डीसी में इसका

[10:39:34] मुख्यालय है। आईएमएफ आईबीआरडी दोनों को

[10:39:37] ब्रिटेन वुड ट्विंस कहते हैं। वर्तमान

[10:39:39] सदस्य 191 है। अंतिम सदस्य लिंकेस्टाइन

[10:39:42] 2024 में बना था।

[10:39:50] $ ट्रिलियन डॉलर तक लोन देने की इसकी

[10:39:52] क्षमता है। वह आज एक ट्रिलियन डॉलर तक का

[10:39:55] लोन देने की ताकत रखता है। इतना बड़ा बैंक

[10:39:58] है।

[10:40:00] तो वर्ल्ड बैंक एक प्रकार से हम कह सकते

[10:40:02] हैं 191 मेंबर्स ज्यादा है। पहले व्यक्ति

[10:40:04] मतलब जिसको भी वर्ल्ड बैंक का मेंबर बनना

[10:40:07] है पहले उसे आईएमएफ का मेंबर बनना पड़ता

[10:40:09] है। तभी वो वर्ल्ड बैंक का मेंबर बन सकता

[10:40:11] है।

[10:40:13] यहां पर अगर हम बातचीत करें तो सबसे

[10:40:15] ज्यादा वर्ल्ड बैंक से किसने लोन लिया है?

[10:40:18] तो सबसे ज्यादा वर्ल्ड बैंक से लोन लिया

[10:40:20] है भारत ने। उसके बाद इंडोनेशिया ने। फिर

[10:40:23] पाकिस्तान ने और फिर बांग्लादेश ने। 39

[10:40:26] बिलियन डॉलर का लोन लिया है हमने। $39

[10:40:28] बिलियन

[10:40:30] 100 का मल्टीप्लाई कर दो तो $3900 अरब

[10:40:33] डॉलर का लोन लिया है हमने पर आईएमएफ के

[10:40:36] मामले में हमारा अब कोई कर्जा नहीं है

[10:40:38] आईएमएफ से हमने कोई लोन नहीं लिया सबसे

[10:40:39] ज्यादा इस समय अर्जेंटीना है फिर इजिप्ट

[10:40:42] है यूक्रेन है और फिर पाकिस्तान है कर्जे

[10:40:44] के मामले में आईएमएफ से जो कर्जा लिया है

[10:40:47] जिन देशों ने अर्जेंटीना सबसे टॉप पर है।

[10:40:51] आईएमएफ का उद्देश्य होता है कहीं ना कहीं

[10:40:54] डीवैल्यूएशन को रोकना। जानबूझ के अपनी

[10:40:56] करेंसी को कम करते हैं। कुछ लोग मतलब रुपए

[10:40:59] की कीमत को जानबूझ के कुछ देश अगर अपना

[10:41:01] देश कम करने लगे तो उसको रोकेगा ये।

[10:41:03] अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बेटर करने में

[10:41:06] मदद करना, मौद्रिक सहयोग देना, भुगतान

[10:41:08] संतुलन की समस्या को हल करना, सस्टेनेबल

[10:41:10] इकोनॉमिकल डेवलपमेंट में मदद करना, किसी

[10:41:13] भी प्रकार के संकटों के बारे में सूचना

[10:41:15] देना या स्थिर करना। प्रमोट इंटरनेशनल

[10:41:18] मोनेटरी कोऑपरेशन फैसिलिट द एक्सपेंशन एंड

[10:41:21] बैलेंस ग्रोथ ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड प्रमोट

[10:41:23] एक्सचेंज स्टेबिलिटी कहीं ना कहीं विनिमय

[10:41:26] दर की स्थिरता को प्रमोट करने की बातचीत

[10:41:28] करता है। पॉलिसी एडवाइस देता है।

[10:41:31] फाइनेंशियल असिस्टेंट करता है या कैपेसिटी

[10:41:33] डेवलपमेंट में मदद करता है। अंतरराष्ट्रीय

[10:41:35] मौद्रिक प्रणाली में स्थिरता बनाए रखने और

[10:41:38] संकट को रोकने के लिए आईएमएफ अपने सदस्य

[10:41:40] देशों की सरकारों के साथ लगातार बातचीत

[10:41:42] करते रहता है और बताते रहता है कि यहां

[10:41:44] संकट है। भले ही इसने संकट बताया नहीं था

[10:41:48] 20078 का। यह कौन सी रिपोर्ट छापता है?

[10:41:51] वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक, ग्लोबल

[10:41:54] फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट, फिस्कल

[10:41:57] मॉनिटर, एक्सटर्नल सेक्टर रिपोर्ट, रीजनल

[10:42:00] इकोनॉमिकल रिपोर्ट, ग्लोबल पॉलिसी एजेंडा,

[10:42:03] वर्ल्ड इकोनॉमिकल आउटलुक इसका बड़ा फेमस

[10:42:05] है। उसके बाद ग्लोबल फाइनेंशियल

[10:42:06] स्टेबिलिटी रिपोर्ट फेमस है। ये छह

[10:42:09] रिपोर्ट पब्लिश करता है।

[10:42:12] कौन सा संगठन वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक

[10:42:14] छापता है? इस तरीके के सवाल यूपीएससी

[10:42:16] इसमें पूछती रहती है।

[10:42:26] [गला साफ़ करने की आवाज़] कैसे ये

[10:42:27] कैपेसिटी डेवलपमेंट करता है? आईएमएफ

[10:42:29] तकनीकी सहायता और ट्रेनिंग प्रदान करता

[10:42:31] है। जिसे क्षमता विकास के रूप में जाना

[10:42:33] जाता है। क्षमता विकास के अंतर्गत सदस्य

[10:42:36] देशों में कर संग्रह में सुधार फाइनेंसियल

[10:42:39] जो पूरा का पूरा बजट होता है उसको कैसे

[10:42:41] बेटर किया जाए। इसमें भी वह सलाहें देने

[10:42:43] की उसकी आदत है।

[10:42:47] फिर है फाइनेंशियल सपोर्ट। फाइनेंशियल

[10:42:49] असिस्टेंट का मतलब होता है कि आईएमएफ

[10:42:51] समय-समय पर ऋण भी देता है। केवल सदस्य

[10:42:54] देशों को ऋण देता है। केवल सदस्य देशों

[10:42:56] को। अन्य विकास बैंक की तरह आईएमएफ

[10:42:59] विशिष्ट परियोजनाओं के लिए ऋण नहीं देता

[10:43:01] बल्कि आईएमएफ संकट से प्रभावित देशों को

[10:43:03] उभारने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करता

[10:43:06] है क्योंकि आर्थिक स्थिरता और विकास को

[10:43:07] बहाल करने वाली नीतियां वहां वो लागू कर

[10:43:10] सकता है। अगर हम सिंपल सी बात करें

[10:43:14] आईएमएफ से जब भी ऋण प्राप्त करना होगा तो

[10:43:17] केवल सदस्य देशों को ऋण देगा। यह ओनली

[10:43:19] सदस्य देशों को आईएमएफ के ऋण देने के आधार

[10:43:22] और उपकरण कौन से हैं? तो आईएमएफ स्टैंड

[10:43:25] बाय अरेंजमेंट दे सकता है। स्टैंड बाय

[10:43:27] क्रेडिट फैसिलिटी दे सकता है। एक्सटेंडेड

[10:43:28] फंड फैसिलिटी दे सकता है। एक्सटेंडेड

[10:43:30] क्रेडिट फैसिलिटी दे सकता है। रैपिड

[10:43:32] फाइनेंसियल इंस्ट्रूमेंट दे सकता है।

[10:43:34] रैपिड क्रेडिट [गला साफ़ करने की आवाज़]

