# क्रिया शारीर (Kriya Sharir) Marathon One Shot | Modern + Ayurveda | Complete 1st Paper Recap

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[00:10] हेलो फ्यूचर डॉक्टर्स स्वागत है आपके अपने

[00:12] चैनल बीएएमएस क्रैकर्स में तो जैसा कि

[00:15] हमेशा की तरह आज फिर हम लेकर आए हैं

[00:18] क्रियासारी का मैराथन वन शॉट में पूरा

[00:22] क्रिया आयुर्वेद पोर्शन खत्म उसके बाद हम

[00:24] लेकर आएंगे वन श में मॉडर्न फर्स्ट पेपर

[00:27] का तो बिना देरी किए शुरू करते तो इसमें

[00:30] सबसे पहले शरीर शारीर एवं क्रिया शरीर तो

[00:33] शरीर क्या होता है तो निवृत्ति क्या है

[00:35] शरीर की तो शरीर सब श्री धातु में सम श्री

[00:38] धातु तथा सम धातु से बना है। श्री धातु का

[00:41] मतलब क्या होता है? हिंसा अर्थ में प्रयोग

[00:43] और सम मतलब विनाश अर्थ में प्रयोग। अगर

[00:45] शरीर का दिन प्रतिदिन विनाश होने से शरीर

[00:47] शब्द कहा गया है। परिभाषा क्या है? आपने

[00:49] श्लोक पढ़ा होगा कि रचना सारी में भी

[00:52] शरीरम तत्र शरीरम नाम चेतना अधिष्ठान भूत

[00:54] पंच महाभूत अर्थात चेतना अधिष्ठान भूत

[00:57] आत्मा एवं पंच महाभूत के विकारों के

[01:00] समुदाय को शरीर कहते हैं। पंच महाभूत प्लस

[01:03] आत्मा इक्वल टू क्या होता है? शरीर होता

[01:04] है। बात करेंगे तो एक और श्लोक क्या है?

[01:07] दोष धातु मल मूलम ही शरीरम अर्थात दोष

[01:09] धातु मल ही शरीर के मूल है। इन्हीं से

[01:11] शरीर की उत्पत्ति स्थितियों में विनाश

[01:13] संभव है। अब हम बात करेंगे शरीर निर्माण।

[01:16] तो शरीर निर्माण कैसे हुआ है? तो सूक्ष्म

[01:18] के द्वारा क्या शुम गर्भाशतम आत्म प्रकृति

[01:20] विकारम समुचितम गर्भ गर्भ इच्छते तत चेतना

[01:25] स्थितम तो ये आप एक बार श्लोक देख लीजिए

[01:27] अब इसका अर्थात क्या होगा शुक्र एवं शोित

[01:29] का गर्भाशय में विकार युक्त आत्मा के साथ

[01:32] जब संयोग होता है तब गर्भ की उत्पत्ति

[01:34] होती है उसमें चेतना का अवस्थान होता है।

[01:38] वायु महाभूत द्वारा इसका विभाजन होता है।

[01:40] तीज महाभूत से गर्भ में पाचन का कार्य

[01:43] होता है। आप तथा जल महाभूत गर्भ को

[01:45] क्लेदित करता है। पृथ्वी आभूत क्या करता

[01:47] है? गर्भ को आकार प्रदान करता है एवं

[01:49] कठोरता उत्पन्न करता है। आकाशवाभूत

[01:52] श्रोतों स्रोतसों वाहिनियों एवं आशयों में

[01:55] अवकाश प्रदान करता है जिससे इनमें रिक्तता

[01:59] उत्पन्न होती है। ऐसे बढ़ते हुए गर्भ में

[02:01] हाथ पैर जी्हा, नाक, कान, नितम आदि अंग

[02:05] उत्पन्न हो जाते हैं। तब उसे क्या बोला

[02:06] जाता है? शरीर की संज्ञा दी जाती है। तो

[02:08] शरीर के पर्याय क्या है? शरीर, देह, काय

[02:11] और पुरुष। अब हम बात करेंगे शरीर। शरीर

[02:14] में रहने वाली को शरीरी कहते हैं। शरीर

[02:18] आशय और शरीरी आशी है। शरीर के अंदर शरीरी

[02:22] आशी के रूप में रहकर व्यक्ति को चेतना या

[02:24] जीवन प्रदान करती है। तो शरीर से आत्मा का

[02:27] बोध होता है। तो शरीरी को हम आत्मा बोलते

[02:29] हैं। क्या बोलते हैं? आत्मा। अब बात

[02:30] करेंगे शरीर। तो शरीर क्या है? तो शरीरम

[02:31] अधिकृत कृतम तंत्र शरीरम। जिस शास्त्र या

[02:35] तंत्र या ग्रंथ में शरीर का वर्णन हो उसे

[02:37] क्या बोलते हैं? शरीर कहते हैं। शारीर

[02:39] कहते हैं। शरीर दो प्रकार के होते हैं। एक

[02:41] होता है रचना शरीर एक होता है क्रिया

[02:43] शारीर। तो रचना का मतलब क्या रचना

[02:45] प्रतिपादिकम शरीरम रचना शारीरम और क्रिया

[02:47] क्रिया प्रतिपादिकम शरीरम क्रियाशम जिस

[02:50] शास्त्र में शरीर की रचना का वर्णन हो उसे

[02:52] रचना शरीर कहते हैं और जिस शास्त्र में

[02:54] शरीर की क्रियाओं का वर्णन हो उसे

[02:55] क्रियाशारी कहते हैं। अब शरीर ज्ञान की

[02:57] उपयोगिता क्या है? क्रिया शारीर महत्व

[02:59] चिकित्सा विज्ञान में निपुणता प्राप्त

[03:02] करने के लिए शरीर का ज्ञान परम आवश्यक है।

[03:04] आचार्य चरक कहते हैं शरीरम सर्वथा सर्वदा

[03:07] वेद योग आयुर्वेद

[03:10] का तसन वेद लोक सुख प्रद मतलब शरीर का

[03:14] ज्ञान उपयोगिता को लक्षित करता है। तथा

[03:17] सर्वदा सब प्रकार से संपूर्ण शरीर को जो

[03:21] वैद जानता है वही भीषक संसार में सबसे

[03:24] संसार में सुख देने वाले आयुर्वेद शास्त्र

[03:26] को संपूर्ण रूप में जानता है। अब हम बात

[03:29] करेंगे क्या शरीर विचय तो क्या है? तो

[03:32] चिकित्सा शास्त्र में शरीर के उपकार के

[03:35] लिए शरीर का विषय पूर्वक ज्ञान परम आवश्यक

[03:38] है। इसलिए कुशल वैद शरीर के विभाग ज्ञान

[03:40] की प्रशंसा करते हैं। इन मॉडर्न मेडिकल

[03:42] साइंस में क्रिया शरीर क्या है? सूक्ष्म

[03:44] हेतु क्या है? बायोकेमिस्ट्री बायो

[03:47] हिस्टोलॉजी आदि भागों में व्यक्त किया गया

[03:49] है। रोगों के निदान एवं चिकित्सा के

[03:51] अध्ययन पूर्व क्रिया शरीर का ज्ञान परम

[03:54] आवश्यक होता है। क्रिया शारीरिक क्रिया

[03:56] शरीर के उपादान भूत दोष धातु एवं मलों की

[03:59] प्राकृतिक क्रियाओं का निरूपण करते हैं।

[04:01] इस प्रकार क्रिया शरीर ज्ञान अभाव में

[04:03] चिकित्सा कार्य में सफलता से अनुप हो जाती

[04:06] है। अब बात करेंगे त्रिदोष। त्रिदोष तो

[04:08] दोष क्या होते हैं? तो दूष्यंत इति दोष

[04:10] मतलब दूषित करने वाले को क्या बोलते हैं?

[04:11] दोष कहते हैं। सामान्यत दोष का अर्थ क्या

[04:14] होता है? सामान्यत दोष का अर्थ क्या है?

[04:16] पित दोष। पित दोष कौन से? वात, पित्त और

[04:18] कफ ही होते हैं। परंतु मूल रूप से दोष दो

[04:21] प्रकार के होते हैं। कौन-कौन से? शारीरिक

[04:23] और मानसिक। तो शारीरिक में वात, पित्त, कफ

[04:25] आते हैं और मानसिक में रज और तम आते हैं।

[04:27] तो ये शॉर्ट पेपर बना लीजिएगा। आप इससे

[04:29] जरूर एक ऐसे मिलता है। तो शारीरिक दोष,

[04:31] मानसिक दोष। अब बात करेंगे परिभाषा। तो

[04:34] अपने शरीर में निर्माण करने के साथ-साथ

[04:36] दूष धातुओं को दूषित करने वाले को दोष

[04:38] कहते हैं। दोष किसे कहते हैं? अपने शरीर

[04:41] में निर्माण करने के साथसाथ दूष यानी धातु

[04:44] या मलों को दूषित करने वाले को क्या दोष

[04:46] कहते हैं। चरक ने क्या बोला है? वायु पिता

[04:48] कपस शरीर दोष संग्रह अर्थात वात पित्त कप

[04:51] शरीर दोष कहलाते हैं। त्रिगुण कौन-कौन से

[04:54] हैं? तो सत रजत तम इनके लक्षण क्या है? तो

[04:57] सत का क्या है? प्रकाशक रज का प्रवर्तक और

[05:00] तम का नियतक। अब इनका कोरिलेशन क्या है?

