# Complete Indian Polity through Animation in one Video for UPSC CSE | OnlyIAS

https://www.youtube.com/watch?v=iSc23xf52U4
Translation: en

[00:00] नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका PW ओली आईएस के इस खास वीडियो में।
  Hello friends, welcome to this special video of PW Oli IAS.

[00:03] आज हम बात करने जा रहे हैं एक ऐसे सफर की जो सिर्फ कागजों पर लिखी एक कहानी नहीं बल्कि एक सोच, एक सपना था।
  Today we are going to talk about a journey that was not just a story written on paper but a thought, a dream.

[00:08] एक ऐसे देश का सपना जो दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी बनने वाला था।
  A dream of a country that was going to become the world's largest democracy.

[00:18] जी हां, हमारा प्यारा देश भारत।
  Yes, our beloved country India.

[00:21] दोस्तों आज के इस वीडियो में हम समझेंगे भारत के संविधान यानी इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन के बनने और इवॉल्व होने की कहानी।
  Friends, in today's video, we will understand the story of the making and evolution of the Constitution of India, i.e., the Indian Constitution.

[00:29] कैसे यह एक आईडिया बना? कैसे यह एक मूवमेंट में बदला और कैसे इसने हम सबको एक आइडेंटिटी दी और वो आइडेंटिटी थी वी द पीपल ऑफ इंडिया।
  How did it become an idea? How did it turn into a movement and how did it give us all an identity, and that identity was We the People of India.

[00:40] लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिरकार सबसे पहले यह विचार किसने दिया कि भारत का संविधान भारत के लोगों द्वारा ही बनाया जाना चाहिए।
  But the question arises, who first gave the idea that the Constitution of India should be made by the people of India.

[00:51] कौन थे वो लोग जिन्होंने इस सपने को सच बनाने के लिए अपनी मेहनत, अपना समय और अपनी जिंदगी समर्पित कर दी।
  Who were those people who dedicated their hard work, their time, and their lives to make this dream come true.

[00:57] हम देखेंगे
  We will see

[01:00] शुरुआती दिनों में हमारे कॉन्स्टिट्यूशन में क्या-क्या प्रोविजंस थे और फिर समय के साथ कौन से नए प्रोविजंस ऐड किए गए और सबसे जरूरी क्यों किए गए?
  What provisions were there in our constitution in the early days, and then over time, which new provisions were added, and most importantly, why were they added?

[01:08] क्या मोटिव था उन बदलावों के पीछे?
  What was the motive behind those changes?

[01:11] और जब यह बदलाव आए तब हमारी एग्जीक्यूटिव, लेजिस्लेचर, जुडिशरी ने इन पर क्या प्रतिक्रिया दी?
  And when these changes came, how did our executive, legislature, and judiciary react to them?

[01:18] आज के इस वीडियो में हम इन्हीं सारे सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे।
  In today's video, we will try to find the answers to all these questions.

[01:22] और समझेंगे कि भारत का संविधान सिर्फ कानून का किताब नहीं बल्कि एक लिविंग डॉक्यूमेंट है जो हर नए युग के साथ इवॉल्व होता जा रहा है।
  And we will understand that the Constitution of India is not just a book of laws but a living document that is evolving with every new era.

[01:31] तो चलिए शुरू करते हैं।
  So let's begin.

[01:34] दोस्तों आप सब जानते हैं कि किसी भी देश का कॉन्स्टिट्यूशन उस देश की आत्मा होती है और इस आत्मा को रूप देने का काम एक विशेष असेंबली करती है जिसे हम संविधान सभा या फिर कॉन्स्टिटुएंट असेंबली कहते हैं।
  Friends, you all know that the constitution of any country is the soul of that country, and the work of giving form to this soul is done by a special assembly which we call the Constituent Assembly.

[01:49] लेकिन दोस्तों, भारत में कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली बनाने का आईडिया किसी एक दिन में नहीं आया था।
  But friends, the idea of forming a Constituent Assembly in India did not come about in a single day.

[01:54] यह एक लंबी जर्नी रही जो लगभग दो दशक तक चलती
  It was a long journey that lasted for about two decades.

[02:01] रही।
  It was.

[02:05] इस जर्नी की पहली झलक हमें 1928 की नेहरू रिपोर्ट में देखने को मिलती है।
  The first glimpse of this journey is seen in the 1928 Nehru Report.

[02:08] यह वही मोमेंट था जहां पहली बार फ्यूचर कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ इंडिया के बारे में सोचा गया।
  This was the moment when the future Constitution of India was thought about for the first time.

[02:13] लेकिन इस थॉट को एक ऑर्गेनाइज्ड और क्लियर रूप में देने का काम हुआ 1934 में जब एमएन रॉय ने पहली बार ऑफिशियली कॉन्स्टिटुएंट असेंबली का प्रपोजल दिया।
  But the work of giving this thought an organized and clear form happened in 1934 when MN Roy first officially proposed the Constituent Assembly.

[02:26] धीरे-धीरे यह आईडिया लोगों के बीच मोमेंटम पकड़ने लगा और ब्रिटिश गवर्नमेंट को भी मानना पड़ा कि भारत के लिए एक इक्टेड बॉडी द्वारा कॉन्स्टिट्यूशन बनाना ही होगा।
  Slowly this idea started gaining momentum among the people and the British government also had to accept that the constitution for India would have to be made by an elected body.

[02:37] 1935 के बाद से इंडियन नेशनल कांग्रेस ने भी इस आईडिया को अपनी ऑफिशियल डिमांड बना लिया और फिर 1940 के अगस्त ऑफर में ब्रिटिश गवर्नमेंट ने प्रिंसिपल के तौर पर यह बात मान ली कि भारत का संविधान भारत के लोग ही बनाएंगे।
  From 1935 onwards, the Indian National Congress also made this idea its official demand, and then in the August Offer of 1940, the British government accepted in principle that the constitution of India would be made by the people of India.

[02:52] लेकिन प्रिंसिपल से रियलिटी तक पहुंचने में अभी काफी वक्त था।
  But there was still a lot of time to reach reality from principle.

[02:57] और वो वक्त आया 1946 में जब कैबिनेट मिशन
  And that time came in 1946 when the Cabinet Mission

[03:01] प्लान के तहत कॉन्स्टिटुएंट असेंबली बनाने का फैसला लिया गया।
  Under the plan, it was decided to form a Constituent Assembly.

[03:04] इसी प्लान के तहत इलेक्शंस कराए गए और असेंबली का गठन किया और फिर वह ऐतिहासिक दिन आया 9 दिसंबर 1946 जब कॉन्स्टिटुएंट असेंबली की पहली मीटिंग बुलाई गई।
  Under this plan, elections were held and the assembly was formed, and then came that historic day, December 9, 1946, when the first meeting of the Constituent Assembly was convened.

[03:14] उस समय सबसे सीनियर मेंबर होने के नाते डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा जी को असेंबली का टेंपरेरी प्रेसिडेंट बनाया गया।
  At that time, as the most senior member, Dr. Sachchidananda Sinha was made the temporary president of the assembly.

[03:19] लेकिन सिर्फ दो दिन बाद यानी 11th दिसंबर 1946 को असेंबली ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी को परमानेंट प्रेसिडेंट के रूप में इ कर लिया।
  But just two days later, on December 11, 1946, the assembly elected Dr. Rajendra Prasad as the permanent president.

[03:23] उनके साथ एच सी मुखर्जी जी को वाइस प्रेसिडेंट बनाया गया और एक बहुत ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई सर बी एन राव को जो बने कॉन्स्टिट्यूशनल एडवाइजर ऑफ द कॉन्स्टिटुएंट असेंबली।
  Along with him, H.C. Mukherjee was made the Vice President, and a very important responsibility was given to Sir B.N. Rau, who became the Constitutional Advisor of the Constituent Assembly.

[03:44] दोस्तों एक और इंटरेस्टिंग फैक्ट यह है कि जब कॉन्स्टिटुएंट असेंबली बनी थी तो उसमें 389 मेंबर्स थे।
  Friends, another interesting fact is that when the Constituent Assembly was formed, it had 389 members.

[03:47] लेकिन 1947 के पार्टीशन के बाद कुछ सीट्स पाकिस्तान को चली गई और हमारी असेंबली की मेंबरशिप घटकर 299 रह गई।
  But after the partition of 1947, some seats went to Pakistan, and our assembly's membership reduced to 299.

[03:55] अब सवाल उठता है कि आखिर इतनी बड़ी
  Now the question arises as to why such a large

[04:05] असेंबली ने अपना काम पूरा करने में कितना समय लिया?
  How long did the assembly take to complete its work?

[04:09] हमारे इस कॉन्स्टिट्यूशन को बनाने में लगभग 3 साल लगे।
  It took about 3 years to make our constitution.

[04:13] एग्जैक्ट फिगर की बात करें तो 2 साल, 11 महीने और 18 दिन।
  To talk about the exact figure, it was 2 years, 11 months, and 18 days.

[04:16] सोचिए दोस्तों, इतना लंबा समय यह खुद बताता है कि कॉन्स्टिट्यूशन बनाना कितना चैलेंजिंग और डिटेल्ड काम था।
  Think about it friends, such a long time itself tells how challenging and detailed work it was to create the constitution.

[04:22] इस दौरान कुल 11 सेशंस हुए जो मिलाकर करीब 165 दिन तक चले।
  During this period, a total of 11 sessions were held, which lasted for about 165 days combined.

[04:29] हर एक सेशन में गहरी चर्चाएं, डिबेट्स और आर्गुमेंट्स होते रहे।
  In each session, deep discussions, debates, and arguments continued.

[04:35] इन सब में जिसमें सबसे ज्यादा वक्त लगा वो था ड्राफ्ट कॉन्स्टिट्यूशन पर डिस्कशंस और डिबेट्स का।
  Among all these, the one that took the most time was the discussions and debates on the draft constitution.

[04:40] जी हां, सिर्फ इस ड्राफ्ट के ऊपर ही लगभग 114 दिनों तक पॉइंट टू पॉइंट डिस्कशन हुआ।
  Yes, point-to-point discussion took place on this draft alone for about 114 days.

[04:47] और हां, यह सफर सिर्फ लंबा ही नहीं महंगा भी था।
  And yes, this journey was not only long but also expensive.

[04:50] उस दौर के हिसाब से देखा जाए तो संविधान बनाने में लगभग 64 लाख खर्च हुए थे जो उस वक्त एक बहुत बड़ी रकम थी।
  Looking at it from the perspective of that era, about 64 lakh were spent in making the constitution, which was a very large sum at that time.

[04:58] लेकिन दोस्तों उस सारी मेहनत का परिणाम था वो हिस्टोरिक दिन 26 नवंबर 1949
  But friends, the result of all that hard work was that historic day, November 26, 1949.

[05:06] जब संविधान को फॉर्मली अडॉप्ट कर लिया गया।
  When the constitution was formally adopted.

[05:08] आज हम इसी दिन को संविधान दिवस यानी कॉन्स्टिट्यूशन रूप में मनाते हैं।
  Today we celebrate this day as Constitution Day.

[05:11] दरअसल 1930 में इसी दिन यानी 26 जनवरी को रावी नदी के किनारे इंडियन नेशनल कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज का संकल्प डिक्लेअर किया था और यही वजह है कि हम हर साल 26 जनवरी को रिपब्लिक डे यानी गणतंत्र दिवस मनाते हैं।
  Actually, on this day in 1930, January 26th, the Indian National Congress declared the resolution of Purna Swaraj on the banks of the Ravi River, and this is why we celebrate January 26th every year as Republic Day.

[05:28] दोस्तों अब तो आप समझ ही गए होंगे कि इतना विशाल और डिटेल्ड डॉक्यूमेंट बनाना किसी एक व्यक्ति का काम नहीं था।
  Friends, by now you must have understood that creating such a vast and detailed document was not the work of a single person.

[05:31] कॉन्स्टिटुएंट असेंबली की कई सारी कमिटीज डिफरेंट-डिफरेंट रोल्स निभा रही थी और कॉन्स्टिट्यूशन बनाने के लिए एक स्पेशलाइज्ड कमेटी बनाई गई थी जो कि सबसे पॉपुलर कमेटी थी ड्राफ्टिंग कमेटी जिसकी प्रेसिडेंसी संभाली थी डॉ बी आर अंबेडकर जी ने उन्होंने ही फाइनल ड्राफ्ट को शेप दिया और इसीलिए उन्हें अक्सर आर्किटेक्ट ऑफ द इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन कहा जाता है।
  Many committees of the Constituent Assembly were playing different roles, and a specialized committee was formed to create the constitution, which was the most popular committee, the Drafting Committee, presided over by Dr. B. R. Ambedkar. He gave shape to the final draft, and that is why he is often called the architect of the Indian Constitution.

[05:57] पर भारत का संविधान एक कलेक्टिव टीम वर्क का नतीजा था।
  But the Constitution of India was the result of collective teamwork.

[05:59] हर कमेटी, हर लीडर ने अपना-अपना क्रूशियल रोल निभाया।
  Every committee, every leader played their crucial role.

[06:02] जैसे जवाहरलाल नेहरू जी के लीडरशिप में दो
  For example, under the leadership of Jawaharlal Nehru, two

[06:08] इंपॉर्टेंट कमिटीज थी।
  There were important committees.

[06:10] यूनियन कॉन्स्टिट्यूशन कमिटी और यूनियन पावर्स कमेटी।
  The Union Constitution Committee and the Union Powers Committee.

[06:12] वहीं सरदार वल्लभ भाई पटेल जी के पास भी दो बहुत ही क्रूशियल जिम्मेदारियां थी।
  Also, Sardar Vallabhbhai Patel had two very crucial responsibilities.

[06:17] वो प्रोविंशियल कॉन्स्टिट्यूशन कमेटी और एडवाइज़री कमेटी ऑन फंडामेंटल राइट्स एंड माइनॉरिटीज के चेयर पर्सन थे।
  He was the Chairperson of the Provincial Constitution Committee and the Advisory Committee on Fundamental Rights and Minorities.

[06:25] इन सब लीडर्स के थॉट्स, डिबेट्स और डिस्कशंस का नतीजा था वो फाइनल ड्राफ्ट जो बाद में पूरे देश का गाइडिंग डॉक्यूमेंट बना और इस पूरी प्रोसेस के दौरान असेंबली के डेली काम को डायरेक्ट करने की जिम्मेदारी थी जीवी मावलंकर जी के पास जो कॉन्स्टिटुएंट असेंबली को एक प्रोविजनल पार्लियामेंट की तरह संचालित करते थे।
  The result of the thoughts, debates, and discussions of all these leaders was that final draft which later became the guiding document for the entire country, and during this entire process, the responsibility of directing the daily work of the Assembly lay with G.V. Mavalankar, who conducted the Constituent Assembly like a provisional parliament.

[06:44] यह सच है कि कॉन्स्टिट्यूशन बनाना एक टीम एफर्ट था।
  It is true that making the Constitution was a team effort.

[06:46] हर मेंबर और हर कमेटी ने अपना पूरा कंट्रीब्यूशन दिया।
  Every member and every committee made their full contribution.

[06:48] इस पूरे प्रोसेस के साथ कुछ बहुत ही यूनिक और फैसनेटिंग फैक्ट्स जुड़े हुए हैं जिसे हम अभी डिस्कस करेंगे।
  Some very unique and fascinating facts are associated with this entire process, which we will discuss now.

[06:58] हमारे कॉन्स्टिट्यूशन के बारे में एक इंटरेस्टिंग फैक्ट यह है कि हमारा पूरा कॉन्स्टिट्यूशन हाथ से लिखा गया था और इसमें कोई भी प्रिंटिंग प्रेस का यूज़ नहीं किया गया।
  An interesting fact about our Constitution is that our entire Constitution was written by hand, and no printing press was used.

[07:06] प्रेम बिहारी नारायण
  Prem Bihari Narayan

[07:08] रायजादा जी ने इसे अपनी एलगेंट इटालिक स्टाइल हैंडराइटिंग में लिखा और इतना ही नहीं शांतिनिकेतन के कलाकारों जैसे मशहूर आर्टिस्ट नंदलाल बोस जी ने हर पेज को पेंटिंग्स और मोटिव्स से सजाया।
  Rayjada ji wrote it in his elegant italic style handwriting, and not only that, famous artists like Shantiniketan's artists, Nandlal Bose ji, decorated every page with paintings and motifs.

[07:23] इसीलिए हमारा संविधान सिर्फ एक लीगल डॉक्यूमेंट ही नहीं बल्कि हमारे रिच आर्ट हेरिटेज फॉर्म्स का एक बेहतरीन एग्जांपल है।
  Therefore, our constitution is not just a legal document but also a great example of our rich art heritage forms.

[07:31] इसके अलावा कॉन्स्टिट्यूशन के दो ओरिजिनल कॉपीज बनाई गई थी।
  Besides this, two original copies of the constitution were made.

[07:33] एक इंग्लिश में और एक हिंदी में।
  One in English and one in Hindi.

[07:36] पर हिंदी वर्जन को ऑथॉरिटेटिव माना गया 1987 में जब 58 कॉन्स्टिट्यूशन अमेंडमेंट एक्ट आया।
  But the Hindi version was considered authoritative in 1987 when the 58th Constitution Amendment Act came.

[07:42] दोनों कॉपीज हैंड रिटन थी और पेंटिंग्स से ब्यूटीफुली डेकोरेट की गई थी जिससे हर एक पेज एक विजुअल मास्टर पीस बन गया।
  Both copies were handwritten and beautifully decorated with paintings, making each page a visual masterpiece.

[07:49] हमारे कॉन्स्टिट्यूशन ने शुरू से ही पावर का क्लियर डिवीजन डिफाइन किया था।
  Our constitution had defined a clear division of power from the beginning.

[07:54] ताकि सेंटर और स्टेट्स के बीच अथॉरिटी का बैलेंस बना रहे।
  So that a balance of authority remains between the center and the states.

[07:59] इसके लिए तीन लिस्ट्स बनाई गई।
  For this, three lists were created.

[08:03] यूनियन लिस्ट यानी संघ सूची जिस पर सिर्फ सेंट्रल गवर्नमेंट लॉज़ बना सकती है।
  Union List, meaning Sangh Suchi, on which only the Central Government can make laws.

[08:06] दूसरी
  Second,

[08:09] है स्टेट लिस्ट यानी राज्य सूची जिसमें केवल स्टेट सरकारों को ही लॉज़ बनाने का राइट है।
  There is the State List, meaning the state list, in which only state governments have the right to make laws.

[08:14] और तीसरी है कॉनकरेंट लिस्ट यानी समावर्ती सूची जिस पर दोनों सेंटर और स्टेट्स लॉज़ बना सकते हैं।
  And the third is the Concurrent List, meaning the concurrent list, on which both the Center and the states can make laws.

[08:21] यह सिस्टम इसीलिए डिजाइन किया गया था ताकि पावर्स और अथॉरिटी का क्लियर डिवीजन हो और कॉन्फ्लिक्ट्स के कम से कम चांसेस रहें।
  This system was designed so that there would be a clear division of powers and authority and minimal chances of conflicts.

[08:30] तो चलिए यहां तक हमने हमारे कॉन्स्टिट्यूशन के कुछ यूनिक पॉइंट्स के बारे में जान लिया।
  So, let's, up to this point, we have learned about some unique points of our Constitution.

[08:34] अब हमारे संविधान के कुछ मेन फीचर्स के बारे में जानते हैं।
  Now let's learn about some main features of our Constitution.

[08:39] सोर्सेज कहते हैं कि भारतीय संविधान दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान है और इसमें कुछ बहुत ही खास बातें समाई हुई है।
  Sources say that the Indian Constitution is the longest written constitution in the world and it contains some very special things.

[08:48] पार्लियामेंट्री सिस्टम जैसे ब्रिटेन में होता है।
  Parliamentary system, like in Britain.

[08:51] यहां भी सरकार डायरेक्टली जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के प्रति जिम्मेदार है।
  Here too, the government is directly responsible to the representatives elected by the people.

[08:56] यानी सरकार का असली अकाउंटेबिलिटी सिस्टम लोगों के हाथ में है।
  Meaning, the real accountability system of the government is in the hands of the people.

[09:01] फेडरल स्ट्रक्चर विद स्ट्रांग सेंटर।
  Federal structure with a strong center.

[09:04] संविधान फेडरल है।
  The Constitution is federal.

[09:07] मतलब सेंटर और राज्यों के पावर्स क्लियरली डिवाइड किए गए हैं।
  Meaning, the powers of the Center and the states are clearly divided.

[09:10] लेकिन सेंटर को थोड़ा ज्यादा पावर दी गई है।
  But the center has been given a little more power.

[09:12] ताकि देश की एकता और स्टेबिलिटी बनी रहे।
  So that the unity and stability of the country remain.

[09:15] तीसरी खास बात यह है कि भारतीय संविधान में रिजिडिटी और फ्लेक्सिबिलिटी का एक परफेक्ट बैलेंस है।
  The third special thing is that there is a perfect balance of rigidity and flexibility in the Indian Constitution.

[09:18] यही बैलेंस संविधान को डायनामिक भी बनाता है और स्टेबल भी ताकि जरूरत के हिसाब से इवॉल्व हो सके।
  This balance makes the constitution dynamic as well as stable so that it can evolve according to need.

[09:21] लेकिन देश की बेसिक फ्रेमवर्क सेफ रहे।
  But the basic framework of the country remains safe.

[09:23] एक और खास बात यह है कि हमारे संविधान के फीचर्स में एक परफेक्ट बैलेंस और स्ट्रेंथ देखा जा सकता है।
  Another special thing is that a perfect balance and strength can be seen in the features of our constitution.

[09:26] जैसे कि कॉन्स्टिट्यूशन में जुडिशरी को एक इंडिपेंडेंट स्टेटस दिया गया है।
  For example, the judiciary has been given an independent status in the constitution.

[09:29] यह इंडिपेंडेंस एनश्योर करती है कि कानून के हिसाब से इंपार्शियल डिसीजंस लिए जा सके।
  This independence ensures that impartial decisions can be taken according to the law.

[09:31] इसके अलावा हर एक सिटीजन को फंडामेंटल राइट्स भी दिए गए हैं जो हर एक सिटीजन को किसी भी भेदभाव के बिना समानता से जीने का अधिकार देता है।
  Besides this, fundamental rights have also been given to every citizen, which gives every citizen the right to live with equality without any discrimination.

[09:34] हमारे संविधान ने कुछ फंडामेंटल राइट्स उनके लिए भी दिए हैं जो भारत के सिटीजंस नहीं है।
  Our constitution has also given some fundamental rights to those who are not citizens of India.

[09:36] गवर्नमेंट को गाइड करने और पब्लिक वेलफेयर और सोशल जस्टिस को इंप्लीमेंट करने के लिए संविधान में डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ऑफ स्टेट
  To guide the government and to implement public welfare and social justice, the constitution has Directive Principles of State

[10:11] पॉलिसी के प्रोविजंस हैं।
  There are provisions of the policy.

[10:13] हमारे देश की यूनिटी बनाए रखने के लिए संविधान में वन सिटीजनशिप का प्रोविजन है।
  To maintain the unity of our country, the constitution has a provision for one citizenship.

[10:16] चाहे आप किसी भी स्टेट के निवासी हो।
  No matter which state you are a resident of.

[10:18] आपकी एक ही सिटीजनशिप है इंडियन।
  You have only one citizenship, Indian.

[10:21] भारत एक मल्टी रिलीजियस देश है।
  India is a multi-religious country.

[10:24] लेकिन भारत का कोई स्टेट रिलीजन नहीं है।
  But India has no state religion.

[10:27] सभी रिलीजंस को इक्वल ट्रीटमेंट मिले।
  All religions receive equal treatment.

[10:30] इसके लिए हमारे संविधान में सेकुलरिज्म का भी प्रोविजन है।
  For this, our constitution also has a provision for secularism.

[10:32] इसके अलावा हमारे संविधान में इमरजेंसी प्रोविजंस भी हैं जो जरूरत पड़ने पर यूटिलाइज किए जाते हैं।
  Besides this, our constitution also has emergency provisions which are utilized when needed.

[10:34] लेकिन इसके मिसयूज को अवॉइड करने के लिए प्रॉपर चेकक्स एंड बैलेंस के मेजर्स भी दिए गए हैं।
  But to avoid its misuse, proper checks and balances measures have also been given.

[10:36] यह सारे फीचर्स मिलकर भारतीय संविधान को एक यूनिक और खास पहचान देते हैं।
  All these features together give the Indian constitution a unique and special identity.

[10:38] जिसकी शुरुआत होती है प्रियमबल से।
  Which begins with the Preamble.

[10:41] जो असल में हमारे संविधान का एसेंस है।
  Which is actually the essence of our constitution.

[10:43] प्रियमबल ने भारत को कुछ इस तरह से डिफाइन किया है।
  The Preamble has defined India in a certain way.

[10:46] प्रएमबल के अकॉर्डिंग भारत एक सोवरन कंट्री है और किसी दूसरे अथॉरिटी के कंट्रोल में नहीं है।
  According to the Preamble, India is a sovereign country and not under the control of any other authority.

[10:49] सोशलिस्ट कंट्री है जो सोसाइटी में इक्वलिटी और जस्टिस को प्रमोट करती है।
  It is a socialist country that promotes equality and justice in society.

[11:13] सेकुलर कंट्री है यानी स्टेट का कोई रिलीजन नहीं है और सभी रिलीजंस को इक्वल ट्रीट किया जाता है।
  It is a secular country, meaning the state has no religion, and all religions are treated equally.

[11:19] डेमोक्रेटिक है।
  It is democratic.

[11:22] यानी यहां की सरकार को जनता द्वारा चुना जाता है।
  Meaning, the government here is elected by the people.

[11:24] रिपब्लिक कंट्री है।
  It is a republic country.

[11:27] यानी कि भारत का हेड ऑफ स्टेट चुनाव के जरिए आता है और यहां कोई हेरिडिटी सिस्टम एक्सिस्ट नहीं करता।
  Meaning, the head of state of India comes through election, and no heredity system exists here.

[11:32] प्रियमबल के बारे में एक इंटरेस्टिंग फैक्ट है।
  There is an interesting fact about the Preamble.

[11:34] दरअसल आज जो हम प्रएमबल देखते हैं वो ओरिजिनल से डिफरेंट है।
  Actually, the Preamble we see today is different from the original.

[11:39] ओरिजिनल प्रएमबल में सोशलिस्ट और सेकुलर टर्म्स नहीं थे।
  The original Preamble did not have the terms socialist and secular.

[11:42] इन टर्म्स को 1976 के 42 अमेंडमेंट के द्वारा ऐड किया गया।
  These terms were added by the 42nd Amendment in 1976.

[11:49] इसके साथ ही इंटेग्रिटी का कांसेप्ट भी इंक्लूड किया गया था।
  Along with this, the concept of integrity was also included.

[11:51] 42 अमेंडमेंट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसके सिग्निफिकेंस को दो लैंडमार्क केसेस में हाईलाइट किया।
  After the 42nd Amendment, the Supreme Court highlighted its significance in two landmark cases.

[11:56] 1973 में हिस्टोरिक केशवानंद भारती केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रएमबल सिर्फ शुरुआत का हिस्सा नहीं बल्कि संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर का कोर है।
  In the historic Kesavananda Bharati case in 1973, the Supreme Court said that the Preamble is not just the introductory part but the core of the constitution's basic structure.

[12:08] मतलब इसमें लिखे आइडियल्स जस्टिस, लिबर्टी, इक्वलिटी,
  Meaning, the ideals written in it: justice, liberty, equality,

[12:15] फ्रेटरनिटी को बदला या मिटाया नहीं जा सकता।
  Fraternity cannot be changed or erased.

[12:18] फिर 1980 में मिनरवा मिल्स केस में सुप्रीम कोर्ट ने रीइंफोर्स किया कि प्रियमबल के प्रिंसिपल्स और फंडामेंटल स्ट्रक्चर को तोड़ना अलाउड नहीं है।
  Then in 1980, in the Minerva Mills case, the Supreme Court reinforced that the principles and fundamental structure of the Preamble are not allowed to be broken.

[12:30] यानी प्रएमबल के यह टर्म्स केवल वर्ड्स नहीं बल्कि इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन की आत्मा है जो हमें जस्टिस और इक्वलिटी के रास्ते पर चलने की दिशा दिखाते हैं।
  Meaning, these terms of the Preamble are not just words but the soul of the Indian Constitution, which show us the direction to walk on the path of justice and equality.

[12:40] हालांकि इससे पहले 1960 में बेरूबारी केस में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा था कि प्रियमबल कॉन्स्टिट्यूशन का ऑफिशियल पार्ट नहीं है।
  However, before this, in the Berubari case in 1960, the Supreme Court had said that the Preamble is not an official part of the Constitution.

[12:47] लेकिन फिर 1973 के केशवानंद भारती केस में कोर्ट ने अपने फैसले को बदल दिया।
  But then in the Kesavananda Bharati case of 1973, the court changed its decision.

[12:54] जो आगे मिनरवा मिल्स केस में भी जारी रहा।
  Which continued further in the Minerva Mills case.

[12:57] फिर 1995 के एलआईसी केस में भी सुप्रीम कोर्ट ने कंफर्म किया कि प्रएमबल कॉन्स्टिट्यूशन का इंटीग्रल पार्ट है।
  Then in the LIC case of 1995, the Supreme Court also confirmed that the Preamble is an integral part of the Constitution.

[13:03] जिससे इसकीेंस और भी ज्यादा इंक्रीस हो गई।
  Due to which its importance increased even more.

[13:07] प्रियमबल कीेंस को तो हमने समझ लिया।
  We have understood the importance of the Preamble.

[13:09] अब बात करते हैं कॉन्स्टिट्यूशन के सोर्सेस की।
  Now let's talk about the sources of the Constitution.

[13:11] हमारे कॉन्स्टिट्यूशन के फ्रेमर्स ने हमारी
  The framers of our Constitution have our

[13:15] कॉन्स्टिट्यूशन को बनाने में दूसरे कंट्रीज के कॉन्स्टिट्यूशन से इंस्पिरेशन ली।
  In making the constitution, inspiration was taken from the constitutions of other countries.

[13:22] जैसे यूएसए, यूके, आयरलैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जापान और साउथ अफ्रीका।
  Like USA, UK, Ireland, Canada, Australia, Japan and South Africa.

[13:26] यह दिखाता है कि हमारे फ्रेमर्स कितने ओपन माइंडेड थे और कैसे उन्होंने दूसरे कंट्रीज के बेस्ट एलिमेंट्स को लेकर एक यूनिक इंडियन कॉन्टेक्स्ट के लिए सूटेबल कॉन्स्टिट्यूशन तैयार किया।
  This shows how open-minded our framers were and how they took the best elements from other countries to prepare a suitable constitution for the unique Indian context.

[13:41] हमारे कॉन्स्टिट्यूशन का सबसे बड़ा सोर्स था गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 जहां से हमारे कॉन्स्टिट्यूशन में एडमिनिस्ट्रेटिव और स्ट्रक्चरल फ्रेमवर्क्स अडॉप्ट किए गए।
  The biggest source of our constitution was the Government of India Act 1935, from where administrative and structural frameworks were adopted into our constitution.