[10:43:35] फैसिलिटी दे सकता है। प्रिकॉशनरी

[10:43:37] लिक्विडिटी लाइन के रूप में शॉर्ट टर्म

[10:43:38] लिक्विडिटी लाइन के रूप में आईएमएफ स्टाफ

[10:43:41] मॉनिटर प्रोग्राम के रूप में मदद करता है।

[10:43:44] यह आईएमएफ की एक अल्पकालिक ऋण सुविधा होती

[10:43:46] है जो देशों को आर्थिक संकट जैसे भुगतान

[10:43:48] संतुलन की समस्या से निपटने के लिए देता

[10:43:50] है। एक से 2 साल के लिए कर्जा मिलता है।

[10:43:53] यह कम आय वाले देशों के लिए दिया जाता है।

[10:43:55] जो आर्थिक स्थिरता लाने के लिए कम ब्याज

[10:43:57] दर पर ऋण मिलता है कि देश में आर्थिक

[10:43:59] स्थिरता आ सके। यह लंबी अवधि के लिए देशों

[10:44:02] को आर्थिक सुधार और संरचनात्मक समस्याओं

[10:44:04] को सुधारने के लिए मिलता है। यह कम आय

[10:44:06] वाले देशों को लंबी अवधि का ऋण उपलब्ध

[10:44:08] करने, गरीबी को दूर करने के लिए देता है।

[10:44:11] यह तुरंत वित्तीय मदद देता है जब देश को

[10:44:13] अचानक आर्थिक झटका लगता है। प्राकृतिक

[10:44:15] आपदा या वैश्विक संकट में यह कम आय वाले

[10:44:18] देशों के लिए त्वरित रूप से रैपिड क्रेडिट

[10:44:20] फैसिलिटी लाता है। प्रिकॉशनरी एंड

[10:44:23] लिक्विडिटी लाइन यह उन देशों के लिए जिनकी

[10:44:24] अर्थव्यवस्था ठीक है लेकिन भविष्य में

[10:44:26] संकट आ सकता है। इसके लिए बना के रखता है।

[10:44:29] शॉर्ट टर्म लिक्विडिटी लाइन यह मजबूत

[10:44:31] अर्थव्यवस्था वाले देशों को अल्पकालिक

[10:44:33] नगदी की जरूरतों के लिए दिया जाता है। और

[10:44:36] यह अनौपचारिक कार्यक्रम है जिसमें आईएमएफ

[10:44:38] देश की आर्थिक नीतियों की निगरानी करता है

[10:44:41] ताकि उनकी मदद कर सके अगर कोई समस्या आ

[10:44:44] जाए तो। बेल आउट पैकेज एक वित्तीय सहायता

[10:44:47] है जो आईएमएफ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं

[10:44:49] द्वारा उन देशों को दी जाती है जो गंभीर

[10:44:51] आर्थिक संकट से जूझ रहे होते हैं। जैसे

[10:44:54] पाकिस्तान को दिया गया, श्रीलंका को दिया

[10:44:56] गया। शर्तें होती है कि राजकोषीय अनुशासन

[10:44:59] बनाए रखिए। जैसे हमें भी 1991 में दिया

[10:45:02] गया था। पहले तो राजकोशीय अनुशासन का मतलब

[10:45:04] होता है सरकारों पर दबाव डालती कि खर्चे

[10:45:06] कम करो। रेवेन्यू कलेक्शन बढ़ाओ। सब्सिडी

[10:45:09] में कटौती करो। राज्य के स्वामित्व वाले

[10:45:12] उद्योगों को प्राइवेटाइजेशन करो।

[10:45:13] मुद्रास्फीति को कंट्रोल करने की बातें

[10:45:16] रखी जाती है।

[10:45:18] त्वरित वित्तीय प्रपत्र, रैपिड फाइनेंसिंग

[10:45:21] इंस्ट्रूमेंट और त्वरित ऋण सुविधा, रैपिड

[10:45:23] क्रेडिट फैसिलिटी निम्नलिखित में से किसके

[10:45:25] द्वारा उधार दिए जाने के उपबंध हैं? तो

[10:45:27] आईएमएफ के द्वारा इस तरीके के

[10:45:29] इंस्ट्रूमेंट अपनाए जाते हैं। आईएमएफ की

[10:45:32] संरचना भी लगभग वैसी है। प्रत्येक सदस्य

[10:45:34] देश से गवर्नर का मनोनयन होगा। वहीं से ही

[10:45:37] होंगे जो गवर्नर चुने जाएंगे। फिर वह

[10:45:39] कार्यकारी बोर्ड का चयन करेंगे। 24 और एक

[10:45:41] 25 लोग यहां भी रहेंगे। गवर्नरों को मिलकर

[10:45:44] बोर्ड ऑफ गवर्नर बनेगा। बोर्ड ऑफ गवर्नर

[10:45:46] के माध्यम से आईएमएफ का प्रबंधन और संचालन

[10:45:49] होगा। मुख्य गवर्नर की अनुपस्थिति में उस

[10:45:51] देश का प्रतिनिधित्व वैकल्पिक गवर्नर करता

[10:45:53] है। मतलब वित्त मंत्री की अनुपस्थिति में

[10:45:55] देश का जो आरबीआई का गवर्नर है हमारे देश

[10:45:58] में वो इसका वैकल्पिक गवर्नर होता है।

[10:46:00] बोर्ड ऑफ गवर्नर आईएमएफ की सर्वोच्च

[10:46:02] संस्था है। लगभग वो सारे काम बैठ साल में

[10:46:05] एक बार बैठकें करेंगे तब बैठेंगे। लेकिन

[10:46:07] जो दिन प्रतिदिन का काम होता है वो

[10:46:09] कार्यकारी बोर्ड करता है। कार्यकारी बोर्ड

[10:46:11] वैसा ही होता है जैसे वर्ल्ड बैंक का था

[10:46:13] 25 लोगों का।

[10:46:16] तो बोर्ड ऑफ गवर्नर वहां पर भी बोर्ड ऑफ

[10:46:18] गवर्नर है। वर्ल्ड बैंक में एग्जीक्यूटिव

[10:46:20] काउंसिल होंगे। एक मैनेजिंग डायरेक्टर

[10:46:22] होगा। वहां चेयरमैन होता है। बोर्ड ऑफ

[10:46:24] गवर्नर आईएमएफ की सर्वोच्च निर्णय वाली

[10:46:26] बातचीत होती है। एक सदस्य एक देश से चुना

[10:46:29] जाता है जो गवर्नर के रूप में बैठकें करते

[10:46:31] हैं। लेकिन यह केवल नाम मात्र के लिए एक

[10:46:34] साल में बैठक करेंगे। रियल में कामकाज तो

[10:46:36] यही चला रहे होते हैं। और सबसे बड़ी

[10:46:39] बातचीत यह है कि सेम वैसा ही सारा कुछ

[10:46:42] वोटिंग सिस्टम है। इसके पास भी प्रबंध

[10:46:45] निदेशक की नियुक्ति कार्यकारी बोर्ड के

[10:46:47] द्वारा वोटिंग या सहमति के माध्यम से की

[10:46:50] जाती है। यह पद परंपरागत रूप से यूरोपियन

[10:46:52] देशों के प्रतिनिधि द्वारा दिया जाता है।

[10:46:54] तो वर्ल्ड बैंक का हमेशा चेयरमैन अमेरिकन

[10:46:56] बनता है और इसका चेयरमैन हमेशा एक

[10:46:58] यूरोपियन व्यक्ति बनता है। आईएमएफ का पहला

[10:47:00] प्रबंध निदेशक कैमियल गुट है। वर्तमान में

[10:47:02] बुल्गेरिया की क्रिस्टालिना जॉर्जिया

[10:47:04] आईएमएफ के प्रबंध निदेशक हैं। भारत से कोई

[10:47:07] भी व्यक्ति आईएमएफ का कभी प्रबंध निदेशक

[10:47:09] बना ही नहीं बन ही नहीं सकता है क्योंकि

[10:47:11] ये बनने ही नहीं देंगे गंदे लोग।

[10:47:15] टू मिनिस्टर कमेटी एडवाइस द बोर्ड ऑफ

[10:47:18] गवर्नर। बोर्ड ऑफ गवर्नर की सलाह को सलाह

[10:47:20] देने के लिए दो कमेटियां होती है।

[10:47:22] इंटरनेशनल मॉनिटरी एंड फाइनेंशियल कमेटी

[10:47:24] और डेवलपमेंट कमेटी।

[10:47:26] इंटरनेशनल मोनेटरी एंड फाइनेंशियल कमेट या

[10:47:29] समिति प्रमुख कार्य वैश्विक आर्थिक

[10:47:31] मुद्दों पर चर्चा करते हैं। पूरे के पूरे

[10:47:33] देशों को सलाह देते हैं। आईएमएफसी में 24

[10:47:36] सदस्य होते हैं जिन्हें बोर्ड ऑफ गवर्नर

[10:47:38] के द्वारा चुना जाता है। यह सभी सदस्य

[10:47:40] देशों से ही चुने जाते हैं। आईएमएफसी की

[10:47:42] बैठक में विश्व बैंक भी प्रेक्षक की भांति

[10:47:44] भाग लेता है। आम सहमति से काम किया जाता

[10:47:47] है और इनकी बैठकों से यह निर्णय लिया जाता

[10:47:50] है कि अब दुनिया भर में क्या कदम उठाए

[10:47:51] जाने चाहिए। इंटरनेशनल मोनेटरी एंड

[10:47:54] फाइनेंशियल कमेट आईएमएफसी विश्व

[10:47:56] अर्थव्यवस्था से सरोकार रखने वाले विषयों

[10:47:58] पर चर्चा करता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा

[10:48:01] कोष को उसके कार्य की दिशा पर सलाह देता

[10:48:03] है। आईएमएफसी की बैठकों में विश्व बैंक

[10:48:05] प्रेषक की भांति भाग लेता है। हम कहेंगे

[10:48:07] दोनों ही बातें सही है। फिर है डेवलपमेंट

[10:48:10] कमेटी। विकास समिति आईएमएफ के बोर्ड ऑफ

[10:48:12] गवर्नर और विश्व बैंक के 25 सदस्यों वाली

[10:48:15] एक जॉइंट कमेटी है। दोनों का जॉइंट कमेटी

[10:48:18] है ये। इस समिति का कार्य विकासशील देश

[10:48:20] उभरते बाजार आर्थिक विकास से संबंधित

[10:48:22] मुद्दों पर आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक के

[10:48:24] बोर्ड ऑफ गवर्नर सदस्य देशों का ध्यान

[10:48:26] आकर्षित करना विकास के महत्वपूर्ण मुद्दों

[10:48:29] पर सभी देशों के बीच में सहमति बनाने का

[10:48:31] यह काम करता है। एडवाइस द बोर्ड ऑफ गवर्नर

[10:48:34] ऑफ आईएमएफ एंड द वर्ल्ड बैंक ऑफ इकोनॉमिक

[10:48:36] इशू इन द डेवलपिंग कंट्रीज द मतलब

[10:48:40] विकासशील देशों को ज्यादा मदद करते हैं ये

[10:48:42] इस मामले में। द कमिटी हैज़ 25 मेंबर 25

[10:48:45] लोगों की बना होता है। यूजुअली मिनिस्टर

[10:48:46] ऑफ फाइनेंस और डेवलपमेंट एंड एंड प्रोवाइड

[10:48:50] अ फोरम फॉर बिल्डिंग कंसेंसस ऑन क्रिटिकल

[10:48:52] डेवलपमेंट इशूज़। जो अति संवेदनशील मुद्दे

[10:48:55] होते हैं उन पर ये एक प्रकार की राय बनाते

[10:48:57] हैं।

[10:48:58] आईएमएफ की वोटिंग सिस्टम भी सेम वैसा ही

[10:49:01] है। जिसका जितना कोटा उसे उतना ही ज्यादा

[10:49:03] वोटिंग राइट्स दिया गया है।

[10:49:06] कोटा आधारित वोट यह देश के कोटा के अनुपात

[10:49:09] में होता है। कुल वोटिंग शक्ति में

[10:49:10] अमेरिका की हिस्सेदारी 17.42%

[10:49:13] है और महत्वपूर्ण निर्णय के लिए 85% वोट

[10:49:16] चाहिए। अब बगैर अमेरिका के कुछ हो नहीं

[10:49:18] सकता। प्रत्येक सदस्य देश का कोटा उसकी

[10:49:21] आर्थिक स्थिति जीडीपी व्यापार भुगतान

[10:49:23] संतुलन के आधार पर निर्धारित होता है।

[10:49:25] कोटा आईएमएफ में देश की वित्तीय योगदान

[10:49:27] वोटिंग शक्ति ऋण प्राप्ति करने के लिए भी

[10:49:29] जरूरी है। कितना किसी को ऋण मिलेगा उसकी

[10:49:31] वोटिंग पावर से ही पता चलता है। और यहां

[10:49:34] पर वोटिंग के लिए स्पेशल ड्राइंग राइट्स

[10:49:36] के तहत एक नई करेंसी बनाई गई है जिसके

[10:49:39] माध्यम से तय किया जाता है। पहले तो डॉलर

[10:49:42] के रूप में तय किया जाता था। किसी भी जगह

[10:49:44] पर एसडीआर का निर्धारण करने के लिए चार

[10:49:47] चीजें जरूरी होती है। जीडीपी का कितना

[10:49:49] मतलब जीडीपी कितना है? ओपननेस कितनी है उस

[10:49:52] देश में? इकोनॉमिकल डायवर्सिटी कितनी है?