[05:03] तो पंचमहाभूत में। तो पंचमहाभूत में आकाश

[05:06] का क्या होता है? सब वायु का स्पर्श अग्नि

[05:09] का रूप जल का रस पृथ्वी का गंध तो ये

[05:12] एमसीक्यू में देखने को मिलेंगे ये

[05:15] कोरिलेशन किस में मिलेंगे आपको एमसीक्यू

[05:18] देखने को मिल जाएगा या फिर एस क्यू तो ये

[05:20] कोरिलेशन आप देख लीजिएगा सत्वादी गुण पंच

[05:23] महाभूत का सत्वाद गुण क्या है तो आकाश में

[05:24] सत्व वायु में रज अग्नि में सत्व रज जल

[05:27] में स और तम पृथ्वी में तम दोष और भूत आदि

[05:31] के क्या है तो वात में कौन सा वायु होगा

[05:32] पित्त में अग्नि और कफ में जल होगा धातुओं

[05:35] में तो यह जरूर एससी या फिर आपको एमसीक्यू

[05:38] इनसे पांच देखने को मिल जाएंगे। मलों में

[05:40] बुताधि क्या है? मूत्र में जल अग्नि,

[05:41] पुरुष में पृथ्वी अग्नि और श्वेत में जल।

[05:44] त्रिगुण दोष संबंध क्या है? तो वात में

[05:47] कौन से? रज होंगे, पित्त में सत्व होंगे

[05:48] और कफ में तम होगा। अब हम बात करेंगे लोक

[05:51] पुरुष। तो पुरुषोयम लोकम समिति। पुरुष लोक

[05:54] का प्रतीक है। आचार्य चरक के अनुसार

[05:56] ब्राह्मण में पाए जाने वाले सभी भौतिक एवं

[05:58] आध्यात्मिक पदार्थ पुरुष में विभिन्न

[06:00] भावों के रूप में विद्यमान रहते हैं। तो

[06:02] ये आपको मैंने पदार्थ में भी पढ़ा दिया

[06:05] था। लेकिन आज भी समझा दे रहा हूं। अर्थात

[06:07] लोक में जितने मूर्तिमान द्रव्य हैं वे सब

[06:10] पुरुष में भी पाए जाते हैं। जिन तत्वों से

[06:12] पुरुष का निर्माण हुआ है उसी से लोक का

[06:14] निर्माण भी हुआ है। इस प्रकार के प्रकार

[06:17] लोक एवं पुरुष शामिल हुए। यत पिंडे शरीर

[06:20] तथा

[06:22] ब्रह्मांडे मतलब जिस प्रकार पंचमहाभूत एवं

[06:25] अव्यक्त ब्रह्म के समुदाय से यह लोक बना

[06:28] है। उसी प्रकार पंचमहाभूत आत्मा के संयोग

[06:30] से पुरुष बना है। लोक पुरुष साम्य है। तो

[06:33] यह आपको मैंने बता दिया था। तो एक बार देख

[06:35] लीजिएगा। अब इसका महत्व क्या है? तो

[06:36] चिकित्सा कर्म दृष्टि में लोक पुरुष शामिल

[06:38] जानना आवश्यक है। सभी लोग सभी लोक भावों

[06:41] को अपने में तथा अपने भावों के लोक में

[06:44] देखने से आत्म बुद्धि उत्पन्न होती है।

[06:47] जिससे व्यक्ति को पता चलता है कि इस संसार

[06:49] में सुख एवं दुख का कर्ता मैं स्वयं हूं।

[06:52] क्रिया शारीरिक के मौलिक सिद्धांत क्या

[06:53] है? तो दोष धातु मल मूलात्मक शरीर, पुरुष

[06:56] अव्यय एवं उसका वर्गीकरण और स्रोतस

[06:58] विज्ञान। तो दोष धातु मल मूलात्मक शरीर

[07:01] क्या है? तो दोष क्या दुष्यंत इति पोषण जो

[07:03] हमने बता दिया है और धातु क्या है? तो

[07:05] धारणा धातु जो शरीर में धारण करे उसे धातु

[07:08] कहते हैं। धातुएं साथ होती है। ये शरीर का

[07:10] धारण एवं पोषण करती है। इन्हें टिश्यू या

[07:12] उत्तक भी कहते हैं। मल क्या है? मलिनीकरण।

[07:14] तो जो शरीर को मलिन करे उसे क्या कहते

[07:15] हैं? मल कहते हैं। ऐसे प्याज द्रव्य जो

[07:18] शरीर में समय से अधिक मात्रा में या अधिक

[07:21] रुक जाने के कारण शरीर में मलिन करे उसे

[07:23] क्या बोलते हैं? मल कहते हैं। तो कौन-कौन

[07:26] से त्रिमल कौन से हैं? मूत्र, पुरुष और

[07:28] श्वेत। धातु कौन से हैं? रस रक्त, मांस,

[07:30] मेद, अस्थि, मज्ज, शुक्र। अब हम बात

[07:33] करेंगे दोष धातु मल का पंच भौतिक। तो यह

[07:37] भी हमने पूर्ण में वर्णन कर लिया। अब दोष

[07:39] धातु, मल मूलन शरीरम। तो अतः दोष धातु मल

[07:41] मूल शरीर के क्या है? मूल है। जिस प्रकार

[07:44] किसी वृक्ष की उत्पत्ति, स्थिति, विनाश

[07:46] उसके मूल पर आधारित होती है। उसी प्रकार

[07:47] शरीर की उत्पत्ति, स्थिति एवं विनाश भी

[07:50] उसके मूल पर आधारित रहते हैं। मूल का अर्थ

[07:52] है उपादान कारण। जैसे वस्त्र का उपादान

[07:54] कारण सूत्र घड़े का उपादान कारण मिट्टी

[08:00] उसी प्रकार

[08:02] शरीर का उपादान कारण दोष धातु वाले इसके

[08:04] अभाव में शरीर की स्थिति नहीं रह सकती है।

[08:07] अब हम लोग बात करेंगे पुरुष अव्यय एवं

[08:09] अपवर्गीकरण। तो पुरुष अव्यय का अर्थ है

[08:12] पुरुष किन-किन अव्ययों से मिलकर बना है?

[08:15] जैसे पंच विम सती अर्थात 25 तत्व जिनसे

[08:19] पुरुष बना है? तो आठ प्रकृति, 16 विकार और

[08:21] एक आत्मा। अब सृष्टि की उत्पत्ति किससे

[08:24] हुई है? तो अव्यक्त, महत महत से अहंकार,

[08:27] अहंकार कितने? तीन प्रकार सात्विक, रासिक

[08:29] और तामसिक। तो सात्विक और रासिक से एकादश

[08:31] इंद्रियां बना है। रासिक और तामसी से

[08:33] पंचतन मात्र बने। तो इनसे क्या हो गया?

[08:35] सृष्टि की उत्पत्ति हुई है। अब हम बात

[08:36] करेंगे पुरुष का वर्गीकरण। तो इससे एससी

[08:39] देखने को आपको जरूर मिल जाएगा। तो ये

[08:41] ध्यान दें। तो कौन-कौन से हैं? एक धातु,

[08:43] द्विधातु, त्रिधातु, षट धातु, त्रिधातु,

[08:46] सब धातु, शत्रु सति और पंच विस्म। एक धातु

[08:49] कौन है? तो चेतना धातु क्या है? चेतना रूप

[08:53] पुरुष एक धातु पुरुष है। अतः शुद्ध पुरुष

[08:55] को एक धातु पुरुष कहते हैं। यह सूक्ष्म

[08:57] शरीर को धारण करके प्रत्येक जीव में रहने

[09:00] से जीवात्मा कहलाता है। द्विधातुष कौन सा

[09:02] है? क्षेत्र और क्षेत्र। क्षेत्र को शरीर

[09:04] कहते हैं और क्षेत्र को आत्मा कहते हैं।

[09:08] अग्नि भी कहते हैं और स्वत। त्रिधातुष कौन

[09:10] है? सत आत्मा और शरीर। ये त्रि दंडात्मक

[09:14] भी इसे कहते हैं। और त्रिगुणात्मक पुरुष

[09:16] कौन से हैं? सत्व रज और तम।

[09:19] पंच धातु कौन से हैं? आकाश, वायु, अग्नि,

[09:21] जल, पृथ्वी, षट धातु कौन से हैं? तो कर्म

[09:24] पुरुष इसको क्या है? षट धातु को कर्म

[09:26] पुरुष, चिकित्स पुरुष और अधिकरण भी कहते

[09:28] हैं। तो षट धातुज में कौन-कौन से होते

[09:30] हैं? तो पंच तन पंच महाभूत और आत्मा।

[09:36] अब इसका क्या है? चरक ने क्या बोला है?

[09:38] खाद्य और चेतना सष्ट धातु पुरुष अर्थात ख

[09:41] आदि आकाश, वायु, अग्नि प्रकृति के साथ

[09:43] चेतना मिलकर धातु पुरुष बनाते हैं। अकेली

[09:45] आत्मा की चिकित्सा नहीं की जा सकती है। वह

[09:47] निर्विकार स्वरूप है। धातु पुरुष चिकित्सा

[09:50] का अधिकारी है पंचमहाभूत और आत्मा से क्या

[09:53] होगा सन अब हम बात करेंगे सब धातु सात

[09:56] धातु रस रस मेदस्त मज शुक्र यह सब क्या है

[09:58] सब धातु पुरुष है द्वादश कौन-कौन से हैं

[10:01] तो आत्मा पंच ज्ञान इंद्रियां मन और प

[10:04] महाभूत ये 12 तत्व मिलाकर कौन से हैं

[10:07] द्वादश होंगे अब त्रयोदोश कौन से हैं तीन

[10:09] दोषवाित कप सा धातु रस रदस्त वजस और

[10:14] त्रिमल ये मिलके जो भाव शरीर धारणा में

[10:16] सहयोगी हो और मूल हो वो क्या बोलेंगे धातु

[10:20] पुरुष सप्त धातुज पुरुष सप्त धातुष पुरुष

[10:23] कौन से हैं?

[10:26] तो आत्मा 10 इंद्रियां मन और पंच महाभूत

[10:30] तो 17 तत्व वाले क्या होंगे?

[10:34] अब हम बात करेंगे चतुर्भिमसति धातुष।

[10:38] क्या चतुर्भिमसति धातु? चतुर्भिम से

[10:41] संख्या की दृष्टि से 34 तत्वों से सृष्टि

[10:44] की उत्पत्ति होती है। पुरुष के साथ इनका

[10:47] संबंध होने से पुरुष को 24 तत्व वाला

[10:49] बताया गया है। यह 24 तत्व समुदाय राशि या

[10:52] समूह में संयुक्त होने से राशि पुरुष कहते

[10:55] हैं। आठ प्रकृति 16 विकार से क्या हुआ? 24

[10:59] तत्व इसको मिलाकर हो गया। तो राशि समूह

[11:02] में एक साथ ग्रहण करने के कारण इन्हें

[11:04] क्या बोलते हैं? राशि पुरुष कहते हैं।

[11:05] पंचि सती धातु पुरुष कौन है? 24 तत्वों

[11:08] वाला पुरुष कहा गया है और सुश्रुत ने 25

[11:11] तत्व वाले पुरुष को स्वीकार किया है। 24

[11:14] तत्वों वाला पुरुष अचेतन होता है। इसमें

[11:16] 25 तत्व आत्मा स्वरूप होता है तब उसे

[11:19] चेतना उत्पन्न होती है। वही चेतना पुरुष

[11:21] पंच तत्वात्मक पुरुष कहलाता है। तो इसमें

[11:24] कौन से 24 तत्व हो गए दोस्तों? अष्ट

[11:26] प्रकृति सोस विकार और एक आत्मा मिला के

[11:29] क्या हो गया? वचन। अब बात करेंगे श्रोतस

[11:31] श्रोतस धातु से श्रोतस शब्द बना है जिसका

[11:34] अर्थ होता है निशण अर्थात वाहना या श्रणात

[11:37] श्रोताशी जिसके द्वारा स्वर्ण होता है उसे

[11:39] क्या बोलते हैं श्रोतस कहते हैं इसका पुरा

[11:43] परिभाषा क्या है तो श्रोताशी खल परिणाम

[11:47] आप धमाना धातु नाम अभिवानी

[11:51] भतन अर्थेन यथा पूर्व रसादी धातु को त्याग

[11:55] कर उत्तरोत्तर रक्तद धातुओं में बदते

[11:57] परिवर्तनशील धातुओं का अभिवन करने वाले

[12:00] मार्ग या रचना विशेष को श्रोतस कहते हैं।

[12:02] अत वहन के अतिरिक परिवर्तनशील धातुओं को

[12:05] वहन करने वाली मार्ग को श्रोतस कहते हैं।

[12:08] सुश्रुत ने क्या बोला है? सिरा धमनी से

[12:11] पृथक शरीर में अवकाश अवकाश युक्त सुशीर

[12:15] भाग जो मूल रूप से रसा आदि धातुओं का वह

[12:18] वाहन करते हैं उसे श्रोतस कहते हैं। इसका

[12:20] पर्याय क्या है? सिरा, धमनी, पसायनी,

[12:25] निकेट, रसवाहिनी, आश्रया आदि। स्वरूप क्या

[12:28] है?

[12:30] स्वधातु सर्व वर्णनी मतलब अंदर बहने वाली

[12:33] धातु के वर्ण के समान होता है। इसका वर्ण

[12:36] आकार क्या होता है? तो वृत्त नलिका स्थूल

[12:38] मोटे अणु यानी सूक्ष्म दीर्घ लंबे रत्नाश

[12:42] वृक्ष की लता समान। परिगणना क्या है?

[12:45] जितने भी पुरुष में मूर्तिमान भाव विशेष

[12:47] हैं उतने ही शरीर में श्रोतस अथवा श्रोतस

[12:50] की संख्या अपरिमेय है। श्रोतस दो प्रकार

[12:54] से होते हैं।

[12:57] दृश्य और अदृश्य। दृश्य में कौन-कौन से?

