# ANTIFRAGILE

https://www.youtube.com/watch?v=TtcPo5h9TEU
Translation: en

[00:01] विंड अगर कैंडल पर चलेगी तो कैंडल बुझ जाएगी।
  If the wind blows on a candle, the candle will go out.

[00:05] लेकिन फायर पर चलेगी तो फायर और तेज हो जाएगी।
  But if it blows on a fire, the fire will become even stronger.

[00:08] यानी विंड फायर को और स्ट्रांग बना देती है।
  Meaning, wind makes fire stronger.

[00:12] वैसे ही रैंडमनेस, अनसर्टेनिटी, केओस यह सब चीजें हमसे छुपने की नहीं है।
  Similarly, randomness, uncertainty, chaos – these things are not to be hidden from.

[00:21] हमें इनका सामना करना चाहिए।
  We should face them.

[00:25] इनका फायदा उठाना चाहिए।
  We should take advantage of them.

[00:29] हमको फायर बनना है।
  We need to become fire.

[00:34] कैंडल नहीं विंड आनी चाहिए ताकि हम और स्ट्रांग हो सके।
  Not a candle, but wind should come so that we can become stronger.

[00:38] मेरा मानना है कि रैंडमनेस और अनसर्टेनिटी से डर के छुपना नहीं है बल्कि उनका यूज करना है।
  I believe that we should not hide in fear from randomness and uncertainty, but rather use them.

[00:45] सिर्फ अनसर्टेनिटी में जीना ही नहीं है जिससे बस मुश्किल से बचा जा सके।
  It is not enough to just live in uncertainty, just to avoid difficulties.

[00:49] हमें अनसर्टेनिटी में ना सिर्फ जीना है बल्कि उस पर जीत भी पानी है।
  We must not only live in uncertainty, but also conquer it.

[00:56] जैसे कुछ रोमन स्ट्रोइक्स होते थे वह हार नहीं
  Like some Roman Stoics, they did not lose.

[01:03] मानते थे बल्कि लास्ट में उनकी ही जीत होती थी।
  They believed, but in the end, they were the ones who won.

[01:10] मिशन यह है कि जो चीजें हमारे सामने नहीं दिखती जो समझ नहीं आती उन्हें हम अपना बना लें, काबू में कर लें या उन पर जीत हासिल कर लें।
  The mission is that things that are not visible to us, that we don't understand, we should make them our own, bring them under control, or achieve victory over them.

[01:22] कैसे? कुछ चीजें शख्स, रैंडमनेस, स्ट्रेस से फायदा उठाती हैं और ऐसे ही ग्रो करती हैं।
  How? Some things benefit from randomness, stress, and grow in this way.

[01:29] जो चीजें इन सब चीजों को पसंद करती हैं, उनको मैंने एंटी फ्रजाइल कहा है।
  Things that like all these things, I have called them antifragile.

[01:37] फ्रजाइल चीजें स्ट्रेस में टूट जाती हैं।
  Fragile things break under stress.

[01:39] लेकिन एंटीफ्रजाइल चीजें स्ट्रेस में और स्ट्रांग हो जाती हैं।
  But antifragile things become stronger under stress.

[01:45] रेिलिएंट सिर्फ सेम रहता है।
  Resilient just stays the same.

[01:49] पर एंटीफजाइल और बेहतर हो जाता है।
  But antifragile becomes even better.

[01:50] यह प्रॉपर्टी नेचर, इवोल्यूशन, आइडियाज, कल्चर, सिटीज, लीगल सिस्टम, ह्यूमन बॉडी, बैक्टीरिया, इनोवेशन हर लिविंग चीज में दिखती है।
  This property is seen in nature, evolution, ideas, culture, cities, legal systems, the human body, bacteria, innovation, in every living thing.

[02:01] लेकिन डेड चीजें जैसे स्टपलर
  But dead things like staplers

[02:06] में नहीं दिखती।
  I don't see it.

[02:08] एंटी फ्रजाइल को रेंडमनेस, अनसर्टेनिटी, गलतियां, रिस्क पसंद आता है।
  Anti-fragile likes randomness, uncertainty, mistakes, risk.

[02:15] इस वजह से हम अननोन चीजों को बिना समझे भी सही तरीके से हैंडल कर सकते हैं।
  Because of this, we can handle unknown things correctly even without understanding them.

[02:23] मेरा मानना है कि डम और एंटी फ्रजाइल बनना ज्यादा अच्छा है।
  I believe it is better to be dumb and anti-fragile.

[02:26] कंपेयर टू सिर्फ स्मार्ट और फ्रजाइल बनने के।
  Compared to just being smart and fragile.

[02:29] बहुत चीजें हमारे आसपास हैं जो स्ट्रेस, रैंडमनेस से स्ट्रांग होती हैं।
  Many things around us become stronger from stress and randomness.

[02:36] जैसे बॉडी, माइंड, इकोनमी, न्यूट्रिशन, फाइनेंशियल कॉन्ट्रैक्ट्स, डायबिटीज जैसी बीमारियां भी कम रेंडमनेस से आती हैं।
  Like the body, mind, economy, nutrition, financial contracts, even diseases like diabetes come from less randomness.

[02:49] एंटीफ्रजाइल को समझ के हम अनसर्टेन सिचुएशंस में बेहतर डिसीजंस ले सकते हैं।
  By understanding anti-fragile, we can make better decisions in uncertain situations.

[02:55] बिना सब कुछ प्रेडिक्ट किए।
  Without predicting everything.

[02:59] फ्रिजिलिटी को पहचानना आसान है।
  It is easy to recognize fragility.

[03:02] रिस्क को एक्यूरेटली प्रेडिक्ट करना मुश्किल है।
  It is difficult to accurately predict risk.

[03:05] ब्लैक स्ान प्रॉब्लम भी इसी से रिलेटेड है।
  The black swan problem is also related to this.

[03:05] किकर
  Kierkegaard

[03:07] इवेंट्स को प्रेडिक्ट नहीं कर सकते।
  We cannot predict events.

[03:10] लेकिन किस चीज को कितना नुकसान हो सकता है, वह देख सकते हैं।
  But we can see how much damage something can cause.

[03:16] हमें अपने रिस्क मैनेजमेंट के तरीके बदल देने चाहिए।
  We should change our risk management methods.

[03:19] टेस्ट भी सिंपल है।
  The test is also simple.

[03:22] जो चीज रैंडमनेस में फायदा उठा ले वह एंटीफ्रजाइल है।
  That which benefits from randomness is antifragile.

[03:26] जो नुकसान उठाए वह फ्रजाइल है।
  That which suffers damage is fragile.

[03:30] अगर एंटीफ्रजाइल सिस्टम से रैंडमनेस स्ट्रेस हटा दिया तो वह कमजोर या खत्म हो जाएगी।
  If randomness stress is removed from an antifragile system, it will become weak or perish.

[03:37] मॉडर्न दुनिया में हमने इकॉनमी, हेल्थ, एजुकेशन सबको ओवर प्रोटेक्ट करके वीक बना दिया है।
  In the modern world, we have made economies, health, and education weak by overprotecting them all.

[03:44] जैसे बेड पर लंबे टाइम तक रहने से मसल्स कमजोर हो जाती हैं।
  Just like muscles become weak from staying in bed for a long time.

[03:48] वैसे ही स्ट्रेस हटा के सिस्टम्स खत्म हो जाते हैं।
  Similarly, systems perish by removing stress.

[03:55] टॉप डाउन कंट्रोल से सिस्टम्स फ्रजाइल हो गए हैं।
  Systems have become fragile due to top-down control.

[03:58] लेकिन बॉटम अप्रोच, टिंकरिंग, इनोवेशन रेंडमनेस में ग्रो करते हैं।
  But bottom-up approaches, tinkering, and innovation grow in randomness.

[04:05] सोसाइटी का सबसे बड़ा प्रॉब्लम है स्किन
  The biggest problem of society is skin

[04:09] इन द गेम ना होना।
  Not being in the game.

[04:11] कुछ लोग खुद का फायदा निकाल लेते हैं।
  Some people take advantage of themselves.

[04:14] रैंडमनेस से लेकिन रिस्क दूसरों पर डाल देते हैं।
  From randomness, but put the risk on others.

[04:17] 208 की फाइनेंशियल क्राइसिस में भी ऐसा ही हुआ था।
  The same thing happened in the 208 financial crisis.

[04:21] पहले जो रिस्क लेता था वही लीडर या हीरो कहलाता था।
  Previously, whoever took the risk was called a leader or a hero.

[04:25] लेकिन अब ब्यूरोक्रेट्स, बैंकर्स, पावरफुल एकेडमिक्स बिना खुद रिस्क लिए सब कंट्रोल कर रहे हैं और आम लोगों को नुकसान हो रहा है।
  But now bureaucrats, bankers, powerful academics are controlling everything without taking risks themselves, and ordinary people are suffering.

[04:38] आज तक इतना ज्यादा कंट्रोल उन लोगों के हाथ में कभी नहीं था जिन पर कोई पर्सनल रिस्क नहीं है।
  Until today, such great control was never in the hands of those who have no personal risk.

[04:43] सबसे बड़ी एथिकल बात है कि अपनी एंटी फ्रेजिलिटी दूसरों की फ्रेजिलिटी की कॉस्ट पे नहीं होनी चाहिए।
  The biggest ethical point is that one's anti-fragility should not come at the cost of others' fragility.

[04:53] मैं चाहता हूं कि मैं खुश होकर एक ऐसे दुनिया में जीूं जो मुझे समझ नहीं आती।
  I want to live happily in a world that I don't understand.

[05:00] ब्लैक स्व्स वह बड़े-बड़े अजीब इवेंट्स हैं जो किसी भी आदमी के लिए बिल्कुल अनएक्सेक्टेड होते हैं।
  Black swans are those big, strange events that are completely unexpected for any person.

[05:05] और जब यह होते हैं
  And when they happen

[05:09] तो उस आदमी को नुकसान होता है।
  So that man suffers harm.

[05:13] ज्यादातर हिस्ट्री ऐसे ही ब्लैक स्ान इवेंट से बनती है।
  Most of history is made from such black swan events.

[05:16] लेकिन हम छोटी-मोटी चीजें समझने में लगे रहते हैं और बड़ी चीजें मिस कर देते हैं।
  But we get caught up in understanding small things and miss the big things.

[05:22] हम जो मॉडल्स और थरीज बनाते हैं, वह ब्लैक स्ान को ट्रैक ही नहीं कर सकते।
  The models and theories we create cannot track black swans.

[05:25] ब्लैक स्ान होने के बाद हम सोचते हैं कि हमने उसको पहले से गेस किया था क्योंकि बाद में सब कुछ समझ में आ जाता है।
  After a black swan occurs, we think we had guessed it beforehand because everything makes sense in retrospect.

[05:38] लेकिन असल में ऐसा नहीं होता।
  But in reality, that's not how it happens.

[05:42] हमारे दिमाग हिस्ट्री को सीधा सिंपल बना देता है।
  Our minds simplify history.

[05:45] इसलिए रेंडमनेस को हम अंडरएस्टीमेट करते हैं।
  Therefore, we underestimate randomness.

[05:47] जब रियलिटी में रैंडमनेस दिखता है तो हम उससे डर जाते हैं या ओवर रिएक्ट करते हैं।
  When randomness appears in reality, we become afraid of it or overreact.

[05:54] इस डर और ऑर्डर की भूख के चक्कर में हम ऐसे सिस्टम्स बना लेते हैं जो ब्लैक स्ान से नुकसान उठाते हैं।
  In pursuit of this fear and hunger for order, we create systems that suffer from black swans.

[06:04] फायदा नहीं।
  Not benefit.

[06:06] जब आप ऑर्डर ढूंढते हैं तो असली आर्डर
  When you look for order, real order

[06:09] मिलता नहीं।
  It is not found.

[06:14] रैंडमनेस को अगर हम समझें यूज करें तभी कुछ कंट्रोल मिलेगा।
  Only if we understand and use randomness will we get some control.

[06:18] कॉम्प्लेक्स सिस्टम्स में बहुत सारे कनेक्शंस होते हैं जो दिखाई नहीं देते।
  Complex systems have many connections that are not visible.

[06:25] नॉन लीनियर का मतलब है दो चीजें डबल करने से रिजल्ट डबल नहीं होता।
  Non-linear means that doubling two things does not double the result.

[06:28] कभी ज्यादा या कम होता है।
  Sometimes it is more or less.

[06:31] सिंपल कॉज इफेक्ट यहां काम नहीं करता।
  Simple cause and effect does not work here.

[06:35] जो मैनमेड कॉम्प्लेक्स सिस्टम्स हैं, वह ज्यादा अनप्रिडिक्टेबल होते जा रहे हैं और ब्लैक स्ान इवेंट्स ज्यादा होने लग गए हैं।
  Man-made complex systems are becoming more unpredictable, and black swan events are occurring more frequently.

[06:44] टेक्नोलॉजी बढ़ रही है पर प्रेडिक्टबिलिटी कम हो रही है।
  Technology is increasing, but predictability is decreasing.

[06:47] यह सब हमने बनाया है प्रोग्रेस के नाम पे जो एक्चुअली ब्लैक स्वान वलनेरेबल बना रहा है।
  We have made all this in the name of progress, which is actually making us vulnerable to black swans.

[06:54] ब्लैक स्वान प्रॉब्लम का सबसे बुरा पार्ट यह है कि रेयर इवेंट्स के चांसेस हम कैलकुलेट ही नहीं कर सकते।
  The worst part of the black swan problem is that we cannot calculate the chances of rare events.

[07:04] जितना रेयर इवेंट उतना ही अनप्रिडिक्टेबल।
  The rarer the event, the more unpredictable it is.

[07:10] फिर भी साइंटिस्ट्स ज्यादा कॉन्फिडेंट दिखते हैं।
  Still, scientists appear more confident.

[07:13] लेकिन असल में उनको कुछ नहीं पता होता।
  But in reality, they don't know anything.

[07:15] नेचर ही बेस्ट एक्सपर्ट है ब्लैक स्ान हैंडल करने में क्योंकि उसमें एंटी फ्रिजिलिटी है।
  Nature is the best expert in handling black swans because it has antifragility.

[07:21] नेचर बिना किसी आईवी लीग डायरेक्टर के अपने आप एडजस्ट करती रही है और सर्वाइव किया है।
  Nature has been adjusting itself and surviving without any Ivy League director.

[07:29] एंटीफ्रजिलिटी सिर्फ ब्लैक स्ान का स्यूशन नहीं है बल्कि उसको समझने से हम इंटेलेक्चुअल लेवल पर भी ब्लैक स्ान को एक्सेप्ट कर सकते हैं।
  Antifragility is not just the solution to black swans, but by understanding it, we can also accept black swans at an intellectual level.

[07:43] रोबस्ट होना भी काफी नहीं है।
  Being robust is also not enough.

[07:47] नेचर सिर्फ सेफ नहीं है।
  Nature is not just safe.

[07:47] वह एग्रेसिव है।
  It is aggressive.

[07:50] जो वीक है उसको खत्म कर देती है।
  It destroys whatever is weak.

[07:50] नई चीजें बनाती है।
  It creates new things.

[07:55] टाइम सब कुछ तोड़ देता है जो थोड़ा सा भी कमजोर है।
  Time breaks everything that is even slightly weak.

[07:57] इसलिए परफेक्ट रोबस्टनेस चाहिए पर वह पॉसिबल नहीं है।
  Therefore, perfect robustness is needed, but that is not possible.

[08:01] इसलिए हमें ऐसे सिस्टम्स चाहिए जो शॉक्स, रैंडमनेस, स्ट्रेस को यूज करके अपने आप को बार-बार
  Therefore, we need systems that use shocks, randomness, and stress to repeatedly

[08:12] नया बना सके।
  Could make it new.

[08:12] यही है एंटीफजिलिटी।
  This is antifragility.

[08:17] एंटीफ्रजाइल चीजें प्रेडिक्शन एरर से
  Antifragile things from prediction error

[08:20] फायदा उठाती हैं।
  take advantage.

[08:20] इसलिए आज दुनिया में वही
  Therefore, today in the world, only those

[08:23] चीजें टिकी हैं जो रैंडमनेस से स्ट्रांग
  things survive that become strong from randomness.

[08:25] हो जाती हैं।
  They become.

[08:25] हम सोचते हैं कि दुनिया
  We think that the world

[08:29] डिजाइन, रिसर्च फंडिंग से चलती है।
  runs on design and research funding.

[08:29] लेकिन
  But

[08:32] असल में टिंकरर्स और रिस्क टेकर्स की वजह
  in reality, due to tinkerers and risk-takers

[08:36] से चल रही है।
  it is running.

[08:36] जो टेक्नोलॉजी इनोवेशन है
  The technology innovation that is

[08:40] वह सब ट्रायल और एरर से आई है।
  has all come from trial and error.

[08:40] बुक्स
  Books

[08:44] लिखने वाले एकेडमिक्स ने नहीं बनाई।
  writers academics did not create.

[08:47] फ्रजिलिटी को हम मेजर कर सकते हैं रिस्क
  We can measure fragility, risk

[08:50] को नहीं।
  cannot.

[08:50] रिस्क का एस्टीमेट कभी सही नहीं
  The estimate of risk is never correct.

[08:53] होता।
  It happens.

[08:53] खासकर रेयर इवेंट्स का।
  Especially for rare events.

[08:57] फ्रिजिलिटी
  Fragility

[08:57] और एंटीफ्रजिलिटी हर चीज की एक प्रॉपर्टी
  and antifragility are a property of everything

[09:00] है जो हम देख सकते हैं, कंपेयर कर सकते
  that we can see, can compare,

[09:03] हैं, मेजर भी कर सकते हैं।
  can, can also measure.

[09:03] हम आसानी से
  We can easily

[09:07] बोल सकते हैं कि कौन सी चीज फ्रजाइल है।
  say which thing is fragile.

[09:07] जैसे दादी मां टेंपरेचर से ज्यादा फ्रजाइल
  Like grandmother is more fragile than temperature

[09:13] कोई डिक्टेटरशिप ज्यादा फ्रजाइल है पॉलिटिकल चेंज में।
  Some dictatorship is more fragile in political change.

[09:17] कोई बैंक ज्यादा फ्रजाइल है क्राइसिस में या कोई मॉडर्न बिल्डिंग अर्थक्वेक में ज्यादा फ्रजाइल है।
  Some bank is more fragile in crisis or some modern building is more fragile in an earthquake.

[09:26] हम यह भी प्रेडिक्ट कर सकते हैं कि कौन सी चीज ज्यादा चलेगी।
  We can also predict which thing will go further.

[09:33] रिस्क पर बात करना बेकार है।
  Talking about risk is useless.

[09:35] फ्रिजिलिटी पर ध्यान देना चाहिए।
  We should pay attention to fragility.

[09:38] फ्रजिलिटी का ऑोजिट है एंटीफजिलिटी।
  The opposite of fragility is antifragility.

[09:40] एंटीफजिलिटी को मेजर करने के लिए एक सिंपल रूल है जो हर फील्ड में काम करता है।
  There is a simple rule to measure antifragility that works in every field.

[09:46] हेल्थ से लेकर सोसाइटी तक।
  From health to society.

[09:50] हम रियल लाइफ में एंटी फ्रजिलिटी का फायदा उठाते हैं।
  We take advantage of antifragility in real life.

[09:53] पर इंटेलेक्चुअल लेवल पर उसको इग्नोर कर देते हैं।
  But on an intellectual level, we ignore it.

[09:58] फ्रजिलिस्ता वह आदमी है जो ज्यादातर सूट टाई पहनता है।
  A fragile person is someone who mostly wears a suit and tie.

[10:01] डेस्क पर बैठ के काम करता है।
  Works sitting at a desk.

[10:04] मीटिंग्स अटेंड करता है और समझता है कि जो चीज दिख नहीं रही या समझ नहीं आ रही वह एकिस्ट ही नहीं करती।
  Attends meetings and understands that what is not visible or understandable does not exist.

[10:12] मतलब जो चीज
  Meaning, the thing

[10:16] अननोन है उसको वह नॉन एकिस्टेंट मान लेता है।
  Whatever is unknown, it considers non-existent.

[10:20] फजिलिस्ता हमेशा यह सोचता है कि साइंस सब कुछ सॉल्व कर सकती है और रीजन हर चीज का समझ में आ सकता है।
  Fragilista always thinks that science can solve everything and reason can be understood for everything.

[10:31] लेकिन असल में कॉम्प्लेक्स सिस्टम्स नेचर और जिंदगी के बड़े-बड़े मिस्ट्रीज इतने सिंपल नहीं होते।
  But in reality, complex systems, nature, and the big mysteries of life are not that simple.

[10:38] फ्रजिलिता खुद ही अपनी सोच को साइंस का लेबल देकर मैनुअल बनाने लग जाता है बिना असली समझ के।
  Fragilista itself starts labeling its thinking as science and making it manual without real understanding.

[10:47] फ्रजिलिस्टा की वजह से मॉडर्न सोसाइटी में मिस्टीरियस कॉम्प्लेक्स अजीब चीजें इग्नोर होने लगती हैं।
  Because of Fragilista, mysterious, complex, strange things start getting ignored in modern society.

[10:53] जिनको निच ने डायोनीजियन बोला था।
  Which Nietzsche called Dionysian.

[11:01] यह एक तरह का सकर गेम है जिसमें फायदा थोड़ा और दिखाई देता है लेकिन नुकसान छुपा हुआ और बड़ा होता है।
  This is a kind of sucker game in which the profit appears a little more, but the loss is hidden and greater.

[11:10] मेडिकल फ्रजिलिस्ता बॉडी को नेचुरली हील नहीं करने देता।
  Medical fragilista does not let the body heal naturally.

[11:14] ज्यादा दवा देता है जिससे
  It gives more medicine, due to which

[11:17] साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं।
  There can be side effects.

[11:20] पॉलिसी फजिलिस्ता इकॉनमी को बार-बार ठीक करने के चक्कर में ब्लो अप कर देता है।
  Policy fragility blows up the economy by trying to fix it repeatedly.

[11:27] साइकेट्रिक फ्रजिलिस्ता बच्चों को मेडिसिन देकर उनका माइंड इंप्रूव करता है।
  Psychiatric fragility improves children's minds by giving them medicine.

[11:35] फिनेंशियल फ्रजिलिस्ता बैंकिंग सिस्टम को गलत मॉडल से डिस्ट्रॉय कर देता है।
  Financial fragility destroys the banking system with the wrong model.

[11:40] प्रेडिक्टर फजिलिस्ता अननेसेसरी रिस्क लेने को कहता है।
  Predictor fragility tells you to take unnecessary risks.

[11:46] मिलिट्री और सॉकर मॉम टाइप फ्रेजिलिस्ता भी सिस्टम को डिस्टर्ब करते हैं।
  Military and soccer mom type fragility also disturb the system.

[11:51] पॉलिटिशियंस सिर्फ रेिलियंस या सॉलिडिटी की बात करते हैं।
  Politicians only talk about resilience or solidity.

[11:57] लेकिन एंटी फ्रजिलिटी की नहीं।
  But not about anti-fragility.

[11:57] असली प्रोग्रेस, ग्रोथ, इवोल्यूशन, रिस्क और गलती करने वाले लोगों की वजह से होती है।
  Real progress, growth, evolution happen because of people who take risks and make mistakes.

[12:07] पॉलिसी मेकर्स की वजह से नहीं।
  Not because of policymakers.

[12:07] कॉम्प्लेक्स सिस्टम के लिए कॉम्प्लिकेटेड रूल्स की जरूरत नहीं होती।
  Complex systems do not need complicated rules.

[12:13] सिस्टम जितना सिंपल होगा उतना ही बेहतर।
  The simpler the system, the better.

[12:16] कॉम्प्लिकेटेड रूल्स से अनएक्सेक्टेड
  Complicated rules lead to unexpected

[12:18] प्रॉब्लम्स बढ़ जाती हैं और हर इंटरवेंशन के बाद नए प्रॉब्लम्स आते हैं।
  Problems increase and new problems arise after every intervention.

[12:25] सिंपलीसिटी मॉडर्न लाइफ में मुश्किल हो गई है क्योंकि कुछ लोगों को अपनी जॉब बचाने के लिए सब कुछ कॉम्प्लेक्स दिखाना पसंद है।
  Simplicity has become difficult in modern life because some people like to show everything as complex to save their jobs.

[12:35] सिंपलीसिटी पाना आसान नहीं है।
  Achieving simplicity is not easy.

[12:38] हार्ड वर्क चाहिए।
  Hard work is needed.

[12:41] स्टीव जॉब्स ने भी कहा था कि सिंपल सोच लाना सबसे मुश्किल है।
  Steve Jobs also said that bringing simple thinking is the most difficult.

[12:45] अरबों की एक कहावत है।
  There is an Arabic proverb.

[12:49] समझना आसान है लेकिन लिखना मुश्किल है।
  It is easy to understand but difficult to write.

[12:52] थ्योरिस्टिक्स यानी सिंपल रूल्स यूज करिए।
  Use heuristics, meaning simple rules.

[12:55] लेकिन यह याद रहे कि वह परफेक्ट नहीं होते।
  But remember that they are not perfect.

[12:58] सिर्फ काम चलाऊ होते हैं।
  They are just makeshift.

[13:01] अगर हम इनको परफेक्ट समझ लेंगे तो वह डेंजरस हो जाते हैं।
  If we consider them perfect, they become dangerous.

[13:04] एंटीफजिलिटी की सोच एकदम सीधी नहीं थी बल्कि बहुत घुमावदार थी।
  The thinking of antifragility was not straightforward but very convoluted.

[13:07] एक दिन मुझे समझ आया कि फ्रिजिलिटी का मतलब है जो चीज वोलेटिलिटी, रेंडमनेस, अनसर्टेनिटी, स्ट्रेस, एरर, डिसऑर्डर से नफरत करती है।
  One day I understood that fragility means something that hates volatility, randomness, uncertainty, stress, error, disorder.

[13:21] जैसे आपके घर का ग्लास, टीवी या वह चाइना सेट।
  Like the glass in your house, the TV, or that China set.

[13:25] अगर फ्रजाइल है तो उसको सिर्फ शांति, ऑर्डर, प्रेडिक्टबिलिटी पसंद है।
  If it is fragile, it only likes peace, order, predictability.

[13:34] कोई शॉक, कोई अर्थक्वेक, कोई हिलन या शोर पसंद नहीं।
  It doesn't like any shock, any earthquake, any shaking or noise.

[13:38] और फ्रजाइल चीजें टाइम को भी पसंद नहीं करती क्योंकि टाइम के साथ और प्रॉब्लम्स आती हैं।
  And fragile things don't like time either because with time more problems arise.

[13:44] चीज टूट सकती है।
  The thing can break.

[13:48] एंटीफजलिटी इस डेफिनेशन का उल्टा है।
  Antifragility is the opposite of this definition.

[13:52] वह चीजें जो वोलेटिलिटी, अनसर्टेनिटी, रेंडमनेस, एरर्स, केओस, स्ट्रेसर्स सबको पसंद करती हैं।
  Those things that like volatility, uncertainty, randomness, errors, chaos, stressors, all of them.

[13:59] यह टाइम को भी पसंद करती हैं क्योंकि टाइम के साथ फायदा मिल सकता है।
  They also like time because with time there can be a benefit.

[14:06] यहां एक स्ट्रांग कनेक्शन है नॉन लीनियरिटी से।
  Here there is a strong connection to non-linearity.

[14:09] जो भी चीज का रिस्पांस नॉन लीनियर है, वह या तो फ्रजाइल होगी या एंटी फ्रजाइल रैंडमनेस के हिसाब से।
  Whatever thing's response is non-linear, it will either be fragile or antifragile according to randomness.

[14:20] सबसे अजीब बात है कि यह सिंपल प्रॉपर्टी
  The strangest thing is that this simple property

[14:23] कि फ्रजाइल चीजें वोलेटिलिटी को हेट करती हैं।
  That fragile things hate volatility.

[14:26] कभी भी साइंस या फिलॉसफी में सीरियसली डिस्कस नहीं हुई।
  It was never seriously discussed in science or philosophy.

[14:32] मेरा काम भी इसी पर था।
  My work was also on this.

[14:32] मैं देखता था कि कौन सी चीज वोलेटिलिटी को पसंद करती है या नहीं करती।
  I used to see which things like volatility or not.

[14:38] फाइनशियल मार्केट से शुरू हुआ था यह काम पर बाद में मुझे लगा कि यह हर जगह काम करता है।
  This work started from financial markets, but later I felt that it works everywhere.

[14:45] मेडिसिन, पॉलिटिक्स, खाना बनाना हर जगह।
  Medicine, politics, cooking, everywhere.

[14:48] इस फील्ड में दो तरह के लोग होते हैं।
  There are two types of people in this field.

[14:51] एक एकेडमिक्स जो फ्यूचर इवेंट्स का स्टडी करते हैं।
  One is academics who study future events.

[14:54] बुक्स पेपर्स लिखते हैं।
  They write books and papers.

[14:57] दूसरे प्रैक्टिशनर्स जो प्रेडिक्ट नहीं करते बल्कि देखते हैं कि कोई भी चीज वोलेटिलिटी आने पर कैसे रिएक्ट करती है।
  The second are practitioners who do not predict but see how anything reacts when volatility arrives.

[15:07] प्रैक्टिशनर्स ज्यादा बिजी होते हैं।
  Practitioners are busier.

[15:10] वह बुक्स लिखने का टाइम नहीं निकालते।
  They do not take out time to write books.

[15:13] दोनों का डिफरेंस बहुत बड़ा है।
  The difference between the two is very large.

[15:16] फ्यूचर प्रेडिक्ट करना बहुत मुश्किल है।
  Predicting the future is very difficult.

[15:19] लेकिन यह देखना आसान है कि कोई चीज वोलेटिलिटी से
  But it is easy to see how something reacts to volatility.

[15:25] टूटेगी या स्ट्रांग होगी।
  Will it break or become strong?

[15:28] सिर्फ प्रैक्टिशनर्स यह पॉइंट नेचुरली समझ लेते हैं।
  Only practitioners naturally understand this point.

[15:33] फ्रजिलिटी और एंटीफजिलिटी का मेन पॉइंट यह है कि कोई भी सिस्टम या तो वोलेटिलिटी से नुकसान उठाता है यानी फ्रजाइल या फायदा उठाता है यानी एंटीफ्रजाइल।
  The main point of fragility and antifragility is that any system either suffers damage from volatility, meaning fragile, or benefits, meaning antifragile.

[15:46] और यह सिर्फ वोलेटिलिटी नहीं बल्कि डिसऑर्डर फैमिली के और भी मेंबर्स हैं।
  And it's not just volatility, but also other members of the disorder family.

[15:52] अनसर्टेनिटी, वेरिएबिलिटी, इनकंप्लीट नॉलेज, चांस, केओस, डिसऑर्डर, एंट्रोपी, टाइम, अननोन, रैंडमनेस, टर्मोइल, स्ट्रेसर, एरर, आउटकम का फर्क और नॉलेज।
  Uncertainty, variability, incomplete knowledge, chance, chaos, disorder, entropy, time, unknown, randomness, turmoil, stressors, errors, difference in outcome, and knowledge.

[16:09] यह सब एक ही फैमिली है।
  These are all from the same family.

[16:13] एंटी फ्रजाइल सिस्टम्स इन सब चीजों से ग्रो करते हैं।
  Antifragile systems grow from all these things.

[16:16] फ्रजाइल सिस्टम्स इन सब चीजों से खत्म होते हैं।
  Fragile systems are destroyed by all these things.

[16:21] टाइम भी वोलेटिलिटी की तरह काम करता है।
  Time also works like volatility.

[16:24] जितना ज्यादा टाइम उतनी ज्यादा
  The more time, the more

[16:26] पॉसिबिलिटीज, उतनी ज्यादा अनसर्टेनिटी, उतनी ज्यादा एरर्स या नई अपॉर्चुनिटीज।
  The more possibilities, the more uncertainty, the more errors or new opportunities.

[16:34] अगर कोई चीज थोड़ा हार्म हैंडल कर सकती है और थोड़ा एंटी फ्रजाइल है तो टाइम के साथ वह ग्रो कर जाती है।
  If something can handle a little harm and is a little anti-fragile, it grows over time.

[16:41] जैसे एक्सपीरियंस बढ़ता है वैसे।
  Just as experience grows.

[16:44] लेकिन फ्रजाइल चीजें टाइम के साथ टूट जाती हैं।
  But fragile things break over time.

[16:50] मेरे लिए यह बुक मेरी लाइफ का मेन काम है।
  For me, this book is the main work of my life.

[16:54] मेरा एक ही मेन आईडिया था।
  I had only one main idea.

[16:57] उसको हर लेवल पर ले जाकर यहां तक लाया।
  I took it to every level and brought it here.

[17:01] प्रैक्टिशनर की सोच और रैंडमनेस अनसर्टेनिटी के इंटरेस्ट को मिलाकर प्रैक्टिकल और थ्यरी दोनों कंबाइन किए।
  Combining the practitioner's thinking and the interest of randomness and uncertainty, I combined both practical and theory.

[17:07] मेरे सारे लिखे एस एक ही मेन आईडिया के अलग चैप्टर्स हैं।
  All my written essays are different chapters of the same main idea.

[17:11] इंसर्ट कॉर्पस जो रैंडमनेस, अनसर्टेनिटी, डिसऑर्डर और उन सब चीजों के डिसीजन मेकिंग से जुड़े हैं जो हम नहीं समझ पाते।
  Insert corpus which is related to decision-making of randomness, uncertainty, disorder, and all those things that we don't understand.

[17:20] दुनिया में जो छुपी हुई चीजें हैं उन्हें।
  The hidden things in the world.

[17:29] इसमें तीन बुक्स और एडों्स हैं और हर बुक
  It has three books and add-ons, and every book

[17:32] के चैप्टर एक दूसरे से जुड़े हैं।
  its chapters are connected to each other.

[17:35] चाहे साइंस हो, फिलॉसफी, बिजनेस, साइकोलॉजी,
  Whether it's science, philosophy, business, psychology,

[17:38] लिटरेचर या मेरी खुद की स्टोरी।
  literature, or my own story.

[17:42] द ब्लैक स्वान और एंटीफ्रजाइल दोनों कनेक्टेड है।
  The Black Swan and Antifragile are both connected.

[17:45] एंटीफ्रजाइल मेन बुक है।
  Antifragile is the main book.

[17:48] ब्लैक स्वान उसका सप्लीमेंट।
  Black Swan is its supplement.

[17:51] क्योंकि ब्लैक स्वान प्रॉब्लम बताती है और एंटीफ्रजाइल स्यूशन।
  Because Black Swan tells the problem and Antifragile the solution.

[17:55] ब्लैक स्वान और फुल बाय रैंडमनेस बताते हैं कि दुनिया में रेयर इवेंट्स डोमिनेट करते हैं और हमें लगता है कि हम समझ पाते हैं पर असल में समझ नहीं पाते।
  Black Swan and Fooled by Randomness tell us that rare events dominate the world, and we think we understand, but we actually don't.

[18:07] एंटी फ्रजाइल मानती है कि अब हमें यह समझना नहीं कि दुनिया अनप्रिडिक्टेबल है।
  Antifragile believes that we should not understand that the world is unpredictable.

[18:10] बल्कि अब प्रैक्टिकल काम करना है।
  Rather, we should now do practical work.

[18:13] कैसे अनसर्टेनिटी और रैंडमनेस को अपने फेवर में यूज करें।
  How to use uncertainty and randomness in our favor.

[18:17] प्रैक्टिकल सशंस पर फोकस करें।
  Focus on practical solutions.

[18:25] मैं जो लिखता हूं वही खुद करता हूं।
  I do what I write.

[18:28] जो रिस्क मैं दूसरों को लेने या ना लेने को
  The risks I tell others to take or not to take

[18:30] बोलता हूं वह पहले खुद लेता हूं या बचता हूं।
  I speak, I take it myself first or I survive.

[18:34] अगर मैं गलत हो गया तो सबसे पहले नुकसान मुझे ही होगा।
  If I am wrong, then first of all, I will be the one to suffer the loss.

[18:37] जैसे जब मैंने द ब्लैक स्ान में बैंक्स की फ्रेजिलिटी पर वर्न किया था तो मैं खुद बैंक कोलैब से बेट कर रहा था।
  For example, when I warned about the fragility of banks in The Black Swan, I myself was betting on bank collapses.

[18:45] वरना लिखना अनएथिकल लगता।
  Otherwise, writing felt unethical.

[18:48] यह रूल मेरे लिए हर फील्ड में है।
  This rule applies to me in every field.

[18:50] मेडिसिन, टेक्नोलॉजी, जिंदगी सब में।
  Medicine, technology, life, in everything.

[18:54] मैं मानता हूं कि खुद का एक्सपीरियंस ही असली सच्चाई दिखाता है क्योंकि स्टडीज में डाटा छांट के दिखाया जा सकता है।
  I believe that personal experience shows the real truth because data in studies can be selectively presented.

[19:00] कहानी बनाई जा सकती है।
  A story can be fabricated.

[19:04] पर पर्सनल एक्सपीरियंस डायरेक्ट होता है।
  But personal experience is direct.

[19:07] मुझे लगता है कि अगर किसी टॉपिक पे लिखने के लिए लाइब्रेरी से पढ़ना पड़े तो वह टॉपिक मेरे लिए नहीं है।
  I feel that if I have to read from the library to write about a topic, then that topic is not for me.

[19:13] अगर खुद की क्यूरियोसिटी या जरूरत के लिए मैंने ऑलरेडी नहीं पढ़ा तो मैं उस पे लिख नहीं सकता।
  If I haven't already read about it out of my own curiosity or need, then I cannot write about it.

[19:19] मतलब आइडियाज वही होने चाहिए जो अंदर से आए जो टाइम के साथ पक्के हो।
  Meaning, the ideas should be those that come from within, that are solidified over time.

[19:25] सिर्फ वही असली हैं।
  Only those are real.

[19:29] प्रोफेशनल को वही
  Professionals, those

[19:33] लिखना चाहिए जो रियलिटी से आया हो ना कि सिर्फ लाइब्रेरी रिसर्च से।
  One should write what comes from reality, not just from library research.

[19:39] बिलीफ वही असली है जिसमें आदमी अपनी जान पे रिस्क ले।
  Belief is only real when a person risks their life for it.

[19:43] दिखावा नहीं असली रिस्क।
  Not pretense, real risk.

[19:47] आज की दुनिया में एथिक्स की जगह लॉ आ गया है और लॉ को लॉयर आसानी से गेम कर सकते हैं।
  In today's world, law has replaced ethics, and lawyers can easily game the law.

[19:54] इसलिए मैं खुद को और दूसरों को भी फोर्स करता हूं कि जब भी सिस्टम में फ्रॉड दिखे तो उसको एक्सपोज करिए।
  Therefore, I force myself and others too that whenever fraud is seen in the system, expose it.

[19:59] वरना आप खुद फ्रॉड हैं।
  Otherwise, you yourself are a fraud.

[20:02] अगर कोई बुरे काम कर रहा है और आप चुप हैं तो आप भी उसी में शामिल हैं।
  If someone is doing bad deeds and you are silent, then you are also involved in it.

[20:08] प्राइवेट में कुछ और बोलना, पब्लिक में कुछ और लिखना यह फेक है और सोसाइटी की प्रॉब्लम्स भी इसी से आती हैं।
  Saying one thing in private and writing another in public is fake, and society's problems also arise from this.

[20:16] इसलिए मुझे जब भी किसी को फ्रॉड या डेंजरस बोलना हो तो वह मैं पब्लिक में भी बोलूंगा।
  Therefore, whenever I have to call someone fraudulent or dangerous, I will say it in public too.

[20:21] कॉम्प्रोमाइज का मतलब है बुरा काम सपोर्ट करना।
  Compromise means supporting bad work.

[20:25] मेरा रोल है कि मैं दुनिया को बिना डरे पूरी ऑनेस्टी से जज करूं।
  My role is to judge the world with complete honesty, without fear.

[20:27] यह सिर्फ एम नहीं ऑब्लिगेशन है।
  This is not just a goal, it is an obligation.