[10:49:54] और इंटरनेशनल रिजर्व अंतरराष्ट्रीय रिजर्व

[10:49:57] कितना है? उस देश के पास विदेशी मुद्रा

[10:49:59] भंडार कितना है? इस तरीके से एसडीआर का

[10:50:02] निर्धारण किया जाता है। एक एसडीआर के लिए

[10:50:05] अगर हम बातचीत करें तो सबसे ज्यादा कोटा

[10:50:07] अमेरिका का है। फिर जापान का है। फिर

[10:50:09] चाइना का है। जर्मनी का है। फिर फ्रांस और

[10:50:13] यूके का लगभग सेम है। हम अगर इसमें बातचीत

[10:50:16] करें तो अब हम 1 2 3 4 5 6 7 8 नंबर पर आ

[10:50:22] चुके हैं। भारत अब आठवें नंबर पर आ चुका

[10:50:25] है। लगभग

[10:50:27] प्रत्येक 1 लाख एसडीआर के अंशदान के लिए

[10:50:30] एक अतिरिक्त मत दिया जाता है। मतलब 1 लाख

[10:50:31] एसडीआर अगर आपका आ गया तो एक वोटिंग राइट

[10:50:34] मिलेगा। विकसित देशों का अंशदान अधिक है,

[10:50:37] मत भी अधिक है। यहां पर भी सेम वैसा ही

[10:50:39] सिस्टम है जैसे वर्ल्ड बैंक का होता है।

[10:50:42] विकासशील और अल्पविकसित देशों को हमेशा

[10:50:44] लगता है कि आईएमएफ तो उनके अनुसार ही बात

[10:50:47] करता है जो अमीर देश हैं।

[10:50:51] एसडीआर 1971 में लाया गया था क्योंकि उसके

[10:50:54] पहले आईएमएफ की ऑफिशियल करेंसी डॉलर होती

[10:50:56] थी। पर अमेरिका ने उसके कई नियमों के साथ

[10:50:59] समझौतों को तोड़ा। तो आईएमएफ ने कहा कि अब

[10:51:01] हम अपनी करेंसी बनाएंगे। एसडीआर स्पेशल

[10:51:04] ड्रॉइंग राइट्स आईएमएफ खाते की एक इकाई है

[10:51:06] ना कि एक करेंसी पेपर गोल्ड कहते हैं।

[10:51:08] मतलब वर्चुअल करेंसी है। रियल में कहे तो

[10:51:12] इसका जो निर्माण किया जाता है स्पेशल

[10:51:14] ड्रॉइंग राइट्स आर इंटरनेशनल रिजर्व एसेट

[10:51:16] क्रेडिडेट बाय आईएमएफ टू सप्लीमेंट द

[10:51:18] ऑफिशियल रिजर्व ऑफ मेंबर कंट्रीज। द

[10:51:20] वैल्यू ऑफ़ एसडीआर इज़ बेस्ड ऑन द बास्केट

[10:51:23] ऑफ़ फाइव करेंसी। पांच करेंसियों के

[10:51:25] बास्केट से पता चलता है। इस बास्केट में

[10:51:28] सबसे ज्यादा वेटेज डॉलर को दिया गया है।

[10:51:30] फिर यूरो को दिया गया है। और बाकी फिर

[10:51:32] जापान की करेंसी, चाइना की करेंसी और

[10:51:35] पाउंड की करेंसी इन तीनों को जोड़ते हुए

[10:51:38] मतलब टोटल पांचों का एवरेज लिया जाता है।

[10:51:40] वेटेड एवरेज

[10:51:48] की बातचीत इसमें आती है।

[10:51:51] वेटेड एवरेज की बातचीत इसमें आती है।

[10:51:51] एसडीआर की मुद्रा कीमत का निर्धारण यूएस

[10:51:53] डॉलर में मूल्यों को जोड़कर किया जाता है।

[10:51:55] जो बाजार विनिमय दर मतलब कितना डॉलर कितने

[10:51:59] का आएगा यह इस तरीके से कन्वर्शन के आधार

[10:52:01] पर हर 5 साल में इसकी समीक्षा की जाती है।

[10:52:04] वेटेज परसेंटेज वेटेज चेंज किया जाता है

[10:52:06] पांचप साल में और इसके अकॉर्डिंग डिसाइड

[10:52:09] किया जाता है कि कितना उसको वैल्यू्यूएशन

[10:52:12] दिया जाना चाहिए। कितनी एक एसडीआर कितने

[10:52:15] का होगा। अमेरिकी डॉलर, जापानीयन, ब्रिटिश

[10:52:18] पाउंड, चीनी, युवान और यूरोपियन यूरो इसके

[10:52:20] अंतर्गत आते हैं। सदस्य देशों का मतदान

[10:52:23] अधिकार सीधे उनके कोटे से जुड़ा हुआ रहता

[10:52:25] है। आय में प्रत्येक सदस्य देशों को अपनी

[10:52:27] मुद्रा के विनिमय मूल्य के निर्धारण

[10:52:29] प्रक्रिया चुनने की अनुमति देता है।

[10:52:34] फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व विदेशी मुद्रा

[10:52:36] भंडार जब किसी देश का कैलकुलेट किया जाता

[10:52:38] है तो कितना दुनिया भर की करेंसियां है वह

[10:52:40] होती है। कितना सोने का भंडार है? और

[10:52:43] स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स को भी कैलकुलेट

[10:52:45] करते हैं। साथ ही साथ आईएमएफ के साथ

[10:52:47] रिजर्व ट्रेंच आईएमएफ के साथ रिजर्व

[10:52:49] ट्रेंच मतलब हमने आईएमएफ के निर्माण में

[10:52:52] तो योगदान दिया हुआ है। यह तो कर्जा कितना

[10:52:55] मिल पाएगा उसको दर्शाता है और हमने जो भी

[10:52:57] आईएमएफ में जब निर्माण के समय जो पैसा

[10:53:00] दिया है वो सब हमारा विदेशी करेंसी के रूप

[10:53:02] में काउंट किया जाता है।

[10:53:06] स्वर्ण ट्रांस रिजर्व ट्रेंच जो आईएमएफ के

[10:53:09] द्वारा सदस्य देशों को प्रदत एक साख

[10:53:11] प्रणाली में रखा जाता है। साख प्रणाली

[10:53:13] मतलब एक प्रकार से रिजर्व ट्रांस है। इसको

[10:53:16] सुधार दीजिएगा। यह एक प्रकार से कर्जा

[10:53:18] कितना मिलेगा किसी सदस्य देश को उसको भी

[10:53:21] विदेशी मुद्रा भंडार में जोड़ते और यह

[10:53:23] स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स उसने जो

[10:53:24] कंट्रीब्यूट किया हुआ है आईएमएफ के

[10:53:26] निर्माण में उसको दर्शाता है।

[10:53:30] फिर है डब्ल्यूटीओ बनाना तो हम चाहते थे

[10:53:32] आईटीओ ब्रिटेन वुड में लेकिन बन नहीं

[10:53:35] पाया। तो यूरोपियन देश और अमेरिका ने

[10:53:37] मिलकर एक समझौता कर दिया था। गेट जीएटीटी

[10:53:41] जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड टेरिफ और

[10:53:44] उसकी बैठकें सही टाइम पर नहीं होती थी। कई

[10:53:46] तरीके की बदमाशियां होती थी। भारत जैसा

[10:53:49] देश उसका सदस्य था लेकिन एक धोखेबाजी

[10:53:51] महसूस होती थी।

[10:53:55] तो उनकी बैठकों को राउंड कहते थे। राउंड

[10:53:58] जब इसकी आठवीं बैठक मतलब आठवें राउंड की

[10:54:00] बातचीत चल रही थी तब लोग इससे उब गए थे।

[10:54:03] तब 1991 की घटना के बाद रशिया भी टूट गया

[10:54:07] था। यूएसएसआर भी टूट गया था। तो अब

[10:54:10] यूएसएसआर का मतलब रशिया भी तैयार हो गया

[10:54:12] था अंतरराष्ट्रीय व्यापार संगठन में बनने

[10:54:15] के लिए। तो 1995 में उरुग्व राउंड के

[10:54:19] अंतिम दौर में चर्चाओं के तहत वर्ल्ड

[10:54:22] ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन का निर्माण हुआ और इस

[10:54:24] समय यह बिल्कुल चुपचाप बैठ गया है। बेशर्म

[10:54:27] बन चुका है। दुनिया में व्यापार खराब से

[10:54:29] खराब होता जा रहा है। इसकी डिस्प्यूट

[10:54:31] सेटलमेंट बॉडी काम नहीं कर रही है।

[10:54:33] अमेरिका के द्वारा किए गए एक क्षण पर ये

[10:54:35] कुछ भी नहीं बोल रहा है। बेशर्म जैसी

[10:54:37] संस्था बन चुका है ये भी। विश्व व्यापार

[10:54:39] संगठन एक अंतरराष्ट्रीय संस्था है जो दो

[10:54:42] देशों के बीच व्यापार के नियम तय करती है।

[10:54:44] उनका पालन सुनिश्चित करती है। व्यापार को

[10:54:46] सरलीकृत करना कम से कम बैरियर वाला बनाने

[10:54:49] का लक्ष्य होता है। डब्ल्यूटीओ का मुख्य

[10:54:51] एजेंडा वैश्वीकरण है ताकि एक वैश्वीकृत

[10:54:53] अर्थव्यवस्था की परिकल्पना को साकार किया

[10:54:55] जा सके। डब्ल्यूटीओ एक स्वायत्त, स्वतंत्र

[10:54:58] और वैधानिक अधिकार प्राप्त संस्था है।

[10:55:01] यूनाइटेड नेशन का इससे कोई लेना देना नहीं

[10:55:04] है।

[10:55:05] इट इज नॉट ए पार्ट ऑफ एजेंसी ऑफ यूनाइटेड

[10:55:08] नेशन। पहले आईटीओ बनाना चाह रहे थे। फिर

[10:55:10] गेट बना और गेट के बाद फिर डब्ल्यूटीओ

[10:55:12] आया। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनाना तो

[10:55:14] आईटीओ चाहते थे लेकिन सम्मेलन में कोई

[10:55:16] समझौता नहीं हो पाया। तो 1947 में जनरल

[10:55:19] एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड टेरिफ पर सहमति

[10:55:22] बनी। कुछ देशों ने मिलकर इसको निर्माण

[10:55:24] किया। गेट कोई औपचारिक संगठन नहीं बल्कि

[10:55:26] एक समझौता भरता। धीरे-धीरे टेरिफ और

[10:55:28] व्यापार के मार्ग में इसने कुछ बाधाओं को

[10:55:30] कम किया। लेकिन फिर भी कुछ बेटर परिणाम

[10:55:33] नहीं ला पाया। 1986 से 1994 में इसकी

[10:55:37] उरुग्व दौर की बैठकें शुरू हुई और इस

[10:55:40] उरुग्व दौर की बैठक में व्यापार नियमों को

[10:55:43] व्यापक बनाने, व्यापार में सेवाएं,

[10:55:45] बौद्धिक संपदा को शामिल करने के लिए

[10:55:47] औपचारिक संगठन की स्थापना की आवश्यकता

[10:55:49] महसूस हुई। 15 अप्रैल 1994 को मराकेश में

[10:55:53] मराकेश में विश्व व्यापार संगठन की

[10:55:57] स्थापना हुई और 1 जनवरी 1995 से इसने काम

[10:56:00] करना शुरू किया। डब्ल्यूटीओ ने गेट को हटा

[10:56:03] दिया और उसकी जगह पर एक अंतरराष्ट्रीय

[10:56:05] इंस्टीट्यूशन का काम शुरू किया।

[10:56:08] डब्ल्यूटीओ की स्थापना के साथ गेट का

[10:56:10] अस्तित्व खत्म हो गया। गेट समझौता भरता।

[10:56:12] डब्ल्यूटीओ समझौता नहीं बल्कि एक

[10:56:14] इंस्टट्यूट है। इसमें गेट के अलावा नई

[10:56:17] चीजें जोड़ी गई। सर्विस सेक्टर को भी

[10:56:19] इसमें जोड़ा गया जो कि गेट में नहीं था।

[10:56:21] गेट्स नाम से जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड इन

[10:56:23] सर्विज और ट्रिप्स नामक समझौता जोड़ा गया।

[10:56:26] ट्रेड रिलेटेड एस्पेक्ट ऑफ इंटेलेक्चुअल

[10:56:29] प्रॉपर्टी राइट्स इनको जोड़ा गया। गेट में

[10:56:32] वर्ष 1994 तक 128 हस्ताक्षरकर्ता देश थे।

[10:56:36] मराके समझौते में 123 देशों ने भाग लिया।

[10:56:39] जबकि डब्ल्यूटीओ की स्थापना के समय केवल

[10:56:42] 76 सदस्य देश थे।

[10:56:45] धीरे-धीरे इसके सदस्य बढ़ते गए।

[10:56:47] डब्ल्यूटीओ में अब कुल 166 सदस्य हैं।

[10:56:50] भारत गेट का भी और डब्ल्यूटीओ का भी

[10:56:53] संस्थापक सदस्य रहा है। पर सच में अब ये

[10:56:56] बकवास संस्था बन गई है। मुख्यालय

[10:56:58] स्विट्जरलैंड जिनेवा में है। अमेरिका में

[10:57:00] नहीं क्योंकि वास्तविक रूप में एक

[10:57:02] डेमोक्रेटिक संस्था है। एक राष्ट्र एक वोट

[10:57:04] की यहां पर बात करता है। पर दुख की बात है

[10:57:07] कि ये बड़ी देशों पर कोई एक्शन ले ही नहीं

[10:57:10] पाता है। हिम्मत ही नहीं होती इसकी। 2016

[10:57:13] में अफगानिस्तान को 164वां सदस्य बनाया

[10:57:15] गया। 2024 में अबू धाबी में आयोजित 13वें

[10:57:18] मंत्रीस्तरीय सम्मेलन के दौरान कोमोरोस और

[10:57:21] तिमोर लेस्ते को 165वें और 166वें सदस्य

[10:57:25] के रूप में मान्यता दी गई। मतलब कोमोरोस

[10:57:28] और तिमोर लेस्ते इसके नए सदस्य हैं। गेट

[10:57:31] 1947 में बनाया गया एक समझौता है। यह एक

[10:57:34] जनवरी 1995 में बना। यह एक प्रकार से

[10:57:37] ट्रीटी थी। एक संगठन है। व्यापार में

[10:57:39] टेरिफ और कोटा। कोटा मतलब एक तय मात्रा

[10:57:42] में ही निर्यात किया जा सकता है। आयात

[10:57:44] किया जा सकता है। इसको कोटा कहते थे। इसको

[10:57:46] कम करता था। यह सभी प्रकार के बैरियर को

[10:57:49] खत्म करने की बात करता है। ये केवल

[10:57:50] वस्तुओं पर था। ये वस्तु सेवा और

[10:57:52] इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी पर है। इसका कोई