[13:50] इसके अलावा ब्रिटेन से पार्लियामेंट्री सिस्टम लिया गया जहां गवर्नमेंट डायरेक्टली लेजिस्लेचर के प्रति रिस्पांसिबल होती है।
  Besides this, the parliamentary system was taken from Britain, where the government is directly responsible to the legislature.

[13:57] यूएसए से लिए गए फंडामेंटल राइट्स और जुडिशियल रिव्यू जो सिटीजंस के राइट्स और जुडिशरी के इंडिपेंडेंस को प्रोटेक्ट करते हैं।
  Fundamental rights and judicial review taken from the USA, which protect the rights of citizens and the independence of the judiciary.

[14:05] डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ऑफ स्टेट पॉलिसी आयरिश कॉन्स्टिट्यूशन से लिया गया जो गवर्नमेंट को स्टेट के वेलफेयर और सोशल जस्टिस के लिए गाइड करता है।
  The Directive Principles of State Policy were taken from the Irish constitution, which guides the government for the welfare of the state and social justice.

[14:15] इसी तरह कनाडा से फेडरल स्ट्रक्चर और
  Similarly, from Canada, the federal structure and

[14:18] स्ट्रांग सेंटर के कांसेप्ट्स को अडॉप किया गया।
  The concepts of a strong center were adopted.

[14:20] जिससे स्टेट्स और सेंटर के बीच पावर्स का एक बैलेंस बना रहे।
  So that a balance of powers remains between the states and the center.

[14:25] वहीं ऑस्ट्रेलिया से कॉनकरेंट लिस्ट, जर्मनी से इमरजेंसी में फंडामेंटल राइट्स का सस्पेंशन, फ्रांस से आइडियल्स ऑफ लिबर्टी, इक्वलिटी, फ्रेटरनिटी, सोवियत यूनियन से फंडामेंटल ड्यूटीज के आइडियल्स और साउथ अफ्रीका से अमेंडमेंट प्रोसेस का कांसेप्ट लिया गया।
  From Australia, the Concurrent List; from Germany, the suspension of fundamental rights during emergency; from France, the ideals of liberty, equality, fraternity; from the Soviet Union, the ideals of fundamental duties; and from South Africa, the concept of the amendment process were taken.

[14:41] कुल मिलाकर बात यह है कि हमारा कॉन्स्टिट्यूशन एक केयरफुली कुछ इस तरीके से बनाया गया है जिसमें दुनिया के बेस्ट एलिमेंट्स को इंडियन कॉन्टेक्स्ट के हिसाब से अडॉप किया गया।
  Overall, the point is that our constitution has been carefully made in such a way that the best elements from around the world have been adopted according to the Indian context.

[14:55] यह सब दिखाता है कि कॉन्स्टिट्यूशन फ्रेमर्स का विज़ बहुत ही ब्रॉड और इंक्लूसिव था।
  All this shows that the vision of the constitution framers was very broad and inclusive.

[15:00] कॉन्स्टिट्यूशन बनाने के लिए उन्होंने दुनिया के बेस्ट प्रिंसिपल्स को समझा और उन्हें हमारे देश के डिमांड्स को देखते हुए इंप्लीमेंट किया।
  To make the constitution, they understood the world's best principles and implemented them keeping in mind the demands of our country.

[15:07] चलिए यहां तक तो हमने इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन इसके ओरिजिन, प्रोसेससेस एटसेटरा को समझ लिया।
  Okay, so far we have understood the origin, processes, etcetera of the Indian Constitution.

[15:13] आइए अब कॉन्स्टिट्यूशन के प्रोविज़ंस को डिटेल में डिस्कस करते हैं।
  Let's now discuss the provisions of the constitution in detail.

[15:17] प्रोविज़ंस ऑफ
  Provisions of

[15:19] कॉन्स्टिट्यूशन।
  Constitution.

[15:22] सबसे पहले बात करते हैं पार्ट वन के बारे में जिसमें टोटल चार आर्टिकल्स आर्टिकल वन, टू, थ्री एंड फोर शामिल हैं।
  First, let's talk about Part One, which includes a total of four articles: Article One, Two, Three, and Four.

[15:30] कॉन्स्टिट्यूशन का आर्टिकल वन क्लियरली कहता है इंडिया दैट इज भारत शैल बी अ यूनियन ऑफ स्टेट्स।
  Article One of the Constitution clearly states, 'India, that is Bharat, shall be a Union of States.'

[15:36] अब आपके दिमाग में यह क्वेश्चन आया होगा कि भारत को यूनियन ऑफ स्टेट्स ही क्यों कहा गया है?
  Now, a question might have arisen in your mind: why is India called a Union of States?

[15:40] इसे फेडरेशन या महासंघ क्यों नहीं कहा गया?
  Why is it not called a Federation or Mahasangh?

[15:43] दरअसल इसके पीछे का कारण यह है कि भारत के स्टेट्स किसी एग्रीमेंट या ट्रीटी का नतीजा नहीं है बल्कि यह एक परमानेंट यूनियन है जिसमें स्टेट्स के अपने राइट्स हैं जो कॉन्स्टिट्यूशन द्वारा दिए गए हैं।
  The reason behind this is that the states of India are not the result of any agreement or treaty, but rather it is a permanent union in which the states have their own rights given by the Constitution.

[15:58] ऐसा करने के पीछे ऑब्जेक्टिव यह था कि देश की यूनिटी और इंटेग्रिटी सबसे पहले है।
  The objective behind doing this was that the unity and integrity of the country come first.

[16:05] इसी वजह से स्टेट्स को यूनियन से अलग होने का कोई अधिकार नहीं दिया गया।
  For this reason, states have not been given any right to separate from the Union.

[16:11] यह हमारी भारत की इंटेग्रिटी और स्ट्रांग यूनियन को दर्शाता है।
  This reflects the integrity and strong union of our India.

[16:13] वहीं आर्टिकल टू के अकॉर्डिंग अगर किसी एक्सटर्नल टेरिटरी को भारत में
  According to Article Two, if any external territory is to be included in India

[16:19] मर्ज करना हो तो उसे इंक्लूड किया जा सकता है।
  If it is to be merged, it can be included.

[16:22] यानी हम नए टेरिटरी एक्वायर कर सकते हैं।
  Meaning, we can acquire new territories.

[16:25] इसी तरह आर्टिकल थ्री पार्लियामेंट को यह ऑथॉरिटी देता है कि वह एग्जिस्टिंग स्टेट्स की बाउंड्रीज को बदल सके।
  Similarly, Article Three gives Parliament the authority to change the boundaries of existing states.

[16:28] बाउंड्री चेंज का मतलब है किसी स्टेट का एरिया को घटाकर या बढ़ाकर चेंज करना या फिर दो स्टेट्स को मर्ज करना या फिर एक ही स्टेट को तोड़कर नया स्टेट क्रिएट करना।
  Changing boundaries means changing a state's area by reducing or increasing it, or merging two states, or breaking up a single state to create a new state.

[16:44] इसके अलावा पार्लियामेंट स्टेट्स का नाम भी बदल सकता है।
  Besides this, Parliament can also change the names of states.

[16:47] जैसे 2000 में बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड तीन नए स्टेट्स बनाए गए।
  For example, in 2000, Jharkhand, Chhattisgarh, and Uttarakhand were created as three new states from Bihar, Madhya Pradesh, and Uttar Pradesh.

[16:56] लेकिन यहां गौर करने वाली बात यह है कि इस प्रोसेस में स्टेट्स की भी सहमति ली जाती है।
  But the point to note here is that the consent of the states is also taken in this process.

[16:59] अकॉर्डिंग टू द कॉन्स्टिट्यूशन जब पार्लियामेंट किसी स्टेट की बाउंड्री चेंज करने या न्यू स्टेट क्रिएट करने का बिल पार्लियामेंट में लाती है तो सबसे पहले उसे अफेक्टेड स्टेट के लेजिस्लेचर के पास भेजा जाता है।
  According to the Constitution, when Parliament brings a bill to change the boundary of a state or create a new state in Parliament, it is first sent to the legislature of the affected state.

[17:13] ताकि वह इस पर अपनी ओपिनियन दे सके।
  So that it can give its opinion on it.

[17:15] लेकिन पार्लियामेंट उन स्टेट्स के
  But Parliament of those states

[17:21] ओपिनियन को एक्सेप्ट करने के लिए लीगली ऑब्लिगेटेड नहीं होता।
  It is not legally obligated to accept the opinion.

[17:26] और तो और स्टेट लेजिस्लेचर को भी अपना ओपिनियन एक टाइम बाउंड मैनर में देना होता है।
  Moreover, the state legislature also has to give its opinion in a time-bound manner.

[17:32] अब बात करते हैं आर्टिकल फोर के बारे में जो क्लियरली कहता है कि आर्टिकल दो या तीन के तहत जो भी चेंजेस होंगे उन्हें कॉन्स्टिट्यूशनल अमेंडमेंट नहीं माना जाएगा।
  Now let's talk about Article Four, which clearly states that any changes made under Article Two or Three will not be considered a constitutional amendment.

[17:43] कहने का मतलब इसके लिए सिंपल मेजॉरिटी ही काफी है और कॉन्स्टिट्यूशनल अमेंडमेंट वाली स्पेशल प्रोसीजर की जरूरत नहीं है।
  This means that a simple majority is sufficient for this, and the special procedure for constitutional amendment is not required.

[17:51] खैर यहां तक हमने पार्ट वन यानी कि द यूनियन एंड इट्स टेरिटरीज को बड़े ही डिटेल्स में देख लिया।
  Well, up to here we have seen Part One, i.e., The Union and Its Territories, in great detail.

[17:58] अब बढ़ते हैं नेक्स्ट पार्ट की ओर।
  Now let's move on to the next part.

[17:58] कॉन्स्टिट्यूशन का पार्ट टू है सिटीजनशिप जो भारत के सिटीजनशिप को क्लियरली डिफाइन करता है।
  Part Two of the Constitution is Citizenship, which clearly defines the citizenship of India.

[18:06] सिटीजनशिप का चैप्टर आर्टिकल फाइव से स्टार्ट होता है जो बताता है कि 26 जनवरी 1950 को किसे भारत का सिटीजन माना गया।
  The chapter on citizenship starts with Article Five, which states who was considered a citizen of India on January 26, 1950.

[18:15] इसके अकॉर्डिंग वही पर्सन इंडिया का सिटीजन होगा जो उस वक्त इंडिया में रह रहा था और इनमें से किसी भी एक कंडीशन को फुलफिल करता था।
  According to this, the person who was living in India at that time and fulfilled any one of these conditions would be a citizen of India.

[18:20] पहली या तो वह
  First, either he

[18:24] भारत में पैदा हुआ हो।
  Born in India.

[18:28] दूसरी या उसके पेरेंट्स में से किसी एक का जन्म भारत में हुआ हो।
  Or one of his parents was born in India.

[18:33] तीसरी या फिर कॉन्स्टिट्यूशन के लागू होने के कम से कम 5 साल पहले तक कंटीन्यूअसली भारत में रह रहा हो।
  Third, or has been continuously living in India for at least 5 years before the Constitution came into effect.

[18:39] यह तो बात हुई 26 जनवरी 1950 तक भारत में रहने वाले लोगों के सिटीजनशिप की।
  This was about the citizenship of people living in India until January 26, 1950.

[18:45] अब बात करते हैं आर्टिकल सिक्स की जो पार्टीशन के बाद पाकिस्तान से भारत आए लोगों के सिटीजनशिप को डिफाइन करता है।
  Now let's talk about Article Six, which defines the citizenship of people who came to India from Pakistan after the partition.

[18:54] इस कॉन्टेक्स्ट में 19 जुलाई 1948 की डेट बहुत क्रूशियल है।
  In this context, the date July 19, 1948, is very crucial.

[18:58] क्योंकि इसी दिन भारत और पाकिस्तान के बीच परमिट सिस्टम लागू किया गया था।
  Because on this day, the permit system was implemented between India and Pakistan.

[19:03] और आर्टिकल सिक्स के अकॉर्डिंग जो लोग इस डेट के पहले से इंडिया में सेटल हो गए उन्हें भारत की सिटीजनशिप दे दी गई।
  And according to Article Six, those who had settled in India before this date were given Indian citizenship.

[19:08] लेकिन 19 जुलाई 1948 के बाद भारत आने वाले लोगों के लिए सिटीजनशिप का प्रोसेस अलग था।
  But for people coming to India after July 19, 1948, the citizenship process was different.

[19:18] उन्हें अपनी रजिस्ट्रेशन करवानी पड़ती थी और कंडीशन यह थी कि एप्लीकेशन सबमिट करने से पहले कम से कम सिक्स मंथ्स इंडिया में
  They had to get their registration done, and the condition was that they had to be in India for at least six months before submitting the application.

[19:26] रेजिडेंट रह चुके हो।
  You have been a resident.

[19:28] इसके बाद आता है आर्टिकल सेवन जिसके अनुसार जो लोग 1 मार्च 1947 के बाद इंडिया से पाकिस्तान चले गए और उन्हें इंडियन सिटीजन नहीं माना जाएगा।
  After this comes Article Seven, according to which those who went from India to Pakistan after March 1, 1947, will not be considered Indian citizens.

[19:39] अब अगर कोई बाद में इंडिया वापस आता है और रीपट्रिएशन परमिट ले लेता है तो आर्टिकल सिक्स के अकॉर्डिंग सिटीजनशिप के लिए रजिस्टर करने के लिए एलिजिबल होगा।
  Now, if someone returns to India later and obtains a repatriation permit, they will be eligible to register for citizenship according to Article Six.

[19:49] अब बात करते हैं उन लोगों की जो इंडियन ओरिजिन के थे लेकिन उस वक्त फॉरेन कंट्री में रह रहे थे।
  Now let's talk about those people who were of Indian origin but were living in a foreign country at that time.

[19:55] उनके सिटीजनशिप को आर्टिकल एट में डिफाइन किया गया है।
  Their citizenship is defined in Article Eight.

[19:57] इस आर्टिकल के अकॉर्डिंग अगर कोई पर्सन खुद या उसके पेरेंट्स या ग्रैंड पेरेंट्स में से कोई अनडिवाइडेड इंडिया में पैदा हुआ था और वो अब्रॉड शिफ्ट हो गए थे तो वो अपने इंडियन डिप्लोमेटिक मिशन के पास अपना नाम रजिस्टर करवा के इंडियन सिटीजनशिप ले सकते थे।
  According to this article, if a person themselves, or their parents, or grandparents were born in undivided India and had shifted abroad, they could obtain Indian citizenship by registering their name with their Indian diplomatic mission.

[20:17] नेक्स्ट है आर्टिकल नाइन जो वन सिटीजनशिप के प्रिंसिपल को डिफाइन करता है।
  Next is Article Nine, which defines the principle of one citizenship.

[20:20] मतलब भारत में सिर्फ एक ही नेशनल सिटीजनशिप है।
  Meaning, there is only one national citizenship in India.

[20:22] चाहे वह पर्सन वर्ल्ड में कहीं भी रहे।
  No matter where that person lives in the world.