[20:34] दूसरा पॉइंट मैं खुद पे वही साइंटिफिक

[20:38] प्रोसेस अप्लाई करता हूं जो दूसरों से

[20:41] एक्सपेक्ट करता हूं। मेडिसिन या साइंस के

[20:44] क्लेम्स को मैं फैक्ट चेक पीियर रिव्यू

[20:47] में डालना पसंद करता हूं। लॉजिकल या मैथ्स

[20:51] वाली चीजें अपने आप खड़ी हो सकती हैं।

[20:54] उनको अलग से प्रूफ की जरूरत नहीं। इसलिए

[20:57] टेक्निकल फुट नोट्स एकेडमिक प्लेसिस पे

[21:00] पब्लिश करता हूं। बाकी मैं कुछ भी पब्लिश

[21:03] नहीं करता ताकि असली ऑनेस्टी बनी रहे।

[21:06] करियर की रेस ना बन जाए।

[21:10] मैं 20 साल ट्रेडर और बिजनेसमैन रहा हूं।

[21:13] जब मैं एकेडमिया में गया तो देखा कि वहां

[21:16] लाइफ अजीब है। कॉमर्स में मजा, एनर्जी,

[21:19] नेचुरलनेस है। लेकिन एकेडमिक्स में जेलसी,

[21:22] छोटी सोच, गजेस और लोनलीनेस मिलती है।

[21:27] एकेडमिक लोग एक दूसरे पर ट्रस्ट नहीं

[21:29] करते। सिर्फ रिकॉग्निशन और क्रेडिट के

[21:32] पीछे भागते हैं। बिजनेस में रिलेशन क्लीन

[21:35] होते हैं। पर एकेडमिक्स में दिखावा,

[21:37] राइवलरी और इनसिक्योरिटी ज्यादा मिलता है।

[21:41] मुझे लगता है छोटा बिजनेस, बाजार, मार्केट

[21:45] ही असली टॉलरेंस, ऑनेस्टी और लव लाते हैं।

[21:49] लेक्चर्स या रीजनिंग से नहीं। यहां

[21:51] गलतियां छोटी होती हैं और जल्दी भूल जाते

[21:54] हैं। मैं खुश हूं कि मैं ह्यूमन हूं और

[21:57] मुझे ऐसी जगह पसंद है जहां लोग अपनी

[22:00] किस्मत से प्यार करते हैं। एकेडेमिया में

[22:03] यह फीलिंग नहीं मिली पर कॉमर्स और अकेले

[22:06] पढ़ाई में मिली। बिजनेस और मार्केट ही

[22:10] इंसान को टोलरेंट, लविंग और ऑनेस्ट बना

[22:13] सकते हैं। एंटीफजाइल किताब सात अलग बुक्स

[22:17] और एक नोट्स सेक्शन में बंटी है। मैंने

[22:21] इन्हें बुक्स इसलिए बोला क्योंकि हर पार्ट

[22:24] अलग टॉपिक पर डीप जाता है। कभी इवोल्यूशन,

[22:27] कभी पॉलिटिक्स, बिजनेस, साइंस, एथिक्स,

[22:30] नॉलेज, फिलॉसफी पर सब एक ही सेंट्रल

[22:34] आईडिया से जुड़े हैं। यह पार्ट्स एस जैसे

[22:37] फील देते हैं ना कि टेक्स्ट बुक जैसा।

[22:41] मैंने पर्सनल एक्सपीरियंस, स्टोरी और

[22:43] पैरेबल को साइंस और थ्यरी के साथ मिक्स

[22:46] किया है। मैंने प्रोबेबिलिटी और रिस्क

[22:49] अपने बिजनेस लाइफ के एक्सपीरियंस अपने खुद

[22:53] की कहानियों के साथ लिखा है।

[22:56] इसलिए सोच और राइटिंग अलग है। ऑटोग्राफी

[22:59] जैसा टच है। यह किताब अनसर्टेनिटी को

[23:03] समझने के लिए पर्सनल एस्स का बेस्ट फॉर्म

[23:06] है शायद।

[23:10] बुक वन में द एंटीफ्रजाइल यह नई प्रॉपर्टी

[23:13] बताती है और दिखाती है कि वो और लिविंग

[23:16] चीजें एंटीफ्रजाइल सिस्टम का बेस्ट

[23:19] एग्जांपल है। यहां यह भी दिखाया है कि

[23:22] कैसे कलेक्टिव एंटीफ्रजाइल हो सकता है।

[23:25] जबकि इंडिविजुअल फ्रजाइल हो।

[23:29] बुक दो

[23:31] मॉडर्निटी एंड द डिनाइल ऑफ एंटीफजिलिटी।

[23:35] यहां बताया है कि जब सिस्टम्स जैसे

[23:37] पॉलिटिकल सिस्टम को वोलेटिलिटी से दूर रखा

[23:40] जाता है तो क्या होता है? नेशन स्टेट का

[23:44] कांसेप्ट और हीलर जो हेल्प करने के चक्कर

[23:47] में नुकसान कर देता है। यह सब डिस्कस हुआ

[23:50] है। बुक तीन अ नॉन प्रेडिक्टिव व्यू ऑफ द

[23:55] वर्ल्ड। यहां फैट टोनी नाम का कैरेक्टर को

[23:58] इंट्रोड्यूस किया है जो फ्रिजिलिटी को

[24:00] अपने एक्सपीरियंस से समझ लेता है। सिनेका

[24:03] के राइटिंग से असिमेट्री का कांसेप्ट

[24:06] बताया है। बुक चार ऑप्शनलिटी टेक्नोलॉजी

[24:10] एंड द इंटेलिजेंस ऑफ एंटीफजिलिटी।

[24:13] यह दुनिया के एक अजीब प्रॉपर्टी को दिखाता

[24:16] है जिसमें असिमेट्री का मेजर रोल है और

[24:19] बताता है कि अपॉर्चुनिटी कैसे हमको आज तक

[24:23] ले आई।

[24:24] यहां सोवियत हार्व मेथड का ऑोजिशन है। फैट

[24:28] टोनी और सोक्रेटीस के बीच डिबेट भी है।

[24:32] बुक पांच द नॉन लीनियर एंड द नॉन लीनियर।

[24:36] यह फिलॉसफर्स स्टोन और उसके उल्टे पर फोकस

[24:40] करती है। दो मेन चैप्टर्स टेक्निकल

[24:43] डिटेल्स कॉन्वेक्सिटी स्ट्रेटजीस और

[24:46] फ्रिजिलिटी मैपिंग पर हैं।

[24:50] बुक छ वाया नेगेटिवा।

[24:53] यहां सबट्रक्शन की पावर दिखाई है। यानी

[24:56] कुछ चीजें ऐड करने के बजाय कुछ चीजें हटा

[24:59] देना ज्यादा यूज़फुल होता है। मेडिसिन को

[25:02] रिस्क मैनेजमेंट और नॉलेज के हिसाब से

[25:04] देखा है। बुक सात द एथिक्स ऑफ फ्रिजिलिटी

[25:09] एंड एंटीफ्रजिलिटी।

[25:11] यह एथिक्स को फ्रिजिलिटी के ट्रांसफर पर

[25:14] ग्राउंड करता है। यानी जब एक पार्टी को

[25:17] फायदा मिलता है और दूसरे को नुकसान। स्किन

[25:20] इन द गेम नो होने की प्रॉब्लम्स यहां

[25:23] समझाई है।

[25:25] किताब तीन लेवल पर लिखी गई है। एक तो

[25:27] लिटरेरी फिलॉसोफिकल जहां पैरेबल और स्टोरी

[25:31] है। टेक्निकल आर्गुमेंट सिर्फ बुक पांच

[25:34] में है। दूसरा लेवल अपेंडिक्स है जिसमें

[25:36] ग्राफ्स और टेक्निकल बातें हैं। तीसरा

[25:39] बैकअप मटेरियल है जो सब टेक्निकल पेपर्स

[25:42] और नोट्स के फॉर्म में फ्रीली अवेलेबल है।

[25:45] मैं वर्न करता हूं कि एस्स और पैरेबल

[25:49] प्रूफ नहीं है।

[25:51] साइंटिफिक प्रूफ अलग चीज है। मैं यह भी

[25:54] क्लेरिफाई करना चाहूंगा कि रोबस्ट या

[25:57] रेिलिएंट सिर्फ डैमेज से बचते हैं। पर

[25:59] एंटीफ्रजाइल रैंडमनेस और शॉक से फायदा

[26:03] उठाते हैं। रोबस्ट और एंटीफ्रजाइल में

[26:06] फर्क समझना इंपॉर्टेंट है।

[26:10] अपेंडिक्स में ट्राइड दिया है। मतलब हर

[26:13] चीज को तीन कैटेगरी में मैप कर सकते हैं।

[26:15] फ्रजाइल, रोबस्ट या एंटी फ्रजाइल। दुनिया

[26:19] के बहुत अलग-अलग टॉपिक्स जैसे फिलॉसफर्स,

[26:22] सिटी स्टेट सिस्टम, आर्टिजन, डिस्कवरी,

[26:25] फाइनेंशियल सिस्टम, बैक्टीरिया

[26:28] रेजिस्टेंस, रैंडमनेस, इवोल्यूशन, रिस्क,

[26:31] इंश्योरेंस, मेडिसिन, मिडिल क्लास,

[26:34] वर्कआउट्स, बैंकिंग क्राइसिस सबको एक ही

[26:38] सीधे थ्रेड में जोड़ के दिखाया गया है।

[26:42] ट्राइड का मैप बनाकर हर चीज को समझा जा

[26:44] सकता है। इस किताब का मेन आईडिया है कि

[26:48] हमें फ्यूचर प्रेडिक्ट करने या

[26:50] प्रोबेबिलिटीज कैलकुलेट करने की जगह

[26:52] फ्रेजिलिटी पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि

[26:55] फ्रजिलिटी और एंटी फ्रेजिलिटी एक

[26:57] स्पेक्ट्रम पर आती है अलग-अलग लेवल पर।

[27:01] यहां मैं एक ट्रैड बनाता हूं। तीन कॉलम का

[27:04] एक मैप जिसमें हर चीज या सिस्टम को यह

[27:07] डिसाइड करना होता है कि वह फ्रजाइल,

[27:10] रोबस्ट या एंटी फ्रजाइल है। फ्रजाइल चीज

[27:13] को शांति चाहिए होती है। एंटीफ्रजाइल चीज

[27:17] डिसऑर्डर से ग्रो करती है और रोबस्ट को

[27:20] कोई फर्क नहीं पड़ता। किसी भी सब्जेक्ट

[27:23] में किसी भी पॉलिसी या आइटम को इस ट्रायड

[27:26] में रख के सोचिए और देखिए कि कैसे उनको आप

[27:30] बेहतर बना सकते हैं। जैसे सेंट्रलाइज्ड

[27:34] नेशन स्टेट फ्रजाइल कैटेगरी में है। लेकिन

[27:38] डिसेंट्रलाइज्ड सिटी स्टेट्स एंटीफ्रजाइल

[27:40] कैटेगरी में है। तो इनकी क्वालिटीज लेकर

[27:43] हम अपने सिस्टम को लेस फ्रजाइल बना सकते

[27:47] हैं। गलतियां भी वैसे ही हैं। फ्रजाइल

[27:50] सिस्टम में गलतियां रेयर होती हैं। पर जब

[27:53] होती हैं तो बड़ी होती हैं और इररिवर्सिबल

[27:56] होती हैं। एंटीफ्रजाइल सिस्टम में गलतियां

[27:59] छोटी, जल्दी सुधारने लायक और इंफॉर्मेशन

[28:03] से भरी होती हैं। ट्रायल एंड एरर का

[28:06] सिस्टम एंटीफ्रजाइल है क्योंकि छोटी-छोटी

[28:08] गलतियों से हम सुधारते हैं। अगर

[28:12] एंटीफ्रजाइल बनना है तो अपने आप को ऐसी

[28:15] सिचुएशन में रखिए जहां गलतियां हो। पर वह

[28:18] छोटी हो ताकि नुकसान कम हो और सीखना

[28:21] ज्यादा हो। मैं इसको बारबेल स्ट्रेटजी

[28:24] कहता हूं। हेल्थ में भी सेम है।

[28:27] कुछ ऐड करना है जैसे दवाई नई चीजें यह

[28:30] फ्रजाइल साइड में है लेकिन कुछ हटाना जैसे

[28:33] हार्मफुल चीजें ग्लूटेन फ्रक्टोज ईटीसी

[28:37] ट्रायल एंड एरर से यह ज्यादा रोबस्ट और

[28:39] फ्रजाइल है। सिर्फ एविडेंस की बातों पर

[28:42] भरोसा नहीं करना चाहिए बल्कि नेचुरल और

[28:46] सिंपल चीजों पर भी ध्यान देना चाहिए।

[28:50] ट्राइड का यह मैप हर जगह काम करता है।

[28:53] कल्चर, हेल्थ, पॉलिटिक्स, टेक्नोलॉजी,

[28:56] सिटी प्लानिंग, इकोनमी सब में।

[29:00] सिंपल मेथड से ही हम रिस्क बेस्ड थिंकिंग

[29:03] और बेटर डिसीजन मेकिंग सीख सकते हैं।

[29:07] फ्रजाइल या एंटीफ्रजाइल एब्सोल्यूट नहीं

[29:09] रिलेटिव टर्म्स हैं। जैसे एक आर्टिजन

[29:12] स्मॉल बिजनेस से ज्यादा एंटीफ्रजाइल है।

[29:15] लेकिन रॉक स्टार आर्टिजन से भी ज्यादा

[29:17] एंटीफ्रजाइल है।

[29:21] लोन लेने से सिस्टम फ्रजाइल हो जाता है।

[29:24] एंटीफ्रजाइल चीजें भी एक लिमिट तक ही

[29:27] फायदा लेती हैं। ज्यादा स्ट्रेस से वह भी

[29:30] टूट सकती हैं। बॉडी थोड़ा स्ट्रेस हैंडल कर

[29:33] लेती है। पर टावर ऑफ़ बेबल से गिरेंगे तो

[29:36] टूट जाएगी।

[29:39] रोबस्टनेस मिडिल कॉलम है लेकिन हर केस में

[29:42] डिजायरेबल नहीं। हर जगह एंटीफ्रजिलिटी या

[29:45] रोबस्टनेस बेस्ट नहीं है। कभी-कभी

[29:48] एंटीफजिलिटी में भी लॉस हो सकता है।

[29:51] एंटीफ्रजिलिटी या फ्रेजिलिटी सब सिचुएशन

[29:54] पर डिपेंड करती है। बिल्कुल एब्सोल्यूट

[29:57] नहीं होती। जैसे एक बॉक्सर फिजिकली

[30:00] स्ट्रांग है पर इमोशनल चीजों में फ्रजाइल

[30:03] हो सकता है। दादी मां फिजिकली फ्रजाइल है

[30:07] लेकिन कैरेक्टर में स्ट्रांग हो सकती हैं।

[30:11] बुक वन

[30:15] बुक के पहले दो चैप्टर एंटीफजिलिटी का

[30:18] कांसेप्ट समझाते हैं। तीसरा चैप्टर

[30:20] ऑर्गेनिक जैसे बिल्ली और मैकेनिकल जैसे

[30:24] वाशिंग मशीन में फर्क बताते हैं। चौथा

[30:27] चैप्टर यह दिखाता है कि कुछ लोगों की

[30:29] एंटीफजिलिटी दूसरों की फ्रजिलिटी से आती

[30:32] है। कैसे कुछ लोगों की गलती या प्रॉब्लम

[30:36] दूसरे के लिए फायदा बन जाती है जैसे

[30:38] इवोल्यूशन में होता है। अगर आप एक गिफ्ट

[30:42] भेज रहे हैं जैसे शैंपेन ग्लास तो उस पे

[30:46] फ्रजाइल हैंडल वि केयर लिखते हैं। लेकिन

[30:48] इसका बिल्कुल उल्टा क्या है? लोग कहते हैं

[30:51] रोबस्ट स्ट्रांग रेिलिएंट। लेकिन असल में

[30:55] यह उल्टा नहीं है। रोबस्ट का मतलब है

[30:58] टूटेगा नहीं लेकिन बेहतर भी नहीं होगा।

[31:02] असली उल्टा होगा एंटीफ्रजाइल। वह चीज जो

[31:05] शॉक, ट्रॉमा या मिस हैंडलिंग से और

[31:08] स्ट्रांग हो जाती है। इस वर्ड का कोई

[31:12] सिंपल नाम नहीं है। इसलिए मैंने इसे

[31:14] एंटीफ्रजाइल बनाया। हमारी जिंदगी का आधा

[31:18] हिस्सा ऐसा ही है जिसका कोई नाम ही नहीं।

[31:22] एंटीफ्रजिलिटी का कांसेप्ट हमारे दिमाग के

[31:25] लिए नया है। इसलिए लोग कंफ्यूज हो जाते

[31:27] हैं। सब डिक्शनरी भी कंफ्यूज है। जैसे

[31:30] पॉजिटिव का उल्टा नेगेटिव है। वैसे

[31:33] फ्रजाइल का उल्टा एंटीफ्रजाइल है।

[31:36] न्यूट्रल नहीं।

[31:38] एंटीफ्रजाइल का मतलब है कि स्ट्रेस,

[31:40] डिसऑर्डर, शॉक से चीज बेहतर हो जाए।

[31:46] माइथोलॉजी से अगर एग्जांपल लें तो

[31:49] डेमोक्लीस जो हमेशा तलवार के नीचे बैठा

[31:52] है। किसी भी टाइम मर सकता है। मतलब वह

[31:56] फ्रजाइल है। फिनिक्स जिसको मरने के बाद

[31:59] दोबारा जिंदा कर दिया जाता है। वही वापस आ

[32:02] जाता है। पर उतना ही ना ज्यादा ना कम।

[32:07] लेकिन हाइड्रा जो ग्रीक माइथोलॉजी का

[32:10] जानवर है जिसका सर काट दीजिए तो दो नए आ

[32:13] जाते हैं। मतलब जितना नुकसान होगा उतना

[32:17] ज्यादा स्ट्रांग हो जाएगा। यह है

[32:20] एंटीफ्रजिलिटी।

[32:21] [संगीत]