[10:57:54] ऑफिस नहीं था। इसका बकायदा सेक्रेटेट है।

[10:57:57] ऑफिस है। अस्थाई समझौता था। कानूनी पूर्ण

[10:58:01] कानूनी बाध्यता नहीं थी। पूर्ण कानूनी

[10:58:03] बाध्यता वाला संगठन है। कमजोर और बिना

[10:58:05] समयबद्ध यह थोड़ा मजबूत बनाया गया था।

[10:58:07] लेकिन अभी किसी काम का है नहीं।

[10:58:13] वर्तमान [गला साफ़ करने की आवाज़] में

[10:58:13] व्यापार बाधाओं को कम करना, गैर

[10:58:15] भेदभावकारी सिद्धांत लागू करना, डिजिटल

[10:58:18] युग में व्यापार नियमों को मॉडर्न बनाना,

[10:58:20] पर्यावरण संरक्षण, सस्टेनेबल डेवलपमेंट

[10:58:22] में काम करना, सब कुछ अच्छे उद्देश्य इसके

[10:58:25] हैं। यहां पर ध्यान देना कि यहां थोड़ा

[10:58:27] उल्टा सिस्टम है। सबसे पावरफुल रियल में

[10:58:30] मिनिस्टर कॉन्फ्रेंस है। जितने भी सदस्य

[10:58:32] देश हैं सभी का एक-एक व्यक्ति यहां पर आता

[10:58:35] है जो निर्णय लेता है। इनके निर्णयों को

[10:58:38] लागू करने का काम जनरल काउंसिल का है और

[10:58:40] जनरल काउंसिल के अंडर में डिस्प्यूट

[10:58:43] रेज़ोल्यूशन बॉडी होती है जो दो देशों के

[10:58:45] बीच उत्पन्न विवादों को हल करती है।

[10:58:47] फिलहाल में यह बन नहीं पा रही है। ट्रेड

[10:58:49] पॉलिसी रिव्य्यू बॉडीज होती है। गुड्स

[10:58:51] काउंसिल होती है। सर्विस काउंसिल होती है।

[10:58:53] इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी काउंसिल होती है