[20:28] लेकिन इसके अलावा आर्टिकल नाइन यह भी कहता

[20:31] है कि अगर कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से किसी

[20:34] और कंट्री की सिटीजनशिप एक्सेप्ट करता है

[20:36] तो उसकी इंडियन सिटीजनशिप ऑटोमेटिकली खत्म

[20:39] हो जाती है। यानी भारत ड्यूल सिटीजनशिप को

[20:42] रिकॉग्नाइज नहीं करता।

[20:44] अब बात करते हैं आर्टिकल 10 की। इसके

[20:47] मुताबिक जो पर्सन पहले के आर्टिकल्स के

[20:49] बेसिस पर भारत का सिटीजन बना वो आगे भी

[20:53] भारतीय नागरिक यानी इंडियन सिटीजन बना

[20:55] रहेगा। लेकिन यह पार्लियामेंट के फ्यूचर

[20:58] लॉस के अंडर होगा। मतलब अगर कभी जरूरत

[21:01] पड़े तो पार्लियामेंट के पास यह

[21:03] फ्लेक्सिबिलिटी है कि वो सिटीजनशिप के

[21:05] रूल्स को मॉडिफाई कर सके।

[21:07] आर्टिकल 11 पार्लियामेंट को सिटीजनशिप

[21:10] देने, खत्म करने और सिटीजनशिप से जुड़े

[21:13] लॉस बनाने का फुल पावर देता है। पार्ट टू

[21:16] के बाद अब हम इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन के

[21:18] पार्ट थ्री को देखेंगे जो है फंडामेंटल

[21:21] राइट्स जिसे आर्टिकल 12 से 35 तक डिफाइन

[21:24] किया गया है। फंडामेंटल राइट्स हमारे देश

[21:26] की डेमोक्रेसी के लिए बहुत ही क्रूशियल है

[21:28] क्योंकि ये हर सिटीजन के लिए बेसिक

[21:30] प्रोटेक्शन और फ्रीडम एनश्योर करते हैं।

[21:32] इनमें से कुछ राइट्स तो सिटीजन के अलावा

[21:35] देश के नॉन सिटीजंस के लिए भी है और इसमें

[21:38] सबसे खास है आर्टिकल 32 जो फंडामेंटल

[21:41] राइट्स के वायलेशन होने पर हमें

[21:43] डायरेक्टली सुप्रीम कोर्ट में अपील करने

[21:45] का अधिकार देता है। खैर आइए इन्हें डिटेल

[21:48] में समझने की कोशिश करते हैं। सबसे पहले

[21:50] है आर्टिकल 12 जो स्टेट का मतलब डिफाइन

[21:52] करता है। इस आर्टिकल के अनुसार सेंट्रल

[21:55] गवर्नमेंट, पार्लियामेंट, स्टेट

[21:57] गवर्नमेंट्स, स्टेट लेजिस्लेचर्स, लोकल

[21:59] अथॉरिटीज जैसे म्युनिसिपालिटीज और पंचायत

[22:02] स्टेट के डेफिनेशन में इंक्लूडेड हैं।

[22:04] इसके बाद है आर्टिकल 13 जो कहता है कि कोई

[22:08] भी लॉ चाहे वो कॉन्स्टिट्यूशन से पहले का

[22:11] हो या बाद में बना हो, अगर फंडामेंटल

[22:13] राइट्स के खिलाफ हो या उनका वायलेशन करता

[22:16] हो, तो वह वॉइड माना जाएगा। अब चलिए

[22:20] फंडामेंटल राइट्स की मेन कैटेगरीज पर नजर

[22:22] डालते हैं। पहली कैटेगरी है राइट टू

[22:25] इक्वलिटी जिसे आर्टिकल 14 से 18 कवर करते

[22:28] हैं। आर्टिकल 14 के अकॉर्डिंग हमारे देश

[22:32] में हर कोई लॉ के सामने बराबर है। हर

[22:35] सिटीजन को बिना किसी डिस्क्रिमिनेशन के

[22:38] कानून का इक्वल प्रोटेक्शन मिलेगा।

[22:40] आर्टिकल 15 कहता है कि स्टेट किसी भी

[22:43] सिटीजन के साथ रिलीजन, कास्ट, सेक्स,

[22:46] प्लेस ऑफ बर्थ के बेसिस पर डिस्क्रिमिनेशन

[22:48] नहीं करेगा। लेकिन इसमें कुछ एक्सेप्शनंस

[22:51] भी दिए गए हैं। जैसे स्टेट वुमेन और

[22:55] बच्चों के लिए स्पेशल प्रोविजंस बना सकता

[22:57] है। एससी, एसटी और सोशली इकोनॉमिकली

[23:00] बैकवर्ड क्लासेस के लिए रिजर्वेशन के

[23:03] प्रोविजंस भी लिए जा सकते हैं। यह इसलिए

[23:05] दिए गए हैं ताकि स्टेट सोशल जस्टिस के लिए

[23:08] पॉजिटिव डिस्क्रिमिनेशन और अफरमेटिव एक्शन

[23:11] ले सके। चलिए अब आर्टिकल 16 पर नजर डालते

[23:14] हैं जो गवर्नमेंट जॉब्स और एंप्लॉयमेंट के

[23:17] फेयरनेस को डिफाइन करता है। यह आर्टिकल यह

[23:20] एनश्योर करता है कि सभी सिटीजंस को पब्लिक

[23:22] जॉब ओपोरर्चुनिटीज में बराबर का चांस

[23:25] मिले। साथ ही इसमें एससी, एसटी, ओबीसी और

[23:29] अदर अंडर रिप्रेजेंटेड ग्रुप्स के

[23:31] अपलिफ्टमेंट के लिए रिजर्वेशन का सिस्टम

[23:33] भी है। आर्टिकल 16 गवर्नमेंट एंप्लॉयमेंट

[23:36] में इक्वलिटी और इंक्लूसिविटी मेंटेन करता

[23:39] है ताकि मेरिट के साथ-साथ सोशल जस्टिस भी

[23:41] एनश्योर हो सके। अब बात करते हैं आर्टिकल

[23:44] 17 की जो भारत के सोशल हिस्ट्री में एक

[23:47] टर्निंग पॉइंट था। इस आर्टिकल ने

[23:49] अनटचेबिलिटी को बैन कर दिया। यह सिर्फ एक

[23:51] लीगल क्लॉज़ नहीं था बल्कि सोशल रेवोल्यूशन

[23:54] की शुरुआत थी। जहां इक्वलिटी और ह्यूमन

[23:57] डिग्निटी को पहली बार कॉन्स्टिट्यूशन के

[23:59] लेवल पर प्रोटेक्ट किया गया। अब बात करते

[24:02] हैं राइट टू फ्रीडम के बारे में जिसे

[24:04] आर्टिकल 19 से 22 के अंडर डिफाइन किया गया

[24:07] है। इनमें से आर्टिकल 19 सबसे ज्यादा

[24:10] स्पेशल है क्योंकि यह आर्टिकल हर सिटीजन

[24:12] को छह फंडामेंटल फ्रीडम्स देता है और यही

[24:16] डेमोक्रेसी का रियल एसेंस बनाते हैं। यह

[24:19] छह फंडामेंटल फ्रीडम्स हैं। फ्रीडम ऑफ

[24:22] स्पीच एंड एक्सप्रेशन, फ्रीडम टू असेंबल

[24:25] पीसफुली, फ्रीडम टू फॉर्म एसोसिएशंस और

[24:28] यूनियंस, फ्रीडम ऑफ मूवमेंट, फ्रीडम टू

[24:31] रिसाइड एनीवेयर, फ्रीडम टू प्रैक्टिस एनी

[24:33] प्रोफेशन और ट्रेड। ये फ्रीडम्स सिटीजंस

[24:36] के इंडिविजुअल और कलेक्टिव राइट्स दोनों

[24:39] को प्रोटेक्ट करते हैं। लेकिन यहां गौर

[24:41] करने वाली बात यह है कि ये फ्रीडम्स

[24:43] एब्सोल्यूट नहीं है और इनके ऊपर स्टेट

[24:46] रीज़नेबल रेस्ट्रिकशंस लगा सकता है। अगर

[24:49] बात पब्लिक ऑर्डर, मोरालिटी, सिक्योरिटी

[24:52] या दूसरों के राइट से जुड़ी हो। अब बात

[24:54] करते हैं आर्टिकल 20 की जो क्रिमिनल केसेस

[24:57] में सिटीजंस को स्ट्रांग प्रोटेक्शंस देता

[24:59] है। यह आर्टिकल एनश्योर करता है कि किसी

[25:02] भी सिचुएशन में जस्टिस सिस्टम फेयर रहे।

[25:06] इसके अंडर सबसे पहला कांसेप्ट है एक्स

[25:09] पोस्ट फैक्टो लॉ। इसका मतलब यह है कि अगर

[25:12] कोई एक्ट उस टाइम क्रिमिनल एक्ट नहीं था।

[25:15] तो फ्यूचर में लॉ बनने के बाद भी पास्ट

[25:18] में किए हुए उन एक्ट्स के लिए पनिशमेंट

[25:20] नहीं दी जा सकती। इसका सीधा सा मतलब है कि

[25:23] लॉ कभी भी रेट्रोएक्टिवली अप्लाई नहीं

[25:26] होता। दूसरा इंपॉर्टेंट कांसेप्ट है डबल

[25:29] जपडी का। यानी किसी भी पर्सन को एक ही

[25:32] ऑफेंस के लिए दो बार पनिश नहीं किया जा

[25:35] सकता। एक बार कोर्ट ने डिसीजन दे दिया तो

[25:37] उसी मैटर पर दोबारा ट्रायल नहीं हो सकता।

[25:40] और तीसरा कांसेप्ट है सेल्फ इंक्रिमिनेशन

[25:43] का। इसका मतलब यह है कि किसी पर्सन को

[25:46] अपने खिलाफ गवाही देने या कन्फेशन करने के

[25:49] लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इन तीनों

[25:52] पॉइंट्स का एसेंस यह है कि आर्टिकल 20 के

[25:54] थ्रू सिटीजंस के राइट्स और जस्टिस के बीच

[25:57] एक परफेक्ट बैलेंस बनाया जा सके। अब बात

[26:00] करते हैं आर्टिकल 21 की। इसकीेंस आप इसी

[26:03] बात से समझ सकते हैं कि इसे हमारे

[26:05] कॉन्स्टिट्यूशन का हार्ट बीट माना जाता है

[26:07] क्योंकि यह हर इंसान के जीने और आजादी का

[26:11] बेसिक फाउंडेशन है। इसका सीधा सा एसेंस यह

[26:14] है किसी भी व्यक्ति को उसकी लाइफ या

[26:16] पर्सनल लिबर्टी से डिप्र्राइव्ड नहीं किया

[26:19] जा सकता। जब तक वह लॉ के प्रॉपर प्रोसीजर

[26:22] के हिसाब से ना हो। लेकिन बात सिर्फ

[26:24] सर्वाइवल तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट

[26:26] ने अपने कई इंपॉर्टेंट जजमेंट्स के थ्रू

[26:29] इस आर्टिकल का मीनिंग को काफी एक्सपेंड कर

[26:31] दिया है। आर्टिकल 21 सिटीजंस और नॉन

[26:34] सिटीजंस दोनों को ही डिग्निटी से जीने का

[26:37] मौका देता है। इसके अंदर आते हैं राइट टू

[26:40] लिव विद डिग्निटी, राइट टू क्लीन

[26:42] एनवायरमेंट, राइट टू एजुकेशन, राइट टू

[26:45] स्पिरिट ट्रायल और सबसे लेटेस्ट राइट टू

[26:48] प्राइवेसी जिसे पुटस्वामी केस में

[26:50] रिकॉग्नाइज किया गया था। और सबसे लेटेस्ट

[26:53] राइट टू डिजिटल एक्सेस इसे सुप्रीम कोर्ट

[26:56] के अप्रैल 30th 2025 के जजमेंट में दिया

[26:59] गया। आज के जमाने में आर्टिकल 21 एक

[27:02] इवॉल्विंग कांसेप्ट है जो हर नए चैलेंज के

[27:05] साथ अपने स्कोप को बढ़ाता जा रहा है ताकि

[27:07] हर सिटीजन की डिग्निटी और फ्रीडम ट्रूली

[27:10] प्रोटेक्टेड रहे। आर्टिकल 21 के बाद बात

[27:12] करते हैं आर्टिकल 22 के बारे में। आर्टिकल

[27:15] 22 इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन का एक

[27:17] इंपॉर्टेंट सेफ गार्ड है जो अरेस्टेड या

[27:19] डिटेड लोगों के राइट्स को प्रोटेक्ट करता

[27:22] है। इसके हिसाब से किसी भी पर्सन को

[27:24] अरेस्ट करते वक्त उसको रीजन बताना जरूरी

[27:27] है। उसे लॉयर से कंसल्ट करने का पूरा

[27:30] अधिकार होता है। अरेस्ट के 24 घंटे के

[27:32] अंदर उसे मैजिस्ट्रेट के सामने पेश करना

[27:35] मैंडेटरी है ताकि पावर का मिसयूज ना हो।

[27:38] आर्टिकल 22 प्रिवेंटिव डिटेंशन को भी

[27:41] रेगुलेट करता है। जिसमें गवर्नमेंट कुछ

[27:43] स्पेसिफिक कंडीशंस पर ही किसी को बिना

[27:46] ट्रायल डिटेन कर सकती है। ओवरऑल यह

[27:49] आर्टिकल पर्सनल लिबर्टी और फेयर प्रोसीजर

[27:51] को सिक्योर करता है। नेक्स्ट है आर्टिकल

[27:53] 23 जो कि एक बहुत ही पावरफुल प्रोविजन है

[27:57] जो ह्यूमन डिग्निटी और फ्रीडम फ्रॉम

[27:59] एक्सप्लइटेशन को प्रोटेक्ट करता है। यह

[28:01] क्लियरली कहता है कि ह्यूमन ट्रैफिकिंग और

[28:04] फोर्स्ड और बॉन्डेड लेबर बिल्कुल इललीगल

[28:07] है। यह प्रोविजन डायरेक्टली सिटीजंस के

[28:09] बेसिक राइट्स और पर्सनल लिबर्टी को

[28:11] सेफगार्ड करता है। हां, कॉन्स्टिट्यूशन

[28:13] इसमें एक एक्सेप्शन अलाउ करता है और वो है

[28:16] कंपलसरी सर्विसेज फॉर पब्लिक पर्पस जैसे

[28:20] मिलिट्री या नेशनल सर्विस। लेकिन इसमें

[28:23] कास्ट, रिलीजन या सोशल बैकग्राउंड के

[28:25] बेसिस पर डिस्क्रिमिनेशन बिल्कुल अलाउड

[28:28] नहीं है। शॉर्ट में कहें तो आर्टिकल 23 एक

[28:30] स्ट्रांग शील्ड है जो एक्सप्लइटेशन के

[28:33] अगेंस्ट खड़ा होता है और एनश्योर करता है

[28:35] कि हर सिटीजन अपनी मेहनत और फ्रीडम के साथ

[28:38] जी सके। वहीं आर्टिकल 24 की बात करें तो

[28:41] यह बच्चों को स्पेशल प्रोटेक्शन देता है।

[28:44] यह कहता है कि 14 साल से कम उम्र के

[28:47] बच्चों को फैक्ट्री, माइ या किसी दूसरे

[28:50] हज़ार्डिस वर्क में काम पर नहीं लगाया जा

[28:53] सकता। यह आर्टिकल बच्चों को एक्सप्लइटेशन

[28:56] से बचाने का काम करता है। आगे बढ़ते हुए

[28:58] हम यह देखेंगे कि कॉन्स्टिट्यूशन में

[29:00] रिलीजियस फ्रीडम्स के रिगार्डिंग क्या

[29:02] राइट्स दिए गए हैं और यह कैसे हमारे

[29:05] रिलीजियस फ्रीडम्स को एनश्योर करता है।

[29:07] रिलीजियस फ्रीडम्स में आर्टिकल 25 एक

[29:10] फंडामेंटल प्रोविजन है जो हर पर्सन को

[29:13] फ्रीडम ऑफ कॉन्शियस और रिलीजियस

[29:15] प्रैक्टिससेस देता है। इसका मतलब यह है कि

[29:18] हर सिटीजन अपना रिलीजन चूज़ कर सकता है।

[29:22] उसे फॉलो कर सकता है और उसका प्रचार भी कर

[29:25] सकता है। यह प्रोविजन इंडिविजुअल लिबर्टी

[29:28] और पर्सनल बिलीफ को प्रोटेक्ट करता है।

[29:30] लेकिन यह फ्रीडम एब्सोल्यूट नहीं है।

[29:32] कॉन्स्टिट्यूशन ने इस पर कुछ रीज़नेबल

[29:35] रेस्ट्रिकशंस भी लगाए हैं। जैसे पब्लिक

[29:37] ऑर्डर, मोरालिटी और हेल्थ के अगेंस्ट धर्म

[29:40] के नाम पर कोई एक्टिविटी अलाउड नहीं है।

[29:44] मतलब रिलीजन के प्रैक्टिस में सोसाइटी और

[29:47] लॉ का रिस्पेक्ट जरूरी है। आप ऐसा कोई भी

[29:50] रिलीजियस काम नहीं कर सकते जो पब्लिक

[29:52] ऑर्डर, हेल्थ और मोरालिटी के अगेंस्ट हो

[29:55] और इन्हें थ्रेट करती हो। इसी तरह आर्टिकल

[29:58] 26 हर रिलीजियस डिनॉमिनेशन को एक स्पेशल

[30:01] फ्रीडम देता है। इस आर्टिकल के तहत लोगों

[30:05] को अपना-अपना रिलीजियस अफेयर्स को मैनेज

[30:08] करने का पूरा अधिकार दिया गया है।

[30:11] इसका मतलब यह है कि रिलीजियस ग्रुप्स अपनी

[30:14] इंस्टीटशंस एस्टैब्लिश और रन कर सकते हैं।

[30:17] अपनी प्रॉपर्टी होल्ड और मैनेज कर सकते

[30:20] हैं और अपनी रिलीजियस प्रैक्टिससेस के लिए

[30:22] इंडिपेंडेंट डिसीजंस ले सकते हैं। यह

[30:25] प्रोविज़न रिलीजन के कलेक्टिव राइट्स को

[30:27] प्रोटेक्ट करता है ताकि कम्युनिटीज़ अपनी

[30:30] स्पिरिचुअल और कल्चरल आइडेंटिटी खुद

[30:32] डिसाइड कर सकें। बिना किसी अननेसेसरी

[30:36] स्टेट इंटरफेरेंस के। इसके बाद है आर्टिकल

[30:39] 27। यह आर्टिकल एक इंपॉर्टेंट प्रिंसिपल

[30:42] एस्टैब्लिश करता है कि किसी भी पर्सन को

[30:45] किसी एक पर्टिकुलर रिलीजन को प्रमोट करने

[30:47] के लिए टैक्स देने पर बाध्य नहीं किया जा

[30:50] सकता। इसका मतलब यह है कि स्टेट कंप्लीटली

[30:54] सेुलर है और उसका अपना कोई रिलीजन नहीं

[30:57] है। सिटीजंस के रिलीजन को न्यूट्रल

[30:59] ट्रीटमेंट के साथ रिस्पेक्ट किया जाएगा और

[31:02] उनके टैक्स का यूज रिलीजियस प्रमोशंस के

[31:05] लिए नहीं किया जा सकता। आर्टिकल 28 कहता

[31:07] है कि स्टूडेंट्स को किसी एजुकेशनल

[31:10] इंस्टीट्यूशन में रिलीजियस इंस्ट्रक्शन या

[31:12] वरशिप में फोर्सफुली इनवॉल्व नहीं किया जा

[31:15] सकता। यानी हर स्टूडेंट के पास फुल फ्रीडम

[31:18] है यह डिसाइड करने का कि वो एजुकेशनल

[31:21] इंस्टीट्यूशन में हो रहे रिलीजियस

[31:23] फंक्शनंस में पार्टिसिपेट करें या ना

[31:25] करें। यह प्रोविजन इंडिविजुअल चॉइस और

[31:29] रिलीजियस फ्रीडम को रिस्पेक्ट करता है और

[31:32] एश्योर करता है कि एजुकेशन और फेथ के बीच

[31:35] क्लियर बाउंड्री रहे। उसके बाद आते हैं

[31:38] कल्चरल और एजुकेशनल राइट्स जो स्पेशली

[31:41] माइनॉरिटीज के लिए बहुत इंपॉर्टेंट हैं।

[31:43] इसमें सबसे पहला आर्टिकल है आर्टिकल 29

[31:47] जिसके अकॉर्डिंग भारत के किसी भी हिस्से

[31:50] में रहने वाले सिटीजंस का कोई भी ग्रुप

[31:53] जिनकी अपनी लैंग्वेज, स्क्रिप्ट या कल्चर

[31:55] हो उनको अपनी पहचान और कल्चरल हेरिटेज

[31:59] प्रिजर्व करने का पूरा अधिकार है। इसके

[32:02] बाद है आर्टिकल 30। यह आर्टिकल माइनॉरिटीज

[32:06] को चाहे वह रिलीजन बेस्ड हो या लैंग्वेज

[32:08] बेस्ड। अपने पसंद के एजुकेशनल इंस्टीटश

[32:11] एस्टैब्लिश और मैनेज करने का अधिकार देते

[32:14] हैं। यह राइट्स भारत के डायवर्सिटी और

[32:17] प्लूरलिज्म को बनाए रखने में क्रूशियल रोल

[32:19] प्ले करता है। इसके बाद था आर्टिकल 31 जो

[32:23] ओरिजिनली राइट टू प्रॉपर्टी को फंडामेंटल

[32:25] राइट बनाता था। लेकिन 44 अमेंडमेंट एक्ट

[32:28] के द्वारा इसे रिपील कर दिया गया और राइट

[32:30] टू प्रॉपर्टी को फंडामेंटल राइट से हटाकर

[32:33] आर्टिकल 300 ए में ऑर्डिनरी लीगल राइट बना

[32:36] दिया गया। चलिए अब बात करते हैं आर्टिकल

[32:39] 32 यानी राइट टू कॉन्स्टिट्यूशनल रेमेडीज

[32:42] के बारे में। जिसे डॉ अंबेडकर ने खुद

[32:45] हार्ट एंड सोल ऑफ द कॉन्स्टिट्यूशन कहा

[32:48] था। और हो भी क्यों ना यह आर्टिकल है ही

[32:51] इतना इंपॉर्टेंट। सोचिए अगर किसी सिटीजन

[32:54] के फंडामेंटल राइट्स लिखे तो जाएं पर

[32:56] उन्हें प्रोटेक्ट करने का कोई सिस्टम ही

[32:58] ना हो तो उनका मतलब क्या बचेगा? आर्टिकल

[33:01] 32 हर सिटीजन को यह पावरफुल टूल देता है

[33:03] कि अगर उसके राइट्स का वायलेशन हो तो वो

[33:06] सीधा सुप्रीम कोर्ट के पास जाकर जस्टिस

[33:09] मांग सके।

[33:11] आर्टिकल 32 के अंदर सुप्रीम कोर्ट के पास

[33:13] कुछ स्पेशल पावर्स होती हैं। इन्हें रिट्स

[33:16] कहा जाता है। जिनका पर्पस है सिटीजंस के

[33:19] फंडामेंटल राइट्स को प्रोटेक्ट और एनफोर्स

[33:22] करना। मान लीजिए किसी पर्सन को पुलिस

[33:26] इललीगल तरीके से अरेस्ट कर लेती है तो

[33:28] कोर्ट हेबिस कॉर्पस जारी करके उस पर्सन को

[33:32] तुरंत कोर्ट के सामने प्रेजेंट करने का

[33:34] आर्डर दे सकती है ताकि उसकी फ्रीडम वापस

[33:37] मिल सके।

[33:39] इसी तरह अगर कोई पब्लिक ऑफिसर अपनी ड्यूटी

[33:42] पूरी नहीं कर रहा तो कोर्ट मैंडेमस जारी

[33:45] करके उसे अपना काम करने के लिए मजबूर कर

[33:48] सकती है। वैसे ही अगर कोई लोअर कोर्ट अपनी

[33:51] लिमिट क्रॉस कर रही हो तो प्रोहिबिशन रिट

[33:54] से उसे रोक दिया जाता है। अगर कोई गलत

[33:57] डिसीजन ऑलरेडी दे चुका हो तो सरशोर एरा के

[34:00] थ्रू उस डिसीजन को क्वाश कर दिया जाता है।

[34:03] और फाइनली अगर किसी व्यक्ति ने किसी

[34:06] पब्लिक पोस्ट पर बिना प्रॉपर क्वालिफिकेशन

[34:09] के जगह ले रखी हो तो को वारंटो रिट के

[34:12] जरिए उससे पूछा जाता है तुम्हें इस पद पर

[34:15] रहने का हक किसने दिया? यह सब रिट्स मिलकर

[34:19] आर्टिकल 32 को एक शील्ड बना देते हैं जो

[34:22] हर सिटीजन के राइट्स की रक्षा करता है। अब

[34:25] बात करते हैं एक स्पेशल क्लास ऑफ

[34:27] आर्टिकल्स की जो आर्टिकल 33, 34, 35 हैं।

[34:31] यह कुछ स्पेशल पावर्स और एक्सेप्शनंस

[34:33] डिफाइन करते हैं। आर्टिकल 33 डिफेंस

[34:37] फोर्सेस और गवर्नमेंट एंप्लाइजस के लिए

[34:39] पार्लियामेंट को यह अधिकार देता है कि वो

[34:41] कुछ फंडामेंटल राइट्स को सस्पेंड या

[34:43] मॉडिफाई कर सके। इसी तरह आर्टिकल 34

[34:47] एक्सेप्शनल सिचुएशंस जैसे वॉर या पब्लिक

[34:50] इमरजेंसी में गवर्नमेंट को सिटीजंस के

[34:52] राइट्स रेस्ट्रिक्ट करने की एक्स्ट्रा

[34:54] पावर देता है। आर्टिकल 35 पार्लियामेंट को

[34:58] पावर देता है कि वो स्पेशल लॉस बनाए जो

[35:01] ऊपर मेंशंड राइट्स और प्रोविजंस के लिए

[35:04] स्पेसिफिक हो। यानी ये तीनों आर्टिकल्स

[35:06] सिक्योरिटी, डिफेंस और स्पेशल सिचुएशंस

[35:09] कॉन्स्टिट्यूशन के कोर आइडियल्स को

[35:11] प्रोटेक्ट करते हुए एक्सेप्शनंस डिफाइन

[35:13] करते हैं। पार्ट थ्री के बाद आइए आगे

[35:16] बढ़ते हुए हम समझते हैं पार्ट फोर्थ को

[35:18] जहां से शुरू होता है डायरेक्टिव

[35:20] प्रिंसिपल्स ऑफ स्टेट पॉलिसी या टीपीएसपी।

[35:24] यह आर्टिकल्स 36 से 51 तक कवर होते हैं और

[35:28] इनका रोल एक मोरल कंपस जैसा है जो स्टेट

[35:31] को बताता है कि देश का गवर्नेंस किस

[35:34] डायरेक्शन में चले। इनका मेन पर्पस है एक

[35:37] ऐसी सोसाइटी क्रिएट करना जहां सोशल

[35:39] जस्टिस, इकोनॉमिक इक्वलिटी और पब्लिक

[35:42] वेलफेयर सबके लिए हो। मतलब यह गवर्नमेंट

[35:45] को रिमाइंड करते हैं कि पॉलिसी बनाते वक्त

[35:48] सिर्फ ग्रोथ नहीं बल्कि सोशल जस्टिस और

[35:51] इक्वलिटी भी जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने

[35:53] कई जजमेंट्स में यह क्लियर किया है कि

[35:56] डीपीएसपीस कोर्ट में इनफोर्सिएबल नहीं

[35:58] होते। पर इनकाेंस कम नहीं है। यह लॉ

[36:02] मेकिंग और पॉलिसी डिसीजंस के लिए एक

[36:04] गाइडिंग लाइट की तरह काम करते हैं।

[36:07] सिंपल शब्दों में कहें तो पार्ट फोर एक

[36:10] विज़न स्टेटमेंट है जो बताता है कि भारत

[36:14] सिर्फ पॉलिटिकल डेमोक्रेसी तक लिमिटेड

[36:16] नहीं बल्कि इसका अल्टीमेट गोल है एक सोशल

[36:19] और इकोनॉमिक डेमोक्रेसी को भी एस्टैब्लिश

[36:22] करना। खैर आइए डीपीएसपी के आर्टिकल्स को

[36:25] डिटेल में समझते हैं। आर्टिकल 36 में यह

[36:29] क्लियरली डिफाइन किया गया है कि स्टेट का

[36:31] मतलब क्या है और यह वही डेफिनेशन है जो

[36:34] पार्ट थ्री के फंडामेंटल राइट्स में भी

[36:36] यूज़ होती है। इसमें सेंट्रल गवर्नमेंट,

[36:39] पार्लियामेंट, स्टेट गवर्नमेंट्स, स्टेट

[36:41] लेजिस्लेचर्स और सभी लोकल अथॉरिटीज शामिल

[36:44] हैं। इन प्रिंसिपल्स का पर्पस यह है कि यह

[36:47] पॉलिसी मेकिंग और गवर्नेंस का रोड मैप

[36:50] प्रोवाइड करें ताकि देश का सिस्टमेटिक

[36:53] डेवलपमेंट हो और वेलफेयर एनश्योर हो सके।

[36:57] आर्टिकल 37 में एक इंटरेस्टिंग पॉइंट है।

[37:00] यह क्लियरली कहता है कि डीपीएसपी

[37:02] डायरेक्टली कोर्ट में इनफोर्सबल नहीं है।

[37:04] यानी यह नॉन जस्टिसिएबल है। मतलब कोई

[37:06] सिटीजन कोर्ट में जाकर इन्हें एनफोर्स

[37:09] नहीं करा सकता। लेकिन साथ ही आर्टिकल 37

[37:12] यह भी क्लियरली कहता है कि यह प्रिंसिपल्स

[37:14] गवर्नेंस के लिए फंडामेंटल है। यह पॉलिसी

[37:17] मेकिंग और स्टेट प्लानिंग में गवर्नमेंट

[37:19] के लिए बेसिक गाइड का काम करते हैं और देश

[37:22] के एडमिनिस्ट्रेशन के लिए उनकाेंस

[37:25] एसेंशियल है। यानी डीपीएसपी एक मोरल और

[37:28] प्रैक्टिकल फ्रेमवर्क सेट करते हैं। जिसे

[37:30] गवर्नमेंट अपने लॉज़, स्कीम्स और पॉलिसीज

[37:33] में इंप्लीमेंट कर सकती है। ताकि सोशल

[37:36] जस्टिस और वेलफेयर का मकसद अचीव हो। जब

[37:39] गवर्नमेंट लॉज़ और पॉलिसीज बनाती है तो

[37:42] डीपीएसपी को ध्यान में रखना स्टेट का फर्ज

[37:44] है। मतलब लीगल तौर पर यह एनफोर्सिएबल नहीं

[37:47] है। लेकिन यह एक एडमिनिस्ट्रेटिव और मोरल

[37:51] रिस्पांसिबिलिटी है। डीपीएसपी में आगे

[37:54] बढ़ते हुए अब कुछ मेन प्रिंसिपल्स देखते

[37:56] हैं। आर्टिकल 38 यह कहता है कि स्टेट का

[38:00] कार्यक्रम वेलफेयर ओरिएंटेड होना चाहिए।

[38:03] और सोशल और इकोनॉमिक इनकलिटी को रिड्यूस

[38:06] करना भी स्टेट का एम होना चाहिए। आर्टिकल

[38:09] 38 के बाद बारी आती है आर्टिकल 39 की जो

[38:13] आर्टिकल 38 से ज्यादा डिटेल्ड है। इस

[38:17] आर्टिकल के तहत स्टेट के लिए कुछ

[38:19] इंपॉर्टेंट डायरेक्शंस बनाए गए हैं। जैसे

[38:22] सभी सिटीजंस के लिए सही लाइवलीहुड का

[38:24] राइट, मटेरियल रिसोर्सेज की ओनरशिप और

[38:27] कंट्रोल को ऐसे ऑर्गेनाइज किया जाए कि वह

[38:30] कॉमन गुड के काम आए। स्टेट कुछ लोगों के

[38:34] हाथों में वेल्थ कंसंट्रेशन को रोके। मेन

[38:36] और वुमेन दोनों को इक्वल पे फॉर इक्वल

[38:39] वर्क मिले। वर्कर्स की स्ट्रेंथ और हेल्थ

[38:42] की प्रोटेक्शन की जाएगी और स्टेट

[38:44] चाइल्डहुड और यूथ का एक्सप्लइटेशन को

[38:47] रोके। इसी आर्टिकल में 1976 में एक

[38:51] अमेंडमेंट किया गया जिसे 4

[38:53] कॉन्स्टिट्यूशनल अमेंडमेंट कहते हैं। इसके

[38:56] थ्रू आर्टिकल 39 में एक एडिशनल आर्टिकल 39

[39:00] ए ऐड किया गया जिसमें यह कहा गया कि स्टेट

[39:04] इक्वल जस्टिस के एक्सेस को प्रमोट करेगी

[39:07] और गरीबों को फ्री लीगल एड प्रोवाइड करेगी

[39:11] जिससे हर किसी को जस्टिस मिल पाएगा। यह एक

[39:15] बहुत ही जरूरी प्रोविजन है जो सोशल जस्टिस

[39:18] और इक्वलिटी के आइडियल्स को प्रैक्टिकल

[39:20] बनाता है। खैर आर्टिकल 39 के बाद अब हम

[39:24] बात करते हैं आर्टिकल 40 के बारे में जो

[39:27] गांधियन सोच को रिफ्लेक्ट करता है यानी

[39:30] ग्राम पंचायतों को मजबूती प्रोवाइड करता

[39:32] है और उन्हें सेल्फ गवर्नेंस की छोटी

[39:35] यूनिट्स के रूप में डेवलप करता है। इसके

[39:37] बाद आर्टिकल 41 का फोकस सोशल सिक्योरिटी

[39:40] पर है। जैसे अनइंप्लॉयमेंट, ओल्ड एज,

[39:44] डिजीज या किसी ऐसी अवस्था में जहां

[39:46] सिटीजंस को काम, एजुकेशन या पब्लिक

[39:49] असिस्टेंस की जरूरत हो। वहां स्टेट

[39:51] असिस्टेंस प्रोवाइड करेगी। आर्टिकल 42 में

[39:55] सूटेबल और ह्यूमन वर्किंग कंडीशंस में काम

[39:57] और मैटरनिटी रिलीफ के बारे में मेंशन किया

[40:00] गया है। ताकि वर्किंग वुमेन और फैमिलीज़ को

[40:03] सपोर्ट मिल सके। इसके बाद आर्टिकल 43

[40:07] वर्कर्स के लिए है जो यह कहता है कि

[40:09] वर्कर्स को मिनिमम वेजेस मिले जो एक

[40:12] रिस्पेक्टेबल लाइफ जीने लायक हो और उन्हें

[40:16] रिकक्रिएशन और लीव का भी अधिकार दिया जाए।

[40:19] इसके अलावा यह आर्टिकल कॉटेज इंडस्ट्रीज

[40:22] के प्रमोशन की भी बात करता है। इस आर्टिकल

[40:24] में भी 1976 में 42 कॉन्स्टिट्यूशन

[40:27] अमेंडमेंट एक्ट के थ्रू एक नया आर्टिकल 43

[40:30] ए जोड़ा गया जो इंडस्ट्रीज के मैनेजमेंट

[40:34] में वर्कर्स की भागीदारी को प्रमोट करता

[40:36] है। नेक्स्ट आता है आर्टिकल 44 जो

[40:39] यूनिफॉर्म सिविल कोड से रिलेटेड है और

[40:42] मुझे लगता है कि मुझे इस आर्टिकल के बारे

[40:44] में ज्यादा बताने की जरूरत नहीं है

[40:46] क्योंकि आए दिन यह आर्टिकल न्यूज़ की

[40:48] सुर्खियों में बना रहता है। इस आर्टिकल का

[40:51] विज़न है कि स्टेट एक ऐसा कॉमन सिविल कोड

[40:54] बनाए जो सभी सिटीजंस पर इक्वली अप्लाई हो।

[40:58] चाहे उनका रिलीजन या कम्युनिटी कोई भी हो।

[41:02] सिंपल शब्दों में कहें तो इसका मकसद है

[41:04] पर्सनल लॉस। जैसे मैरिज, डिवोर्स,

[41:07] इनहेरिटेंस और अडॉप्शन के मामलों में पूरे

[41:10] देश में एक समान यूनिफिटी और इक्वलिटी लाई

[41:13] जाए।

[41:14] लेकिन अभी तक यह डायरेक्टिव प्रिंसिपल ही

[41:16] बना हुआ है क्योंकि इसका इंप्लीमेंटेशन

[41:19] पूरे देश में अभी भी एक कॉम्प्लेक्स और

[41:21] सेंसिटिव इशू है।

[41:25] खैर नेक्स्ट है आर्टिकल 45 जिसका फोकस

[41:29] मेनली एजुकेशन पर है। पहले इसमें 14 साल

[41:32] तक के बच्चों के लिए फ्री और कंपलसरी

[41:35] एजुकेशन का जिक्र किया गया था। लेकिन फिर

[41:37] 86 अमेंडमेंट 2002 के थ्रू इसे एक्सपेंड

[41:41] किया गया। इस अमेंडमेंट के बाद आर्टिकल 45

[41:44] के थ्रू इसमें अर्ली चाइल्डहुड केयर एंड

[41:47] एजुकेशन ईसीसीई यानी छ साल से कम उम्र के

[41:50] बच्चों की देखभाल और उनकी एजुकेशन को भी

[41:53] शामिल कर लिया गया। इसके बाद आर्टिकल 46

[41:57] कहता है कि स्टेट को शेड्यूल्ड कास्ट्स,

[42:00] शेड्यूल्ड ट्राइब्स और कमजोर वर्गों के

[42:02] एजुकेशनल और इकोनॉमिक इंटरेस्ट को प्रमोट

[42:05] करना चाहिए और उन्हें सोशल इनजस्टिस और

[42:08] एक्सप्लइटेशन से प्रोटेक्ट करना चाहिए।

[42:10] आर्टिकल 47 में हेल्थ और न्यूट्रिशन पर

[42:13] जोर दिया गया है। इसके अंडर स्टेट को

[42:15] डायरेक्ट किया गया है कि वो लोगों का

[42:17] न्यूट्रिशंस लेवल और लाइफ स्टैंडर्ड्स

[42:19] बढ़ाने के लिए हर संभव एफर्ट्स लेगी। साथ

[42:23] ही साथ स्टेट पब्लिक हेल्थ में भी

[42:25] इंप्रूवमेंट लाएगी और ड्रग्स के कंजमशन को

[42:28] रोकेगी। आर्टिकल 48 में एग्रीकल्चर और

[42:31] कैटल मैनेजमेंट को मॉडर्नाइज और साइंटिफिक

[42:34] तरीकों से डेवलप करने पर जोर दिया गया है।

[42:37] खासतौर पे इसका फोकस काऊ और दूसरे मिलचिंग

[42:41] एनिमल्स के ब्रीड के डेवलपमेंट और उनके

[42:43] स्लॉटर को रोकने पर है। इसके बाद आता है

[42:46] आर्टिकल 48 ए जिसे 4 अमेंडमेंट के थ्रू ऐड

[42:50] किया गया। और यह आर्टिकल एनवायरमेंट,

[42:52] फॉरेस्ट और वाइल्ड लाइफ एनिमल्स के

[42:54] कंजर्वेशन और प्रोटेक्शन पर फोकस करता है।

[42:57] क्लाइमेट चेंज और बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग

[42:59] के इफेक्ट्स को देखते हुए यह आर्टिकल अभी

[43:01] के रिसेंट का कॉन्टेक्स्ट में काफी ज्यादा

[43:03] इंपॉर्टेंट है। इसके बाद आता है आर्टिकल

[43:05] 49 जिसका मेन फोकस है नेशनलेंस के

[43:08] मोन्यूमेंट्स, साइट्स और आर्टिफेक्ट्स के

[43:11] प्रोटेक्शन पर। इस आर्टिकल का ऑब्जेक्टिव

[43:13] है कि हमारी कल्चरल और हिस्टोरिकल हेरिटेज

[43:16] फ्यूचर जनरेशंस के लिए सुरक्षित रहे और

[43:18] देश की आइडेंटिटी और लेगसी को मेंटेन किया

[43:20] जा सके।

[43:22] आर्टिकल 50 गवर्नेंस सिस्टम का एक की पिलर

[43:26] है जो जुडिशरी और एग्जीक्यूटिव के बीच

[43:28] सेपरेशन ऑफ पावर्स के प्रिंसिपल को

[43:30] एस्टैब्लिश करता है। इसका मेन उद्देश्य है

[43:32] कि दोनों ऑर्गन्स जुडिशरी और एग्जीक्यूटिव

[43:35] अपने-अपने फंक्शनंस इंडिपेंडेंटली परफॉर्म