[32:24] डेमोक्लस की स्टोरी पावर और सक्सेस का

[32:26] साइड इफेक्ट बताती है। जितनी बड़ी पोजीशन

[32:29] उतनी बड़ी वनरेबिलिटी। एक दिन सब कुछ टूट

[32:33] सकता है। सक्सेस के बाद फेलियर का रिस्क

[32:36] और बढ़ जाता है। सोसाइटीज जितनी ज्यादा

[32:40] कॉम्प्लेक्स, सोफेस्टिकेटेड

[32:42] स्पेशल हो जाती हैं, उतने ही फ्रजाइल हो

[32:45] जाती हैं। जैसे जोसेफ टेंटर ने बताया है।

[32:49] पर यह जरूरी नहीं है। अगर हम रोबस्ट या

[32:51] एंटी फ्रजाइल बन जाए, तो हम बच सकते हैं।

[32:56] फिनिक्स या हाइड्रा बनना है। नहीं तो

[32:59] डेमोक्लेसी की तलवार सब कुछ खत्म कर देगी।

[33:04] ट्राइड का कांसेप्ट यह है कि हम यह देख

[33:07] सकते हैं कि कहां किस चीज का स्ट्रिंग

[33:09] कमजोर है और किस चीज में एंट्री फ्रजिलिटी

[33:13] डालनी है। फ्रजाइल चीज जब गिरती है तो

[33:17] दूसरों को भी नुकसान होता है। जैसे कोई

[33:20] बड़ी कंपनी कोलैप्स हो जाए तो सोसाइटी पर

[33:22] इफेक्ट पड़ता है। इसीलिए ग्रोथ के साथ

[33:25] एंटीफजिलिटी का डोज़ भी जरूरी है।

[33:29] हम सोचते हैं कि हम सिर्फ वही जानते हैं

[33:32] जो हम बोल सकते हैं। पर असल में हम अपनी

[33:36] सोच से ज्यादा जानते हैं। हमारे एकशंस और

[33:39] इंट्यूशन जो हम फील करते हैं या नेचुरली

[33:43] कर लेते हैं, वह हमारी बोलने या लिखने की

[33:46] कैपेसिटी से आगे है। एंटीफ्रजिलिटी का कोई

[33:50] नाम नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि

[33:52] हम अपनी लाइफ में इसको इग्नोर करते हैं।

[33:55] हमारा नेचुरल बिहेवियर एंटीफ्रजिलिटी को

[33:58] यूज़ करता है। चाहे हम उसको नाम ना दे पाए।

[34:03] जैसे प्रिमिटिव लोगों के पास सिर्फ दो-तीन

[34:05] कलर के नाम होते थे। फिर भी वह आसानी से

[34:09] अलग-अलग रंग पहचान लेते थे। बस उनके कल्चर

[34:12] में उनका नाम नहीं था। वैसे ही हम

[34:15] एंटीफजिलिटी को एक्शन में यूज करते हैं।

[34:18] पर उसका प्रॉपर शब्द नहीं बना पाए।

[34:21] एंशिएंट लैंग्वेज में भी कई बेसिक कलर्स

[34:24] जैसे ब्लू का कोई नाम नहीं था। होमर ने सी

[34:28] को वाइन डार्क बोला था क्योंकि ब्लू वर्ड

[34:31] था ही नहीं। फिर भी लोग रंग पहचान लेते

[34:35] थे। ब्रिटिश पीएम ग्लडस्टोन ने यह सबसे

[34:37] पहले पॉइंट किया था। वैसे ही हमारी

[34:40] वोकैबलरी में एंटीफ्रेजिलिटी का शब्द नहीं

[34:43] है। लेकिन हम एक्शन में इसको यूज करते

[34:46] हैं। ग्लैडस्टोन ने एक और चीज समझी थी।

[34:49] फिस्कल डेफिसिट यानी कर्जा सोसाइटी को

[34:52] फ्रिजाइल बना देता है। प्रोटो

[34:55] एंटीफ्रजिलिटी के कुछ अर्ली एग्जांपल्स भी

[34:58] मिले हैं। जैसे मिथ्रिडेट्स नाम के राजा

[35:02] का केस। उसने अपने आप को जहर के छोटे डोज़

[35:06] देकर इम्यूनिटी बनाई थी ताकि ज्यादा जहर

[35:08] कुछ ना बिगाड़े। इसको

[35:11] मिथरी डेटाइजेशन कहा जाता है। यह सिस्टम

[35:16] को थोड़ा रोबस्ट बनाता है। एंटीफाइल नहीं

[35:19] पर शुरुआत यहीं से होती है। मतलब थोड़ा

[35:22] हार्म सिस्टम को और स्ट्रांग बना सकता है।

[35:26] एक और लेवल है हॉर्मिसिस। यह तब होता है

[35:30] जब थोड़ा सा हार्मफुल सब्सटेंस एक्चुअली

[35:33] बॉडी को स्ट्रांग बना देता है। जैसे छोटा

[35:36] डोज बेनिफिट देता है। ज्यादा डोज नुकसान।

[35:40] प्लांट्स में भी ऐसे टॉक्सिंस होते हैं जो

[35:42] सही मात्रा में हमारे लिए हेल्दी हो जाते

[35:45] हैं। थोड़ा भूख लगना भी हेल्दी है।

[35:48] कैलोरिक रेस्ट्रिक्शन से जानवर लंबी

[35:50] जिंदगी जीते हैं और लगता है ह्यूमंस में

[35:53] भी यह हेल्थ को इंप्रूव करता है। मतलब

[35:57] स्ट्रेसर की थोड़ी मात्रा सिस्टम के लिए

[36:00] नॉर्मल है। उसकी कमी ही नुकसान है।

[36:04] हॉर्मिसिस को होम्योपैथी से गलत जोड़ दिया

[36:07] गया था। जबकि दोनों अलग चीजें हैं।

[36:10] होम्योपैथी का साइंटिफिक प्रूफ नहीं है पर

[36:13] हॉर्मिसिस नेचुरल प्रोसेस है जिसका

[36:17] साइंटिफिक एविडेंस है। पॉइंट यह है कि अगर

[36:20] हम सिस्टम से सब स्ट्रेसर हटा देंगे तो वह

[36:24] सिस्टम कमजोर हो जाएगा। उसको थोड़ा हार्म

[36:28] थोड़ा स्ट्रेस चाहिए होता है ताकि वह सही

[36:31] से काम कर सके। स्ट्रेसर हटाएंगे तो

[36:34] नुकसान ही होगा।

[36:36] हर सिस्टम को थोड़ा स्ट्रेस या चैलेंज

[36:40] चाहिए होता है। लेकिन लोग अक्सर एक डोमेन

[36:43] में समझ लेते हैं और दूसरे में भूल जाते

[36:46] हैं। जैसे किसी को मेडिसिन में समझ आता है

[36:49] कि स्ट्रेस हेल्थ के लिए जरूरी है। पर वही

[36:52] सोच सोसाइटी, इकॉनमी या लाइफ के दूसरे

[36:55] पार्ट्स में नहीं लगा पाते। क्लासरूम में

[36:59] आईडिया समझ आता है पर रियल लाइफ में सड़क

[37:02] पर यूज़ नहीं होता।

[37:04] लोग एक कॉन्टेक्स्ट से दूसरे कॉन्टेक्स्ट

[37:06] में आइडियाज ट्रांसफर नहीं कर पाते। इसे

[37:10] डोमेन डिपेंडेंस कहते हैं। जैसे दुबई में

[37:14] एक बैंकर पोर्टल से लगेज उठवाता है। पर

[37:17] जिम में खुद सूटकेस जैसा वजन उठाता है। एक

[37:21] ही आईडिया पर कॉन्टेक्स्ट बदलने से समझ

[37:24] चली गई।

[37:26] डॉक्टर्स भी कभी एक्सरसाइज सजेस्ट करते

[37:29] हैं ताकि बॉडी टफ हो। पर दूसरी तरफ छोटी

[37:33] सी इनफेक्शन में एंटीबायोटिक्स लिख देते

[37:35] हैं ताकि पेशेंट को कुछ हो ना जाए। डोमेन

[37:39] डिपेंडेंस यहां भी दिख जाती है। अमेरिका

[37:43] में लोग गवर्नमेंट एजेंसी से कार या वाइन

[37:45] के प्राइस कंट्रोल करने की सोच पर गुस्सा

[37:48] हो जाएंगे। पर वही एजेंसी इंटरेस्ट रेट

[37:51] कंट्रोल करती है। उसको एक्सेप्ट कर लेते

[37:54] हैं। क्योंकि सोच सिर्फ एक डोमेन में

[37:57] लिमिटेड है। वैसे ही हम अलग-अलग

[38:00] कॉन्टेक्स्ट में एंटीफजिलिटी देख नहीं

[38:02] पाते। चाहे वह हेल्थ हो, सोसाइटी हो या

[38:06] इकोनॉमिक्स।

[38:09] यह डोमेन डिपेंडेंस सब में होती है।

[38:12] आइडियाज को ट्रांसफर करने में दिक्कत आती

[38:14] है। जैसे किसी को अलग-अलग लैंग्वेज में हर

[38:17] चीज का मीनिंग दोबारा सीखना पड़े। वैसे ही

[38:21] हम सेम आईडिया को नए कॉन्टेक्स्ट में नहीं

[38:24] समझ पाते। इसी वजह से एंटीफजिलिटी हमको

[38:28] ऑब्वियस जगह पर भी दिखाई नहीं देती।

[38:32] मॉडर्न सोसाइटी में इनोवेशन, सक्सेस या

[38:35] ग्रोथ को स्ट्रेस से मिलता फायदा नहीं

[38:37] दिखाई देता। सिर्फ कंफर्ट या प्लानिंग को

[38:40] वैल्यू मिलती है। यह सोच बदलने की जरूरत

[38:44] है। तभी असली विडम आएगी।

[38:49] ओवर कंपनसेशन और ओवर रिएक्शन हर जगह होती

[38:53] है। पोस्टोमेटिक ग्रोथ का कांसेप्ट भी है।

[38:56] लोग बैड एक्सपीरियंस के बाद सिर्फ सर्वाइव

[38:59] नहीं करते बल्कि और ज्यादा स्ट्रांग हो

[39:02] जाते हैं। पॉपुलर कल्चर में भी कहते हैं

[39:05] इट बिल्ड्स कैरेक्टर यानी प्रॉब्लम्स

[39:09] इंसान को ग्रो करती हैं। इंटेलेक्चुअल्स

[39:12] रेंडमनेस के नेगेटिव इफेक्ट पर फोकस करते

[39:15] हैं। पॉजिटिव इफेक्ट्स यानी एंटीफ्रजिलिटी

[39:18] पे नहीं। असली इनोवेशन तब होती है जब लाइफ

[39:23] में सच में प्रॉब्लम या चैलेंज आता है।

[39:27] जब लाइफ ने प्रॉब्लम दी तो नया स्यूशन

[39:30] निकला और यही प्रोसेस सबसे ज्यादा

[39:32] इन्वेंशंस लाता है। ना कि सेफ और

[39:35] कंफर्टेबल लाइफ। लैटिन में भी है हंगर ने

[39:39] इंसान को जुगाड़ सिखाया। ओविड ने भी लिखा

[39:43] दिक्कत ही टैलेंट जगाती है। मतलब जब तक

[39:47] चैलेंज नहीं आएगा ग्रोथ नहीं होगी। जितना

[39:50] ज्यादा प्रॉब्लम उतना ज्यादा एक्स्ट्रा

[39:52] एनर्जी रिलीज होती है और वहीं से नया कुछ

[39:57] बनता है। मॉडर्न वर्ल्ड गलत सोचता है कि

[40:00] इनोवेशन सिर्फ फंडिंग, प्लानिंग या

[40:03] प्रोफेसर से आती है। रियलिटी में

[40:06] अनएजुकेटेड टेक्नशियन या एंटरप्रेन्योर

[40:09] सबसे ज्यादा नई चीजें बनाते हैं। चाहे

[40:12] इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन हो या सिलिकॉन

[40:14] वैली। पर फिर भी लोग कंफर्ट और

[40:17] प्रेडिक्टबिलिटी में इनोवेशन ढूंढते हैं।

[40:20] ग्रेट रोमन कैटो ने भी कहा था कि कंफर्ट

[40:23] इंसान को कमजोर बनाता है। सोसाइटी को भी।

[40:27] आज दुनिया अमीर है पर उतनी ही ज्यादा कर्ज

[40:30] में डूबी है और अपने में मींस में रहना

[40:33] मुश्किल है। कंफर्ट से विल पावर कम हो

[40:36] जाती है।

[40:38] ऑटोमेटेड फ्लाइंग से पायलट्स की स्किल डल

[40:41] हो गई। एक्सीडेंट्स बढ़ गए क्योंकि चैलेंज

[40:44] कम था।

[40:46] चैलेंज चाहिए बिना उसके स्किल्स, ग्रोथ और

[40:50] एंटी फ्रेजिलिटी सब खत्म हो जाते हैं।

[40:54] बेस्ट घोड़ा भी जब स्लो घोड़े के साथ रेस

[40:58] करता है तो हार सकता है। लेकिन जब

[41:01] स्ट्रांग राइवल से कमपीट करता है तो जीत

[41:03] सकता है। मतलब चैलेंज ना मिले तो बेस्ट भी

[41:07] वीक हो जाता है। यही अब्सेंस ऑफ स्ट्रेस

[41:10] का नुकसान है। जब तक जिंदगी में कंपटीशन

[41:14] या चैलेंज नहीं आता हम अपनी बेस्ट एबिलिटी

[41:18] तक नहीं पहुंचते। काफी लोग बिजी होने पर

[41:21] ज्यादा प्रोडक्टिव हो जाते हैं, लेकिन

[41:23] फ्री टाइम मिलते ही काम भी नहीं करते। ओवर

[41:27] कंपनसेशन का यह मैकेनिज्म हर जगह छुपा है।

[41:31] छोटा स्ट्रेस या बैकग्राउंड नॉइस भी माइंड

[41:35] को अलर्ट और फोकस रखती है। इसलिए राइटर्स

[41:38] को कैफेस में थोड़ा शोर में काम करना पसंद

[41:41] है। क्योंकि रेजिस्टेंस होने पर अटेंशन और

[41:45] शार्प हो जाती है।

[41:48] एंटीफजाइल रिस्पांस का एक फॉर्म रिडंडेंसी

[41:52] है। नेचर हमेशा खुद को ओवर इंश्योर करती

[41:55] है। दो किडनी एक्स्ट्रा लंग कैपेसिटी,

[41:58] न्यूरॉन्स सब रिडंडेंट है। ह्यूमन सिस्टम

[42:02] में एक्स्ट्रा कैपेसिटी होने का मतलब है

[42:05] कि जब कुछ अनएक्सेक्टेड होता है तो हम

[42:08] रेडी हैं। रिडंडेंसी वेस्ट लगती है जब कुछ

[42:12] गलत ना हो लेकिन जब होता है तो वही सबसे

[42:15] ज्यादा काम आती है। बिजनेस में भी अगर

[42:18] आपके पास एक्स्ट्रा फर्टिलाइजर या ऑयल का

[42:21] स्टॉक है और मार्केट में शॉर्टेज हो जाती

[42:24] है तो आप प्रॉफिट कमा सकते हैं। रिडंडेंसी

[42:27] सिर्फ डिफेंस नहीं इन्वेस्टमेंट भी है।

[42:30] एमबीए वाले या बिजनेस एक्सपर्ट्स इसे

[42:33] इनफिशिएंट कहते हैं। पर असल में यही सबसे

[42:38] ज्यादा एफिशिएंट है।

[42:41] हम नेचर से सीख सकते हैं। नेचर हर टाइम

[42:45] वर्स्ट केस के लिए प्रिपेयर करती है ना कि

[42:47] सिर्फ पास्ट रिकॉर्ड देखकर। लेकिन ह्यूमंस

[42:51] हमेशा पिछले सबसे बुरे केस तक ही सोच पाते

[42:55] हैं। जबकि असली प्रॉब्लम हमेशा इससे आगे

[42:59] निकल जाती है। जैसे फुकुशिमा डिजास्टर में

[43:02] हुआ। रिस्क मैनेजमेंट में भी वही पुराने

[43:06] नंबर्स देख के रिस्क मेजर किया जाता है।

[43:09] लेकिन फ्यूचर में कोई नया अनएक्सेक्टेड

[43:12] डिजास्टर हो सकता है जो पहले कभी नहीं

[43:15] हुआ। नेचर हमेशा अगले डिजास्टर के लिए

[43:19] रेडी रहती है। इसीलिए वह जिंदा है।

[43:23] बॉडी भी ट्रेनिंग में हमेशा नेक्स्ट लेवल

[43:26] के लिए प्रिपेयर करती है। वेट लिफ्टिंग

[43:28] में बॉडी लिमिट के आगे तैयार हो जाती है

[43:31] ताकि अगली बार ज्यादा लोड उठा सके। इसलिए

[43:35] एंटीफ्रजिलिटी सिर्फ फिट होने से आगे है।

[43:38] फिटनेस का मतलब सिर्फ पास्ट कंडीशंस के

[43:41] हिसाब से एडप्ट होना नहीं है। बल्कि अननोन

[43:46] ज्यादा टफ सिचुएशंस के लिए भी ओवर कंपनसेट

[43:49] करना है।

[43:51] लोग पोस्ट ट्रोमेटिक ग्रोथ को रेिलियंस

[43:54] बोल के छोटा कर देते हैं। जबकि असल में

[43:57] एंटीफजिलिटी है। बड़े प्रॉब्लम के बाद

[44:00] इंसान सिर्फ रिकवर नहीं करता बल्कि और

[44:03] स्ट्रांग हो जाता है। नए स्ट्रेस के लिए

[44:06] रेडी हो जाता है। रिडंडेंसी, एक्स्ट्रा

[44:10] स्ट्रेंथ, ओवर कंपनसेशन

[44:12] यह सब एंटीफ्रजाइल सिस्टम्स की निशानी है।

[44:18] जब इंसान अपने दिमाग की डोमेन डिपेंडेंस

[44:20] को तोड़ देता है, तो हर जगह ओवर कंपनसेशन

[44:24] दिखता है। जैसे बायोलॉजी में लोग

[44:26] बैक्टीरिया रेजिस्टेंस समझ लेते हैं। पर

[44:29] सोसाइटी में रिप्रेशन या प्रोटेस्ट या

[44:32] हेट्रेट बढ़ जाती है। यह नहीं समझ पाते।

[44:36] जैसे सनिका ने कहा था जितना ज्यादा आप

[44:39] पनिश करते हैं उतनी ही ज्यादा लोगों में

[44:42] नफरत बढ़ जाती है। रिवोलशंस रिप्रेश से ही

[44:46] ग्रो करती हैं। उन्हें दबाने की कोशिश

[44:49] करिए तो और तेज हो जाती है। जैसे हाइड्रा

[44:52] का सर काट दीजिए तो दो नए आ जाते हैं।

[44:56] क्राउड में कुछ लोग इतना बोल्ड हो जाते

[44:59] हैं कि अपनी जान दे देते हैं और बाकी लोग

[45:02] और भी ज्यादा स्ट्रांग हो जाते हैं।

[45:05] पॉलिटिकल मूवमेंट, रिबेलियन यह सब बहुत

[45:08] एंटीफ्रजाइल हो सकते हैं क्योंकि जितना

[45:10] दबाएंगे उतना ही वह बढ़ते हैं। लव भी

[45:14] कभी-कभी इतना एंटीफ्रजाइल हो जाता है कि

[45:17] जितनी ज्यादा प्रॉब्लम उतनी ही ज्यादा

[45:19] उसकी इंटेंसिटी बढ़ जाती है। लिटरेचर में

[45:23] कई ऐसे कैरेक्टर्स हैं जो अपने ऑब्सेशन,

[45:26] पेन या डिस्टेंस से और ज्यादा प्यार में

[45:29] फंस जाते हैं। जितना ज्यादा कोई उन्हें

[45:32] इग्नोर करता है, उतना ज्यादा वह और

[45:35] अट्रैक्ट हो जाते हैं। जैसे स्ान का ओडेट

[45:39] के लिए ऑब्सेशन या बुजाटी का डांसर के

[45:43] लिए। यह सब दिखाता है कि कुछ इमोशंस और

[45:47] थॉट्स ऐसे एंटीफजाइल है कि जितना हम

[45:51] उन्हें कंट्रोल करने की कोशिश करेंगे,

[45:54] उतना वह आपको कंट्रोल करेंगे। थॉट्स को

[45:57] दबाने से वह ऑब्सेशन बन जाते हैं।

[46:01] इंफॉर्मेशन भी एंटीफ्रजाइल होती है। जितना

[46:04] उसको दबाने की कोशिश करेंगे उतनी तेजी से

[46:07] फैलती है। सीक्रेट बताने पर लोग और ज्यादा

[46:11] दूसरों को बताते हैं। यह किसी को मत

[46:14] बताना। बोलने से सीक्रेट वायरल हो जाता

[46:17] है। बैंड बुक्स सबसे ज्यादा पढ़ी जाती

[46:20] हैं। क्रिटिसिज्म किसी भी बुक का असली

[46:24] बहेज है क्योंकि बोरिंग बुक पर कोई

[46:26] रिएक्शन ही नहीं देता। बुक्स जितनी ज्यादा

[46:29] बैंड या क्रिटिसाइज होती हैं, उतनी ज्यादा

[46:32] फेमस हो जाती हैं। जैसे ग्राहम ग्रीन,

[46:35] हेनरी मिलर, आयन रैंड, मैडम बोरी, लेडी,

[46:40] चटरलिस, लवर।

[46:43] बैड पब्लिसिटी भी एंटीफजाइल हो सकती है।

[46:46] अगर इंसान उससे सर्वाइव कर जाए तो उसका

[46:50] नाम और ज्यादा पॉपुलर हो जाता है। कई लोग

[46:53] दूसरे को चिढ़ाने या अटैक करने में अपना

[46:56] नाम बना लेते हैं। जैसे वोल्टे को फ्रेन

[47:00] ने क्रिटिसाइज किया तो वोल्टे ने उस पर

[47:02] पोएम्स लिखी। इस तरह फ्रेन का नाम

[47:05] हिस्ट्री में आ गया। नेगेटिव पब्लिसिटी या

[47:09] क्रिटिसिज्म से बचने की जगह अगर उसका

[47:11] रिस्पांस प्रॉपर हो तो इंसान और ज्यादा

[47:14] हाईलाइट हो सकता है।

[47:17] मेरे दादा भी पॉलिटिशियन थे। और उन्होंने

[47:20] अपने बेटे को कहा कि अगर लोग तुम्हारे

[47:22] बारे में बुरा नहीं बोल रहे तो तुम कुछ

[47:25] खास नहीं कर रहे। यानी एनवी और

[47:28] क्रिटिसिज्म सक्सेस की असली निशानी है।

[47:32] क्रिटिसिज्म या बदनाम होने को कंट्रोल

[47:35] करना पॉसिबल नहीं है।

[47:38] और आज के इंटरनेट के जमाने में रेपुटेशन

[47:41] पर कंट्रोल करना और भी मुश्किल हो गया है।

[47:44] इसलिए कोई भी ऐसा जॉब या प्रोफेशन मत

[47:47] पकड़िए जो रेपुटेशन डैमेज से टूट जाए। यह

[47:51] जॉब्स फ्रजाइल है। इनकी कोई वैल्यू नहीं

[47:54] है। अपने रेपुटेशन को कंट्रोल करने की जगह

[47:57] अपने एक्सपोज़र को कंट्रोल करिए या अपने आप

[48:01] को ऐसे पोजीशन में रखिए जहां रेपुटेशन का

[48:04] नुकसान आपको अफेक्ट ना करें या फिर आप उस

[48:07] नुकसान से फायदा उठा सकें। राइटर या

[48:11] आर्टिस्ट इसलिए एंटी फ्रजाइल हैं क्योंकि

[48:14] उनको बदनाम करने की कोशिश उनको और फेमस कर

[48:17] देती है। जबकि कॉर्पोरेट एंप्लई बैंक का

[48:20] स्टाफ या गवर्नमेंट वर्कर बहुत फ्रजाइल

[48:23] होते हैं। इनकी रेपुटेशन ही सब कुछ है।

[48:27] जैसे ही वह गई करियर खत्म।

[48:30] अगर कोई राइटर किसी इकोनॉमिस्ट को

[48:33] पब्लिकली इंसल्ट करता है तो उसकी बुक की

[48:36] सेल्स बढ़ जाएंगी। लेकिन अगर एक मिडिल

[48:39] लेवल एग्जीक्यूटिव ऐसा करें तो उसका करियर

[48:42] खत्म हो जाएगा, फायरिंग हो जाएगी और उसकी

[48:45] इमेज हमेशा के लिए खराब हो जाएगी। टैक्सी

[48:49] ड्राइवर या कंस्ट्रक्शन वर्कर अपने

[48:50] रेपुटेशन पर डिपेंड नहीं करते। इसलिए वह

[48:53] रोबस्ट है। लेकिन जो इंसान सूट टाई पहनता

[48:57] है, ऑफिस में सेफ रहने की कोशिश करता है,

[49:00] वह सबसे ज्यादा फ्रजाइल है। अपनी इमेज का

[49:04] प्रिजनर है।

[49:06] बड़ी कंपनीज और गवर्नमेंट समझ नहीं पाते

[49:09] कि इंफॉर्मेशन को दबाने की कोशिश उनके लिए

[49:12] खुद ही रिस्क है। जैसे ही कोई प्रेस

[49:15] कॉन्फ्रेंस में कॉन्फिडेंस दिखाने की

[49:18] कोशिश करता है, मार्केट और इन्वेस्टर्स

[49:21] भाग जाते हैं। पैनिकिक आ जाता है। इसलिए

[49:24] मैं कहता हूं कि डेट मत लीजिए। अगर डेट

[49:28] नहीं है तो रेपुटेशन की चिंता भी नहीं

[49:30] होती और तभी रेपुटेशन नेचुरली अच्छी हो

[49:34] जाती है। जिनको रेपुटेशन की जरूरत सबसे कम

[49:38] होती है उन्हें ही लोग सबसे ज्यादा ट्रस्ट

[49:40] करते हैं।

[49:43] कभी-कभी जो लोग हमें हार्म करने की कोशिश

[49:47] करते हैं, वही हमारे लिए सबसे बड़े फायदे

[49:50] का रीजन बन जाते हैं। जैसे रियल लाइफ में

[49:54] आप किसी को मारते हैं तो वह कमजोर हो

[49:56] जाएगा। लेकिन इंफॉर्मेशन के जमाने में आप

[49:59] किसी को बदनाम करने की जितनी कोशिश करेंगे

[50:02] वह उतना ही स्ट्रांग और फेमस हो जाएगा और

[50:06] आपका नुकसान हो जाएगा।

[50:09] एंटी फ्रजिलिटी ऑफ इंफॉर्मेशन हर जगह छुपी

[50:12] है पर हम उसे इग्नोर करते हैं।

[50:16] जो लोग आपको हर्ट करने की कोशिश करते हैं

[50:19] अक्सर वही आपके सबसे ज्यादा इनडायरेक्ट

[50:22] हेल्प कर देते हैं। जिंदगी में यही आयरनी

[50:26] है।

[50:27] जो भी चीज जिंदा है उसमें कुछ ना कुछ

[50:30] एंटीफजिलिटी होती है। जिंदगी का सीक्रेट

[50:34] ही एंटीफजिलिटी है। नेचुरल चीजें जैसे

[50:38] ह्यूमन बॉडी स्ट्रेस से स्ट्रांग हो सकती

[50:41] है। पर एक लिमिट तक जैसे बोनस पे प्रेशर

[50:44] डालिए तो वह स्ट्रांग होती है। पर एक

[50:46] प्लेट या कार पर स्ट्रेस डालिए तो वह या

[50:49] तो ब्रेक हो जाएगी या वीक हो जाएगी। वो

[50:52] कभी अपने आप स्ट्रांग नहीं होगी। कुछ नई

[50:56] टेक्नोलॉजी जैसे कार्बन नैनो ट्यूब

[50:58] मटेरियल ऐसा बन गया है जो स्ट्रेस में

[51:01] सेल्फ स्ट्रेंथन करता है। पर नॉर्मल नॉन

[51:04] लिविंग चीजें ऐसी नहीं होती।

[51:07] जिंदा चीजें खुद को रिपेयर करती हैं,

[51:10] इंप्रूव करती हैं। लेकिन नॉन लिविंग चीजें

[51:13] टाइम के साथ बस खत्म होती जाती हैं। जींस

[51:17] या फर्निचर दिखने में अगर पुराने हैं तो

[51:22] स्टाइलिश लग सकते हैं। पर उनका मटेरियल

[51:24] रियल में स्ट्रांग नहीं होता, रिपेयर नहीं

[51:27] होता। ह्यूमंस भी एक पॉइंट के बाद ओल्ड हो

[51:31] जाते हैं। लेकिन एजिंग का बड़ा रीजन यह है

[51:33] कि हम नेचर से मिसमैच हो जाते हैं। या तो

[51:37] स्ट्रेस कम हो गया या रिकवर होने का टाइम

[51:40] कम मिला। सिविलाइजेशन के जमाने में कंफर्ट

[51:44] ज्यादा है। इसलिए लोग लंबी जिंदगी तो जीते

[51:47] हैं पर बीमारियां ज्यादा होती हैं। बॉडी

[51:50] वीक हो जाती है। प्रिमिटिव सोसाइटीज में

[51:53] लोग एजिंग के सिम्टम्स बिना दिखाए सीधे मर

[51:57] जाते हैं या एंड में ही थोड़ा ओल्ड फील

[52:00] करते हैं क्योंकि उनका नेचुरल एनवायरमेंट

[52:03] स्ट्रेस से भरा होता है।

[52:06] कॉम्प्लेक्स सिस्टम और सिंपल सिस्टम में

[52:09] यह फर्क है। मैकेनिकल चीज जैसे वाशिंग

[52:12] मशीन बटन दबाइए रिजल्ट सीधा मिलता है।

[52:16] लेकिन सोसाइटी, मार्केट, कल्चर यह सब

[52:19] कॉम्प्लेक्स है। यहां हर एक्शन का साइड

[52:22] इफेक्ट और चैन रिएक्शन होता है। हर चीज

[52:25] इंटरकनेक्टेड है। एक एनिमल हटा दीजिए तो

[52:29] फूड चेन हिल जाएगी। बैंक बंद हो गया तो

[52:32] पूरी इकॉनमी हिल सकती है। कॉम्प्लेक्स

[52:35] सिस्टम में कॉज को समझना मुश्किल है।

[52:38] इसलिए न्यूज़ में जो भी सीधा रीजन दिखाया

[52:41] जाता है वह गलत या इनकंप्लीट होता है।

[52:46] कॉम्प्लेक्स सिस्टम में स्ट्रेसर

[52:48] इंफॉर्मेशन की तरह काम करता है। आपकी बॉडी

[52:52] दिमाग नहीं। पर स्ट्रेस के थ्रू

[52:54] एनवायरमेंट को समझता है। जैसे ग्रेविटी से

[52:57] बोनस स्ट्रांग होती हैं। फार्म काम से हाथ

[53:00] की स्किन हार्ड हो जाती है। धूप से स्किन

[53:03] टैन होती है। बच्चे पेन के थ्रू रिस्क

[53:06] सीखते हैं। एरर्स और कॉन्सिक्वेंसेस भी एक

[53:09] तरह का इंफॉर्मेशन है। इसलिए जब

[53:12] कॉम्प्लेक्स सिस्टम में स्ट्रेस या प्रेशर

[53:15] हटा देते हैं तो सिस्टम फ्रजाइल हो जाता

[53:18] है। वह सही से एडप्ट नहीं कर पाता।

[53:23] बोनस का एग्जांपल ओल्ड थिंकिंग यह थी कि

[53:27] एज के साथ बोन वीक हो जाती है। लेकिन

[53:30] लेटेस्ट रिसर्च कहती है कि जब बोन वीक हो

[53:32] जाती है तो उसके बाद एजिंग, डायबिटीज,

[53:36] सेक्सुअल प्रॉब्लम्स भी शुरू हो सकती हैं।

[53:38] मतलब बोनस में स्ट्रेस डालने से ना सिर्फ

[53:42] बोनस बल्कि पूरी हेल्थ बेटर होती है।

[53:46] इसलिए सिविलाइजेशन का प्रेशर जैसे बॉस का

[53:49] स्ट्रेस, एग्जाम्स, डेली कम्यूट, गिल्ट यह

[53:53] सब माइल्ड और नॉन स्टॉप स्ट्रेस है।

[53:56] रिकवरी का टाइम नहीं मिलता और यह हार्मफुल

[54:00] है। बॉडी को एक क्यूट शॉर्ट स्ट्रेस चाहिए

[54:03] जिससे रिकवरी हो सके। तब एंटीफ्रजिलिटी

[54:07] आती है।

[54:08] जब स्ट्रेस लगातार और छोटा होता है तो वह

[54:12] बॉडी को तोड़ देता है। जैसे चाइनीस वाटर

[54:16] टॉर्चर।

[54:18] पॉलिटिकल सिस्टम भी कॉम्प्लेक्स है। लेकिन

[54:21] लोग गलती से इकॉनमी को वाशिंग मशीन समझ

[54:24] लेते हैं। मंथली मेंटेनेंस चाहिए, कोई बिग

[54:28] बॉस चाहिए। लेकिन असल में सिस्टम सेल्फ

[54:31] ऑर्गेनाइज करता है, इंटरलिंक्ड होता है और

[54:34] टॉप डाउन कंट्रोल से फ्रजाइल हो जाता है।

[54:38] एडम स्मिथ ने इकॉनमी को ऑर्गेनिज्म की तरह

[54:41] सोचा था। सब कुछ इनविज़िबल हैंड से एडजस्ट

[54:45] होता है। प्लेटो ने गलत सोचा। स्टेट को

[54:48] शिप समझा जिसमें कैप्टन चाहिए। लेकिन

[54:51] कॉम्प्लेक्स सिस्टम को वाशिंग मशीन समझना

[54:55] सबसे बड़ी गलती है।

[54:59] सोशल साइंटिस्ट्स इक्विलिब्रियम को बैलेंस

[55:02] या स्टेबिलिटी की तरह देखते हैं। जैसे

[55:05] सप्लाई डिमांड का बैलेंस या पेंडुलम का

[55:08] बीच में लौट आना। लेकिन मैं कहता हूं कि

[55:12] रियल जिंदा सिस्टम्स जैसे लिविंग

[55:14] ऑर्गेनिज्म या सोसाइटी कभी एक्चुअल

[55:17] इक्विलिब्रियम में नहीं रहते। इनके लिए

[55:19] इक्विलिब्रियम का मतलब है मौत। सब कुछ रुक

[55:24] जाना।

[55:25] जिंदा रहने के लिए रैंडमनेस, वोलेटिलिटी,

[55:29] स्ट्रेस और कंटीन्यूस चेंज जरूरी है। जब

[55:33] हम वेलेटिलिटी को हटा देते हैं, यह सब कुछ

[55:36] परफेक्टली स्टेबल बना देते हैं, तो सिस्टम

[55:39] वीक हो जाता है। हम मॉडर्न लाइफ में

[55:42] स्ट्रेसर्स से बचने की कोशिश करते हैं। पर

[55:45] इसी चक्कर में हम जिंदगी, सोसाइटी और

[55:48] साइंस का नुकसान कर रहे हैं। आज अमेरिका

[55:52] में हर दूसरा जवान किसी ना किसी एंटी

[55:55] डिप्रेसेंट पर है। सबको मूड स्विंग से

[55:58] बचना है। लेकिन मैं कहता हूं कि मूड

[56:01] स्विंग्स, सैडनेस, ए्जायटी यह सब इंसान की

[56:04] असली इंटेलिजेंस का हिस्सा है। अगर हम

[56:07] पोएट्स, थिंकर्स, आर्टिस्ट को यह सब

[56:10] मेडिसिन देके हैप्पी बना देते तो दुनिया

[56:13] से आर्ट, सोल और रियलनेस गायब हो जाता।

[56:18] फार्मासटिकल कंपनीज को सिर्फ प्रॉफिट

[56:21] चाहिए। वह सीजंस भी हटा देंगे अगर उन्हें

[56:24] पैसे मिले तो। बच्चों की लाइफ से

[56:28] वेरिएबिलिटी हटा के हम उनका नुकसान कर रहे

[56:31] हैं। हर चीज स्मूथ और सेफ बना के हम

[56:34] सोसाइटी को बोरिंग सबको सेम बना रहे हैं।

[56:38] जब हम लैंग्वेज सीखते हैं टेक्स्ट बुक से

[56:40] नहीं बल्कि गलती करके। सिचुएशनल डिफिकल्टी

[56:44] से ट्रायल और एरर से सीखते हैं। लेकिन

[56:47] कंफर्ट और सक्सेस की वजह से आज हम नेचुरल

[56:50] वे से सीखना भूल गए हैं। सब कुछ आसान, सेफ

[56:54] और प्रेडिक्टेबल बन गया है। जब स्ट्रेस

[56:57] नहीं मिलता तो लर्निंग भी डल हो जाती है।

[57:02] मॉडर्न लाइफ में

[57:05] टूरिस्टिफिकेशन आ गई है। हर एक्टिविटी एक

[57:08] यूजर मैनुअल, स्क्रिप्ट या स्ेड्यूल्ड

[57:11] प्लान की तरह हो गई है। अनसर्टेनिटी,

[57:14] एडवेंचर, रैंडमनेस सब हटा दी गई हैं। ताकि

[57:17] सब कुछ प्रेडिक्टेबल और कंफर्टेबल हो।

[57:21] लेकिन यह सब जिंदा सिस्टम्स को

[57:24] कैस्ट्रेट्स कर देता है।

[57:27] अनसर्टेनिटी रेंडमनेस की जो थस्ट है वह मर

[57:31] जाती है। अब लीजर टाइम भी स्ेड्यूल हो गया

[57:34] है। फ्राइडे नाइट ओपेरा प्लंड पार्टीज सब

[57:38] कुछ गोल्डन जेल बन गया है। इंसान की नेचर

[57:42] ही रैंडमनेस, रिस्क और चांस को चाहती है।

[57:45] गेम्स, गैंबलिंग, सरप्राइज सब में थ्रिल

[57:49] सी आती है।

[57:51] राइटिंग भी अभी मजा देती है जब उसमें

[57:54] रैंडमनेस हो। प्लान या रूटीन में मजा नहीं

[57:56] आता। लाइफ को अगर फुल्ली प्रेडिक्टेबल बना

[58:00] दिया जाए तो वह डेप होती जाती है। रियल

[58:03] सेटिस्फेक्शन तभी मिलता है जब लॉस के बाद

[58:07] वॉलेट या चीज मिल जाए। या जब रियल डेंजर

[58:10] के टाइम एनर्जी आ जाए। प्लंड जिम स्ेड्यूल

[58:14] के मकसद से नहीं। पुराने जमाने में लाइफ

[58:17] रैंडम थी। कभी होमवर्क नहीं। बॉस नहीं,

[58:20] एप्लीकेशन नहीं, सब कुछ चांस और रिस्क से

[58:24] होता था। डेंजरस था पर बोरिंग नहीं था।

[58:28] मॉडर्न सिस्टम्स में क्रोनिक स्ट्रेस है

[58:31] क्योंकि सब रेपिटेटिव सेम और प्रेडिक्टबल

[58:34] हो गया है। अनइवन टेरेन पर चलना नेचुरल

[58:37] है। जिम मशीन पे बार-बार सेम मूव करना

[58:40] अननेचुरल है। क्रोनिक लो लेवल

[58:44] प्रेडिक्टेबल स्ट्रेस इंसान को थका देता

[58:47] है। जिंदा सिस्टम को तोड़ देता है।

[58:52] जिंदा रहने के लिए रैंडमनेस, वेरिएबिलिटी

[58:55] और थोड़ा रिस्क जरूरी है। बिना इसके सब

[58:58] कुछ बोरिंग, वीक और फेक हो जाता है।

[59:03] हर सिस्टम में कुछ लोगों या यूनिट्स की

[59:06] फ्रिजिलिटी जरूरी होती है ताकि दूसरे

[59:09] स्ट्रांग हो सके। यानी कुछ की गलती,

[59:12] नुकसान या सैक्रिफाइस पर ही पूरा सिस्टम

[59:15] ग्रो करता है। जैसे हर स्टार्टअप फ्रजाइल

[59:19] है पर पूरी इकॉनमी तभी इंप्रूव होती है जब

[59:23] कई स्टार्टअप्स फेल होते हैं।

[59:26] यही वजह है कि एंटरप्रेन्योरशिप चलती है।

[59:31] रेस्टोर का एग्जांपल देखिए। हर एक रेस्टोर

[59:34] फ्रजाइल है। पर इन सबके कंपटीशन से पूरी

[59:38] इंडस्ट्री एंटीफ्रजाइल हो जाती है।

[59:40] क्वालिटी इंप्रूव होती है। अगर सब रेस्टोर

[59:44] इमोर्टल हो जाते तो सब कुछ स्टगनेट और

[59:47] बोरिंग हो जाता। कोई इनोवेशन नहीं होती।

[59:50] नेचुरल सिस्टम में भी लेयर्स और हायरकी

[59:54] होती हैं। ऑर्गेनिज्म खुद फ्रजाइल है पर

[59:57] उसके जींस या इंफॉर्मेशन एंटीफजाइल है।

[01:00:01] यानी एक ऑर्गेनिज्म मर सकता है पर उसके

[01:00:04] जींस सर्वाइव करते हैं। मॉडिफाई होते हैं

[01:00:07] और नए जनरेशन को बेहतर बनाते हैं।

[01:00:11] इवोल्यूशन का रियल लॉजिक भी यही है।

[01:00:14] ऑर्गेनिज्म वीक है। जींस स्ट्रांग है और

[01:00:17] जींस रैंडमनेस और अनसर्टेनिटी से मजा लेते

[01:00:21] हैं। वहीं से इंप्रूव करते हैं। नेचर को

[01:00:25] इंडिविजुअल से ज्यादा कलेक्टिव से मतलब

[01:00:27] है। जैसे जब तक रिप्रोडक्शन हो रहा है,

[01:00:30] ऑर्गेनिज्म की वैल्यू है, फिर वह चला जाता

[01:00:33] है। पर जींस नेक्स्ट जनरेशन में सर्वाइव

[01:00:37] करते हैं।

[01:00:39] अगर कोई ऑर्गेनिज्म इमोर्टल होता तो उसको

[01:00:42] हर तरह के फ्यूचर शॉक्स के लिए परफेक्ट

[01:00:45] तैयार रहना पड़ता जो इंपॉसिबल है। रैंडम

[01:00:49] इवेंट्स का कभी पता नहीं होता इसलिए नेचर

[01:00:52] ऑर्गेनिज्म्स को एक लिमिटेड लाइफ देती है

[01:00:55] ताकि हर जनरेशन में थोड़ा चेंज आ सके और

[01:00:59] सिस्टम एडप्ट कर सके। इसी वजह से नेचर एक

[01:01:02] ही एंपायर या पावर को हमेशा सर्वाइव नहीं

[01:01:06] होने देती बल्कि नए-नए लोग और सिस्टम लाती

[01:01:09] रहती है ताकि सब कुछ फ्रेश रहे।

[01:01:13] इवोल्यूशन भी रैंडमनेस से ही मजा लेती है।

[01:01:17] रैंडम म्यूटेशंस और रैंडम एनवायरमेंट

[01:01:20] दोनों ही नेक्स्ट जनरेशन को बेहतर बनाते

[01:01:23] हैं। हर ऑफस्प्रिंग सर्वाइव नहीं करता।

[01:01:27] वीक लोग निकल जाते हैं। स्ट्रांग लोग

[01:01:29] सर्वाइव करके स्पीशीज को बेहतर बना देते

[01:01:32] हैं। कभी-कभी पूरी स्पीशीज भी मर जाती है

[01:01:36] किसी बड़ी कैटस्ट्रोफी में। पर नेचर को

[01:01:39] कोई फर्क नहीं पड़ता। जो बचेगा वही आगे

[01:01:42] बढ़ेगा। लेकिन रैंडमनेस भी एक हद तक ही

[01:01:46] फायदा करती है। अगर सब कुछ डिस्ट्रॉय हो

[01:01:49] गया तो कुछ नहीं बचेगा। लेकिन अगर थोड़ा

[01:01:52] भी बचा तो सिस्टम फिर से शुरू हो जाएगा।

[01:01:56] एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का अगर एग्जांपल

[01:02:00] लें तो जब बैक्टीरिया को मारने की कोशिश

[01:02:02] करते हैं तो जो बच जाते हैं वह और

[01:02:05] स्ट्रांग हो जाते हैं। फिर उनसे लड़ना और

[01:02:08] मुश्किल हो जाता है। यह भी एक तरह की

[01:02:10] एंटीफ्रजिलिटी है। एक ऑर्गेनिज्म खुद एक

[01:02:14] पपुलेशन है। सेल का ग्रुप। सेल में

[01:02:17] मॉलिक्यूल का ग्रुप। स्पीशीज में

[01:02:19] ऑर्गेनिज्म का ग्रुप। हर लेवल पर कुछ वीक

[01:02:23] यूनिट्स सैक्रिफाइस हो जाती हैं ताकि पूरा

[01:02:26] सिस्टम स्ट्रांग हो सके। जैसे फास्टिंग

[01:02:29] में वीक प्रोटीनंस बॉडी यूज कर लेती है।

[01:02:32] हेल्दी प्रोटीनंस सर्वाइव करते हैं। यह भी

[01:02:34] एक इवोल्यूशनरी प्रोसेस है।

[01:02:40] गलतियां, एरर्स और डेविएशन इंपॉर्टेंट है।

[01:02:44] फ्रजाइल सिस्टम को प्रेडिक्टबिलिटी चाहिए।

[01:02:47] कोई डेविएशन नहीं। एंटीफजाइल सिस्टम को

[01:02:51] डेविएशन चाहिए, रेंडमनेस चाहिए, उससे

[01:02:54] इंप्रूवमेंट आती है। ट्रायल और एरर में हर

[01:02:58] एरर एक नई इंफॉर्मेशन देता है और यहीं से

[01:03:01] रियल डिस्कवरी होती है। जब तक सिस्टम में

[01:03:04] एरर या फेलियर होगा तब तक सिस्टम सीख के

[01:03:07] स्ट्रांग होता रहेगा। इसीलिए गलतियां भी

[01:03:11] एक ब्लेसिंग है क्योंकि वही ग्रोथ और एंटी

[01:03:14] फ्रजिलिटी लाती हैं।

[01:03:18] सिस्टम में लेयरिंग होती है। हर लेवल पर

[01:03:21] कुछ लोगों की गलती, नुकसान या सैक्रिफाइस

[01:03:24] से पूरा सिस्टम स्ट्रांग होता है।

[01:03:27] टाइटेनिक के डूबने का एग्जांपल भी अगर वह

[01:03:30] एक्सीडेंट नहीं होता तो और बड़े शिप्स

[01:03:33] बनते और फ्यूचर में और भी बड़ा एक्सीडेंट

[01:03:36] होता। तो उन लोगों की मौत ने बाकी लोगों

[01:03:39] की जान बचाई। प्लेन क्रश भी हर बार सिस्टम

[01:03:42] को बेहतर करता है। अगले फ्लाइट को सेफ

[01:03:46] बनाता है। पर इकोनॉमिक सिस्टम ऐसा नहीं

[01:03:49] है। क्योंकि वहां एक बैंक की गलती दूसरे

[01:03:52] बैंक्स को भी ले डूबती है। अच्छे सिस्टम्स

[01:03:56] वह होते हैं जहां गलतियां छोटी हो और

[01:03:59] अलग-अलग हो। जैसे एिएशन में जबकि फ्रजाइल

[01:04:03] सिस्टम्स जैसे मॉडर्न इकॉनमी में एक गलती

[01:04:06] सबको अफेक्ट करती है। गलतियां, मिस्टेक्स

[01:04:10] और वेरिएबिलिटी से ही सिस्टम सीखता है।

[01:04:14] एडप्ट करता है और आपको पता चलता है कि

[01:04:18] असली दोस्त कौन है? कैरेक्टर कैसा है।

[01:04:22] जो लोग गलती करते हैं उनको उससे सीखना

[01:04:25] चाहिए। जो बार-बार सेम गलती करते हैं या

[01:04:28] ब्लेम डालते हैं, वह लूजर है। जिसने कभी

[01:04:32] गलती नहीं की उस पर भरोसा नहीं किया जा

[01:04:34] सकता क्योंकि गलती करने वाला मगर हर बार

[01:04:39] नई गलती करने वाला ज्यादा रिलायबल है।

[01:04:43] बायोलॉजी में भी लेयर्स होती हैं। सेल्स,

[01:04:47] प्रोटीनंस, बॉडी, स्पीशीज सब में कंपटीशन

[01:04:51] होता है। इकोनमी में भी सेम है।

[01:04:54] इंडिविजुअल्स छोटी फर्म्स, बड़ी फर्म्स,

[01:04:57] इंडस्ट्रीज, पूरा मार्केट पूरा सिस्टम तभी

[01:05:01] स्ट्रांग बनता है जब हर इंडिविजुअल यह

[01:05:04] यूनिट फ्रजाइल हो, रिस्क ले, गलती करे,

[01:05:08] कभी-कभी फेल हो। रेस्टोरेंट बिजनेस का

[01:05:11] एग्जांपल देखिए। हर रेस्टोर कभी ना कभी

[01:05:14] बंद हो जाता है। लेकिन इस कंपटीशन से ही

[01:05:17] इंडस्ट्री ग्रो करती है। लेकिन जब

[01:05:19] गवर्नमेंट बड़ी-बड़ी फर्म्स को बचाने लगती

[01:05:22] है तो पूरा सिस्टम वीक हो जाता है।

[01:05:25] क्योंकि फेलियर का रिस्क फैल जाता है।

[01:05:29] एंटीफ्रजाइल होना इंडिविजुअल्स की कॉस्ट

[01:05:32] पर होता है। जैसे नेचर का व्हाट डज नॉट

[01:05:35] किल मी मेक्स मी स्ट्रांगर। यह हमेशा सही

[01:05:39] नहीं है। कभी-कभी जो नहीं मरा वह स्ट्रांग

[01:05:43] था। बाकी वीक लोग मर गए। इसलिए ओवरऑल

[01:05:47] पपुलेशन स्ट्रांग हो गई। पर इंडिविजुअल उस

[01:05:50] प्रोसेस से स्ट्रांग नहीं हुआ। इसलिए

[01:05:52] गलती, सैक्रिफाइस और लॉस हमेशा किसी ना

[01:05:56] किसी लेवल पर होता है। तभी सिस्टम सर्वाइव

[01:06:00] और इंप्रूव करता है। सिस्टम के स्ट्रेंथ

[01:06:03] का प्राइस इंडिविजुअल की वीकनेस होती है

[01:06:06] और यही है एंटीफ्रजिलिटी का रियल नेचर।

[01:06:12] हमारे अंदर हमेशा इंडिविजुअल और ग्रुप

[01:06:15] यानी कलेक्टिव का इंटरेस्ट के बीच टेंशन

[01:06:18] रहती है। पुराने जमाने में इंडिविजुअल की

[01:06:22] वैल्यू कम थी। ग्रुप के लिए सैक्रिफाइस

[01:06:24] करना नॉर्मल था। हीरो बनने का मतलब होता

[01:06:28] था अपनी जान दे देना ग्रुप के लिए। अब

[01:06:31] सुसाइड बमबर्स का एग्जांपल है कि यह लोग

[01:06:34] अपनी जान की परवाह नहीं करते। ग्रुप के

[01:06:36] लिए कुछ भी करने को रेडी हो जाते हैं।

[01:06:39] चाहे रिवॉर्ड मिले या ना मिले। ग्रुप

[01:06:42] एक्टिविटीज, रायट्स, वॉर में लोग अपनी

[01:06:45] इंडिविजुअलिटी भूल जाते हैं और हर्ड का

[01:06:48] हिस्सा बन जाते हैं। उनकी सोच ग्रुप

[01:06:51] मेंटालिटी बन जाती है। नेचर भी वही करती

[01:06:55] है। उसको अपने आप को बचाना है। हर एक

[01:06:59] स्पीशीज को नहीं। और हर स्पीशीज को अपने

[01:07:02] इंडिविजुअल मेंबर्स को सैक्रिफाइस करना

[01:07:05] पड़ता है ताकि जींस सर्वाइव कर सकें। यानी

[01:07:08] कि एंटीफजिलिटी का कांसेप्ट सिस्टम को

[01:07:12] स्ट्रांग करता है। लेकिन इंडिविजुअल्स की

[01:07:14] कॉस्ट पर लेकिन यह सोच मुझे पसंद नहीं

[01:07:18] क्योंकि इसमें इंसान कीेंस कम हो जाती है

[01:07:22] जो कि एक ह्यूमनिस्ट सोच के खिलाफ है।

[01:07:26] एनलाइटनमेंट ने इंडिविजुअल की वैल्यू को

[01:07:28] ऊपर ला दिया। अब हर किसी को राइट्स,

[01:07:31] फ्रीडम, प्राइवेसी मिल गई है। लेकिन पहले

[01:07:34] जमाने में फैमिली या ट्राइब की इज्जत सबसे

[01:07:37] इंपॉर्टेंट थी। कभी-कभी लोग दूसरे

[01:07:40] रिलेटिव्स का लोन चुकाते थे। सिर्फ फैमिली

[01:07:43] की इज्जत बचाने के लिए। माफिया कल्चर में

[01:07:46] भी ग्रुप लॉयलिटी खुद को सैक्रिफाइस करना

[01:07:50] इंपॉर्टेंट है।

[01:07:52] फिर भी सिस्टम जरूरी है कि इंडिविजुअल

[01:07:56] सर्वाइव करें।

[01:07:59] लेकिन कॉम्प्लेक्सिटी और इंटरडिपेंडेंस

[01:08:01] में किसी एक इंटरेस्ट को ग्लोरिफाई करना

[01:08:04] गलत हो सकता है। कभी-कभी ह्यूमंस को नेचर

[01:08:08] के खिलाफ भी जाना पड़ता है अपने बेनिफिट

[01:08:11] के लिए। लेकिन बैलेंस रखना जरूरी है।

[01:08:15] एंटरप्रेन्योरशिप को मैं हीरोइज़्म के लेवल

[01:08:18] पर बताया हूं। यह भी रिस्क लेना है।

[01:08:21] सैक्रिफाइस करना है और सोसाइटी इसके बिना

[01:08:24] ग्रो नहीं कर सकती।

[01:08:26] एंटरप्रेन्योर फेल हो जाता है तो भी उसकी

[01:08:29] गलती से सोसाइटी को नॉलेज मिलती है कि

[01:08:32] क्या नहीं करना चाहिए लेकिन उसे रिस्पेक्ट

[01:08:35] नहीं मिलती। सोसाइटी उसको इग्नोर या

[01:08:38] डिसरिस्पेक्ट करती है। एक्चुअली

[01:08:41] एंटरप्रेन्योर या साइंटिस्ट के फेल होने

[01:08:43] पर भी उसको सेम तरह का ऑनर मिलना चाहिए

[01:08:47] जैसे डेड सोल्जर्स को मिलता है। क्योंकि

[01:08:50] उनके रिस्क से ही सोसाइटी आगे बढ़ती है।

[01:08:53] यहां तक कि ओवर कॉन्फिडेंस जो

[01:08:55] साइकोलॉजिस्ट डिजीज बोलते हैं वह भी

[01:08:58] कभी-कभी सिस्टम के लिए फायदेमंद है।

[01:09:01] क्योंकि बिना उनके कोई रिस्क नहीं लेगा और

[01:09:04] नए आइडियाज इनोवेशन नहीं आएंगे। मैनेजर्स

[01:09:08] और सेफ खेलने वाले लोग रेयरली रिस्क लेते

[01:09:11] हैं और सिस्टम को आगे नहीं बढ़ाते।

[01:09:16] मेरा ड्रीम है एक नेशनल एंटरप्रेन्योर डे

[01:09:19] हो जहां सोसाइटी ओपनली कहे कि आपको रिस्क

[01:09:23] लेने की वजह से आपकी सैक्रिफाइस की वजह से

[01:09:27] इकॉनमी ग्रो कर रही है। हमारी कंट्री आपका

[01:09:30] शुक्रिया करती है। इवन अगर आप फेल हो

[01:09:33] जाइए। आपका रोल इंपॉर्टेंट है। यही है

[01:09:36] एंटीफजलिटी का असली सोर्स।

[01:09:43] मॉडर्न जमाने में लोग और सिस्टम्स अपनी

[01:09:46] असली ताकत यानी एंटीफजिलिटी को इग्नोर कर

[01:09:49] रहे हैं। जैसे एक अल्बर्ट रोज पंक्षी

[01:09:53] उड़ने के लिए बना है। लेकिन जब उसको जमीन

[01:09:55] पर रखा जाता है तो वह बिल्कुल बेकार हो

[01:09:58] जाता है। वैसे ही जब हम सिस्टम से

[01:10:02] वोलेटिलिटी, रैंडमनेस या स्ट्रेस हटा देते

[01:10:06] हैं तो उन्हें लगता है कि सब कुछ सेफ हो

[01:10:09] गया। लेकिन असली में वह और ज्यादा फ्रजाइल

[01:10:12] हो जाते हैं। ग्रीक मिथ में प्रोक्रस्टीस

[01:10:16] था जो हर मेहमान को अपने बेड में फिट करने

[01:10:19] के लिए उसकी टांगे काट देता या खींच देता।

[01:10:23] बस इसलिए कि बेड परफेक्ट लगे। वैसे ही

[01:10:27] मॉडर्न सोसाइटी भी हर चीज को फिट करने की

[01:10:30] कोशिश करती है। लेकिन यह नेचुरल रैंडमनेस

[01:10:33] को खत्म करके सिस्टम्स को अंदर से तोड़

[01:10:37] देती है।

[01:10:39] जॉन और जॉर्ज दो भाई थे। जॉन एक बैंक में

[01:10:43] काम करता है। उसकी सैलरी फिक्स है। लाइफ

[01:10:46] प्रेडिक्टबल लगती है। लेकिन अगर एक दिन

[01:10:48] जॉब चली गई तो पूरा इनकम जीरो हो जाएगा।

[01:10:51] वह बेकार हो जाएगा। दूसरी तरफ जॉर्ज एक

[01:10:55] टैक्सी ड्राइवर है। उसकी अर्निंग कभी कम

[01:10:58] कभी ज्यादा होती है। लेकिन वह हमेशा कुछ

[01:11:01] ना कुछ कमा लेता है और काम कभी भी कर सकता

[01:11:04] है। जॉर्ज की इनकम वेरिएबल है लेकिन रिस्क

[01:11:08] भी छोटा-छोटा है और वह अपने आप एडप्ट करता

[01:11:12] रहता है। हर दिन नए प्रॉब्लम सॉल्व करता

[01:11:15] है। जॉन को लगता है कि उसकी लाइफ सिक्योर

[01:11:18] है। लेकिन वह असली में एक दिन में सब कुछ

[01:11:21] खो सकता है। जॉर्ज को लगता है कि उसकी

[01:11:25] लाइफ रिस्की है लेकिन असली में वह रोबस्ट

[01:11:27] है। यानी एकदम से सब कुछ खत्म नहीं होता।

[01:11:31] रैंडमनेस से बचने की कोशिश यानी हर चीज को

[01:11:35] स्मूथ और कंट्रोल करना सिस्टम्स को और

[01:11:38] ज्यादा शॉक प्रोन बना देता है। टैक्सी

[01:11:42] ड्राइवर, कारपेंटर, प्लंबर, प्रॉस्टिट्यूट

[01:11:45] जैसे लोग हर दिन नए स्ट्रेस फेस करते हैं।

[01:11:49] इसलिए वह हर वक्त सीखते हैं और टाइम के

[01:11:52] साथ स्ट्रांग होते हैं। एंप्लाइज जैसे लोग

[01:11:56] एकदम से जॉब जा सकते हैं और फिर कुछ नहीं

[01:12:00] बचता।

[01:12:01] नेचर को छोटे-छोटे मिस्टेक्स पसंद है

[01:12:04] क्योंकि इससे जींस इवॉल्व करते हैं। लेकिन

[01:12:06] ह्यूमंस को गलती से डर लगता है। इसलिए वह

[01:12:10] एंटी फ्रजिलिटी को मिस कर देते हैं। इसी

[01:12:13] तरह सेंट्रलाइज्ड गवर्नमेंट एकदम स्मूथ

[01:12:17] लगती हैं। लेकिन एक बड़ा शॉक सब कुछ तोड़

[01:12:20] सकता है। छोटी सिटी स्टेट्स जैसे एक

[01:12:23] टैक्सी ड्राइवर के बहुत क्लाइंट्स होते

[01:12:25] हैं। ज्यादा रोबस्ट या एंटीफ्रजाइल होते

[01:12:28] हैं क्योंकि हर तरफ से थोड़ा-थोड़ा रिस्क

[01:12:32] आता है। लेकिन कोई भी एक बड़ा शॉक सब कुछ

[01:12:35] नहीं खत्म करता।

[01:12:38] जब भी सिस्टम में वेरिएबिलिटी, वेलेटिलिटी

[01:12:41] या रैंडमनेस होती है तो वह ब्लैक स्ान

[01:12:44] इवेंट्स यानी बड़े शॉक से बच जाता है।

[01:12:48] लेकिन जब हम सब कुछ स्टेबल बनाने की कोशिश

[01:12:51] करते हैं तो छोटे प्रॉब्लम से तो बच जाते

[01:12:54] हैं लेकिन एक दिन एक बड़ा डिजास्टर आ सकता

[01:12:57] है जो सब कुछ खत्म कर देगा। इसलिए छोटे

[01:13:00] स्ट्रेसर्स और रैंडमनेस को अलऊ करना

[01:13:03] सिस्टम के लिए हेल्दी है। यही एंटीफजिलिटी

[01:13:07] का मूल मंत्र है।

[01:13:10] मैं जुरिक के एक कैफे में बैठा हूं जहां

[01:13:13] पहले लेने नाता था और सोच रहा हूं कि

[01:13:17] स्विट्जरलैंड दुनिया का सबसे ज्यादा

[01:13:19] एंटीफ्रजाइल जगह क्यों है?