[10:58:55] जो वस्तु सेवा और बौद्धिक संपदा पर काम

[10:58:58] करती है। मिनिस्टर कांफ्रेंस सबसे पावरफुल

[10:59:00] बॉडी है। उसके अंडर में जनरल काउंसिल

[10:59:02] होगी। जनरल काउंसिल के अंडर में वस्तुओं

[10:59:05] के लिए एक परिषद होगी। इंटेलेक्चुअल

[10:59:08] प्रॉपर्टी के लिए एक परिषद होगी। सेवाओं

[10:59:10] के व्यापार के लिए एक परिषद होगी।

[10:59:11] नेगोशिएशन ट्रेड नेगोशिएशन के लिए एक

[10:59:14] परिषद होगी। साथ ही साथ इसमें एक प्रकार

[10:59:17] से ट्रेड पॉलिसी के रिव्यू के लिए भी काम

[10:59:19] किया जाएगा और सेटलमेंट डिस्प्यूट

[10:59:21] सेटलमेंट बॉडी भी होगी। जहां पर कोई झगड़े

[10:59:24] होंगे। उसके साथ-साथ एपिलेट बॉडी भी होगी

[10:59:26] कि अगर मान लो डिस्प्यूट सेटलमेंट से आप

[10:59:28] संतुष्ट नहीं है तो पुनः अपील कर सकते

[10:59:31] हैं। जैसे भारत अमेरिका के बीच में

[10:59:33] व्यापारिक समझौता नहीं हो पा रहा है तो

[10:59:34] डिस्प्यूट सेटलमेंट बॉडी में हम जा सकते

[10:59:36] थे।

[10:59:38] डब्ल्यूटीओ की संरचना में मंत्री सम्मेलन

[10:59:40] सर्वोच्च प्राधिकरण है जिसका गठन

[10:59:42] डब्ल्यूटीओ के सभी सदस्य देशों से मिलकर

[10:59:44] होता है और इसमें हर दो साल में एक बार यह

[10:59:48] जरूर मिलते हैं। वह हर साल मिलते हैं

[10:59:49] वर्ल्ड बैंक वाले और आईएमएफ वाले। मंत्री

[10:59:52] स्तरीय सम्मेलन के सदस्य बहुपक्षीय

[10:59:54] व्यापार समझौते के सभी मामलों पर निर्णय

[10:59:56] लेते हैं। सामान्य परिषद जनरल काउंसिल

[10:59:59] होती है जो जिनेवा में स्थित सामान्य

[11:00:01] परिषद पूरी तरह से सारे कामकाज को देखती

[11:00:03] है।

[11:00:05] विवाद समाधान निकाय डब्ल्यूटीओ का एक ऐसी

[11:00:09] बॉडी जो सदस्य देशों के बीच में व्यापारिक

[11:00:11] विवादों को हल करने में मदद करती थी। एक

[11:00:13] न्यायिक शाखा है। लेकिन सामान्यत अभी यह

[11:00:16] बन ही नहीं पा रही है। विवादों की सुनवाई

[11:00:19] करते थे। शिकायत कर सकते थे। अमेरिका की

[11:00:21] शिकायत हम करते थे। चाइना की शिकायत करते

[11:00:23] थे। चाइना हमारी शिकायत करता था और फिर

[11:00:25] समाधान निकाले जाते थे। पर फिलहाल में यह

[11:00:28] तंत्र हालांकि हाल के वर्षों में अपीली

[11:00:31] निकाय में नियुक्तियों को लेकर विवाद है।

[11:00:33] विशेष रूप से अमेरिका के द्वारा अवरोध

[11:00:34] किया जा रहा है। इस कारण से काम नहीं कर

[11:00:37] पा रहे हैं। फिर है ट्रेड पॉलिसी रिव्य्यू

[11:00:39] बॉडी। डब्ल्यूटीओ की सामान्य परिषद के

[11:00:41] अधीन काम करती है। डब्ल्यूटीओ की निगरानी

[11:00:44] शाखा है जो देखती है कि व्यापार पॉलिसी

[11:00:46] ट्रांसपेरेंट चल रही है। सुधर रही है कि

[11:00:48] नहीं। डब्ल्यूटीओ के प्रत्येक सदस्य देश

[11:00:50] की व्यापार नीति और प्रथाओं की समय-समय पर

[11:00:53] ये जांच करते हैं। सदस्य देशों में

[11:00:55] व्यापार को सरलीकृत करना, उदारीकरण को

[11:00:58] प्रेरित करना, ज्यादा से ज्यादा बैरियर

[11:01:00] खत्म करना, टैक्सेस जो कस्टम ड्यूटी है

[11:01:02] उसके टैक्सेस को कम करने का मकसद होता है।

[11:01:07] व्यापार नीति समीक्षा निकाय और डिस्प्यूट

[11:01:09] सेटलमेंट बॉडी दोनों डब्ल्यूटीओ के

[11:01:11] महत्वपूर्ण अंग है। डीसीबी व्यापारियों के

[11:01:13] नियमों के उल्लंघन को संबोधित करता है कि

[11:01:16] भाई यहां आपने उल्लंघन किया था। जबकि

[11:01:18] टीपीआरबी नीतियों के ट्रांसपेरेंसी और

[11:01:20] सुधार पर ध्यान देते हैं। दोनों मिलकर

[11:01:22] वैश्विक व्यापार प्रणाली को मजबूत और

[11:01:24] निष्पक्ष बनाते हैं। डब्ल्यूटीओ में एक

[11:01:26] डायरेक्टर जनरल होता है। यह चुना जाता है।

[11:01:28] यह कोई भी बन सकता है। वास्तविक रूप में

[11:01:31] महानिदेशक का निर्वाचन डब्ल्यूटीओ के सभी

[11:01:33] सदस्य देश सर्वस्मति से करते हैं। एक

[11:01:36] व्यक्ति को एक ही वोट दिया गया। यहां कोई

[11:01:38] कोटावोटा सिस्टम नहीं है। 4 साल के लिए

[11:01:40] महानिदेशक चुने जाते हैं। डब्ल्यूटीओ के

[11:01:43] मूल सिद्धांत क्या हैं? मोस्ट फेवर्ड

[11:01:46] नेशन। मोस्ट फेवर्ड नेशन का सिंपल सा मतलब

[11:01:48] है कि अगर आप किसी दूसरे नेशन को जितना

[11:01:51] महत्वपूर्ण मानते हैं सभी नेशन को ऐसा ही

[11:01:54] मानोगे। इसका नाम है मोस्ट फेवर्ड नेशन जो

[11:01:57] अपने बेस्ट से बेस्ट नेशन के साथ आप

[11:01:59] रियायतें दे रहे हैं। सभी देशों को ऐसी

[11:02:01] रियायतें देंगे। बाध्यकारी टेरिफ इसका

[11:02:03] मतलब आप इससे ज्यादा कस्टम ड्यूटी नहीं ले

[11:02:06] सकते हैं। टैक्स नहीं ले सकते हैं। और

[11:02:09] बाहर के वस्तु को भी आप नेशनल वस्तु जैसा

[11:02:11] ही ट्रीटमेंट करेंगे। सरकारें किसी बाहर

[11:02:14] की वस्तु के साथ भेदभाव नहीं करेगी। की

[11:02:16] किसी योजना में मोस्ट फेवर्ड नेशन बहुत

[11:02:18] सिंपल सा कांसेप्ट है। एक विशेष दर्जा

[11:02:21] होता है जो व्यापार में सहयोगी देशों को

[11:02:23] प्रदान करते हैं। एमएफएन देश को आश्वस्त

[11:02:25] किया जाता है कि उसके साथ व्यापार करने

[11:02:27] में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होगा।

[11:02:29] डब्ल्यूटीओ के नियमों के अनुसार सभी सदस्य

[11:02:32] देशों को अन्य सभी सदस्य देशों के साथ

[11:02:34] एमएफएन के तौर पर व्यवहार करना है।

[11:02:37] हालांकि वर्ल्ड व्यापार संगठन के आर्टिकल

[11:02:40] 21 बी के तहत कोई देश उस स्थिति में किसी

[11:02:42] देश से एमएफएन का दर्जा वापस ले सकता है

[11:02:44] जब दोनों देश के बीच सुरक्षा संबंधी

[11:02:46] मुद्दों का विवाद हो कि भाई हमला हो गया

[11:02:48] तो वहां वो मोस्ट फेवर नेशन का दर्जा छीन

[11:02:50] लेते हैं। एमएफएन दर्जे को निलंबित करने

[11:02:53] के लिए कोई औपचारिक प्रक्रिया नहीं होती

[11:02:54] है। बस सदस्य देश कह देगा कि फलाना देश को

[11:02:57] अब हम एमएफएन का दर्जा नहीं देंगे तो वह

[11:02:59] खत्म कर दिया जाएगा। उस देश का एमएफएन का

[11:03:02] दर्जा। क्षेत्रीय व्यापार समझौते भी इसमें

[11:03:05] अपवाद में है। जैसे मान लीजिए कि हमने

[11:03:07] भारत ने श्रीलंका के साथ, बांग्लादेश के

[11:03:10] साथ, नेपाल के साथ, भूटान के साथ मिलकर

[11:03:13] बहुत ही व्यापार को खत्म करने का व्यापार

[11:03:16] के अवरोधों को खत्म करने का निर्णय लिया।

[11:03:19] तो अमेरिका हमें ये नहीं कहेगा कि देखो ये

[11:03:22] श्रीलंका के साथ मोस्ट फेवर्ड नेशन के रूप

[11:03:24] में अच्छा काम कर रहा है। तो इसका अपवाद

[11:03:26] है। रीजनल क्षेत्र में भी तो व्यापार के

[11:03:29] बाधाएं रोक ही रहे हम लोग। तो अगर रीजनल

[11:03:31] क्षेत्र में बाधाओं को रोकने के लिए कोई

[11:03:33] अलग एग्रीमेंट हुआ है तो इसका कोई उल्लंघन

[11:03:35] नहीं माना जाता है। वरीयता प्रदान करने

[11:03:38] वाली एक जनरल प्रणाली। अगर अमीर देशों की

[11:03:40] बात करें तो अमीर देश गरीब और विकासशील

[11:03:43] देशों को अपने यहां पर सामान को आने में

[11:03:45] मदद करने देंगे। ये मोस्ट फेवर्ड नेशन का

[11:03:48] उल्लंघन नहीं माना जाता है। टेरीफ

[11:03:50] बाइंडिंग के लिए अधिकतम शुल्क सीमा तय की

[11:03:53] जाएगी और इसके लिए दोहा में एक बैठक हुई

[11:03:56] थी जिसमें तय कर दिया गया था कि टेरिफ

[11:03:58] बाइंडिंग के तहत इतना ही टैक्स लिया

[11:04:00] जाएगा। जो ज्यादा देश ज्यादा टेरिफ लगाते

[11:04:03] थे उनको ज्यादा कटौती करनी थी। जो कम

[11:04:05] टेरिफ लगाते थे उनको कम कटौती करनी थी।

[11:04:07] फिर नेशनल ट्रीटमेंट का मतलब है कि अनुसार

[11:04:10] जब भी कोई विदेशी वस्तु एक देश की सीमा

[11:04:12] में प्रवेश करती है तो उस वस्तु के साथ

[11:04:14] घरेलू वस्तुओं की तरह ही व्यवहार किया

[11:04:16] जाएगा। मतलब केवल सीमा शुल्क उससे ले सकते

[11:04:19] हैं लेकिन आप उसको ऐसा फील नहीं कराएंगे

[11:04:21] वस्तु को कि ये विदेशी वस्तुएं खास करके

[11:04:23] सरकार। इसके अलावा डब्ल्यूटीओ के कुछ और

[11:04:26] समझौते हुए थे। ट्रिप्स ट्रिप्स का मतलब

[11:04:29] है कॉपीराइट पेटेंट इंटेलेक्चुअल

[11:04:31] प्रॉपर्टी राइट्स का संरक्षण देश में सभी

[11:04:33] देशों में किया जाना चाहिए।

[11:04:36] ट्रिम्स ट्रेड रिलेटेड इन्वेस्टमेंट मेजर

[11:04:38] इन्वेस्टमेंट को आकर्षित करने के लिए कोई

[11:04:40] देश ऐसी ऐसी सुविधाएं नहीं देगा जिससे कि

[11:04:43] व्यापार या इन्वेस्टमेंट एक तरफ़ा हो जाए।

[11:04:47] एग्रीमेंट ऑन टेक्सटाइल और कॉटन।

[11:04:49] टेक्सटाइल और कॉटन में कोई कोटा सिस्टम

[11:04:51] नहीं लगेगा। कोई व्यक्ति कितना भी कॉटन,

[11:04:54] कितना भी कपड़ा इंपोर्ट एक्सपोर्ट कर सकता

[11:04:56] है। जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड सर्विज

[11:04:58] में भी इस बात पर जोर दिया गया है कि कहीं

[11:05:01] ना कहीं जितने भी सर्विस से जुड़े हुए

[11:05:04] मामले रहेंगे, जितने भी ऐसे मामले रहेंगे

[11:05:06] जहां पर हम बातचीत करते हैं जनरल

[11:05:08] एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड सर्विज सेवा

[11:05:10] क्षेत्र से जुड़े गए जितने भी विवाद है

[11:05:13] उसको भी कम किया जाए। और एग्रीमेंट ऑन

[11:05:16] एग्रीकल्चर के तहत क्या किया जाएगा? तो

[11:05:18] एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर के तहत एग्रीमेंट

[11:05:22] ऑन एग्रीकल्चर के तहत किसी भी देश को

[11:05:25] कितनी सब्सिडी देनी है इसका भी डिसीजन

[11:05:27] लिया गया। तो सबसे पहले ट्रिप्स वैसे तो

[11:05:30] 1995 में डब्ल्यूटीओ की स्थापना के साथ यह

[11:05:33] लागू हुआ। ट्रिप्स समझौता ऑलरेडी था विपो

[11:05:37] के अंतर्गत। पर विपो के अंतर्गत बाने के

[11:05:40] बाद फिर डब्ल्यूटीओ में इसको लाया गया कि

[11:05:42] सभी सदस्य देश किसी भी देश के कॉपीराइट

[11:05:45] ट्रेडमार्क पेटेंट इन सबका सम्मान करेंगे।

[11:05:48] अपने देश में इनकी चोरियों को रोकने की

[11:05:50] मदद करेंगे। हम ऑलरेडी इसको पढ़ चुके हैं

[11:05:52] साइंस एंड टेक्नोलॉजी में।

[11:05:57] ट्रिप समझौते के अंतर्गत बौद्धिक संपदा

[11:05:59] अधिकारों की विस्तृत परिभाषा दी गई।

[11:06:01] डब्ल्यूटीओ सदस्य देशों को सुनिश्चित करना

[11:06:03] होता है कि वह कम से कम 20 वर्षों तक किसी

[11:06:05] भी आविष्कार उत्पाद या प्रक्रिया को

[11:06:07] पेटेंट सुरक्षा प्रदान करें। पेटेंट धारक

[11:06:10] को उचित और पारदर्शी शर्तों पर लाइसेंस

[11:06:12] देने की अनुमति देनी होगी। एक प्रकार की

[11:06:14] सुविधा रहेगी। ट्रिप समझौता सदस्य देशों

[11:06:17] को सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल में

[11:06:19] पेटेंट धारक की अनुमति के बिना जेरिक दवा

[11:06:22] उत्पादन की भी अनुमति देते हैं। कई सुधार

[11:06:24] भी किए गए। ट्रेड रिलेटेड इन्वेस्टमेंट

[11:06:26] मेजर ट्रिम समझौता व्यापार से संबंधित

[11:06:29] निवेश उपाय को नियंत्रित करता है। इसे भी

[11:06:32] डब्ल्यूटीओ में जगह दी गई है।

[11:06:35] समझौता विशेष रूप से उन निवेश नीतियों पर

[11:06:38] ध्यान देता है जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार

[11:06:39] को प्रभावित करते हैं। मुख्य रूप से

[11:06:41] विकासशील और विकसित देशों के बीच निवेश

[11:06:43] नीतियों में ट्रांसपेरेंसी लाने की कोशिश

[11:06:46] करता है। ट्रिम्स के अंतर्गत क्या है? कोई

[11:06:49] भी देश ऐसे निवेश नियम लागू नहीं कर सकता

[11:06:51] जो विदेशी उत्पादकों की तुलना में घरेलू

[11:06:53] उत्पादकों को लाभ दें। क्योंकि भाई आप ऐसा

[11:06:56] कर सकते हैं इन्वेस्टमेंट में कि घरेलू

[11:06:57] उत्पादकों के साथ बेनिफिट हो सके। तो इससे

[11:07:00] तो भेदभाव हो जाएगा। यह समझौता उन निवेश

[11:07:03] उपायों को भी प्रतिबंधित करता है जो आयात

[11:07:05] निर्यात पर मात्रात्मक प्रतिबंध लगाते

[11:07:07] हैं। कोई भी देश विदेशी कंपनियों के लिए

[11:07:09] अनिवार्य नहीं कर सकता है कि वह अपने

[11:07:11] उत्पाद में घरेलू कच्चे माल का एक निश्चित

[11:07:13] प्रतिशत उपयोग करें। यह सब सुविधाएं इसमें

[11:07:16] रखी गई थी। कोई देश विदेशी निवेशकों के

[11:07:18] लिए अनिवार्य नहीं कर सकता कि वो अपने

[11:07:20] उत्पाद का एक निश्चित हिस्सा निर्यात करें

[11:07:22] कि इतना तुम्हें एक्सपोर्ट करना ही

[11:07:23] पड़ेगा। ऐसी कोई शर्त नहीं लगा सकते हैं।

[11:07:26] इन्वेस्टर्स के लिए उनकी आयात और निर्यात

[11:07:28] को संतुलित करने की शर्तें लागू नहीं की

[11:07:30] जा सकती। कोई देश यह नहीं कह सकता कि कोई

[11:07:32] कंपनी उतना ही आयात करेगी जितना कि वो

[11:07:34] निर्यात कर रही है। क्योंकि हम चाह रहे थे

[11:07:36] कि इन्वेस्टमेंट को बिल्कुल आराम से किया

[11:07:39] जा सके।

[11:07:41] कोई देश निवेशकों पर ऐसी शर्त नहीं लगा

[11:07:43] सकती कि उसके विदेशी मुद्रा उपयोग को उनके

[11:07:46] निर्यात आय से जोड़ा जाए। कोई देश ऐसे

[11:07:48] विदेशी निवेशक को टेक्नोलॉजी हस्तांतरण के

[11:07:50] लिए बाध्य नहीं कर सकती है। सदस्य देशों

[11:07:53] को अपनी निवेश नीति और उपायों को

[11:07:54] डब्ल्यूटीओ को सूचित करना पड़ता है ताकि

[11:07:57] ट्रांसपेरेंसी रहे कि सदस्य देश ने

[11:07:59] इन्वेस्टमेंट के लिए यह उपाय किए हैं।

[11:08:01] विकसित देशों को ट्रिम समझौते के अनुरूप

[11:08:04] अपनी नीतियों को समायोजित करने के लिए 2

[11:08:06] साल का समय दिया गया था कि भाई अमीर लोग 2

[11:08:08] साल में सुधर जाओ और जो गरीब विकासशील देश

[11:08:11] थे उन्हें 5 से 7 साल का समय दिया गया था।

[11:08:16] व्यापार संबंधित निवेश उपाय के संदर्भ में

[11:08:19] विदेशी निवेशकों द्वारा किए जाने वाले

[11:08:21] आयात पर परिणात्मक निर्बंधन निषिद्ध है

[11:08:23] मतलब नहीं लगा सकते। यह वस्तु सेवाओं

[11:08:26] दोनों के व्यापार संबंधित निवेश उपायों पर

[11:08:28] लागू होते हैं। यह विदेशी निवेश के नियमन

[11:08:31] से संबंधित नहीं है। आंसर आएगा पहला और

[11:08:34] दूसरा क्योंकि ये फॉरेन इन्वेस्टमेंट से

[11:08:37] जुड़ा हुआ ही है। फिर है एग्रीमेंट ऑन

[11:08:39] टेक्सटाइल एंड कॉटन। एक प्रकार से इसमें

[11:08:42] क्या होता था? अब ये तो सब जगह हो गया है।

[11:08:44] पहले कॉटन का एक्सपोर्ट कितना होगा उसका

[11:08:47] कोटा तय कर दिया गया था। ये सब कोटे बंद

[11:08:49] करने की बातचीत की गई थी। 10 साल का समय

[11:08:52] दिया गया था कि भाई सभी लोग ये कोटावोटा

[11:08:54] सिस्टम बंद करेंगे। जिसको जितना एक्सपोर्ट

[11:08:56] करना है इंपोर्ट करना है किया जा सके।

[11:09:01] फिर है जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एंड

[11:09:03] सर्विज। एक बहुत मल्टीलटरल एग्रीमेंट था।

[11:09:06] समझौता सेवा व्यापार को भी वस्तु व्यापार

[11:09:09] की तरह लेता है। एक देश से दूसरे देश में

[11:09:11] आना जाना आसानी से हो सके। मुक्त और

[11:09:13] निष्पक्ष ट्रांसपेरेंसी गैर भेदभावपूर्ण

[11:09:16] अंतरराष्ट्रीय व्यापार इससे मजबूत होगा।

[11:09:18] इसमें गेट्स में चार तरीके की चीजें हैं।

[11:09:21] एक तो है मोड मोड वन सीमा पार्ट सप्लाई।

[11:09:24] सेवा एक देश से दूसरे देश में प्रदान की

[11:09:26] जा सकती है। जैसे ऑनलाइन परामर्श

[11:09:28] टेलीमेडिसिन इस पर कोई प्रतिबंध ना लगाए

[11:09:30] यह ध्यान देता है। उपभोग विदेश में

[11:09:33] उपभोक्ता सेवा प्राप्त करने के लिए

[11:09:35] प्रदाता के देश में जाता है। मतलब पर्यटन

[11:09:37] करना विदेश में शिक्षा के लिए इसमें भी

[11:09:40] कोई प्रतिबंध ना लगाए इस पर यह ध्यान देता

[11:09:42] है। वाणिज्यिक उपस्थिति विदेशी बैंक बीमा

[11:09:45] कंपनियां अन्य देशों में अपनी शाखाएं खोल

[11:09:47] सकती है। केएफसी जैसी डोमिनो जैसी चीजें

[11:09:50] अपने अन्य देशों में शाखाएं खोल सकती हैं

[11:09:52] और व्यक्तियों की आवाजाही सेवा प्रदाता

[11:09:55] कंपनी व्यक्ति अस्थाई रूप से दूसरे देश

[11:09:57] में जाकर सेवाएं दे सकता है। फिलहाल में

[11:10:00] कई सारे देश इसका उल्लंघन कर रहे हैं।

[11:10:02] जैसे अमेरिका भी तो अपने यहां वीजा कठोर

[11:10:04] से कठोर कर रहा है। चौथे मोड़ का उल्लंघन

[11:10:06] कर रहा है।

[11:10:11] बातें बहुत बड़ी-बड़ी की गई लेकिन सर्विस

[11:10:13] सेक्टर में उतना कुछ काम नहीं हो पाया है।

[11:10:16] तीन विवाद का हिस्सा नहीं है। बाकी सब के

[11:10:18] सब विवाद के हिस्से माने जाते हैं। झगड़े

[11:10:20] होते रहते हैं। इसमें

[11:10:23] मोड चार तो सबसे ज्यादा विवादास्पद है।

[11:10:26] मोड चार अगर सही तरीके से लागू किया जाए

[11:10:28] तो वीजा ही खत्म हो जाएगा। वीजा देने की

[11:10:30] जरूरत ही ना पड़े।

[11:10:35] फिर है इसमें एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर। यह