[43:37] करें ताकि जस्टिस सिस्टम फेयर, इंपार्शियल

[43:41] और पॉलिटिकल इन्फ्लुएंस से फ्री बना रहे।

[43:43] आर्टिकल 51 हमारे देश की फॉरेन पॉलिसी का

[43:46] स्ट्रांग फाउंडेशन माना जाता है। इसका मेन

[43:49] गोल है कि देश अपनी इंटरनेशनल रिलेशंस में

[43:52] पीस, कोऑपरेशन और म्यूचुअल रिस्पेक्ट पर

[43:54] फोकस करें। यह आर्टिकल स्टेट को गाइड करता

[43:57] है कि वो इंटरनेशनल पीस और सिक्योरिटी को

[44:00] प्रमोट करें। नेशंस के बीच फ्रेंडली

[44:02] रिलेशंस बनाए रखें। इंटरनेशनल लॉ और

[44:05] ट्रीटीज का सम्मान करें और डिस्प्यूट्स को

[44:08] वॉर के बजाय मीडिएशन और नेगोशिएशन के थ्रू

[44:10] सॉल्व करें।

[44:12] तो यह थे आर्टिकल्स 36 से 51 जिसे

[44:15] कलेक्टिवली डीपीएसपीस यानी डायरेक्टिव

[44:18] प्रिंसिपल्स ऑफ स्टेट पॉलिसी के नाम से

[44:19] जाना जाता है। एक तरह के सेट ऑफ गाइडलाइंस

[44:23] जो स्टेट को गवर्नेंस, सोशल और इकोनमिक

[44:25] जस्टिस, एनवायरमेंटल बैलेंस, गुड गवर्नेंस

[44:28] और फॉरेन पॉलिसी के रिगार्डिंग डायरेक्शंस

[44:30] देते हैं। इन शॉर्ट डीपीएसपीस एक मोरल

[44:33] कंपस की तरह हैं। यह बताते हैं कि स्टेट

[44:36] को किस दिशा में काम करना चाहिए ताकि एक

[44:39] जस्ट और वेलफेयर ओरिएंटेड सोसाइटी बन सके।

[44:43] लेकिन जैसे हमने पहले देखा यह कोर्ट्स में

[44:45] डायरेक्टली एनफोर्सिएबल नहीं होते। इसीलिए

[44:48] पार्ट थ्री के फंडामेंटल राइट्स और पार्ट

[44:50] फोर के डीपीएसपीस के बीच एक सल बैलेंस बना

[44:54] हुआ है। जहां एक तरफ फंडामेंटल राइट्स

[44:56] इंडिविजुअल फ्रीडम को प्रोटेक्ट करते हैं।

[44:59] तो वहीं दूसरी तरफ डीपीएसपीस सोसाइटी के

[45:02] कलेक्टिव वेलफेयर का पाथ दिखाते हैं। इसी

[45:05] वजह से पार्ट थ्री के फंडामेंटल राइट्स और

[45:07] पार्ट फोर के डीपीएसपीस के बीच एक डेलिकेट

[45:10] और कॉम्प्लेक्स रिलेशनशिप बना हुआ है। इसी

[45:13] कॉम्प्लेक्स रिलेशनशिप को लेकर सुप्रीम

[45:15] कोर्ट ने कई सारे लैंडमार्क जजमेंट्स भी

[45:17] दिए हैं। जिसमें यही क्लेरिफाई किया गया

[45:20] है कि दोनों के बीच बैलेंस और हार्मोनी

[45:22] कैसे मेंटेन की जाए। आइए इन जजमेंट्स को

[45:25] भी शॉर्ट में देख लेते हैं। सबसे पहले

[45:28] 1951 में चंपकम दोराई राजन केस। सुप्रीम

[45:31] कोर्ट ने क्लियरली कहा कि डीपीएसपीस

[45:34] फंडामेंटल राइट्स के अधीन रहेंगे और अगर

[45:37] दोनों में कॉन्फ्लिक्ट हो तो फंडामेंटल

[45:39] राइट्स को प्रायोरिटी दी जानी चाहिए। इसका

[45:42] मतलब यह हुआ कि डीपीएसपीस को लागू करने के

[45:45] लिए फंडामेंटल राइट्स को कमजोर या

[45:47] रेस्ट्रिक्ट नहीं किया जा सकता है। यानी

[45:49] फंडामेंटल राइट्स को कॉन्स्टिट्यूशन का

[45:52] सबसे इंपॉर्टेंट फीचर माना गया जो

[45:55] डायरेक्टली सिटीजंस के लीगल राइट्स को

[45:56] प्रोटेक्ट करते थे। फिर आया 1967 का

[46:00] गोलखनाथ केस जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने एक

[46:02] हिस्टोरिक डिसीजन दिया था। कोर्ट ने कहा

[46:05] कि पार्लियामेंट अपनी अमेंडमेंट पावर का

[46:07] इस्तेमाल करके फंडामेंटल राइट्स को बदल या

[46:10] कम नहीं कर सकती। यानी इस फैसले ने एक नया

[46:13] कॉन्स्टिट्यूशनल टर्निंग पॉइंट क्रिएट

[46:15] किया। जहां फंडामेंटल राइट्स को अनटचेबल

[46:18] माना गया और पार्लियामेंट की पावर पर एक

[46:20] स्ट्रांग लिमिट लगा दी गई। उसके बाद 1973

[46:24] में आया हिस्टोरिक केशवानंद भारती केस जो

[46:27] इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन के इतिहास का एक

[46:29] माइलस्टोन है। इस जजमेंट में सुप्रीम

[46:32] कोर्ट ने गोलकनाथ केस का फैसला पलट दिया

[46:34] और कहा कि पार्लियामेंट को पूरे

[46:36] कॉन्स्टिट्यूशन में अमेंडमेंट करने का

[46:38] अधिकार है। चाहे वो फंडामेंटल राइट से ही

[46:40] संबंधित क्यों ना हो। लेकिन कोर्ट ने यहां

[46:43] एक सिग्निफिकेंट कंडीशन रखी। पार्लियामेंट

[46:46] कॉन्स्टिट्यूशन के बेसिक स्ट्रक्चर को बदल

[46:48] नहीं सकती। यहीं से बेसिक स्ट्रक्चर

[46:51] डॉक्ट्राइन का जन्म हुआ जिसमें कहा गया कि

[46:54] अमेंडमेंट्स हो सकते हैं लेकिन

[46:56] कॉन्स्टिट्यूशन के कोर एसेंस और स्पिरिट

[46:59] को छुआ नहीं जा सकता। फिर 1980 में आया

[47:01] मिनरवा मिल्स केस। इस केस में सुप्रीम

[47:03] कोर्ट ने यह बैलेंस और भी क्लियर कर दिया।

[47:05] कोर्ट ने कहा कि फंडामेंटल राइट्स और

[47:07] डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स दोनों ही

[47:09] कॉन्स्टिट्यूशन के लिए इक्वली जरूरी हैं।

[47:11] इन दोनों के बीच का बैलेंस और हार्मोनी ही

[47:13] कॉन्स्टिट्यूशन के बेसिक स्ट्रक्चर का

[47:15] हिस्सा है। मतलब पार्लियामेंट अमेंडमेंट

[47:17] के थ्रू किसी एक को दूसरे पर पूरी तरह

[47:20] डोमिनेट करने का अधिकार नहीं रखती। अगर हम

[47:22] इन चारों लैंडमार्क केसेस यानी कि चंपकम

[47:24] दुराई राजन, गोलकनाथ, केशवानंद भारती और

[47:27] मिनरवा मिल्स को एक साथ देखें तो हमें एक

[47:30] क्लियर पिक्चर यह मिलती है कि फंडामेंटल

[47:32] राइट्स हर सिटीजन को बेसिक प्रोटेक्शन

[47:35] देते हैं। जबकि डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स

[47:37] स्टेट के लोगों के लिए सोशल जस्टिस और

[47:39] वेलफेयर इंश्योर करने का डायरेक्शन

[47:41] प्रोवाइड करते हैं। अब हम कॉन्स्टिट्यूशन

[47:42] के उस खास हिस्से पर आते हैं जो हमें

[47:45] सिर्फ राइट्स ही नहीं बल्कि

[47:46] रिस्पांसिबिलिटीज की भी याद दिलाता है। अब

[47:49] हम बात करने वाले हैं फंडामेंटल ड्यूटीज

[47:51] के बारे में। फंडामेंटल ड्यूटीज को पार्ट

[47:53] फोर ए आर्टिकल 51 ए में दिया गया है।

[47:56] इंपॉर्टेंट बात यह है कि फंडामेंटल राइट्स

[47:59] और डीपीएसपीस की तरह यह ओरिजिनल

[48:01] कॉन्स्टिट्यूशन में नहीं थे। इन्हें 1976

[48:03] के 42 कॉन्स्टिट्यूशन अमेंडमेंट के थ्रू

[48:05] ऐड किया गया था। इन ड्यूटीज का मेन एम था

[48:08] सिटीजंस में नेशनलिज्म, डिसिप्लिन और

[48:12] रिस्पांसिबिलिटी की फीलिंग को और स्ट्रांग

[48:14] बनाना। आर्टिकल 51 ए में मेनली 11 ड्यूटीज

[48:18] को शामिल किया गया है जो यह कहते हैं कि

[48:21] हर सिटीजन का यह कर्तव्य है कि वो

[48:24] कॉन्स्टिट्यूशन फॉलो करें और नेशनल फ्लैग

[48:26] एंड नेशनल एंथम का रिस्पेक्ट करें। फ्रीडम

[48:29] स्ट्रगल के आइडियल्स को फॉलो करें। इंडिया

[48:31] की सोवनिटी और इंटेग्रिटी को प्रोटेक्ट

[48:33] करें। जब भी बुलाया जाए कंट्री को डिफेंड

[48:36] करें और नेशनल सर्विस के लिए तैयार रहें।

[48:39] सब लोगों के साथ ब्रदरहुड का स्पिरिट

[48:41] डेवलप करें। कंट्री की कॉम्पोजिट कल्चर को

[48:43] प्रिजर्व करें। नेचुरल एनवायरमेंट को

[48:45] प्रिजर्व करें। साइंटिफिक टेंपर और

[48:46] ह्यूमैनिटी डेवलप करें। पब्लिक प्रॉपर्टी

[48:49] को सेफ रखें और वायलेंस करने से बचें।

[48:52] लाइफ के हर एरिया में एक्सीलेंस करने की

[48:55] कोशिश करें। पेरेंट्स या गार्डियंस की

[48:57] ड्यूटी है कि छ से 14 साल के बच्चों को

[49:00] स्कूल भेजें।

[49:03] यहां एक बात जानना बहुत जरूरी है कि

[49:05] ओरिजिनली सिर्फ 10 फंडामेंटल ड्यूटीज दी

[49:07] गई थी। लेकिन 86 कॉन्स्टिट्यूशनल

[49:10] अमेंडमेंट के थ्रू एक और ड्यूटी ऐड की गई

[49:13] जिससे टोटल 11 फंडामेंटल ड्यूटीज हो गई।

[49:16] खैर अब बात करते हैं पार्ट फाइव के बारे

[49:19] में जिसमें यूनियन गवर्नमेंट से जुड़े की

[49:21] आर्टिकल्स का प्रोविजंस दिए गए हैं। पार्ट

[49:24] फाइव में सबसे पहले बात करते हैं

[49:26] प्रेसिडेंट से जुड़े कुछ की आर्टिकल्स के

[49:28] बारे में। आर्टिकल 54 और 55 प्रेसिडेंट के

[49:31] इलेक्शन प्रोसेस को एक्सप्लेन करते हैं।

[49:34] यहां बताया गया है कि प्रेसिडेंट को कौन इ

[49:36] करेगा? वोटिंग कैसे होगी? इसके बाद आता है

[49:40] टेन्योर और एलिजिबिलिटी का सेक्शन।

[49:42] आर्टिकल 56 क्लियरली कहता है कि

[49:45] प्रेसिडेंट का टर्म फाइव इयर्स का होता

[49:47] है। आर्टिकल 57 यह अलाउ करता है कि

[49:50] प्रेसिडेंट चाहे तो कितनी भी बार री

[49:52] इलेक्शन के लिए खड़े हो सकते हैं।

[49:55] आर्टिकल 58 एलिजिबिलिटी कंडीशंस बताता है।

[49:58] इसके अनुसार प्रेसिडेंशियल कैंडिडेट

[50:00] इंडियन सिटीजन होना चाहिए। मिनिमम 35

[50:03] इयर्स की एज होनी चाहिए और वह लोकसभा

[50:06] इलेक्शन लड़ने के लिए लीगली एलिजिबल हो।

[50:09] आर्टिकल 59 एक इंपॉर्टेंट कंडीशन सेट करता

[50:12] है। प्रेसिडेंट पार्लियामेंट या स्टेट

[50:14] लेजिस्लेचर का मेंबर नहीं हो सकता। यानी

[50:17] यह आर्टिकल्स मिलकर प्रेसिडेंट के

[50:19] इलेक्शन, टर्म और क्वालिफिकेशंस को

[50:21] क्लियरली डिफाइन कर देते हैं। अब आते हैं

[50:23] ओथ और रिमूवल के प्रोसेस पर। आर्टिकल 60

[50:27] प्रेसिडेंट की ओथ का एग्जैक्ट फॉर्मेट

[50:29] बताता है। यह बताता है कि किस बात की शपथ

[50:32] लेनी है, किस चीज का प्रॉमिस करना है।

[50:35] आर्टिकल 61 एक कंप्लीट इंपीचमेंट प्रोसेस

[50:38] को डिस्क्राइब करता है। जिससे प्रेसिडेंट

[50:40] को अपने पोस्ट से रिमूव किया जा सके। और

[50:43] आर्टिकल 62 एनश्योर करता है कि अगर

[50:46] प्रेसिडेंट का पद कभी वेकेंट हो जाए तो

[50:48] नया इलेक्शन टाइम पर हो जाए और सिस्टम में

[50:50] कोई ब्रेक ना आए।

[50:53] इनके बाद कुछ आर्टिकल्स प्रेसिडेंट के रोल

[50:55] और उनके पावर्स को एक्सप्लेन करते हैं।

[50:57] जैसे आर्टिकल 70 बताता है कि स्पेशल

[50:59] सिचुएशनंस में प्रेसिडेंट के फंक्शनंस

[51:01] कैसे परफॉर्म होंगे। आर्टिकल 71 यह क्लियर

[51:04] करता है कि प्रेसिडेंट या वाइस प्रेसिडेंट

[51:06] के इलेक्शंस में अगर कोई डिस्प्यूट हो तो

[51:09] उसका फाइनल डिसीजन सुप्रीम कोर्ट लेगा।

[51:11] आर्टिकल 72 प्रेसिडेंट को पार्डनिंग पावर

[51:14] देता है। यानी वो सजा माफ कर सकते हैं,

[51:17] रिड्यूस कर सकते हैं या चेंज कर सकते हैं।

[51:19] और आर्टिकल 73 यूनियन गवर्नमेंट की

[51:22] एग्जीक्यूटिव पावर्स का स्कोप डिफाइन करता

[51:24] है। तो ओवरऑल ये सभी आर्टिकल्स मिलकर

[51:27] राष्ट्रपति के ऑफिस का कंप्लीट

[51:29] कॉन्स्टिट्यूशनल फ्रेमवर्क बनाते हैं।

[51:31] जिसमें इलेक्शन कैसे होगा? टर्म कितना

[51:33] होगा? एलिजिबिलिटी क्या है? ओथ कैसे होगी?

[51:36] इंपीचमेंट का प्रोसेस क्या है? और

[51:38] प्रेसिडेंट के मेजर पावर्स कैसे फंक्शन

[51:40] करेंगे एटसेटरा शामिल है।

[51:43] प्रेसिडेंट के बाद अब हम वाइस प्रेसिडेंट

[51:45] के पद की बात करते हैं।

[51:48] आर्टिकल 63 यह कहता है कि भारत में एक

[51:51] उपराष्ट्रपति यानी वाइस प्रेसिडेंट होंगे।

[51:54] आर्टिकल 64 वाइस प्रेसिडेंट को राज्यसभा

[51:56] का एक्स ऑफिशियल चेयर पर्सन बनाते हैं।

[51:59] यानी वह राज्यसभा की मीटिंग्स को प्रिसाइड

[52:02] करते हैं। आर्टिकल 65 एक इंपॉर्टेंट

[52:05] सिचुएशन एक्सप्लेन करता है। अगर

[52:08] प्रेसिडेंट अपने फंक्शनंस परफॉर्म नहीं कर

[52:10] पाते। चाहे इलनेस हो, एब्सेंस हो या उनका

[52:13] ऑफिस वेकेंट हो जाए तो वाइस प्रेसिडेंट

[52:15] एक्टिंग प्रेसिडेंट की तरह उनकी

[52:17] रिस्पांसिबिलिटीज संभालते हैं।

[52:20] आर्टिकल 66 वाइस प्रेसिडेंट के इलेक्शन

[52:23] प्रोसेस को डिटेल में एक्सप्लेन करता है।

[52:25] उनका इलेक्शन मेंबर्स ऑफ पार्लियामेंट

[52:28] यानी कि वो सारे मेंबर्स जो लोकसभा और

[52:30] राज्यसभा दोनों के मेंबर्स हैं मिलकर करते

[52:32] हैं। आर्टिकल 67 उनके कार्यकाल यानी टर्म

[52:36] को डिफाइन करता है जो 5 साल का होता है।

[52:39] वाइस प्रेसिडेंट को री इलेक्शन का ऑप्शन

[52:41] भी होता है। यह आर्टिकल 67 में इंप्लसिटली

[52:44] अलाउड है। आर्टिकल 68 यह इंश्योर करता है

[52:47] कि अगर वाइस प्रेसिडेंट का ऑफिस वेकेंट हो

[52:49] जाए रेिग्नेशन, डेथ या रिमूवल की वजह से

[52:52] तो नया इलेक्शन टाइम पर कराया जाए ताकि

[52:55] पोस्ट लंबी ड्यूरेशन तक खाली ना रहे।

[52:58] आर्टिकल 69 वाइस प्रेसिडेंट की ओथ का

[53:00] एग्जैक्ट फॉर्मेट प्रोवाइड करता है। वो

[53:03] क्या प्रॉमिस करेंगे, क्या अपहोल्ड

[53:05] करेंगे? सब यहां मेंशन है। प्रेसिडेंट और

[53:08] वाइस प्रेसिडेंट के बाद। अब हम आते हैं

[53:10] एग्जीक्यूटिव ब्रांच पर। यही वह पार्ट है

[53:13] जहां से गवर्नमेंट की डेली फंक्शनिंग चलती

[53:16] है। और इस सेक्शन का मेन फोकस होता है

[53:18] प्राइम मिनिस्टर और काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स

[53:21] पर। एग्जीक्यूटिव के प्रोविज़ंस की शुरुआत

[53:24] होती है आर्टिकल 74 से। आर्टिकल 74 कहता

[53:27] है कि प्रेसिडेंट के पास एक काउंसिल

[53:30] ऑफिस्टर्स होगी जो उन्हें एडवाइस देगी। इस

[53:33] काउंसिल का हेड प्राइम मिनिस्टर होते हैं।

[53:36] इंपॉर्टेंट पॉइंट यह है कि प्रेसिडेंट

[53:38] अपने पावर्स का यूज काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स

[53:40] की एडवाइस पर ही करते हैं। इससे आप समझ तो

[53:43] सकते हैं कि रियल डिसीजन मेकिंग पावर

[53:45] मिनिस्टर्स के हाथ में होती है और

[53:47] प्रेसिडेंट उन्हीं डिसीजंस को फॉलो करते

[53:49] हैं जो उन्हें काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स

[53:51] सजेस्ट करते हैं। अब आते हैं आर्टिकल 75

[53:55] पर। आर्टिकल 75 कहता है कि प्राइम

[53:58] मिनिस्टर को अपॉइंट करता है प्रेसिडेंट।

[54:00] बाकी मिनिस्टर्स को पीएम की एडवाइस पर

[54:02] अपॉइंट किया जाता है। इसी आर्टिकल में

[54:05] मिनिस्टर्स का टेन्योर, रिस्पांसिबिलिटी

[54:07] और ओथ का रेफरेंस दिया गया। सबसे

[54:09] इंपॉर्टेंट पार्ट काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स

[54:11] कलेक्टिवली लोकसभा के प्रति रिस्पांसिबल

[54:14] होती है। अगर लोकसभा उन पर फेथ लूज कर दे

[54:17] यानी वोट ऑफ नो कॉन्फिडेंस पास हो जाए तो

[54:19] पूरी गवर्नमेंट को रिजाइन करना पड़ता है।

[54:22] यही हमारे पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी का

[54:24] फाउंडेशन है। एग्जीक्यूटिव पावर पीएम और

[54:27] उनकी काउंसिल के हाथ में होती है और वो

[54:30] डायरेक्टली पीपल के रिप्रेजेंटेटिव्स के

[54:32] प्रति अकाउंटेबल होते हैं। अब आगे बढ़ते

[54:35] हैं। आर्टिकल 76 इंडिया के अटर्नी जनरल का

[54:39] पोस्ट डिफाइन करता है। यह सरकार के चीफ

[54:42] लीगल एडवाइजर होते हैं और इनकी अपॉइंटमेंट

[54:45] प्रेसिडेंट द्वारा की जाती है। इसके तुरंत

[54:48] बाद आता है आर्टिकल 77 जो यह बताता है कि

[54:51] सरकार के सारे ऑफिशियल एकशंस प्रेसिडेंट

[54:53] के नाम से इशू होंगे। गवर्नमेंट अपने काम

[54:56] के लिए रूल्स और प्रोसीजर्स भी बना सकती

[54:58] है जिससे डे टू डे फंक्शनिंग ऑर्गेनाइज्ड

[55:00] तरीके से चल सके। फिर आर्टिकल 78 प्राइम

[55:03] मिनिस्टर की कुछ स्पेशल ड्यूटीज को

[55:05] एक्सप्लेन करता है। प्राइम मिनिस्टर को

[55:08] प्रेसिडेंट को सरकार के काम की जानकारी

[55:10] रेगुलर देनी होती है। एग्जीक्यूटिव के बाद

[55:12] हम पार्लियामेंट के स्ट्रक्चर पर आते हैं

[55:14] जिसे आर्टिकल 79 में डिटेल में दिया गया

[55:17] है। पार्लियामेंट तीन पार्ट से मिलकर बनती

[55:20] है। प्रेसिडेंट, राज्यसभा और लोकसभा।

[55:23] यहां इंपॉर्टेंट बात यह है कि प्रेसिडेंट

[55:25] भी पार्लियामेंट का ही हिस्सा होते हैं।

[55:27] उनके बिना पार्लियामेंट का स्ट्रक्चर

[55:28] इनकंप्लीट माना जाता है। चाहे बिल्स पास

[55:32] करने की बात हो या लेजिसलेटिव प्रोसेस की

[55:34] या फिर किसी भी दूसरे लीगल प्रोसेस की। अब

[55:37] पार्लियामेंट की कंपोजिशन की बात करें तो

[55:40] आर्टिकल 81 लोकसभा की कंपोजिशन डिफाइन

[55:43] करता है। लोकसभा के मेंबर्स डायरेक्टली

[55:45] लोग चुनकर भेजते हैं। इसीलिए इसे हाउस ऑफ

[55:48] द पीपल कहा जाता है। रिप्रेजेंटेशन को

[55:51] पपुलेशन के हिसाब से फेयर बनाए रखने के

[55:54] लिए आर्टिकल 82 कहता है कि हर सेंसस के

[55:57] बाद सीड्स और कॉन्स्टिट्यूएंसी का

[55:59] रिएडजस्टमेंट किया जाएगा।

[56:02] आर्टिकल 83 दोनों हाउसेस के टेन्योर को

[56:05] डिफाइन करता है। राज्यसभा एक परमानेंट

[56:08] हाउस है। यह कभी डिॉल्व नहीं होती। सिर्फ

[56:11] इसके 1/3 मेंबर्स हर दो साल में रिटायर

[56:15] होते हैं और नए मेंबर्स उन पर रिप्लेस

[56:18] होते हैं। लोकसभा के नॉर्मल टेन्योर।

[56:21] लोकसभा का नॉर्मल टेन्योर 5 साल होता है।

[56:24] लेकिन प्रेसिडेंट इसे जरूरत पड़ने पर पहले

[56:26] भी डिॉल्व कर सकते हैं। फिर आता है

[56:29] एलिजिबिलिटी। आर्टिकल 84 के मुताबिक मेंबर

[56:32] ऑफ पार्लियामेंट बनने के लिए कैंडिडेट का

[56:34] इंडियन सिटीजन होना जरूरी है। राज्यसभा के

[56:37] लिए मिनिमम एज 30 इयर्स और लोकसभा के लिए

[56:39] 25 इयर्स होनी चाहिए। पार्लियामेंट बाय लॉ

[56:43] एडिशनल क्वालिफिकेशंस भी प्रिस्राइब कर

[56:45] सकती है।

[56:47] अब हम पार्लियामेंट के सेशंस की बात करते

[56:49] हैं। आर्टिकल 85 कहता है कि प्रेसिडेंट

[56:52] पार्लियामेंट के हाउसेस को समन करते हैं

[56:54] और दो सेशंस के बीच मैक्सिमम 6 महीने का

[56:57] गैप हो सकता है। प्रेसिडेंट किसी भी हाउस

[57:00] को प्रोरोग कर सकते हैं और लोकसभा को

[57:02] डिॉल्व भी कर सकते हैं। आर्टिकल 86

[57:06] प्रेसिडेंट के एनुअल और स्पेशल एड्रेस के

[57:08] बारे में है। यहां प्रेसिडेंट

[57:09] पार्लियामेंट के दोनों हाउसेस को अपना

[57:11] मैसेज दे सकते हैं। जिसमें गवर्नमेंट की

[57:13] पॉलिसी या किसी इंपॉर्टेंट इशू पर उनका

[57:16] विज़न होता है। इसी से रिलेटेड आर्टिकल 87

[57:19] कहता है कि जब नई लोकसभा बनती है या हर

[57:22] साल के पहले सेशन में राष्ट्रपति दोनों

[57:24] हाउसेस को एड्रेस करते हैं और गवर्नमेंट

[57:27] का एजेंडा बताते हैं। आर्टिकल 88

[57:30] मिनिस्टरर्स और अटॉर्नी जनरल को

[57:32] पार्लियामेंट में बोलने और पार्टिसिपेट

[57:34] करने का अधिकार देता है। चाहे वह उस हाउस

[57:36] के इलेक्टेड मेंबर ना भी लेकिन उनके पास

[57:39] पार्लियामेंट की कमेटीज में वोटिंग राइट्स

[57:42] नहीं होते।

[57:43] अब हम पार्लियामेंट के प्रिसाइडिंग

[57:45] ऑफिसर्स पर आते हैं। आर्टिकल 89 कहता है

[57:48] कि राज्यसभा का चेयरमैन भारत का वाइस

[57:51] प्रेसिडेंट होता और राज्यसभा अपना एक

[57:54] डेपुटी चेयरमैन भी इ करती है। आर्टिकल 90,

[57:57] 91 और 92 चेयरमैन और डेपुटी चेयरमैन का

[58:00] काम, उनकी पावर्स, उनका रेज़िग्नेशन और

[58:03] उनके रिमूवल का पूरा प्रोसेस एक्सप्लेन

[58:05] करते हैं। फिर आर्टिकल्स 93 से 96 लोकसभा

[58:09] के स्पीकर और डेपुटी स्पीकर से संबंधित

[58:12] है। आर्टिकल 93 मेंशंड है कि लोकसभा अपना

[58:16] स्पीकर और डिपुटी स्पीकर इ करेगी। यह

[58:19] दोनों तब तक अपने पद पर बने रहते हैं जब

[58:22] तक हाउस उन्हें रिमूव ना कर दे। वो रिजाइन

[58:24] ना कर दें या हाउस डिॉल्व ना हो।

[58:27] आर्टिकल्स 94, 95 और 96 उनके रिमूवल,

[58:30] वेकेंसी और और पावर्स की डिटेल देते हैं।

[58:34] और एक इंपॉर्टेंट पॉइंट है कि स्पीकर के

[58:36] रिमूवल प्रपोजल पर डिस्कशन चले तो स्पीकर

[58:38] अपनी चेयर प्रिसाइड नहीं कर सकते। सैलरीज

[58:42] और अलाउंस के लिए आर्टिकल 97 प्रोविजन

[58:45] देता है। स्पीकर, डिपुटी स्पीकर, राज्यसभा

[58:47] चेयरमैन और डिप्टी चेयरमैन की सैलरीज

[58:49] पार्लियामेंट डिसाइड करती है। आर्टिकल 98

[58:52] कहता है कि लोकसभा और राज्यसभा के लिए

[58:55] सेपरेट सेक्रेटेरिएट्स होंगे जो उनके

[58:57] एडमिनिस्ट्रेटिव और क्लेरिकल काम संभालते

[59:00] हैं।

[59:01] अब हम डेली प्रोसीजर और फंक्शनिंग पर आते

[59:04] हैं। आर्टिकल 99 कहता है कि कोई भी मेंबर

[59:07] तब तक अपनी सीट ऑफिशियली नहीं ले सकता जब

[59:10] तक वह संविधान के फॉर्मेट में ओथ या

[59:12] एफमेशन ना ले ले। उसके बाद आर्टिकल 100

[59:17] कोरम और वोटिंग के रूल्स बताता है। कोरम

[59:20] का मतलब होता है मिनिमम मेंबर्स की

[59:22] प्रेजेंस जिससे हाउस का बिजनेस वैलिड

[59:24] तरीके से चल सकता है। अगर कोरम पूरा नहीं

[59:27] होता तो मीटिंग सस्पेंड हो जाती है। इस

[59:30] आर्टिकल के अनुसार डिसीजंस मेजॉरिटी

[59:32] वोटिंग से लिए जाते हैं और अगर कुछ सीट्स

[59:35] वेकेंट हो या कोई मेंबर डिसक्वालीफाई हो

[59:37] जाए तो भी बाकी मेंबर्स के डिसीजंस वैलिड

[59:40] माने जाते हैं। अब हम देखेंगे आर्टिकल्स

[59:42] 1001 से 1004 के बारे में जो मेंबर्स की

[59:46] सीट्स और क्वालिफिकेशन से संबंधित है।

[59:48] आर्टिकल 1001 के अकॉर्डिंग सीट खाली हो

[59:51] जाती है। अगर कोई मेंबर या तो रिजाइन कर

[59:54] दे या कोई मेंबर 60 दिन से ज्यादा बिना

[59:57] परमिशन एब्सेंट रहे या तो वह

[59:59] डिसक्वालीिफाइड हो जाए या फिर मेंबर की

[01:00:01] मृत्यु हो जाए। आर्टिकल 102

[01:00:04] डिसक्वालीिफिकेशन के ग्राउंड्स डिफाइन

[01:00:05] करता है। जैसे ऑफिस ऑफ प्रॉफिट होल्ड

[01:00:08] करना, इनसॉल्वेंट हो जाना। मेंटल

[01:00:11] अनसाउंडनेस।

[01:00:13] इसके अलावा एंटी डिफेक्शन लॉ के तहत भी

[01:00:16] मेंबर्स को डिसक्वालीफाई किया जा सकता है।

[01:00:18] आपको बता दें कि इस मैटर पर पार्लियामेंट

[01:00:21] और लॉज़ और भी ग्राउंड स्पेसिफाई कर सकते

[01:00:24] हैं। आर्टिकल 103 के अकॉर्डिंग अगर किसी

[01:00:26] मेंबर की क्वालिफिकेशन या

[01:00:28] डिसक्वालीिफिकेशन पर डाउट हो तो इसका

[01:00:30] फैसला प्रेसिडेंट द्वारा किया जाता है।

[01:00:33] लेकिन इस मैटर में इलेक्शन कमीशन की सलाह

[01:00:35] लेना उनके लिए जरूरी होता है। आर्टिकल 104

[01:00:38] कहता है कि अगर कोई व्यक्ति बिना ओथ लिए

[01:00:41] या डिसक्वालीिफिकेशन होते हुए भी मेंबर की

[01:00:44] तरह सीट ले या वोट करे तो उस पर पेनल्टी

[01:00:47] लगाई जा सकती है। अब बात करते हैं

[01:00:49] प्रिविलेजेस ऑफ मेंबर्स की। पार्लियामेंट

[01:00:51] के मेंबर्स को अपनी ड्यूटी सही तरीके से

[01:00:53] करने के लिए कुछ विशेष अधिकार दिए गए हैं।

[01:00:56] जैसे स्पीच और डिबेट में इम्यूनिटी ताकि

[01:00:59] वह बिना डर के अपनी बात रख सकें। कुछ

[01:01:01] सिविल केसेस में अरेस्ट से बचाव ताकि उनका

[01:01:04] लेजिसलेटिव काम डिस्टर्ब ना हो और

[01:01:07] प्रोसीडिंग्स के लिए लीगल प्रोटेक्शन ताकि

[01:01:09] जुडिशरी उनके ऊपर अननेसेसरी प्रेशर ना

[01:01:12] डाले। इन प्रिविलजेस का उद्देश्य यह है कि

[01:01:15] पार्लियामेंट की फंक्शनिंग स्मूथ,

[01:01:17] इंडिपेंडेंट और इफेक्टिव बनी है। अब देखते

[01:01:19] हैं आर्टिकल 105 और 106 के बारे में।

[01:01:22] आर्टिकल 105 पार्लियामेंट्री प्रिविलजेस

[01:01:24] के बारे में बात करता है। पार्लियामेंट के

[01:01:26] मेंबर्स को कुछ स्पेशल राइट्स और

[01:01:28] इम्यूनिटीज दी गई हैं। जिससे वह अपने

[01:01:30] लेजिसलेटिव रिस्पांसिबिलिटीज को को

[01:01:32] स्मूथली पूरा कर सकें। इसमें सबसे

[01:01:34] इंपॉर्टेंट है फ्रीडम ऑफ स्पीच इन

[01:01:36] पार्लियामेंट। यानी पार्लियामेंट के अंदर

[01:01:39] मेंबर्स जो भी डिबेट या स्पीच में बोलते

[01:01:41] हैं, उसके लिए उन पर कोई कोर्ट केस नहीं

[01:01:44] हो सकता। इसके अलावा दूसरे प्रिविलजेस भी

[01:01:46] हैं। जैसे कुछ सिविल अरेस्ट से

[01:01:48] प्रोटेक्शन, पार्लियामेंट्री प्रोसीडिंग्स

[01:01:50] को डिस्टर्ब ना करना और डॉक्यूमेंट्स की

[01:01:52] कॉन्फिडेंशियलिटी का ध्यान रखना। नेक्स्ट

[01:01:55] है आर्टिकल 106 जो सैलरीज एंड अलाउंसेस से

[01:02:00] रिलेटेड है। यह बताता है कि पार्लियामेंट

[01:02:02] के मेंबर्स की सैलरी, अलाउंसेस और

[01:02:04] इमोल्यूमेंट्स पार्लियामेंट द्वारा डिसाइड

[01:02:06] किए जाते हैं ताकि एमपीज फाइनेंशियली

[01:02:09] सिक्योर रहें और बिना किसी फाइनेंशियल

[01:02:11] चिंता के अपनी लेजिसलेटिव ड्यूटीज पर पूरा

[01:02:13] ध्यान दे सकें। अब बात करेंगे हम

[01:02:15] आर्टिकल्स 107 से 111 तक जो लेजिसलेटिव

[01:02:20] प्रोसीजर के बारे में बात करते हैं। सबसे

[01:02:22] पहले है आर्टिकल 107 जो लॉ मेकिंग प्रोसेस

[01:02:25] से रिलेटेड है। यह आर्टिकल पार्लियामेंट

[01:02:27] में ऑर्डिनरी बिल्स को इंट्रोड्यूस,

[01:02:29] डिस्कस और पास करने का प्रोसेस डिफाइन

[01:02:31] करता है। जैसे कि मनी बिल के अलावा कोई भी

[01:02:35] बिल दोनों हाउसेस में से किसी में भी पेश

[01:02:37] किया जा सकता है। दूसरा बिल तभी पास माना

[01:02:40] जाएगा जब दोनों हाउसेस उसे अप्रूव कर देते

[01:02:42] हैं। इस आर्टिकल का एम यह है कि

[01:02:45] पार्लियामेंट एक इंडिपेंडेंट और इफेक्टिव

[01:02:47] लेजिसलेटिव अथॉरिटी बनी रहे और देश के लिए

[01:02:50] कानून बना सके। वहीं आर्टिकल 108 यह कहता

[01:02:53] है कि अगर किसी ऑर्डिनरी बिल पर दोनों

[01:02:56] हाउसेस में डिसए्रीमेंट हो जाए या दोनों

[01:02:58] हाउसेस बिल को पास ना कर सकें तो ऐसे

[01:03:01] सिचुएशन में जॉइंट सिंग के प्रोविजन का

[01:03:04] सहारा लिया गया है। इस जॉइंट सिंग को

[01:03:06] प्रेसिडेंट द्वारा बुलाया जाता है और

[01:03:08] लोकसभा के स्पीकर इसके प्रिसाइडिंग ऑफिसर

[01:03:11] होते हैं। यहां ध्यान देने वाली बात यह है

[01:03:14] कि मनी बिल्स और कॉन्स्टिट्यूशनल

[01:03:16] अमेंडमेंट बिल्स के लिए जॉइंट सिंग का कोई

[01:03:18] प्रोविजन नहीं है। चलिए अब थोड़ा मनी बिल्स

[01:03:21] के प्रोसेस के बारे में डिस्कस करते हैं

[01:03:23] जो कॉन्स्टिट्यूशन में आर्टिकल 109 के

[01:03:25] अंडर आता है। अकॉर्डिंग टू आर्टिकल 109

[01:03:27] मनी बिल्स सिर्फ लोकसभा में ही

[01:03:29] इंट्रोड्यूस किए जा सकते हैं। दूसरा

[01:03:31] राज्यसभा को सिर्फ 14 दिन का समय दिया गया

[01:03:34] है बिल को रिव्यू और सजेशंस देने के लिए।

[01:03:37] लेकिन एक रिस्ट्रिक्शन यह है कि राज्यसभा

[01:03:40] बिल को किसी भी हालत में रिजेक्ट नहीं कर

[01:03:42] सकती। इसका मतलब यह है कि फाइनेंसियल

[01:03:44] मैटर्स में लोकसभा को ही फाइनल अथॉरिटी दी

[01:03:47] गई है। क्योंकि लोकसभा के मेंबर्स

[01:03:49] डायरेक्टली लोगों के द्वारा इ होकर आते

[01:03:51] हैं। यह प्रोसेस एनश्योर करता है कि

[01:03:53] पब्लिक फंड्स और फाइनेंसियल लेजिसलेशन में

[01:03:55] लोकसभा की सुप्रीमेसी बनी रहे। अब हम सभी

[01:03:58] को यह तो समझ आ गया कि मनी बिल के पास

[01:04:00] होने की क्या प्रोसेस है। लेकिन किस बिल

[01:04:03] को हम मनी बिल बोल सकते हैं? इसका जवाब

[01:04:05] हमें मिलता है आर्टिकल 110 में। जो मनी

[01:04:09] बिल को डिफाइन करता है। इस आर्टिकल के

[01:04:12] अकॉर्डिंग अगर किसी बिल में सिर्फ इन

[01:04:14] टॉपिक्स से जुड़े प्रोविजंस हैं जैसे

[01:04:17] टैक्सेस लगाना, बदलना या हटाना, गवर्नमेंट

[01:04:20] का पैसा बोरो करना या गारंटी देना,

[01:04:23] कंसोलिडेटेड फंड से पैसा एलोकेट करना,

[01:04:26] सरकारी रिसीप्ट्स, एक्सपेंडिचर, ऑडिट से

[01:04:29] रिलेटेड मैटर्स और इन सभी मैटर्स से जुड़ा

[01:04:32] कोई भी बिल मनी बिल कहलाता है। इसके अलावा

[01:04:35] सबसे इंपॉर्टेंट बात यह है कि कोई बिल मनी

[01:04:38] बिल है या नहीं। यह फाइनल डिसीजन स्पीकर

[01:04:41] का होता है। अब देखते हैं आर्टिकल 111 के

[01:04:44] बारे में जो यह कहता है कि बिल के दोनों

[01:04:47] हाउसेस से पास हो जाने के बाद उसे

[01:04:50] प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया के पास भेजा जाता