[01:13:22] यहां हर तरह के रिफ्यूजीस, पॉलिटिकल,

[01:13:25] फाइनेंशियल, रिच लोग अपनी सेफ्टी,

[01:13:28] स्टेबिलिटी और शेल्टर के लिए आते हैं।

[01:13:31] वोल्टेयर भी अपने दिनों में स्विट्जरलैंड

[01:13:34] भाग जाता था जब उसने किंग या चर्च को

[01:13:37] चिढ़ाया होता था और उसने यहीं एग्जाइल में

[01:13:40] अपना पैसा भी बनाया था। क्योंकि

[01:13:42] स्ट्रेसर्स और रिस्क से प्रॉफिट हुआ।

[01:13:45] स्विट्जरलैंड की स्टेबिलिटी का असली

[01:13:47] सीक्रेट यह है कि यहां कोई बड़ा सेंट्रल

[01:13:50] गवर्नमेंट नहीं है। यहां हर चीज बॉटम अप

[01:13:54] छोटे-छोटे म्युनिसिपालिटीज और कैंट्स के

[01:13:57] लेवल पर डिसाइड होती है। मतलब छोटे-छोटे

[01:14:00] एरिया अपना लोकल काम खुद करते हैं। इस वजह

[01:14:04] से यहां लोगों के बीच पेटीफाइट्स, छोटी

[01:14:07] पॉलिटिक्स, पानी के फाउंटेन पर झगड़े

[01:14:10] ईटीसी होते रहते हैं। लेकिन यही छोटी-छोटी

[01:14:13] वोलेटिलिटी सिस्टम को स्टेबल बनाती है

[01:14:16] क्योंकि कोई एक बड़ी पावर सब कुछ कंट्रोल

[01:14:18] नहीं करती।

[01:14:20] यहां का सिस्टम बोरिंग है। ग्रैंड

[01:14:23] आइडियाज, यूटोपिया या इंटेलेक्चुअल

[01:14:25] बड़ी-बड़ी बातें नहीं होती। लेकिन यही काम

[01:14:29] करता है। इसलिए स्विट्जरलैंड दुनिया का

[01:14:31] सेफेस्ट सबसे रोबस्ट और एंटी फ्रजाइल

[01:14:34] कंट्री है। स्विट्जरलैंड एक नेशन स्टेट

[01:14:38] नहीं बल्कि छोटे यूनिट्स की फेडरेशन है।

[01:14:41] इन छोटे यूनिट्स में बायोलॉजिकल और इमोशनल

[01:14:44] अटैचमेंट ज्यादा होता है। लोग सामने वाले

[01:14:47] से डायरेक्ट कांटेक्ट में रहते हैं। इसलिए

[01:14:49] अगर कोई गलती करता है तो उसको शर्म भी आती

[01:14:52] है। रिस्पांसिबिलिटी भी फील होती है। बड़े

[01:14:56] स्टेट्स में सब कुछ अब्स्ट्रैक्ट हो जाता

[01:14:58] है। लोगों की फीलिंग गायब हो जाती है।

[01:15:01] सिविल सर्वेंट सिर्फ नंबर्स,

[01:15:03] स्प्रेडशीट्स, स्टैटिस्टिक्स देखते हैं।

[01:15:06] असली लोगों की केयर नहीं करते। इसी वजह से

[01:15:10] मेरे एक दोस्त ने कहा स्टेलन कभी एक

[01:15:13] मुनिसिपालिटी में एकिस्ट नहीं कर सकता था

[01:15:16] क्योंकि छोटे लेवल पर इतना पावर किसी के

[01:15:19] पास नहीं होता।

[01:15:21] जैसे छोटे-छोटे बिजनेसेस, छोटी कंपनीज,

[01:15:25] लोकल लॉ सिस्टम ज्यादा रोबस्ट होते हैं।

[01:15:28] वैसे ही जज बेस्ड लॉ डायवर्सिटी की वजह से

[01:15:31] स्ट्रांग होता है। जबकि रिजिड कोड से बड़ी

[01:15:34] गलतियां हो सकती हैं। लॉबिस्ट भी बड़े

[01:15:38] सिस्टम में आकर बढ़ जाते हैं। छोटे

[01:15:42] सिस्टम्स में लोकल लेवल पर लॉबी करना

[01:15:45] मुश्किल है। इसलिए करप्शन या मैनपुलेशन का

[01:15:48] रिस्क कम होता है। स्विट्जरलैंड का सक्सेस

[01:15:52] भी एजुकेशन के प्रैक्टिकल अप्रेंटिसशिप

[01:15:55] मॉडल से आता है ना कि सिर्फ यूनिवर्सिटी

[01:15:58] डिग्री या थ्योरिटिकल नॉलेज से। यहां का

[01:16:01] सिस्टम

[01:16:03] टेक्निक बेस्ड है यानी एक्चुअल काम और

[01:16:06] स्किल ना कि सिर्फ बुकिश नॉलेज।

[01:16:10] बॉटम अप वोलेटिलिटी यानी छोटी-छोटी

[01:16:13] फ्लक्चुएशंस जैसे लोकल लेवल पर छोटे झगड़े

[01:16:16] या काम का स्ट्रेस नेचुरल सिस्टम का

[01:16:19] हिस्सा है। इसको मैं मिड क्रिस्टान बोलता

[01:16:22] हूं। यहां बहुत सारी वेरिएशंस होती हैं।

[01:16:25] लेकिन कोई एक भी वेरिएशन इतनी बड़ी नहीं

[01:16:28] होती कि सब कुछ बिगड़ जाए। दूसरी तरफ है

[01:16:32] एक्सट्रीम स्थान। जहां दिखने में सब स्मूथ

[01:16:35] और स्टेबल लगता है। लेकिन कभी-कभी बहुत

[01:16:39] बड़े तबाही वाले जंप्स या डिजास्टर्स आ

[01:16:42] जाते हैं। जैसे कि फाइनेंशियल क्रैश या

[01:16:45] कोई बड़ी पॉलिटिकल घटना।

[01:16:48] यहां पर जो रेयर इवेंट होता है वह सबसे

[01:16:50] ज्यादा इफेक्ट डालता है। मेडकिस्तान में

[01:16:54] डेली छोटी फ्लक्चुएशन से सिस्टम स्ट्रांग

[01:16:57] और एडप्ट होता रहता है। लेकिन

[01:17:00] एक्सट्रीमिस्ट में छुपी हुई बड़ी रिस्क

[01:17:02] होती है जो कभी भी धमाका कर सकती है।

[01:17:07] जब हम नेचुरली होने वाली वोलेटिलिटी को

[01:17:09] कंट्रोल या स्मूथ करने की कोशिश करते हैं

[01:17:12] प्लानिंग, सेंट्रलाइजेशन या ओवर इंटरवेंशन

[01:17:16] से तो हम सिस्टम को मिड क्रिस्टान से

[01:17:19] एक्सट्रीमिस्ट में डाल देते हैं। मतलब

[01:17:23] डेली छोटी प्रॉब्लम्स को हटा के कभी एक

[01:17:26] दिन एक ऐसी बड़ी प्रॉब्लम क्रिएट कर देते

[01:17:29] हैं जो सब कुछ बिगाड़ देती है।

[01:17:32] प्रेडिक्टबिलिटी बहुत कम हो जाती है।

[01:17:34] ब्लैक स्ान इवेंट्स का रिस्क बढ़ जाता है

[01:17:37] और सबको लगता है सब कुछ सेफ है जब तक एकदम

[01:17:41] से सब टूट नहीं जाता।

[01:17:43] टर्की को हर दिन अच्छा खाना मिलता है तो

[01:17:46] उसको लगता है कि बुचर उससे प्यार करता है।

[01:17:50] कॉन्फिडेंस बढ़ता रहता है। लेकिन थैंक्स

[01:17:53] गिविंग वाले दिन एक ही शॉक सब खत्म कर

[01:17:56] देता है। टर्की की गलती यह है कि वह सोचती

[01:18:00] है पास्ट में कुछ बुरा नहीं हुआ तो फ्यूचर

[01:18:02] में भी नहीं होगा।

[01:18:04] लेकिन यह सोच सबसे बड़ी चूक है। इसी तरह

[01:18:07] प्लानिंग और आर्टिफिशियल स्टेबिलिटी हमको

[01:18:10] भी फूल करती है। जब सिस्टम्स को ज्यादा

[01:18:14] कंट्रोल, ज्यादा स्टेबलाइजेशन या टॉप डाउन

[01:18:17] मैनेजमेंट से चलाते हैं। जैसे कि बाथ

[01:18:21] पार्टी ने सीरिया में किया। वहां का

[01:18:23] बिजनेस, ट्रेडिंग, कल्चर और प्रोस्पेरिटी

[01:18:26] एकदम गिर गई। जब तक डिसेंट्रलाइजेशन, लोकल

[01:18:30] मैनेजमेंट, छोटी-छोटी वोलेटिलिटी थी तब तक

[01:18:33] प्रोस्पेरिटी थी। जैसे कि स्विट्जरलैंड या

[01:18:36] फिर एंशिएंट नॉर्दन लेवेंट। जैसे ही

[01:18:40] सेंट्रलाइज्ड स्टेट आई, यूटोपिया बनाने का

[01:18:43] क्रेज आया। सारा सिस्टम टूट गया और लोग

[01:18:46] भाग गए। बेरूद जैसे छोटे लूज सिस्टम में

[01:18:50] लोगों को बिजनेस फ्रेंडली एनवायरमेंट मिल

[01:18:52] गया और वह प्रोस्पर करने लगे।

[01:18:55] नेचुरल छोटी वोलेटिलिटी डिसेंट्रलाइजेशन

[01:18:59] और लोकल कंट्रोल सिस्टम्स को स्ट्रांग और

[01:19:01] एंटी फ्रजाइल बनाते हैं। ज्यादा कंट्रोल

[01:19:05] स्टेबिलिटी का दिखावा या प्लानिंग से

[01:19:08] सिस्टम एक्सट्रीमिस्ट तान बन जाता है।

[01:19:10] जहां एक ही बड़ा शौक सब कुछ खत्म कर सकता

[01:19:13] है। हमेशा यह समझना चाहिए कि एब्सेंस ऑफ

[01:19:17] एविडेंस यानी कोई डिजास्टर नहीं हुआ।

[01:19:20] एविडेंस ऑफ ऑब्सेंस नहीं है। यानी आगे भी

[01:19:24] कुछ नहीं होगा।

[01:19:26] लेबनन में सब कुछ परफेक्ट लग रहा था।

[01:19:29] फ्रीडम इकोनॉमिक एनर्जी लेकिन यहां की

[01:19:31] स्टेट इतनी लूज थी कि हर ग्रुप अपने

[01:19:34] वेपन्स ले आया और क्रिश्चियन कम्युनिटी

[01:19:36] अपनी आइडेंटिटी इंपोज करने लगी। रिजल्ट एक

[01:19:40] आर्म्स रेस और फिर 1975 में सिविल वॉर

[01:19:44] क्योंकि कोई कंट्रोल ही नहीं था। लेबनन का

[01:19:47] एग्जांपल बताता है कि थोड़ा

[01:19:49] डिसऑर्गेनाइज्ड होना हेल्दी है। लेकिन अगर

[01:19:52] सिस्टम बिल्कुल ही लूज हो जाए तो केओस आ

[01:19:54] सकता है। लेकिन फिर भी लोग प्रजन यानी

[01:19:58] फ्रीडम खोने से ज्यादा वॉर यानी लड़ाई,

[01:20:02] रिस्क स्ट्रगल को प्रेफर करते हैं। जैसे

[01:20:05] एक रिच एलेपो वाले ने बोला कि उनके लिए

[01:20:08] वॉर प्रजन से बेहतर है। लेबनन और नॉर्थ

[01:20:11] सीरिया दोनों का कल्चर लैंग्वेज सब सेम

[01:20:14] था। लेकिन लेबनन में सिविल वॉर के बावजूद

[01:20:18] आज वहां का स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग सीरिया से