[13:00] बहिमूर्ग और अभ्यांतर। तो बहिमूर्ग में

[13:02] पुरुष में नौ और स्त्रियों में 12 पाए

[13:04] जाते हैं। स्वर्ण दो, मुख एक, नयन दो, घण

[13:10] दो और बुधा एक। ये नौ हो गए।

[13:13] और स्त्रियों में कौन-कौन से हैं?

[13:15] स्तन्यवा और गर्भवा यह हो गए। अब आभ्यांतर

[13:18] स्रोतस कौन-कौन से हैं? तो योगवाही श्रोतस

[13:20] अस्थि मज्जा श्वद अस्थि मज्जा और श्वेद

[13:24] श्रोतस नहीं माने किसने? सुश्रुत ने। और

[13:27] चरक ने कितने माने? 13 माने हैं। और

[13:29] सुश्रुत ने योगवाही श्रोतस 11 माने हैं।

[13:31] 11 माने श्रोतस। प्राणवा अनवा उदक रज

[13:36] रक्तवा रस मांसवा मेधवा अस्थिवा मज्जावा

[13:39] शुक्रवा मूत्रवा पुरुष और श्वेद मतलब ये

[13:44] इन्होंने माने और इसके क्या है मूल क्या

[13:46] है हृदय किसका है प्राणवाह का आमाशय किसका

[13:49] है अन्नवाह का तो ये इसमें तो नहीं पूछा

[13:51] जाएगा आपको ये रचना सारी में आप अच्छे से

[13:54] जब रचना सारी का मैराथन आएगा तो उसमें

[13:56] अच्छे से बताएंगे श्रुत के लक्षण तो अति

[14:00] प्रवृत्ति होती है शंग होता है शरा

[14:01] ग्रंथियों बीमार गमन होता है दोष वृद्धि

[14:03] क्षय प्रकोप के सामान्य दिना दोष निरुक्ति

[14:06] दूष्यंत इति दोष जो दूषित करते हैं उसे

[14:08] क्या बोलते हैं? दोष कहा जाता है। दोष दो

[14:12] प्रकार के शारीरिक दोष और मानसिक दोष। तो

[14:14] शारीरिक वात कफ है और मानसिक रच स्तर

[14:16] दोषों की विकृत अवस्था के भेद कितने हैं?

[14:18] तो दो है। दोष वृद्धि और दोष क्षय। दोषों

[14:21] की वृद्धि क्षय व प्रकोप के सामान्य लक्षण

[14:23] क्या है? तो दोषों की समान गुदा वाले आहार

[14:25] विहार अधिक सेवन करने से दोषों की वृद्धि

[14:27] और विपरीत गुण वाले आहार विहार का सेवन

[14:29] करने से क्या होगा? क्षय होता है। तो दोष

[14:31] की प्रवृद्ध अवस्था के अनुसार यथावल लक्षण

[14:34] उत्पन्न होते हैं। क्षीण हुए दोष अपने

[14:35] लक्षणों को शरीर में कम प्रदर्शित करते

[14:38] हैं। सम दोष अपने प्रकृतीत रूप में रहते

[14:40] हुए अपना-अपना कार्य करता है। वृद्धि के

[14:41] भेद वात पित्त कफ संपूर्ण शरीर में

[14:44] व्याप्त होकर वृद्धि को प्राप्त होते हैं।

[14:45] अतः वृद्धि के दो भेद होते हैं। चयजन्य

[14:47] वृद्धि और प्रकोपजन्य। चयजन्य वृद्धि

[14:50] उत्तर काल में प्रकोपजप जन्य वृद्धि में

[14:52] परिवर्तित हो जाए। वाद दोष निरु। अब हम

[14:54] बात करेंगे वाद तो इससे एलए और एसq्यू

[14:57] देखने को जरूर मिल जाता है। तो क्या है?

[14:59] निरुक्ति वा गति गंध हो। धातु से प्रत्यय

[15:02] होने पर वाद शब्द की निष्पत्ति होती है।

[15:04] गति शब्द तीन अर्थों में प्रयुक्त होता

[15:07] है। गमन, ज्ञान और प्राप्ति। इसमें गमन,

[15:13] अब हम बात करेंगे

[15:16] शरीर में होने शरीर में

[15:24] शरीर में होने वाली किसी भी प्रकार की गति

[15:27] या चेष्टा वात के द्वारा वह संभव होती है।

[15:30] क्या होती है? वात के द्वारा संभव होती

[15:33] है।

[15:36] शब्द

[15:37] गंध शब्द का अर्थ है उत्साह जो सभी प्रकार

[15:40] के शारीरिक एवं मानसिक भावों की सम्यक

[15:43] प्रवृत्ति से उत्पन्न सम्यक परिवर्तन से

[15:46] क्या होता है? उत्पन्न होता है। किससे?

[15:48] सम्यक परिवर्तन से। वात के भौतिक गुण क्या

[15:50] है? तो रुक्ष शीतो लघु सूक्ष्म चलो विषत

[15:54] खण तो यह याद कर लीजिएगा कौन-कौन वात का

[15:56] संचय कब होता है? तो संचय उष्ण युक्त

[15:59] रुक्ष प्रकोप शीत प्रसमन उष्ण युक्त आहार

[16:03] से और ये शीत से और स्निग्ध आहार से वात

[16:07] प्रकोप के हेतु का लक्षण क्या है? तो आहार

[16:09] जनन्य क्या है? और विहार जन्य और मानसिक

[16:10] कार्य रुच कठिन ती कषाय अतिश द्रव्य का

[16:15] अधिक सेवन और विहार जन्य अति व्यायाम धातु

[16:18] क्षय जागरण अवतरपण वेग आदि से क्या विहार

[16:21] जन्य लक्षण होंगे और इसके प्रकोप होंगे

[16:24] मानसिक अतिशोक अति स्त्रा से

[16:28] प्रकृति प्रकुपितवाद के लक्षण क्या है तो

[16:30] नानावि विकार से

[16:34] उपतप यानी ग्रसित बल वर्ण सुखा उपघात मन

[16:38] दुखी तथा सभी इंद्रियों का हनन, गर्भ

[16:40] नष्ट, गर्भ विकृति तथा गर्भ को सुखाकर

[16:43] दीर्घकाल धारण, भय, शोक, मोह, प्रलाप,

[16:45] नष्ट आदि ये क्या होंगे? प्रकपित वात के

[16:48] लक्षण होंगे। वायु के प्राकृतिक कर्म क्या

[16:50] है? तो उत्साह, उश्वास, निश्वास, चेष्टा

[16:53] ये सब क्या है? उसके

[16:56] क्या है? प्राकृतिक कर्म है। तो इसका

[16:58] श्लोक याद कर लीजिएगा। धातुओं की सम्यक

[17:00] गति प्रवित मलों का यथासमय व यथा मार्ग से

[17:04] निष्कासन। वात का स्थान क्या है? वस्तुआ

[17:06] शरीर सर्व शरीर में गमन करती ही रहती है।

[17:08] फिर भी वायु की प्रधानता के कारण आचार्यों

[17:12] ने बस्ती पुरदान कटी शक्ति पैरों की

[17:15] अस्थियां पकवास वाद का विशेष स्थान बताया

[17:17] है। अब हम बात करेंगे पित्त की। तो पित्त

[17:20] की निवृत्ति तप संताप धातु के पीधन पत्ते

[17:22] होने पर पित्त शब्द बनता है। पित्त का

[17:24] अर्थ होता है दहन या उष्णता की उत्पत्ति।

[17:27] स्निग्ध को इसके गुण क्या है? स्नेग पोष

[17:29] तीक्ष अम्लस कटुति नील पित्त विषा अम्ल।

[17:33] पित्त संचय क्या है? संचय शीत युक्त

[17:35] तीक्षण आहार से प्रकोप उष्ण आहार से और

[17:37] समवन क्या होता है शीत युक्त मंदा से पीत

[17:39] के प्रकोप होते लक्षण क्या है तो कटुर

[17:41] अम्ल लवण रस सेवन उष्ण विदाई तीक्षण भोजन

[17:44] तिल अतिश दधी सुरा का अरनाल का सेवन

[17:49] [गला साफ़ करने की आवाज़]

[17:50] बिहारस क्या है तो क्रोध उपवास आतप स्त्री

[17:52] संग काल के अनुसार भोजन जीर्णवस्था पर शरद

[17:55] ग्रीष्म ऋतु पर मध्यांतर प्रकुपित पित्त

[17:57] के लक्षण क्या है तो भोजन का पचना ना पचना

[18:00] दिखाई देना और ना दिखाई देना शरीर का ताप

[18:02] कम और ज्यादा होना यह सब क्या है? अब इसका

[18:05] प्राकृतिक कर्म क्या है? तो शरीर में

[18:07] संपादित होने वाले विभिन्न कार्य जिनमें

[18:10] एंजाइम योगदान देते हैं, समस्त कार्य

[18:11] पित्त द्वारा संपादित किए जाते हैं। मानव

[18:14] शरीर में होने वाले समस्त बायो बायो

[18:16] फिजिकल एवं कैटाबॉलिक फंक्शन भी पित्त

[18:19] द्वारा संपादित किए जाते हैं। पित्त के

[18:20] स्थान क्या है? तो पित्त का स्थान तो

[18:22] विशेष स्थान क्या है? आमाशय श्वेदो रसो

[18:24] लसिका रुधिरम आमाशय पित्त स्थानानी तत्र

[18:28] अप आमाशय विशेषण पित स्थान। तो यह श्लोक

[18:30] याद कर लेना इंपॉर्टेंट है। अब बात करेंगे

[18:33] कफ की। कफ की निवृत्ति किन जलेन फलती इति

[18:35] कफ जल से जिसकी उत्पत्ति होती है उसे क्या

[18:37] कहते हैं? कफ कहते हैं। कफ में जो 10 कफ

[18:40] दोष में जल महाभूत की प्रधानता रहती है

[18:41] तथा जल की तरह इसका कार्य भी संयोग करना

[18:46] है।

[18:48] स्लेष अलिंग धातु से मलिन प्रत्यय लगाने

[18:51] में स्ले शक्ति उत संयोग आलिंगन मिलन शरीर

[18:55] में इन प्रक्रियाओं का करता ही श्लेष्मा

[18:58] या कफ है। स्वरूप क्या है? तो प्राकृतिक

[19:00] कफ मानव शरीर में बल तथा ओझ के रूप में

[19:03] विद्यमान रहता है। यही कफ विकृत होने पर

[19:06] मल कहलाता है तथा पापमा अर्थात विभिन्न

[19:08] रोगों को उत्पन्न करने वाला होता है।

[19:12] कफ के भौतिक गुण क्या है? तो गुरु शीत

[19:15] मृदु स्निग्ध मधुर स्थिर पिचिल। ये याद कर

[19:18] लेना आप। कफ का संचय प्रकोप वन क्या है?

[19:21] तो संचय कब होगा? शीत युक्त स्निग्ध गुण

[19:24] से। और प्रकोप उष्ण से। और समन क्या होगा?

[19:27] उष्ण युक्त रुक्षद गुण से। कफ प्रकोप हेतु

[19:30] के लक्षण क्या है? तो आहार जन्य क्या है?