[01:04:52] है। प्रेसिडेंट के पास तीन ऑप्शंस होते

[01:04:54] हैं। बिल को असेंट देना, बिल को रिजेक्ट

[01:04:57] करना, बिल को रिकंसीडरेशन के लिए वापस

[01:05:00] भेजना। गौर करने वाली बात यह है कि मनी

[01:05:02] बिल्स के मामले में रिकंसीडरेशन का स्कोप

[01:05:04] लिमिटेड है और फाइनल डिसीजन बेसिकली

[01:05:06] लोकसभा के हाथों में होता है। इसके बाद

[01:05:09] आते हैं फाइनेंसियल पावर्स और अकाउंट से

[01:05:11] जुड़े आर्टिकल्स जो पार्लियामेंट के

[01:05:13] बजेटरी और एक्सपेंडिचर कंट्रोल का

[01:05:15] फ्रेमवर्क डिफाइन करते हैं। नेक्स्ट है

[01:05:17] आर्टिकल 112 एनुअल फाइनेंसियल स्टेटमेंट।

[01:05:20] यह आर्टिकल एनुअल बजट के फ्रेमवर्क को

[01:05:23] डिफाइन करता है। हर साल प्रेसिडेंट ऑफ

[01:05:25] इंडिया पार्लियामेंट में बजट प्रेजेंट

[01:05:27] करते हैं। जिसमें गवर्नमेंट के

[01:05:28] एक्सपेक्टेड रेवेन्यूस और एक्सपेंडिचर का

[01:05:31] ओवरव्यू होता है। नेक्स्ट इज आर्टिकल 113

[01:05:34] जो प्रोसीजर फॉर एप्रोप्रिएशन डिमांड्स के

[01:05:37] बारे में डिस्कस करता है। आर्टिकल 113

[01:05:40] कहता है कि बजट के डिमांड्स फॉर ग्रांट्स

[01:05:43] पर वोटिंग का अधिकार सिर्फ लोकसभा का होता

[01:05:46] है। लोकसभा ही डिसाइड करती है कि ग्रांट

[01:05:49] को अप्रूव करना है, रिजेक्ट करना है या

[01:05:52] फिर रिड्यूस करना है। राज्यसभा इन

[01:05:54] डिमांड्स पर डिस्कशन तो कर सकती है लेकिन

[01:05:57] वोट नहीं कर सकती। इसके अलावा कोई भी

[01:05:59] डिमांड तभी इंट्रोड्यूस की जा सकती है जब

[01:06:02] प्रेसिडेंट रेकमेंडेशन देते हैं। नेक्स्ट

[01:06:04] इज आर्टिकल 114 जो फंड्स के विथड्रॉल पर

[01:06:08] लिमिटेशंस की बात करता है। अकॉर्डिंग टू

[01:06:11] दिस गवर्नमेंट एप्रोप्रिएशन बिल पास होने

[01:06:13] से पहले कंसोलिडेटेड फंड से कोई पैसा

[01:06:16] विड्रॉल नहीं कर सकती। यह रूल एनश्योर

[01:06:19] करता है कि हर खर्चे पर पार्लियामेंट का

[01:06:21] पूरा कंट्रोल हो और गवर्नमेंट बिना

[01:06:23] अप्रूवल के एक भी यूज ना कर सके। अब आते

[01:06:27] हैं आर्टिकल 115 पर जो सप्लीमेंट्री

[01:06:30] ग्रांट्स के बारे में बात करता है। यानी

[01:06:32] कि अगर फाइनेंसियल इयर्स के बीच में

[01:06:35] गवर्नमेंट को एक्स्ट्रा फंड्स की जरूरत

[01:06:37] पड़ जाए तो इसके लिए प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया

[01:06:39] पार्लियामेंट के सामने सप्लीमेंट्री

[01:06:41] एडिशनल या एक्सेस ग्रांट्स का प्रोविजन

[01:06:43] रखते हैं। जिसका प्रोसीजर सेम एनुअल बजट

[01:06:46] के प्रोसीजर जैसा होता है। नेक्स्ट इज़

[01:06:48] आर्टिकल 116 जो वोट ऑन अकाउंट, वोट ऑफ

[01:06:52] क्रेडिट और एक्सेप्शनल ग्रांट्स को डिफाइन

[01:06:54] करता है। आइए समझते हैं इन्हें एक-एक

[01:06:57] करके। वोट ऑन अकाउंट बजट पास होने में अगर

[01:07:00] डिले हो जाए तो सरकार को रूटीन एक्सपेंसेस

[01:07:03] जैसे सैलरीज, बिल्स और डेली फंक्शनिंग के

[01:07:06] लिए टेंपरेरी पैसा चाहिए होता है। इस

[01:07:08] टेंपरेरी परमिशन को ही वोट ऑन अकाउंट कहते

[01:07:11] हैं। वोट ऑफ क्रेडिट। कोई भी इमरजेंसी

[01:07:14] जैसे वॉर या कोई बड़ी अनएक्सेक्टेड

[01:07:16] सिचुएशन जिसमें खर्च का एग्जैक्ट अमाउंट

[01:07:19] का एस्टीमेट नहीं बन पाता। ऐसे में

[01:07:21] पार्लियामेंट गवर्नमेंट को लसम पैसा यूज

[01:07:24] करने की परमिशन देती है। इसी परमिशन को

[01:07:26] वोट ऑफ क्रेडिट कहा जाता है। एक्सेप्शनल

[01:07:29] ग्रांट्स कोई भी स्पेशल काम जो नॉर्मल बजट

[01:07:32] का हिस्सा नहीं होता। पार्लियामेंट उसके

[01:07:34] लिए एक अलग से स्पेशल ग्रांट अप्रूव करती

[01:07:37] है जिसे एक्सेप्शनल ग्रांट कहा जाता है।

[01:07:40] इस सेक्शन का अगला आर्टिकल है आर्टिकल 117

[01:07:44] जो फाइनेंसियल बिल्स के बारे में डिस्कस

[01:07:45] करता है। अकॉर्डिंग टू दिस। यह मनी बिल से

[01:07:48] थोड़ा अलग है, लेकिन फिर भी फाइनेंसियल

[01:07:51] मैटर्स जैसे रेवेन्यू और एक्सपेंडिचर को

[01:07:53] कवर करता है। फाइनेंसियल मैटर्स जैसे

[01:07:55] टैक्स, बोरोइंग या कंसोलिडेटेड फंड से

[01:07:58] रिलेटेड बिल को इंट्रोड्यूस करने से पहले

[01:08:00] प्रेसिडेंट की परमिशन जरूरी होती है। और

[01:08:03] ध्यान रहे ऐसा बिल राज्यसभा में

[01:08:06] इंट्रोड्यूस नहीं हो सकता। सिर्फ लोकसभा

[01:08:08] ही इसे इंट्रोड्यूस कर सकती है। लेकिन अगर

[01:08:11] कोई अमेंडमेंट टैक्स कम करने या हटाने के

[01:08:14] लिए हो तो उसके लिए प्रेसिडेंट की

[01:08:15] रेमेंडेशन नहीं चाहिए होती। अब बात करते

[01:08:18] हैं आर्टिकल 118 के बारे में जो है रूल्स

[01:08:21] ऑफ प्रोसीजर। यह आर्टिकल कहता है कि दोनों

[01:08:24] हाउसेस अपने-अपने प्रोसीजर के रूल्स बना

[01:08:26] सकते हैं। लेकिन जॉइंट सिंग का प्रोसीजर

[01:08:29] प्रेसिडेंट, स्पीकर और चेयरमैन से

[01:08:31] कंसल्टेशन के बाद ही बनता है। और जॉइंट

[01:08:33] सिंग का प्रिसाइडिंग ऑफिसर स्पीकर होता

[01:08:36] है।

[01:08:37] नेक्स्ट इज आर्टिकल 119 जिसमें फाइनेंसियल

[01:08:41] प्रोसीजर्स के बारे में डिस्कस किया गया

[01:08:43] है। आर्टिकल 119 कहता है कि पार्लियामेंट

[01:08:46] फाइनेंसियल बिजनेस को टाइम पर कंप्लीट

[01:08:49] कराने के लिए एक लॉ बना सकती है। जिसमें

[01:08:52] दोनों हाउसेस के प्रोसीजर और फाइनेंसियल

[01:08:54] मैटर्स हैंडल करने के रूल्स डिसाइड किए गए

[01:08:56] हो। और अगर पार्लियामेंट का बनाया हुआ लॉ

[01:08:59] हाउस के पहले से बनाए रूल्स से

[01:09:01] कॉन्फ्लिक्ट करे तो पार्लियामेंट का लॉ ही

[01:09:04] फाइनल माना जाएगा। यानी लॉ हाउस के रूल्स

[01:09:07] पर प्रिवेल करेगा। नेक्स्ट है आर्टिकल

[01:09:09] 1120 जो पार्लियामेंट के अंदर यूज होने

[01:09:12] वाले लैंग्वेज के बारे में डिस्कस करता

[01:09:14] है। इस आर्टिकल के अकॉर्डिंग पार्लियामेंट

[01:09:17] के अंदर ऑफिशियल लैंग्वेज हिंदी या

[01:09:19] इंग्लिश हो सकती है। अगर कोई मेंबर हिंदी

[01:09:21] या इंग्लिश में बात नहीं कर सकता तो

[01:09:23] स्पीकर या चेयरमैन उसे मदर टंग में बोलने

[01:09:26] की परमिशन दे सकते हैं। अब हम डिस्कस

[01:09:29] करेंगे आर्टिकल 1121 एंड 112 जो

[01:09:33] पार्लियामेंट को प्रिविलेजेस और जुडिशरी

[01:09:35] को सेफगार्ड प्रोवाइड करते हैं। अकॉर्डिंग

[01:09:38] टू आर्टिकल 1121 हाई कोर्ट एंड सुप्रीम

[01:09:41] कोर्ट के जजेस के कंडक्ट पर पार्लियामेंट

[01:09:43] डिस्कशन नहीं कर सकती। यहां केवल

[01:09:45] इंपीचमेंट केस ही एक्सेप्शन है। यह

[01:09:48] प्रोविजन जुडिशरी की इंडिपेंडेंस को

[01:09:50] सेफगार्ड प्रोवाइड करता है। वहीं आर्टिकल

[01:09:53] 112 जुडिशियल नॉन इंटरफेरेंस के बारे में

[01:09:56] बात करता है। इसके अकॉर्डिंग कोर्ट्स

[01:09:59] पार्लियामेंट के प्रोसीडिंग्स को चैलेंज

[01:10:00] नहीं कर सकती। मतलब पार्लियामेंट के अंदर

[01:10:03] जो डिसीजंस और डिबेट्स होते हैं, वह

[01:10:06] जुडिशियल रिव्यू के अंडर नहीं आएंगे। यह

[01:10:09] आर्टिकल यह एनश्योर करता है कि लेजिसलेटिव

[01:10:11] प्रोसेस इंडिपेंडेंट और अनहिर्ड रहे। अब

[01:10:15] बात करते हैं आर्टिकल 1123 के बारे में जो

[01:10:18] प्रेसिडेंट की ऑर्डिनेंस मेकिंग पावर के

[01:10:20] बारे में बताता है। इसके अकॉर्डिंग जब

[01:10:22] पार्लियामेंट सेशन में नहीं हो और तुरंत

[01:10:24] लॉ की जरूरत हो तो प्रेसिडेंट ऑर्डिनेंस

[01:10:27] जारी कर सकते हैं। ऑर्डिनेंस टेंपरेरी लॉ

[01:10:30] होता है और एक्ट ऑफ पार्लियामेंट जैसी

[01:10:32] पावर रखता है। लेकिन अगर पार्लियामेंट

[01:10:35] सेशन में वापस आने के सिक्स वीक्स के बाद

[01:10:37] भी उस ऑर्डिनेंस को अप्रूव नहीं करती तो

[01:10:40] वो ऑर्डिनेंस ऑटोमेटिकली लैप्स हो जाता

[01:10:42] है। तो अभी हमने यूनियन एग्जीक्यूटिव और

[01:10:45] लेजिस्लेचर को डिस्कस किया और इसके बाद के

[01:10:47] आर्टिकल्स जुडिशरी से रिलेटेड हैं जिनको

[01:10:50] हम अलग एक सेक्शन में देखेंगे। आर्टिकल

[01:10:52] 152 जो स्टेट को डिफाइन करता है। इसके बाद

[01:10:57] आर्टिकल 153 गवर्नर ऑफ द स्टेट से डील

[01:11:00] करता है। इस आर्टिकल के अकॉर्डिंग हर

[01:11:03] स्टेट का एक गवर्नर होगा जो स्टेट का

[01:11:06] एग्जीक्यूटिव हेड होगा। बिल्कुल वैसे ही

[01:11:08] जैसे सेंटर के लिए प्रेसिडेंट है। यह

[01:11:11] आर्टिकल स्टेट की एग्जीक्यूटिव और

[01:11:13] लेजिसलेटिव फ्रेमवर्क का बेसिक स्ट्रक्चर

[01:11:15] डिफाइन करता है। आगे बढ़ते हुए अब हम

[01:11:18] गवर्नर के पावर्स और स्टेट काउंसिल

[01:11:20] ऑफिस्टर्स को समझने की कोशिश करेंगे ताकि

[01:11:23] हमें क्लियर पिक्चर मिले कि स्टेट

[01:11:25] गवर्नेंस कैसे ऑपरेट करती है। इसमें सबसे

[01:11:28] पहले है आर्टिकल 154 जो एग्जीक्यूटिव पावर

[01:11:32] से डील करता है। इसके अकॉर्डिंग स्टेट की

[01:11:36] सारी एग्जीक्यूटिव पावर गवर्नर के पास

[01:11:38] होती है। आर्टिकल 155 के अकॉर्डिंग गवर्नर

[01:11:41] की अपॉइंटमेंट प्रेसिडेंट के द्वारा की

[01:11:43] जाती है। क्योंकि गवर्नर स्टेट में सेंटर

[01:11:46] के रिप्रेजेंटेटिव के रूप में काम करता

[01:11:48] है। नेक्स्ट इज़ आर्टिकल 156 जो यह कहता है

[01:11:53] कि गवर्नर का टर्म 5 साल का होता है।

[01:11:56] लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है

[01:11:58] कि असल में गवर्नर प्रेसिडेंट के

[01:12:00] डिस्क्रीशन पे अपने पोस्ट को कंटिन्यू

[01:12:02] करते हैं। इसका मतलब है कि जरूरत पड़ने पर

[01:12:05] उन्हें टर्म के पहले भी रिमूव किया जा

[01:12:07] सकता है। इसके बाद है आर्टिकल 157 जिसमें

[01:12:11] गवर्नर के एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया को

[01:12:13] मेंशन किया गया है। जैसे गवर्नर बनने के

[01:12:16] लिए भारत का सिटीजन होना जरूरी है और

[01:12:19] मिनिमम एज 35 साल होनी चाहिए। वहीं

[01:12:22] आर्टिकल 158 इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन में

[01:12:25] गवर्नर के पद के कंडीशंस को डिफाइन करता

[01:12:27] है। इसके मुताबिक गवर्नर पार्लियामेंट या

[01:12:30] स्टेट लेजिस्लेचर का मेंबर नहीं हो सकता।

[01:12:33] अगर वह किसी हाउस या स्टेट लेजिस्लेचर का

[01:12:35] मेंबर रहते हुए गवर्नर अपॉइंट हो जाए तो

[01:12:38] उनकी हाउस या लेजिस्लेचर वाली सीट

[01:12:41] ऑटोमेटिकली वेकेंट हो जाती है। गवर्नर कोई

[01:12:44] भी ऑफिस ऑफ प्रॉफिट होल्ड नहीं कर सकते।

[01:12:47] गवर्नर को फ्री ऑफिशियल रेजिडेंस और

[01:12:49] पार्लियामेंट के डिसाइड किए गए अलाउसेस

[01:12:51] मिलते हैं। उनके इमॉलमेंट्स और अलाउसेस

[01:12:54] उनके टेन्योर के दौरान कम नहीं किए जा

[01:12:57] सकते। नेक्स्ट है आर्टिकल 159 जो यह कहता

[01:13:00] है कि गवर्नर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के

[01:13:03] सामने ओथ लेते हैं कि कॉन्स्टिट्यूशन को

[01:13:07] प्रिजर्व, प्रोटेक्ट एंड डिफेंड करेंगे।

[01:13:09] स्टेट के लोगों की सर्विस और वेल बीइंग के

[01:13:12] लिए काम करेंगे। वहीं आर्टिकल 1160 का

[01:13:15] कहना है कि अगर गवर्नर की पोस्ट

[01:13:17] टेंपरेरीली वेकेंट हो जाए या सिचुएशन

[01:13:20] अनयूजुअल हो तो ऐसे में प्रेसिडेंट डिसाइड

[01:13:23] करते हैं कि गवर्नर के फंक्शनंस कौन

[01:13:25] परफॉर्म करेगा। अगला आर्टिकल है आर्टिकल

[01:13:28] 161 जो गवर्नर के पार्डनिंग पावर्स के

[01:13:30] बारे में बात करता है। जैसे सेंटर में

[01:13:32] प्रेसिडेंट के पास पार्डनिंग पावर होती है

[01:13:35] वैसे ही गवर्नर के पास भी पार्डनिंग पावर

[01:13:37] होते हैं जो स्टेट के अंदर डेथ पेनल्टी,

[01:13:39] लाइफ इंप्रज़मेंट या अन्य केसेस में लागू

[01:13:42] होती है। नेक्स्ट इज़ आर्टिकल 163 जो यह

[01:13:46] कहता है कि गवर्नर को एडवाइस देने के लिए

[01:13:49] स्टेट में काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स होती है