[01:20:21] तीन से छ गुना ज्यादा है। क्योंकि सीरिया

[01:20:24] में बाथ पार्टी का टाइट कंट्रोल था। जबकि

[01:20:28] लेबनन में थोड़ी आजादी थी।

[01:20:32] रूसो और मेकियावेली भी कहते हैं कि थोड़ी

[01:20:34] एेजिटेशन, थोड़ा केस लोगों में एनर्जी,

[01:20:38] फ्रीडम और प्रोग्रेस लाता है। पीस से

[01:20:41] ज्यादा ग्रोथ फ्रीडम से होती है।

[01:20:43] स्टेबिलिटी से नहीं।

[01:20:45] एंशिएंट इजिप्ट जैसे सेंट्रलाइज स्टेट्स

[01:20:48] थोड़े टाइम के लिए सर्वाइव करते हैं।

[01:20:50] लेकिन जैसे ही बाहर से कोई अनप्रिडिक्टेबल

[01:20:53] इनवेडर आते हैं, सिस्टम टूट जाता है।

[01:20:57] एंपायर्स जैसे रोमन और ऑटोमन लोकल एलट्स

[01:21:00] को थोड़ी ऑटोनोमी देते थे। वह लोकल लेवल

[01:21:04] पर बिजनेस और कॉमर्स ग्रो कर लेते थे,

[01:21:06] लेकिन मिलिट्री पावर अपने हाथ में रखते

[01:21:08] थे। इसलिए सिस्टम स्टेबल रहता था। एंपायर

[01:21:13] का सिस्टम सेंट्रलाइज्ड नेशन स्टेट से

[01:21:16] ज्यादा स्टेबल होता है क्योंकि लोकल लोगों

[01:21:18] को अपना काम करने की आजादी मिलती है।

[01:21:22] यूरोप में भी जब तक जर्मनी और इटली जैसे

[01:21:26] बड़े नेशन स्टेट्स नहीं बने थे। छोटे-छोटे

[01:21:29] स्टेट्स और सिटी स्टेट्स कास्टेंटली टेंशन

[01:21:32] में रहते थे। लेकिन यह टेंशन मैनेजेबल थी।

[01:21:35] जैसे बारिश की छोटी-छोटी बूंदे कभी फ्लड

[01:21:39] नहीं आती थी। पर जैसे ही बड़े नेशन

[01:21:42] स्टेट्स बने वर्ल्ड वॉारर्स जैसे मैसिव

[01:21:44] डिजास्टर्स आ गए। छोटे यूनिट्स का

[01:21:47] वोलेटाइल सिस्टम ज्यादा सेफ था। जबकि बड़े

[01:21:50] यूनिट्स का स्मूथ सिस्टम एक दिन टोटल

[01:21:53] डिस्ट्रक्शन ले आता है। जैसे रेस्टोर

[01:21:56] बिजनेस छोटी-छोटी फेलियर्स हैं लेकिन कभी

[01:21:59] पूरी इंडस्ट्री एक साथ नहीं गिरती।

[01:22:02] बैंकिंग या सेंट्रलाइज सिस्टम में एक शौक

[01:22:05] सब कुछ गिरा देता है। कुछ लोग सोचते हैं

[01:22:09] कि दुनिया ज्यादा सेफ हो गई है। लेकिन

[01:22:11] रिस्क हिस्ट्री में कभी इतना बड़ा नहीं था

[01:22:14] जितना अब है। क्योंकि आज के मैसिव नेशन

[01:22:17] स्टेट्स, न्यूक्लियर वेपंस और

[01:22:20] इंटरकनेक्टेड सिस्टम से एक शॉक में सब कुछ

[01:22:23] बर्बाद हो सकता है। रिस्क फ्यूचर में है

[01:22:26] पास्ट में नहीं।

[01:22:28] ऑस्ट्रोहंगेरियन और ऑटोमन जैसे मेसी

[01:22:31] एंपायर्स टूट गए। नेशन स्टेट्स बने सिटीज

[01:22:34] जैसे वियना, एलेग्जेंडरिया, स्टानबुल अपनी

[01:22:39] आइडेंटिटी खो बैठे और लोग कल्चर एग्जाइल

[01:22:42] में चले गए।

[01:22:44] मैं भी ऐसा ही फील करता हूं जब मेरा

[01:22:47] लेबेंटाइन क्रिश्चियन वर्ल्ड लेबनीज़ वॉर

[01:22:50] में खत्म हो गया।

[01:22:55] थोड़ा रेंडमनेस सिस्टम के लिए अच्छा है।

[01:22:58] बिना रेंडमनेस के सिस्टम वीक हो जाता है

[01:23:01] और छुपा हुआ रिस्क जमा हो जाता है। जैसे

[01:23:04] एक बैंक के एंप्लई जो सिक्योर लगते हैं

[01:23:06] लेकिन एक ही शॉक में सब कुछ खो सकता है।

[01:23:10] वैसे ही सेंट्रलाइज्ड सिस्टम भी एक ही

[01:23:12] झटके में गिर सकता है। दूसरी तरफ आर्टिजन

[01:23:16] टैक्सी ड्राइवर या डिसेंट्रलाइज्ड मिसेस

[01:23:19] सिस्टम में छोटा-मोटा उथल-पुथल चलती रहती

[01:23:22] है। इसलिए वह लॉन्ग टर्म में ज्यादा

[01:23:25] स्टेबल और एंटीफ्रजाइल है।

[01:23:28] जेम्स क्लर्क मैक्सवेल ने बताया था कि जब

[01:23:31] हम कोई सिस्टम को बहुत टाइटली कंट्रोल

[01:23:34] करते हैं जैसे स्टीम इंजन की स्पीड को तो

[01:23:37] कभी-कभी वह और अनस्टेबल हो जाता है।

[01:23:40] मशीनरी टूट भी सकती है। मार्केट्स में भी

[01:23:43] अगर हम प्राइसेस फिक्स करते हैं या

[01:23:46] वोलेटिलिटी हटा देते हैं तो पीरियड्स ऑफ

[01:23:49] काम के बाद बड़ा क्रैश आ सकता है। थोड़ा

[01:23:52] कंफ्यूजन, थोड़ा रैंडमनेस सिस्टम को

[01:23:55] हेल्दी रखता है। जैसे फॉरेस्ट में छोटी आग

[01:23:58] लगने देते हैं तो सबसे जलने वाली चीजें

[01:24:01] खत्म हो जाती हैं और बड़ी डिजास्टर से बच

[01:24:04] जाते हैं।

[01:24:06] इकॉनमी में अगर फर्म्स को छोटे-छोटे

[01:24:09] सेटबैक्स मिलते रहते हैं तो वह स्ट्रांग

[01:24:12] रहती हैं। लेकिन अगर बहुत टाइम तक कुछ

[01:24:14] नहीं होता तो एक दिन बड़ा क्राइसिस आता

[01:24:17] है। मार्केट्स में भी जब मार्केट नया लोड

[01:24:21] टच करता है तो सब वीक हैंड्स निकल जाते

[01:24:24] हैं और एक साफ सफाई हो जाती है। ज्यादा

[01:24:29] टाइम तक जब मार्केट सेफ लगता है तो वीक

[01:24:31] लोग कॉन्फिडेंट हो जाते हैं और जब

[01:24:33] क्राइसिस आती है तो सब मिलके क्रैश क्रिएट

[01:24:36] करते हैं। रेगुलर वोलेटिलिटी सिस्टम को

[01:24:39] साफ रखती है।

[01:24:42] बुरडेंस डंकी का एग्जांपल यह है कि अगर

[01:24:46] डंकी खाना और पानी के बीच कंफ्यूज खड़ा

[01:24:48] रहे तो मर जाएगा। लेकिन थोड़ा रैंडम पुश

[01:24:52] मिल जाए तो बच सकता है। मतलब जब सिस्टम

[01:24:55] स्टक हो तो रैंडमनेस से नया सशन मिल सकता

[01:24:59] है।

[01:25:00] मेटल को भी स्ट्रांग बनाने के लिए एनहलिंग

[01:25:04] टेक्निक यूज होती है। पहले हीट करिए फिर

[01:25:07] थोड़ा-थोड़ा कूल करिए ताकि एटम्स नई

[01:25:10] पोजीशन में जा सके।

[01:25:12] थोड़ा स्ट्रेस, थोड़ा रैंडमनेस सिस्टम को

[01:25:15] बेहतर बनाता है। पॉलिटिक्स में भी थोड़ा

[01:25:19] रैंडमनेस गवर्नेंस में हेल्पफुल हो सकता

[01:25:21] है। पुराने जमाने में एथेंस में

[01:25:24] पॉलिटिशियंस को रैंडम ड्रॉ से चूज़ किया

[01:25:27] जाता था ताकि सिस्टम डीजेनरेट ना हो जाए।

[01:25:31] कंप्यूटर सिमुलेशंस भी दिखाते हैं कि अगर

[01:25:34] पार्लियामेंट में कुछ लोग रैंडम सिलेलेक्ट

[01:25:36] किए जाए तो सिस्टम बेहतर काम करता है।

[01:25:40] वोल्टे कहते हैं कि कभी-कभी पॉलिटिकल

[01:25:43] असेसनेशंस भी रिशफलिंग लाता है। सिस्टम

[01:25:46] में फ्रेश एनर्जी लाता है। माफिया में बॉस

[01:25:50] का मर्डर भी नेचुरल सक्सेशन का हिस्सा है।

[01:25:52] और अगर बॉस ज्यादा टाइम तक टिक जाए तो

[01:25:56] सिस्टम जैम हो सकता है। आज के टाइम में

[01:25:59] सीईओस, पॉलिटिशियंस, प्रोफेसर्स सब ज्यादा

[01:26:03] टाइम तक पावर में रहते हैं। तो सिस्टम

[01:26:05] स्लो और बोरिंग हो जाता है। रैंडम ड्रॉ

[01:26:09] लॉट या फेट से डिसीजन लेने का एंशिएंट

[01:26:12] ट्रेडिशन भी इसीलिए था। सोचिए एक समय पर

[01:26:16] लोग वर्जिल की एनी एड खोल के रैंडमली एक

[01:26:20] लाइन पढ़ते थे और उस लाइन को अपने डिसीजन

[01:26:23] की डायरेक्शन मानते थे ताकि रिग्रेट ना

[01:26:25] हो।

[01:26:27] मैं खुद रेस्टोर में मेनू रैंडमली सेलेक्ट

[01:26:30] करता हूं या सबसे मोटा आदमी क्या ऑर्डर कर

[01:26:33] रहा है वही ले लेता हूं ताकि चॉइसेस की

[01:26:35] टेंशन ना रहे।

[01:26:39] जब फायर नहीं होती तो जलने वाली चीजें

[01:26:42] चुपचाप जमा होती रहती हैं। वैसे ही जब

[01:26:45] पॉलिटिकल इनस्टेबिलिटी या छोटी-छोटी लड़ाई

[01:26:48] नहीं होती तो अंदर ही अंदर सिस्टम में

[01:26:51] एक्सप्लोसिव चीजें जमा हो जाती हैं। लोग

[01:26:54] हैरान हो जाते हैं जब मैं कहता हूं कि

[01:26:56] स्टेबिलिटी भी एक टाइम बम की तरह है। अंदर

[01:26:59] ही अंदर रिस्क जमा होता रहता है। जोसेफ डे

[01:27:03] मिस्त्री ने कहा था कि कॉन्फ्लिक्ट्स

[01:27:06] कंट्रीज को स्ट्रांग बनाते हैं। वॉर अच्छा

[01:27:08] नहीं है। लेकिन पॉइंट यह है कि हम अक्सर

[01:27:11] लॉस को तुरंत देखते हैं। लेकिन बाद में

[01:27:14] होने वाले फायदे नहीं देखते। जैसे गार्डनर

[01:27:18] ट्री को प्रून करता है तो पहले हर्ट होता

[01:27:21] है। बाद में ट्री स्ट्रांग हो जाता है।

[01:27:23] वैसे ही फोर्स्ड पीस या फेक स्टेबिलिटी

[01:27:26] लॉन्ग टर्म में ज्यादा नुकसान कर सकती है।

[01:27:29] जैसे यूरोप में वर्ल्ड वॉर के पहले कई साल

[01:27:32] की शांति के बाद बड़ी तबाही हुई।

[01:27:36] स्टेबिलिटी और काम दिखने वाले सिस्टम्स

[01:27:39] में असल में साइलेंट रिस्क होता है।

[01:27:41] वोलेटिलिटी ही असली इंफॉर्मेशन है। जब

[01:27:45] लीडर्स या पॉलिसी मेकर्स फ्लक्चुएशंस को

[01:27:47] रोकने की कोशिश करते हैं तो वह सिस्टम को

[01:27:50] ज्यादा ही फ्रजाइल बना देते हैं। जब तक

[01:27:53] कुछ होता नहीं तब तक रिस्क दिखाई नहीं

[01:27:56] देता।

[01:27:58] लेकिन जब ब्लो अप होता है तो बहुत बड़ा

[01:28:00] होता है।

[01:28:02] जितनी देर लगती है ब्लो अप आने में उतना

[01:28:05] ही नुकसान ज्यादा होता है। आर्टिफिशियल

[01:28:08] स्टेबिलिटी एक सकर गेम है जिसमें हम शॉर्ट

[01:28:12] टर्म शांति खरीदते हैं। लेकिन लॉन्ग टर्म

[01:28:14] में बड़ा नुकसान होता है। जैसे इजिप्ट का

[01:28:17] गवर्नमेंट या सऊदी अरेबिया जहां यूएस

[01:28:20] सपोर्ट के चलते फेक स्टेबिलिटी रही और

[01:28:23] अंदर ही अंदर नुकसान होता रहा। ऐसे ही

[01:28:26] ईरान में भी यूएस ने एक रिप्रेसिव साह

[01:28:29] लगाया

[01:28:31] जिसका साइड इफेक्ट आज तक दिख रहा है।

[01:28:34] अमेरिकन पॉलिसीज मिडिल ईस्ट में

[01:28:36] स्टेबिलिटी के नाम पे जो कुछ करती हैं वह

[01:28:39] असली में ज्यादा इनस्टेबिलिटी लाती है।

[01:28:43] मॉडर्निटी का मतलब है कि इंसान एनवायरमेंट

[01:28:45] को डोमिनेट कर रहा है। हर जगह रैंडमनेस और

[01:28:49] स्ट्रेस हटा रहा है। हर चीज को स्मूथ बना

[01:28:52] रहा है। यह मॉडर्निटी सिर्फ इंडस्ट्रियल

[01:28:55] या साइंस का जमाना नहीं। यह सोच है कि सब

[01:28:58] कुछ ह्यूमन डिजाइन से परफेक्ट हो सकता है।

[01:29:01] हर चीज को रशनलाइज करिए, ऑप्टिमाइज करिए।

[01:29:06] मॉडर्निटी में हम सबको प्रोकस्टियन बेड पर

[01:29:10] डाल देते हैं। सबको एक ही साइज में फिट

[01:29:12] करने की कोशिश। चाहे पैर काटने पड़े या

[01:29:16] खींचने पड़े। कुछ चीजें इस प्रोसेस में

[01:29:19] अच्छी भी हो सकती हैं। लेकिन ज्यादातर में

[01:29:21] यह नुकसान ही करता है।

[01:29:23] ब्रोंग्स जू का शेर सेफ है। लेकिन फ्री

[01:29:27] वाले शेर की लाइफ में जो असली रैंडमनेस,

[01:29:29] स्ट्रगल और मस्ती है, वह उसके पास नहीं।

[01:29:34] मॉडर्निटी ने हर चीज को नैरेटिव और स्टोरी

[01:29:37] पर डिपेंडेंट कर दिया है। पब्लिक

[01:29:40] फंक्शनरीज या बड़े कंपनी एंप्लाइज सिर्फ

[01:29:43] वही काम करते हैं जो किसी स्टोरी में फिट

[01:29:46] हो सके। असली प्रॉफिट या असली रिजल्ट से

[01:29:49] ज्यादा दिखावा इंपॉर्टेंट हो गया है।

[01:29:53] पहले इंसान गसिप और रियल स्टोरीज से समझता

[01:29:56] था। आज प्रेस से सेंसेशनल और रिमोट न्यूज़

[01:30:00] मिलती है। लेकिन असली रेलेवेंट चीजों से

[01:30:03] दूर हो गया है। पहले अनसर्टेनिटी को हैंडल

[01:30:06] करने के लिए हमारी बिलीव्स या गॉड्स थे।

[01:30:09] आज हम सब कुछ कंट्रोल करना चाहते हैं।

[01:30:12] लेकिन हमारी गलतियां भी बड़ी हो गई हैं।

[01:30:16] नेशन स्टेट का आना भी इसी प्रोसेस का

[01:30:18] हिस्सा है। एजेंसी या पावर अब गॉड के पास

[01:30:22] नहीं इंसान के पास आ गई हैं। और जब इंसान

[01:30:25] के पास पावर आती है तो उनकी गलतियां भी

[01:30:27] बड़ी होती हैं। जैसे स्टेट की मोनोपोली ऑन

[01:30:31] वायलेंस या फिस्कल इरिस्पांसिबिलिटी।

[01:30:37] 1930 में एक एक्सपेरिमेंट हुआ। 389 बच्चों

[01:30:40] को डॉक्टर के पास ले जाया गया। 175 को

[01:30:45] टॉन्सिल का ऑपरेशन रिकमेंड किया गया। बाकी

[01:30:48] बच्चों को दूसरे डॉक्टर को दिखाया। तो 99

[01:30:51] को ऑपरेशन का बोला। फिर तीसरे डॉक्टर के

[01:30:54] पास बच्चे ले गए तो 52 को ऑपरेशन बोला

[01:30:58] गया।

[01:30:59] इसका मतलब डॉक्टर का काम करने का अर्ज या

[01:31:03] आदत सबसे बड़ी प्रॉब्लम है। हर किसी को

[01:31:06] लगता है कुछ ना कुछ करना ही है बिना सोचे

[01:31:10] समझे। हर अननेसेसरी ऑपरेशन बच्चे की लाइफ

[01:31:14] एक्सपेक्टेंसी घटा देता है। लेकिन यह समझ

[01:31:17] नहीं आता कि कब फायदा ज्यादा है और कब

[01:31:20] नुकसान। इसको मैं नाइव इंटरवेंशनिज्म कहता

[01:31:24] हूं। बिना सोचे समझे बस कुछ करने की

[01:31:28] जल्दी।

[01:31:29] जब ट्रीटमेंट से ज्यादा नुकसान हो उसे

[01:31:32] एट्रोजेनिक्स कहते हैं। यह वर्ड ग्रीक से

[01:31:36] आया है। मतलब हीलर की वजह से नुकसान। जैसे

[01:31:39] जॉर्ज वाशिंगटन की डेथ डॉक्टर्स ने इतना

[01:31:42] ब्लड निकाल दिया कि वह मर गए। क्योंकि तब

[01:31:46] ब्लड लेटिंग कॉमन ट्रीटमेंट था। पहले

[01:31:49] हॉस्पिटल ने लोगों को जिंदा बचाने से

[01:31:51] ज्यादा उनको मार दिया। हॉस्पिटल फीवर या

[01:31:54] जर्म्स की वजह से डेथ रेट बढ़ गई थी। जबकि

[01:31:58] स्ट्रीट पर बच्चे ज्यादा सर्वाइव करते थे।

[01:32:01] डॉक्टर सिमिलवीस ने यह सब प्रूफ किया

[01:32:04] लेकिन उनको लोगों ने इग्नोर कर दिया।

[01:32:07] उल्टा उनकी बात सुनने की जगह उनको पागल

[01:32:10] करके असाइलम भेज दिया। बाद में जाकर उनकी

[01:32:13] बात सच निकली। लेकिन उन्होंने बहुत पेन

[01:32:17] झेला और सिस्टम ने उनको पनिश किया। आज भी

[01:32:21] मेडिकल एट्रोजेनिक्स बड़ी प्रॉब्लम है।

[01:32:25] डॉक्टर्स या फार्मा कंपनीज ओवर ट्रीटमेंट

[01:32:27] करवाते हैं। अननेसेसरी मेडिसिंस देते हैं

[01:32:30] या अपने प्रॉफिट के लिए गलत एडवाइस देते

[01:32:33] हैं। यूएस में मेडिकल एरर कार एक्सीडेंट

[01:32:36] से थ्री से 10 टाइम्स ज्यादा लोगों को

[01:32:39] मारता है।

[01:32:41] बढ़िया यह है कि अब मेडिकल फील्ड में

[01:32:44] थोड़ा इंप्रूवमेंट आ रहा है। लेकिन बाकी

[01:32:46] फील्ड्स में लोग अभी भी यह नहीं मानते कि

[01:32:49] उनका हेल्प भी कभी-कभी हार्मफुल हो सकता

[01:32:53] है।

[01:32:55] यही प्रिंसिपल सिर्फ मेडिसिन नहीं हर

[01:32:58] फील्ड पॉलिटिक्स, इकोनॉमिक्स, एजुकेशन,

[01:33:01] अर्बन प्लानिंग एटीसी में भी लगता है। जो

[01:33:04] भी ब्लाइंडली इंटरवीन करते हैं। जहां

[01:33:07] जरूरत नहीं वह हाइड्रोजेनिक्स क्रिएट करता

[01:33:10] है। मतलब सिस्टम को हेल्प करने के चक्कर

[01:33:13] में ज्यादा नुकसान कर देता है। पर यह

[01:33:16] समझना मुश्किल है क्योंकि ज्यादातर लोग

[01:33:18] स्पेशली एक्सपर्ट्स और कंसलटेंट्स हमेशा

[01:33:22] समझते हैं कि वह गलती नहीं कर सकते।

[01:33:25] रिलीजन में भी यह बोला गया है जो गलत काम

[01:33:29] करते हैं लेकिन खुद को नहीं समझते हैं।

[01:33:32] कुछ केसेस में ऑोजिट भी होता है। कभी-कभी

[01:33:36] किसी की गलत या बुरी सोच के की हुई चीज भी

[01:33:40] बेनिफिट कर जाती है। जैसे हैकर्स जब

[01:33:43] सिस्टम पर अटैक करते हैं तो सिस्टम

[01:33:45] स्ट्रांग हो जाता है या किसी की नेगेटिव

[01:33:48] पब्लिसिटी से चीज और फेमस हो जाती है।

[01:33:51] मतलब सिस्टम जो एंटीफ्रजाइल है उस पर अटैक

[01:33:54] करके भी लोग उसको मजबूत ही कर देते हैं।

[01:33:58] कैपिटलिज्म में भी वैसे ही होता है। इंसान

[01:34:02] खुद के फायदे के लिए कुछ करता है। लेकिन

[01:34:05] सिस्टम में उसका फायदा सबको मिलता है।

[01:34:08] चाहे इंटेंशन कुछ भी हो।

[01:34:12] सोशियोइकोनॉमिक लाइफ और ह्यूमन बॉडी दोनों

[01:34:15] में ही हाइट्रोजेनिक्स का प्रॉब्लम है।

[01:34:18] मतलब हम जरूरत से ज्यादा इंटरवीन करते हैं

[01:34:21] बिना रिस्पेक्ट के कि चीजें खुद से भी ठीक

[01:34:24] हो सकती हैं या ग्रो कर सकती हैं।

[01:34:28] लोग हर प्रॉब्लम को इंजीनियरिंग प्रॉब्लम

[01:34:30] जैसे ट्रीट करते हैं जो मशीनंस में ठीक है

[01:34:33] लेकिन ऑर्गेनिज्म्स या बायोलॉजिकल

[01:34:36] सिस्टम्स में नहीं। सब जगह हम एंटी

[01:34:39] फ्रेजिलिटी का इंकार करते हैं। सिस्टम को

[01:34:42] फोर्सफुली इंप्रूव करने की कोशिश में

[01:34:45] सिस्टम को और कमजोर बना देते हैं। सोशल

[01:34:49] साइंस और इकोनॉमिक्स में लोग

[01:34:51] हाइट्रोजेनिक्स को जानते ही नहीं। उनके

[01:34:54] पास इसका कोई कांसेप्ट या शब्द भी नहीं

[01:34:57] है। जब मैंने इकोनॉमिक्स में मॉडल एरर पर

[01:35:00] क्लास लेना चाहा तो लोगों ने इग्नोर किया

[01:35:03] या रोक दिया। कहा थ्यरी दिखाओ। लेकिन असली

[01:35:07] प्रॉब्लम यह है कि थ्यरी खुद ही गलती

[01:35:10] क्रिएट करती है। फिजिक्स में थरी

[01:35:13] रिलेटिवली सेफ है क्योंकि हर नई थ्यरी

[01:35:15] पुरानी से बेटर होती है। लेकिन सोशल साइंस

[01:35:18] में हर थ्यरी दूसरी थ्यरी से अलग और ऑोजिट

[01:35:22] होती है और प्रैक्टिकल लाइफ में थ्यरीज

[01:35:24] बहुत फ्रजाइल होती हैं।

[01:35:27] सोशल साइंस की थ्यरीज सुपर फ्रजाइल है।

[01:35:31] रियल वर्ल्ड रिस्क एनालिसिस में बेकार

[01:35:33] हैं। सोशल साइंस और पॉलिसी में

[01:35:36] हाइड्रोजेनिक्स का इंपैक्ट मेडकिस्तान

[01:35:40] जैसा छोटा नहीं बल्कि एक्सट्रीमिस्टान

[01:35:42] जैसा बड़ा होता है। पावर कंसंट्रेट होने

[01:35:46] की वजह से एक गलती सबको बर्बाद कर सकती

[01:35:50] है। इकोनॉमिक क्राइसिस 2007 का भी मेन

[01:35:54] रीजन था एललेन ग्रीन स्पैन जैसे लोगों की

[01:35:57] इंटरवेंशन। उन्होंने बूमबस्ट साइकिल को

[01:36:01] स्मूथ करने की कोशिश की। रिस्क को हाइड कर

[01:36:04] दिया। फिर एक दिन सब कुछ फट गया।

[01:36:07] छोटे-छोटे फायर फॉरेस्ट में फ्यूल को खत्म

[01:36:10] कर देता है। वैसे ही छोटे-छोटे फेलियर्स

[01:36:13] इकॉनमी में कमजोर फर्म्स को हटा देते हैं।

[01:36:16] लेकिन जब सब स्मूथ दिख रहा हो अंदर ही

[01:36:19] अंदर बड़ा रिस्क जमा हो रहा होता है।

[01:36:22] एथिक्स की दिक्कत यह है कि पावर मिलने पे

[01:36:26] इंसान कुछ ना कुछ दिखाने की कोशिश करता

[01:36:29] है। डेमोक्रेसी में सबसे बड़ा प्रॉमिस

[01:36:32] करने वाला जीत जाता है। चाहे लॉन्ग टर्म

[01:36:35] कॉस्ट कुछ भी हो। यह टेंडेंसी हर फील्ड

[01:36:38] में है। एडिटिंग का एग्जांपल लीजिए। एक

[01:36:41] एडिटर पांच चेंजेस करेगा। दूसरा उसी पेज

[01:36:44] को देखेगा। फिर पांच और चेंजेस करेगा।

[01:36:48] शायद पहले वाले के चेंजेस ही वापस बदल

[01:36:50] देगा।

[01:36:52] ओवर इंटरवेंशन गलत जगह होता है और असली

[01:36:55] जरूरत की जगह कुछ नहीं होता। ज्यादा

[01:36:59] इंटरवेंशन का मतलब जरूरी वक्त पे कम

[01:37:01] इंटरवेंशन। छोटा गवर्नमेंट भी कभी-कभी

[01:37:05] ज्यादा इंट्रसिव हो सकता है। लेकिन मैसेज

[01:37:08] यह नहीं है कि इंटरवेंशन हमेशा गलत है।

[01:37:12] कभी-कभी अंडर इन्वेंशन भी प्रॉब्लम है।

[01:37:15] जैसे इमरजेंसी में या जब एनवायरमेंट या

[01:37:18] इकॉनमी में कोई बड़ी चीज कंट्रोल करनी हो।

[01:37:23] सही रूल यह है कि साइज, कंसंट्रेशन और

[01:37:26] स्पीड को कंट्रोल करिए। यह ब्लैक स्ान

[01:37:29] रिस्क कम करते हैं। हाईवे पर स्पीड लिमिट

[01:37:33] लगाना सेफ्टी बढ़ाता है। लेकिन स्ट्रीट पर

[01:37:36] ज्यादा रेगुलेशन उल्टा लोगों की अलर्टनेस

[01:37:38] कम कर देता है और एक्सीडेंट्स बढ़ा सकता

[01:37:41] है।

[01:37:43] ड्रेस्टिन नीदरलैंड्स में सबस्ट्रीट साइंस

[01:37:46] हटा दिए तो सेफ्टी बढ़ गई क्योंकि लोग खुद

[01:37:49] से कॉशियस हो गए।

[01:37:51] यूएस पॉलिटिक्स में यह आइडियाज फिट नहीं

[01:37:54] बैठते। डेमोक्रेट्स हाइपर इंटरवेंशन करते

[01:37:57] हैं। रिपब्लिकनंस कॉरपोरेशन को फ्री

[01:38:00] छोड़ते हैं। दोनों ही डेट बढ़ाते हैं।

[01:38:02] दोनों ही ब्लैक स्वान रिस्क नहीं समझते।

[01:38:07] इंटरवेंशन का एक सिस्टमेटिक प्रोटोकॉल हो

[01:38:10] कि कब कुछ करना है, कब सिस्टम को छोड़

[01:38:13] देना है और हमें मॉडर्निटी के

[01:38:16] हाइट्रोजेनिक्स जैसे एनवायरमेंट का बड़ा

[01:38:18] नुकसान इसको एक्टिवली कंट्रोल करना चाहिए।

[01:38:22] मैं किसी पार्टी का सपोर्टर नहीं बस रिस्क

[01:38:25] और हार्म को ध्यान में रख के पॉलिसी बनाने

[01:38:28] के लिए कहता हूं ताकि प्लेनेट और इंसानी

[01:38:31] सोसाइटी को हम खत्म ना कर दें।

[01:38:35] इंटरवेंशनिज्म का प्रॉब्लम यह है कि

[01:38:37] सोसाइटी में जो इंसान कुछ काम करता है

[01:38:41] उसको क्रेडिट मिलता है। लेकिन जो इंसान

[01:38:44] कुछ बुरा होने से रोकता है उसको कोई नहीं

[01:38:46] देखता। डॉक्टर जो पेशेंट को ऑपरेट नहीं

[01:38:50] करता और पेशेंट की बॉडी को खुद हील होने

[01:38:52] का मौका देता है उसको रिस्पेक्ट या

[01:38:55] रिवॉर्ड नहीं मिलता। लेकिन जो डॉक्टर

[01:38:57] अननेसेसरी सर्जरी करता है, पेशेंट को

[01:39:00] रिलीफ दिखाता है, पैसा कमाता है, उसको र्स

[01:39:04] रॉयस मिलती है। कॉर्पोरेट मैनेजर जो लॉस

[01:39:07] अवॉइड करता है, उसको रेयरली कोई रिवॉर्ड

[01:39:10] मिलता है। ब्लैक स्वान वर्ल्ड का असली

[01:39:12] हीरो वह है जो बड़ी मुसीबत होने से पहले

[01:39:15] ही रोक लेता है। लेकिन क्योंकि वह मुसीबत

[01:39:19] आए ही नहीं तो उसको क्रेडिट भी नहीं

[01:39:21] मिलता।

[01:39:23] पुराने जमाने के लोग ज्यादा समझदार थे।

[01:39:26] जैसे रोमन जनरल फेबियस मैक्सिममस जिसको

[01:39:30] कनकटेटर यानी प्रोक्रेस्टिनेटर कहा गया।

[01:39:34] उसने दुश्मन हेनबल को डायरेक्ट फाइट में

[01:39:37] घुस के नहीं बल्कि डिले करके हराया। उसकी

[01:39:41] स्ट्रेटजी थी कि एक्शन को डिले करो ताकि

[01:39:44] अननेसेसरी लॉस ना हो। इसी आईडिया पर

[01:39:47] फेबियन सोसाइटी भी बनी यूके में जिसमें

[01:39:50] डीले को एक स्मार्ट पॉलिटिकल स्ट्रेटजी

[01:39:52] माना गया ताकि गलत टाइम पर गलत एक्शन ना

[01:39:55] हो जाए और लोग अपनी सोच बदल सके जब कुछ

[01:39:59] चीजें सामने आए।

[01:40:01] रोम का फेमस प्रोवर्ब है फस्तना लते धीरे

[01:40:06] जल्दी करो। चाइनीस फिलॉसफी में लाओजुब ने

[01:40:10] भी कहा था ववे कुछ ना करते हुए काम हो

[01:40:15] जाता है। प्रोकस्टिनेशन को हम गलत समझते

[01:40:18] हैं लेकिन असल में यह हमारी बॉडी और माइंड

[01:40:21] का नेचुरल डिफेंस है। नेचर को अपना काम

[01:40:24] करने का मौका मिलता है। गलतियां कम होती

[01:40:28] हैं। जब असली डेंजर हो जैसे रूम में शेर आ

[01:40:31] जाए या आग लग जाए तब प्रोक्रेस्टिनेट नहीं

[01:40:35] करते लेकिन आर्टिफिशियल काम या जरूरत ना

[01:40:38] होने वाली चीजों में प्रोक्रेस्टिनेट करना

[01:40:41] फायदेमंद है। मैं खुद लिखने में

[01:40:44] प्रोक्रेस्टिनेट करता हूं। अगर लिखने का

[01:40:47] मन नहीं तो लिखता ही नहीं ताकि बेकार या

[01:40:50] झूठा लिखने से बचूं।

[01:40:53] मैं वही लिखता हूं जिसमें नेचुरली

[01:40:55] इंटरेस्ट हो।

[01:40:57] साइकोलॉजिस्ट और इकोनॉमिस्ट बोलते हैं कि

[01:41:00] प्रोक्रेस्टिनेशन डिजीज है। लेकिन असल में

[01:41:03] एनवायरमेंट बेकार है। इंसान नहीं।

[01:41:06] प्रोक्रेस्टिनेशन हमारा नेचुरलिस्टिक

[01:41:08] फिल्टर है। यह शॉर्ट टर्म यूज़लेस

[01:41:11] इंफॉर्मेशन को इग्नोर करने में हेल्प करता

[01:41:13] है। ताकि हम बिना सोचे समझे जंप ना करें।

[01:41:18] लोग सोचते हैं कि जो नेचुरल है वह हमेशा

[01:41:22] सही नहीं होता। नेचुरलिस्टिक फैलेसी लेकिन

[01:41:25] रिस्क एक मामले में नेचर को इग्नोर करना

[01:41:28] बड़ी गलती है। नेचर टाइम के टेस्ट से

[01:41:32] गुजरी है। सबसे रोबस्ट वही है। फिलॉसफर्स

[01:41:36] जो रिस्क को इग्नोर करके सिर्फ मोरलाइज

[01:41:38] करते हैं, वह बेकार हैं। उनको जीन पूल से

[01:41:42] बाहर हो जाना चाहिए। मॉडर्न सोसाइटी हमको

[01:41:45] हर सेकंड इंफॉर्मेशन के बम से न्यूरोटिक

[01:41:48] बना रही है। एक इंसान जो हर छोटी चीज पर

[01:41:52] ओवर रिएक्ट करता है, हर न्यूज़, हर

[01:41:54] प्रॉब्लम को बड़ी समस्या बना देता है,

[01:41:57] उसको हम न्यूरोटिक कहते हैं। दूसरी तरफ एक

[01:42:01] इंसान जो काम रहता है, रियल रिस्क पर ही

[01:42:04] रिएक्ट करता है, वह ट्रू लीडर टाइप है।

[01:42:07] पहले वाले को सब कुछ नॉइज़ लगता है। दूसरे

[01:42:10] वाले को सिर्फ सिग्नल दिखाई देता है।

[01:42:13] साइंस में भी नॉइस का मतलब है रैंडम बेकार

[01:42:16] इंफॉर्मेशन जिसे इग्नोर करना चाहिए। हमारे

[01:42:20] इनेबिलिटी नॉइज़ और सिग्नल को अलग करने की

[01:42:23] वजह से हम हर चीज पर रिएक्ट करते हैं और

[01:42:27] ओवर इंटरवीन करने लगते हैं।

[01:42:32] अगर किसी इंसान को जल्दी मरना है तो उसको

[01:42:36] पर्सनल डॉक्टर दे दीजिए। चाहे डॉक्टर

[01:42:38] अच्छा हो या बुरा फर्क नहीं पड़ता। पर्सनल

[01:42:42] डॉक्टर का मतलब ज्यादा इंटरवेंशन,

[01:42:44] अननेसेसरी ट्रीटमेंट और ओवर मेडिकेशन।

[01:42:47] क्योंकि डॉक्टर को अपनी सैलरी जस्टिफाई

[01:42:49] करनी होती है और कुछ ना करने पर उसको खुद

[01:42:53] लगता है कि वह काम नहीं कर रहा। इसी वजह

[01:42:56] से कई बार बड़े लोग, रिच लोग या लीडर्स

[01:43:00] ज्यादा मेडिकल केयर लेने के बावजूद आम

[01:43:02] लोगों की तरह ही मर जाते हैं या कभी-कभी

[01:43:05] उनसे पहले भी। माइकल जैक्सन जिन्होंने

[01:43:08] पर्सनल डॉक्टर की ओवर इंटरवेंशन ने

[01:43:11] प्रॉब्लम क्रिएट किया। यह प्रॉब्लम सिर्फ

[01:43:14] हेल्थ में नहीं बल्कि कोऑपरेशंस और पॉलिसी

[01:43:16] मेकिंग में भी है। जैसे एलन ग्रीन स्पेन

[01:43:20] जिनके पास डाटा गैदरिंग डिपार्टमेंट्स थे

[01:43:23] और वह हर छोटी फ्लक्चुएशन पर रिएक्ट करते

[01:43:26] थे। नॉइस को सिग्नल समझ लेते थे। इस वजह

[01:43:29] से उन्होंने केओस क्रिएट किया। बिजनेस और

[01:43:33] इकोनॉमिक डिसीजन मेकिंग में ज्यादा डाटा

[01:43:35] लेने से ज्यादा प्रॉब्लम्स आती हैं।

[01:43:38] क्योंकि डाटा में स्प्यूरियस बेकार चीजें

[01:43:41] भी होती हैं। जितनी ज्यादा फ्रीक्वेंटली

[01:43:44] डाटा देखिए उतना ही नॉइज़ ज्यादा मिलेगा

[01:43:47] सिग्नल कम। इयरली डाटा में सिग्नल नॉइज़

[01:43:51] रेशियो 1 है। डेली देखिए तो 5% सिग्नल और

[01:43:55] 95% नॉइज़ हो जाती है और आवरली तो लगभग सब

[01:44:00] कुछ नॉइज़ हो जाता है। इसलिए जो इंसान रोज

[01:44:03] न्यूज़ देखता है वह सिग्नल नहीं बस नॉइज़

[01:44:06] देख रहा होता है।

[01:44:08] न्यूज़ पेपर्स हर दिन कुछ ना कुछ सेंसेशनल

[01:44:12] डालते हैं ताकि पेज भर सके। पर असल में

[01:44:15] बहुत दिन ऐसे होते हैं जब दो लाइन का पेपर

[01:44:18] ही काफी होता है। लेकिन पैसा कमाने के

[01:44:21] चक्कर में जंक न्यूज़ दे देते हैं। जंक

[01:44:24] न्यूज़ भी एक तरह की एट्रोजेनिक्स है।

[01:44:29] ह्यूमन बायोलॉजी में भी ज्यादा इंफॉर्मेशन

[01:44:31] का ओवरलोड प्रॉब्लम क्रिएट करता है। जैसे

[01:44:34] ज्यादा हॉर्मोंस या ज्यादा फूड। न्यूज़ या

[01:44:37] शुगर का ज्यादा कंजमशन बॉडी को कंफ्यूज

[01:44:40] करता है। वैसे ही ज्यादा इंफॉर्मेशन भी

[01:44:43] माइंड को कंफ्यूज करती है। हम इमोशनली भी

[01:44:46] नॉइज़ पर रिएक्ट कर लेते हैं। जबकि रियल

[01:44:49] सिग्नल आपको वैसे भी पता चल जाता है जब

[01:44:53] जरूरत होती है। इसलिए सिर्फ बड़ी चेंजेस

[01:44:56] देखिए। छोटी फ्लक्चुएशंस को इग्नोर करिए।

[01:45:00] मीडिया की वजह से हम वर्चुअल रियलिटी में

[01:45:03] जी रहे हैं। असली दुनिया से अलग होते जा

[01:45:06] रहे हैं। क्योंकि मीडिया हर दिन सिर्फ

[01:45:09] सेंसेशनल एनेकडोटल स्टोरीज दिखाता है।

[01:45:12] असली रिस्क छुप जाता है। मीडिया के

[01:45:16] एक्सप्लेनेशंस और थ्यरीज भी हमें गलत

[01:45:19] इल्लुजन देते हैं कि हम दुनिया समझ रहे

[01:45:22] हैं। हम रियल वर्ल्ड के मैप को रियलिटी से

[01:45:25] क्रॉस चेक करना भूल गए हैं। इसी वजह से हम

[01:45:29] सोचते हैं कि सब कुछ कंट्रोल में है। जबकि

[01:45:32] दुनिया फ्रजाइल होती जा रही है।

[01:45:35] इंफॉर्मेशन राशन करना कम करना बेस्ट

[01:45:38] स्यूशन है ओवर इंटरवेंशन से बचने का। पर

[01:45:42] इंटरनेट के जमाने में यह लोगों को समझना

[01:45:45] मुश्किल है। जितना ज्यादा डाटा लेंगे उतना

[01:45:49] ही कम समझ पाएंगे और उतना ही ज्यादा बेकार

[01:45:52] इंटरवेंशन करेंगे।

[01:45:54] चीन में जब स्टेट ने फूड को कंट्रोल करना

[01:45:57] शुरू किया तभी भुखमरी बढ़ गई। सोवियत रूस

[01:46:02] में इनफिशिएंट सिस्टम होने के बावजूद

[01:46:04] रिडंडेंसी थी। लोग एक दूसरे की हेल्प कर

[01:46:08] लेते थे क्योंकि रियल ह्यूमन लिंक्स थे

[01:46:10] वर्चुअल नहीं। अमेरिका में फूड एफिशिएंट

[01:46:13] है पर एक डिसरप्शन से सब कुछ बिगड़ सकता

[01:46:16] है। जबकि रूस में इनफिशिएंसी ने एक्चुअली

[01:46:19] लोगों को बचाया।

[01:46:21] फ्रांस के बारे में भी मिथ है कि

[01:46:23] सेंट्रलाइज्ड स्टेट की वजह से सब कुछ

[01:46:25] अच्छा चलता है। लेकिन असल में फ्रांस में

[01:46:29] स्टेट नॉमिनल ही थी। ज्यादातर कंट्री

[01:46:32] डिसेंट्रलाइज्ड थी। लोकल लैंग्वेज थी। हर

[01:46:35] जगह राइट कल्चर था। सेंट्रलाइजेशन का रियल

[01:46:38] इफेक्ट बहुत लेट आया और कुछ टाइम

[01:46:40] सेंट्रलाइज्ड ग्रोथ के बावजूद

[01:46:43] डिसेंट्रलाइजेशन फिर शुरू हो गई। फ्रांस

[01:46:46] की डायवर्सिटी, वैरायटी और लोकल मिसनेस ही

[01:46:50] उसकी स्ट्रेंथ थी ना कि टॉप डाउन कंट्रोल।

[01:46:54] स्वीडन और नदी कंट्रीज का एग्जांपल लोग

[01:46:57] देते हैं कि यह लार्ज स्टेट वाले कंट्रीज

[01:46:59] भी कितने सक्सेसफुल, हैप्पी और डेवलप्ड

[01:47:03] है। जैसे डेनमार्क को वर्ल्ड का सबसे

[01:47:06] हैप्पी नेशन कहा जाता है। लेकिन असल सच यह

[01:47:09] है कि वहां स्टेट सिर्फ टैक्स कलेक्ट करता

[01:47:12] है। पर पैसे लोकल कम्यून्स खुद यूज करते

[01:47:15] हैं। जैसे लोकल स्किल ट्रेनिंग या जो लोकल

[01:47:18] कम्युनिटी चाहे वह। इकोनॉमिक एलट्स को भी

[01:47:23] वहां दूसरे डेमोक्रेसी से ज्यादा फ्रीडम

[01:47:25] मिलती है। तो यह सच में उतना स्टैटिज्म

[01:47:29] नहीं है जितना दूर से लगता है।

[01:47:32] स्वीडन जैसे देश ने भी जब बड़ी रेसेस आई

[01:47:37] 1990 में तो स्ट्रांग फिस्कल पॉलिसीज लगा

[01:47:40] के सिस्टम को मजबूत किया और बाद में बड़ी

[01:47:43] ग्लोबल क्राइसिस का असर कम हुआ। मतलब

[01:47:46] क्राइसिस से सुधार आता है और सिस्टम टफ हो

[01:47:50] जाता है। दूसरी इंपॉर्टेंट बात जब भी कोई

[01:47:53] कॉनस्ट्रेंड फ्रजाइल सिस्टम टूटता है तो

[01:47:57] हमेशा लोग ब्लेम करते हैं प्रेडिक्शन

[01:48:00] फेलियर को। जैसे कि इंटेलिजेंस फेलियर या

[01:48:03] फॉरकास्टिंग का गलत होना। लेकिन असल बात

[01:48:06] यह है कि फौल्ट सिस्टम की फ्रजिलिटी में

[01:48:09] थी। किसी एक छोटी कैटलिस्ट या इवेंट में

[01:48:12] नहीं। जैसे इजिप्ट का रिवोल्यूशन हुआ

[01:48:15] ओबामा ने ब्लेम किया कि हमने प्रेडिक्ट

[01:48:18] नहीं किया लेकिन प्रॉब्लम प्रेडिक्शन की

[01:48:20] नहीं सिस्टम के अंदर छुपी वीकनेस की थी।

[01:48:24] वैसे ही 208 के फाइनेंसियल क्राइसिस में

[01:48:27] सब ब्लेम करते रहे सब प्राइम मेलडाउन या

[01:48:30] किसी एक इवेंट को। पर असल वजह अंडरलाइन

[01:48:33] फ्रजिलिटी थी। मतलब लोग कैटलिस्ट और कॉज

[01:48:37] में कंफ्यूजन करते हैं। इसलिए प्रेडिक्शन

[01:48:40] में पैसे और एनर्जी लगाना वेस्ट है

[01:48:43] क्योंकि ऐसे इवेंट्स अनप्रिडिक्टेबल होते

[01:48:46] हैं और यह कभी वेगस के ब्लैक जैक की तरह

[01:48:49] नहीं हो सकता कि थोड़ा सा बेहतर प्रेडिक्ट

[01:48:52] करके जीत जाएंगे। रियल वर्ल्ड में

[01:48:55] पॉलिटिकल या इकोनॉमिक टेल इवेंट्स की

[01:48:57] प्रोबेबिलिटीज कभी परफेक्ट नहीं निकाल

[01:49:00] सकते। चाहे कितना भी डाटा हो, कितना भी

[01:49:03] रिसर्च हो। मेरा एक एक्सपीरियंस है। एक

[01:49:07] फाइनेंशियल पैनल में इकोनॉमिस्ट ने फ्यूचर

[01:49:09] के सालों की प्रोजेक्शन दिखाई। तो मैंने

[01:49:12] पब्लिक में गुस्सा दिखाया और कहा कि

[01:49:14] फ्यूचर प्रेडिक्शन में हमारी रिकॉर्ड जीरो

[01:49:17] है। और यह डेंजरस भी है क्योंकि यह लोग

[01:49:19] रिस्क टेकर्स को ओवर कॉन्फिडेंट बना देते

[01:49:22] हैं। जैसे झूठा मेडिसिन देना। हम चाइल्ड

[01:49:26] प्रूफिंग समझते हैं लेकिन फॉरकास्टिंग

[01:49:28] प्रूफिंग नहीं। स्यूशन है कि हमको ऐसे

[01:49:32] रोबस्ट सिस्टम्स बनाने हैं जो गलत

[01:49:34] प्रेडिक्शन होने पर भी टूट ना जाए। मतलब

[01:49:37] एंटीफ्रजाइल या रोबस्ट।

[01:49:40] अगर आपके पास एक्स्ट्रा कैश, गोल्ड या

[01:49:43] खाना है तो आपको हर क्राइसिस प्रेडिक्ट

[01:49:46] करने की जरूरत नहीं। आप ऑलरेडी रेडी हैं।

[01:49:50] लेकिन अगर आप उधार में हैं तो आपको सब कुछ

[01:49:52] परफेक्ट प्रेडिक्ट करना पड़ेगा।

[01:49:56] तो फोकस यह होना चाहिए कि अपने सिस्टम को

[01:49:59] कम से कम फ्रजाइल बनाएं। प्रेडिक्शन पर कम

[01:50:02] डिपेंड करें और हिस्ट्री से सीखें कि

[01:50:04] ह्यूमंस चेंज नहीं होते तो यूटोपियन

[01:50:08] प्लानिंग बेकार है।

[01:50:10] इंसान चाहे तो मून पर घर बना सकता है।

[01:50:13] प्लनेट्स की ट्रेजजेक्टरी प्रेडिक्ट कर

[01:50:15] सकता है। क्वांटम फिजिक्स के छोटे से छोटे

[01:50:19] इफेक्ट का हिसाब रख सकता है। लेकिन

[01:50:22] गवर्नमेंट और उनके सुपर एडवांस्ड मॉडल्स

[01:50:24] भी रिवोल्यूशन, क्राइसिस, बजट डेफिसिट,

[01:50:28] क्लाइमेट चेंज या स्टॉक मार्केट की प्राइस

[01:50:30] कुछ घंटे बाद क्या होगी यह प्रेडिक्ट नहीं

[01:50:34] कर सकते। यह दोनों अलग दुनिया है। एक जहां

[01:50:38] कुछ चीजें प्रेडिक्ट हो सकती हैं। दूसरी

[01:50:40] जहां ब्लैक स्न इवेंट्स होते हैं जो

[01:50:42] अनप्रिडिक्टेबल और डेंजरस है। जो समझदारी

[01:50:46] है वह यह है कि समझिए कि कौन सी चीज

[01:50:49] प्रेडिक्ट हो सकती है और कौन सी नहीं। और

[01:50:52] जिन चीजों में ब्लैक स्ान रिस्क है वहां

[01:50:55] प्रेडिक्ट करने की जगह अपने आप को सेफ

[01:50:57] रखने पर फोकस करिए। सोशल, इकोनॉमिक,

[01:51:01] कल्चरल लाइफ मोस्टली इसी ब्लैक स्ान जोन

[01:51:04] में आती है। जहां रेयर इवेंट्स का इंपैक्ट

[01:51:07] बहुत ज्यादा है और उनको प्रेडिक्ट करना

[01:51:10] नामुमकिन है। चाहे कितने भी एक्सपर्ट्स हो

[01:51:14] या कितने भी एडवांस्ड मॉडल्स हो।

[01:51:18] मैं यह बार-बार कहता हूं कि ब्लैक स्वान

[01:51:21] डोमेन में रैंडमनेस इतनी कॉम्प्लिकेटेड है

[01:51:24] कि उसको समझना पॉसिबल ही नहीं। मैथमेटिकल

[01:51:27] लिमिट है। कोई भी टेक्नोलॉजी या पीएचडी भी

[01:51:30] इसको तोड़ नहीं सकता।

[01:51:33] मेरा काम यह बताना है कि स्केप्टिसिज्म कब

[01:51:36] सही जगह यूज करिए और कब नहीं। मतलब कौन सी

[01:51:39] जगह में डाउट रखना चाहिए जो फोर्थ

[01:51:42] क्वाड्रेंट है यानी ब्लैक स्ान जोोन और

[01:51:45] कौन से में नहीं।

[01:51:47] टारगेट यह है कि अपने आप को फोर्थ

[01:51:49] क्वाड्रेंट से बाहर निकालिए। यह वही जगह

[01:51:52] है जहां रेयर, अनप्रिडिक्टेबल और ह्यूज

[01:51:55] इफेक्ट वाले इवेंट्स होते हैं और रिस्क

[01:51:57] कैलकुलेशन फेल हो जाता है। मॉडर्न जमाने

[01:52:01] में विनर टेक ऑल इफेक्ट बढ़ गया है। हर

[01:52:05] चीज में कुछ लोग या कंपनीज सब कुछ ले जाते

[01:52:08] हैं। बाकी के लिए कुछ नहीं बचता। इससे

[01:52:11] अनप्रिडिक्टबिलिटी और भी बढ़ गई है। अब

[01:52:14] ज्यादा चीजें ब्लैक स्ान इफेक्ट से चल रही

[01:52:16] हैं और समझना मुश्किल हो जा रहा है।

[01:52:20] दूसरी साइड यह भी है कि ब्लैक स्ान का

[01:52:22] कांसेप्ट पॉपुलर होने के बाद लोग और भी

[01:52:25] ज्यादा प्रेडिक्शन करने लगे हैं। नए-नए

[01:52:28] कॉम्प्लिकेटेड मॉडल्स बना रहे हैं। पर असल

[01:52:31] स्यूशन सिंपल है। कम करिए और डिस्कशन को

[01:52:35] एंटीफजिलिटी पर शिफ्ट करिए। मतलब फोकस

[01:52:38] प्रेडिक्शन पर नहीं सिस्टम को इतना मजबूत

[01:52:41] बनाने पर लगाइए कि अगर गलत हो भी जाइए तो

[01:52:44] बचे रहिए।

[01:52:47] एक और प्रैक्टिकल टिप हर बड़ी क्राइसिस या

[01:52:50] डिजास्टर के लिए अपने पास बुक्स रख लीजिए

[01:52:53] क्योंकि जब लाइट चली जाती है या टाइम पास

[01:52:56] नहीं होता तो नवेल्स ही काम आती हैं। यह

[01:52:59] रोबस्ट है। इलेक्ट्रिसिटी की जरूरत नहीं

[01:53:02] होती। रोबस्ट सिस्टम का भी यही लॉजिक है

[01:53:05] जो किसी भी क्राइसिस में टिक सके।

[01:53:11] [संगीत]