[11:10:39] समझौता डब्ल्यूटीओ की स्थापना के साथ हुआ।

[11:10:41] कृषि व्यापार का उदारीकरण करने के लिए

[11:10:44] दुनिया भर के एग्रीकल्चर प्रोडक्ट को

[11:10:46] आसानी से व्यापार में उपयोग करने के लिए

[11:10:48] जिसमें यह बात तय की गई कि सब्सिडी कितनी

[11:10:50] दी जाएगी? टेरिफ में कमी की जाएगी। विकसित

[11:10:53] देशों का औसतन 36% और विकासशील देशों को

[11:10:56] 24% तक एग्रीकल्चर टेरिफ कम करना पड़ेगा।

[11:11:00] गैर टेरीफ बाधाओं का टेरिफीकरण मतलब खास

[11:11:03] करके

[11:11:05] कभी-कभी जानबूझकर कहा जाता था कि इसमें

[11:11:07] फर्टिलाइजर ज्यादा है। इसके अंतर्गत

[11:11:09] कीटनाशक है। मजदूर बाल श्रम का उपयोग किया

[11:11:12] गया। ऐसे टेरिफ को भी कम करने की बातचीत

[11:11:15] हुई।

[11:11:17] कुछ देशों को आयात में अचानक वृद्धि या

[11:11:19] मूल्य में गिरावट से अपने घरेलू उत्पादकों

[11:11:21] को बचाने के लिए टेंपरेरी अतिरिक्त टेरिफ

[11:11:24] लगाने की व्यवस्था दी गई है कि भाई अगर

[11:11:26] कभी आपको ऐसा लगे कि आपके देश के लोगों को

[11:11:28] नुकसान हो रहा है तो आप लगा सकते हैं।

[11:11:31] एग्रीकल्चर एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर में

[11:11:34] किसानों को कितनी सब्सिडी दी जाएगी? तो

[11:11:36] इसको एक बॉक्स में रख दिया गया। ग्रीन

[11:11:38] बॉक्स के अंतर्गत ऐसी सब्सिडियां है जिससे

[11:11:40] व्यापार पर कोई भी विकृति पैदा नहीं होती।

[11:11:42] जैसे पर्यावरण संरक्षण कार्यक्रम के लिए

[11:11:44] रिसर्च करने के लिए डिजास्टर के समय जो

[11:11:47] मदद की जाती है सरकारों के द्वारा किसानों

[11:11:49] को उसे कहते हैं ग्रीन बॉक्स सब्सिडी उस

[11:11:51] पर कोई झगड़ा नहीं है। ब्लू बॉक्स सब्सिडी

[11:11:54] में ऐसी आर्थिक सहायता दी जाती है जो

[11:11:56] कृषकों को उत्पादों के उत्पादन में

[11:11:58] मात्रात्मक कमी लाने हेतु सरकार द्वारा दी

[11:12:00] जाती है। मतलब जानबूझ के सरकार कहती है कि

[11:12:03] इसमें उत्पादन थोड़ा कम कर दो। इसके लिए

[11:12:05] मदद भी करती है सरकार। इससे भी कोई ज्यादा

[11:12:07] नुकसान नहीं होता है। अंबरब बॉक्स सब्सिडी

[11:12:10] ये सबसे ज्यादा बुरी मानी जाती है। ब्लू

[11:12:12] और ग्रीन बॉक्स के अलावा सभी सब्सिडियां

[11:12:14] इसमें आती है और इसके लिए तय कर दिया गया

[11:12:16] है कि अमीर देश अपने कुल एग्रीकल्चर

[11:12:19] प्रोडक्शन का 5% से ज्यादा टैक्स सब्सिडी

[11:12:22] नहीं दे सकते हैं और भारत जैसे विकासशील

[11:12:24] अपने कुल एग्रीकल्चर प्रोडक्शन के 10% से

[11:12:27] ज्यादा सब्सिडी नहीं दे सकते हैं। क्योंकि

[11:12:30] इसके कारण विकृतियां आती है। पीस क्लॉज़

[11:12:33] डब्ल्यूटीओ के कृषि समझौते के आर्टिकल 13

[11:12:36] को संदर्भित करने के लिए व्यापार वार्ता

[11:12:38] कलों द्वारा उपयोग किया जाने वाला एक शब्द

[11:12:40] है। डब्ल्यूटीओ के 2013 में बाली मंत्री

[11:12:43] स्तरीय बैठक में भारत के साथ यह समझौता

[11:12:45] हुआ था। क्योंकि गेहूं चावल के लिए कई बार

[11:12:48] भारत पर आरोप लगाए जाते थे कि सरकार

[11:12:50] ज्यादा सब्सिडी दे रही है। किसी भी देश को

[11:12:52] अपने लोगों के खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम से

[11:12:54] कानूनी रूप से रोका नहीं जाएगा। भले ही

[11:12:56] सब्सिडी कृषि पर डब्ल्यूटीओ समझौते में

[11:12:59] निर्दिष्ट सीमाओं का भले ही उल्लंघन करती

[11:13:01] हो। ये प्रावधान तब तक लागू रहेगा जब तक

[11:13:03] खाद्य भंडारण की समस्या का एक परमानेंट

[11:13:06] सॉल्यूशन नहीं मिल जाता। मतलब भाई हम अपने

[11:13:08] देश के लोगों को अनाज उत्पादन करने के लिए

[11:13:10] अगर किसानों को ज्यादा मदद भी दे रहे हैं

[11:13:12] तो आप नाराज मत होइए क्योंकि हम अपने देश

[11:13:14] में फूड सिक्योरिटी तो बेटर कर सकते हैं

[11:13:16] कि नहीं?

[11:13:18] फिर है एशियन डेवलपमेंट बैंक। ये हमारे

[11:13:20] देश में एशिया के विकास के लिए विकसित

[11:13:23] देशों ने मिलकर बनाया था। एशियन डेवलपमेंट

[11:13:26] बैंक।

[11:13:28] 1966 में मनीला फिलीपींस में मुख्यालय

[11:13:31] स्थापना के समय भारत सहित 31 सदस्य देश

[11:13:33] थे। वर्तमान सदस्य 69 हैं। 69 ऐसा नहीं है

[11:13:37] कि केवल एशिया के लोग हैं। बाहर के भी हैं

[11:13:39] जो पैसा देना चाहते हैं। भले ही वो कर्जे

[11:13:41] नहीं लेते। नवीनतम सदस्य इजराइल है।

[11:13:43] एशियाई डेवलपमेंट आउटलुक ये पब्लिश करता

[11:13:46] है। इसका अध्यक्ष हमेशा ही जापान का

[11:13:48] व्यक्ति रहता है क्योंकि अमेरिका और जापान

[11:13:50] दोनों मिलकर इसका वोटिंग राइट सबसे

[11:13:51] हाईएस्ट है। अध्यक्ष पुनः निर्वाचित हो

[11:13:54] सकता है। एडीबी का प्रारूप वर्ल्ड बैंक के

[11:13:56] बिल्कुल जैसा है। एडीबी में वैसा ही है

[11:13:58] वोटिंग सिस्टम। एशियन डेवलपमेंट बैंक में

[11:14:01] जिसका वोटिंग राइट्स उतना ही उसको वोटिंग

[11:14:05] जितना कोटा उतना ही उसका वोटिंग राइट्स

[11:14:07] रहेगा। जापान का 15.6 अमेरिका का 15.6 चीन

[11:14:12] का 6.4 भारत का 6.3 और ऑस्ट्रेलिया का 5.8

[11:14:16] है।

[11:14:18] जापान के द्वारा पहले इसकी शुरुआत की गई

[11:14:21] फिर अमेरिका ने एक कहा कि अब इसको हम एक

[11:14:23] प्रकार से एशियन डेवलपमेंट बैंक बना देते

[11:14:25] हैं। एशियन डेवलपमेंट बैंक मूल रूप से

[11:14:27] एशिया पेसिफिक रीजन में गरीब देशों की मदद

[11:14:30] करता है। भारत ने भी कई सारे कर्जे इससे

[11:14:32] लेकर रखे हुए हैं।

[11:14:38] क्लाइमेट एक्शन के लिए, प्राइवेट सेक्टर

[11:14:40] डेवलपमेंट के लिए, रीजनल कोऑपरेशन के लिए,

[11:14:43] डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन के लिए। फिर है

[11:14:45] एशियाई इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट

[11:14:47] बैंक। क्योंकि एशियन डेवलपमेंट बैंक की

[11:14:50] प्रॉब्लम है कि ये कोटा सिस्टम पर बेस्ड

[11:14:52] है। तो हमने कहा भ हम भी ऐसा बैंक

[11:14:53] बनाएंगे। तो जो ब्रिक्स देश है उन्होंने

[11:14:57] मिलकर एक बैंक बनाया एशियाई

[11:14:59] इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक गरीब

[11:15:01] देशों की मदद के लिए। एक बहुपक्षीय विकास

[11:15:05] बैंक है। 2015 में बनाया गया। 2016 में

[11:15:08] परिचालन हुआ। बीजिंग चीन में मुख्यालय

[11:15:10] स्थापना के समय भारत सहित 57 सदस्य देश

[11:15:13] थे। वर्तमान सदस्यों की संख्या 111 है।

[11:15:15] बिना किसी शर्त के कर्जे देता है ये।

[11:15:18] एशियन डेवलपमेंट बैंक तो ये कर्जे लगाता

[11:15:20] है। एक अध्यक्ष पांच उपाध्यक्ष होंगे।

[11:15:22] एआईआईबी के सभी शेयर धारकों द्वारा 5 वर्ष

[11:15:25] के लिए चुना जाता है। अध्यक्ष पुनर्वाचन

[11:15:27] का पात्र रहेगा। इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाने

[11:15:30] के लिए सड़कें बनाने के लिए रेलवे का जाल

[11:15:33] बनाने के लिए कर्जे देता है। ये छोटा है

[11:15:35] ये फिलहाल में। जिन लुकिन इस समय इसके

[11:15:37] अध्यक्ष हैं।

[11:15:42] एआईबी की शुरुआत 100 बिलियन डॉलर अमेरिकी

[11:15:45] डॉलर से हुई थी। 20% राशि तुरंत जमा करनी

[11:15:48] थी। वैसी नेम चीज थी। इसमें

[11:15:56] बैंक के बड़े हिस्सेदार चीन का वोटिंग

[11:15:58] राइट 26% है। भारत की वोटिंग राइट 7.5%

[11:16:02] है। रशिया का वोटिंग राइट 6% है। यहां पर

[11:16:04] भी कहीं ना कहीं वोटिंग राइट उसी के

[11:16:06] अकॉर्डिंग रखा गया है। कहीं ना कहीं बैंक

[11:16:08] में कुल मतदान क्षमता का 75% हिस्सा

[11:16:11] क्षेत्रीय सदस्यों का रहेगा। यह शर्त है

[11:16:13] कि एशियाई लोगों का 75% योगदान रहेगा। कॉल

[11:16:18] अप शेयर पूंजी वह राशि जो निवेशक बाद में

[11:16:20] देने के लिए तैयार होते हैं। यह राशि जमा

[11:16:22] नहीं होती है। निवेशक की जिम्मेदारी रहती

[11:16:24] है कि बैंक कहने पर इसे जमा करेगा।

[11:16:26] एआईआईबी बैंक एशिया के बाहर भी ऋण दे सकता

[11:16:28] है। बशर्त कि वह एशिया के साथ जुड़ाव रखता

[11:16:31] हो। ऋण एक वैश्विक सार्वजनिक हित के लिए

[11:16:33] होता है। एशिया को इससे लाभ हो सकता है।

[11:16:35] ऐसे ऋण गैर क्षेत्रीय ऋण की अधिकतम सीमा

[11:16:37] 25% रहेगी और क्षेत्र एशिया क्षेत्र को

[11:16:40] 75% ऋण मिलेगा। फिर आया न्यू डेवलपमेंट

[11:16:43] बैंक जिसको ब्रिक्स बैंक भी कहते हैं। यह

[11:16:46] ब्रिक्स देशों ने मिलकर बनाया वर्ल्ड बैंक

[11:16:48] को चैलेंज करने के लिए। एशियाई

[11:16:50] इंफ्रास्ट्रक्चर बैंक किसको चैलेंज करता

[11:16:52] है? एशियन डेवलपमेंट बैंक को। और न्यू

[11:16:55] डेवलपमेंट बैंक किसको चैलेंज करता है?