[01:13:51] जिसका हेड चीफ मिनिस्टर होता है। डे टू डे

[01:13:53] गवर्नेंस की रियल पावर चीफ मिनिस्टर और

[01:13:55] उनके मिनिस्टर्स के पास होती है। जबकि

[01:13:57] गवर्नर सिर्फ फॉर्मल हेड होते हैं। अब बात

[01:14:00] करते हैं आर्टिकल 1164 की जिसके अकॉर्डिंग

[01:14:03] बाकीर्स को भी चीफ मिनिस्टर की सलाह पर

[01:14:05] गवर्नर अपॉइंट करते हैं। काउंसिल ऑफ

[01:14:07] मिनिस्टर्स कलेक्टिवली लेजिसलेटिव असेंबली

[01:14:09] के सामने अकाउंटेबल होते हैं और

[01:14:11] मिनिस्टर्स एक टीम के रूप में असेंबली के

[01:14:14] सामने अकाउंटेबल होते हैं ना कि

[01:14:15] इंडिविजुअली। अब आते हैं हम आर्टिकल्स 166

[01:14:18] एंड 167 पर जिसमें आर्टिकल 166 कहता है कि

[01:14:22] स्टेट के सारे एग्जीक्यूटिव एकशंस गवर्नर

[01:14:25] के नाम से ही किए जाने चाहिए। वहीं

[01:14:27] आर्टिकल 167 कहता है कि यह स्टेट के चीफ

[01:14:30] मिनिस्टर की ड्यूटी है कि वो रेगुलरली

[01:14:32] गवर्नर को स्टेट के अफेयर्स और फंक्शनिंग

[01:14:35] के बारे में इनफॉर्म करें। आर्टिकल 165 को

[01:14:37] अब हम सेपरेटली डिस्कस करेंगे क्योंकि

[01:14:39] इसमें एडवोकेट जनरल ऑफ द स्टेट की बात की

[01:14:42] गई है। इसके अकॉर्डिंग गवर्नर एक पर्सन

[01:14:44] अपॉइंट करते हैं जो हाई कोर्ट के जज बनने

[01:14:47] की एलिजिबिलिटी रखते हो। इस पर्सन का काम

[01:14:49] होता है स्टेट गवर्नमेंट को लीगल मैटर्स

[01:14:51] पर एडवाइस देना। इसे ही कॉन्स्टिट्यूशन

[01:14:53] में एडवोकेट जनरल ऑफ द स्टेट कहा गया है।

[01:14:55] इसके बाद अगले जिस सेक्शन के आर्टिकल्स को

[01:14:59] हम डिस्कस करने वाले हैं वो है स्टेट

[01:15:00] लेजिस्लेचर। इसकी स्टार्टिंग होती है

[01:15:02] आर्टिकल 168 से जो यह कहता है कि हर स्टेट

[01:15:05] में एक लेजिस्लेचर होती है जो गवर्नर और

[01:15:08] एक या दो हाउसेस से मिलकर बनती है क्योंकि

[01:15:11] कुछ स्टेट्स में बाईकमरल सिस्टम है यानी

[01:15:13] लेजिसलेटिव असेंबली के साथ लेजिसलेटिव

[01:15:16] काउंसिल भी होती है। वहीं कुछ स्टेट्स

[01:15:18] यूनिकमरल होते हैं। जहां सिर्फ लेजिसलेटिव

[01:15:20] असेंबली ही होती है। अगला आर्टिकल 169

[01:15:23] कहता है कि स्टेट के पास अथॉरिटी है

[01:15:26] लेजिसलेटिव काउंसिल बनाने या खत्म करने

[01:15:28] की। इसके लिए स्टेट असेंबली में स्पेशल

[01:15:30] मेजॉरिटी से रेजोल्यूशन पास करना जरूरी

[01:15:32] होता है। इसके बाद अब हम जानेंगे स्टेट

[01:15:35] लेजिस्लेचर या विधानसभा के स्ट्रक्चर और

[01:15:37] फंक्शनिंग के बारे में। इसमें सबसे पहले

[01:15:39] आता है आर्टिकल 170 जिसके अकॉर्डिंग

[01:15:42] असेंबली के मेंबर्स डायरेक्टली पब्लिक

[01:15:44] द्वारा इए जाते हैं और हर

[01:15:46] कॉन्स्टिट्यूएंसी से एक मेंबर चुना जाता

[01:15:48] है। वहीं आर्टिकल 172 बताता है कि

[01:15:51] विधानसभा का टर्म 5 साल का होगा। नेक्स्ट

[01:15:53] है आर्टिकल 173 जो कहता है कि असेंबली के

[01:15:56] मेंबर्स की एज मिनिमम 25 साल होनी चाहिए

[01:15:59] और वह इंडियन सिटीजन होने चाहिए। विधानसभा

[01:16:02] के बाद अब एक नजर डालते हैं विधान परिषद

[01:16:04] या लेजिसलेटिव काउंसिल के ऊपर। अकॉर्डिंग

[01:16:06] टू आर्टिकल 171 स्टेट लेजिसलेटिव काउंसिल

[01:16:08] के मेंबर्स अलग-अलग बैकग्राउंड से आते हैं

[01:16:11] ताकि हर सेक्शन का रिप्रेजेंटेशन हो। कुछ

[01:16:13] मेंबर्स, लोकल बॉडीज जैसे जिला परिषद और

[01:16:15] म्युनिसिपालिटीज़ द्वारा इए जाते हैं। वहीं

[01:16:18] दूसरी तरफ कुछ टीचर्स और ग्रेजुएट्स अपने

[01:16:20] रिप्रेजेंटेटिव्स को चुनते हैं। इसके

[01:16:22] अलावा कुछ ऐसे मेंबर्स गवर्नर के द्वारा

[01:16:25] नॉमिनेट किए जाते हैं जो एजुकेशन, आर्ट,

[01:16:28] साइंस, सोशल सर्विस जैसे फील्ड्स में

[01:16:30] अनुभव रखते हैं। इस तरह काउंसिल में

[01:16:33] सोसाइटी के हर हिस्से का रिप्रेजेंटेशन

[01:16:35] पॉसिबल हो जाता है। यहां पर जो सबसे

[01:16:37] इंपॉर्टेंट बात है वो यह है कि विधान

[01:16:40] परिषद एक परमानेंट बॉडी है। यानी कि यह

[01:16:43] कभी डिसॉल्व नहीं होती। इसके मेंबर्स

[01:16:46] ग्रेजुअली रिटायर होते हैं और उनकी जगह नए

[01:16:48] मेंबर्स आते रहते हैं। अगला आर्टिकल है

[01:16:51] आर्टिकल 174 जो गवर्नर को यह अधिकार देता

[01:16:54] है कि वह स्टेट लेजिस्लेचर को समन कर सकता

[01:16:57] है। प्रोरो यानी सेशन समाप्त कर सकता है

[01:17:00] और उसे डिॉल्व भी कर सकता है। इसके साथ ही

[01:17:02] आर्टिकल 175 भी गवर्नर को यह अधिकार देता

[01:17:05] है कि वह असेंबली या दोनों हाउसेस को

[01:17:08] एड्रेस कर सकता है और अपना कोई भी मैसेज

[01:17:11] दोनों हाउसेस तक भेज सकता है। आर्टिकल 176

[01:17:13] कहता है कि गवर्नर को स्टेट लेजिस्लेचर को

[01:17:16] एक स्पेशल एड्रेस देना होता है। एक बार जब

[01:17:18] नई लेजिसलेटिव असेंबली चुनकर आती है और

[01:17:20] फिर हर साल के पहले सेशन की शुरुआत में।

[01:17:23] नेक्स्ट है आर्टिकल 177 जिसके अकॉर्डिंग

[01:17:26] मिनिस्टर्स और एडवोकेट जनरल को स्टेट

[01:17:28] लेजिस्लेचर के प्रोसीडिंग्स में बोलने और

[01:17:31] पार्टिसिपेट करने का अधिकार होता है। चाहे

[01:17:33] वो हाउस के मेंबर हो या ना हो। इस आर्टिकल

[01:17:36] का पर्पस यह है कि एग्जीक्यूटिव और

[01:17:38] लेजिस्लेचर के बीच एक कनेक्शन बना रहे

[01:17:40] ताकि मिनिस्टर्स और एडवोकेट जनरल सही

[01:17:42] इनफेशन दे सकें और पॉलिसीज को क्लेरिफाई

[01:17:45] कर सकें। लेकिन उन्हें वोटिंग का राइट तभी

[01:17:47] मिलता है जब वो लेजिस्लेचर के मेंबर हो।

[01:17:49] अगला आर्टिकल है आर्टिकल 178 जो कहता है

[01:17:53] कि हर स्टेट लेजिसलेटिव असेंबली अपने

[01:17:55] मेंबर्स में से एक स्पीकर और एक डेपुटी

[01:17:58] स्पीकर चुनेगी। अगर इन दोनों में से किसी

[01:18:00] की भी पोस्ट खाली हो जाए तो असेंबली को

[01:18:03] तुरंत किसी और मेंबर को चुनना होगा। यह

[01:18:05] दोनों प्रिसाइडिंग ऑफिसर्स असेंबली के

[01:18:07] स्मूथ फंक्शनिंग के लिए बहुत इंपॉर्टेंट

[01:18:09] होते हैं। यह डिसिप्लिन मेंटेन करते हैं

[01:18:11] और लेजिसलेटिव प्रोसीडिंग्स को गाइड करते

[01:18:14] हैं। अब बात अगर लेजिसलेटिव काउंसिल की हो

[01:18:16] तो आर्टिकल 182 कहता है हर स्टेट के

[01:18:18] लेजिसलेटिव काउंसिल में एक चेयरमैन और एक

[01:18:21] डेपुटी चेयरमैन का पद होगा जो उस काउंसिल

[01:18:24] के मेंबर्स में से चुने जाएंगे। वहीं

[01:18:26] आर्टिकल 183 बताता है कि लेजिसलेटिव

[01:18:28] काउंसिल के चेयरमैन और डेपुटी चेयरमैन

[01:18:31] वेकेशन, रेिग्नेशन या रिमूवल के केसेस में

[01:18:34] अपना पद कैसे छोड़ सकते हैं। असेंबली या

[01:18:36] काउंसिल में जब कोई मेंबर इ होकर आता है

[01:18:39] तो सबसे पहले वो आर्टिकल 188 के तहत शपथ

[01:18:42] लेता है। जिसमें वो अपने कॉन्स्टिट्यूशनल

[01:18:44] ड्यूटीज और कमिटमेंट्स को एक्सेप्ट करता

[01:18:45] है। कॉन्स्टिट्यूशन का अगला आर्टिकल यानी

[01:18:48] आर्टिकल 189 कहता है कि स्टेट लेजिस्लेचर

[01:18:51] में डिसीजंस हमेशा उन मेंबर्स के मेजॉरिटी

[01:18:54] वोट से लिए जाते हैं जो उस वक्त हाउस में

[01:18:56] प्रेजेंट और वोटिंग कर रहे होते हैं।

[01:18:59] स्पीकर या चेयरमैन नॉर्मली वोट नहीं करते।

[01:19:02] लेकिन अगर वोट्स बराबर हो जाए तो उनके पास

[01:19:04] कास्टिंग वोट होता है जिससे वह फाइनल

[01:19:07] डिसीजन लेते हैं। इस आर्टिकल का एक

[01:19:09] इंपॉर्टेंट हिस्सा यह भी है कि अगर हाउस

[01:19:11] की कुछ सीट्स वेकेंट हो जाए तो भी हाउस का

[01:19:14] काम रुकता नहीं। प्रोसीडिंग्स वैलिड ही

[01:19:16] रहती हैं। आर्टिकल 189 कोरम का भी रूल सेट

[01:19:19] करता है। कोरम का मतलब होता है मीटिंग

[01:19:21] चलाने के लिए मिनिमम रिक्वायर्ड मेंबर्स।

[01:19:24] यहां कोरम होता है 10 मेंबर्स या हाउस के

[01:19:27] टोटल मेंबर्स का वन 10थ जो भी ज्यादा हो।

[01:19:30] अगर किसी सेशन के दौरान कोरम पूरा नहीं

[01:19:33] होता तो स्पीकर या चेयरमैन को मीटिंग

[01:19:35] सस्पेंड या एड्जॉर्ड करनी पड़ती है। जब तक

[01:19:38] कोरम कंप्लीट ना हो। इन प्रोविजंस का मेन

[01:19:40] पर्पस यह है कि लेजिस्लेचर का काम

[01:19:42] ऑर्डरली, वैलिड और अन इंटरप्टेड तरीके से

[01:19:45] चल सके। इसके बाद आर्टिकल 191 यह कहता है

[01:19:49] कि कौन एलिजिबल है और कौन डिसक्वालीिफाइड

[01:19:52] ताकि मेंबर्स का सिलेक्शन और कंडक्ट में

[01:19:54] क्लेरिटी रहे और जब कभी कोई सीट खाली हो

[01:19:57] जाती है तो आर्टिकल 190 यह बताता है कि

[01:20:00] किस तरह प्रॉपर प्रोसीजर फॉलो करके उस सीट

[01:20:03] को फिल किया जा सकता है। इस तरह यह

[01:20:06] प्रोविजंस एनश्योर करते हैं कि लेजिसलेटिव

[01:20:08] प्रोसेस स्मूथ, अकाउंटेबल और ट्रांसपेरेंट

[01:20:11] रहे। इसके बाद है आर्टिकल 194। जो स्टेट

[01:20:15] लेजिस्लेचर्स को स्पेशल पावर्स और

[01:20:17] इम्यूनिटीज देता है। जैसे हाउस में फ्रीडम

[01:20:20] ऑफ स्पीच, पार्लियामेंट्री प्रोसीडिंग्स

[01:20:22] पर कोर्ट एक्शन से प्रोटेक्शन और मेंबर्स

[01:20:25] के लिए प्रिविलजेस ताकि लेजिस्लेचर अपने

[01:20:28] फंक्शनंस इंडिपेंडेंटली और इफेक्टिवली

[01:20:30] परफॉर्म कर सके। अब आते हैं हम उन

[01:20:32] आर्टिकल्स पर जो स्टेट लेजिस्लेचर के

[01:20:35] बिल्स से रिलेटेड है। सबसे पहले है

[01:20:37] आर्टिकल 196 जो ऑर्डिनरी बिल्स से रिलेटेड

[01:20:40] है। इसके अकॉर्डिंग बिल को किसी भी मेंबर

[01:20:43] या मिनिस्टर के द्वारा असेंबली या काउंसिल

[01:20:46] में प्रपोज किया जा सकता है। इसके बाद

[01:20:48] आर्टिकल 198 जिसके अकॉर्डिंग मनी बिल

[01:20:51] विधानसभा में प्रपोज किए जा सकते हैं।

[01:20:54] विधानसभा से पास होने के बाद मनी बिल को

[01:20:56] विधान परिषद भेजा जाता है। जहां उसके पास

[01:20:59] बस 14 दिन होते हैं। विधान परिषद मनी बिल

[01:21:02] पर सिर्फ सजेशंस दे सकता है। उसे रिजेक्ट

[01:21:05] नहीं कर सकता। नेक्स्ट इज आर्टिकल 199 जो

[01:21:08] मनी बिल को डिफाइन करता है। इसके

[01:21:11] अकॉर्डिंग मनी बिल वह होता है जो टैक्सेस,

[01:21:14] लोनस या राज्य के कंसोलिडेटेड फंड से पैसा

[01:21:17] निकालने या जमा करने से रिलेटेड है। जैसा

[01:21:20] कि अभी हमने देखा विधान परिषद के पास मनी

[01:21:23] बिल से रिलेटेड बहुत ही लिमिटेड पावर्स

[01:21:25] होते हैं। लेकिन बात अगर ऑर्डिनरी बिल की

[01:21:27] हो तो विधान परिषद इसे मैक्सिमम 4 महीने

[01:21:29] तक रोक या डिस्कस कर सकती है। बिल के

[01:21:32] दोनों हाउसेस में पास हो जाने के बाद उस

[01:21:34] पर गवर्नर की असेंट लेना इंपॉर्टेंट है।

[01:21:37] आर्टिकल 200 के तहत गवर्नर के पास किसी

[01:21:40] बिल पर तीन ऑप्शंस होते हैं। गिव असेंट

[01:21:43] बिल को अप्रूव कर दें। विद होल्ड असेंट

[01:21:46] बिल को रिजेक्ट कर दे। रिटर्न फॉर

[01:21:48] रिकंसीडरेशन। बिल को दोबारा कंसीडर करने

[01:21:51] के लिए लेजिस्लेचर को वापस भेज दे। यहां

[01:21:53] मनी बिल एक्सेप्शन है। अगर विधानसभा

[01:21:56] दोबारा बिल पास कर दे तो गवर्नर को सहमति

[01:21:59] देना जरूरी है। अब डालते हैं नजर

[01:22:00] फाइनेंसियल मैटर्स से रिलेटेड आर्टिकल्स

[01:22:02] पर। आर्टिकल 202 के अकॉर्डिंग हर साल

[01:22:07] गवर्नर लेजिस्लेचर के सामने एस्टीेटेड

[01:22:10] रिसीट्स एंड एक्सपेंडिचर्स का स्टेटमेंट

[01:22:12] रखते हैं। दूसरा यहां एक और टर्म आता है

[01:22:14] एप्रोप्रिएशन बिल। अकॉर्डिंग टू आर्टिकल

[01:22:17] 204 जब लेजिसलेटिव असेंबली आर्टिकल 203 के

[01:22:21] अंडर सारे ग्रांट्स अप्रूव कर देती है तो

[01:22:24] सरकार एक एप्रोप्रिएशन बिल इंट्रोड्यूस

[01:22:26] करती है। इस बिल का पर्पस होता है कि

[01:22:29] कंसोलिडेटेड फंड ऑफ द स्टेट से पैसा

[01:22:31] ऑफिशियली विथड्रॉ करने की परमिशन लेना। इस

[01:22:34] बिल में कोई भी ऐसी अमेंडमेंट अलाउ नहीं

[01:22:36] होती जो अमाउंट या उसके पर्पस को बदल दे

[01:22:39] और स्पीकर का डिसीजन ही फाइनल डिसीजन होता

[01:22:42] है। सबसे इंपॉर्टेंट बात एप्रोप्रिएशन बिल

[01:22:45] पास हुए बिना स्टेट गवर्नमेंट ₹1 भी

[01:22:47] कंसोलिडेटेड फंड से नहीं निकाल सकती। यह

[01:22:50] एनश्योर करता है कि फाइनेंसियल कंट्रोल

[01:22:52] लेजिस्लेचर के पास रहे। इसके बाद आर्टिकल

[01:22:55] 205 सप्लीमेंट्री ग्रांट्स और आर्टिकल 206

[01:23:00] वोट ऑन अकाउंट, वोट ऑफ क्रेडिट और

[01:23:01] एक्सेप्शनल ग्रांट्स को डिस्क्राइब करते

[01:23:04] हैं। जिन्हें हम ऑलरेडी पहले ही समझ चुके

[01:23:06] हैं। अगले जिन आर्टिकल्स की हम बात करेंगे

[01:23:08] वो है आर्टिकल 208 जिसके अकॉर्डिंग राज्य

[01:23:11] की विधानसभा और विधान परिषद अपनी प्रोसीजर

[01:23:14] खुद डिसाइड करती है और अपनी प्रोसीडिंग्स

[01:23:17] का मैनेजमेंट भी खुद ही करती है। वहीं

[01:23:19] आर्टिकल 21 यह बताता है कि स्टेट

[01:23:21] लेजिस्लेचर में प्रोसीडिंग्स या तो उस

[01:23:24] स्टेट की ऑफिशियल लैंग्वेज में होगी या

[01:23:26] फिर हिंदी में होगी या इंग्लिश में होगी।

[01:23:29] लेकिन अगर कोई मेंबर इन तीनों में

[01:23:31] एक्सप्रेस नहीं कर सकते तो स्पीकर उसे

[01:23:34] अपनी मदद टंग यूज़ करने की परमिशन दे सकते

[01:23:36] हैं। इसके बाद सेम सेंटर की तरह अकॉर्डिंग

[01:23:39] टू आर्टिकल 211 स्टेट लेजिस्लेचर जजेस के

[01:23:42] कंडक्ट पर डिस्कशन नहीं कर सकती। और

[01:23:44] अकॉर्डिंग टू आर्टिकल 212 कोर्ट

[01:23:47] लेजिस्लेचर के इंटरनल प्रोसीजर को चैलेंज

[01:23:49] नहीं कर सकती। नेक्स्ट हम आते हैं आर्टिकल

[01:23:51] 213 पर। गवर्नर के ऑर्डिनेंस पावर के बारे

[01:23:54] में बात करते हैं। इस आर्टिकल के

[01:23:56] अकॉर्डिंग जब लेजिस्लेचर सेशन में नहीं हो

[01:23:58] और उसी वक्त किसी लॉ की जरूरत हो तो

[01:24:01] गवर्नर ऑर्डिनेंस इशू कर सकते हैं।

[01:24:04] ऑर्डिनेंस एक टेंपरेरी लॉ के रूप में काम

[01:24:06] करता है। लेकिन बाद में लेजिस्लेचर के

[01:24:08] सेशन के शुरू होने के छ हफ्तों के अंदर

[01:24:11] ऑर्डिनेंस को पास करना इंपॉर्टेंट है। अगर

[01:24:14] ऐसा नहीं हुआ तो ऐसे में ऑर्डिनेंस

[01:24:16] ऑटोमेटिकली लैप्स हो जाता है। दोस्तों अब

[01:24:19] हम देखेंगे कॉन्स्टिट्यूशन के पार्ट सिक्स

[01:24:21] ए और पार्ट सेवन को जो जुडिशरी से रिलेटेड

[01:24:24] है। सुप्रीम कोर्ट आर्टिकल 124 टू 151

[01:24:28] आर्टिकल 124 इंडिया का सुप्रीम कोर्ट

[01:24:31] एस्टैब्लिश करता है। इसमें चीफ जस्टिस और

[01:24:33] मैक्सिमम 34 जजेस की अपॉइंटमेंट हो सकती

[01:24:36] है। जजेस को प्रेसिडेंट अपॉइंट करते हैं

[01:24:39] और वो मैक्सिमम 65 इयर्स की एज तक सर्व

[01:24:42] करते हैं। रिटायरमेंट से पहले जजेस को

[01:24:45] पोस्ट से हटाने के दो तरीके हैं। पहला है

[01:24:48] रेिग्नेशन और दूसरा है इंपीचमेंट।

[01:24:51] आर्टिकल वन टू फाइव जजेस की सैलरी,

[01:24:53] अलाउंसेस और पेंशन रेगुलेट करता है। इससे

[01:24:56] जुडिशरी का फाइनेंसियल इंडिपेंडेंस भी

[01:24:58] प्रोटेक्ट होता है। नेक्स्ट आर्टिकल है

[01:25:00] आर्टिकल वन टू सिक्स। अकॉर्डिंग टू दिस

[01:25:02] अगर सीजेआई की सीट टेंपरेरीली खाली हो या

[01:25:05] सीजेआई अवेलेबल ना हो तो प्रेसिडेंट किसी

[01:25:08] सीनियर जज को एक्टिंग सीजेआई बना सकते

[01:25:11] हैं। व आर्टिकल 127 एडहॉक जजेस के बारे

[01:25:14] में बात करता है। अगर सुप्रीम कोर्ट में

[01:25:16] जजेस की कमी हो जाए और कोरम कंप्लीट ना हो

[01:25:19] तो प्रेसिडेंट सीजेआई की रिक्वेस्ट पर

[01:25:22] किसी हाई कोर्ट जज को टेंपरेरीली या ऐडक

[01:25:25] जज बना सकते हैं। इसके अलावा आर्टिकल 128

[01:25:28] के अकॉर्डिंग प्रेसिडेंट किसी रिटायर्ड

[01:25:30] सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट जज को सुप्रीम

[01:25:32] कोर्ट में टेंपरेरीली बैठने और केसेस

[01:25:35] सुनने के लिए बुलवा सकते हैं। बस जज की

[01:25:38] कंसेंट जरूरी है। नेक्स्ट इज आर्टिकल वन

[01:25:40] टू न जो सुप्रीम कोर्ट को कोर्ट ऑफ

[01:25:42] रिकॉर्ड डिक्लेअ करता है। इसका मतलब है कि

[01:25:45] सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट्स और ऑर्डर्स

[01:25:48] प्रेसिडेंट के रूप में काम करते हैं और

[01:25:50] कोर्ट के रिकॉर्ड्स लीगली वैलिड और

[01:25:52] ऑथेंटिक होते हैं। अब हम बात करेंगे उन

[01:25:54] आर्टिकल्स के बारे में जो सुप्रीम कोर्ट

[01:25:56] की जुरिसडिक्शन और पावर्स के बारे में।

[01:25:58] आर्टिकल 131 जो यह कहता है कि सुप्रीम

[01:26:01] कोर्ट को डायरेक्टली डिस्प्यूट्स सुनने का

[01:26:03] अधिकार है। फिर चाहे वो सेंटर वर्सेस

[01:26:06] स्टेट्स का हो या फिर स्टेट्स वर्सेस

[01:26:08] स्टेट्स का। मतलब अगर कॉन्स्टिट्यूशनल या

[01:26:10] लीगल कॉन्फ्लिक्ट होता है तो केस सीधा

[01:26:13] सुप्रीम कोर्ट में ही जाएगा। इस सेक्शन का

[01:26:15] अगला आर्टिकल है आर्टिकल 132 जिसके

[01:26:17] अकॉर्डिंग अगर हाईकोर्ट का कोई डिसीजन

[01:26:19] कॉन्स्टिट्यूशनल इशू से रिलेटेड हो तो

[01:26:21] उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा

[01:26:24] सकती है। नेक्स्ट है आर्टिकल 133 जो बात

[01:26:27] करता है सिविल मैटर्स में अपील के बारे

[01:26:29] में यह कहता है कि अगर सिविल केस में कोई

[01:26:32] इंपॉर्टेंट क्वेश्चन ऑफ लॉ हो तो सुप्रीम

[01:26:34] कोर्ट उस अपील को सुन सकता है। वहीं

[01:26:36] आर्टिकल 134 क्रिमिनल मैटर्स में अपील से

[01:26:39] रिलेटेड बात करता है। अकॉर्डिंग टू दिस

[01:26:41] हाई कोर्ट के क्रिमिनल केसेस के डिसीजंस

[01:26:43] के खिलाफ अपील सुप्रीम कोर्ट में की जा

[01:26:45] सकती है। अब हम जिस आर्टिकल के बारे में

[01:26:47] जानेंगे वह है आर्टिकल 136 जो यह कहता है

[01:26:50] कि सुप्रीम कोर्ट के पास एक एक्सेप्शनल

[01:26:53] डिस्क्रेशनरी पावर है जिसके अकॉर्डिंग

[01:26:55] सुप्रीम कोर्ट किसी भी कोर्ट या ट्राइबनल

[01:26:58] के जजमेंट, डिग्री, सेंटेंस या ऑर्डर के

[01:27:01] खिलाफ स्पेशल लीव देकर अपील सुन सकती है।

[01:27:04] यह पावर ऑर्डिनरी अपील का राइट नहीं है।

[01:27:06] ये सिर्फ एक एक्स्ट्राऑर्डिनरी रूट है

[01:27:08] जिसमें सुप्रीम कोर्ट स्वयं डिसाइड करता

[01:27:10] है कि मैटर सुनना है या नहीं। इसके अलावा

[01:27:13] अंडर द आर्टिकल 137 सुप्रीम कोर्ट को यह

[01:27:16] अधिकार भी है कि वो अपने जजमेंट्स और

[01:27:19] ऑर्डर्स का रिव्यू कर सकता है। यह रिव्यू

[01:27:21] कुछ ग्राउंड्स पर ही पॉसिबल होता है। जैसे

[01:27:24] कोई क्लियर एरर हो, कोई इंपॉर्टेंट बात

[01:27:27] कोर्ट के सामने ना आ पाई हो या जस्टिस

[01:27:30] मिसकैरी हो गया हो। अगले जिस आर्टिकल के

[01:27:32] बारे में हम चर्चा करने वाले हैं वो

[01:27:34] सुप्रीम कोर्ट की पावर को कंप्लीट जस्टिस

[01:27:36] की ओर ले जाता है और वो है आर्टिकल 142 जो

[01:27:40] सुप्रीम कोर्ट को अथॉरिटी देता है कि वो

[01:27:43] किसी भी केस में कंप्लीट जस्टिस के लिए

[01:27:46] कोई भी आवश्यक ऑर्डर दे सकती है। कोर्ट के

[01:27:49] ऐसे ऑर्डर्स पूरे भारत में लागू होते हैं।

[01:27:51] इसमें डिक्रीज की इनफोर्समेंट, एविडेंस

[01:27:54] प्रोडक्शन के लिए डायरेक्शंस और एक्स्ट्रा

[01:27:57] ऑर्डिनरी रेमेडीज सब शामिल हो सकती हैं।

[01:27:59] नेक्स्ट आर्टिकल इज आर्टिकल 143 जो ये

[01:28:02] कहता है कि प्रेसिडेंट किसी भी इंपॉर्टेंट

[01:28:05] क्वेश्चन ऑफ लॉ और फैक्ट जो पब्लिकेंस का

[01:28:08] हो सुप्रीम कोर्ट को रेफर कर सकते हैं।

[01:28:11] सुप्रीम कोर्ट इस पर अपनी एडवाइज़री

[01:28:13] ओपिनियन देती है। हालांकि यह ओपिनियन

[01:28:16] बाइंडिंग नहीं होती लेकिन बहुत ऑथोरिटेटिव

[01:28:18] मानी जाती है। आर्टिकल 144 इस आर्टिकल के

[01:28:22] मुताबिक भारत की सभी सिविल और जुडिशियल

[01:28:25] अथॉरिटीज सुप्रीम कोर्ट की फंक्शनिंग में

[01:28:28] एड यानी मदद करने को बाध्य होती हैं। अगला

[01:28:31] आर्टिकल है आर्टिकल 145 जिसके अकॉर्डिंग

[01:28:34] सुप्रीम कोर्ट अपने प्रैक्टिस और प्रोसीजर

[01:28:36] के रूल्स खुद बनाती है। इनमें शामिल होता

[01:28:39] है अपील्स का फॉर्मेट, रिव्यू पिटीशन,

[01:28:42] चेंबर हियरिंग्स, बेंचेस का गठन,

[01:28:45] एविडेंसेस के नॉर्म्स और इंटरनल

[01:28:47] फंक्शनिंग। यह रूल्स चीफ जस्टिस और जजेस

[01:28:50] के अप्रूवल से ही बनते हैं। इसके साथ ही

[01:28:52] आर्टिकल 146 के अकॉर्डिंग सुप्रीम कोर्ट

[01:28:54] के स्टाफ की अपॉइंटमेंट, उनकी सर्विस

[01:28:56] कंडीशंस, सैलरीज और अलाउंसेस चीफ जस्टिस

[01:28:59] के कंट्रोल में होती हैं। कोर्ट का सारा

[01:29:01] एक्सपेंडिचर कंसोलिडेटेड फंड ऑफ इंडिया से

[01:29:04] दिया जाता है। चलिए इसके बाद अब बढ़ते हैं

[01:29:06] सीएजी यानी कॉनंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल की

[01:29:10] ओर। जिसमें सबसे पहला आर्टिकल है आर्टिकल

[01:29:12] 148 अकॉर्डिंग टू दिस भारत में एक

[01:29:15] कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया सीएजी

[01:29:18] होंगे जो पूरे देश के फाइनेंशियल

[01:29:21] एडमिनिस्ट्रेशन का सबसे बड़ा ऑडिटिंग

[01:29:24] अथॉरिटी होंगे। रोल एंड अथॉरिटी सीएजी

[01:29:27] सरकार के सारे खर्चों और अकाउंट्स पर नजर

[01:29:29] रखने वाली सुप्रीम अथॉरिटी के रूप में काम

[01:29:32] करेंगे। यह एनश्योर करेंगे कि पब्लिक

[01:29:34] फंड्स का सही और ट्रांसपेरेंट यूज़ हो।

[01:29:36] अपॉइंटमेंट एंड टेन्योर सीएजी प्रेसिडेंट

[01:29:39] ऑफ इंडिया के द्वारा अपॉइंट किए जाएंगे।

[01:29:41] सीएजी की सैलरी और सर्विस कंडीशंस लॉ

[01:29:44] द्वारा डिसाइड होती है और इनमें कोई भी

[01:29:47] ऐसा चेंज नहीं किया जा सकता जो सीएजी के

[01:29:49] टेन्योर को डिसएडवांटेज में डाले। सीएजी

[01:29:52] को रिमूव सिर्फ वही प्रोसीजर फॉलो करके

[01:29:54] किया जा सकता है जो सुप्रीम कोर्ट के जज

[01:29:56] के रिमूवल के लिए होता है। यह प्रोविजन

[01:29:59] सीएजी की कंप्लीट इंडिपेंडेंस को इंश्योर

[01:30:01] करता है। नेक्स्ट है ड्यूटीज एंड पावर्स

[01:30:04] ऑफ सीएजी जो आर्टिकल 149 में दी गई है। इस

[01:30:07] आर्टिकल के तहत सीएजी की मेन

[01:30:09] रिस्पांसिबिलिटीज हैं यूनियन और स्टेट्स

[01:30:11] के अकाउंट्स की ऑडिट्स। गवर्नमेंट के

[01:30:13] द्वारा चलाए गए फंड्स, स्कीम्स, ग्रांट्स

[01:30:15] की ऑडिट, पब्लिक मनी का प्रॉपर यूज़। किसी

[01:30:18] पब्लिक अथॉरिटी, कॉरपोरेशन या बॉडी जिसे

[01:30:20] गवर्नमेंट ने फाइनेंस दिया हो, उसकी ऑडिट,

[01:30:23] गवर्नमेंट के रिसीट्स और एक्सपेंडिचर का

[01:30:25] सही रिकॉर्ड मेंटेन करवाना। अगला आर्टिकल

[01:30:27] है आर्टिकल 150 जो कहता है कि यूनियन और

[01:30:31] स्टेट्स के अकाउंट्स किस फॉर्म में बनाए

[01:30:33] जाएंगे। यह प्रेसिडेंट डिसाइड करेंगे।

[01:30:34] प्रेसिडेंट यह फॉर्म सीएजी की एडवाइस के

[01:30:37] साथ फाइनलाइज करते हैं। वहीं आर्टिकल 151

[01:30:40] ऑडिट रिपोर्ट्स के बारे में बात करते हुए

[01:30:42] कहता है कि यूनियन की ऑडिट रिपोर्ट्स

[01:30:44] प्रेसिडेंट को सबमिट की जाती है और फिर

[01:30:47] प्रेसिडेंट उन्हें पार्लियामेंट के सामने

[01:30:48] टेबल करते हैं। स्टेट की ऑडिट रिपोर्ट्स

[01:30:51] गवर्नर को दी जाती है और गवर्नर उन्हें

[01:30:53] स्टेट लेजिस्लेचर के सामने रखते हैं। यह

[01:30:55] प्रोविजन इंश्योर करते हैं कि गवर्नमेंट

[01:30:57] का फाइनल फंक्शनिंग पब्लिक अकाउंटेबिलिटी

[01:31:00] के अंदर आए। अब सुप्रीम कोर्ट और सीएजी के

[01:31:03] बाद हम बात करेंगे स्टेट जुडिशरी की। यहां

[01:31:06] हाई कोर्ट्स और लोअर कोर्ट्स का स्ट्रक्चर

[01:31:08] समझना जरूरी है। ताकि हम देख सकें कि

[01:31:11] जुडिशरी सेंट्रल और स्टेट लेवल पर कैसे

[01:31:13] फंक्शन करती है और कैसे कानून और जस्टिस

[01:31:16] का इंप्लीमेंटेशन हर स्टेट में एनश्योर

[01:31:18] होता है। हाई कोर्ट्स आर्टिकल 214 कहता है

[01:31:22] कि भारत के हर राज्य के लिए एक हाई कोर्ट

[01:31:24] होगा। यह स्टेट लेवल जुडिशरी का सबसे ऊपर

[01:31:27] का कोर्ट होगा। अकॉर्डिंग टू आर्टिकल 231

[01:31:30] पार्लियामेंट चाहे तो दो या ज्यादा

[01:31:32] राज्यों के लिए या किसी राज्य और यूनियन

[01:31:35] टेरिटरी के लिए कॉमन हाई कोर्ट बना सकती

[01:31:37] है। वहीं आर्टिकल 215 का कहना है कि

[01:31:40] हाईकोर्ट को भी सुप्रीम कोर्ट की तरह

[01:31:42] कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड का दर्जा दिया गया है।

[01:31:45] इसका मतलब है इनके डिसीजंस प्रेसिडेंट

[01:31:48] बनेंगे और इनके पास कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट की

[01:31:51] पावर भी होगी। नेक्स्ट आर्टिकल है आर्टिकल

[01:31:53] 216 जिसमें बताया गया है कि हाई कोर्ट में

[01:31:57] एक चीफ जस्टिस और इतने अन्य जजेस होंगे

[01:32:00] जितने कि प्रेसिडेंट जरूरी समझे। इससे हाई

[01:32:02] कोर्ट की जज स्ट्रेंथ को वर्क लोड के

[01:32:04] हिसाब से बढ़ाने या कम करने की

[01:32:06] फ्लेक्सिबिलिटी मिलती है। यह प्रोविजंस

[01:32:08] एनश्योर करते हैं कि स्टेट जुडिशरी का

[01:32:10] फ्रेमवर्क सुप्रीम कोर्ट के मॉडल से

[01:32:12] अलाइंड रहे और हाई कोर्ट्स का रोल और

[01:32:15] पावर्स भी क्लियरली डिफाइंड हो। इसके बाद

[01:32:18] हम चर्चा करेंगे उन आर्टिकल्स की जो हाई

[01:32:20] कोर्ट जजेस के अपॉइंटमेंट्स,

[01:32:22] क्वालिफिकेशंस और ओथ के बारे में बात करते

[01:32:24] हैं। इसकी शुरुआत होती है आर्टिकल 217 से।

[01:32:29] आर्टिकल 217 बताता है कि हाई कोर्ट के

[01:32:31] जजेस की अपॉइंटमेंट और उनकी सर्विस

[01:32:33] कंडीशंस का फ्रेमवर्क क्या होगा। इसी

[01:32:36] आर्टिकल के अकॉर्डिंग हाई कोर्ट के जजेस

[01:32:38] की अपॉइंटमेंट प्रेसिडेंट करते हैं।

[01:32:40] अपॉइंटमेंट के लिए प्रेसिडेंट को चीफ

[01:32:42] जस्टिस ऑफ इंडिया, स्टेट गवर्नर और उस हाई

[01:32:45] कोर्ट के चीफ जस्टिस से चर्चा करनी होती

[01:32:47] है। इसी आर्टिकल के अकॉर्डिंग हाई कोर्ट

[01:32:49] जजेस की रिटायरमेंट एज 62 साल की होती है।

[01:32:53] यह आर्टिकल जुडिशियल अपॉइंटमेंट्स में

[01:32:55] ट्रांसपेरेंसी और मल्टीपल लेवल कंसल्टेशन

[01:32:57] एनश्योर करता है। नेक्स्ट आर्टिकल है

[01:33:00] आर्टिकल 219 जो हाईकोर्ट के जजेस के ओथ

[01:33:04] लेने की प्रक्रिया बताता है। जजेस को अपना

[01:33:07] पद ग्रहण करने से पहले ओथ लेना होता है।

[01:33:11] जिसमें वह संविधान की रक्षा और अपने

[01:33:13] कर्तव्य ईमानदारी से निभाने का वचन देते

[01:33:16] हैं। वहीं आर्टिकल 220 एक इंपॉर्टेंट

[01:33:20] रेस्ट्रिक्शन लगाता है। इसके हिसाब से जब

[01:33:23] कोई वकील हाई कोर्ट का परमानेंट जज बन

[01:33:26] जाता है तो वह अपने उसी हाई कोर्ट में

[01:33:28] दोबारा प्रैक्टिस नहीं कर सकता। इसका

[01:33:31] उद्देश्य इंपार्शियलिटी और कॉन्फ्लिक्ट ऑफ

[01:33:34] इंटरेस्ट को प्रिवेंट करना है। यह

[01:33:36] आर्टिकल्स एनश्योर करते हैं कि जजेस की

[01:33:38] अपॉइंटमेंट, उनका कंडक्ट और उनकी

[01:33:41] इंपार्शियलिटी पूरी तरह से प्रोटेक्टेड

[01:33:43] रहे। अब आगे हम देखते हैं इनकी सैलरी और

[01:33:47] ट्रांसफर प्रोसेस क्या है। सबसे पहले हम

[01:33:49] बात करेंगे आर्टिकल 221 की जो जजेस के

[01:33:53] सैलरी और अलाउंसेस के फ्रेमवर्क डिफाइन

[01:33:55] करता है। यह सैलरी पार्लियामेंट के द्वारा

[01:33:58] डिसाइड होती है और सर्विस कंडीशंस को इस

[01:34:01] तरह प्रोटेक्ट किया जाता है कि जज की

[01:34:03] फाइनेंसियल इंडिपेंडेंस हमेशा बनी रहे।

[01:34:06] वहीं आर्टिकल 222 हाई कोर्ट के जजेस के

[01:34:09] ट्रांसफर की प्रोसेस के बारे में बताता

[01:34:11] है। प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया के पास यह पावर

[01:34:14] होती है कि वे एक हाई कोर्ट के जज को

[01:34:16] दूसरे हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर सकते

[01:34:18] हैं। पर इसके लिए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की