[01:53:14] नेरो काम करता है बुक्स पढ़ने का। जिंदगी

[01:53:17] भर बस पढ़ाई। फैट टोनी को पढ़ना बिल्कुल

[01:53:21] पसंद नहीं। कहता है एक दिन मेमोरियर

[01:53:23] लिखेगा लेकिन खुद एक भी किताब प्रॉपर्ली

[01:53:26] नहीं पढ़ी। फैट टोनी ब्रूगलिन में पला

[01:53:30] बढ़ा। न्यू जर्सी शिफ्ट हुआ। एकदम टिपिकल

[01:53:33] एक्सेंट है। ऑफिस काम और रूटीन से एलर्जिक

[01:53:38] है। दिन भर आराम करता है। कभी-कभी कुछ

[01:53:40] डील्स और हमेशा खाना खाना।

[01:53:43] ज्यादा लोग बिजी रहते हैं। हर कोई स्ट्रेस

[01:53:46] में भागा घूमता है। लेकिन नेरो और टोनी

[01:53:50] दोनों बोर होने से डरते हैं। इसलिए अक्सर

[01:53:53] लंच के बहाने मिलते हैं। डिनर तो आसानी से

[01:53:57] मिल जाता है। पर लंच के पार्टनर्स ढूंढना

[01:54:00] टफ है। ऑफिस वाले बोरिंग होते हैं।

[01:54:03] स्ट्रेस के मरे हुए।

[01:54:05] टोनी का इटालियन रेस्टोर में लेवल अलग है।

[01:54:08] ओनर उसे हग करता है। स्टाफ खुश हो जाता

[01:54:12] है। जाते वक्त कुछ ना कुछ गिफ्ट देकर बाय

[01:54:15] बोलते हैं। नेरू की ए्जायटी लंच से कम हो

[01:54:20] जाती थी। जब टोनी मिल जाता जिम में मिलते

[01:54:23] टोनी अपना हॉरिजॉन्टल वर्कआउट करता। सोना

[01:54:26] जकूजी स्टीम बाथ फिर रेस्टोर। टोनी को

[01:54:30] इवनिंग में और भी दोस्तों की कंपनी चाहिए

[01:54:33] जो मजेदार हो। आइडियाज दे सकें। नेहरू की

[01:54:37] लाइफ अलग है। रात को जल्दी सो जाना,

[01:54:40] पार्टी से जल्दी निकल जाना, दिन में काम,

[01:54:44] ज्यादा टाइम ऑनलाइन बुक्स मंगवाना, पढ़ना,

[01:54:46] पुरानी एडवेंचरस लाइफ के बाद अब शांत

[01:54:49] रूटीन पसंद है। नेरो को बहुत चीजों से

[01:54:52] एलर्जी है। फ्लिप फ्लॉप्स, टीवी,

[01:54:55] पॉलिटिशियंस, बैंकर्स, न्यू जर्सी, क्रूज़

[01:54:59] वाले रिच लोग, यूनिवर्सिटी एडमिन, नेम

[01:55:02] ड्रॉपर्स, एलिवेटर म्यूजिक, वेल्ड ड्रेस्ड

[01:55:06] सेल्समैन, फैट टोनी को एम्प्टी सूट लोग

[01:55:09] पसंद नहीं जो मेन पॉइंट नहीं समझते।

[01:55:14] टोनी फ्रजिलिटी को स्मेल कर सकता है।

[01:55:17] लिटरली नए लोगों से मिलकर उनको सूंघ लेता

[01:55:21] है। जैसे डॉग नैरो एक वंटियर ट्रांसलेशन

[01:55:25] ग्रुप में है। जहां सीनियोरिटी डिग्री पर

[01:55:27] नहीं सब इक्वल रूल्स स्ट्रिक्ट। दूसरा

[01:55:31] क्लब वेटलिफ्टिंग मोस्टली न्यूयॉर्क के

[01:55:33] डोरमैन जेिटर्स मॉबस्टर टाइप लोग। निरो

[01:55:38] जितना फ्री होता है उतना ही अंदर से

[01:55:40] डिसटिस्फाइड। खुद को बिजी रखता नॉलेज चस

[01:55:43] करके लेकिन जितना डीप जाए उतना ही डीप

[01:55:47] होता जाता है। एक वेनेटियन प्रोवर्ब के

[01:55:50] हिसाब से क्यूरियोसिटी को खत्म नहीं किया

[01:55:54] जा सकता। उसको चस करने से और बढ़ जाती है।

[01:55:57] निरो के पास 15,000 बुक्स हैं। हर दिन नए

[01:56:01] आते हैं। बॉक्सेस का स्ट्रेस, मेडिकल

[01:56:04] टेक्स्ट पढ़ना पसंद है क्योंकि खुद कैंसर

[01:56:07] और हेलीकॉप्टर क्रैश फेस किया। इसलिए

[01:56:09] ह्यूमन बॉडी और टेक फ्रेजिलिटी पर

[01:56:12] इंटरेस्ट पड़ गया। स्टैटिस्टिक्स और

[01:56:15] प्रोबेबिलिटी में फॉर्मली ट्रेंड है। उसको

[01:56:18] फिलॉसफी जैसा मानते हैं। एक ही बुक जिंदगी

[01:56:22] भर लिख रहा प्रोबेबिलिटी एंड मेटा

[01:56:24] प्रोबेबिलिटी। पर हर दो साल में छोड़ देता

[01:56:27] फिर उठा लेता। नेरो को बिना प्लान के

[01:56:31] पुराने शहरों में घूमना पसंद। रैंडमनेस से

[01:56:34] ट्रैवल करता। स्मेल पर डेस्टिनेशन डिसाइड

[01:56:37] करता।

[01:56:39] जब भी न्यूयॉर्क में होता अपने विंडो से

[01:56:41] न्यू जर्सी देखकर खुश होता कि वहां नहीं

[01:56:44] है। टोनी को भी कह देता मुझे भी तुम्हारी

[01:56:47] जरूरत नहीं पर असल में जरूरत थी।

[01:56:52] 208 के क्राइसिस के बाद दोनों की दोस्ती

[01:56:54] समझ आई। दोनों ने पहले से प्रेडिक्ट कर

[01:56:57] लिया था कि यह सिस्टम टूटेगा क्योंकि

[01:57:00] दुनिया में सकर्स हैं। फैट टोनी के लिए

[01:57:03] नर्स, बैंकर्स, एडमिनिस्ट्रेटर्स सबसे

[01:57:06] बड़े सकर्स हैं। वह ग्रुप में और भी बड़े

[01:57:09] सकर्स बन जाते हैं। टोनी सकर्स को

[01:57:12] पहचानता, उनके खिलाफ बेट लगाता, पैसा

[01:57:15] बनाता, हराम की जिंदगी जीता।

[01:57:19] नैरो का वर्जन इंटेलेक्चुअल था। उसके लिए

[01:57:22] सिस्टम जो समझता है कि प्रोबेबिलिटी को

[01:57:25] समझ गया वह गलत है इसलिए टूटेगा।

[01:57:30] दोनों एंटी फ्रजाइल है क्योंकि फ्रजिलिटी

[01:57:33] के अगेंस्ट बिट लगाते हैं। टोनी ने

[01:57:36] क्राइसिस में बहुत पैसा कमाया। नेरो ने

[01:57:38] थोड़ा कमाया लेकिन खुश था। पैसा उसके लिए

[01:57:42] कुछ खास नहीं था। फैमिली पहले से वेल्थी

[01:57:45] थी। पैसा टाइम का वेस्ट लगता था। ज्यादा

[01:57:48] पैसा कॉम्प्लिकेशंस लाता है। खुशी नहीं।

[01:57:52] नेरो को फ्लैशी लाइफ स्टाइल, एक्सेस मनी

[01:57:54] सब बकवास लगता है।

[01:57:57] एथिक्स के मामले में नेरो मानता है कि

[01:58:00] पहले वार्न करो सकर्स को। टोनी मानता है

[01:58:04] कि वार्निंग देना बेकार है। वर्ड्स आर फॉर

[01:58:07] सीसीज।

[01:58:09] लोग तब तक रिस्पेक्ट नहीं देंगे जब तक

[01:58:11] उनका पैसा नहीं ले लेते।

[01:58:13] टोनी के लिए प्रूफ चाहिए होता है। बैंक

[01:58:16] स्टेटमेंट, जीत की फिजिकल निशानी।

[01:58:20] रिकॉग्निशन के चक्कर में मत पड़िए। लोग

[01:58:22] अनफेयर हैं। नेहरू ने देखा कि बहुत बड़े

[01:58:25] साइंटिस्ट भी रिकॉग्निशन के पीछे पागल

[01:58:28] हैं। जो नहीं मिलता उसके लिए परेशान रहते

[01:58:31] हैं। नेरो ने डिसाइड किया कि वह यह गेम

[01:58:34] नहीं खेलेगा। अपने फैट टोनी बेड के गेम्स

[01:58:38] को एनवेलप में देखता। फिर इग्नोर करके दिन

[01:58:41] शुरू कर देता। लेकिन एथिक्स के हिसाब से

[01:58:44] नैरो को लॉसेस भी वैसे ही एक्सेप्ट करने

[01:58:47] चाहिए। असली इंसान वही जो अपने ओपिनियन पर

[01:58:51] खुद रिस्क ले। नैरो का मंत्र था इरोडिशन,

[01:58:55] एस्थेटिक्स, रिस्क टेकिंग बाकी सब छोड़ो।

[01:59:00] चैरिटी में भी फेड टोनी का रूल फॉलो करता।

[01:59:04] सिर्फ उनको डोनेट करता है जो डायरेक्टली

[01:59:06] नहीं मांगते। कोई सैलरी नहीं लेता। नॉर्मल

[01:59:10] चैरिटी ऑर्गेनाइजेशन को कभी पैसा नहीं

[01:59:12] देता।

[01:59:14] नेहरू को अकेला रहने का दुख था। खासकर 208

[01:59:17] के क्राइसिस से पहले वो सोचता था क्या

[01:59:21] उसमें कोई प्रॉब्लम है या दुनिया ही अजीब

[01:59:23] है। संडे रात को यह फीलिंग और भी स्ट्रांग

[01:59:26] हो जाती थी। फैट टोनी के साथ लंच करने से

[01:59:30] उसको लगता था कि वह अकेला पागल नहीं है या

[01:59:33] शायद दोनों ही पागल हैं। दुनिया की चीजें

[01:59:37] समझ नहीं आती थी और दूसरे लोग खासकर

[01:59:40] इंटेलिजेंट लोग कभी नहीं समझ सकते थे।

[01:59:44] लाखों प्रोफेशनल्स गवर्नमेंट एकेडमिया,

[01:59:47] बैंकिंग, कॉरपोरेशंस, ईटीसी यह काम करते

[01:59:51] हैं इकॉनमी में। लेकिन बहुत ही कम लोगों

[01:59:53] ने 208 की क्राइसिस आते हुए देखी और उसकी

[01:59:57] फुल डैमेज का अंदाजा तो और भी कम लोगों को

[02:00:00] था और जो समझ गए उनको यह नहीं समझ आया कि

[02:00:04] क्राइसिस मॉडर्न जमाने की वजह से है। नेरो

[02:00:08] डाउनटाउन न्यूयॉर्क में वर्ल्ड ट्रेड

[02:00:11] सेंटर के पास खड़ा हो सकता था। देखता था

[02:00:14] कितनी एनर्जी, कितने लोग, कितना नॉइज़,

[02:00:17] कितना इंफॉर्मेशन, कितने बैग्स खाए जा रहे

[02:00:21] हैं। लेकिन सब बेकार, सिर्फ नॉइज़ एनर्जी

[02:00:25] वेस्ट हो रही है। इकोजोन गर्म हो रहा।

[02:00:28] वेल्थ एक इल्लुजन है जो कभी भी गायब हो

[02:00:31] सकती है। अगर सारी बुक्स स्टक करें तो

[02:00:36] पहाड़ बन जाएगा।

[02:00:38] लेकिन नैरो के लिए उनमें स्टैटिस्टिक्स या

[02:00:41] मैथमेटिकल मॉडल सिर्फ हवा है। चाहे कितना

[02:00:44] भी एविडेंस हो। फैट टोनी के साथ कुछ लंच

[02:00:49] कर लें तो हार्व की 2 मिलियन बुक से

[02:00:52] ज्यादा समझ आता है। यह सब बड़ा सकर

[02:00:56] प्रॉब्लम है। फैट टोनी प्रेडिक्शनंस में

[02:00:59] बिलीव नहीं करता था। फिर भी उसने बड़ी

[02:01:01] कमाई की यह प्रेडिक्ट करके कि

[02:01:04] प्रेडिक्टर्स जो प्रेडिक्शन करते हैं फेल

[02:01:07] होंगे। यह पैराडॉक्स है। साइंस

[02:01:10] कॉन्फ्रेंसेस में नैरो फिजिसिस्ट से मिलता

[02:01:13] था जो प्रेडिक्शन पर बिलीव करते फैंसी

[02:01:16] मॉडल्स यूज करते पर उनके बिजनेस फेल हो

[02:01:19] जाते। फैट टोनी प्रेडिक्शन पर बिलीव नहीं

[02:01:23] करता। लेकिन प्रेडिक्शन से ही रिच हो गया।

[02:01:26] पॉइंट यह है कि प्रेडिक्ट नहीं कर सकते।

[02:01:29] लेकिन यह प्रेडिक्ट कर सकते हैं कि जो

[02:01:31] प्रेडिक्ट कर रहा है वह खतरे में है। कभी

[02:01:34] ना कभी फेल होगा क्योंकि प्रेडिक्शन गलत

[02:01:38] हो सकती है और ओवर कॉन्फिडेंट लोग क्रैश

[02:01:41] करते हैं। जो प्रेडिक्शन पर डिपेंड करते

[02:01:44] हैं वह ज्यादा रिस्क लेता है। फैट टोनी

[02:01:47] एंटीफ्रजाइल है क्योंकि वह फ्रजाइल लोगों

[02:01:50] को ऑोजिट करता है। उनकी फ्रजिलिटी ढूंढता

[02:01:54] है। उस पर बे लगाता है। कोलैप्स होने पर

[02:01:57] कमाई करता है। फिर नेरो से मस्ती, टांग

[02:02:01] खचाई, लंच। फैट टोनी का मॉडल सिंपल है।

[02:02:05] फ्रिजाइल चीजें ढूंढिए। उन पे कोलैप्स पे

[02:02:08] बिट लगाइए और पैसा कमाइए। फैट टोने से

[02:02:13] पहले इटली के एक और इंसान ने एंटीफजिलिटी

[02:02:16] का प्रॉब्लम सॉल्व किया था। सेनेका ने।

[02:02:19] हिस्टोइक फिलॉसफर एकदम प्रैक्टिकल और रियल

[02:02:23] वर्ल्ड में सक्सेसफुल।

[02:02:25] सेनिका सबसे अमीर था। रोमन एंपायर में

[02:02:28] ट्रेडिंग में तेज एपरर का टटर भी था। उसने

[02:02:33] हिस्टोइक फिलॉसफी फॉलो की जिसमें फेट से

[02:02:35] इनडिफरेंट रहना, प्रैक्टिकल सशंस देना,

[02:02:39] एडवर्सिटी और पावर्टी को हैंडल करना और

[02:02:42] वेल्थ को भी। सिनेका के स्टोइसिज्म में एक

[02:02:46] फ्रेज है। निहिल पेरडिटी

[02:02:50] मैंने कुछ नहीं खोया। जब कुछ बुरा हो जाता

[02:02:54] है। स्टक्स चैलेंज का मजा लेते हैं।

[02:02:57] लग्जरी को देख के कहते हैं कि यह सब लोड

[02:03:00] है। डिपेंडेंसी है। रोबस्टनेस का मतलब है

[02:03:04] कि कुछ भी हो जाए आप पर कोई असर नहीं। ना

[02:03:07] ज्यादा खुशी ना ज्यादा दुख। बीच में

[02:03:10] स्टेडी रहना। लेकिन सनिका की स्टोसिज्म

[02:03:13] सिंपल रोबस्टनेस नहीं। वह एंटीफजिलिटी है।

[02:03:17] ऊपर से गेन हो सकता है। नीचे से लॉस नहीं

[02:03:20] होता।

[02:03:22] कमेंटेटर्स ने यह मिस कर दिया कि सनिका ने

[02:03:25] एंटीफ्रजिलिटी सिखाई है क्योंकि

[02:03:27] इंटेलेक्चुअल लोग एंटीफजिलिटी को पसंद

[02:03:30] नहीं करते। उनका फोकस सिर्फ रोबसनेस तक

[02:03:33] होता है। सनिका चाहते थे कि फेट से अपसाइड

[02:03:37] मिले और इसमें कोई बुरा नहीं है। सनिका के

[02:03:41] दो लेसन है। पहले डाउन साइड को कंट्रोल

[02:03:44] करना, इमोशंस से बचना। दूसरा एंटी

[02:03:47] फ्रेजिलिटी लाना और यह कैसे करते हैं हम

[02:03:51] आगे समझेंगे।

[02:03:53] जब सक्सेसफुल हो जाते हैं तो लॉस ज्यादा

[02:03:57] हो जाता है। गेन कम।

[02:04:00] डेमोक्लिस की तलवार वाली स्टोरी जब अमीर

[02:04:03] हो जाइए तो लॉस का डर ज्यादा सताता है।

[02:04:06] नींद खराब स्ट्रेस बढ़ जाता है। चेहरे पर

[02:04:09] बाल उगने लगते हैं। सेंस ऑफ ह्यूमर खत्म

[02:04:12] हो जाता है। पोजीशंस ही पनिशमेंट बन जाती

[02:04:15] है। क्योंकि हम उन पर डिपेंडेंट हो जाते

[02:04:18] हैं। अपसाइड का कोई फायदा नहीं। डाउन साइड

[02:04:22] का डर ही डर है। इमोशंस पर डिपेंडेंसी एक

[02:04:25] नई स्लेवरी है। एंशिएंट्स को यह पता था।

[02:04:29] लिवी ने लिखा मेन फील द गुड लेस इंटेंसली

[02:04:34] देन द बैड। मॉडर्न साइकोलॉजिस्ट अब लॉस अ

[02:04:38] वर्जन पर थ्योरी बना रहे हैं। पर सेनिका

[02:04:41] और पुराने लोग पहले ही प्रैक्टिकल तरीके

[02:04:44] से समझ गए थे।

[02:04:46] अगर आपके पास ज्यादा है खोने को और कम है

[02:04:50] पाने को तो आप फ्रजाइल हैं। सनिका ने इसका

[02:04:55] प्रैक्टिकल स्यूशन दिया। मेंटल एक्सरसाइज

[02:04:58] करिए। अपनी पोजीशंस को लिख के खत्म समझिए

[02:05:02] ताकि अगर लॉस हो तो दुख ना हो। जैसे

[02:05:05] इंश्योरेंस काम करता है। सनिका जब ट्रैवल

[02:05:08] करते थे तो वह भी बस वही सामान ले जाते थे

[02:05:11] जो शिप रेक में बच जाता। मतलब मिनिमम उस

[02:05:15] टाइम स्लेव ले जाना नॉर्मल था इसलिए लिखा

[02:05:18] है।

[02:05:20] यह मॉडर्न भी है।

[02:05:23] मैंने भी अपने जॉब के टाइम पर रेिग्नेशन

[02:05:26] लेटर पहले ही लिख के रख ली ताकि

[02:05:28] डिपेंडेंसी ना रहे। ट्रेडर के टाइम डेली

[02:05:31] सुबह सोचता कि सब कुछ खत्म हो गया तो दिन

[02:05:34] बोनस लगता था। वर्स्ट केस इमेजिन कर लीजिए

[02:05:38] तो दिमाग शांत रहता है। डिसिप्लिन

[02:05:41] स्ट्रांग होता है। जब सब अच्छा चल रहा हो

[02:05:44] तो यह करना मुश्किल है। लेकिन तब ही सबसे

[02:05:47] जरूरी है।

[02:05:50] एक इंटेलिजेंट लाइफ का मतलब है अपने

[02:05:52] इमोशंस को ऐसे पोजीशन करिए कि दुख ना हो।

[02:05:55] लॉसेस का स्टिंग ना हो। मेंटली

[02:05:58] बिलोंगिंग्स का राइट ऑफ करिए ताकि दुनिया

[02:06:01] की वोलेटिलिटी आपको हर्ट ना करें।

[02:06:06] स्टोसिज्म का मतलब है इमोशंस को पूरा खत्म

[02:06:10] नहीं करना। बस उनको कंट्रोल में लाना, टेम

[02:06:13] करना। इंसान को सब्जी नहीं बनाना। एक

[02:06:18] मॉडर्न स्ट्रोइक ऐसा है जो अपने डर को सोच

[02:06:21] समझ के डिसीजन लेने में बदल देता है। पेन

[02:06:25] को, इंफॉर्मेशन में, गलती को सीखने का

[02:06:27] मौका और डिजायर को एक्शन में।

[02:06:31] सेनिका लाइफ को हैंडल करने के लिए ट्रिक्स

[02:06:34] देते हैं। जैसे गुस्से को एक्शन से अलग

[02:06:38] रखने के लिए एक दिन रुक जाओ। तुरंत रिएक्ट

[02:06:41] मत करो ताकि बाद में पछताना ना पड़े।

[02:06:44] दूसरे रोमन एपररर्स जैसे हेड्रियन गुस्से

[02:06:48] में स्लेव की आंख फोड़ देते। बाद में

[02:06:50] सिर्फ गिल्ट मिलता पर कुछ सुधार नहीं सकते

[02:06:54] थे। सेनका कहते हैं अच्छी डीड्स में

[02:06:56] इन्वेस्ट करो क्योंकि वह हमसे कोई छीन

[02:06:59] नहीं सकता।

[02:07:02] सनिका एक कदम आगे जाते हैं। कहते हैं दौलत

[02:07:06] समझदार इंसान की स्लेव है। बेवकूफ की

[02:07:09] मास्टर उन्होंने स्टइक ट्रेडिशन तोड़ के

[02:07:13] अपसाइड रखा मतलब पैसा रखा लेकिन उसके

[02:07:17] नेगेटिव इफेक्ट से बचे रहे। दूसरे स्टइक्स

[02:07:20] कहते कि पावर्टी बेहतर है पर हो सकता है

[02:07:23] वह बस बात हो क्योंकि वह खुद गरीब थे।

[02:07:27] सनिका ने एक्चुअल में पैसा रखा बिना उसके

[02:07:30] स्लेव बने। यह प्रूफ है कि वह शब्द नहीं

[02:07:33] एक्शन में बिलीव करते थे। वो अपने गुड

[02:07:36] डीड्स को बुक कीपिंग जैसे ट्रीट करते जो

[02:07:39] रिटर्न हो गया वो बोनस नहीं हुआ तो भी लॉस

[02:07:42] नहीं।

[02:07:44] एक रूल है अगर आपके पास ज्यादा खोने को है

[02:07:50] कम पाने को तो आप फ्रजाइल हैं। यह

[02:07:53] असिमेट्री यूनिवर्सल है। फ्रजाइल पैकेज

[02:07:56] हिलने से टूट जाता है। कुछ पाता नहीं।

[02:08:00] एंटीफ्रजाइल को हिलने से फायदा होता है।

[02:08:03] अगर कुछ लूज नहीं कर रहे हैं। सिर्फ गेन

[02:08:07] ही गेन है तो आप एंटीफ्रजाइल हैं। अगर

[02:08:10] अपसाइड ज्यादा है, डाउन साइड कम तो

[02:08:13] वोलेटिलिटी यानी अनसर्टेनिटी आपको फायदा

[02:08:16] देगी। फ्रजिलिटी का मतलब है डाउन साइड

[02:08:19] ज्यादा, अपसाइड कम और एंटीफजिलिटी का मतलब

[02:08:23] अपसाइड ज्यादा, डाउन साइड कम। अगर अपसाइड

[02:08:26] ज्यादा है तो आपको स्ट्रेसर्स की कमी से

[02:08:29] भी नुकसान हो सकता है। यह आईडिया बारबेल

[02:08:32] मेथड से प्रैक्टिस में लाते हैं। बारबेल

[02:08:36] स्ट्रेटजी का मतलब है एक साइड एक्सट्रीम

[02:08:38] सेफ्टी ज्यादा सिक्योर बोरिंग

[02:08:40] इन्वेस्टमेंट और दूसरी साइड एक्सट्रीम

[02:08:43] रिस्क बहुत रिस्की पोटेंशियल फॉर ह्यूज

[02:08:46] अपसाइड बीच का कुछ नहीं। इससे डाउन साइड

[02:08:50] कंट्रोल में आता है। अप साइड ओपन रहता है।

[02:08:53] अगर सब कुछ मीडियम रिस्क में डाल दीजिए तो

[02:08:56] एस्टिमेशन गलत होने पर सब कुछ खत्म हो

[02:08:59] सकता है। बारबेल मेथड में मैक्सिमम लॉस

[02:09:03] फिक्स्ड होता है। एंटीफजिलिटी का मतलब है

[02:09:07] एक तरफ कॉशन दूसरी तरफ अग्रेशन। ज्यादा

[02:09:11] बुरा होने से बचिए। अच्छा अपने आप हो

[02:09:14] जाएगा। हर काम में जहां रिस्क है

[02:09:17] एक्सट्रीम्स की डुअल स्ट्रेटजी बेहतर है।

[02:09:20] बीच का कॉम्प्रोमाइज कमजोर है। बायोलॉजी

[02:09:24] में भी बारबेल स्ट्रेटजी है। कुछ एनिमल्स

[02:09:27] स्टेबल पार्टनर चूज़ करते हैं। अकाउंटेंट

[02:09:30] टाइप और कभी-कभी रॉक स्टार टाइप से चीटिंग

[02:09:34] करते हैं ताकि स्टेबल लाइफ भी हो और जींस

[02:09:36] भी अच्छे मिल सके या कभी सिर्फ मजे के

[02:09:40] लिए। ह्यूमन सोसाइटी में भी यह पैटर्न

[02:09:43] मिलता है।

[02:09:45] बारबेल का लॉजिक यह है कि बच्चों को थोड़ा

[02:09:48] रिस्क लेने दीजिए। छोटी इंजरी से सीखने

[02:09:51] दीजिए। लेकिन बड़े डेंजर से बचाइए। लोग

[02:09:55] अक्सर स्माल लॉसेस से ज्यादा डरते हैं।

[02:09:58] लेकिन बड़े ब्लैक स्वान रिस्क इग्नोर कर

[02:10:01] देते हैं। इंश्योरेंस भी स्मॉल प्रोबेबल

[02:10:04] लॉसेस के लिए लेते हैं। बड़े रेयर लॉस के

[02:10:07] लिए नहीं उल्टा करना चाहिए।

[02:10:10] पाथ डिपेंडेंस इंपॉर्टेंट है। अगर एक चीज

[02:10:13] फ्रजाइल है, एक बार टूट गई तो ठीक नहीं हो

[02:10:16] सकती। ऑर्डर ऑफ इवेंट्स इंपॉर्टेंट है। बस

[02:10:19] फाइनल पॉइंट नहीं। इसीलिए सबसे पहले डाउन

[02:10:23] साइड हटाइए। फिर अपसाइड देखिए।

[02:10:26] जीडीपी ग्रोथ या एफिशिएंसी को भी फ्रजाइल

[02:10:30] सिस्टम में मेजर करें तो बेकार है क्योंकि

[02:10:33] कोई भी बड़ा शौक सब कुछ खत्म कर सकता है।

[02:10:37] रियल प्रोग्रेस तभी है जब ग्रोथ रोबस्ट हो

[02:10:41] ना कि स्पीड और नंबर देख के। बारबेल का

[02:10:44] एग्जांपल 90% पैसा सेफ जगह रखिए। 10%

[02:10:49] रिस्क में डालिए। मैक्सिमम लॉस पता है।

[02:10:52] अपसाइड अनलिमिटेड है। बीच का रिस्क सबसे

[02:10:56] खतरनाक है क्योंकि वह एक्यूरेटली

[02:10:58] प्रेडिक्ट नहीं होता।

[02:11:01] यह सारी बातें दिखाती हैं कि एंटी

[02:11:03] फ्रजिलिटी में की है। डाउन साइड कंट्रोल

[02:11:06] करना और अपसाइड ओपन रखना। एक्सट्रीम्स का

[02:11:09] कॉम्बिनेशन यूज करना। बीच का हल

[02:11:12] कॉम्प्रोमाइज है जो फ्रजाइल बना देता है।

[02:11:16] बारबेली स्ट्रेटजी का मतलब है कि सेफ और

[02:11:19] रिस्की दोनों एक्सट्रीम्स को मिक्स करिए।

[02:11:22] बीच का गोल्डन मिडिल अवॉइड करिए क्योंकि

[02:11:25] अक्सर मिडिल सबसे वीक होता है। लिटरेचर

[02:11:29] में देखिए तो फ्रेंच राइटर्स सिक्योर

[02:11:32] सरकारी नौकरी ले लेते हैं जिसमें टेंशन कम

[02:11:35] हो। फिर अपने फ्री टाइम में खुद की मर्जी

[02:11:38] से लिखते हैं बिना किसी के प्रेशर के।

[02:11:41] अमेरिकन राइटर्स अक्सर मीडिया या एकेडमिया

[02:11:44] में फंस जाते हैं जिससे उनकी राइटिंग का

[02:11:47] सोल मर जाता है क्योंकि उनको दूसरे के

[02:11:50] रूल्स फॉलो करने पड़ते हैं। काफी फेमस

[02:11:54] राइटर्स जैसे काफ इंश्योरेंस कंपनी में

[02:11:56] काम करते थे। स्पिनोजा लेंस मेकर थे। फिर

[02:12:00] अपने आइडियाज पर फ्री लिखते थे।

[02:12:03] डिप्लोमेट की जॉब भी एक एग्जांपल है। काम

[02:12:06] सिंपल बाकी टाइम, अपना काम, अपनी सोच।

[02:12:10] काफी लोग पहले सेफ करियर बना लेते हैं।

[02:12:12] फिर रिस्की और क्रिएटिव काम ट्राई करते

[02:12:15] हैं। जैसे एक दोस्त एडिटर था। फिर रिस्की

[02:12:19] फील्ड में गया। लेकिन अगर फेल हो गया तो

[02:12:21] एडिटर का काम वापस मिल सकता था। सेनिका भी

[02:12:25] पहले एक्टिव लाइफ में थे। फिर फिलॉसफर बन

[02:12:28] गए या माउंटेन जैसे पहले काम फिर

[02:12:31] रिफ्लेक्शन

[02:12:35] वर्क भी ऐसे ही करिए या तो शॉर्ट इंटेंस

[02:12:39] काम करिए फिर पूरा रेस्ट पूरा दिन बोर

[02:12:43] ऑफिस में मत बैठिए

[02:12:45] प्रोलिफिक राइटर सिमिनन साल में सिर्फ 60

[02:12:50] दिन लिखते थे बाकी 300 दिन कुछ नहीं करते

[02:12:53] थे फिर भी 200 से ज्यादा नवेल्स लिखे

[02:12:57] बारबेल हर जगह मिलता है। पर्सनल रिस्क में

[02:13:00] भी कुछ रिस्क से पूरी तरह बचिए। जैसे

[02:13:03] स्मोकिंग, शुगर, बाइक्स और कुछ में डेरिंग

[02:13:07] करिए। जहां टर्मिनल हार्म नहीं हो। सोशल

[02:13:11] पॉलिसी में भी सबसे कमजोर को प्रोटेक्ट

[02:13:14] करिए। स्ट्रांग को अपना काम करने दीजिए।

[02:13:17] बीच के प्रिविलेज्ड मिडिल क्लास की ओवर

[02:13:20] प्रोटेक्शन से सोसाइटी को नुकसान होता है।

[02:13:23] पुअर लोग सबसे ज्यादा हर्ट होते हैं। यूके

[02:13:27] पहले बारबेल था। एक तरफ एडवेंचरर्स, दूसरी

[02:13:30] तरफ एरिस्टोक्रेसी। अब सब बोझबाजी बैंकर

[02:13:33] बन गए हैं। राइटिंग में भी यह तो बिल्कुल

[02:13:37] सिंपल एस्से या हार्ड कोर टेक्निकल पेपर।

[02:13:40] बीच में कुछ नहीं। एक्सरसाइज भी बारबेल

[02:13:43] है। एकदम हैवी वेट लिफ्ट करिए। फिर

[02:13:46] बिल्कुल आराम ना कि डेली थोड़ा-थोड़ा करते

[02:13:49] रहिए। ग्रीक्स भी पार्टी के एंड में पागल

[02:13:52] हरकतें करते थे। बाकी टाइम रेशनल रहते थे।

[02:13:56] गसिप मैगजीन या क्लासिक बुक्स बीच का

[02:13:59] मिडिल ब्रो सबसे बोरिंग।

[02:14:02] किसी से प्रॉब्लम है तो या तो इग्नोर करिए

[02:14:05] या सीधा हटा दीजिए। बीच का छोटा-मोटा

[02:14:08] झगड़ा मत करिए।

[02:14:10] मार्बल का पॉइंट है कि रैंडमनेस से

[02:14:12] एंटीफजिलिटी मिलती है क्योंकि आप अपना

[02:14:15] डाउन साइड क्लिप करते हैं। डैमेज कंट्रोल

[02:14:18] करते हैं। अप साइड ओपन रहता है। फाइनेंस

[02:14:22] में भी पूरा पैसा मीडियम रिस्क में मत

[02:14:25] डालिए। एक तरफ सेफ रखिए। दूसरी तरफ

[02:14:28] स्पेकुलेटिव।

[02:14:30] रेडेलियो का रूल है कि कोई भी

[02:14:31] स्पेककुलेटिव बेट ऐसी हो जिसमें रिस्क ऑफ

[02:14:35] रुइन जीरो हो। तभी बारबेल का फायदा मिलता

[02:14:38] है। अल्कोहल पर भी रोज थोड़ा-थोड़ा मत

[02:14:42] पीजिए। बेहतर है कुछ दिन बिल्कुल मत

[02:14:45] पीजिए। बाकी दिन खुल के पीजिए। बॉडी को

[02:14:48] रेस्ट मिलती है। बारबल का मतलब

[02:14:51] इन्वेस्टमेंट रिटर्न नहीं। सर्वाइवल की

[02:14:53] इंश्योरेंस है। यह ऑप्शन नहीं जरूरत है।

[02:14:58] स्टोइससिज्म इमोशंस को टेम करता है।

[02:15:02] बारबेल अनसर्टेनिटी को टेम करता है। दोनों

[02:15:06] का फोकस है डाउन साइड से बचना। अपसाइड

[02:15:09] खुला छोड़ना। डोमेन डिपेंडेंस भी होती है।

[02:15:13] लोग घर की इंश्योरेंस लेते हैं लेकिन

[02:15:15] पोर्टफोलियो में बारबेल नहीं लगाते। जबकि

[02:15:19] यह भी वैसे ही सोचना चाहिए।

[02:15:22] बारबल स्ट्रेटजी सब जगह एप्लीकेबल है।

[02:15:25] चाहे करियर हो, पर्सनल लाइफ हो, हेल्थ हो,

[02:15:29] सोशल पॉलिसी हो या फाइनेंस।

[02:15:32] सेफ और रिस्की एक्सट्रीम्स का कॉम्बिनेशन

[02:15:35] बीच का एवरेज जोन अवॉइड करिए। यही रियल

[02:15:40] एंटीफ्रजिलिटी है।

[02:15:47] अब बात करते हैं ऑप्शनलिटी, इनोवेशन और

[02:15:50] एंटी फ्रिजिलिटी की ऑप्शन का मतलब है आपके

[02:15:55] पास ऑप्शंस हो, चॉइसेस हो बिना किसी बड़ी

[02:15:58] रिस्क के ताकि अनसर्टेनिटी का फायदा उठा

[02:16:01] सके।

[02:16:03] यही चीज किसी भी चीज को ट्रूली एंटीफजाइल

[02:16:06] बनाती है। संत थॉमसनास की बुक सुमा

[02:16:11] थियोलेजिया कहता है कि इंसान हमेशा किसी

[02:16:15] एंड गोल के इंटेंशन से ही मूव करता है।

[02:16:18] मतलब सबको लगता है कि सब कुछ प्लान के

[02:16:21] हिसाब से ही होता है।

[02:16:24] लेकिन यही सोच सबसे बड़ी गलती है। यही

[02:16:29] टेलियोलॉजिकल फैलेसी है जिसमें इंसान को

[02:16:33] लगता है कि उसे पूरा पता है वह कहां जा

[02:16:37] रहा है या दूसरे लोग भी जानते हैं वह क्या

[02:16:40] चाहते हैं। असल में जिंदगी ऐसी नहीं चलती।

[02:16:44] एक रेशनल फ्लेनर हर कदम पर अपना प्लान बदल

[02:16:48] सकता है। सिचुएशन देख के नए डिसीजन ले

[02:16:52] सकता है। इंफॉर्मेशन आने पर टारगेट चेंज

[02:16:55] कर सकता है। जैसे नैरो ट्रैवल में करता

[02:16:58] था। टूरिस्ट फिक्स प्लान लेकर चलता है पर

[02:17:02] फ्लेनवर ओपन है। उसके पास फ्रीडम है।

[02:17:06] प्लान चेंज करने का ऑप्शन है। बिजनेस या

[02:17:09] लाइफ में ओपोरर्चुनिटीज्म सही है पर

[02:17:12] पर्सनल रिलेशन में नहीं। वहां लॉयलिटी

[02:17:15] जरूरी है।

[02:17:17] सबसे बड़ी गलती यह सोचना है कि आपको पता

[02:17:20] है कि आप कल क्या चाहेंगे। दूसरे भी अपने

[02:17:24] फ्यूचर के बारे में नहीं जानते। मार्केट

[02:17:27] रिसर्च या फोकस ग्रुप काम नहीं आता। स्टीव

[02:17:30] जॉब्स की स्ट्रेंथ थी कि लोगों को नहीं

[02:17:33] पता उनको क्या चाहिए जब तक उनको मिलता

[02:17:36] नहीं।

[02:17:38] ऑप्शनलिटी का मतलब है जब चाहे चेंज कर लें

[02:17:43] और इसलिए ऑप्शन एंटी फ्रजाइल लाता है।

[02:17:47] आपको अनसर्टेनिटी से फायदा मिलता है और

[02:17:50] लॉस लिमिटेड रहता है।

[02:17:54] अमेरिका की रियल स्ट्रेंथ ही यही

[02:17:56] ऑप्शनलिटी है। रिस्क लेना, ट्राई करना,

[02:18:00] फेल हो जाना, फिर दोबारा कोशिश करना बिना

[02:18:03] शर्माए।

[02:18:05] यूनिवर्सिटीज की डिग्री नहीं यह ओपन

[02:18:08] ट्रायल एंड एरर एटीट्यूड ही नया इनोवेशन

[02:18:11] लाता है। जैसे इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन के