[19:32] गुरु मधुर अतिष्ण भोजन सेवन से दूध तथा

[19:34] इच्छुर विकार सेवन से अत्यधिक द्रव्य भोजन

[19:38] से ददी तथा सर्दी के प्रयोग से विहार जन

[19:40] अत्यधिक शयन से और का क्या है? दिन व

[19:43] रात्रि के आदि काल में भोजन करने से वसंत

[19:46] ऋतु में। अब लक्षण क्या है? शरीर में कफ

[19:48] के कुपित होने पर दृढ़ता स्थिरता उपचय व

[19:51] काश्य उत्साह व आलस्य वृता कलिता ज्ञान व

[19:54] विज्ञान तथा प्रीति व मोह का होना ये इसके

[19:57] लक्षण है प्राकृतिक कर्म क्या है तो शरीर

[20:00] का स्नेहन बंधन स्थिरता गुरुता विस्तता बल

[20:03] क्षमा आदि उदारता अन्य संधि संश्लेषण रोपण

[20:08] पूर्ण ये सब क्या है इसके प्राकृतिक कर्म

[20:11] है इसका स्थान कहां है तो उ शिरोगवा प्रलय

[20:15] स्वमेदस श्लेष्म स्थानानी उरो विशेषण

[20:19] श्लेष तो इसका स्थान विशेष स्थान क्या है?

[20:21] उर है काश अपने हृदय और आमाशय माना है। तो

[20:23] यह भी याद कर लेना। अब हम बात करेंगे

[20:25] दोषों की वृद्धि छह लक्षण तो ये यहां से

[20:28] एक एससीक्यू आपको देखने को जरूर मिलेगा। छ

[20:30] और वृद्धि से जरूर याद कर वात वृद्धि के

[20:33] छह लक्षण वात वृद्धि वाक परुषण काश्य का

[20:36] गात स्फूर्णम उष्ण कामिता निद्रा नाश

[20:39] अल्पबलत्व

[20:41] गणसत्वम तो शरीर में वात की वृद्धि होने

[20:44] पर वाक पर वाणी मेंसता करस यानी दुर्बलता

[20:48] काण यानी त्वचा का कृष होना यानी काला

[20:50] काला होना गात स्पर्ण अंगों का फटना उष्ण

[20:53] कामिता यानी उष्ण द्रव्यों के सेवन की

[20:55] इच्छा करना निद्रा नाश हो यानी निद्रा का

[20:57] नाश हो जाना अल्पबलत्वम शरीर में अल्पबल

[21:00] होना गव वर्ष क्या है? विभंग और मलसंग

[21:03] होना।

[21:05] अब बात करेंगे वात छय के तो वात छ मंद

[21:08] चेष्टा अल्प वाकम प्रहर्षो मूता च मतलब

[21:13] चेष्टा का मंद होना वाक शक्ति का दुर्बल

[21:15] होना हर्ष का अभाव आना संज्ञा नाश या

[21:18] बुद्धि मोहना अब हम बात करेंगे पित्त

[21:21] वृद्धि के तो पित्त क्या है तो पित्त

[21:23] वृद्धि पिता भासता संताप शीत कामित्वम

[21:26] अल्पिद्रता मूछा बल हानि इंद्रिय दबल्यम

[21:29] पित्त विण मूत्र नेत्रम शरीर का वर्ण पीला

[21:34] होना, शरीर का ताप बढ़ना, शीत पदार्थों का

[21:37] सेवन की इच्छा होना, अल्प निद्रा मूछा तथा

[21:39] फल की हानि होना, इंद्र तथा ग्रहण करने

[21:41] में दुर्बलता होना, मूल मूत्र, मल तथा

[21:44] नेत्र के रंग का वर्ण पीला होना। अब बात

[21:47] करेंगे पित्त के क्षय तो पित्त क्षय होने

[21:49] में शरीर का ताप कम होता है। अग्नि का

[21:52] दुर्बल होना और प्रवाह क्षय होता है। तो

[21:54] ये आप लोग इन सबको जरूर देख लीजिएगा। इससे

[21:56] एक एमसीक्यू आपको जरूर देखने को मिलेगा।

[21:58] कफ वृद्धि की तो ये श्लोक याद कर लीजिएगा।

[22:01] तो त्वचा का वन श्वेत होना शरीर में

[22:03] स्थितिता स्थिरता गुरुता मानसिक एवं

[22:05] शारीरिक अवसाद तंद्र तथा निर्ग्र अधिक का

[22:08] होना संधियों एवं अस्थियों में शिथिलता का

[22:11] होना कफ छह में क्या होगा तो अंगों में

[22:14] रुक्षिता आएगी आंतरिकता होगा आमाशय से

[22:17] भिन्न कफ के स्थानों में शून्यता का अनुभव

[22:19] होना संधियों में शिथिलता तृष्णा तथा

[22:21] दुर्बल होना रात्रि जानवर अब हम बात

[22:23] करेंगे त्रिदोषों के पंच विद भेद की

[22:25] प्राकृतिक एवं विकृत अवस्था वात के भेद

[22:28] वात के कितने भेद है तो पांच है प्राणवायु

[22:30] उदान वायु समान बयान और अपान वायु

[22:32] प्राणवायु का स्थान क्या है? तो मुर्दा उ

[22:35] कंठ जीवा मुख और नास इसका कार्य क्या है?

[22:39] थूकना छीकना उद्गार यानी डकार लेना स्वास

[22:42] और निश्वास आहार को निगलना विकृत कर्म

[22:46] क्या है? शसन संस्थान संबंधित विकार

[22:49] उद्गार संवन छतु अप्रवत हृदय व मानसिक रोग

[22:53] से मृत्यु भी हो सकती है। अब शस प्रस्राव

[22:56] प्रक्रिया इसमें क्या किया है? तो वर्णन

[22:57] किसने किया है? शारंगधर ने किया है। तो ये

[22:59] मोस्ट इंपॉर्टेंट है। ये जरूर देख लेना।

[23:00] नाभि में स्थित प्राणु अगुखी कमल स्वरूप

[23:03] हृदय का स्पर्श करता हुआ विष्णु पथ के

[23:06] अमृत का पान करने के लिए कंठ मार्ग से

[23:10] बाहर आता है। अंबर पीयूष आकाशीय अमृत

[23:14] शुद्ध एयर हैविंग का पान करके वेग पूर्वक

[23:18] उसी मार्ग से क्या होता है? लौट जाता है।

[23:22] इस प्रकार समस्त शरीर में जीवात्मा तथा

[23:24] जठराग्न का प्रेरण

[23:27] वायु द्वारा होता है। अब हम बात करेंगे

[23:32] उदान वायु। तो उदान वायु का क्या है?

[23:34] स्थान

[23:36] तो नाभि, उर और कंठ। कार्य क्या है? वाक

[23:39] प्रकृति यानी भाषण गाना आदि। ये श्लोक आप

[23:41] पढ़ लीजिए। याद कर लीजिएगा। ऊर्जा का

[23:43] संचार बढ़ तथा स्मरण शक्ति देना। विकृत

[23:45] क्या है? चतुर्गत रोग उत्पन्न हो जाएंगे।

[23:47] समान वायु का ये आप याद कर लीजिएगा। स्थान

[23:50] इसके जरूरी श्लोक श्वद व दोष व अंबु व शत

[23:54] सर्वपष्ट कार्य क्या है? अन्न को ग्रहण

[23:56] करना जठराग्नि को बल देना और आहार रस व मल

[24:00] मूत्र का विवेचन करना श्वत दोष अनुज का

[24:04] कार्य को संपादित करना विकृत क्या है?

[24:06] विकृत अवस्था कर्म क्या करेगा? तो गुण

[24:08] मतिसार तथा ग्रणी से उत्पन्न मलबा की

[24:10] वृद्धि तथा रस क्षय प्राकृत कर्मों के

[24:12] विपरीत लक्षण बयान का स्थान क्या है?

[24:14] सर्वशरीर है। अष्टांग हृदय ने किस क्या

[24:17] माना है बाग्भवट ने? तो हृदय अपकार रस व

[24:20] रक्त धातुओं का संपूर्ण शरीर में प्रवाह

[24:22] करेगा। श्वत श्रवण शरीर में गति उत्पन्न

[24:25] करना। अंगों का प्रसारण व अक्षेप नेत्रों

[24:28] को खोलना खोलना व बंद करना। विकृत में

[24:31] क्या होगा? विकृत कर्म क्या होगा? स्वर्ग

[24:32] देत रोग ज्वर रक्त प्राकृत कर्म के विकृत

[24:36] लक्षण है। अपान वायु का स्थान क्या है?

[24:37] वृषण वस्ती भेड़ नाभि उ प्रदेश भक्षण

[24:40] गुदा। इसका कार्य क्या है? पुरुष मूत्र

[24:43] शुक्र गर्भ आरोग का निश इसका विकृत कर्म

[24:45] क्या है? गुदा वस्ती रोग होना। अब आधुनिक

[24:48] परिदृश्य दोष का निरूपण तो यह आप लोग एक

[24:50] बार देख लीजिएगा। अब पित्त दोष अब हम बात

[24:53] करेंगे पित्त दोष के प्रकार। तो पित्त दोष

[24:55] पांच प्रकार के होते हैं। कौन-कौन से?

[24:57] पाचक, रंजक, साधक, आलोचक और भ्राजक पित्त।

[25:00] तो पाचक पित्त का स्थान क्या है? पपवाशय,

[25:02] आमाशय के मध्य स्थान अर्थात ग्रहणी।

[25:05] प्राकृतिक कर्म क्या है? चतुर्भित, अन्न

[25:07] का पाचन, दोष, रस, मूत्र, पुरुष का

[25:09] विवेचन, धातुओं की पूर्ति के लिए छुदा,

[25:11] पिपासा की उत्पत्ति। विकृत क्या है? तो एक

[25:13] विकृत कर्म क्या है? अजी, अग्नि मार्ग,

[25:15] कम, पित्त तथा ग्रहणी आदि रोग की उत्पत्ति

[25:18] हो जाती है। रंजक पित्त का स्थान क्या है?

[25:20] यकृत और पी। प्राकृतिक कर्म क्या है? रस

[25:23] का रंजन कर रक्त उत्पत्ति करना। विकृत

[25:25] क्या है? पांडु, कामला, पालित्य रोग आदि

[25:27] की उत्पत्ति हो जाती है। साधक वित्त का

[25:29] स्थान क्या है? हृदय है। इसका कर्म क्या

[25:31] है? प्राकृतिक कर्म। तो मेधा, बुद्धि,

[25:34] अभिमान आदि पार्थिक मनोरथ को पूर्ण करना।

[25:37] पुरुषार्थ चतुष्टय की प्राप्ति हेतु

[25:40] प्रेरित करता है। विकृत में क्या है?

[25:41] मानसिक बुद्धि विकार हो जाएगा। और आलोचक

[25:45] पित्त का भेद क्या है? तो भेद भेल ने दो

[25:47] माने हैं। बुद्धि

[25:49] आलोचक पित्त के भेद कितने माने? भेल ने

[25:52] दो। तो बुद्धि वैशिक और चक्षु वैशेषिक। तो

[25:55] आलोचक पित्त का स्थान क्या होता है? नेत्र

[25:57] होता है। इसके प्राकृतिक वस्तुओं के रूप

[25:59] का दर्शन वस्तुओं की भिन्नता का ज्ञान

[26:01] कराना। विकृत कर्म से क्या होता है?