[01:34:21] एडवाइस लेना जरूरी होती है। नेक्स्ट है

[01:34:24] आर्टिकल 223 जिसके मुताबिक जब हाईकोर्ट के

[01:34:28] चीफ जस्टिस का पद खाली हो या चीफ जस्टिस

[01:34:30] अपने ड्यूटीज टेंपरेरीली नहीं निभा पा रहे

[01:34:33] हो तो प्रेसिडेंट उस हाई कोर्ट के किसी जज

[01:34:36] को एक्टिंग चीफ जस्टिस बना सकते हैं।

[01:34:39] दूसरी तरफ आर्टिकल 224 एडिशनल जजेस की बात

[01:34:42] करते हुए कहता है कि हाई कोर्ट का वर्क

[01:34:45] लोड बढ़ने पर एडिशनल जजेस अपॉइंट करने की

[01:34:47] परमिशन दी गई है। यह अपॉइंटमेंट्स

[01:34:50] टेंपरेरी नेचर की होती है। जैसे बैकलग

[01:34:53] क्लियर करने के लिए। नेक्स्ट अब हम बात

[01:34:56] करने वाले हैं रिटायर्ड जजेस हाई कोर्ट के

[01:34:58] रिट जुरिसडिक्शन और सुपरवाइज़री पावर्स के

[01:35:01] बारे में जिसकी शुरुआत होती है आर्टिकल 24

[01:35:04] ए से। आर्टिकल 24 ए हाई कोर्ट को यह

[01:35:08] अथॉरिटी देता है कि वो किसी रिटायर्ड जज

[01:35:11] को फिर से टेंपरेरी बेसिस पर बुला सकते

[01:35:13] हैं। जब वर्क लोड या स्पेशल एक्सपर्टीज की

[01:35:16] जरूरत हो।

[01:35:18] दूसरी तरफ आर्टिकल 226 हाई कोर्ट की सबसे

[01:35:22] शक्तिशाली पावर के बारे में बात करता है

[01:35:24] जो है रिट जुरिसडिक्शन क्योंकि हाई कोर्ट

[01:35:27] की रिट जुरिसडिक्शन सिर्फ फंडामेंटल

[01:35:29] राइट्स तक ही सीमित नहीं है। वो किसी भी

[01:35:32] लीगल राइट के प्रोटेक्शन के लिए रिट्स इशू

[01:35:35] कर सकता है। हाई कोर्ट रिट्स इस प्रकार

[01:35:37] हैं। हेबिस कॉर्पस इललीगल डिटेंशन को

[01:35:41] रोकना। मैंडेमस पब्लिक अथॉरिटी को ड्यूटी

[01:35:44] परफॉर्म करने का आर्डर देना। प्रोहिबिशन

[01:35:47] लोअर कोर्ट्स को जुरिसडिक्शन के ओवरस्टेप

[01:35:50] से रोकना सर्शराय लोअर कोर्ट्स के डिसीजन

[01:35:53] को एग्जामिन करना को वारंटो

[01:35:57] किसी ऑफिस को ऑक्यूुपाई करने का लीगल राइट

[01:36:00] चेक करना हाई कोर्ट की यह पावर्स सुप्रीम

[01:36:03] कोर्ट के आर्टिकल 32 के रिट पावर्स से

[01:36:06] काफी ब्रॉडर हैं। क्योंकि जैसा कि हमने

[01:36:08] अभी बात की हाई कोर्ट इन्हें किसी भी लीगल

[01:36:11] राइट के लिए यूज कर सकता है। नेक्स्ट है

[01:36:14] आर्टिकल 227 हाई कोर्ट को अपने नीचे की

[01:36:16] सभी कोर्ट्स पर सुपरिटेंडेंस का अधिकार

[01:36:19] देता है। मतलब एडमिनिस्ट्रेटिव और

[01:36:21] जुडिशियल दोनों तरह की निगरानी। हाई कोर्ट

[01:36:24] एनश्योर करता है कि लोअर कोर्ट्स ठीक से

[01:36:26] काम करें और जुडिशियल स्टैंडर्ड्स मेंटेन

[01:36:29] हो। अगला आर्टिकल यानी कि आर्टिकल 28 कहता

[01:36:32] है कि जब किसी लोअर कोर्ट के केस में

[01:36:35] कॉन्स्टिट्यूशनल इंटरप्रिटेशन का सवाल हो

[01:36:37] तो हाई कोर्ट उस केस को अपने पास ट्रांसफर

[01:36:40] करवा सकता है। अब हम देखते हैं हाई कोर्ट

[01:36:43] के एडमिनिस्ट्रेटिव कंट्रोल और एक्सटेंडेड

[01:36:45] जुरिसडिक्शन के बारे में। आर्टिकल 229

[01:36:48] कहता है कि हाई कोर्ट के स्टाफ की

[01:36:50] अपॉइंटमेंट्स और उनके सर्विस कंडीशन का

[01:36:53] पूरा कंट्रोल हाई कोर्ट के पास ही होता

[01:36:55] है। यह आर्टिकल हाई कोर्ट की

[01:36:57] एडमिनिस्ट्रेटिव इंडिपेंडेंस स्ट्रेंथन

[01:36:59] करता है। दूसरी तरफ आर्टिकल 230 कहता है

[01:37:03] कि पार्लियामेंट चाहे तो यूनियन टेरिटरी

[01:37:05] के लिए हाई कोर्ट की जुरिसडिक्शन एक्सटेंड

[01:37:07] कर सकती है। इससे यूटीस के लिए भी

[01:37:10] जुडिशियल स्ट्रक्चर ईजीली ऑर्गेनाइज किया

[01:37:12] जा सकता है। नेक्स्ट है आर्टिकल 231 जो

[01:37:16] पार्लियामेंट को यह पावर देता है कि वह दो

[01:37:18] या ज्यादा स्टेट्स के लिए कॉमन हाई कोर्ट

[01:37:21] एस्टैब्लिश कर सकती है। आज भी कुछ हाई

[01:37:24] कोर्ट्स जॉइंट नेचर के हैं। जैसे पंजाब

[01:37:27] हरियाणा हाईकोर्ट। इसके बाद आते हैं

[01:37:30] आर्टिकल 233 टू 237 जो सबोर्डिनेट कोर्ट्स

[01:37:34] के बारे में बात करते हैं। सबोर्डिनेट

[01:37:36] कोर्ट्स आम आदमी को लोकल लेवल पर जस्टिस

[01:37:39] प्रोवाइड करने का काम करते हैं।

[01:37:41] डिस्ट्रिक्ट कोर्ट्स इसका एक बेहतर

[01:37:42] एग्जांपल है। अब हम बढ़ते हैं

[01:37:44] कॉन्स्टिट्यूशन के पार्ट नाइन और नाइन ए

[01:37:47] की तरफ जो पंचायत और म्युनिसिपालिटीज का

[01:37:50] फ्रेमवर्क डिफाइन करते हैं। इनका मेन

[01:37:52] पर्पस है गवर्नेंस को लोकल लेवल यानी आम

[01:37:56] लोगों तक ले जाना और डिसेंट्रलाइजेशन ऑफ

[01:37:58] पावर को इफेक्टिव बनाना। इंडिया में

[01:38:01] गवर्नेंस के तीन लेवल्स हैं। सेंट्रल,

[01:38:04] स्टेट और लोकल। पार्ट नाइन और पार्ट नाइन

[01:38:07] ए लोकल गवर्नेंस को डिटेल में एक्सप्लेन

[01:38:10] करते हैं। पार्ट नाइन पंचायत। यह आर्टिकल

[01:38:13] 243 से 243 ओ तक कवर करता है। आर्टिकल 243

[01:38:17] ए ग्राम सभा का प्रोविजन देता है। ग्राम

[01:38:21] सभा को समझिए जैसे पंचायत सिस्टम की

[01:38:23] आत्मा। इसमें पूरे विलेज के वोटर्स शामिल

[01:38:27] होते हैं। यह सबसे बेसिक डेमोक्रेटिक

[01:38:30] यूनिट है। जहां से प्लानिंग और लोकल

[01:38:32] डिसीजन मेकिंग शुरू होती है। ग्रामभा के

[01:38:35] थ्रू लोग अपने इशूज़, प्रपोजल्स और

[01:38:38] डेवलपमेंट वर्क्स में सीधा पार्टिसिपेट कर

[01:38:40] सकते हैं। यानी ग्राम सभा ही पंचायत का

[01:38:43] मूल आधार है और इसी से लोकल गवर्नेंस की

[01:38:46] शुरुआत होती है। जहां आम नागरिक अपने गांव

[01:38:49] के विकास में एक्टिवली इनवॉल्व हो सकते

[01:38:51] हैं। एक तरह से डायरेक्ट पार्टिसिपेशन का

[01:38:54] मॉडल है ग्रामभा में। आर्टिकल 243 बी और

[01:38:57] 243 सी यह पंचायतों के स्ट्रक्चर और

[01:39:00] फॉर्मेशन को डिफाइन करते हैं। पंचायत

[01:39:03] सिस्टम का त्रिस्तरीय ढांचा कुछ इस तरह

[01:39:05] है। गांव लेवल, ग्राम पंचायत, ब्लॉक और

[01:39:09] इंटरमीडिएट लेवल, पंचायत समिति, जिला

[01:39:12] लेवल, जिला परिषद। यहां यह भी स्पेसिफाई

[01:39:16] किया गया है कि इनके मेंबर्स कैसे चुने

[01:39:18] जाएं ताकि डेमोक्रेटिक रिप्रेजेंटेशन

[01:39:20] एनश्योर हो। अगला आर्टिकल है 243 दी। जो

[01:39:25] रिजर्वेशन प्रोविजंस के बारे में बताते

[01:39:27] हुए कहता है कि शेड्यूल्ड कास्ट और

[01:39:29] शेड्यूल्ड ट्राइब्स के लिए उनकी पपुलेशन

[01:39:32] प्रोपोर्शन के हिसाब से सीट्स रिजर्व

[01:39:34] रहेंगी। वहीं वुमेन के लिए भी कम से कम वन

[01:39:38] थर्ड सीट्स रिजर्व रहेंगी। इंडियन

[01:39:40] कॉन्स्टिट्यूशन के यह प्रोविजंस सोशल

[01:39:42] जस्टिस और इंक्लूसिविटी को प्रमोट करते

[01:39:45] हैं। नेक्स्ट है आर्टिकल 243 ई जो कहता है

[01:39:49] कि पंचायतों का फिक्स टर्म 5 साल का है जो

[01:39:52] लोकल लेवल गवर्नेंस को स्टेबिलिटी और

[01:39:54] कंटिन्यूटी प्रोवाइड करता है और साथ ही

[01:39:57] डेवलपमेंट वर्क्स अनइंटरप्टेड चल सके

[01:39:59] इसमें भी मदद करता है। अगला आर्टिकल है

[01:40:02] आर्टिकल 243 जी जो पंचायतों के काम,

[01:40:06] अथॉरिटी और जिम्मेदारियों को डिफाइन करता

[01:40:08] है। पंचायतों के की एरियाज में शामिल है।

[01:40:11] एग्रीकल्चर और इरीगेशन, रूरल रोड्स और

[01:40:14] इंफ्रास्ट्रक्चर, रूरल डेवलपमेंट

[01:40:17] प्रोग्राम्स। इन पावर्स का लिंकेज 11th

[01:40:20] शेड्यूल से है। जहां टोटल 29 सब्जेक्ट्स

[01:40:23] स्पेसिफाई किए गए हैं। साथ ही पंचायतों को

[01:40:26] लोकल नीड्स एड्रेस करने का राइट और फंड

[01:40:29] एलोकेशन का प्रोविजन भी दिया गया है।

[01:40:31] जिससे काम एफिशिएंटली हो सके। यानी

[01:40:34] अथॉरिटी अकाउंटेबिलिटी रिसोर्सेज का एक

[01:40:37] बैलेंस्ड फ्रेमवर्क एनश्योर किया गया है।

[01:40:40] जिससे लोकल गवर्नेंस इफेक्टिव और

[01:40:42] रिस्पांसिव हो। इसके अलावा आर्टिकल 243 एच

[01:40:45] के तहत पंचायतों को टैक्सेस, फीस और

[01:40:49] चार्जेस लगाने का अधिकार भी दिया गया है।

[01:40:51] जिससे वह अपनी लोकल नीड्स के लिए खुद

[01:40:54] रेवेन्यू जनरेट कर सकती हैं। नेक्स्ट इज

[01:40:57] आर्टिकल 243 आई जो कहता है स्टेट फाइनेंस

[01:41:01] कमीशन गवर्नर को रेकमेंड करेगा कि स्टेट

[01:41:03] के टैक्सेस का कितना हिस्सा पंचायतों और

[01:41:05] लोकल बॉडीज को मिलेगा जिससे फंड एलोकेशन

[01:41:08] फेयर और बैलेंस्ड हो। आर्टिकल 243 जे भी

[01:41:12] ट्रांसपेरेंसी और फेयरनेस की बात करते हुए

[01:41:14] कहता है कि पंचायतों के फाइनेंसियल

[01:41:17] ट्रांजैक्शंस का ऑडिट कंपलसरी है जिससे

[01:41:20] कंप्लीट ट्रांसपेरेंसी बनी रहे और फंड्स

[01:41:22] का मिसयूज ना हो। अगला आर्टिकल है 243 के

[01:41:27] जिसके अकॉर्डिंग मेंबर्स के इलेक्शन हर 5

[01:41:30] साल में रेगुलर और फेयर होने चाहिए ताकि

[01:41:32] ग्रास रूट्स डेमोक्रेसी इफेक्टिव और

[01:41:34] अकाउंटेबल बनी रहे। यानी पंचायतों के लिए

[01:41:38] पावर्स, फंड्स, अकाउंटेबिलिटी, इलेक्शंस

[01:41:41] का एक कंप्लीट फ्रेमवर्क एनश्योर किया गया

[01:41:44] है। अब हम बात करेंगे पार्ट न ए की जिसके

[01:41:48] अंदर आर्टिकल 243 पी से लेकर आर्टिकल 243

[01:41:52] जेड जी तक अर्बन लोकल बॉडीज की बात की गई

[01:41:55] है। यह प्रोविज़ंस शहर के कॉन्टेक्स्ट में

[01:41:58] लोकल गवर्नेंस के लिए हैं और पंचायतों के

[01:42:00] फ्रेमवर्क से काफी मिलते जुलते हैं। बस

[01:42:03] अर्बन रिक्वायरमेंट्स के हिसाब से एडजस्ट

[01:42:05] किए गए हैं। सबसे पहले आर्टिकल 243 पी

[01:42:08] बेसिक टर्म्स को डिफाइन करता है। जैसे

[01:42:10] म्युनिसिपालिटी, वार्ड, मेट्रोपॉलिटन

[01:42:13] एरिया, पीपीसी, डिस्ट्रिक्ट प्लानिंग

[01:42:15] कमिटी ताकि पूरे फ्रेमवर्क में क्लेरिटी

[01:42:18] बनी रहे। इसके बाद आता है आर्टिकल 243

[01:42:22] काता है कि हर स्टेट में अर्बन एरियाज के

[01:42:25] लिए तीन कैटेगरीज की म्युनिसिपल बॉडीज

[01:42:27] होती हैं। नगर पंचायत जहां एरिया रूरल से

[01:42:31] अर्बन स्टेज में ट्रांजिशन में हो।

[01:42:33] म्यनिसिपल काउंसिल मीडियम टाउनंस के लिए

[01:42:36] म्युनिसिपल कॉरपोरेशन लार्ज सिटीज के लिए

[01:42:39] जहां पॉपुलेशन और नीड्स ज्यादा होती हैं।

[01:42:42] यानी जैसे रूरल एरियाज के लिए पंचायती राज

[01:42:44] का थ्री टियर सिस्टम है वैसे ही सिटीज में

[01:42:47] यह थ्री लेवल अर्बन गवर्नेंस सिस्टम काम

[01:42:50] करता है। अब आगे बढ़ते हैं आर्टिकल 243 आर

[01:42:54] पर जो यह मेंशन करता है कि

[01:42:56] म्युनिसिपालिटीज के मेंबर्स का डायरेक्ट

[01:42:59] इलेक्शन के थ्रू वार्ड से इलेक्शन होगा।

[01:43:02] साथ ही एससी, एसटी और वुमेन के लिए

[01:43:05] रिजर्वेशन का सिस्टम भी रहता है। जैसे

[01:43:07] रूरल पंचायत में होता है। फिर आता है अगला

[01:43:10] आर्टिकल 243 एस जो वार्ड कमिटीज को मेंशन

[01:43:14] करता है। अकॉर्डिंग टू दिस बड़े शहरों में

[01:43:17] हर वार्ड की अपनी कमेटी हो सकती है जिसका

[01:43:19] काम लोकल इशज़, सर्विस डिलीवरी और सिटीजन

[01:43:23] पार्टिसिपेशन को हैंडल करना होता है। अगर

[01:43:25] पॉपुलेशन 3 लाख या उससे ज्यादा हो तो एक

[01:43:28] शहर में मल्टीपल वार्ड कमिटीज भी बन सकती

[01:43:30] हैं।

[01:43:32] इसके बाद आर्टिकल 243 टी सीट रिजर्वेशन का

[01:43:35] स्ट्रक्चर प्रोवाइड करता है। जिसके अनुसार

[01:43:38] एससी, एसटी और वुमेन के लिए मिनिमम वन

[01:43:40] थर्ड सीट्स रिजर्व रहेंगी। अर्बन बॉडीज

[01:43:43] में इंक्लूसिवनेस और रिप्रेजेंटेशन

[01:43:45] एनश्योर करने के लिए यह प्रोविजन क्रिटिकल

[01:43:47] है। फिर आता है आर्टिकल 243 यू जो क्लियर

[01:43:51] करता है कि हर म्यनिसिपल बॉडी का टर्म

[01:43:53] फिक्स्ड 5 साल होता है। अगर

[01:43:55] म्युनिसिपालिटी डिॉल्व हो जाए तो न्यू

[01:43:57] इक्शंस एक फिक्स टाइम पीरियड में करना

[01:43:59] मैंडेटरी होता है ताकि लोकल डेमोक्रेसी

[01:44:02] ब्रेक ना हो। अब हम बात करते हैं पावर्स

[01:44:05] की जो आर्टिकल 243 डब्ल्यू में दी गई हैं।

[01:44:08] इस आर्टिकल के अकॉर्डिंग स्टेट

[01:44:09] गवर्नमेंट्स म्युनिसिपालिटीज को उनके लोकल

[01:44:12] फंक्शनंस परफॉर्म करने के लिए पावर्स

[01:44:14] असाइन करती है।

[01:44:16] इनमें 12th शेड्यूल के इंपॉर्टेंट काम

[01:44:18] शामिल हैं। जैसे अर्बन प्लानिंग, वाटर

[01:44:21] सप्लाई, सैनिटेशन, रोड्स और स्ट्रीट

[01:44:24] लाइटिंग, पब्लिक हेल्थ, मार्केट्स,

[01:44:27] एनवायरमेंटल प्रोटेक्शन, स्लम इंप्रूवमेंट

[01:44:29] यानी नगरपालिकाएं सिटी लेवल डेवलपमेंट के

[01:44:32] ऑलमोस्ट सारे मेजर एरियाज हैंडल करती हैं।

[01:44:36] नेक्स्ट इज़ आर्टिकल 243 एक्स जो

[01:44:38] म्युनिसिपालिटीज को टैक्सेस, ड्यूटीज,

[01:44:41] टोल्स और फीस कलेक्ट करने का अधिकार देता

[01:44:44] है।

[01:44:46] यही उनका प्राइमरी रेवेन्यू सिस्टम होता

[01:44:48] है जिससे लोकल गवर्नेंस फाइनेंशियली

[01:44:51] इंडिपेंडेंट बन पाती है। अब यहां एक

[01:44:53] इंपॉर्टेंट कनेक्शन आता है। जैसे पंचायतों

[01:44:57] के लिए फाइनेंस कमीशन होता है।

[01:45:01] वैसे ही आर्टिकल 243 व के थ्रू स्टेट

[01:45:04] फाइनेंस कमीशन म्यनिसिपल बॉडीज के लिए भी

[01:45:07] रेवेन्यू शेयरिंग और ग्रांट्स की

[01:45:08] रिकमेंडेशन देता है। जिसमें आर्टिकल 243

[01:45:11] जेड इंश्योर करता है कि म्युनिसिपल

[01:45:13] अकाउंट्स प्रॉपर्ली मेंटेन हो और उनका

[01:45:16] ऑडिट टाइमली हो ताकि ट्रांसपेरेंसी और

[01:45:19] अकाउंटेबिलिटी बनी रहे। इसके बाद आर्टिकल

[01:45:22] 243 जेड ए कहता है कि म्यनिसिपल इलेक्शंस

[01:45:26] की पूरी रिस्पांसिबिलिटी स्टेट इलेक्शन

[01:45:29] कमीशन के पास होगी। यह सेम मॉडल पंचायत के

[01:45:32] इक्शंस में भी फॉलो होता है। इसके आगे

[01:45:35] आर्टिकल 243 जेड डी डिस्ट्रिक्ट लेवल

[01:45:38] प्लानिंग की बात करता है। इस आर्टिकल के

[01:45:41] मुताबिक हर डिस्ट्रिक्ट में डिस्ट्रिक्ट

[01:45:43] प्लानिंग कमेटी बनाई जाती है जिसका काम है

[01:45:46] रूरल और अर्बन दोनों एरियाज के डेवलपमेंट

[01:45:48] प्लांस को इंटीग्रेट करना और डिस्ट्रिक्ट

[01:45:51] लेवल बैलेंस्ड डेवलपमेंट एनश्योर करना।

[01:45:53] अगर हम और आगे बढ़े तो आर्टिकल 243 जेड ई

[01:45:57] उन शहरों की बात करता है जिनकी पपुलेशन 10

[01:45:59] लाख से ज्यादा है। अकॉर्डिंग टू दिस ऐसे

[01:46:02] सिटीज में मेट्रोपॉलिटन प्लानिंग कमेटी

[01:46:04] बनाई जाती है और एमपीसी का काम होता है

[01:46:07] बड़े शहरों के लिए इंटीग्रेटेड अर्बन

[01:46:10] प्लानिंग बनाना। हाउसिंग, ट्रांसपोर्ट,

[01:46:12] इंफ्रास्ट्रक्चर और लैंड यूज़ को

[01:46:14] कोऑर्डिनेट करना। म्युनिसिपालिटीज और

[01:46:17] पंचायत के प्लांस को हार्मोनाइज करना।

[01:46:19] सिंपल लैंग्वेज में एमपीसी बड़े मेट्रोस

[01:46:22] के लिए वही है जो रूरल एरियाज में पंचायती

[01:46:24] राज प्लानिंग होती है। बस अर्बन स्केल पर।

[01:46:28] इस सेक्शन में कुछ आर्टिकल्स और हैं। जैसे

[01:46:31] आर्टिकल 243 जेडफ जो पुराने म्युनिसिपल

[01:46:35] लॉस को अलव करता है कि वो एक टाइम लिमिट

[01:46:37] तक वैलिड रहे। जब तक स्टेट्स उन्हें नई

[01:46:39] कॉन्स्टिट्यूशनल फ्रेमवर्क के अकॉर्डिंग

[01:46:41] अपडेट नहीं कर देते।

[01:46:43] वहीं दूसरी तरफ आर्टिकल 243 जेड जी

[01:46:46] इलेक्शन प्रोसेस को प्रोटेक्ट करता है। इस

[01:46:49] आर्टिकल के मुताबिक म्यनिसिपल इलेक्शन

[01:46:51] चलने के दौरान कोर्ट्स डायरेक्टली

[01:46:53] इंटरफेयर नहीं कर सकती। इलेक्शंस को सिर्फ

[01:46:56] इलेक्शन पिटीशन के जरिए चैलेंज किया जा

[01:46:58] सकता है। यह इसलिए किया गया है ताकि लोकल

[01:47:01] इलेक्शंस स्मूथ इंटरप्शन फ्री और टाइम

[01:47:04] बाउंड तरीके से कंप्लीट हो सके। चाहे

[01:47:06] पार्ट नाइन हो या पार्ट नाइन ए। दोनों का

[01:47:09] ही उद्देश्य है लोकल कम्युनिटीज को एमावर

[01:47:12] करना ताकि वह अपने एरियाज की जरूरतों के

[01:47:15] हिसाब से फैसले ले सकें। यही है लोकल

[01:47:18] सेल्फ गवर्नेंस का मूल मंत्र। पीपल्स

[01:47:20] पार्टिसिपेशन इन पीपल्स डेवलपमेंट। अब

[01:47:23] हमने पावर का डिसेंट्रलाइजेशन को तो समझ

[01:47:26] लिया लेकिन इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन कुछ