[02:18:13] टाइम ब्रिटेन में हुआ।

[02:18:16] थेल्स की स्टोरी देखें तो सब लोग कहते थे

[02:18:20] डअर्स सक्सेसफुल होते हैं। फिलॉसफर सिर्फ

[02:18:23] बातें करते हैं। थेल्स ने ऑलिव प्रसेस का

[02:18:27] ऑप्शन ले लिया। सीजन के लिए सब पे पहले ही

[02:18:30] छोटा पैसा दे दिया।

[02:18:33] हार्वेस्ट अच्छा हो गया तो डिमांड बढ़ गई

[02:18:35] और थिल्स ने पैसा कमा लिया। फिर वापस

[02:18:38] फिलॉसफी पर आ गए। यह सबसे पहला ऑप्शन

[02:18:42] ट्रेड था। छोटा नुकसान, बड़ा पोटेंशियल

[02:18:45] प्रॉफिट बिना ऑब्लिगेशन के। असिमेट्री का

[02:18:48] पूरा प्योर एग्जांपल है। ज्यादा गेन, कम

[02:18:52] लॉस। अरिस्टोटल को लगा थेल्स का नॉलेज काम

[02:18:55] आया। असल में ऑप्शन ने काम किया। ऑप्शन

[02:18:59] यानी आपको सब कुछ जानना जरूरी नहीं जब

[02:19:04] आपके पास ऑप्शन हो। कम रिस्क बड़ा अपसाइड

[02:19:08] जब सही हो तो ज्यादा कमाएंगे। गलत हो तो

[02:19:11] लॉस कम या जीरो। जिंदगी में भी हर चीज

[02:19:15] ऑप्शन जैसी हो सकती है। जहां चॉइसेस

[02:19:18] ज्यादा वहां आपको कम पता होना चाहिए।

[02:19:22] रिस्क कम होता है। फाइनशियल इंडिपेंडेंस

[02:19:25] भी एक ऑप्शन है। फ्रीडम का हाईएस्ट लेवल।

[02:19:30] थेल्स की स्टोरी में एक और बात है कि लोग

[02:19:33] अक्सर अपने फेलियर्स को रशनलाइज कर लेते

[02:19:36] हैं कि हमें वैसे भी पैसा नहीं चाहिए था।

[02:19:40] जैसे खट्टे अंगूर की कहानी में। पर असली

[02:19:43] ऑप्शन तभी है जब हम रियल में चॉइस कर सकते

[02:19:47] हैं ना कि मजबूरी में। ऑप्शन हमारी अपनी

[02:19:51] असली प्रेफरेंसेस को दिखाता है। थेल्स ने

[02:19:55] अपने आप को फंड किया। इंडिपेंडेंस मिली और

[02:19:58] ऑप्शंस मिल गए। उनको किसी को बताना नहीं

[02:20:01] पड़ा कि वह कहां जा रहे हैं क्योंकि वह

[02:20:04] खुद भी नहीं जानते थे। ऑप्शन की पावर यही

[02:20:07] है।

[02:20:09] फ्री ऑप्शंस हर जगह मिल सकती है। जैसे

[02:20:11] लंदन में सैटरडे रात को किसी ने कैजुअली

[02:20:15] पार्टी के लिए बुलाया। आपको जाना है या

[02:20:18] नहीं? डिसीजन आपका कोई ऑब्लिगेशन नहीं।

[02:20:21] डाउन साइड कुछ भी नहीं। अपसाइड है कि

[02:20:23] अच्छी पार्टी मिल सकती है।

[02:20:26] इसी को फ्री ऑप्शन कहते हैं। बिना कॉस्ट,

[02:20:29] अपसाइड खुला लॉस जीरो।

[02:20:34] अगर आप न्यूयॉर्क सिटी में रेंट

[02:20:36] कंट्रोलोल्ड अपार्टमेंट में रहते हैं तो

[02:20:38] आपके पास ऑप्शन है कि जितना चाहे वहां

[02:20:41] रहें। पर ऑब्लिगेशन नहीं है कि रहें। चाहे

[02:20:44] तो लैंड लॉर्ड को नोटिस देकर कभी भी शिफ्ट

[02:20:47] हो जाइए। चाहे तो सस्ते रेंट में ही बैठे

[02:20:50] रहिए। अगर रेंट बढ़ जाए तो आप सेफ हैं।

[02:20:53] अगर रेंट गिर जाए तो आप जाकर नया सस्ता घर

[02:20:57] ले सकते हैं या खरीद सकते हैं।

[02:21:01] यानी आपको रेंट बढ़ने से कोई नुकसान नहीं

[02:21:04] पर गिरने से फायदा है। यही है ऑप्शन वाली

[02:21:07] असिमेट्री। अप साइड आपका डाउन साइड नहीं।

[02:21:12] अनसर्टेनिटी जितनी ज्यादा हो आपका ऑप्शन

[02:21:15] की वैल्यू उतनी बढ़ जाती है क्योंकि हर

[02:21:18] तरह की सिचुएशन में आप सेफ होके यह फायदे

[02:21:22] में हो

[02:21:25] और यह हिडन ऑप्शन है। इसमें कॉस्ट

[02:21:28] एक्स्ट्रा कॉस्ट भी नहीं लगती।

[02:21:32] थेल्स की स्टोरी भी ऑप्शन और असिमेट्री की

[02:21:35] है। ऑप्शन में हमारे पास हमेशा नॉन

[02:21:38] लीनियरिटी होती है। ज्यादा गेन, कम लॉस या

[02:21:41] लॉस फिक्स्ड। मतलब अगर सही निकले तो बड़ा

[02:21:46] फायदा, गलत हो गए तो छोटा या नो लॉस।

[02:21:50] ऑप्शन को एवरेज से फर्क नहीं पड़ता। बस

[02:21:53] फेवरेबल आउटकम से पड़ता है। जैसे राइटर्स

[02:21:56] या आर्टिस्ट। उनको छोटी डेडिकेटेड ऑडियंस

[02:22:00] से ज्यादा फायदा होता है बजाय एक बड़ी

[02:22:02] एवरेज ऑडियंस के।

[02:22:05] कितने लोग उन्हें डिसलाइक करते हैं उससे

[02:22:08] कोई फर्क नहीं पड़ता। पर थोड़े लॉयल

[02:22:11] पावरफुल सपोर्टर से पूरा गेम चेंज हो सकता

[02:22:14] है। विडगंस्टीन जैसे फिलॉसफर को बहुत कम

[02:22:18] फॉलोअर्स थे। पर जो थे वह इनफ्लुएंशियल

[02:22:21] थे।

[02:22:22] लग्जरी गुड्स का बिजनेस भी एवरेज से नहीं

[02:22:25] एक्सट्रीम से चलता है। अगर कुछ लोग बहुत

[02:22:28] ज्यादा अमीर हैं, बाकी चाहे गरीब हो

[02:22:32] लग्जरी का बिजनेस चलेगा क्योंकि सिर्फ

[02:22:34] एक्सट्रीम्स ही काफी हैं। रियलस्टेट का

[02:22:38] बबल्स भी इसी वजह से आते हैं। कुछ अल्ट्रा

[02:22:41] रिच लोग प्राइसेस को रॉकेट कर देते हैं।

[02:22:46] सोसाइटी में भी ग्रोथ एवरेज बढ़ाने से

[02:22:49] नहीं बल्कि एक्सट्रीम्स में यानी रिस्क

[02:22:52] टेकर्स, क्रिएटिव्स जिन्होंने हिम्मत

[02:22:55] दिखाई उनसे आती है। यह लोग एवरेज से कम पर

[02:22:59] सोसाइटी के लिए ज्यादा इंपॉर्टेंट हैं।

[02:23:02] फिलॉसफी में भी दो तरह के लोग होते हैं।

[02:23:05] थैलीजियन पे ऑफ देखने वाले और सिमेट्री को

[02:23:09] समझने वाले और अरिस्टोटेलियन यानी लॉजिक

[02:23:12] सही गलत देखने वाले। अरिस्टोटल की गलती थी

[02:23:16] कि नॉलेज और प्रॉफिट को एक ही चीज समझा।

[02:23:20] जबकि पे ऑफ और प्रेडिक्शन अलग होते हैं।

[02:23:23] ऑप्शन में नॉलेज कम असिमिट्री ज्यादा

[02:23:26] इंपॉर्टेंट है।

[02:23:29] अगर आपके पास ऑप्शनलिटी है

[02:23:32] तो आपको हमेशा इंटेलिजेंट, स्किल्ड या

[02:23:36] नॉलेजेबल होने की जरूरत नहीं पड़ती। आप बस

[02:23:39] गलत डिसीजन से बचिए और जब अच्छा चांस दिखे

[02:23:43] तो गैब कर लीजिए। ऑप्शन की प्रॉपर्टी है

[02:23:46] कम गलत डिसीजंस, कुछ अच्छे आउटकम्स, ओवरऑल

[02:23:51] फायदा।

[02:23:53] यह इवोल्यूशन का भी फंडा है। ट्रायल एंड

[02:23:56] एरर, छोटे मिस्टेक्स, बड़े फायदे। नेचर भी

[02:24:00] इसी तरह सिलेलेक्ट करती है। जो एम्ब्रियो

[02:24:04] अच्छा नहीं है उसको जल्दी हटा देती है।

[02:24:07] अच्छा है तो रख लेती है। नेचर ऑप्शनलिटी

[02:24:11] को हमसे बेहतर समझती है। बिना इंटेलिजेंस

[02:24:14] के भी बढ़िया रिजल्ट ले आती है।

[02:24:18] ऑप्शन का मतलब है असिमेट्री प्लस

[02:24:21] रैशनलिटी। मतलब अच्छी चीज पकड़िए। बुरी

[02:24:25] चीज छोड़ दीजिए। एंटीफ्रजाइल चीजों में

[02:24:28] ऑप्शन होता है। फ्रजाइल में नहीं। नेचर हर

[02:24:31] जनरेशन में बेहतर सेलेक्ट करती है। ट्रायल

[02:24:34] एंड एरर से बेस्ट पिक करती है। इसी में

[02:24:37] एंटीफजिलिटी का सीक्रेट है। फाइनेंस में

[02:24:41] लोग एक्सप्लसिट ऑप्शन खरीदने के लिए पैसा

[02:24:44] देते हैं। लेकिन असली जिंदगी में हर जगह

[02:24:46] ऑप्शंस छुपे होते हैं। बस हम पहचान नहीं

[02:24:50] पाते।

[02:24:52] लोग मैथमेटिकली ऑप्शंस समझते हैं पर

[02:24:55] ट्रायल एंड एरर या जिंदगी के स्मॉल

[02:24:58] मिस्टेक्स को ऑप्शन नहीं मानते। जबकि वही

[02:25:00] रियल एंटी फ्रजिलिटी है। हर एरर में कॉस्ट

[02:25:04] लिमिटेड है। रिवॉर्ड कभी-कभी अनलिमिटेड हो

[02:25:08] सकता है। फैट टोनी भी इसी छुपी ऑप्शनलिटी

[02:25:12] को यूज करता था।

[02:25:14] हम सब में ऑप्शन ब्लाइंडनेस है। हमारे

[02:25:17] सामने ऑप्शंस होते हैं पर हम उनको इग्नोर

[02:25:20] कर देते हैं। ऑप्शंस की वैल्यू ही

[02:25:22] वेरिएबिलिटी में है। जब नुकसान कम, फायदा

[02:25:26] बड़ा हो तो ऑप्शन की रियल पावर दिखती है।

[02:25:30] नेचर, बिजनेस, फाइनेंस, क्रिएटिविटी सब

[02:25:34] जगह ऑप्शन का प्रिंसिपल काम करता है।

[02:25:37] लेकिन ज्यादातर लोग सिर्फ टेक्स्ट बुक में

[02:25:39] देखते हैं। लाइफ में नहीं।

[02:25:43] एक दिन मैं एक फ्रेंड जो पहले रबी थे। फिर

[02:25:47] ऑप्शन ट्रेडर बने। फिर दोबारा रवि

[02:25:51] उन्होंने एक लाइन बोली लाइफ इज अ लॉन्ग

[02:25:54] गामा

[02:25:56] इसका मतलब तुम्हें जिंदगी में वोलेटिलिटी

[02:25:59] चेंजेस अनसर्टेनिटी से फायदा मिलता है लॉस

[02:26:03] नहीं होता

[02:26:05] ऑप्शन ट्रेडिंग की लैंग्वेज में लॉन्ग

[02:26:08] गामा मतलब तुम नॉन लीनियरिटी से बेनिफिट

[02:26:12] उठाते हो सरप्राइजेस तुम्हारे फेवर में हो

[02:26:15] सकते हैं। बहुत सारे एकेडमिक लोग कहते हैं

[02:26:19] कि ऑप्शंस लेना इररेशनल है क्योंकि वो

[02:26:22] ज्यादा महंगी मिलती है पर वो लाइफ की

[02:26:24] रियलिटी समझते ही नहीं। वो कसीनो जैसी सेफ

[02:26:28] वर्ल्ड में सोचते हैं। रियल वर्ल्ड में

[02:26:31] रिस्क टेकिंग गैंबलिंग नहीं है और

[02:26:34] ऑप्शनैलिटी लॉटरी टिकट नहीं है। रियल

[02:26:38] वेल्थ बनती है अपॉर्चुनिटी से। रियलस्टेट,

[02:26:41] टेक्नोलॉजी, इनोवेशन सब ऑप्शन के चलते

[02:26:45] ग्रो हुआ है। बैंकिंग जैसे बिजनेस जिसमें

[02:26:49] ऑप्शनैलिटी नहीं वह बार-बार खत्म होते

[02:26:52] हैं। ऑप्शनैलिटी सिर्फ फाइनेंस में नहीं

[02:26:56] पॉलिटिक्स में भी है। रोमंस ने अपना

[02:26:59] पॉलिटिकल सिस्टम टिंकर करके बनाया। एक ही

[02:27:02] चीज ट्राई करते रहे। जो काम आई उसको

[02:27:05] अपनाया ना कि एक परफेक्ट रीजंड प्लान

[02:27:09] बनाया।

[02:27:10] ग्रीिक्स ने सोच समझ के प्लान बनाया।

[02:27:13] रोमंस ने ट्रायल एंड एरर से बेस्ट ऑप्शन

[02:27:15] लिया और उन्होंने मुश्किलें फेस करके

[02:27:18] सीखा। हर जगह असिमेट्री इंपॉर्टेंट है।

[02:27:22] ज्यादा अपसाइड, कम डाउन साइड और ऑप्शन

[02:27:26] लेने का मतलब है कि आपको नॉलेज जरूरी

[02:27:29] नहीं। बस ऑप्शन को सही यूज़ करिए। रिजल्ट

[02:27:32] मिल जाएगा।

[02:27:34] लाइफ में ज्यादा चीजें ऑप्शन से आती हैं

[02:27:36] ना कि इसके लिए इंटेलिजेंस है। जो लोग

[02:27:40] समझते हैं एजुकेशन से वेल्थ आती है या

[02:27:43] इंटेलिजेंट लोग यह डिस्कवरीज करते हैं

[02:27:46] उनके लिए यह शौक है। काफी डिस्कवरीज

[02:27:49] इन्वेंशंस या तो गलती से होती हैं या

[02:27:52] ऑप्शन यूज करने से। एक एग्जांपल है

[02:27:56] व्हील्ड सूटकेस का। सब लोग सूटकेस उठाउ

[02:27:59] उठा के एयरपोर्ट में घूमते रहे। लेकिन

[02:28:02] किसी ने दिमाग नहीं लगाया कि सूटकेस के

[02:28:05] नीचे छोटे पहहिए लगा दें। व्हील का

[02:28:08] इन्वेंशन हजारों साल पहले हो चुका था। पर

[02:28:12] सूटकेस में लगाना किसी को नहीं आया। मून

[02:28:15] पे इंसान पहुंच गया लेकिन लगेज खींचने का

[02:28:18] सशन नहीं मिला। इससे पता चलता है कि हम

[02:28:22] इमेजिनेशन में बहुत कमजोर हैं। सिंपल सशन

[02:28:25] सामने है पर हम देख नहीं पाते। सिर्फ कुछ

[02:28:29] विजनरी लोग जो ऑप्शन की वैल्यू समझते हैं

[02:28:32] वही प्रैक्टिकल ब्रेक थ्रू ला पाते हैं।

[02:28:35] और भी एग्जांपल्स हैं। मायंस के पास

[02:28:38] व्हील्स थे और उन्होंने अपने टॉयज में

[02:28:40] लगाया। पिरामिड में पत्थर खींचने में यूज

[02:28:43] नहीं किया। ग्रीक के पास स्टीम इंजन थी।

[02:28:46] पर सिर्फ टाइम पास के लिए एक्चुअल यूज़

[02:28:50] बाद में आया। इन्वेंशन और इंप्लीमेंटेशन

[02:28:53] दोनों अलग चीजें हैं। इन्वेंशन होने के

[02:28:56] बाद भी उसका सही यूज़ समझना लक और विज़न पर

[02:29:00] डिपेंड करता है। बहुत सारी डिस्कवरीज हाफ

[02:29:04] इन्वेंटेड पड़ी रहती हैं। जब तक कोई विज़नरी

[02:29:07] उनको पूरा इंप्लीमेंट ना करें। स्टीव जॉब

[02:29:11] ने माउस और ग्राफिकल इंटरफेस को कंप्यूटर

[02:29:14] में यूज किया। तभी आज हम लैपटॉप यूज कर

[02:29:17] पाते हैं। वर्ल्ड को आगे ले जाने वाली

[02:29:20] टेक्नोलॉजीस आमतौर पर सिंपल होती हैं।

[02:29:23] जैसे पहिया, साइकिल या कार। काफी

[02:29:27] टेक्नोलॉजी फेल भी हो जाती हैं क्योंकि वह

[02:29:29] फ्रजाइल होती हैं। नेचर भी सिंपल और

[02:29:32] रोबस्ट स्यूशन पे वापस आ जाती है। जैसे

[02:29:36] कैमल व्हील से बेहतर था डेजर्ट में।

[02:29:41] जितनी चीज सिंपल और ऑब्वियस हो उतना हम

[02:29:44] कॉम्प्लिकेटेड तरीके से समझने की कोशिश

[02:29:47] करते हैं और मिस कर जाते हैं। रियल

[02:29:50] डिस्कवरीज प्रैक्टिस और सिंपल ऑब्जरवेशन

[02:29:53] से मिलती हैं। कॉम्प्लिकेटेड थ्यरी से

[02:29:56] नहीं। गवर्नमेंट और यूनिवर्सिटीज इनोवेशन

[02:29:59] में कम ही हेल्प करती हैं। क्योंकि वह

[02:30:02] सिर्फ कॉम्प्लिकेटेड और न्यूज़ वर्दी चीज

[02:30:04] ढूंढते हैं। सिंपल काम की चीज पर ध्यान

[02:30:07] नहीं देते। सिंपलीसिटी को वैल्यू नहीं

[02:30:10] मिलती लेकिन वही सबसे ज्यादा काम की होती

[02:30:13] है।

[02:30:15] थेल्स और व्हील की स्टोरी से साफ है कि

[02:30:18] एंटीफजिलिटी जो ट्रायल एंड एरर और

[02:30:21] असिमेट्री यानी अपसाइड ज्यादा डाउन साइड

[02:30:24] कम पे बेस्ड है। इंटेलिजेंस से भी ऊपर है।

[02:30:28] लेकिन थोड़ी इंटेलिजेंस जरूरी है। सबसे

[02:30:32] इंपॉर्टेंट है समझना कि जब आपके पास ऑप्शन

[02:30:34] हो यानी कोई बेहतर चीज सामने हो तो उसका

[02:30:38] फायदा उठाना। ऑप्शन की पावर को पहचानना ही

[02:30:42] असली रैशनलिटी है। लेकिन इतनी सी समझ भी

[02:30:46] सब में नहीं होती। हिस्ट्री में कई

[02:30:49] इन्वेंशंस के बाद उनका प्रैक्टिकल यूज़

[02:30:51] बहुत लेट हुआ। जैसे व्हील का एग्जांपल या

[02:30:55] मेडिकल साइंस में जर्म्स का कांसेप्ट

[02:30:57] एक्सेप्ट होने में 200 साल लग गए।

[02:31:00] एंटीसेप्सिस और ड्रग थेरेपी में भी कई

[02:31:04] दशकों का गैप रहा। डॉक्टर्स ओल्ड आइडियाज

[02:31:07] पर चिपके रहे। ब्लड लेटिंग जैसे हार्मफुल

[02:31:10] ट्रीटमेंट करते रहे। जबकि नए आइडियाज बिना

[02:31:13] किसी रिस्क के फायदा दे सकते थे। जब कोई

[02:31:16] पुराना नॉन नेचुरल और हार्मफुल चीज रिमूव

[02:31:20] करने में कोई रिस्क नहीं।

[02:31:23] फिर भी उसको कंटिन्यू करना बेवकूफी और

[02:31:26] क्रिमिनल है। ट्रायल एंड एरर का असली

[02:31:29] वैल्यू यह है कि वह रैंडम नहीं होता।

[02:31:32] ऑप्शनैलिटी के साथ हर एरर एक इन्वेस्टमेंट

[02:31:35] बन सकती है। अगर आपको समझ आए कि क्या काम

[02:31:39] करता है और क्या नहीं। जैसे आप कुछ खो

[02:31:42] दीजिए तो हर नई जगह ढूंढने पे आपको पता

[02:31:46] चलता है कि अब कहां नहीं देखना। तो अगला

[02:31:49] सर्च बेहतर होता है। ट्रेजर हंटर ग्रेग

[02:31:53] स्टिम का मेथड भी इसी पर बेस्ड है। हर फेल

[02:31:57] सर्च एक लर्निंग है और हर ट्रायल अगले

[02:32:00] रिजल्ट को बेहतर बनाता है। यही लॉजिक ऑयल

[02:32:04] गैस नेचुरल रिसोर्सेज में भी है क्योंकि

[02:32:07] अपसाइड बहुत बड़ा हो सकता है। ट्रायल एंड

[02:32:11] एरर जब ऑप्शनैलिटी के साथ हो तो रैंडमनेस

[02:32:14] टेम हो जाती है। इकोनॉमिस्ट इसकाउंटर ने

[02:32:18] क्रिएटिव डिस्ट्रक्शन की बात की। मतलब कुछ

[02:32:21] पुरानी चीजें टूटेंग तभी नई चीजें बनेंगी।

[02:32:25] सिस्टम इंप्रूव होगा। लेकिन उन्होंने

[02:32:28] ऑप्शनैलिटी, अनसर्टेनिटी, एंटी फ्रेजिलिटी

[02:32:31] का कोर पॉइंट मिस कर दिया। गवर्नमेंट या

[02:32:34] लार्ज ऑर्गेनाइजेशनंस सोचते हैं कि

[02:32:37] इनोवेशन एक स्ट्रेट लाइन है। एकेडमिया,

[02:32:41] साइंस, टेक्नोलॉजी, प्रैक्टिस। लेकिन असली

[02:32:44] में जिंदगी में ज्यादातर इनोवेशन रैंडम

[02:32:47] टिंकरिंग, ट्रायल एंड एरर और प्रैक्टिकल

[02:32:51] एक्सपीरियंस से आती है। एकेडमिक नॉलेज जो

[02:32:54] बुक्स, ग्रेड्स, थरीज, हार्व टाइप, फॉर्मल

[02:32:57] सिस्टम से मिलती है, उसका असली लाइफ में

[02:33:00] लिमिटेड रोल है। पर हम लोग यह ओवरएस्टीमेट

[02:33:04] करते हैं और रियल प्रैक्टिकल टेस्टिट

[02:33:07] नॉलेज को अंडरएस्टीमेट करते हैं।

[02:33:10] टेक्नोलॉजी को आमतौर पर डिफाइन किया जाता

[02:33:13] है कि वह साइंस के एप्लीकेशन से बनती है।

[02:33:16] पर असल में बहुत बार उल्टा होता है। पहले

[02:33:20] प्रैक्टिस फिर थ्यरीज बनती है। फिर उसी पे

[02:33:23] एकेडमिक पेपर्स लिखे जाते हैं। लीनियर

[02:33:27] बकोनियन मॉडल एकेडमिया फिर अप्लाइड साइंस

[02:33:30] फिर प्रैक्टिस।

[02:33:32] यह सिर्फ रेस केसेस में काम करता है। जैसे

[02:33:35] एटॉमिक बम असली लूप में पहले रैंडम

[02:33:39] टिंकरिंग यानी ट्रायल एंड एरर यानी एंटी

[02:33:42] फ्रजिलिटी फिर प्रैक्टिकल सशंस या

[02:33:45] ह्यूरिस्टिक्स यानी टेक्नोलॉजी फिर

[02:33:48] अप्रेंटिसशिप यानी प्रैक्टिस फिर वापस

[02:33:51] टिंकरिंग। एकेडमिक थरीज मोस्टली अपने आप

[02:33:54] में चक्कर काटती रहती हैं। प्रैक्टिकल

[02:33:57] लाइफ से डिस्कनेक्टेड होती हैं। हार्व और

[02:34:01] नेथोलॉजी डिपार्टमेंट की मस्ती वाले अगर

[02:34:04] बात करें तो प्रोफेसर्स बर्ड्स को सिखाते

[02:34:07] हैं कैसे उड़ना है। फिर क्रेडिट ले लेते

[02:34:10] हैं जब बर्ड्स उड़ गए। बुक्स लिख देते हैं

[02:34:13] कि हमारी वजह से बर्ड्स उड़ते हैं। मगर

[02:34:16] असल में बर्ड्स बिना हारवर्ड लेक्चर के ही

[02:34:18] उड़ रहे हैं। लेकिन जब बर्ड्स की जगह

[02:34:21] ह्यूमंस आ जाते हैं तो हम मान लेते हैं कि

[02:34:24] एजुकेशन और लेक्चर से ही इंसान सब काम कर

[02:34:28] पाता है जो कि गलत है। यह इल्लुजन बनती है

[02:34:32] क्योंकि जो लिखने वाले हैं वही हिस्ट्री

[02:34:34] लिखते हैं। उनको कन्फर्मेशन बायस होता है।

[02:34:38] जो काम करता है उसका क्रेडिट ले लेते हैं।

[02:34:40] जो फेल करता है वह कभी रिकॉर्ड नहीं होता।

[02:34:44] एजुकेशन के एट्रोजेनिक इफ़ेक्ट्स यानी

[02:34:47] हार्मफुल साइड इफ़ेक्ट्स पर कभी बात नहीं

[02:34:50] होती। सोवियत हार्व इल्ल्यूजन यानी

[02:34:54] लेक्चरिंग बर्ड्स ऑन फ्लाइंग। इसका मतलब

[02:34:57] है कि लोग सोच लेते हैं कि जो चीज साथ में

[02:35:00] दिखती है वह उसका रीजन है। जैसे बर्ड्स को

[02:35:03] उड़ता देख के मान लेना कि लेक्चर्स की वजह

[02:35:06] से बर्ड्स उड़ते हैं। इसे एपी फिनोमिनन

[02:35:10] कहते हैं। दो चीजें एक साथ दिखती हैं। तो

[02:35:14] लोग मान लेते हैं कि एक दूसरे की वजह से

[02:35:16] हो रही हैं। जबकि असल में कॉजलिटी कुछ और

[02:35:20] होती है। जैसे शिप के कॉम्पस को देख के

[02:35:24] लगता है कंपस शिप को चला रहा है। पर असल

[02:35:27] में शिप की डायरेक्शन दिखाता है।

[02:35:30] डेवलप्ड कंट्रीज में रिसर्च दिख जाती है

[02:35:33] तो लोग मान लेते हैं कि रिसर्च की वजह से

[02:35:36] पैसा आया है। जबकि हो सकता है पैसा पहले

[02:35:40] आया हो। रिसर्च बाद में हुई हो। ऐसे ही जब

[02:35:44] क्राइसिस होती है तो लोग ग्रीड को दोष

[02:35:47] देते हैं। कहते हैं अगर ग्रीड हटा दें तो

[02:35:50] क्राइसिस खत्म हो जाएगी। जबकि ग्रिड तो

[02:35:53] हमेशा थी सिस्टम की फ्रेजिलिटी नई है। इस

[02:35:57] इल्लुजन को तोड़ने का तरीका है सीक्वेंस

[02:36:00] देखना। क्या ए हमेशा बी से पहले होता है?

[02:36:04] अगर नहीं तो समझ जाइए कजिलिटी फेक है।

[02:36:09] काफी बार हिस्टोरियंस जर्नलिस्ट या

[02:36:11] एक्सपर्ट्स भी यह गलती कर देते हैं।

[02:36:14] मास्टर प्यूपिल या कॉज इफेक्ट रिलेशन बना

[02:36:17] देते हैं बिना सही एविडेंस के। बस क्योंकि

[02:36:20] कुछ चीजें साथ में दिखती हैं। कंफर्मेशन

[02:36:24] बायस या चेरी पिकिंग भी इसी का पार्ट है।

[02:36:28] लोग बस वही एग्जांपल दिखाते हैं जो उनकी

[02:36:31] बात को सपोर्ट करें। बाकी इग्नोर कर देते

[02:36:34] हैं। जैसे कंट्री की टूरिस्ट फोटो में सब

[02:36:36] कुछ परफेक्ट दिखाना रियलिटी अलग होती है।

[02:36:40] एकेडमिया या रिसर्च भी अपनी सक्सेस स्टोरी

[02:36:43] हाईलाइट करती है। फेलियर्स को इग्नोर कर

[02:36:46] देती है। जिससे पब्लिक को लगता है कि

[02:36:49] एकेडमिक मेथड हर जगह काम करता है। जिससे

[02:36:53] मैथमेटिक्स की एप्लीकेशनेशंस दिखाई जाती

[02:36:55] हैं। पर जहां मैथ्स फेल हुई या नुकसान हुआ

[02:36:59] उसका मेंशन नहीं होता।

[02:37:01] चेरी पिकिंग में ऑप्शनलिटी होती है।

[02:37:04] स्टोरी का अपसाइड दिखाना, डाउन साइड

[02:37:07] छुपाना। रियल वर्ल्ड में एंटीफजलिटी की

[02:37:10] इंटेलिजेंस चाहिए होती है। इंटरवेंशनिस्ट

[02:37:13] लोग या यूनिवर्सिटीज को यह बात हजम नहीं

[02:37:17] होती कि बिना उनके भी चीजें सुधर सकती

[02:37:20] हैं।

[02:37:22] अबू धाबी में ऑयल पैसा आया तो उन्होंने

[02:37:25] सोचा प्रेस्टीजियस यूनिवर्सिटीज बुलाओ।

[02:37:28] एजुकेशन पर पैसा डालो। सोसाइटी रिच हो

[02:37:31] जाएगी। पर एक्चुअल में उनका पैसा ऑयल से

[02:37:34] आया एजुकेशन के थ्रू नहीं। यह भी एक एपी

[02:37:38] फेनोमिनन है। रियल प्रोग्रेस के लिए

[02:37:41] स्ट्रेसर्स, डिफिकल्टीज यानी एंटीफजिलिटी

[02:37:45] चाहिए होती है। बिना प्रॉब्लम्स के

[02:37:47] सोफिस्टिकेशन या इनोवेशन नहीं आती। जैसे

[02:37:53] ओम विलेज वॉर की वजह से बिखर गया। लेकिन

[02:37:56] स्ट्रगल के बाद वापस और स्ट्रांग बन गया।

[02:37:59] मतलब जब तक लोग हिले नहीं उनमें ग्रोथ

[02:38:02] नहीं आई। कंट्रीज में एजुकेशन बढ़ाने से

[02:38:06] इकोनमिक ग्रोथ आएगी। यह भी इल्लुजन है।

[02:38:10] स्टडीज दिखाती हैं कि पहले पैसा आता है।

[02:38:13] उसके बाद एजुकेशन लेवल बढ़ता है। ताइवान,

[02:38:16] कोरिया जैसे देश पहले गरीब और अनएुकेटेड

[02:38:20] थे। बाद में रिच हो गए। तब एजुकेशन आई। सब

[02:38:25] सहधारण अफ्रीका में लिटरेसी बढ़ी लेकिन

[02:38:28] पावर्टी भी बढ़ी। मतलब वेल्थ लीड्स टू

[02:38:31] एजुकेशन नॉट द अदर वे। एजुकेशन इंडिविजुअल

[02:38:36] के लिए हेल्पफुल है लेकिन देश के लेवल पर

[02:38:39] डायरेक्ट रिलेशन नहीं। एजुकेशन का असली

[02:38:43] बेनिफिट है स्टेबिलिटी।

[02:38:45] मिडिल क्लास फैमिलीज में कंटिन्यूटी ना कि

[02:38:48] जीडीपी ग्रोथ।

[02:38:51] रियल एजुकेशन पार्टी में होती है। लोगों

[02:38:54] से बात करने, सीखने और रियल एक्सपीरियंस

[02:38:58] से।

[02:38:59] कमोडिटाइज्ड पैकेज्ड एजुकेशन या सिर्फ

[02:39:03] डिग्रीज लेना नॉलेज नहीं है। स्कॉलरशिप और

[02:39:07] ऑर्गेनाइज्ड एजुकेशन अलग चीजें हैं।

[02:39:10] यूनिवर्सिटीज नॉलेज बना सकती हैं, लेकिन

[02:39:13] उनका इंपैक्ट काफी ओवरहाइब्ड है। लोग गलत

[02:39:17] कॉज लिंक बना देते हैं।

[02:39:20] एजुकेशन का एक फायदा यह है कि इंसान

[02:39:24] ज्यादा कल्चरर्ड

[02:39:26] यानी पॉलिश्ड डिनर पार्टनर बन जाता है।

[02:39:30] बातें करने लायक हो पाता है। पर एजुकेशन

[02:39:33] को इकॉनमी इंप्रूव करने का टूल बनाना एक

[02:39:36] नया कांसेप्ट है। पहले एजुकेशन का एम था

[02:39:39] अच्छा इंसान बनाना, वैल्यू्यूज बढ़ाना,

[02:39:42] लर्निंग के लिए सीखना ना कि गोल्ड या पैसा

[02:39:46] कमाना। एंटरप्रेन्यर्स या

[02:39:50] टेक्निकल लोग अच्छे डिनर पार्टनर नहीं

[02:39:52] होते। उनका टैलेंट करने में है, बात बनाने

[02:39:56] में नहीं। काफी लोग सोचते हैं अगर कोई

[02:39:58] इंसान कल्चरर्ड है, अच्छा बोलता है तो वह

[02:40:03] हर फील्ड में अच्छा होगा। इसको हेलो

[02:40:07] इफेक्ट कहते हैं। मगर यह सोच गलत है।

[02:40:11] अच्छे डअर्स या आर्टिजंस अक्सर बोलने में

[02:40:14] सिंपल या कंफ्यूज लगते हैं। उनके आइडियाज

[02:40:17] एलगेंट नहीं होते और उनका काम बेस्ट होता

[02:40:21] है।

[02:40:22] ब्यूरोक्रेट्स को भी बातों के बेसिस पर ही

[02:40:25] सेलेक्ट किया जाता है क्योंकि उनके काम का

[02:40:28] ऑब्जेक्टिव रिजल्ट नहीं होता।

[02:40:32] ग्रीन लंब फैलेसी का मतलब है हम गलत नॉलेज

[02:40:36] को इंपॉर्टेंट समझ लेते हैं और असली

[02:40:39] इंपॉर्टेंट चीज इग्नोर कर देते हैं।

[02:40:41] एग्जांपल एक सक्सेसफुल ट्रेडर मान लीजिए

[02:40:45] जो सिगल यह ग्रीन लंब ट्रेड करता था। पर

[02:40:49] सोचता था कि लंब पे पेंट लगा होता है। असल

[02:40:53] में ग्रीन लंब मतलब फ्रेश लकड़ी।

[02:40:57] वह ट्रेड में एक्सपर्ट था पर थ्यरी नहीं

[02:41:00] जानता था। फिर भी प्रॉफिट में था।

[02:41:04] दूसरी तरफ ग्रैंड थरीज पढ़ने वाले आदमी

[02:41:07] लॉस में चले गए। रियलिटी यह है कि मार्केट

[02:41:10] इवोल्यूशन या रियल वर्ल्ड में काम करने

[02:41:14] वाले लोग एग्जाम्स या थ्योरिटिकल नॉलेज पे

[02:41:17] सिलेक्ट नहीं होते। उनको प्रैक्टिकल चीजें

[02:41:20] आती है जो आउटसाइडर्स को बेकार लग सकती

[02:41:23] हैं।

[02:41:25] जब मैं डेरिवेटिव ट्रेनिंग में आया तो

[02:41:28] सोचा फाइनेंस ट्रेडर्स इकोनॉमिक्स

[02:41:30] जिओपॉलिटिक्स मतलब सब जानते होंगे। पर

[02:41:34] रियलिटी में वो लोग सिंपल स्ट्रीट स्मार्ट

[02:41:37] बातों में नॉर्मल थे। ज्यादा थ्यरीज नहीं

[02:41:40] पढ़ते थे। इंग्लिश भी स्टैंडर्ड नहीं

[02:41:42] बोलते थे। काफी लोग स्विट्जरलैंड को मैप

[02:41:46] पे नहीं बता सकते थे। फिर भी बड़े

[02:41:48] ट्रेडर्स थे। करोड़ों कमाते थे। लंदन में

[02:41:52] तो और भी बेसिक कॉकनी लोग सक्सेसफुल

[02:41:55] ट्रेडर्स थे। मुझे यह देख के शॉक लगा।

[02:41:59] अपनी सारी एजुकेशन वेस्ट लगने लगी।

[02:42:03] तब समझा कि प्राइस और रियलिटी का रिलेशन

[02:42:06] सिंपल नहीं है। वह थरी से नहीं प्रैक्टिकल

[02:42:09] से आता है।

[02:42:12] फैट टोनी की स्टोरी भी इसी पॉइंट को

[02:42:15] दिखाती है। जब गल्फ वॉर हुआ सब एनालिस्ट

[02:42:19] बोल रहे थे कि ऑयल का प्राइस वॉर से

[02:42:21] बढ़ेगा। फैट टोनी को इराक का लोकेशन भी

[02:42:24] नहीं पता था। लेकिन उसने कॉमन सेंस यूज़

[02:42:27] किया। अगर सब एक्सपेक्ट कर रहे हैं प्राइस

[02:42:30] बढ़ेगा तो वह एक्सपेक्टेशन ऑलरेडी प्राइस

[02:42:33] में होगा। जब वॉर स्टार्ट हुआ तो ऑयल

[02:42:36] प्राइस आधा हो गया। टोनी ने 3 लाख को 18

[02:42:40] मिलियन बना लिया। बाकी लोग वॉर प्रेडिक्ट

[02:42:43] करके भी लॉस में चले गए क्योंकि उन्होंने

[02:42:46] बेसिक चीज मिस कर दी। ऑयल और कुवैत सेम

[02:42:50] चीज नहीं है। टोनी ने अपसाइड ज्यादा डाउन

[02:42:53] साइड कम देखा और वही सबसे बड़ा लेसन है।

[02:42:59] यह नॉट द सेम टिंग यानी कॉन्फ्लिक्लेशन

[02:43:03] प्रॉब्लम है। लोग सोच लेते हैं कि दो

[02:43:05] कनेक्टेड चीजें एक ही हैं। जबकि उनका

[02:43:08] रिलेशन कॉम्प्लेक्स या डिफरेंट होता है।

[02:43:12] ऑप्शनलिटी समझ लीजिए तो यह डिफरेंस पहचान

[02:43:17] सकते हैं। जैसे जिम सिमंस टॉप क्वांट

[02:43:22] ट्रेडर इकोनॉमिस्ट को हायर नहीं करते

[02:43:24] क्योंकि वह थ्यरी नहीं पैटर्न और इंटरनल

[02:43:27] लॉजिक देखना चाहते हैं। एरियल रबिनस्टीन

[02:43:31] फेमस इकोनॉमिस्ट भी कहते हैं कि थ्यरी से

[02:43:34] प्रैक्टिस डायरेक्ट नहीं होती। थ्यरी

[02:43:36] इंस्पिरेशन दे सकती है पर पॉलिसी नहीं

[02:43:39] बनाना चाहिए।

[02:43:41] बड़ा पॉइंट यह है कि नैरेटिव और प्रैक्टिस

[02:43:44] का रिलेशन ऑप्शनलिटी में है। जो काम करता

[02:43:47] है वह सिंपल एंटी फ्रजाइल पे ऑफ वाला होता

[02:43:51] है। और आयरनी यह है कि स्कूल,

[02:43:54] यूनिवर्सिटीज, एजुकेशन से हम ऑप्शनलिटी

[02:43:57] देखना भूल जाते हैं। यानी असली जिंदगी में

[02:44:01] वैल्यू क्या है? वह नजर ही नहीं आता।

[02:44:05] ग्रीक स्टोरी में दो भाई थे। प्रोमिथथियस

[02:44:08] जो फ्यूचर देख के सोचता था फायर लाया और

[02:44:12] एपिमथस जो सब होने के बाद सोचता था यह

[02:44:16] पडोरा का बॉक्स खोल दिया इरिवर्सिबल

[02:44:19] नुकसान हो गया ऑप्शनैलिटी प्रोमिथियस जैसी

[02:44:24] है आप रिस्क लेके कुछ नया ट्राई करते हो

[02:44:27] अपसाइड बड़ा डाउन साइड छोटा

[02:44:30] गलती हो भी गई तो ज्यादा नुकसान नहीं वापस

[02:44:34] सुधार सकते हो लेकिन नेट

[02:44:37] यानी बाद में स्टोरी बनाना एपिथिस जैसा

[02:44:40] है। गलती हो गई तो सब कुछ खत्म वापस नहीं

[02:44:44] आ सकते। ऑप्शन अनसर्टेनिटी को टेम करती

[02:44:49] है। नरेटिव आपको अनसर्टेनिटी का गुलाम बना

[02:44:53] देता है। फ्यूचर को पास्ट की कॉपी समझ

[02:44:56] लेना सबसे बड़ी गलती है।

[02:45:00] सोचना और करने में फर्क है। थ्यरी और

[02:45:04] प्रैक्टिस अलग है। इंटेलेक्चुअल्स सोचते

[02:45:07] हैं। थ्योरी सब कुछ है। पर रियल वर्ल्ड

[02:45:09] में ट्रायल एंड एरर, टिंकरिंग, प्रैक्टिकल

[02:45:12] रिस्क लेना यह सबसे पावरफुल है। नॉलेज दो

[02:45:16] तरह की है। फॉर्मल यानी क्लासरूम, टेक्स्ट

[02:45:19] बुक और फैट टोने टाइप यानी स्ट्रीट

[02:45:22] स्मार्ट रिस्क लेने वाला, ट्रायल एंड एरर

[02:45:25] से सीखने वाला।

[02:45:27] एंटी फ्रजिलिटी प्रैक्टिकल रिस्क टेकिंग

[02:45:30] बारबे स्ट्रेटजी कम डाउन साइड बड़ा अप साइड

[02:45:34] इस पर बेस्ड है। यही टफ कॉम्प्लेक्स

[02:45:38] वर्ल्ड में काम आता है। टिंकरिंग और

[02:45:41] ट्रायल एंड एरर में भी नरेटिव होता है।

[02:45:44] लेकिन उस नरेटिव पे चिपकना जरूरी नहीं।

[02:45:47] जैसे दादी नानी की एडवाइस। रिलीजियस

[02:45:50] स्टोरीज या रूल ऑफ थंब जो लॉजिक नहीं लगते

[02:45:54] लेकिन जनरेशन से काम आ रहे हैं। वह

[02:45:57] एक्चुअल में इवोलशनरी विज़डम है।

[02:46:00] सर्वाइवल आइडियाज का नहीं ह्यूमंस का होता

[02:46:03] है। जो सर्वाइव करता है उसकी सोच, उसके

[02:46:07] रूल सर्वाइव करते हैं। इसलिए दादी की बात

[02:46:10] बिजनेस स्कूल से ज्यादा काम की है।

[02:46:15] एक्सपर्ट्स जब अपने आप को ज्यादा

[02:46:17] इंटेलिजेंट समझ लेते हैं तो वह फ्रजाइल हो

[02:46:20] जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है सब कुछ

[02:46:22] पता है। जितना आपको लगता है कि आप जानते

[02:46:26] हैं उतना आप गलत हैं। उतना आप रिस्क में

[02:46:30] हैं। एक्सेप्ट कर लीजिए कि आपको सब नहीं

[02:46:33] पता। आपके लिए सेफ है।

[02:46:38] हमने पहले कहा था कि क्लासरूम एजुकेशन से

[02:46:42] वेल्थ नहीं आती। वेल्थ से एजुकेशन आती है।

[02:46:45] यह भी एक इल्लुजन है। वैसे ही असली

[02:46:48] इनोवेशन और ग्रोथ एंटी फ्रजाइल रिस्क

[02:46:51] टेकिंग प्रैक्टिस और ट्रायल एंड एरर से

[02:46:54] आती है ना कि ऑर्गेनाइज्ड रिसर्च या थ्यरी

[02:46:57] से।

[02:46:59] थरीज यूज़फुल है। लेकिन हम लोग रैंडम चांस

[02:47:02] प्रैक्टिस और सही टाइम पर राइट डिसीजन की

[02:47:06] पावर को अंडरएस्टीमेट करते हैं। हिस्ट्री

[02:47:10] भी मोस्टली लूजर्स या नॉन प्रैक्टिशनर्स

[02:47:14] लिखते हैं। वह जो रियल वर्ल्ड काम नहीं

[02:47:17] करते। सिर्फ लिखते हैं, सोचते हैं। इसलिए

[02:47:21] हिस्ट्री में कॉज इफेक्ट, थ्यरी,

[02:47:23] प्रैक्टिस, इनोवेशन की असली स्टोरी गलत

[02:47:27] दिखाई जाती है। काफी बार थ्यरी बाद में

[02:47:31] बनती है। जब कोई प्रैक्टिस में काम कर

[02:47:33] चुका होता है। एक एग्जांपल है डेरिवेटिव्स

[02:47:37] ट्रेडिंग में शिकायगो के ट्रेडर्स

[02:47:39] कॉम्प्लेक्स फार्मूला नहीं जानते थे।

[02:47:42] लेकिन प्राइस, रिस्क सब प्रैक्टिकल सोच से

[02:47:45] सेट करते थे। जो एकेडमिक्स बाद में

[02:47:48] फार्मूला में कन्वर्ट कर देते हैं और

[02:47:50] क्रेडिट ले लेते हैं। ऑप्शन प्राइिंग, जेट

[02:47:53] इंजन, मेडिकल इनोवेशंस सब पहले फील्ड में

[02:47:57] प्रैक्टिस में इवॉल्व हुआ। बाद में थरी

[02:48:00] बनी। लेकिन एकेडमिया क्लेम कर लेती है कि

[02:48:03] पहले थ्यरी थी फिर प्रैक्टिस।

[02:48:07] एक और प्रॉब्लम यह है कि जब एकेडमिक्स या

[02:48:09] हिस्टोरियंस स्टोरी लिखते हैं तो वह

[02:48:12] नैरेटिव को ऐसा शेप देते हैं जिससे लगे कि

[02:48:17] थ्योरी काम आई। प्रैक्टिस बाद में आई।

[02:48:21] मगर असल में रियल वर्ल्ड में काम करने

[02:48:23] वाले लोग ट्रेडर्स, इंजीनियर्स, आर्टिजंस

[02:48:27] पहले कुछ नया ढूंढ लेते हैं। बाद में उसकी

[02:48:29] थ्यरी लिखी जाती है। रियल वर्ल्ड में

[02:48:33] क्योर से थ्यरी पैदा होती है ना कि थ्यरी

[02:48:36] से क्योर।

[02:48:39] इंजीनियर्स और बिल्डर्स का काम देखकर लगता

[02:48:41] है कि थरीज और साइंस के बिना भी बड़ी

[02:48:45] इनोवेशंस हो सकती हैं। असल में इनोवेशंस

[02:48:49] ट्रायल एंड एरर प्रैक्टिकल एक्सपीरियंस और

[02:48:52] मास्टर अप्रेंटिस स्टाइल से होती हैं। बाद

[02:48:56] में थ्यरी उसको एक्सप्लेन करने के लिए आती

[02:48:58] है। जैसे जेट इंजन बिना थ्योरिटिकल

[02:49:01] अंडरस्टैंडिंग के बना लिया गया। पहले

[02:49:04] टिंकर किया, काम किया। बाद में एकेडमिक

[02:49:07] थ्यरी आई। साइबरनेटिक्स भी इंजीनियरिंग

[02:49:10] वर्ल्ड में प्रैक्टिस में थी। बाद में

[02:49:13] वाइनर ने थ्यरी बना दी। लोग समझ बैठे कि

[02:49:16] सब कुछ उसकी थ्यरी से आया है। ज्योमेट्री

[02:49:20] और मैथ्स भी जैसे यूक्लिड के एलिमेंट्स

[02:49:24] यूज़ होने के बाद लिखे गए। पहले प्रैक्टिस

[02:49:27] में यूज़ हो रहे थे। फिर फॉर्मल बनाया गया।

[02:49:30] मिडिवल यूरोप में कैथेड्रल या बिल्डिंग्स

[02:49:33] बनाने वाले इंजीनियर्स मैथ्स नहीं जानते

[02:49:36] थे। बस रूल्स, ट्रिक्स और मास्टर से सीखी

[02:49:40] हुई चीजें यूज करते थे। पर फिर भी उनके

[02:49:44] बनाए बिल्डिंग्स आज तक मजबूत हैं। रोमंस

[02:49:48] ने एक्विडक्ट्स बिना मैथ्स के बनाए

[02:49:51] क्योंकि उनका सिस्टम ट्रायल एंड एरर और

[02:49:54] एक्सपीरियंस पे बेस्ड था।

[02:49:57] जबकि ज्यादा मैथ से लोग ओवर ऑप्टिमाइज

[02:50:00] करके फ्रजाइल बना देते हैं।

[02:50:03] कुकिंग का एग्जांपल दिखाता है कि

[02:50:06] प्रैक्टिकल काम में ऑप्शनैलिटी सबसे

[02:50:08] इंपॉर्टेंट है। नया इंग्रेडिएंट ऐड करिए।

[02:50:11] अगर अच्छा लगे तो रख लीजिए नहीं तो हटा

[02:50:14] दीजिए।

[02:50:15] रेसिपी जनरेशंस के ट्रायल एंड एरर से

[02:50:18] इवॉल्व होती है। कोई फॉर्मल थ्यरी नहीं।

[02:50:21] सिर्फ अप्रेंटिसशिप, एक्सपीरियंस और

[02:50:24] फीडबैक पर बेस्ड है।

[02:50:26] मेडिसिन भी असल में अप्रेंटिसशिप और

[02:50:29] ऑब्जरर्वेशन पर है। थोड़ा बैकग्राउंड

[02:50:33] थ्यरी आती है पर असली नॉलेज एंपेरिकल और

[02:50:37] प्रैक्टिस से आता है। एविडेंस बेस्ड

[02:50:40] मेडिसिन भी ज्यादा कैटलॉगिंग और

[02:50:42] ऑब्जरर्वेशन पे बेस्ड है ना कि प्योर

[02:50:46] थ्यरी पे। फिजिक्स जैसे कुछ रियल फील्ड्स

[02:50:49] में थ्यरी से प्रेडिक्शनंस आती हैं। जैसे

[02:50:51] आइंस्टीन की रिलेटिविटी या हग्सबसोन।

[02:50:55] लेकिन यह एक्सेप्शनंस है। ज्यादातर

[02:50:57] कॉम्प्लेक्स सिस्टम्स में काम थ्यरी से

[02:51:00] नहीं टिंकर करने से होता है। कंप्यूटर का

[02:51:03] भी एग्जांपल ले लीजिए। पहले थ्यरी बनी फिर

[02:51:06] कंप्यूटर बना। पर यूज़ क्या करेंगे पता

[02:51:10] नहीं था। फिर वर्ड प्रोसेसिंग आया। फिर

[02:51:12] इंटरनेट, फिर सोशल नेटवर्क। यह सब रैंडम

[02:51:15] ट्रायल, चांस और टिंकर करने से हुआ। साइंस

[02:51:19] ने सिर्फ बेस दिया। डायरेक्शन नहीं। चीन

[02:51:22] का केस देखिए। जब तक लोग टिंकर करते रहे

[02:51:25] इनोवेशंस आती रही जैसे स्पिनिंग मशीन

[02:51:28] लेकिन जब सिस्टम टॉप डाउन और

[02:51:30] ब्यूरोक्रेटिक हो गया तो टिंकर करने की

[02:51:33] कल्चर खत्म हो गई सिर्फ नॉलेज इकट्ठा होता

[02:51:36] रहा पर प्रैक्टिकल नई चीजें बनाना बंद हो

[02:51:40] गया यही रीजन है कि इंडस्ट्रियल

[02:51:42] रिवोल्यूशन यूरोप में हुई क्योंकि वहां

[02:51:45] टिंकर ट्राई फेल इंप्रूव की कल्चर थी चीन

[02:51:49] में नहीं

[02:51:51] इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन और नए इन्वेंशंस