[11:16:56] वर्ल्ड बैंक को। स्थापना का विचार 2012

[11:16:59] में दिल्ली के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में

[11:17:01] हुआ था। 2013 में दक्षिण अफ्रीका के डरबन

[11:17:04] में इसके बारे में सहमति हुई। और 2014 में

[11:17:07] ब्राजील के पोर्ट लेजा में इसका फाइनली

[11:17:10] निर्माण कर दिया गया। विश्व बैंक और

[11:17:12] आईएमएफ के विकल्प के रूप में एक मल्टीटरल

[11:17:16] डेवलपमेंट बैंक है। इसे कई बार पूछा जाता

[11:17:19] है फोर्ट लेजर डिक्लेरेशन का मतलब क्या

[11:17:21] है? तो ब्रिक्स से जुड़ा हुआ डिक्लेरेशन

[11:17:23] था।

[11:17:25] 2018 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसको

[11:17:27] परवेक्षक का दर्जा दिया। का शंघाई चीन में

[11:17:30] मुख्यालय है। दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील

[11:17:32] में इसके क्षेत्रीय कार्यालय है और इसमें

[11:17:34] कोई भी वोटिंग राइट्स कोटे पर बेस्ड नहीं

[11:17:37] है बल्कि एक देश एक वोट है। विश्व बैंक के

[11:17:40] पूंजीगत हिस्से के आधार पर मतदान प्रणाली

[11:17:42] के बजाय न्यू डेवलपमेंट बैंक या brिक्स

[11:17:44] बैंक में प्रत्येक भागीदार देश को एक वोट

[11:17:46] ही दिया गया है। एनडीबी के संस्थापक

[11:17:49] सदस्यों की संयुक्त मतदान शक्ति कम से कम

[11:17:51] 55% रहेगी। मतलब ब्राजील, रशिया, इंडिया,

[11:17:55] चाइना, साउथ अफ्रीका इसके संस्थापक सदस्य

[11:17:58] रहे। फिर बांग्लादेश, यूनाइटेड अरब

[11:18:00] अमीरात, इजिप्ट, अल्जेरिया

[11:18:03] इसके सदस्य देश बन चुके हैं और आने वाले

[11:18:06] टाइम में यह भी जल्दी बनेंगे। 100 बिलियन

[11:18:08] डॉलर से शुरू किया गया था। वैश्विक जीडीपी

[11:18:11] में 24% योगदान देने वाले इन देशों का यह

[11:18:14] संगठन है। एक प्रकार से भारत के केवी कामत

[11:18:17] इसके पहले अध्यक्ष बने थे। वर्तमान में

[11:18:19] डिलमा वानारुसे ब्राजील के अध्यक्ष हैं।

[11:18:22] पुनर्नियुक्ति के अध्यक्ष पात्र हो सकते

[11:18:24] हैं।

[11:18:27] मतलब अब इसके अगर सदस्य देखेंगे तो इसके

[11:18:29] सदस्य टोटल हो चुके हैं नौ।

[11:18:39] फिर है ओईसीडी। ओईसीडी क्या है? लोकतंत्र

[11:18:43] और मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था के मूल्यों

[11:18:45] पर आधारित एक अंतर सरकारी संगठन है। पेरिस

[11:18:49] फ्रांस में इसका मुख्यालय है। एक प्रकार

[11:18:52] से अगर हम कहें तो

[11:18:55] 1948 में यूरोपियन आर्थिक सहयोग संगठन के

[11:18:58] रूप में शुरुआत हुई। 1961 में अमेरिका और

[11:19:01] कनाडा के शामिल होने के बाद इसका नाम

[11:19:03] ओईसीडी रख दिया गया। अमेरिका द्वारा वित्त

[11:19:06] पोषित मार्शल योजना के माध्यम से

[11:19:08] युद्धग्रस्त यूरोप का पुनर्निर्माण करने

[11:19:10] का लक्ष्य था। वर्तमान उद्देश्य है

[11:19:12] वैश्विक आर्थिक स्थिरता का निर्माण करना।

[11:19:14] गरीबी को दूर करना। अंतरराष्ट्रीय उचित कर

[11:19:17] प्रणाली के तहत एक मंच प्रदान करना जहां

[11:19:20] पर आदर्श कर सम्मेलन भी आयोजित किए जाते

[11:19:22] हैं। कर चोरी, मनी लॉन्ड्रिंग इन चीजों पर

[11:19:25] ये काम करता है। ओईसीडी ऑर्गेनाइजेशन फॉर

[11:19:28] इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट

[11:19:33] अधिकांश देश इसमें उच्च आय वाले, विकसित

[11:19:36] और लोकतांत्रिक है। भारत इसका सदस्य नहीं

[11:19:38] है पर उसके गहन साझेदारी कई क्षेत्रों में

[11:19:41] सहयोग करता है। फिर है ओपेक और ओपेक प्लस।

[11:19:44] वे देश जो पेट्रोल का एक्सपोर्ट करते हैं

[11:19:46] उनके द्वारा बनाया गया। उसमें कुछ और

[11:19:48] देशों को जोड़ा गया तो प्लस एक अंतर

[11:19:51] सरकारी संगठन 1960 में बगदाद सम्मेलन में

[11:19:53] बनाया गया था। तेल नीतियों पर एक जैसी

[11:19:56] पॉलिसी बनाने के लिए ईरान, इराक, कुवैत,

[11:19:58] सऊदी अरब, वेनेजुएला थे। वर्तमान में कुल

[11:20:01] 12 सदस्य मुख्यालय वियना ऑस्ट्रेलिया में

[11:20:03] हैं।

[11:20:06] ओपेक देशों द्वारा विश्व के लगभग 30%

[11:20:08] कच्चे तेल का उत्पादन होता है। विश्व की

[11:20:10] 80% प्रमाणित तेल भंडार क्षमता ओपेक देशों

[11:20:13] के पास है। वैश्विक तेल निर्यात में लगभग

[11:20:15] 50% तक सऊदी अरब ओपेक का सबसे बड़ा तेल

[11:20:18] उत्पादक देश माना जाता है। 2016 में ओपेक

[11:20:21] प्लस बनाया गया। अन्य देशों को भी जोड़ने

[11:20:23] की कोशिश की गई। रूस, कजाकिस्तान,

[11:20:26] मलेशिया, मेक्सिको यह गठबंधन अमेरिकी शेल

[11:20:28] तेल की बढ़ती आपूर्ति के कारण तेल की

[11:20:30] कीमतों में गिरावट का मुकाबला करने के लिए

[11:20:32] बनाया गया था। क्योंकि अमेरिका अलग तरीके

[11:20:35] से पॉलिसी बना रहा था।

[11:20:38] फाइनली आखिरी टॉपिक पर आ जाते हैं। सेक्टर

[11:20:41] हम देख चुके हैं। एग्रीकल्चर हम कंप्लीट

[11:20:44] कर चुके हैं। इंडस्ट्रियल सेक्टर अगर हम

[11:20:46] बात करें सेकेंडरी सेक्टर वित्तीय वर्ष

[11:20:49] 2025-26 के पहली तिवही में जीवीए में 7.7%

[11:20:54] और दूसरी तिमाही में 9.1% वृद्धि के साथ

[11:20:57] अच्छा प्रदर्शन कर रहा है। भारत के

[11:20:59] विनिर्माण मूल्यवर्धन मध्यम में योगदान

[11:21:02] उद्योगों का योगदान मतलब इंडस्ट्रियल

[11:21:04] कंट्रीब्यूट 46.3%

[11:21:06] इंडियन मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू एडिशन अगर

[11:21:09] हम बात करें तो आठ प्रमुख उद्योगों के

[11:21:12] सूचकांक 175.7%

[11:21:14] रहा दिसंबर 2024 की तुलना में उसमें भी

[11:21:17] ग्रोथ मिली है।

[11:21:24] इस दौरान सीमेंट, इस्पात, बिजली, उर्वरक

[11:21:27] कोयले के उत्पादन में सकारात्मक वृद्धि आई

[11:21:29] है। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा सीमेंट

[11:21:31] उत्पादक देश बना हुआ है। भारत विश्व का

[11:21:34] दूसरा सबसे बड़ा कच्चा इस्पात उत्पादक देश

[11:21:36] बना हुआ है। भारत का कोयला उद्योग 2025

[11:21:40] में ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच चुका है।

[11:21:42] वैश्विक औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में सुधार

[11:21:44] होते हुए इस सूचकांक में देश की रैंकिंग

[11:21:47] 2022 में 40वें स्थान पर थी। 2023 में अब

[11:21:49] 37वें स्थान पर पहुंच चुकी है।

[11:21:55] विनिर्माण उत्पाद में लगभग 35.4%

[11:21:59] मतलब एक्सपोर्ट में योगदान रहा। इसका

[11:22:01] जीडीपी में 40 यह विनिर्माण उत्पादन में

[11:22:04] लगभग 35.4%

[11:22:06] निर्यात में 48.58%

[11:22:09] जीडीपी में 31.1%

[11:22:11] योगदान है। जबकि 32.82 करोड़ से अधिक

[11:22:14] लोगों को रोजगार दे रहा है। ये पॉइंट नोट

[11:22:16] करने जैसा है। रिसर्च और विकास पर

[11:22:18] राष्ट्रीय व्यय सकल घरेलू उत्पाद का 0.64%

[11:22:21] ही होता है। मतलब बहुत कम रिसर्च हो रही

[11:22:23] है यहां पर। जबकि चीन जैसे देशों में

[11:22:26] व्यवसायिक क्षेत्र का रिसर्च और विकास में

[11:22:29] योगदान कम से कम 41% होता है।

[11:22:34] फिर इंडस्ट्रियल रिवॉल्यूशन क्रांति 1.0

[11:22:37] आई थी। 1760 से 1840 में ब्रिटेन में आई

[11:22:40] थी सबसे पहले। फिर 1870 से 1914 में बिजली

[11:22:44] असेंबल लाइन रेलवे लाइन की क्रांति आई।

[11:22:46] क्रांति 3.0 इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर

[11:22:48] ऑटोमेशन की आई। और 21वीं सदी में क्रांति

[11:22:51] फोर चल रही है। एआई इंटरनेट ऑफ थिंग्स

[11:22:53] रोबोटिक्स बिग डाटा क्लाउड कंप्यूटिंग पर

[11:22:56] बेस्ड हैं। फिर औद्योगिक पॉलिसियां

[11:22:59] समय-समय पर सरकार लेकर आती है। हमारे देश

[11:23:01] में पहली पॉलिसी 1948 में फिर 1956 में

[11:23:04] फिर 1973 में 1977 फिर 1980 में आई। हमारी

[11:23:09] लास्ट औद्योगिक पॉलिसी 1991 में आई थी जो

[11:23:12] एलपीजी पर बेस्ड थी। नई औद्योगिक नीति

[11:23:15] 2023 का केवल मसौदा जारी किया गया पर अभी

[11:23:18] तक पेश नहीं कर पाए हैं जो कि होना चाहिए

[11:23:21] था अभी तक उदारीकरण मतलब ज्यादा से ज्यादा

[11:23:24] नियमों को सरलीकृत करना निजीकरण मतलब

[11:23:27] अधिकतर जो सेक्टर है सरकारी सेक्टर उसको

[11:23:30] प्राइवेट सेक्टर में कन्वर्ट करना सर

[11:23:32] प्राइवेट लोगों को मौका देना और वैश्वीकरण

[11:23:34] मतलब दुनिया के उद्योगपति या दुनिया की

[11:23:37] अर्थव्यवस्था के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था