[26:03] दृष्टि संबंधी तिमि रोग नेत्र रोग तथा

[26:06] दृष्टि पतन गत रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

[26:08] भाजक पित्त का स्थान क्या है? है इसके

[26:10] प्राकृतिक शरीर की छाया का प्रकाशन करने

[26:12] के साथ-साथ शरीर के वर्ग का प्रकाशन करना

[26:14] शरीर की ऊष्मा को नियंत्रित करता है।

[26:16] अभ्यंग परिषेक अवगाहन लेप आदि का पाचन कर

[26:20] त्वचा में अवशोषण करता है। अब इसके विकृत

[26:23] कर्म क्या है? तो त्वचा विवता, त्वक रोग

[26:26] और प्राकृतिक करके विपरीत लक्षण। आधुनिक

[26:28] प्रदेश से तो ये आप लोग देख लीजिए

[26:30] क्या-क्या होते हैं। तो पित्त पाचक पित्त

[26:31] क्या करता है? डाइजेस्टिव जूस, पेप्सिन,

[26:33] पेनक्रियाटिक जूस और इंटेस्टाइनल जूस। अब

[26:36] हम बात करेंगे कफ दोष के भेद। तो कब दोष

[26:39] के पांच भेद होते हैं। इनके भी कौन-कौन

[26:41] से? क्लेदक अवलंबक, बोधक, तर्पक,

[26:43] श्लेष्मक। क्लेदक का स्थान क्या है? तो

[26:45] आमाशय प्राकृतिक अन्न संघात अर्थात अन्न

[26:49] संघात अर्थात आहार को आद्र यानी गीला कर

[26:52] सूक्ष्म व महीन कणों में विभक्त कर सुपाच

[26:55] बनाता है। बनाना है। और इसके विकृत कर से

[26:58] अजीन हो जाता है। एवं अमित रोग उत्पन्न हो

[27:00] जाते हैं। अवलंबक कफ क्या है? इसके

[27:02] स्थानिक है। सवी एवं सवी एवं अनस

[27:09] यह वीर्य के से हृदय का अवलंबन करता है।

[27:12] बल देता है। शरीर अन्य श्लेष्म स्थानों का

[27:15] अवलंबन पुरस्त स्थान को धारण करता है।

[27:18] विकृत क्या है? हृदय एवं फुस संबंधी रोग

[27:20] उत्पन्न हो जाता है। बोधक कफ का स्थान

[27:22] क्या है? जीवा, मूल व कण। प्राकृतिक सड

[27:24] रसों का रसेंद्रिय द्वारा ज्ञान अंत का

[27:26] मुख से सहयोग होता है। उसे पतले कणों में

[27:29] विणित कर घोल लेता है। विकृत कर्म क्या

[27:31] है? मुख व लार ग्रंथियों संबंधित विकार रस

[27:34] ज्ञान अभाव। अब बात करेंगे कफ का तो इसका

[27:38] स्थान सिर है। कर्म क्या है? मस्तिष्क का

[27:41] स्नेह एवं पोषण। नेत्र का तर्पण करना। और

[27:44] विकृत क्या है? मानसिक विकृति या नेत्र के

[27:46] जलीय अंश में दृष्टि होने से दृष्टिगत रोग

[27:49] होना। अब इसलिए इसमें कफ बात करेंगे तो

[27:52] स्थान क्या है? संधि है। कर्म क्या है?

[27:53] संधियों का स्न पोषण एवं उन्हें आपस में

[27:56] जुड़े रखना। विकृत कर्म क्या है इसका? तो

[27:58] संधिगत रोग और संधिवाद आमत आदि होगा। अब

[28:03] बात करेंगे इसका

[28:06] आधुनिक परिदृश्य में कफ का क्या है? तो

[28:08] क्लेदक कफ म्यूसिन है। अवलंबक क्या है?

[28:10] पेरिकार्डियल एंड प्लुरल फ्लूइड। बोधक कफ

[28:14] क्या है? सलाइवा तरपक कफ क्या है? सीएसएफ

[28:16] फैट्स लाइक पल्मेटी स्टेन कोन आदि।

[28:19] इस्लेष्मक क्या है? साइनोवियल फ्लूइड। अब

[28:22] बात करेंगे आश आशयक।

[28:27] तो ये तो हमें नहीं पढ़ना है। षट क्रिया।

[28:30] अब हम सबसे इंपॉर्टेंट ये इंपॉर्टेंट है

[28:32] क्या? षट क्रिया काल। तो क्रिया काल शब्द

[28:35] दो शब्दों से बना है क्रिया प्लस काल।

[28:37] क्रिया का चिकित्सा काल का मतलब औषध रोगों

[28:40] की अवस्था के अनुसार चिकित्सा रोग अपनी

[28:42] किस अवस्था में यह जानकर विषक चिकित्सा

[28:45] करें। काल के अनुसार क्रिया करना ही

[28:47] क्रियाकाल कहलाता है। तो क्रिया का

[28:49] संक्षेप में अर्थ चिकित्सा के अवसर हैं।

[28:51] चरक, बाग्भवट रोग की तीन अवस्थाएं बताई

[28:54] है। संचय, प्रकोप और प्रसवन। सुश्रुत रोग

[28:57] की छ अवस्थाएं बताई है उसे षट क्रिया काल

[29:00] कहते हैं जिसका वर्ण षट क्रिया काल के रूप

[29:01] में वर्णन किया गया है।

[29:03] ये श्लोक बहुत इंपॉर्टेंट है तो ये याद

[29:05] रखना है संचयम च प्रकोपम च प्रम स्थान

[29:07] संशयम व्यक्ति भेदम च योति दोषण सभवेत

[29:12] भष्का

[29:13] प्रथम क्रियाकाल क्या है संचय है द्वितीय

[29:15] प्रकोप तृतीय प्रसमन चतुर्थ स्थान संचय और

[29:19] पंचम व्याक्ता अवस्था और षड क्या है

[29:23] भेदावस्था अब प्रथम में क्या हम संचय

[29:25] अवस्था में क्या पढ़ेंगे च वृद्धि

[29:30] शब्द मन्य दोषों की अपने स्थान वृद्धि को

[29:32] चय अवस्था या संचय कहते हैं। लक्षण क्या

[29:34] है? तो वात में क्या लक्षण आएंगे? उपष्

[29:37] यानी क्या होगा? जकड़ाहट होगी और फूलनेस

[29:40] होगा। पित्त में पिता भासता यानी पिता भास

[29:43] का मतलब क्या होगा? पीलापन

[29:44] [गला साफ़ करने की आवाज़]

[29:45] दिखेगा। कफ में क्या होगा? मंदागिनी, गौरव

[29:48] और आलस्य होगा। तो अर्थात संचय अवस्था में

[29:50] ही यदि दोषों को उपचार द्वारा साफ कर दिया

[29:52] जाए तो वे बाद की प्रकोप आदि अवस्थाओं को

[29:55] प्राप्त नहीं होते। उपचार ना करने पर यह

[29:57] दोष उत्तरोत्तर बलवान होते चले जाते हैं।

[30:00] अब द्वितीय क्या है? तो प्रकोप अवस्था है।

[30:02] तो दोष जब अन्य मार्गों में गमन करने को

[30:05] तत्पर हो जाते हैं तब उसे प्रकोप अवस्था

[30:07] कहते हैं। यह दो भेद इसके दो होते हैं। चय

[30:10] प्रकोप और अचय प्रकोप। तो लक्षण क्या है?