[01:47:28] इमरजेंसी सिचुएशन में पावर के

[01:47:30] सेंट्रलाइजेशन की भी बात करता है। आइए एक

[01:47:33] नजर इस पर भी डाल लेते हैं। हमारे

[01:47:35] कॉन्स्टिट्यूशन में तीन टाइप्स की

[01:47:37] इमरजेंसीज दी गई हैं। इनका मेन पर्पस है

[01:47:40] कि अगर देश किसी नेशनल क्राइसिस, स्टेट

[01:47:42] क्राइसिस या इकोनॉमिक क्राइसिस का सामना

[01:47:45] करें तो गवर्नमेंट के पास ऐसी पावर्स हो

[01:47:48] जो सिचुएशन को कंट्रोल कर सकें और यूनिटी,

[01:47:50] सिक्योरिटी और स्टेबिलिटी बनाए रखें।

[01:47:52] आर्टिकल 352 सबसे पहले बात करते हैं

[01:47:55] आर्टिकल 352 की जिसे नेशनल इमरजेंसी कहते

[01:47:58] हैं। यह इमरजेंसी तब लागू होती है जब वॉर

[01:48:03] युद्ध हो। एक्सटर्नल अग्रेशन बाहरी अटैक

[01:48:06] हो या आर्म्ड रिबेलियन आंतरिक सशस्त्र

[01:48:09] विद्रोह हो। कॉन्स्टिट्यूशन में पहले

[01:48:12] इंटरनल डिस्टरबेंसेस शब्द था। पर 44

[01:48:15] अमेंडमेंट 1978 के बाद इसे रिप्लेस करके

[01:48:18] आर्म्ड रिबेलियन कर दिया गया ताकि मिसयज

[01:48:21] की पॉसिबिलिटी कम हो। नेशनल इमरजेंसी के

[01:48:24] दौरान कुछ इंपॉर्टेंट इफेक्ट्स होते हैं।

[01:48:27] सेंटर की पावर्स स्टेट्स के ऊपर ज्यादा हो

[01:48:29] जाती है। आर्टिकल 19 के फंडामेंटल राइट्स

[01:48:32] ऑटोमेटिकली सस्पेंड हो जाते हैं।

[01:48:34] पार्लियामेंट किसी भी सब्जेक्ट पर लॉ बना

[01:48:36] सकती है। इवन स्टेट लिस्ट के सब्जेक्ट्स

[01:48:39] पर। इमरजेंसी पूरे देश या किसी स्पेसिफिक

[01:48:42] पार्ट में भी लागू हो सकती है। यानी जब

[01:48:44] देश के एकिस्टेंस या सिक्योरिटी पर रियल

[01:48:47] डेंजर हो तब सरकार को सेंट्रलाइज्ड पास्ट

[01:48:50] और डिसाइसिव एक्शन लेने की पावर मिल जाती

[01:48:53] है। आर्टिकल 356 को कॉमनली प्रेसिडेंट्स

[01:48:56] रूल या स्टेट इमरजेंसी कहा जाता है। यह तब

[01:48:59] लागू होता है जब किसी स्टेट की

[01:49:01] कॉन्स्टिट्यूशनल मशीनरी फेल हो जाए।

[01:49:03] गवर्नर रिपोर्ट भेजे कि स्टेट गवर्नमेंट

[01:49:06] कॉन्स्टिट्यूशन के अकॉर्डिंग नहीं चल रही

[01:49:08] या फिर स्टेट अपनी ड्यूटीज को फुलफिल नहीं

[01:49:10] कर पा रहा हो। प्रेसिडेंट्स रूल के दौरान

[01:49:13] स्टेट असेंबली सस्पेंड या डिॉल्व हो सकती

[01:49:16] है। इसके बाद गवर्नर प्लस सेंटर स्टेट का

[01:49:20] डायरेक्ट एडमिनिस्ट्रेशन संभालते हैं।

[01:49:23] स्टेट गवर्नमेंट की पावर्स प्रेसिडेंट के

[01:49:25] नाम पर एक्सरसाइज होती हैं। इस इमरजेंसी

[01:49:28] का पर्पस यह है कि स्टेट में

[01:49:30] कॉन्स्टिट्यूशनल गवर्नेंस वापस रिस्टोर हो

[01:49:32] सके। जैसा कि हमने अभी देखा नेशनल

[01:49:35] इमरजेंसी सिक्योरिटी थ्रेट से रिलेटेड

[01:49:37] होती है। स्टेट इमरजेंसी गवर्नेंस फेलियर

[01:49:40] से लेकिन तीसरी इमरजेंसी बिल्कुल अलग नेचर

[01:49:43] की होती है। यह तब लगती है जब क्राइसिस

[01:49:45] इकोनॉमिक इनस्टेबिलिटी की वजह से हो।

[01:49:48] फाइनेंसियल इमरजेंसी आर्टिकल 360

[01:49:50] फाइनेंसियल इमरजेंसी को डिफाइन करता है।

[01:49:53] यह तब डिक्लेअ की जा सकती है जब देश की

[01:49:56] फाइनेंसियल स्टेबिलिटी खतरे में हो।

[01:49:58] इकोनॉमिक सिस्टम सीवियरली स्ट्रेस्ड हो।

[01:50:00] सेंटर को फाइनेंससेस कंट्रोल करने की

[01:50:02] अर्जेंट नीड हो। फाइनेंसियल इमरजेंसी के

[01:50:05] दौरान सेंटर को अथॉरिटी मिल जाती है कि वह

[01:50:08] स्टेट के फाइनेंसियल डिसीजंस रेगुलेट

[01:50:10] करें। गवर्नमेंट एंप्लाइजस की सैलरी,

[01:50:12] अलाउंसेस रिड्यूस या फ्रीज की जा सकती

[01:50:15] हैं। स्टेट्स को सेंटर की फाइनेंसियल

[01:50:17] डायरेक्शंस फॉलो करना मैंडेटरी होता है।

[01:50:20] यह इमरजेंसी अब तक कभी डिक्लेअ नहीं हुई।

[01:50:22] पर इसका इंक्लूजन इसलिए किया गया है ताकि

[01:50:25] देश किसी भी फाइनेंसियल कोलैप्स से बच

[01:50:27] सके। इन सारे कॉन्स्टिट्यूशनल प्रोविजंस

[01:50:30] के बाद अब हम बात करेंगे उन मेजर

[01:50:32] कॉन्स्टिट्यूशनल अमेंडमेंट्स के बारे में

[01:50:34] जिनकी वजह से काफी सारे चेंजेस हमें देखने

[01:50:37] को मिले। तो चलिए शुरू करते हैं। 1951 से

[01:50:41] लेकर अब तक भारतीय संविधान में कई मेजर

[01:50:43] अमेंडमेंट्स किए जा चुके हैं। सबसे पहला

[01:50:46] है फर्स्ट अमेंडमेंट 1951। इंडिपेंडेंस के

[01:50:49] तुरंत बाद जब कोर्ट्स ने लैंड रिफॉर्म्स

[01:50:52] को अनकॉन्स्टिट्यूशनल डिक्लेअ करना शुरू

[01:50:54] किया तब फर्स्ट अमेंडमेंट लाया गया।

[01:50:56] फ्रीडम ऑफ स्पीच आर्टिकल 19 पर कुछ

[01:50:58] रीज़नेबल रेस्ट्रिकशंस ऐड किए। पब्लिक

[01:51:01] ऑर्डर, डिसेंसी, सिक्योरिटी के लिए नाइंथ

[01:51:04] शेड्यूल क्रिएट किया गया ताकि लैंड

[01:51:06] रिफॉर्म लॉस को जुडिशियल रिव्यू से

[01:51:08] प्रोटेक्ट किया जा सके। अगला है 4

[01:51:11] अमेंडमेंट 1976 मिनी कॉन्स्टिट्यूशन।

[01:51:14] इमरजेंसी के दौरान किया गया यह सबसे बड़ा

[01:51:17] अमेंडमेंट था। इसने कॉन्स्टिट्यूशन के

[01:51:19] मल्टीपल पार्ट्स को मॉडिफाई किया। प्रएमबल

[01:51:22] में सोशलिस्ट और सेकुलर वर्ड्स ऐड किए गए।

[01:51:25] फंडामेंटल ड्यूटीज आर्टिकल 51 ए इंसर्ट

[01:51:28] किए गए। जुडिशरी के रिव्यू पावर्स को

[01:51:30] रेस्ट्रिक्ट किया गया। डीपीएसपीस को कुछ

[01:51:33] केसेस में फंडामेंटल राइट्स पर प्रायोरिटी

[01:51:35] दी गई। 44 अमेंडमेंट 1978 जनता गवर्नमेंट

[01:51:38] ने इमरजेंसी के मिसयूज को एड्रेस करने के

[01:51:41] लिए यह अमेंडमेंट पास किया। इसके की

[01:51:44] प्रोविज़ंस थे राइट टू प्रॉपर्टी को

[01:51:46] फंडामेंटल राइट से हटाकर लीगल राइट बनाए।

[01:51:50] नेशनल इमरजेंसी आर्टिकल 352 डिक्लेअ करने

[01:51:53] की कंडीशंस को स्ट्रिक्ट बनाया। इंटरनल

[01:51:55] डिस्टरबेंसेस को रिप्लेस करके आर्म्ड

[01:51:58] रिबेलियन किया गया। आर्टिकल 19 के राइट्स

[01:52:01] इमरजेंसी में ऑटोमेटिकली सस्पेंड नहीं

[01:52:03] होंगे। फंडामेंटल राइट्स की प्रोटेक्शन को

[01:52:06] फिर से स्ट्रेंथन किया गया।

[01:52:09] अगला जो अमेंडमेंट है वो है 61 अमेंडमेंट

[01:52:12] 1989। वोटिंग एज को 21 से 18 साल तक

[01:52:16] रिड्यूस किया गया। इससे यूथ को पॉलिटिकल

[01:52:19] प्रोसेस में पार्टिसिपेट करने का मौका

[01:52:20] मिला और डेमोक्रेसी में उनका वॉइस

[01:52:23] स्ट्रांगर हुआ। इसके बाद आता है 86

[01:52:26] अमेंडमेंट 2002 राइट टू एजुकेशन को

[01:52:29] फंडामेंटल राइट बनाया गया जिसमें छ से 14

[01:52:32] साल के बच्चों के लिए फ्री एंड कंपलसरी

[01:52:35] एजुकेशन की बात की गई। यह शिक्षा को सबके

[01:52:39] लिए एक्सेसबल बनाने और इंक्लूसिव एजुकेशन

[01:52:42] प्रमोट करने का एक मेजर स्टेप था। अब हम

[01:52:45] जानेंगे उन अमेंडमेंट्स के बारे में जो

[01:52:46] रिजर्वेशन से रिलेटेड हैं। 93 अमेंडमेंट

[01:52:49] 2005 ओबीसीज के लिए प्राइवेट एजुकेशन

[01:52:52] इंस्टीट्यूशन में रिजर्वेशन अलाउ किया

[01:52:54] गया। 113 अमेंडमेंट 2019 ईडब्ल्यूएस

[01:52:58] इकोनॉमिकली वीकर सेक्शंस के लिए 10%

[01:53:01] रिजर्वेशन इंट्रोड्यूस किया गया। 116

[01:53:04] अमेंडमेंट 2023 वुमेन के लिए लोकसभा और

[01:53:08] विधानसभाओं में 1/3 रिजर्वेशन के

[01:53:10] प्रोविज़ंस की बात की गई। अब आते हैं कुछ

[01:53:12] रीसेंट अमेंडमेंट्स पर जो प्रैक्टिकल और

[01:53:14] सोशल नीड्स के हिसाब से हो रहे हैं। 100

[01:53:17] अमेंडमेंट इंडिया बांग्लादेश लैंड

[01:53:19] बाउंड्री एग्रीमेंट को इंप्लीमेंट करने के

[01:53:21] लिए किया गया। अंडर फर्स्ट अमेंडमेंट 2016

[01:53:24] जीएसटी लागू किया गया जो इनडायरेक्ट

[01:53:27] टैक्सेशन को सिंपलीफाई और यूनिफॉर्म बनाता

[01:53:30] है। 11 सेकंड अमेंडमेंट 2018 नेशनल कमीशन

[01:53:34] फॉर बैकवर्ड क्लासेस को कॉन्स्टिट्यूशनल

[01:53:36] स्टेटस दिया गया।

[01:53:38] 114 अमेंडमेंट 2020 एंग्लो इंडियन

[01:53:41] कम्युनिटी के नॉमिनेटेड सीट्स को लोकसभा

[01:53:43] और स्टेट असेंबलीज में खत्म किया गया।

[01:53:46] 115th अमेंडमेंट 202 स्टेट्स को बैकवर्ड

[01:53:50] क्लासेस की लिस्ट बनाने का अधिकार वापस

[01:53:52] दिया गया ताकि लोकल कॉन्टेक्स्ट के हिसाब

[01:53:55] से पॉलिसीज बन सकें। इन अमेंडमेंट्स ने

[01:53:58] गवर्नेंस, फेडरलिज्म और इकोनॉमिक पॉलिसी

[01:54:00] को मॉडर्न नीड्स के हिसाब से अपडेट किया।

[01:54:04] अब हम चर्चा करेंगे इंडिपेंडेंस से पहले

[01:54:07] के कुछ की लेजिसलेशंस के बारे में।

[01:54:09] रेगुलेटिंग एक्ट 1773 ब्रिटिश

[01:54:12] पार्लियामेंट ने कंपनी के काम पर पहला

[01:54:14] कंट्रोल लगाया और बंगाल में गवर्नर जनरल

[01:54:17] का पद एस्टैब्लिश हुआ। पिट्स इंडिया एक्ट

[01:54:20] 1784 कंपनी के पॉलिटिकल और कमर्शियल

[01:54:24] पावर्स अलग किए गए। और इंग्लैंड में बोर्ड

[01:54:27] ऑफ कंट्रोल बना। मतलब ड्यूल कंट्रोल का

[01:54:30] सिस्टम, चार्टर एक्ट्स, एक सीरीज ऑफ

[01:54:33] एक्ट्स जिसमें कंपनी के पावर्स और

[01:54:35] गवर्नेंस का फ्रेमवर्क डिफाइन किया गया।

[01:54:37] ग्रेजुअली सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेशन और

[01:54:40] लेजिसलेटिव पावर्स को रेगुलेट किया गया।

[01:54:42] 1813 ईस्ट इंडिया कंपनी का ट्रेडिंग

[01:54:45] मोनोपोली खत्म हुआ। चाइना और चाय के

[01:54:48] अलावा। 1833 कंपनी ऑलमोस्ट प्योरली

[01:54:52] एडमिनिस्ट्रेटिव बॉडी बन गई। गवर्नर जनरल

[01:54:54] ऑफ इंडिया का रोल फॉर्मलाइज हुआ। 1853

[01:54:58] सिविल सर्विज में ओपन कंपटीशन शुरू हुआ।

[01:55:01] थ्योरेटिकली इंडियंस के लिए भी आफ्टर द

[01:55:04] रिवोल्ट ऑफ 1857

[01:55:06] गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1858 कंपनी राज

[01:55:09] खत्म। ब्रिटिश क्राउन का डायरेक्ट रोल

[01:55:12] शुरू। गवर्नर जनरल का पद वायसरॉय बन गया

[01:55:15] और इंग्लैंड में सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट फॉर

[01:55:17] इंडिया की पोस्ट एस्टैब्लिश हुई। नेक्स्ट

[01:55:20] हम देखेंगे इंडियन काउंसिल एक्ट्स के बारे

[01:55:22] में। इंडियन काउंसिल्स एक्ट 1861 पहली बार

[01:55:25] लिमिटेड इंडियंस को लेजिसलेटिव काउंसिल्स

[01:55:28] में नॉमिनेट किया गया। इंडियन काउंसिल्स

[01:55:30] एक्ट 1892 पहले से पावर्स थोड़ी बढ़ी जैसे

[01:55:34] बजट पर डिबेट का अधिकार और सदस्यों की

[01:55:37] संख्या में इंक्रीमेंट हुआ। मोरले मिंटो

[01:55:39] रिफॉर्म्स 1909 इसके दौरान मुस्लिम्स के

[01:55:43] लिए सेपरेट इलेक्टोरेट्स इंट्रोड्यूस हुए।

[01:55:45] यानी कि कम्युनल रिप्रेजेंटेशन की शुरुआत

[01:55:48] यहीं से हुई। यानी कि कम्युनल

[01:55:50] रिप्रेजेंटेशन की शुरुआत यहीं से हुई।

[01:55:53] मॉन्टोंग्यू चेम्सफर्ड रिफॉर्म्स 1919

[01:55:56] प्रोवेंसेस में डायरकी इंप्लीमेंट हुई।

[01:55:58] सेंट्रल और प्रोविंशियल पावर्स को स्प्लिट

[01:56:00] किया गया और सेंट्रल लेजिस्लेचर बायकमरल

[01:56:03] बनाया गया। गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935

[01:56:07] मॉडर्न कॉन्स्टिट्यूशन का ब्लूप्रिंट

[01:56:09] तैयार किया गया। फेडरल स्ट्रक्चर,

[01:56:11] प्रोविंशियल ऑटोनोमी,

[01:56:14] एक्सपेंडेड फ्रेंचाइज और लेजिसलेटिव

[01:56:16] फ्रेमवर्क यहीं से आया है। यह पूरा

[01:56:19] प्रोसेस ग्रेजुअली इंडियंस को लेजिसलेटिव

[01:56:22] और एडमिनिस्ट्रेटिव अफेयर्स में शामिल

[01:56:24] करने का था। जो इवेंचुअली इंडिपेंडेंस के

[01:56:27] बाद डेमोक्रेटिक कॉन्स्टिट्यूशन का बेस

[01:56:29] बना। इस पूरे एववोल्यूशन में ग्रेजुअल

[01:56:31] पार्टिसिपेशन, फेडरलिज्म, सोशल जस्टिस,

[01:56:34] फंडामेंटल राइट्स और गवर्नेंस फ्रेमवक्स

[01:56:36] सिस्टमेटिकली डेवलप हुए जो आज के भारत के

[01:56:40] डेमोक्रेटिक और अकाउंटेबल सिस्टम का

[01:56:42] फाउंडेशन है। इसके बाद हम बात करने वाले

[01:56:45] हैं एक दूसरे कांसेप्ट पर जिसका नाम है

[01:56:48] कॉन्स्टिट्यूशनल और नॉन कॉन्स्टिट्यूशनल

[01:56:50] बॉडीज। कॉन्स्टिट्यूशनल बॉडीज जैसे नाम से

[01:56:54] ही पता चल रहा है। यह डायरेक्टली

[01:56:56] कॉन्स्टिट्यूशन से ही उत्पन्न होती हैं।

[01:56:58] यानी कि कॉन्स्टिट्यूशन ही डिसाइड करता है

[01:57:01] कि कैसे बनेंगी, उनके पावर्स क्या होंगे,

[01:57:04] रिस्पांसिबिलिटीज क्या हैं? और उनकी

[01:57:06] लिमिट्स क्या हैं? यही वजह है कि इन्हें

[01:57:09] स्पेशल स्टेबिलिटी और ऑटोनोमी मिलती है।

[01:57:12] यह शॉर्ट टर्म पॉलिटिकल या गवर्नमेंट

[01:57:14] प्रेशर से ज्यादा इफेक्टेड नहीं होते। और

[01:57:16] इनके डिसीजंस का वेट ज्यादा होता है। और

[01:57:19] हां, इन बॉडीज को चेंज करना या उनके

[01:57:22] पावर्स में मॉडिफिकेशन लाना इजी नहीं

[01:57:24] होता। क्योंकि इसके लिए कॉन्स्टिट्यूशनल

[01:57:27] अमेंडमेंट की जरूरत पड़ती है जो एक

[01:57:29] कॉम्प्लेक्स प्रोसेस है। एग्जांपल्स

[01:57:32] इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया आर्टिकल 3 टू4

[01:57:37] काम क्या है? लोकसभा, राज्यसभा, स्टेट

[01:57:40] असेंबलीज, प्रेसिडेंट और वाइस प्रेसिडेंट

[01:57:42] के इलेक्शंस करवाना। इलेक्टोरल रोल्स

[01:57:45] मेंटेन करना, प्री और फेयर इलेक्शंस

[01:57:48] इंश्योर करना, मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट

[01:57:50] इंप्लीमेंट करना क्यों जरूरी है? अगर

[01:57:54] इलेक्शंस इंपार्शियल ना हो तो डेमोक्रेसी

[01:57:56] की क्रेडिबिलिटी खत्म हो जाती है। ईसीआई

[01:57:59] ही गारंटी देता है कि पावर जनता के वोट से

[01:58:03] ट्रांसफर हो। नॉट बाय मैनपुलेशन।

[01:58:06] फाइनेंस कमीशन आर्टिकल 280

[01:58:10] काम क्या है? सेंटर और स्टेट्स के बीच

[01:58:13] रेवेन्यू शेयरिंग का फार्मूला रेकमेंड

[01:58:15] करना, ग्रांट्स इनड डिसाइड करना, फिस्कल

[01:58:18] फेडरलिज्म को बैलेंस करना क्यों जरूरी है?

[01:58:22] इंडिया जैसा फेडरल कंट्री तभी चलेगा जब

[01:58:25] सेंटर और स्टेट्स के फाइनेंससेस फेयर और

[01:58:27] ट्रांसपेरेंट वे में डिवाइड हो। फाइनेंस

[01:58:30] कमीशन एनश्योर करता है कि कोई स्टेट

[01:58:32] फाइनेंसियली हेल्पलेस ना हो। यूपीएससी

[01:58:36] यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन आर्टिकल 315

[01:58:39] काम क्या है? आईएएस, आईपीएस, आईएफएस जैसे

[01:58:42] सर्विज का एग्जाम्स कंडक्ट करना,

[01:58:45] रिक्रूटमेंट को प्योर मेरिट पर रखना।

[01:58:48] गवर्नमेंट को रिक्रूटमेंट रिलेटेड एडवाइस

[01:58:50] देना। क्यों जरूरी है? अगर ब्यूरोक्रेसी

[01:58:53] इनफिशिएंट हो तो गवर्नेंस कोलैप्स हो जाता

[01:58:55] है। यूपीएससी एनश्योर करता है कि कंट्री

[01:58:58] की टॉप सर्विज में कॉमटेंट, न्यूट्रल और

[01:59:02] एथिकल ऑफिसर्स आए। स्टेट पब्लिक सर्विस

[01:59:05] कमीशंस आर्टिकल 315

[01:59:09] काम क्या है? स्टेट सिविल सर्विज के लिए

[01:59:12] एग्जाम्स कंडक्ट करना, स्टेट गवर्नमेंट को

[01:59:14] रिक्रूटमेंट एडवाइस देना क्यों जरूरी है?

[01:59:17] हर स्टेट की अपनी नीड्स होती हैं। पीएससीस

[01:59:20] एनश्योर करते हैं कि लोकल एडमिनिस्ट्रेशन

[01:59:22] के लिए राइट ऑफिसर सेलेक्ट हो। सीएजी,

[01:59:25] कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया

[01:59:28] आर्टिकल 148 काम क्या है? सेंट्रल और

[01:59:32] स्टेट गवर्नमेंट्स के सारे एक्सपेंडिचर्स

[01:59:34] का ऑडिट करना, पब्लिक मनी का मिसयूज

[01:59:36] आइडेंटिफाई करना, ऑडिट रिपोर्ट्स

[01:59:38] पार्लियामेंट और स्टेट असेंबलीज में सबमिट

[01:59:40] करना। क्यों जरूरी है? अगर पैसा सही जगह

[01:59:44] यूज नहीं हो रहा तो करप्शन और वेस्टेज बढ़

[01:59:47] जाता है। सीएजी फाइनेंसियल वॉच डॉग है जो

[01:59:50] एनश्योर करते हैं कि पब्लिक फंड्स सेफ और

[01:59:53] अकाउंटेबल रहे। अटॉर्नी जनरल ऑफ इंडिया

[01:59:56] आर्टिकल 76 काम क्या है? सेंट्रल

[01:59:59] गवर्नमेंट का चीफ लीगल एडवाइजर गवर्नमेंट

[02:00:01] को लीगल ओपिनियन देना सुप्रीम कोर्ट में

[02:00:04] गवर्नमेंट को रिप्रेजेंट करना क्यों जरूरी

[02:00:06] है? गवर्नमेंट जब लॉ बनाती है या

[02:00:09] इंप्लीमेंट करती है तो लीगल क्लेरिटी

[02:00:11] एसेंशियल होती है। अटर्नी जनरल एनश्योर

[02:00:14] करते हैं कि डिसीजंस कॉन्स्टिट्यूशन के

[02:00:16] अकॉर्डिंग हो। एडवोकेट जनरल स्टेट आर्टिकल

[02:00:20] 165 काम क्या है? स्टेट गवर्नमेंट को

[02:00:24] स्टेट गवर्नमेंट का चीफ लीगल एडवाइजर हाई

[02:00:26] कोर्ट में स्टेट्स को रिप्रेजेंट करना

[02:00:29] क्यों जरूरी है? स्टेट लेवल गवर्नेंस के

[02:00:31] लिए लीगल एडवाइस इक्वली इंपॉर्टेंट होती

[02:00:33] है। नेशनल कमीशन फॉर शेड्यूल कास्ट्स

[02:00:36] आर्टिकल 338 काम क्या है? शेड्यूल्ड कास्ट

[02:00:40] कम्युनिटीज के लिए शेड्यूल कास्ट

[02:00:42] कम्युनिटीज के राइट्स प्रोटेक्ट करना,

[02:00:44] कंप्लेंट्स इन्वेस्टिगेट करना, गवर्नमेंट

[02:00:47] को पॉलिसी इंप्रूवमेंट्स रेकमेंड करना

[02:00:49] क्यों जरूरी है? सोशल डिस्क्रिमिनेशन को

[02:00:51] स्टॉप करने के लिए एक डेडिकेटेड वॉच डॉग

[02:00:54] बॉडी होना इंपॉर्टेंट था। नेशनल कमीशन फॉर

[02:00:57] शेड्यूल्ड ट्राइब्स आर्टिकल 338 ए काम

[02:01:00] क्या है? एसटी कम्युनिटीज के लैंड राइट्स,

[02:01:03] फॉरेस्ट राइट्स और कल्चरल राइट्स को

[02:01:05] प्रोटेक्ट करना वायलेशंस की इंक्वायरी

[02:01:07] करना क्यों जरूरी है? ट्राइबल कम्युनिटीज

[02:01:10] सबसे वनरेबल ग्रुप्स में से एक है। उनके

[02:01:13] इंटरेस्ट प्रोटेक्ट करना प्रायोरिटी है।

[02:01:16] नेशनल कमीशन फॉर बैकवर्ड क्लासेस आर्टिकल

[02:01:18] 338 बी

[02:01:20] काम क्या है? ओबीसी कम्युनिटीज के वेलफेयर

[02:01:23] और राइट्स को मॉनिटर करना, बैकवर्ड क्लास

[02:01:25] लिस्ट और रिजर्वेशन रिलेटेड रेकमेंडेशंस

[02:01:28] देना। क्यों जरूरी है? ओबीसी पपुलेशन का

[02:01:31] साइज लार्ज है। उनके सोशियोइकोनमिक

[02:01:33] अपलिफ्टमेंट के लिए एक डेडिकेटेड

[02:01:35] कॉन्स्टिट्यूशन बॉडी नेसेसरी थी। स्पेशल

[02:01:38] ऑफिसर फॉर लिंग्विस्टिक माइनॉरिटीज।

[02:01:40] आर्टिकल 350 बी काम क्या है? लिंग्विस्टिक

[02:01:44] माइनॉरिटीज के लैंग्वेज राइट्स प्रोटेक्ट

[02:01:45] करना, स्टेट अथॉरिटीज की कंप्लायंस चेक

[02:01:48] करना। क्यों जरूरी है? इंडिया

[02:01:51] मल्टीलिंगुअल कंट्री है। लैंग्वेज

[02:01:53] डिस्क्रिमिनेशन अवॉइड करने के लिए यह रोल

[02:01:55] क्रूशियल है। नेक्स्ट इज नॉन

[02:01:58] कॉन्स्टिट्यूशनल बॉडीज। वो इंस्टीटशंस

[02:02:00] होते हैं जो डायरेक्टली कॉन्स्टिट्यूशन

[02:02:02] में मेंशन नहीं होते। यह या तो

[02:02:04] पार्लियामेंट के एक्ट से बनते हैं या

[02:02:06] गवर्नमेंट के एग्जीक्यूटिव ऑर्डर से। इनकी

[02:02:08] स्पेशलिटी होती है कि इनका स्ट्रक्चर और

[02:02:11] पावर्स टाइम टू टाइम मॉडिफाई किए जा सकते

[02:02:14] हैं। ताकि गवर्नेंस न्यू चैलेंजेस के

[02:02:16] अकॉर्डिंग अडॉप्ट हो सके। नॉन

[02:02:18] कॉन्स्टिट्यूशनल बॉडीज दो टाइप्स की होती

[02:02:20] हैं। स्टटरी बॉडीज यह पार्लियामेंट के

[02:02:23] किसी एक्ट से बनती हैं। इसलिए लीगली

[02:02:25] स्ट्रांग होती हैं। फॉर एग्जांपल सेबी

[02:02:28] सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया

[02:02:30] 1992 किस एक्ट से बनी? सेबी एक्ट 1992 काम

[02:02:35] क्या है? शेयर मार्केट को रेगुलेट करना,

[02:02:38] इन्वेस्टर्स के इंटरेस्ट को प्रोटेक्ट

[02:02:40] करना, फ्रॉड, इनाइडर ट्रेडिंग और मार्केट

[02:02:42] मैनपुलेशन को रोकना, स्टॉक एक्सचेंजेस को

[02:02:45] सुपरवाइज करना। क्यों जरूरी है? अगर शेयर

[02:02:48] मार्केट ट्रांसपेरेंट नहीं होगा तो लोग

[02:02:50] इन्वेस्ट नहीं करेंगे। सेबी मार्केट में

[02:02:53] ट्रस्ट, फेयरनेस और स्टेबिलिटी मेंटेन

[02:02:55] करता है। सीसीआई कंपटीशन कमीशन ऑफ इंडिया

[02:02:59] 2002

[02:03:01] किस एक्ट से बनी? कंपटीशन एक्ट 2002 काम

[02:03:04] क्या है?

[02:03:06] मार्केट में फेयर कंपटीशन इंश्योर करना,

[02:03:09] मोनोपोली और कार्टिल जैसे अनफेयर

[02:03:11] प्रैक्टिससेस को रोकना, कंपनीज के मर्जर्स

[02:03:14] एंड एक्विजिशंस का रिव्यू करना ताकि

[02:03:16] मार्केट हेल्दी रहे। क्यों जरूरी है? अगर

[02:03:20] एक कंपनी पूरा मार्केट कैप्चर कर ले तो

[02:03:22] कंज्यूमर्स को नुकसान होता है। सीसीआई

[02:03:25] एनश्योर करता है कि मार्केट कंपिटिटिव और

[02:03:27] कंज्यूमर फ्रेंडली रहे। एनजीटी नेशनल

[02:03:30] ग्रीन ट्राइबनल 2010 किस एक्ट से बनी?

[02:03:33] एनजीटी एक्ट 2010 काम क्या है?

[02:03:37] एनवायरमेंटल डिस्प्यूट्स को फास्ट ट्रैक

[02:03:39] करना, पोल्यूशन, डिफॉरेस्टेशन, इकोलॉजिकल

[02:03:42] डैमेज पर तेजी से डिसीजंस लेना,

[02:03:44] एनवायरमेंट प्रोटेक्शन को लीगल बैक देना।

[02:03:47] क्यों जरूरी है? कोर्ट्स में एनवायरमेंटल

[02:03:49] केसेस बहुत टाइम लेते थे। एनजीटी एक

[02:03:52] स्पेशलाइज्ड ग्रीन कोर्ट है जो फास्ट

[02:03:54] जस्टिस देता है। एनएचआरसी नेशनल ह्यूमन

[02:03:57] राइट्स कमीशन 1993 किस एक्ट से बनी?

[02:04:01] प्रोटेक्शन ऑफ ह्यूमन राइट्स एक्ट 1993

[02:04:03] काम क्या है? ह्यूमन राइट्स वायलेशंस की

[02:04:06] इंक्वायरी करना। गवर्नमेंट या पुलिस की

[02:04:08] एक्शन या फेलियर का रिव्यू करना।

[02:04:10] विक्टिम्स के लिए कंपनसेशन और रिफॉर्म्स

[02:04:13] रेकमेंड करना। एनएचआरसी एनश्योर करता है

[02:04:16] कि इंसानी डिग्निटी और बेसिक राइट्स

[02:04:18] प्रोटेक्टेड रहे। चाहे ऑफेंडर कोई भी हो।

[02:04:22] सीआईसी सेंट्रल इंफॉर्मेशन कमीशन 2005 किस

[02:04:26] एक्ट से बनी? राइट टू इंफॉर्मेशन एक्ट

[02:04:28] 2005 काम क्या है? सिटीजंस को गवर्नमेंट

[02:04:32] से इंफॉर्मेशन दिलवाना, पब्लिक अथॉरिटीज

[02:04:35] को अकाउंटेबल बनाना। जब डिपार्टमेंट्स

[02:04:37] इंफॉर्मेशन डिनाई करें, सीआईसी उन्हें

[02:04:40] डायरेक्शन देता है। क्यों जरूरी है?

[02:04:42] आरटीआई डेमोक्रेसी का बैकबोन है। सीआईसी

[02:04:45] एनश्योर करता है कि गवर्नेंस ट्रांसपेरेंट

[02:04:48] रहे। लोकपाल एंड लोकायुक्त 2013 किस एक्ट

[02:04:53] से बनी? लोकपाल एंड लोकायुक्त एक्ट 2013

[02:04:58] काम क्या है? हाई लेवल करप्शन केसेस की

[02:05:01] इन्वेस्टिगेशन मिनिस्टर्स, एमपीज, सीनियर

[02:05:04] ब्यूरोक्रेट्स पर कंप्लेंट को रिव्यू

[02:05:06] करना, गवर्नमेंट को करप्शन फ्री फंक्शनिंग

[02:05:08] की तरफ पुश करना। क्यों जरूरी है?

[02:05:12] अकाउंटेबिलिटी बिना करप्शन कंट्रोल पॉसिबल

[02:05:14] नहीं है।

[02:05:17] लोकपाल लोकायुक्त सिस्टम पब्लिक ट्रस्ट

[02:05:19] बिल्ड करता है। एग्जीक्यूटिव बॉडीज यह

[02:05:22] गवर्नमेंट रेजोल्यूशन या ऑर्डर से बनती

[02:05:25] है। इसलिए यह ज्यादा फ्लेक्सिबल होती हैं।

[02:05:29] एग्जांपल्स नीति आयोग 2015 कैसे बनी?

[02:05:33] प्लानिंग कमीशन को रिप्लेस करने के लिए

[02:05:35] गवर्नमेंट रेजोल्यूशन से काम क्या है?

[02:05:38] पॉलिसी थिंक टैंक के रूप में काम करना।

[02:05:40] लॉन्ग टर्म डेवलपमेंट प्लानिंग करना,

[02:05:43] सेंटर स्टेट कोऑर्डिनेशन इंप्रूव करना,

[02:05:45] कोऑपरेटिव फेडरलिज्म, इनोवेशन और डाटा

[02:05:48] ड्रिवन पॉलिसीज प्रमोट करना क्यों जरूरी

[02:05:51] है? मॉडर्न इकॉनमी में स्टैटिक प्लानिंग

[02:05:54] नहीं चलती। नीति आयोग फ्लेक्सिबल और रियल

[02:05:57] टाइम पॉलिसी मेकिंग अलव करता है। सीबीआई

[02:06:00] सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन कैसे

[02:06:03] बनती है?

[02:06:04] एग्जीक्यूटिव रेजोल्यूशन और डीएसपीई एक्ट

[02:06:07] के प्रोविजंस के थ्रू ऑपरेट करती है। काम

[02:06:10] क्या है? करप्शन केसेस इन्वेस्टिगेट करना,

[02:06:13] इकोनॉमिक ऑफेंसेस और हाई प्रोफाइल

[02:06:15] क्राइम्स की इंक्वायरी, इंटरस्ट क्राइम्स

[02:06:17] और सेंसिटिव केसेस हैंडल करना। क्यों

[02:06:20] जरूरी है? सीबीआई नेशनल लेवल

[02:06:23] इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी है जो कॉम्प्लेक्स

[02:06:25] क्राइम्स को टैकल करती है। आरबीआई

[02:06:28] आईआरडीएआई एफएसएसएआई कोऑर्डिनेशन एंड

[02:06:32] रेगुलेशन आरबीआई रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया

[02:06:35] मॉनिटरी पॉलिसी कंट्रोल करता है। इनफ्लेशन

[02:06:38] मैनेज करता है। बैंक्स को रेगुलेट करता

[02:06:40] है। आईआरडीएआई इंश्योरेंस रेगुलेटरी

[02:06:44] अथॉरिटी इंश्योरेंस कंपनीज़ को रेगुलेट

[02:06:46] करता है। पॉलिसी होल्डर्स के इंटरेस्ट्स

[02:06:49] प्रोटेक्ट करता है। एफएसएसएआई फूड सेफ्टी

[02:06:52] अथॉरिटी फूड क्वालिटी स्टैंडर्ड्स सेट

[02:06:55] करता है। अनसेफ फूड प्रोडक्ट्स को मार्केट

[02:06:57] में आने से रोकता है। इस वीडियो में हमने

[02:06:59] अपने देश के संविधान को बनते हुए देखा।

[02:07:02] इसमें हुए मेजर चेंजेस को समझा और

[02:07:04] प्रोविजंस को पहचाना। अगर इस वीडियो के

[02:07:07] बाद आपके मन में कोई सवाल हो तो हमें जरूर

[02:07:10] बताएं। इसके साथ ही हम आपसे विदा लेते हैं

[02:07:12] और आशा करते हैं कि आपके सपनों को पाने

[02:07:15] में हमारे प्रयास आपको हेल्प करते रहेंगे।

[02:07:17] ऑल द बेस्ट।