[11:23:39] को जोड़ना यह इसी के अंतर्गत जोड़े गए थे

[11:23:41] सब के सब

[11:23:46] तो अभी औद्योगिक नई नीति की सच में जरूरत

[11:23:48] है। बहुत लंबा टाइम हो चुका है। हमारे देश

[11:23:51] में नई औद्योगिक प्रवृत्तियों में नई

[11:23:53] औद्योगिक नीति के मसौदे की बातचीत की गई

[11:23:55] है। मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने का बात

[11:23:57] हुआ है। लेकिन अभी तक कोई बड़ी चीज नहीं

[11:23:59] रही है। प्रोडक्शन लिंक इंसेंटिव स्कीम

[11:24:02] बहुत चल रही है। हमारे देश में 2020 में

[11:24:04] शुरू की गई थी। 14 प्रमुख क्षेत्रों में

[11:24:06] विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय

[11:24:09] प्रोत्साहन। जो ज्यादा प्रोडक्शन करेगा

[11:24:10] उसको उतनी ज्यादा मदद सरकार करेगी। मिशन

[11:24:13] विनिर्मा शुरू किया गया। 2025-26 के

[11:24:16] केंद्रीय बजट में मिशन विनिर्माण की घोषणा

[11:24:18] की ताकि और गति प्रदान की जा सके।

[11:24:21] इंडस्ट्री 4.0 डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन

[11:24:24] सरकार कृत्रिम बुद्धिमत्ता मशीन लर्निंग

[11:24:27] इंटरनेट ऑफ थिंग जैसे उन्नत तकनीकों को

[11:24:29] बढ़ावा दे रही है। अन्य प्रवृत्तियां मेक

[11:24:32] इन इंडिया 2.0 के माध्यम से 27 रणनीतिक

[11:24:35] क्षेत्रों में निवेश आकर्षित करने पर

[11:24:36] सरकार बल दे रही है। स्टार्टअप इंडिया

[11:24:39] एमएसएमई सशक्तिकरण वोकल फॉर लोकल लोकल टू

[11:24:42] ग्लोबल जैसी चीजों पर काम किया जा रहा है।

[11:24:45] पब्लिक सेक्टर में भी सरकार लगातार अपनी

[11:24:47] हिस्सेदारी को या तो कम कर रही है या फिर

[11:24:49] उसका काम प्रोडक्शन में बेटर करने पर काम

[11:24:52] कर रही है। सार्वजनिक क्षेत्र के जो उद्यम

[11:24:55] हैं उसमें भी सरकार ने कई प्रकार के

[11:24:57] वर्गीकरण करके रखे हुए हैं।

[11:25:05] मिनी रत्न नवरत्न महारत्न का दर्जा दिया

[11:25:07] जाता है। सरकार की जो बड़ी-बड़ी कंपनियां

[11:25:09] अच्छा काम करती हैं। दर्जा प्र के साथ

[11:25:12] कंपनियों को अलग-अलग स्वतंत्रताएं मिलती

[11:25:14] है। मिनी रत्न वन और टू ₹500 करोड़ तक की

[11:25:17] परियोजनाओं में निवेश कर सकती है। मिनी

[11:25:19] रत्न वन मिनी रत्न टू ₹300 करोड़ तक की

[11:25:22] परियोजनाओं में निवेश कर सकती है। नवरत्न

[11:25:24] कंपनियां ₹1000 करोड़ तक की परियोजनाओं

[11:25:26] में खुद निवेश कर सकती है। सरकार से

[11:25:28] अनुमति की जरूरत नहीं और महारत्न वाली

[11:25:30] कंपनियां ₹5000 करोड़ तक की परियोजनाओं

[11:25:32] में इन्वेस्टमेंट कर सकती हैं।

[11:25:36] मिनी रत्न के लिए शर्तें यह होती है मिनी

[11:25:38] रत्न श्रेणी वन पिछले 3 वर्षों में लगातार

[11:25:41] लाभ अर्जित किया हो 3 वर्षों में कम से कम

[11:25:43] एक बार ₹ करोड़ तक का शुद्ध लाभ अर्जित

[11:25:46] किया हो मिनी रत्न श्रेणी टू निबल संपत्ति

[11:25:49] सकारात्मक होनी चाहिए तो टू में आ जाएगी

[11:25:51] पहले टू में आती है फिर वन में आती है

[11:25:54] नवरत्न मिनी रत्न श्रेणी के तहत होनी

[11:25:57] चाहिए पिछले 5 वर्ष में 3 वर्षों में

[11:25:59] समझौते ज्ञापन प्रणाली के अनुसार उत्कृष्ट

[11:26:01] या बहुत अच्छी रेटिंग मिली हो और 60

[11:26:04] मापदंडों में से अधिक से अधिक स्कोर

[11:26:06] प्राप्त किया हो

[11:26:08] छह मापदंडों में से या उससे अधिक का समग्र

[11:26:12] स्कोर छह मापदंडों में 60 या उससे अधिक का

[11:26:16] स्कोर लाया हो 60 या उससे अधिक शुद्ध

[11:26:19] पूंजी शुद्ध लाभ इस तरीके की चीजों को

[11:26:21] जोड़ा जाता है प्रति शेयर कमाई अच्छी दी

[11:26:24] हो फिर है महारत्न जो 2009 में शुरू की गई

[11:26:27] थी वास्तविक रूप में नवरत्न का दर्जा

[11:26:30] प्राप्त होना चाहिए ₹5000 करोड़ से अधिक

[11:26:32] का औसत वार्षिक टर्नओवर होना चाहिए

[11:26:35] और उसका जो निबल संपत्ति 15,000 करोड़ से

[11:26:38] ज्यादा की होनी चाहिए। 3 वर्षों के दौरान

[11:26:41] कर के बाद भी मुनाफा लगभग 5000 करोड़ से

[11:26:44] ज्यादा का होना चाहिए। यह सरकारी कंपनियों

[11:26:46] को दर्जे दिए जाते हैं केवल। फिर प्राइवेट

[11:26:49] सेक्टर के उद्योगों में सरकार कोशिश कर

[11:26:51] रही है कि अनऑर्गनाइज को ऑर्गेनाइज सेक्टर

[11:26:53] में बदले। सबसे ज्यादा एमएसएमई को सरकार

[11:26:56] सपोर्ट करती है क्योंकि रोजगार देने के

[11:26:58] मामले में सबसे अग्रणी है।

[11:27:01] कोर उद्योग जिन्हें आधारभूत उद्योग भी कहा

[11:27:03] जाता है। अर्थव्यवस्था के लिए आधार प्रदान

[11:27:05] करते हैं। अन्य उद्योगों के लिए कच्चा

[11:27:07] माल, ऊर्जा, बुनियादी सेवाएं प्रदान करते

[11:27:10] हैं। आठ कोर उद्योगों के बारे में हमने

[11:27:12] बातचीत की थी आपके सामने। एमएसएमई का सबसे

[11:27:15] बड़ा योगदान होता है रोजगार देना। इनकी

[11:27:17] परिभाषा याद रखिएगा। एमएसएमई की परिभाषाएं

[11:27:20] क्या रखी गई है? एमएसएमई में माइक्रो उसे

[11:27:22] कहते हैं जहां ₹25 लाख तक का मतलब जो नया

[11:27:26] आया है माइक्रो ₹1 करोड़ तक का

[11:27:28] इन्वेस्टमेंट एक करोड़ से कम और टर्नओवर 5

[11:27:31] करोड़ से कम का हो तो माइक्रो 10 करोड़ से

[11:27:34] इन्वेस्टमेंट कम और टर्नओवर 50 करोड़ से

[11:27:36] कम का हो तो स्मॉल और अगर इससे ज्यादा

[11:27:38] होगा तो अपडेट करना पड़ेगा मतलब अब जो

[11:27:41] लेटेस्ट आ गया है वो याद रखिए रिवाइज कर

[11:27:44] दिया गया है पुनः रिवाइज कर दिया अब 2ाई

[11:27:46] करोड़ हो गया है यह ज्यादा ध्यान देना है

[11:27:48] उस पुराने वाले को भूल जाइए ढाई करोड़

[11:27:51] 10 करोड़ 25 करोड़ 100 करोड़ और 125 करोड़

[11:27:57] 500 करोड़ टर्नओवर याद रखिएगा और

[11:28:00] इन्वेस्टमेंट याद रखिएगा इन्हें हम कहते

[11:28:02] हैं कि एमएसएमई की परिभाषा नई परिभाषा है

[11:28:05] अब ये

[11:28:11] 27 जून को एमएसएमई डे सेलिब्रेट किया जाता

[11:28:14] है। बाकी हमने इकोनमी का करंट अफेयर

[11:28:16] कंप्लीट किया है। उसको एक बार देख

[11:28:18] लीजिएगा। इसके साथ सफिशिएंट है। भारत

[11:28:20] सरकार की योजनाएं हमने मिसलेनियस में कवर

[11:28:23] कर दी है। सर्विस सेक्टर की अगर हम बातचीत

[11:28:25] करें तो भारत में जीडीपी का सबसे बड़ा

[11:28:27] योगदान सर्विस सेक्टर से आता है। हमारे

[11:28:29] जीडीपी में 54% योगदान सर्विस सेक्टर का

[11:28:33] है। यह पॉइंट आपको याद रखना है। सॉफ्टवेयर

[11:28:35] और पेशेवर सेवाओं में वृद्धि के कारण

[11:28:38] सर्विस सेक्टर का एक्सपोर्ट काफी बेटर रहा

[11:28:40] था। 20 25 26 24-25 में

[11:28:46] 9.1%

[11:28:47] की बढ़ोतरी का अनुमान है जो कि सबसे बेटर

[11:28:50] माना जा रहा है। दुनिया का सातवां सबसे

[11:28:52] बड़ा निर्यातक देश है सर्विस सेक्टर के

[11:28:55] मामले में।

[11:28:57] सर्विस सेक्टर को निर्यात का सबसे बड़ा

[11:29:00] ग्रोथ इंजन माना जा रहा है।

[11:29:03] मिसलेनियस बाकी हम कंप्लीट कर चुके हैं।

[11:29:06] इसे आप एक बार पुनः देख लीजिएगा। उम्मीद

[11:29:09] करते हैं कि फाइनली आप लोगों का जो लक्ष्य

[11:29:12] था वह पूरा हो गया होगा और इंडियन इकोनमी

[11:29:15] का यह मैराथन यहां समाप्त होता है। बस आप

[11:29:19] रिवीजन करिए। बहुत बार जितनी बार आप

[11:29:21] मैराथन कक्षाओं को देख सकते हैं देखते

[11:29:24] चलिए। हमें गारंटी है कि मैराथन कक्षाएं

[11:29:27] आपके लिए बहुत लाभदायक होगी और सबसे

[11:29:29] ज्यादा जरूरी चीज यह बता दूं मैं कि इन

[11:29:31] मैराथन कक्षाओं को रिवीजन के पर्पस से ही

[11:29:34] देखिएगा। कांसेप्ट पढ़ने के पर्पस से

[11:29:36] नहीं। हमें उम्मीद नहीं बल्कि गारंटी है

[11:29:39] कि आपको बहुत अच्छा लाभ हुआ होगा। शेयर

[11:29:42] लाइक जरूर करते चलिएगा और जो वादा मैंने

[11:29:45] किया था फाइनली मैंने पूरा कर दिया है जो

[11:29:47] बार-बार आप आरोप लगाते थे। बस अब इसमें एक

[11:29:50] सूचकांक वाली जो क्लास है वो हम ले लेंगे

[11:29:52] मंडे या संडे के दिन। बस रिवीजन करते

[11:29:55] चलिए, पढ़ते चलिएगा और कोशिश करिएगा कि

[11:29:58] सभी मैराथन कक्षाओं को दो-दो तीन-तीन बार

[11:30:01] तो ही कंप्लीट कर दे और ये मैराथन कक्षाएं

[11:30:04] आपको जब भी कोई एग्जाम इस साल में आएगी तब

[11:30:06] आप देख सकते हैं। सभी को पुनः बेस्ट ऑफ

[11:30:09] लक।