[30:12] तो वात में कोष् संचरण होगा। पित्त में

[30:15] अम्लिका, पिपासा, परिदा होगा, कफ में

[30:16] अन्नद्वेष और हृदय, क्लेद होगा। तो, यह

[30:19] जरूर आपको एक एलपी है। शॉर्ट आंसर में

[30:22] देखने को मिलेगा षट क्रिया का। अब बात

[30:25] करें प्रसर का शाब्दिक अर्थ है फैलना।

[30:26] प्रकोप अवस्था में समुचित चिकित्सा ना

[30:28] होने से प्रकोपित दोष शरीर के बीमारों में

[30:30] गमन कर जाते हैं। स्रोतों द्वारा शरीर में

[30:33] स्वतंत्र दोष का फैल फैलना प्रसर कहलाता

[30:36] है। दोषों का प्रसर 15 प्रकार से होते

[30:37] हैं। कौन? वात पित्त कफ रक्त वात पित्त

[30:40] पित्त कफ कफ वात वात पित्त कफ वात रक्त

[30:43] पित्त रक्त कफ रक्त वात पित्त रक्त पित्त

[30:46] कफ रक्त कफ वात रक्त वात पित्त कफ रक्त।

[30:51] अब हम बात करेंगे इसके लक्षण। तो वात में

[30:52] क्या होगा? बीमार गमन और आटोप लक्षण

[30:55] आएंगे। पित्त का ओसोस परिदा होगा। कफ में

[30:58] आरोचक अभिपाक अनुसाद होगा। अब हम बात

[31:01] करेंगे चौथा स्थान संशय अवस्था यानी

[31:04] चतुर्थ क्रिया काल। तो क्या होगा? स्थान

[31:06] संशय अवस्था में दोष और दुष्यों का संयोग

[31:08] होता है। जब प्रसर अवस्था में भी दोषों की

[31:11] कोई समुचित चिकित्सा नहीं हो की जाती तो

[31:14] वे दोष शरीर के दुष्य यानी धातु एवं मलों

[31:17] के संयोग कर लेते हैं। इसी को दूष संूचना

[31:20] कहा जाता है। अर्थात चतुर्थ क्रिया काल

[31:22] में दो संूचना होती है। व्याधि के पूर्व

[31:24] लक्षण

[31:26] मिलते हैं। यहां चतुर्थ में ही क्या मिलते

[31:28] हैं? व्याधि के पूर्ण। तो इससे एक

[31:29] एमसीक्यू भी बन सकता है। तो शरीर में

[31:31] संचरण करने वाले प्रकुपित दोष जहां

[31:34] स्रोतों में विकृति होती है वहीं रुककर

[31:36] व्याधि उत्पन्न करते हैं। लक्षण किसी भी

[31:37] व्याधि के पूर्व स्थान स्थान संशय अवस्था

[31:41] के लक्षण इस अवस्था भविष्य में होने वाली

[31:43] व्याधि के लक्षण पूर्व मिलते हैं। इस

[31:45] अवस्था में व्याधि के लक्षण नहीं व्यक्त

[31:47] होते। पोस्ट में मंदागिनी की सूचिका

[31:49] गुलमादी बस्ती प्रदेश में प्रमेय अस्मरी

[31:51] आदि त्वचा में विकार पुष् विसर्प आदि

[31:54] अस्थिगत में विदति मेगत में गलगंड अपची

[31:57] आदि सर्वशत में ज्वार गुदा में अस्मरण

[31:59] बगंदर आदि अब व्याक्ता पंचम क्रिया काल

[32:02] क्या है व्याक्ता अवस्था जब व्याधि

[32:04] [नाक से की जाने वाली आवाज़] के लक्षण

[32:04] प्रकट हो जाए तो वह अवस्था कहलाती है

[32:07] जिसमें व्याधि के लक्षण प्रकट हो जाते हैं

[32:10] वही व्यक्त अवस्था या रूपावस्था है। अतः

[32:12] इस अवस्था में व्याधि के लक्षण स्पष्ट रूप

[32:14] से दिखाई देते हैं। अब बात करेंगे

[32:17] भेदावस्था यानी लाश। रोग व्यक्त हो जाने

[32:21] पर भी यदि रोग वृद्धि की शांति के लिए

[32:24] उचित उपकार ना किया जाए तो रोग की ओर भी

[32:26] अधिक वृद्धि हो जाने पर अनेक प्रकार के

[32:28] उपद्रव पैदा हो जाते हैं। अर्थात

[32:30] वृद्धावस्था के रोग क्या उपद्रव अरिष्ट

[32:32] लक्षण रोग चिरकालीन जीर्ण असाध्य

[32:34] दीर्घकालीन बंद हो जाते हैं। दोष वृद्धि

[32:37] की अंतिम अवस्था है। धातु पाक तथा वर्ण की

[32:39] उत्पत्ति हो जाती है। अतः इस अवस्था को

[32:41] वर्णावस्था भी कहते हैं। षट क्रिया काल की

[32:44] चिकित्सा करने का अवसर है। षड क्रिया काल

[32:47] रोगावस्था के दौरान दोष वैसम की अवस्थाओं

[32:50] को प्रकट करता है। चिकित्सा में सफलता

[32:52] हेतु षट क्रिया काल का ज्ञान

[32:56] अति आवश्यक है। अब हम बात करेंगे प्रकृति

[32:59] तो इससे भी एक एलपी या एक एसपी देखने को

[33:02] मिल जाता है। तो प्रकृति की निरुक्ति क्या

[33:05] है? तो प्र उपसर्ग पूर्वक कृ धातु से होती

[33:08] है। प्र मतलब सत्वगुण एवं ज्ञान अर्थक कृ

[33:11] मतलब रसगुण एवं व्यर्थक ती मतलब तामस एवं

[33:15] जड़ता को प्रकृति इति प्रकृति जो अन्य

[33:18] तत्वों को उत्पन्न करती है उसे प्रकृति

[33:21] कहते हैं। प्रकृति स्वभाव है। प्रकृति को

[33:24] आरोग्य कहते हैं। प्रकृति शरीर का स्वरूप

[33:26] होता है। प्रकृति का निर्माण तो हमने वहां

[33:28] पढ़ा था शुक्र संयोग भवे दोष प्रकृति

[33:34] तस लक्षण दोष शुक्रित के संयोग काल में

[33:38] जिस दोष की प्रबलता होती है उसी से पुरुष

[33:41] की प्रकृति का निर्माण होता है। उपमा जिस

[33:43] प्रकार विष में उत्पन्न हुआ कीड़ा विष के

[33:46] कारण नहीं मरता उसी प्रकार मनुष्य की

[33:48] प्रकृति निश्चित ही शरीर को बाधा नहीं

[33:50] पहुंचाती। इसका पर्याय क्या है? स्वभाव

[33:52] योनि धारणी लिंग शक्ति आदि। प्रकृति

[33:55] उत्पादन में सहायक कारण दो प्रकार के होते

[33:58] हैं। गर्भावस्था में अपेक्षित कारण और

[33:59] जन्मोत्तम काल में अपेक्षित कारण।

[34:01] गर्भावस्था में अपेक्षित कारण क्या है? तो

[34:03] शुक्र की प्रकृति, काल गर्भाशय की

[34:05] प्रकृति, माता के आहार विहार की प्रकृति,

[34:07] महाभूत विकार की प्रकृति। जन्मोत्तर काल

[34:10] में अपेक्षित कारण छह जातियां होती हैं।

[34:12] जाति प्रोकस्था, कुल प्रसक्ता, देश

[34:15] अनुपातिनी, कालानुपातिनी, वयोपातिनी,

[34:18] प्रत्यान तथा अब इसके भेद क्या है? तो

[34:22] भौतिक प्रकृति, शारीरिक प्रकृति, देह

[34:25] प्रकृति, मानस प्रकृति और भौतिक प्रकृति।

[34:27] तो सबसे पहले हम पढ़ेंगे भौतिक प्रक्रिया।

[34:29] तो पंच महाभूतों के आधार पर भौतिक

[34:31] प्रकृतियां पांच होती हैं। आकाश, वायु,

[34:35] अग्नि, जल, पृथ्वी।

[34:37] शारीरिक कौन-कौन से हैं? सात होंगे। वातज,

[34:39] पित्तज, कफज, द्वंज और सन्निपातज। वात

[34:42] प्रकृति क्या होगी? हीन प्रकृति होगी।

[34:44] पित्त, प्रकृति, मध्यम, कफज, उत्तम और

[34:47] द्वंज प्रकृति निंद्र और सन्निपातज क्या

[34:49] होती है? श्रेष्ठ होती है। तो यहां से एक

[34:50] एमसीक्यू देखने को मिल जाएगा आपको। अब हम

[34:52] बात करेंगे मानस प्रकृति। सत्व स्तंभ के

[34:54] कारण मनुष्य के स्वभाव में विशेष गुण पाए

[34:56] जाते हैं। इन गुणों के कारण सात्विक राशि

[34:58] और तामसिक तीन प्रकार की मानस प्रकृतियां

[35:00] होती हैं। सुश्रुत में तीन प्रकार के

[35:02] कौन-कौन से? सत्व रस स्तंभ को कहा महा

[35:04] प्रकृति कहा है। सात्विक प्रकृति और

[35:06] रास्तिक सात्विक के भेद किन में सात होते

[35:09] हैं। तो उत्तम सुख में उत्कर्षण न प्रकट

[35:12] करने वाले दुख में दीनता ना प्रकट करने

[35:14] वाले को क्या बोलते हैं? सात्विक कहते हैं

[35:16] और रास्तिक छह होते हैं। तो मध्यम राज

[35:18] प्रकृति सुख को अधिक खुश होकर तथा दुख को

[35:21] अधिक दुखी होकर तामस तीन होते हैं। हीन

[35:25] अकीरण सदैव दुखी रहता है। कुल मानस

[35:27] प्रकृतियां कितनी होती है? 16 होती है।

[35:29] देह के प्रकृति के लक्षण क्या है? तो वात

[35:31] प्रकृति पुरुष लक्षण चरक ने वात के गुणों

[35:34] के आधार पर प्रकृति बताई है। रुक्ष शरीर

[35:38] रुक्ष दुर्बलता दुर्बल पतला छोटा स्वर

[35:41] वृक्ष दुर्बल कटा धीमी

[35:44] रुक कर सुनने में कटु तथा अप्रिय अल्प

[35:48] निद्रा वाले लघु गुण चंचल अल्प आहार

[35:53] स्ूर्ति बहुत बोलने वाला कंडरा सीधा जाल

[35:56] दिखाई देता है। मानसिक विकार से शीघ्र

[35:57] ग्रसित होता है। शशु रोम दंत मुख खुरदुरे

[36:01] होते हैं। अंग प्रत्यंग स्फुटित होता है।

[36:03] संधियों में शब्द उत्पन्न होते हैं।

[36:04] अल्पबल होता है आदि। अब हम बात करें

[36:07] पित्तज प्रकृति पुरुष के लक्षण क्या है?

[36:10] बाल असमय श्वेत बुद्धिमान अधिक श्वेत

[36:13] स्वप्न में अग्नि देखता है। चरक ने उष्णता

[36:16] को असहन गौर वर्ण वाले और तीव्र भूख प्यास

[36:23] वाले तीक्षण अग्नि प्रभूत असन आदि वाले अब

[36:27] प्रकृति पुरुष के लक्षण क्या है? तो गंभीर

[36:29] बुद्धि वाला स्थूल अंग स्निग केस वाला

[36:31] बलवान स्वप्न में जलाशय देखता है। चरक ने

[36:35] क्या बोला है? स्निग्ध तथा इस लक्षण

[36:37] शोभनीय सुकुमार शुक्र बाहुल्य उत्तम वैवाह

[36:41] शक्ति अधिक संतान वाले क्षार युक्त आदि

[36:44] उन्होंने बताएं। ध्वनि प्रकृति लक्षण क्या

[36:46] है? तो मिलेजुले लक्षण मिलते हैं। मतलब

[36:48] तीनों से मिलेजुले संधिपद में भी सभी

[36:50] लक्षण युक्त होते हैं। मानस प्रकृति के

[36:52] लक्षण तीन होते हैं। सात्विक, तामसिक और

[36:54] रास्तिक। सात्विक कौन-कौन से होते हैं?

[36:56] ब्रह्म सत्व अर्श सत्व इंद्र सत्व या में

[37:01] सत्व वरुण सत्य कौवे सत और गंध सत्व और

[37:06] तामसिक पशु सत्व मत्स्य सत्व वनस पत्य

[37:10] सत्व और राशि क्या है असुर सत्व राक्षस

[37:13] पैशा सर्प प्रेत साकोर सात्विक प्रकृति

[37:17] कौन से है तो पवित्र होता है सच बोलने

[37:19] वाला जीतात्मा विचार कार्य करने वाला

[37:21] ज्ञान विज्ञान युग्म शक्ति संपन्न समर्थसी

[37:26] अति

[37:27] चिसक कारक चतुर

[37:30] ऋषि सत्व कौन सा है तो अध्ययन व्रत होम

[37:33] ब्रह्मचर्य पालन राग द्वेष से रहित प्रबल

[37:36] धारण शक्ति इंद्र सत्व क्या है तो सुखवीर

[37:39] ओजस्वी दीर्घदर्शी धर्म अर्थ काम में लगा

[37:42] रहने वाला या शत क्या है सभी प्रकार की

[37:45] चेष्टाओं पर ध्यान देने वाला समय पर कार्य

[37:47] करने वाला जिस पर कोई प्रहार ना कर सके

[37:49] सदा जागरूक वर्ण शत है शूरवीर

[37:54] सब्र करने वाला असूची

[37:56] द्वेष पीड़ी जल क्रीड़ा प्रेमी समय पर

[38:00] क्रोधित एवं प्रसन्न होने वाला कोबेर सत्व

[38:03] जिसका कोप और प्रसन्नता स्पष्ट रूप से

[38:06] दिखाई दे स्थान अभिमान

[38:08] भोग परिवार संपन्न धर्म अर्थ काम युक्त

[38:11] पवित्र सुख पूर्वक विहार करने वाला गंधर्व

[38:14] सत जिसे गाना नाचना बजाना पीने लगना गंधवा

[38:17] ले करने वाला आदि बात करेंगे रास्तिक

[38:20] राजसिक के तो रासिक में असुर सत्व कौन से

[38:24] सुर चंड कपटी आदि तो ये लोग आप सब ये सब

[38:28] देख लेना एक बार आप तामसिक वंशिक प्रकृति

[38:31] का ज्ञान आप देख लीजिए चिकित्सा कर्म में

[38:34] सुगमता रोग की साध्य साध्य का ज्ञान

[38:36] प्रकृति ज्ञान से धातु समय तथा दोष साम्य

[38:39] स्थापित कर स्वास्थ्य स्थिर रखा जा सकता

[38:41] है। प्रकृति जानकर व्यक्ति को पत्त पत्ते

[38:43] पालन निर्धारण किया जा सकता है। प्रकृति

[38:45] के ज्ञान के आधार पर भविष्य में आने वाली

[38:48] बीमारियों से उत्तम तरीके

[38:51] से बचाव संभव है। अब हम बात करेंगे अग्नि

[38:55] यह मोस्ट मोस्टेंट है। इससे 10 नंबर का भी

[38:59] क्वेश्चन अग्नि शब्द अंग धातु में

[39:05] दो तरीके से बना है। अग धातु और अग्र धातु

[39:08] सर्वव्यापी अर्थात सर्वत्र व्याप्त रहने

[39:11] वाला और गमन परिवर्तन। इसका मतलब अग्र का

[39:14] मतलब क्या है? गमन परिवर्तन हो। तो इसका

[39:17] सर्वव्यापारी होते हुए जो शरीर में

[39:18] परिवर्तनशील शक्ति है उसे क्या बोलते हैं?

[39:20] अग्नि कहते हैं। इसके पर्याय क्या है?

[39:23] वार्नर सर्वपाक

[39:26] अभन भनी पावक अन

[39:40] भेद इसके क्या है? तो शरीर में अग्नि एक

[39:42] होते हुए भी अपने स्थान एवं कर्मों के

[39:45] आधार पर भिन्न-भिन्न नामों से जानी जाती

[39:47] है। चरक चरक स्थूल रूप से तीन प्रकार

[39:52] जिनके 13 भेद होते हैं। जठराग्नि,

[39:54] भूताग्नि और धात्वा अग्नि 13 पित्त को ही

[39:57] अग्नि मानते हैं। सुश्रुत ने पित्त को ही

[39:59] अग्नि माना। जठराग्नि किसको कहते हैं?

[40:01] इसका पर्याय क्या है? अंतरा अग्नि, काय

[40:03] अग्नि, देह अग्नि, पाच अग्नि आदि। जठर में

[40:06] रहने वाली अग्नि को जठराग्नि कहते हैं

[40:08] क्योंकि आहार का प्रथम पाचन इसी से होता

[40:10] है। इसके पश्चात अनरस को भूता अग्नि और

[40:13] धात अग्नि कार्य करती है। जठराग्नि के बल

[40:14] से शरीर में उष्णता आती है। जठराग्नि भूता

[40:16] अग्नि और धात अग्नि को बल प्रदान करती है।

[40:18] सभी अग्नियों में प्रधान अग्नि है। स्थान

[40:21] अग्नि का स्थान क्या है? गणी सुशुत आवास

[40:24] पवाशय मध्य षष्ठी पित्त धरा कला को अग्नि

[40:27] का स्थान माना है। प्रधानता जठराग्नि का

[40:29] स्थान माना है। किसका? जठराग्नि का।

[40:32] प्रधानता अन्न का पाचन करने वाली जठराग्नि

[40:35] सभी अग्नियों में प्रमुख मानी जाती है

[40:37] क्योंकि इसकी वृद्धि अक्षय होने पर अन्य

[40:40] अग्नियों की वृद्धि अक्षय हो जाती है।

[40:42] जठराग्निद

[40:44] यानी कमी आहार पाचन की कमी होती है। शाद

[40:47] कमी से आम बनता है। धातुओं का स्वाभाविक

[40:50] रूप से वृद्धि ना होना और दीप्ति यानी

[40:52] वृद्धि होने पर क्या होगा? धातु पाक, धातु

[40:54] क्षय और रोग की उत्पत्ति हो जाएगी। तो बल

[40:57] भेद से जठराग्नि चार प्रकार का होता है।

[40:59] तीक्षण अग्नि मंदा अग्नि विषम अग्नि और सम

[41:01] अग्नि प्रकृति अनुसार वातस प्रकृति विषम

[41:04] अग्नि पित्तज प्रकृति तीक्षण अग्नि कफ़

[41:06] प्रकृति मंद अग्नि सम प्रकृति समग्नि कर्म

[41:10] प्रधान कर्म आहार पाक अन्य अग्नियों को बल

[41:12] प्रदान करना शरीर धातु भोज बल आदि का पोषण

[41:15] करना धातु की क्षय वृद्धि का कारण उचित

[41:18] समय पर सम मात्रा में लिए गए अन्न को

[41:22] संपूर्ण रूप से पाचित करके आयु की वृद्धि

[41:25] करता है। भूताग्नि कितने होते हैं? तो

[41:26] पांच होते हैं। पार्थिव आव्य वायु तेजस और

[41:30] नाभस भूतागिनी पंच आहार में अपने अपने

[41:32] गुणों का पाचन करती है। भूतागिनी रस में

[41:34] उपस्थित गुणों को सजातीय गुणों में

[41:37] परिवर्तित करती है। जिससे वह शरीर को

[41:39] ग्राह होकर शरीर में पोषण करती है।

[41:40] भूताग्नि गुणों को पाक करती है। भूताग्नि

[41:44] द्वारा आहार रस में विशेष गुणाधान होकर

[41:47] धातु अग्नियों के लिए धातु पोषण योग बनाती

[41:49] है। धातु अग्नि कितनी होती है? सात होती

[41:51] है। रस रक्त मांस में रस की वजह शुभ धातु

[41:54] और धागियां क्या? धातुओं में पाक पाक

[41:57] क्रिया कर धातुओं का पोषण करती है। द्रव्य

[42:00] में जठराग्नि क्रिया करके अनर्रस अनर्रस

[42:02] विजातीय होके भूताग्नि से अनरस सजातीय हो

[42:05] जाता है। रसाग्नि के सार भाग और रसाग्नि

[42:08] से क्या अन्न रस से में क्या होता है?

[42:10] रसाग्नि का कार्य करके कितने दो भाग बनते

[42:12] हैं। सार भाग और पीट भाग। पीट भाग से फिर

[42:14] दो भाग। सार भाग से फिर दो भाग बनते हैं।

[42:16] स्थूल और सूक्ष्म। सूक्ष्म से क्या बनता

[42:18] है? तो उपधातु और उत्तरोत्तर धातु का अंश।

[42:22] मतलब कि उसमें फिर रक्त अग्नि की क्रिया

[42:25] होगी तो फिर दो भाग बनेगा क्षार और किट तो

[42:27] क्षार में फिर स्थूल और ये ऐसे करते करते

[42:29] सभी अब अग्नि का सभी धातुओं का कार्य

[42:32] करेगी। अब अग्नि का महत्व क्या है? तो

[42:34] अग्नि शरीर का मूल है क्योंकि आयु वर्ण बल

[42:37] स्वास्थ्य उत्साह उच्च प्रभाव ओज प्राण ये

[42:40] सब अग्नि पर ही निर्भर है। बल आरोग्य आयु

[42:43] प्राण अग्नि के अधीन है। अतः इसकी विशेष

[42:45] रूप से रक्षा करनी चाहिए। दोषों की क्षमता

[42:47] एवं प्रकोप अग्नि के आश्रित है। उस अग्नि

[42:50] की सदा ही रक्षा करनी चाहिए। अब हम मोस्ट

[42:52] इंपॉर्टेंट टॉपिक आहार की बात कर रहे हैं।

[42:54] इससे भी एक एससीक्यू और एक एलक्यू देखने

[42:57] को जरूर मिलेगा। इसकी निरुक्ति क्या है?

[43:00] आहारते गलार इति आहार। गले से नीचे लिए

[43:04] जाने वाले या निगलने वाले द्रव्य को आहार

[43:06] कहते हैं। परिभाषा इसका जो द्रव्य गले के

[43:09] द्वारा निगला जाए तथा जो शरीर दो धातु मल

[43:12] का पोषण करे उसे आहार कहते हैं। इसका

[43:14] वर्गीकरण क्या है? एक भेद दो भेद चतुर्वेद

[43:18] चतुर्वेद सप्तभेद पंचम भेद और 20 भेद

[43:22] असंख्य एक भेद आहारता की दृष्टि से योनि

[43:26] भेद से दो भेद स्थावर जांगम प्रभाव भेद से

[43:29] क्या हितकर अहितकर उपयोग भेद से उपयोग के

[43:34] आधार पर पान असन भक्ष लेह और रसों के आधार

[43:38] पर मधुर अम्ल लवण कटु कसाय गुणवादी गुण के

[43:41] आधार पर पीस होते हैं द्रव्यों के संयोग

[43:43] तथा करण की अधिकता के कारण पर आहार असंख्य

[43:47] होते हैं। महत्व प्राण धारियों का प्राण

[43:49] अन्न है। इसी अन्न की ओर जीव लोग भागता

[43:53] है। वर्ण सुख प्रसाद

[43:55] पुष्टि सुख पुष्टि जीवन बल प्रतिभा मेदा

[43:58] ये सब अन्न में प्रतिष्ठित है। आहार

[44:01] तिरुपस्तंभ में से एक है। इससे शरीर बल व

[44:05] पोषण से पुष्ट होकर स्थिर रहता है। बल एवं

[44:08] वायु आहार के अधीन है। शरीर आहार के कारण

[44:11] ही संभव है।

[44:13] प्रणीन सद्य बलकृत देहधारक आयु कारक तेज

[44:17] देने वाला सम उत्साह का कारण स्मृतिवर्धन

[44:20] ओज एवं अग्निवर्धक है अष्ट आहार विशेष

[44:23] आयतन मोस्ट मोस्ट इंपॉर्टेंट है इससे एलए

[44:26] भी बन सकता है और हो सकता है एसपी भी तो

[44:28] स्वस्थ वृत्त तो आहार क्या है आहार विधि

[44:33] विशेष आयतन क्या है तो आहार आहार विधि के

[44:37] आठ विशेष आयतनों का वर्णन है विधि विशेष

[44:40] आयतन कहते हैं प्रकृति अर्थात स्वभाव आहार

[44:42] एवं औष द्रव्यों से ही गुरु लघु आदि युक्त

[44:45] होते हैं। जैसे कि उड़द एवं शुगर का मांस

[44:48] गुरु एवं मूग एवं हिरण का मांस लघु है।

[44:51] करण स्वाभाविक द्रवों के संस्कार को करण

[44:54] कहते हैं। संस्कार द्वारा द्रव्यों में

[44:55] गुंतधान होता है। दधिक कफ वर्धक है किंतु

[44:58] मंथन पश्चात प्राप्त कफ नाशक है। संयोग दो

[45:01] या दो से अधिक द्रव्यों का सह भाव मिलाओ।

[45:04] इस संयोग से द्रव्य में विशेष गुण आते हैं

[45:07] जो कि अकेले द्रव्य में नहीं होते। शहद

[45:08] एवं विरुद्ध समान मात्रा में विष होता है।

[45:11] और शद एवं घृत पथक पृथक में अमृत समान

[45:14] होते हैं। अब बात करेंगे राशि आहार की

[45:16] मात्रा राशि कहलाती है। यह दो सर्वग्रह और

[45:18] परिग्रह आहार द्रव्य की संपूर्ण मात्रा

[45:20] सर्वग्रह है और आहार घट घटकों की पथक पृथक

[45:23] मात्रा क्या है? परिग्रह है। देश आहार

[45:26] द्रव्य तथा उपभोक्ता का उत्पत्ति स्थान

[45:29] देश कहलाता है। काल समय दो प्रकार से होते

[45:32] हैं। नित्यक और आवास्तिक। ऋतु साथ में की

[45:34] अपेक्षा रखता है उसे नित्यक कहते हैं।

[45:36] अधिकारों की अपेक्षा रखता है उसे क्या

[45:37] बोलते हैं? अवस्थी कहते हैं। उपयोग संस्था

[45:40] क्या है? भोजन ग्रहण करने के नियम भोजन के

[45:42] जीर्ण लक्षण की अपेक्षा करता है। उसे

[45:44] उपयोग संस्था कहते हैं। उपभोक्ता क्या है?

[45:47] उपयोग जो आहार का उपयोग करता है उसके साथ

[45:51] जो आहार का उपयोग करता है वो साथ में

[45:56] उपयोगता को अधीन रहता है। इस प्रकार आहार

[45:59] विशेषकरण का उचित प्रयोग पथ शुभ एवं

[46:03] अनुचित प्रयोग अपत्य या अशुभ होता है। अब

[46:06] हम बात करेंगे आहार विधि विधान उष्ण आहार

[46:09] तो शीघ्र पचता स्वादिष्ट तथा वात अनुलोमन

[46:14] करता है उसे क्या बोलते हैं? उष्णहार

[46:17] स्निग्ध आहार क्या है? शीघ्र पचने वाला

[46:18] है। वल वर्धक है। व प्रसाद वाला है। मात्र

[46:21] पूर्व क्या है? तो वात पित्त को बिना

[46:23] प्रकपित किए आयु वर्धक आहार जीर्ण होने पर

[46:27] परिपक औरस तथा सभी दोषों को प्रकुपित करता

[46:31] है। वीर्य विरुद्ध वीर्य विरुद्ध आहार

[46:33] ग्रहण विकारों से आक्रांत नहीं होता। इष्ट

[46:36] देश इष्ट उपकरण मानसिक उद्वेग तथा

[46:39] मनोविकार से बचाव ना अति द्रुतम आहार का

[46:42] उन्माद गमन भोजन पश्चात आलस से अपच ना अति

[46:46] विलंब तृप्ति की प्राप्ति नहीं होती विषम

[46:48] पाचन अल्प न हसन तो अतिशील भोजन समान

[46:53] लक्षण आत्मशक्ति अनुसार हानि लाभ विचार

[46:57] अग्नि की समीक्षा कर भोजन करें अब आहार

[47:00] परिवार भाव क्या है आहार परिवाहकर भाव

[47:03] क्या है तो इसके छ संख्या कितनी छह है तो

[47:06] परिभाषा यह आहार को पचाकर रसादी धातुओं के

[47:09] रूप में बदलने वाले छह भाव है। ऊष्मा भूख

[47:11] पदार्थों का पाचन कराती है। वायु भोजन को

[47:14] गति प्रदान करके उससे रस का अपकर्षण कराने

[47:17] में सहायक होता है। इसका ट्रिक क्या है?

[47:20] उमा वायु के क्लेद स्ने का काल समान है।

[47:23] तो क्लेद अन्न को शिथिल करता है। स्नेह

[47:25] भोजन को मृदु करता है। काल क्या है? सम्यक

[47:27] रूप में भोजन को पकाने में सहायक होता है।

[47:30] असमयोग क्या है? तो परिणाम प्राप्त रसादी

[47:34] धातुओं का समय

[47:38] रखता है। अब द्वादर्श परिवेशालय क्या है?

[47:41] तो आहार को किन-किन अवस्था में देना

[47:43] चाहिए? इसके लिए भोजन के 12 विचार का

[47:46] वर्णन किया गया है। जो शीत तृष्णा उष्णता

[47:49] दामन से पीड़ित रक्त विष्याप्त मूर्छित

[47:51] मैथुन छ आदि को शीत प्रकृति भोजन देना

[47:54] करवाना चाहिए। कफ वात से पीड़ित विरेचन के

[47:57] लिए किए हुए स्नेह पान क्लीन को उष्ण भोजन

[48:00] देना चाहिए। स्न वात रोगी सुक्ष रोगी थके

[48:03] हुए व्यायामी को स्निग्ध देना चाहिए रुक्ष

[48:05] में कफज पुरुष प्रमेह में रुक्ष और द्रव

[48:09] तृष्णा आलू दुर्बल में द्रव देना चाहिए

[48:12] शुष्क में वर्णित प्रमेह क्ल शरीर वाले को

[48:14] शुष्क द्रव आहार पाक अब आहार पाक से भी एक

[48:17] एलए या एसक्यू या एलए देखने को मिल जाएगा

[48:20] तो पोष् का अर्थ होता है बड़ी खाली स्थान

[48:23] से जिसमें अत्यधिक वस्तुएं रखी जाती है

[48:25] पर्याय महा स्त्रोत शरीर मध्य मोहानिम आम

[48:28] पकवास से अब बात करेंगे आवास इसके सुसूत्र

[48:32] में क्या बोला है? आवाशय अग्नाशय पकवाशय

[48:34] मूत्राशय रुधराशय मृद कुंडो फुफुस चरक ने

[48:38] दो भेद बदले मृदु और क्रूर पित्त प्रधान

[48:41] ग्रहणी कोष् और वात प्रधान ग्रहणी कुरु

[48:44] कोष् सुश्रुत ने मृत्यु को पित्त मध्य कोष

[48:48] सम और क्रूर को वात वागभट कफ तथा शाम दोष

[48:51] की प्रधानता से मध्यकोष् अब महत्व औषधि

[48:54] मात्र निर्धारण हेतु कोष् ज्ञान आवश्यक

[48:56] है। संशोधन चिकित्सा कर्म करने से पूर्व

[48:59] कोष् ज्ञान आवश्यक है। अन्व स्त्रोतस एवं

[49:01] जिसके द्वारा शरीर परिवर्तनशील धातुओं का

[49:04] शरण होता है। अन्वसतस वे आभ्यंतर स्त्रोतस

[49:08] है जो अन्न का वाहन करते हैं। मूल आमाशय

[49:11] वामपसो अन्नवाहिनी धमनीय दृष्टि के दृष्टि

[49:15] के कारण अति मात्रा अकाल अहित भोजन से

[49:19] अग्नि विगुणता से लक्षण अन्न अभिलाषा

[49:23] अरुचि अभिपाक सर्दी आद्यमान शूल और मरण ये

[49:27] सब इसके लक्षण है। अब ग्रहणी एवं पित्त

[49:30] धरा कला। तो ग्रहणी शरीर के उस अव्यय को

[49:32] कहा जाता है जो अन्न को ग्रहण कर कुछ समय

[49:35] तक धारण करता है जिससे कि अन्न का सम्यक

[49:38] विघटन एवं अशोषण हो सके। स्थान क्या है?

[49:40] ग्रहणी का नाभि के ऊपर अग्नि का अधिष्ठान

[49:43] है। यह ग्रहणी अग्नि के बल से उपास्तंभित

[49:48] एवं बलिष्ठ होते हैं। कार्य पक अन्न का

[49:51] धारण करती है तथा पकवा वह वाहन को पारश्व

[49:53] से सृजन करती है। अग्नि के दुर्बल होने से

[49:55] ग्रहणी हो जाती है तथा आम का विमोचन करती

[49:59] है। पितरा कला क्या है? तो षष्ठी पित्रा

[50:02] पित्रा नाम या कला प्रकृतिता पकवासे आमाशय

[50:06] मध्यस्था ग्रहणी सा प्रकृतिता छठी कला का

[50:08] नाम पित्रा कला है या पकवासे और आमाशय के

[50:11] मध्य में स्थिर रहती है इसे ग्रहणी कहा

[50:13] जाता है पित्रा के द्वारा अन्न का ग्रहण

[50:15] होने से इसको क्या कहेंगे ग्रणी का आहार

[50:17] पाक प्रक्रिया क्या है तो आहार आदान कर्म

[50:20] ग्रहण से कोष् में आता है कोष् में इन

[50:22] अन्न का संघात तथा मृत्व को प्राप्त होता

[50:24] है संघात मतलब पाचक पित्त होता है मृत्व

[50:26] क्लेरक का कप होता है अब मृदु अन्न को

[50:29] समान वायु द्वारा प्रेरण कर फल स्वरूप

[50:31] जठराग्नि द्वारा उचित काल में सम मात्रा

[50:34] में खाया आहार पाक करती है। उपमा जिस

[50:38] प्रकार एक पात्र में रखा गया जल और चावल

[50:40] अग्नि में पाक होकर भात में परिवत हो जाए

[50:42] उसी प्रकार अन्न भी आमाशय के अध स्थिर

[50:45] अग्नि से पचकर रस एवं मल में परिवर्तन हो

[50:48] जाए। अवस्था अवस्था पाक का तात्पर्य

[50:50] अवस्था पाक का तात्पर्य अन्न का अवस्था

[50:52] अनुसार पाक से है। अन्न ग्रहण करने के बाद

[50:56] वह किस अवस्था में पहुंच गया है? इसके

[50:58] नियमित पाक तीन अवस्थाएं बताई गई है। मधुर

[51:01] अवस्था पाक अम्ल कटु अवस्था पाक को परपाक

[51:05] भी कहते हैं। मधुरा अवस्था पाक को पाकवा

[51:07] पाकवा पाक अवस्था और अम्ल अवस्था पाक को

[51:10] पश्च अवस्था कटु को पाकवा अवस्था कहते

[51:13] हैं। मधुर अवस्था पाक या रस युक्त आहार

[51:18] बोधक कफ द्वारा मृद

[51:22] दांतों द्वारा चमन कर मधुर रस फेन युक्त

[51:25] कफ की उत्पत्ति करता है। यह प्रक्रिया आवा

[51:28] भाग में होती है। उसे क्या बोलते हैं?

[51:30] मधुर अवस्था पाक। अम्ल अवस्था पाक क्या

[51:32] है? मधुर अवस्था के उपरांत जब अपक

[51:35] विदग्ध होकर अम्ल अम्लीयभीत हो जाता है तब

[51:39] उसे क्या उसे ही क्या बोलते हैं? अम्ल

[51:41] अवस्था पाक कहते हैं। यह आमाशय के अधू भाग

[51:43] में होता है। इस अम्ल के कारण अच पित्त

[51:46] शुद्ध पित्त की उत्पत्ति होती है। कटु

[51:48] अवस्था उपयुक्त अवस्थाओं से होता हुआ अन्न

[51:51] जब पकवासे को प्राप्त होता है तो पकवासे

[51:54] में उपस्थित अग्नि द्वारा आहार स्नेहांश

[51:57] एवं जलियांन शोषित होकर पिंड रूप में

[51:59] परिवर्तन होता है तथा कटुआ की उत्पत्ति और

[52:01] वायु की वृद्धि होती है। इस प्रकार मधुर

[52:05] अवस्था पाक में कफ, अम्ल में पित्त और

[52:07] कटुआ में उत्पत्ति होती है। जीर्ण आहार

[52:11] लक्षण उद्गार शुद्धि उत्साह वेगोत्सर्ग

[52:16] लघुता भूख प्यास आदि लक्षण होते हैं।

[52:18] निष्ठा पाक क्या होता है? आहार से

[52:20] जठराग्नि का संयोग होकर अन्न रस बनता है।

[52:23] उसमें अंतिम क्रिया द्वारा परिणाम स्वरूप

[52:25] रस की उत्पत्ति होती है। उसे हम विपाक

[52:28] कहते हैं। पाक के अंत में होने के कारण

[52:30] इसे निष्ठा पाक कहते हैं। संपूर्ण अवस्था

[52:32] वर्ग द्वारा सूक्ष्म रूप में परिवर्तन हो

[52:34] जाता है। इसके पश्चात प्रत्येक द्रव्य का

[52:36] जठराणी द्वारा रूपांतर होने पर एक विशिष्ट

[52:39] रस की उत्पत्ति होती है। उसे क्या विपाक

[52:41] कहते हैं। इसके भेद कितने होते हैं? तो

[52:44] इसके तीन भी होते हैं। चरक ने तीन माने और

[52:46] सूत्रों ने दो। चरक ने मधुर विपाक अम्ल

[52:48] प्रकार कट विभाग मधुर द्रव्य रस द्रव्य रस

[52:52] और कटु तिक द्रव्य रस सुश्रुत में दो मधुर

[52:55] विपाक गुरु कटुर लघु कर्म जिस प्रकार के

[52:58] रस वाला जिस प्रकार के रस वाला विपाक होता

[53:01] है उसी प्रकार के अनुसार कर्म होता है

[53:03] मधुर विपाक में कफ वर्धक मलमूत्र सृष्टक

[53:07] सुक्र अम्ल विपाक पित्तवर्धक होता है मल

[53:10] मूत्र सृष्टक होता है सुक्र नाशक होता है

[53:12] कठ वाव वर्धक होता है वातवर्धक मल मूत्र

[53:15] वंधक होता है और शुक्र नाशक होता है।

[53:17] विपाक का ज्ञान अनुमान द्वारा होता है।

[53:19] अवस्था वाक एवं विपाक में अंतर तो यह

[53:21] अवस्था पाक प्रथम पाक है। पाक की अवस्था

[53:25] पर निर्भर करता है। संपूर्ण आहार रस का

[53:27] घोक है। कफ, पित्त और वात, पित्त, कफ की

[53:32] वृद्धि होती है। तीन भेद होते हैं इसके।

[53:34] परिवर्तनशील, प्रत्यक्ष ज्ञान प्रपा भी

[53:37] कहते हैं। विपाक क्या है? अंतिम पाठ नहीं

[53:40] है।

[53:44] प्रत्येक द्रव्य के रूपांतरण रस का घोक

[53:46] है। वात पित्त कफ प्लस मल की उत्पत्ति

[53:49] होती है। चरक में तीन माने सुश्रुप में दो

[53:51] माने अपरिवर्तनशील

[53:53] अनुमान भी निष्ठा पाक कहते हैं।

[53:57] तो यहां पर हमारा आज मैराथन खत्म हुआ।

[54:01] आई होप आपको समझ में आया होगा। तो एक से

[54:04] दो बार देख के जाए। य से

[54:07] देखने को मिल जाएगा। तब तक के लिए बने रहे

[54:10] आपके अपने चैनल बीएएमएस क्रैकर के साथ और

[54:13] हां इसका मॉडर्न पार्ट जो है वह हम