[02:51:53] मेनली हॉबिस्ट लोगों और इंग्लिश प्रीस्ट्स

[02:51:57] यानी रेक्टर्स की वजह से आए जो अपनी मर्जी

[02:52:00] से फ्री टाइम में बिना किसी एकेडमिक

[02:52:03] प्रेशर के काम करते थे। यह लोग सिक्योर

[02:52:06] लाइफ, घर, खाना और फ्री टाइम के साथ अपने

[02:52:10] आइडियाज पे काम करते थे। जैसे थॉमस बेस,

[02:52:14] थॉमस माल्थस और कई और रिक्टर्स ने

[02:52:18] इन्वेंशंस और डिस्कवरीज की। बिना किसी

[02:52:21] यूनिवर्सिटी या एकेडमिक के डायरेक्ट

[02:52:22] इन्वॉल्वमेंट के एकेडमिक साइंस का

[02:52:26] टेक्नोलॉजी पर डायरेक्ट इंपैक्ट कम था।

[02:52:29] यूनिवर्सिटीज नेशनल वेल्थ के बाद स्ट्रांग

[02:52:32] हुई पहले नहीं। हॉबी, साइंस, टिंकरर्स और

[02:52:36] प्राइवेट इन्वेस्टर्स ने रियल इनोवेशंस

[02:52:39] की। जैसे स्टीम इंजन या टेक्सटाइल मशीनंस।

[02:52:43] यह सब प्रैक्टिकल लोगों के ट्रायल एंड एरर

[02:52:45] से आया। साइंस या थरी से नहीं।

[02:52:50] कि अली ने दिखाया कि गवर्नमेंट जब रिसर्च

[02:52:52] पर ज्यादा पैसा लगाती है तो प्राइवेट

[02:52:55] सेक्टर कम इन्वेस्ट करता है और इनोवेशन

[02:52:58] स्लो हो जाती है जैसे जापान में हुआ।

[02:53:02] इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन का मेन सोर्स

[02:53:04] टिंकरर्स और डअर्स थे ना कि प्रोफेसर्स या

[02:53:08] थरिस्ट्स।

[02:53:10] थ्यरी और प्रैक्टिस का उल्टा रिलेशन था।

[02:53:12] पहले इन्वेंशन हुई बाद में थ्यरी आई।

[02:53:15] एकेडमिक लोगों ने कई इन्वेंशंस का क्रेडिट

[02:53:18] अपने नाम भी लिया जो असल में फील्ड के

[02:53:22] लोगों ने बनाई थी। रिसर्च और इनोवेशन में

[02:53:25] पे ऑफ्स का पैटर्न ऐसा है कि एक बड़ा

[02:53:28] डिस्कवरी सब कुछ कवर कर लेता है। इसलिए

[02:53:32] सही पॉलिसी यह है कि ज्यादा से ज्यादा

[02:53:34] स्माल अमाउंट्स अलग-अलग लोगों को दीजिए

[02:53:38] ताकि हर ऑप्शन में चांस हो। क्योंकि विनर

[02:53:42] अनप्रिडिक्टेबल है। वेंचर कैपिटलिस्ट भी

[02:53:46] आइडियाज पर नहीं लोगों पर पैसा लगाते हैं

[02:53:49] और कोई फिक्स प्लान नहीं बनाते।

[02:53:52] सही अप्रोच है कि पैसा एग्रेसिव टिंकरर्स

[02:53:56] को दिया जाए जो ऑप्शंस को मिल्क कर सकें।

[02:54:01] मेडिसिन में भी रिसर्च ज्यादा सिरेंडिपिटी

[02:54:04] चांस और एक्सीडेंटल डिस्कवरी से होती है।

[02:54:08] प्लंड या टारगेटेड रिसर्च से नहीं।

[02:54:11] कैंसर ड्रग्स या दूसरे मेजर मेडिसिंस

[02:54:14] ज्यादातर रैंडम चांस या किसी और फील्ड की

[02:54:18] डिस्कवरी से आए। गवर्नमेंट या एकेडमिक

[02:54:21] रिसर्च का डायरेक्ट इंपैक्ट मेडिसिंस पर

[02:54:23] कम है। प्राइवेट इंडस्ट्री ने ज्यादा

[02:54:26] ड्रग्स बनाई हैं। बहुत सारी मेडिसिंस

[02:54:29] ब्लैक स्न स्टाइल यानी अनएक्सेक्टेड तरीके

[02:54:32] से मिल गई।

[02:54:34] डिजाइनर ड्रग्स का मॉडल काम नहीं करता

[02:54:37] क्योंकि साइड इफेक्ट्स और इंटरेक्शंस

[02:54:40] अनप्रिडिक्टबल है और ड्रग्स बनाने का

[02:54:42] प्रोसेस ज्यादा कॉम्प्लेक्स होता जा रहा

[02:54:45] है।

[02:54:47] अल गजाली ने एक फेमस एग्जांपल दिया पिन

[02:54:51] का। एक पिन बनाने में 25 लोग लगते हैं और

[02:54:54] सब बिना किसी सेंट्रल प्लानर के कोलैबोरेट

[02:54:58] करते हैं। जैसे इनविज़िबल हैंड चल रहा हो।

[02:55:01] कोई भी अकेला इंसान पूरा पिन नहीं बना

[02:55:04] सकता।

[02:55:06] अलगजाली के हिसाब से असली नॉलेज इंसान के

[02:55:09] पास नहीं बल्कि गॉड के या नेचर के पास है।

[02:55:14] एडम स्मिथ ने भी मार्केट को इनविज़िबल हैंड

[02:55:16] कहा। दोनों का मतलब यही कि सिस्टम खुद चल

[02:55:20] रहा है और किसी भी इंडिविजुअल को पूरी

[02:55:23] प्रोसेस का नॉलेज नहीं है। मैटर रिडली

[02:55:26] बायोलॉजी के एग्जांपल से कहते हैं कि

[02:55:29] कोलैबोरेशन में बड़ी पावर है। जब आइडियाज

[02:55:32] मिक्स होते हैं तब एक्सप्लोजन ऑफ ग्रोथ

[02:55:35] होता है। एक प्लस एक बराबर दो नहीं बल्कि

[02:55:39] कई गुना ज्यादा होते हैं। पर ऐसा

[02:55:42] कोलैबोरेशन कैसे होगा? कब होगा? कोई नहीं

[02:55:45] प्रेडिक्ट कर सकता। इसलिए वर्ल्ड के

[02:55:48] फ्यूचर अनप्रिडिक्टेबल है। सबसे अच्छा यही

[02:55:52] है कि एनवायरमेंट ऐसा बनाइए कि कोलबोरेशन

[02:55:55] आसान हो जाए। पर सेंट्रली इनोवेशन कंट्रोल

[02:56:00] नहीं हो सकता। जैसे रूस ने ट्राई किया।

[02:56:02] फेल हो गया। रिलीजन का इफेक्ट भी यही है।

[02:56:06] इंसान की लिमिटेशन को एक्सेप्ट करिए। गॉड

[02:56:09] या नेचर पर छोड़ दीजिए। स्केप्टिक लोग जो

[02:56:13] एक्सपर्ट नॉलेज पर डाउट करते हैं मोस्टली

[02:56:16] रिलीजियस या रिलीजन सपोर्टिव थे क्योंकि

[02:56:20] उनको पता था कि इंसान सब नहीं जानता।

[02:56:23] कॉरपोरेशंस स्ट्रेटेजिक प्लानिंग पे फिदा

[02:56:26] है। पर एविडेंस दिखाता है कि स्ट्रेटेजिक

[02:56:30] प्लानिंग ज्यादा काम नहीं करती। मैनेजमेंट

[02:56:33] थरीज टेलरिज्म से प्रोडक्टिविटी तक

[02:56:37] मोस्टली सूडो साइंस निकली है। बिजनेस का

[02:56:40] असली प्रोग्रेस ड्रिफ्ट चांस और

[02:56:43] ओपोरर्चुनिस्टिक चेंजेस से होता है। कोका

[02:56:47] कोला पहले मेडिसिन थी। टिफनेस स्टेशनरी

[02:56:50] स्टोर नोकिया पेपर मिल डपोंट

[02:56:53] एक्सप्लोसिव्स इवन बुक सेल्स

[02:56:58] ओडा सिल्वर स्मिथ्स एक कल्ट ग्रुप था। सब

[02:57:02] अपने ओरिजिनल प्लान से टोटली अलग हो गए।

[02:57:05] इसका मतलब बिजनेस की रियल ग्रोथ प्लान

[02:57:07] नहीं बल्कि एक्सीडेंटल और अपोरर्चुनिस्टिक

[02:57:10] होती है। अब बात करते हैं इनवर्स टर्की

[02:57:14] प्रॉब्लम की। मतलब जो चीजें हम पास्ट डाटा

[02:57:18] में नहीं देखते वह पॉजिटिव भी हो सकती

[02:57:20] हैं। एंटीफ्रजाइल सिस्टम्स में या नेगेटिव

[02:57:24] भी फ्रजाइल सिस्टम्स में।

[02:57:27] जैसे मेक्सिको की वेल्थ समझने के लिए अगर

[02:57:31] सैंपल में कार्लो स्लिम नहीं आया तो एवरेज

[02:57:34] गलत हो जाएगा क्योंकि रेयर इवेंट यानी

[02:57:37] स्लिम का रिच होना सबको ओवरपावर करता है।

[02:57:41] इंटरफाइल या ब्लैक स्ान बिनेसेस में छोटे

[02:57:44] लॉसेस होते हैं। पर कभी-कभी एक बड़ा विन

[02:57:48] मिलता है जो डाटा में दिख नहीं पाता।

[02:57:51] इसलिए लोग अंडरएस्टेट करते हैं। इसी तरह

[02:57:55] फ्रजाइल चीजों में रेयर बड़ा लॉस होता है।

[02:57:59] पर डाटा में नहीं दिखाई देता। लोग समझ

[02:58:02] नहीं पाते। हार्व बिजनेस स्कूल के

[02:58:05] प्रोफेसर ने बायोटेक पर बोला कि ज्यादा

[02:58:07] कंपनीज प्रॉफिट नहीं कमा रही तो इसमें

[02:58:10] पोटेंशियल नहीं।

[02:58:12] लेकिन एक्सट्रीमिस्ट या ब्लैक स्वान

[02:58:14] वर्ल्ड में रेयर इवेंट डोमिनेट करता है।

[02:58:17] एक या दो कंपनीज बहुत बड़ा प्रॉफिट कमा

[02:58:20] लेती हैं जो डाटा में दिख नहीं पाता। इसी

[02:58:24] तरह इंश्योरेंस कंपनीज पे एक और प्रोफेसर

[02:58:27] ने गलत कंक्लूजन निकाला क्योंकि रेयर

[02:58:29] कैटस्ट्रोफिक लॉसेस डाटा में नहीं दिखते।

[02:58:33] पर एक ही बड़ा इवेंट सब कुछ बर्बाद कर

[02:58:36] सकता है।

[02:58:38] सबसे पहले हर चीज को ऑप्शनलिटी के हिसाब

[02:58:42] से रैंक करिए। जिसमें ज्यादा ऑप्शंस हैं

[02:58:45] उसको ज्यादा वैल्यू दीजिए। दूसरा ओपन

[02:58:48] एंडेड पे ऑफ वाले ऑप्शंस ढूंढिए जिसमें

[02:58:51] प्रॉफिट की लिमिट ना हो। तीसरा किसी भी

[02:58:54] बिजनेस या काम में बिजनेस प्लान पर

[02:58:57] इन्वेस्ट मत करिए। बल्कि ऐसे इंसान पर

[02:59:00] इन्वेस्ट करिए जो छह सात बार अपनी लाइफ

[02:59:03] में बदल चुका हो या बदल सकता है। क्योंकि

[02:59:06] यह लोग सर्वाइव करते हैं, एडप्ट कर लेते

[02:59:09] हैं। यही वेंचर कैपिटलिस्ट की भी अप्रोच

[02:59:12] है। चौथा हमेशा मार्बल स्ट्रेटजी फॉलो

[02:59:16] करिए। मतलब एक्सट्रीम सेफ और एक्सट्रीम

[02:59:20] रिस्क का मिक्स रखिए। बीच का मॉडरेट

[02:59:23] अप्रोच अवॉइड करिए।

[02:59:26] सोसाइटी ने एररिक्स यानी डअर्स

[02:59:29] एक्सपेरिमेंट करने वाले ट्रायल एंड एरर से

[02:59:32] सीखने वाले लोग इनको अंडरवैल्यू किया है।

[02:59:36] उनको शेरन या क्वक बोल दिया। सिर्फ इसलिए

[02:59:40] क्योंकि उन्होंने फॉर्मल थ्यरी या बुक्स

[02:59:42] नहीं लिखी। ऑफिशियल मेडिसिन ने हमेशा

[02:59:46] एंपेरिक्स को अपोज किया। उनको इललीगल या

[02:59:49] लो क्लास दिखाया क्योंकि कंपटीशन की वजह

[02:59:52] से उनका इनकम गिरता था। लेकिन रियलिटी यह

[02:59:55] है कि एररिक्स के ट्रायल एंड एरर टिंकरिंग

[02:59:59] और स्ट्रीट नॉलेज ने मॉडर्न मेडिसिन में

[03:00:01] काफी क्र्स और रेमेडीज दिए

[03:00:05] जो एकेडमिक्स ने साइलेंटली कॉपी भी किया।

[03:00:09] एकेडमिक्स ने अपने फ्रॉड्स को रेशनलाइजेशन

[03:00:12] के कवर में छुपा लिया। पर इंपेरिक्स का

[03:00:15] काम एक्चुअल लोगों को फायदा पहुंचा गया।

[03:00:19] हर नॉन एकेडमिक क्वक नहीं होता और

[03:00:21] एकेडमिक्स भी ऑर्गेनाइज्ड क्वक्स हो सकते

[03:00:24] हैं। क्लासरूम स्किल्स या लडिक यानी गेम

[03:00:29] लाइक स्किल्स लाइफ में ट्रांसफर नहीं

[03:00:31] होती। चेस की स्किल्स चेस बोर्ड पे ही काम

[03:00:34] आती है। रियल लाइफ में नहीं। क्लासरूम में

[03:00:37] जो सीखते हैं वह वहीं रह जाता है। रियल

[03:00:40] वर्ल्ड में ट्रांसलेशन नहीं होता। कभी-कभी

[03:00:43] नुकसान भी हो जाता है।

[03:00:46] जैसे अरथमेटिक सीखने के बाद बच्चे सिंपल

[03:00:49] इंटरवल्स भी गलत गिन लेते हैं। जबकि बिना

[03:00:52] अरथमैटिक वाले सही गिन लेते हैं। सॉकरम

[03:00:57] कल्चर या मॉडर्न एजुकेशन स्ट्रक्चर से

[03:00:59] बच्चों की नेचुरल रैंडमनेस, बायोफीलिया,

[03:01:03] एडवेंचर और एंटीफजिलिटी खत्म हो जाती है।

[03:01:07] स्ट्रक्चर लर्निंग से बच्चे सिर्फ अच्छे

[03:01:09] स्टूडेंट्स बनते हैं। पर एंबिग्विटी या

[03:01:12] रियल वर्ल्ड प्रॉब्लम्स हैंडल नहीं कर

[03:01:14] पाते। रियल फ्रीडम सिर्फ ऑटो डिडक्ट्स

[03:01:18] यानी खुद सीखने वाले के पास है। चाहे वह

[03:01:22] स्कूल में हो या लाइफ में।

[03:01:26] रैंडमनेस, एडवेंचर, सेल्फ डिस्कवरी मिस यह

[03:01:30] सब लाइफ को जीने लायक बनाता है। जबकि

[03:01:32] प्रीसेट स्ट्रक्चरर्ड अपॉइंटमेंट बेस्ड

[03:01:35] लाइफ फेक और झूठी है।

[03:01:39] शेर जंगल में रहते हैं। उनकी लाइफ

[03:01:41] अनप्रिडिक्टेबल एडवेंचर से भारी है। जबकि

[03:01:45] कैपिटिविटी वाले लायंस की लाइफ लॉन्ग और

[03:01:48] सेफ है। पर असली मजा मिसिंग है। सनिका भी

[03:01:52] कहते हैं कि हम लाइफ के लिए नहीं लेक्चर

[03:01:55] रूम के लिए पढ़ते हैं। ज्यादा रशनलिटी

[03:01:58] लाने वाले पॉलिसी मेकर्स या स्ट्रक्चरर्ड

[03:02:01] लाइफ को प्रमोट करने वाले एक्चुअली वर्ल्ड

[03:02:04] को और अनप्रिडिक्टेबल बना देते हैं।

[03:02:07] क्योंकि रैंडमनेस को स्क्वीज़ करने की

[03:02:09] कोशिश करते हैं। मुझे स्टैंडर्डाइज्ड

[03:02:12] एजुकेशन पे कभी भी भरोसा नहीं रहा क्योंकि

[03:02:16] मैंने खुद से पढ़ाई की। मैं प्योर ऑटो

[03:02:20] डिडक्ट रहा। डिग्री लेने के बावजूद भी

[03:02:24] मेरे पापा लेबनन में टॉप स्टूडेंट थे। सब

[03:02:27] उनको इंटेलिजेंट स्टूडेंट कहते थे। पर

[03:02:30] उन्होंने खुद भी स्कूल को ज्यादा वैल्यू

[03:02:32] नहीं दिया और अपने बेटे को भी यानी मुझे

[03:02:35] भी उस एलट जे स्वीट स्कूल में नहीं भेजा।

[03:02:39] ताकि मुझे वही टॉर्चर ना हो जो उन्होंने

[03:02:42] झेला। जो लोग स्कूल में टॉप होते हैं वह

[03:02:45] रियल लाइफ में हमेशा सक्सेसफुल नहीं होते।

[03:02:48] बल्कि कुछ लोग जो क्लास में बॉटम पर थे

[03:02:51] बिजनेस या पॉलिटिक्स में सुपर सक्सेसफुल

[03:02:54] निकले।

[03:02:55] इसलिए खुद नॉलेज के लिए मैं क्यूरियस रहा।

[03:02:58] स्कूल के करिकुलम से बाहर पढ़ाई की और

[03:03:01] बुक्स लाइब्रेरी से खरीद के खुद पढ़ता

[03:03:03] गया। स्कूल वाले स्टूडेंट सिर्फ सिलेबस रट

[03:03:07] लेते हैं। पर असली नॉलेज तो उस सिलेबस के

[03:03:10] बाहर मिलती है।

[03:03:13] स्कूल सिर्फ उन लोगों को सेलेक्ट करता है

[03:03:16] जो बोरिंग और फिक्स्ड टास्क पे ध्यान दे

[03:03:18] सकते हैं। पर जो रियल वर्ल्ड में थोड़ा

[03:03:21] फजीनेस और अनसर्टेनिटी हैंडल नहीं कर

[03:03:24] पाते।

[03:03:26] जैसे जिम के मशीन पर मसल्स बनाना पर रियल

[03:03:29] लाइफ फाइट में काम ना आना। वैसे ही हाई

[03:03:33] ग्रेड्स वाले स्टूडेंट स्ट्रक्चर

[03:03:34] एनवायरमेंट में तो तेज होते हैं। पर असली

[03:03:37] दुनिया में थोड़ा सा चैलेंज आते ही हिल

[03:03:40] जाते हैं। मेरा तरीका यह था कि एग्जाम में

[03:03:43] बस पास होने जितना मिनिमम पढ़िए। बाकी

[03:03:47] पूरा फोकस अपनी क्यूरियोसिटी पर रखिए।

[03:03:50] रैंडम ट्रायल एंड एरर से पढ़िए। जब बुक

[03:03:53] बोर लगने लगे तो तुरंत छोड़िए। दूसरी उठा

[03:03:56] लीजिए। क्योंकि पढ़ना फ्री और एफर्टलेस

[03:03:59] लगना चाहिए। वरना मजा नहीं। यही मेथड अभी

[03:04:03] भी फॉलो करता हूं। अवॉयडेंस ऑफ बोडम इज

[03:04:07] एवरीथिंग।

[03:04:09] मैं स्कूल के सिलेबस से दूर अपनी मर्जी के

[03:04:11] ऑथर्स, फिलॉसफर्स, नवेल्स पढ़ता रहा।

[03:04:15] रीडिंग आवर्स का डेली टारगेट रखता था। और

[03:04:18] जो स्कूल में पढ़ाया गया सब भूल गया। पर

[03:04:21] जो खुद पढ़ा वह अब तक याद है। जब फाइनेंस

[03:04:25] और प्रोबेबिलिटी में इंटरेस्ट आया तो पूरी

[03:04:27] इंटेंसिटी से सिर्फ वही पढ़ाई की। बिना

[03:04:30] किसी कोर्स या फॉर्मल सिलेबस के और इसे

[03:04:34] रैंडम डीप क्यूरियोसिटी से रियलस्ट मिल

[03:04:37] गई।

[03:04:39] असली ट्रेजर हमेशा करिकुलम के बाहर ही

[03:04:42] होता है।

[03:04:47] फैट टोनी का व्यू था कि वह सोक्रेटीस को

[03:04:50] मारने को जस्टिफाई करता है।

[03:04:54] डिफरेंस यह है कि दो तरह की नॉलेज है। एक

[03:04:57] है नैरेटिव इंटेलिजिबल समझने लायक नॉलेज।

[03:05:02] दूसरा है ओपेक थिंकर करके मिलने वाली

[03:05:05] नॉलेज जो एक्सप्लेन नहीं हो सकती। सबसे

[03:05:08] बड़ी गलती यही है कि हम अनइटेलिजिबल

[03:05:13] चीजों को अनइटेेजेंट मान लेते हैं। मतलब

[03:05:17] जो समझ नहीं आता उसको बेकार समझना।

[03:05:20] जबकि रियल वर्ल्ड में बहुत कुछ जो काम

[03:05:23] करता है वह समझने लायक नहीं होता।

[03:05:27] जैसे सोक्रेटीस के यूथफ्रो डेलॉग का एक

[03:05:31] एग्जांपल जिसमें सोक्रेटीस सामने वाले को

[03:05:34] कंफ्यूज करता है बार-बार डेफिनेशन पूछ के

[03:05:39] पर यह एंड नहीं होता क्योंकि कुछ

[03:05:41] कांसेप्ट्स जैसे पीटी की पक्की डेफिनेशन

[03:05:44] मिल ही नहीं सकती और शायद डिस्कशन आज तक

[03:05:48] चलता रहता मतलब हर चीज को वर्ड्स में

[03:05:51] बांधना शब्दों में डिफाइन करना या

[03:05:54] एक्सप्लेन करना पॉसिबल

[03:05:56] लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह चीज बेकार

[03:05:59] है या काम नहीं करती।

[03:06:02] फेट टोनी और सोक्रेटीज दोनों आर्ग्यू करने

[03:06:05] वाले लोग हैं। दोनों को बातें करने का शौक

[03:06:09] है। परफेट टोनी की अप्रोच अलग है।

[03:06:11] सोक्रेटीज डेफिनेशन के पीछे भागते हैं। हर

[03:06:15] चीज को एकजेक्टली समझना चाहते हैं और

[03:06:18] सिर्फ डेफिनेशन ही नॉलेज मानते हैं। फैट

[03:06:21] टोनी कहता है कि सब चीजें शब्दों में

[03:06:24] डिफाइन करना जरूरी नहीं है। सब कुछ

[03:06:27] लैंग्वेज में फिट नहीं होता। जैसे बच्चा

[03:06:30] मां का दूध पीता है बिना डेफिनेशन जाने या

[03:06:33] कुत्ता अपने मालिक से वफादारी करता है

[03:06:36] बिना ओनर डिफाइन किए। फैट टोनी कहता है कि

[03:06:40] जो चीज हम फील कर सकते हैं या कर सकते हैं

[03:06:44] उसके लिए थ्यरी की जरूरत नहीं। सोक्रेटीज

[03:06:48] हर चीज का मतलब फिक्स करना चाहते हैं।

[03:06:51] जबकि फैट टोनी कहता है कि ऐसा करने से हम

[03:06:54] उन चीजों का मैजिक और रियल समझ खो देते

[03:06:58] हैं जो एक्सप्लेन नहीं हो सकती।

[03:07:01] फैट टोनी सोक्रेटीस को बोलते हैं तुम

[03:07:05] लोगों को कंफ्यूज कर रहे हो जो उनका

[03:07:07] नेचुरल इंस्टिंक्ट है या ट्रेडिशंस है

[03:07:10] उसको तोड़ रहे हो बिना उनको बेहतर जवाब

[03:07:13] दिए। सोक्रेटिस का लॉजिक है कि बिना

[03:07:16] डेफिनेशन के हम कुछ भी समझ नहीं सकते और

[03:07:19] हमेशा सोचना और एग्जामिन करना जरूरी है।

[03:07:23] परफेट टोनी बोलता है कि तुम लोगों से उनकी

[03:07:26] इग्नोरेंस का सुकून छीन रहे हो और उनको उन

[03:07:30] चीजों पर शक दिलवा रहे हो जो वह बिना

[03:07:32] प्रॉब्लम के फॉलो कर रहे हैं। यानी कि तुम

[03:07:36] सो कॉल्ड नॉलेज के नाम पर लाइफ की

[03:07:38] सिंपलीसिटी को डिस्ट्रॉय कर रहे हो।

[03:07:43] फिलॉसफी सोक्रेटीस के बाद से थ्यरी और

[03:07:46] कॉनसेप्चुअल नॉलेज पे फोकस करने लग गई जो

[03:07:49] सिर्फ लिखने या एक्सप्लेन करने लायक चीजें

[03:07:52] मानती हैं और प्रैक्टिकल फील बेस्ड या

[03:07:56] इंस्टिअल नॉलेज को साइड पर रख देती हैं।

[03:08:00] नेचर ने भी सोक्रेटीज को क्रिटिसाइज किया

[03:08:03] था। कहा है जो मुझे समझ नहीं आता वह बेकार

[03:08:06] नहीं है। हर चीज एक्सप्लेनेबल हो जरूरी

[03:08:10] नहीं। कुछ चीजें इनडायरेक्ट समझ से बाहर

[03:08:13] होती है पर फिर भी इंटेलिजेंट या

[03:08:15] वैल्यूुएबल होती हैं।

[03:08:18] नेचर कहते हैं कि अपोलोनियन यानी रीजन

[03:08:22] कंट्रोल बैलेंस और डायनोजियन यानी वाइल्ड

[03:08:26] क्रिएटिव इंस्टिंक्ट दोनों इंपॉर्टेंट है।

[03:08:30] बिना डायनोजियन के लाइफ ड्राई हो जाती है।

[03:08:34] नॉलेज और प्रोग्रेस सिर्फ रेशनलिटी से

[03:08:36] नहीं होता। कुछ चीजें रेंडमनेस, केओस और

[03:08:40] इंस्टिंक्ट से आती हैं जो सोक्रेटीस जैसे

[03:08:43] थिंकर्स इग्नोर करते हैं। सनिका भी कहते

[03:08:47] हैं कि ह्यूमन नेचर में इंस्टिंक्ट,

[03:08:50] स्ट्रेंथ और रीजन तीनों है। स्ट्रक्चर

[03:08:54] लर्निंग और फिलॉसफी हमेशा सिंपल और क्लियर

[03:08:58] एक्सप्लेनेशन ढूंढती है। इसलिए नवांस और

[03:09:01] रियल वर्ल्ड कॉम्प्लेक्सिटी को इग्नोर कर

[03:09:03] देती है। इसलिए प्रैक्टिकल वर्ल्ड में जो

[03:09:08] काम करता है उसको एक्सप्लेन नहीं कर सकते

[03:09:11] पर वह फिर भी वैल्यूुएबल है।

[03:09:15] आईडिया यह है कि हर चीज को डिफाइन करना,

[03:09:18] एक्सप्लेन करना या रशनलाइज करने की कोशिश

[03:09:21] में हम असली विडम, इंस्टिंक्ट और

[03:09:24] प्रैक्टिकल काम करने वाली नॉलेज खो देते

[03:09:27] हैं। जो बिना शब्दों के भी समझ आती है।

[03:09:31] फैट टोनी कहता है कि सोक्रेटीज की गलती

[03:09:34] यही थी कि वह सिस्टम को डिस्टर्ब कर रहे

[03:09:37] थे। जब सब ठीक चल रहा था। यानी लोग

[03:09:40] ट्रेडिशन, इंस्टिंक्ट और अनस्पोकन रूल्स

[03:09:44] से लाइफ चला रहे थे। सब चीजें शब्दों में

[03:09:48] एक्सप्लेन नहीं हो सकती। और जब जबरदस्ती

[03:09:51] एक्सप्लेन करते हैं तो इंसान की असली

[03:09:54] इंसानियत मार देती है। बहुत बार लोग सही

[03:09:59] चीज पर फोकस करते हैं पर उनको खुद नहीं

[03:10:01] पता होता कि कैसे फिर भी काम हो रहा होता

[03:10:05] है। सोक्रेटीज को हीरो इसलिए बनाया गया

[03:10:09] क्योंकि वह अपनी सोच पर अड़े थे। पर कुछ

[03:10:12] लोग मानते थे कि सोक्रेटी सोसाइटी के बेस

[03:10:15] तोड़ रहे हैं। जो चीजें हमें एल्डर से

[03:10:18] मिलती हैं, ट्रेडिशंस उनको बिना समझे

[03:10:22] क्वेश्चन करना गलत है। कैटू द एल्डर एक

[03:10:25] प्रैक्टिकल और ट्रेडिशनल लविंग आदमी

[03:10:28] सोक्रेटीस को पसंद नहीं करते थे। कहते थे

[03:10:31] सोक्रेटीज डेमोक्रेसी और कस्टम्स को खत्म

[03:10:34] कर रहे हैं। पुराने जमाने के लोग रशनलिज्म

[03:10:37] से बचने की सलाह देते थे क्योंकि अधूरा

[03:10:40] ज्ञान सबसे डेंजरस होता है।

[03:10:44] बाद के थिंकर्स जैसे एडममंड बर्क ओकश

[03:10:48] जोसेफ डी मेस्त्रे सब ट्रेडिशन को वैल्यू

[03:10:51] करते थे। इनके हिसाब से ट्रेडिशन में

[03:10:54] कलेक्टिव फिल्टर्ड नॉलेज होती है। सोसाइटी

[03:10:58] को स्टेबल रखती है। विडगंस्टीन कहते हैं

[03:11:01] कि सब कुछ शब्द में नहीं आता। कुछ चीजें

[03:11:05] एक्सप्रेस ही नहीं हो सकती। हक कहते थे कि

[03:11:08] सोसाइटी की नॉलेज मार्केट के ट्रांजैक्शन

[03:11:11] में छुपी है। पर उन्होंने ऑप्शनलिटी को

[03:11:14] समझा नहीं। लेवस्ट्रस दिखाते हैं कि

[03:11:18] ट्रेडिशनल नॉन लिटरेट सोसाइटीज भी अपनी

[03:11:21] होलिस्टिक साइंस फॉलो करती थी जो किसी भी

[03:11:25] मॉडर्न साइंस से कम नहीं। जॉन ग्रे

[03:11:28] एनलाइटमेंट को इल्ल्यूजन मानते हैं। कहते

[03:11:31] हैं कि साइंस का प्रोग्रेस भी कभी-कभी बस

[03:11:34] एक धोखा होता है।

[03:11:37] फैट टोनी के लिए असली बात ट्रू या फॉल्स

[03:11:40] नहीं बल्कि सकर या नॉन सकर है। लाइफ में

[03:11:44] एक्सपोज़र, रिस्क या रिवॉर्ड ज्यादा

[03:11:47] इंपॉर्टेंट है ना कि नॉलेज। जो पे ऑफ होता

[03:11:51] है यानी आपको क्या मिलता है नुकसान होता

[03:11:54] वही सबसे इंपॉर्टेंट है। नॉट जस्ट लॉजिकल

[03:11:58] सच या झूठ।

[03:12:00] डिसीजंस कभी प्रोबेबिलिटी पर नहीं हमेशा

[03:12:02] कॉन्सिक्वेंस पे लिए जाते हैं। जैसे

[03:12:05] एयरपोर्ट पे हर किसी को चेक करते हैं

[03:12:08] क्योंकि टेररिज्म का नुकसान बहुत बड़ा है।

[03:12:11] चाहे चांस कम हो। प्लेन क्रैश का चांस 1%

[03:12:15] हो तो भी लोग नहीं बैठते क्योंकि लॉस

[03:12:18] ह्यूज है। यानी लाइफ में हम हमेशा

[03:12:21] फ्रेजिलिटी देखते हैं ना कि प्रोबेबिलिटी

[03:12:24] या ट्रू या फॉल्स।

[03:12:28] यह प्रॉब्लम ग्रीन लंब फैलेसी जैसी है।

[03:12:32] लोग सोचते हैं कि एक इवेंट और उसका

[03:12:34] एक्सपोज़र सेम चीज है। पर असल में फर्क है।

[03:12:38] प्रेडिक्टर्स हमेशा इवेंट प्रेडिक्ट करने

[03:12:40] की कोशिश करते हैं। पर्सनली स्मार्टनेस

[03:12:43] एक्सपोज़र चेंज करने में है। ट्रेडिशनल

[03:12:46] सोसाइटीज और रिलीजंस इस चीज को बेटर हैंडल

[03:12:50] करते हैं।

[03:12:53] यूनिवर्सिटीज और ऑर्गेनाइज्ड रिसर्च की

[03:12:56] बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लोग जो बोलते

[03:12:59] हैं कि यही प्रोग्रेस लाते हैं उनका कोई

[03:13:03] प्रूफ नहीं। उनकी सोच में ऑप्शन या सेकंड

[03:13:07] ऑर्डर इफेक्ट्स नहीं होता। इसलिए उनकी

[03:13:09] बातें इनकंप्लीट है। एजुकेशन आजकल एक

[03:13:13] स्टेटस सिंबल बन गई है। हार्व या

[03:13:16] स्टैनफोर्ड अब एक लुई विटॉन बैग की तरह

[03:13:19] है। जिससे मिडिल क्लास पेरेंट्स अपनी

[03:13:21] सेविंग्स खर्च करके खरीदते हैं। लेकिन

[03:13:24] सोसाइटी को एक्चुअल फायदा नहीं मिलता।

[03:13:27] स्टूडेंट लोंस भी सिस्टम को स्क्वीज कर

[03:13:30] रहे हैं। पर यह सब एक स्कैम की तरह है जो

[03:13:33] लंबा नहीं चलेगा। टाइम और हिस्ट्री सब कुछ

[03:13:37] एक्सपोज कर देती है और फ्रजाइल सिस्टम्स

[03:13:40] हमेशा टूट जाते हैं।

[03:13:49] मेरी पूरी लाइफ का फोकस हिडन नॉन

[03:13:52] लीनियरिटीज पे रहा है। यानी लाइफ में हर

[03:13:56] चीज सीधी लाइन की तरह नहीं चलती। जब

[03:13:59] इंटेंसिटी या क्वांटिटी बढ़ाते हैं तो

[03:14:01] इफेक्ट उतना सिंपल नहीं बढ़ता। यह नॉन

[03:14:04] लीनियरिटी है। मैंने अपनी पहली बुक

[03:14:08] डायनेमिक हेजिंग एटिक में लिखा। वहां मुझे

[03:14:12] लगा कि यह मेथड फाइनेंस के बाहर भी यूज़ हो

[03:14:14] सकता है। पर उस टाइम वो आईडिया पूरा

[03:14:18] क्लियर नहीं था। जब फाइनेंस एकेडमिक्स ने

[03:14:21] मेरी बुक अलग-अलग रीजन से रिजेक्ट की तब

[03:14:24] मुझे समझ आया कि जब सब लोग अलग-अलग रीजन

[03:14:28] से मना करते हैं तब कुछ नया हो सकता है।

[03:14:32] यही एंटीफजिलिटी है। उसके बाद मेरा

[03:14:35] इंटरेस्ट थोड़ा शिफ्ट हो गया और फिर

[03:14:38] पब्लिक लाइफ और मीडिया ने तंग करके फिर से

[03:14:41] मुझे सॉलिट्यूड में ला दिया और तब मुझे

[03:14:44] रियलाइजेशन हुआ कि नॉन लीनियरिटी हर जगह

[03:14:47] काम करती है।

[03:14:49] पोशलिन कप एक एग्जांपल है। यह कप चाहता है

[03:14:53] कि उसको छेड़ा ना जाए। उसको शांति चाहिए

[03:14:57] क्योंकि उसको शॉक्स या वेरिएबिलिटी नहीं

[03:14:59] पसंद। मतलब फ्रजाइल चीजें हमेशा

[03:15:02] वोलेटिलिटी से डरती हैं। क्योंकि एक बड़ा

[03:15:05] शौक छोटी-छोटी मल्टीपल शॉक से ज्यादा

[03:15:08] नुकसान करता है।

[03:15:11] एक स्टोरी भी है। किंग अपने बेटे को एक

[03:15:14] बड़ा पत्थर मारने का वादा करता है। पर बाद

[03:15:17] में वह पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े में

[03:15:20] तोड़ के बेटे को मारते हैं। तो हार्म कम

[03:15:24] हो जाता है। यहां समझ आता है कि एक ही

[03:15:27] बड़े शॉक का डैमेज बहुत ज्यादा होता है।

[03:15:30] कंपेयर टू मल्टीपल छोटे शॉक्स। यही नॉन

[03:15:34] लीनियरिटी है। मैं आपको एक सिंपल रूल

[03:15:37] बताता हूं। फ्रजाइल चीजें जितना बड़ा शॉक

[03:15:41] होती है उतना ही ज्यादा नुकसान होता है और

[03:15:45] यह रिलेशन सीधा नहीं कर्व होता है। कार

[03:15:49] वॉल से 50 मील पर आवर पर टकराती है तो

[03:15:53] डैमेज 10 टाइम्स 5 एमपीएस से टकराने से

[03:15:57] होता है। सात बोतल्स एक दिन में पीना एक

[03:16:00] बोतल रोज पीने से ज्यादा खराब करेगा।

[03:16:04] एक फुट से कप गिराना 1 इंच से 12 बार

[03:16:08] गिराने से ज्यादा डैमेज करेगा। यानी टोटल

[03:16:12] स्मॉल शॉक्स का इफेक्ट हमेशा एक बड़े शॉक

[03:16:16] से कम होता है। यही रियल फ्रजिलिटी है।

[03:16:22] फ्रिजिलिटी इसी वजह से नॉन लीनियर होती

[03:16:25] है। क्योंकि अगर हार्म लीनियर होता तो

[03:16:28] छोटे-छोटे शॉक्स मिलके भी चीज तोड़ देते।

[03:16:32] लेकिन रियल लाइफ में चीजें स्माल शॉक्स

[03:16:34] टोलरेट कर लेती हैं और एक बड़ा शॉक में

[03:16:38] टूट जाती हैं। इसी तरह ब्लैक स्वन इवेंट्स

[03:16:41] यानी एक्सट्रीम रेयर इवेंट्स फ्रजाइल

[03:16:44] चीजों के लिए सबसे डेंजरस होते हैं।

[03:16:48] फ्रजाइल का उल्टा है वहां बड़े शॉक से

[03:16:51] ज्यादा फायदा होता है।

[03:16:54] वेट लिफ्टिंग का एग्जांपल

[03:16:57] कि 100 पाउंड्स एक बार उठाना 50 पाउंड्स

[03:17:00] दो बार उठाने से ज्यादा बेनिफिट देता है।

[03:17:03] यानी जब बेनिफिट या हार्म इनक्रीस नॉन

[03:17:07] लीनियरली होता है तब एंटी फ्रजाइल या

[03:17:10] फ्रजाइल बिहेवियर दिखाई देता है। यही

[03:17:14] सिंपल कर्व और नॉन लीनियरिटी हर चीज पर

[03:17:17] अप्लाई होती है। मेडिकल एरर्स, गवर्नमेंट

[03:17:20] साइज, इनोवेशन, अनसर्टेनिटी सब कुछ। यानी

[03:17:24] रियल विज़डम यही है कि नॉन लिनियरिटी समझिए

[03:17:27] और कैसे चीजें छोटे शॉक्स और बड़े शॉक्स पर

[03:17:31] डिफरेंटली रिएक्ट करती हैं। यह पहचानिए।

[03:17:38] नॉन लीनियरिटी दो तरह की होती है। कॉनकेव

[03:17:41] यानी अंदर की तरफ कर्व करती है। जैसा सैड

[03:17:45] फेस यह फ्रजाइल होती है और कॉन्वेक्स यानी

[03:17:49] बाहर की तरफ कर्व करती है। जैसे स्माइली

[03:17:52] फेस यह एंटी फ्रजाइल होती है। जब किसी चीज

[03:17:56] का अपसाइड डाउन साइड से ज्यादा होता है तो

[03:17:59] उसका ग्राफ कॉन्वेक्स यानी स्माइल होगा।

[03:18:02] और जब डाउन साइड ज्यादा होगा तो कॉनकेव

[03:18:05] यानी फ्राउन होगा। कॉन्वेक्सिटी इफेक्ट

[03:18:08] मतलब जब आपको फ्लक्चुएशन से ज्यादा फायदा

[03:18:11] होता है और कॉनकेविटी इफेक्ट मतलब आपको

[03:18:14] फ्लक्चुएशन से ज्यादा नुकसान होता है।

[03:18:18] इसलिए कॉन्वेक्स वाले फ्लक्चुएशन से खुश

[03:18:21] होते हैं। कॉनकेव वाले दुख से भर जाते

[03:18:24] हैं। कॉनकेव यानी फ्रजाइल चीजें ब्लैक

[03:18:28] स्ान या बड़े अनएक्सेक्टेड शॉक से बहुत

[03:18:32] ज्यादा हार्म होती हैं। छोटी-छोटी

[03:18:35] वेरिएबिलिटी से उतना नहीं। जितना ज्यादा

[03:18:38] कॉनकेविटी उतना ही बुरा रिजल्ट बड़े शौक

[03:18:41] से मिलता है। इसका रियल लाइफ एग्जांपल

[03:18:44] ट्रैफिक में मिलता है। सुबह-सुबह

[03:18:46] न्यूयॉर्क का ट्रैफिक कम होता है। पर जैसे

[03:18:49] ही कार्स का नंबर थोड़ा बढ़ता है, एक

[03:18:52] पॉइंट के बाद ट्रैवल टाइम अचानक बहुत बढ़

[03:18:55] जाता है। थोड़ा-थोड़ा बढ़ने पर कोई फर्क

[03:18:58] नहीं पड़ता। पर जब थ्रेशहोल्ड क्रॉस हो

[03:19:00] गया तो हर एक्स्ट्रा कार ट्रेवल टाइम को

[03:19:04] डिस प्रोपोशनली बढ़ा देती है। यह नॉन

[03:19:08] लीनियर कॉनकेव इफेक्ट है। इसी तरह

[03:19:11] सिस्टम्स जो ओवर ऑप्टिमाइज्ड होते हैं

[03:19:14] जैसे एयरपोर्ट, रेलवे थोड़ा ज्यादा लोड पर

[03:19:17] कोलैप्स कर जाते हैं। यह समझना इंपॉर्टेंट

[03:19:20] है क्योंकि मैक्सिमम कैपेसिटी पर काम करना

[03:19:23] छोटी सी प्रॉब्लम को बहुत बड़े लॉस में

[03:19:26] बदल सकता है।

[03:19:29] और यह प्रिंस पल हर जगह अप्लाई होता है।

[03:19:32] सिटीज और कंपनीज छोटी से बड़ी होती हैं तो

[03:19:36] बस साइज ही नहीं बढ़ता। उनका नेचर भी बदल

[03:19:39] जाता है। यानी मोर इज डिफरेंट।

[03:19:43] छोटे-छोटे टाउनंस का एक बड़ा सिटी बना

[03:19:47] दीजिए तो टोटली डिफरेंट प्रॉब्लम्स आएंगी

[03:19:50] और वह छोटी जगह के प्रॉब्लम्स का सिंपल

[03:19:52] एडिशन नहीं होता। इसीलिए बैलेंस्ड मील का

[03:19:56] कांसेप्ट भी उतना सही नहीं है। क्योंकि जब

[03:19:59] हम हर दिन एक ही न्यूट्रिएंट्स रेगुलरिटी

[03:20:02] से खाते हैं तो शायद उतना बेनिफिट नहीं

[03:20:05] मिलता जितना वेरिएबिलिटी और फास्टिंग या

[03:20:07] फिस्टिंग साइकिल से मिलता है। क्योंकि

[03:20:10] बायोलॉजिकल रिस्पांस भी नॉन लीनियर होता

[03:20:12] है।

[03:20:16] और एक्सरसाइज का एग्जांपल भी ऐसा ही है।

[03:20:20] दो लोग सेम डिस्टेंस सेम टाइम में ट्रैवल

[03:20:22] करते हैं। एक स्लो वॉक करता है, एक चिल

[03:20:26] करता है और लास्ट में स्प्रिंट करता है।

[03:20:29] दोनों की एवरेज स्पीड सेम है। पर स्प्रिंट

[03:20:32] करने वाले को ज्यादा हेल्थ बेनिफिट मिलता

[03:20:34] है क्योंकि हेल्थ गेंस कॉन्वेक्स होती हैं

[03:20:37] स्पीड के साथ। थोड़ा फास्ट करेंगे तो

[03:20:40] ज्यादा बेनिफिट मिलेगा।

[03:20:43] मेरा मानना है कि स्मॉल इज ब्यूटीफुल के

[03:20:46] पीछे लॉजिक यही है कि छोटी चीजें कम

[03:20:49] फ्रजाइल होती हैं। बड़ा साइज सिस्टम में

[03:20:52] रैंडमनेस या शॉक से बड़ी मुसीबत आ सकती है

[03:20:56] क्योंकि कॉनकेविटी ज्यादा हो जाती है।

[03:21:00] इसलिए हर चीज में कॉन्वेक्सिटी या

[03:21:03] कॉनकेविटी यानी स्माइली या सैड फेस वाले

[03:21:07] करो को समझना रियल वर्ल्ड में डिसीजन और

[03:21:10] रिस्क लेने का मेन टूल है। जब इंसान के

[03:21:15] पास कोई चॉइस नहीं बची होती और तुरंत कोई

[03:21:17] काम करना पड़ता है। चाहे कितना भी महंगा

[03:21:21] हो उस सिचुएशन को सीक्वेंस कहते हैं। जैसे

[03:21:24] सोचिए आपको अर्जेंटली जर्मनी जाना है।

[03:21:27] सस्ती फ्लाइट बुक कर ली। पर एक प्रॉब्लम

[03:21:30] की वजह से आपको आखिरी मोमेंट पर दूसरी

[03:21:33] फ्लाइट लेनी पड़ती है और उसका दाम 10

[03:21:36] टाइम्स ज्यादा है तो मजबूरी में पैसा खर्च

[03:21:39] करना पड़ता है। यह स्क्वीज है। साइज बढ़ने

[03:21:43] से स्क्वीज़ और भी खतरनाक हो जाता है और

[03:21:47] कॉस्ट नॉन लीनियरली बढ़ जाता है।

[03:21:52] जैसे घर में बिल्ली या कुत्ता रखेंगे तो

[03:21:56] स्ट्रेस टाइम में ज्यादा खर्चा नहीं होता।

[03:21:59] लेकिन एलीिफेंट रख लिया तो पानी या

[03:22:01] रिसोर्सेज की कमी में आपकी वाट लग जाएगी।

[03:22:05] क्योंकि हर एक गैलन पानी की कीमत बढ़ती

[03:22:07] जाएगी। बड़ा साइज का मतलब ज्यादा हिडन

[03:22:11] रिस्क जिसे हम समझ नहीं पाते। बिजनेस में

[03:22:15] भी यही होता है। बड़े कॉरपोरेशंस या

[03:22:17] मर्जर्स सपोजिटली एफिशिएंट दिखते हैं।

[03:22:21] लेकिन स्ट्रेस टाइम में उनकी फ्रजिलिटी

[03:22:24] सामने आती है। डाटा दिखाता है कि बड़े

[03:22:27] साइज की वजह से कंपनीज को फायदा नहीं

[03:22:30] नुकसान होता है। एिफेंट टाइप कंपनीज जैसे

[03:22:34] बड़े बक्स ज्यादा फ्रजाइल होते हैं। जैसे

[03:22:38] सोसाइट जनरली बैंक का केस हुआ था। उनको एक

[03:22:42] दिन में 70 बिलियन डॉलर की स्टक्स बेचनी

[03:22:45] पड़ी। रिजल्ट हुआ 6 बिलियन डॉलर का लॉस

[03:22:49] क्योंकि उनके पास वेट करने का ऑप्शन नहीं

[03:22:51] था। सब तुरंत करना पड़ा।

[03:22:55] अगर वही चीज छोटे बैंक्स में होती तो कोई

[03:22:58] बड़ा नुकसान नहीं होता। तो लेसन यह है कि

[03:23:01] एक बड़ा स्टोन ज्यादा नुकसान करेगा। पर

[03:23:05] उतने ही वेट के पेबल्स छोटे-छोटे नुकसान

[03:23:08] करेंगे जो मैनेजेबल है। प्रोजेक्ट

[03:23:11] मैनेजमेंट में भी देखिए जैसे ब्रिजेस या

[03:23:14] डैम्स जो एक पीस में बनते हैं उनमें डिले

[03:23:17] और कॉस्ट का रिस्क नॉन लीनियरिटी बढ़ जाती

[03:23:20] है। पर रोड जो टुकड़ों में बनती है उसमें

[03:23:23] यह रिस्क कम होता है। इसी तरह बड़े सुपर

[03:23:27] मार्केट्स या सुपर स्टोर्स एरिया को

[03:23:30] रिवाइव कर सकते हैं। पर अगर वह बंद हो गए

[03:23:33] तो पूरा एरिया डेड हो जाएगा। छोटे शॉप्स

[03:23:37] में ऐसा रिस्क नहीं होता। एग्जिट का

[03:23:39] एग्जांपल भी है। मूवी थिएटर में अगर फायर

[03:23:43] हो गया और सब लोग एक साथ भाग रहे हैं तो

[03:23:45] ज्यादा लोग एक साथ एग्जिट करने की कोशिश

[03:23:48] करेंगे तो कुछ लोग मर भी सकते हैं क्योंकि

[03:23:51] हर एक्स्ट्रा आदमी नुकसान को ज्यादा बड़ा

[03:23:54] कर देता है।

[03:23:58] फ्लाइट्स के एग्जांपल में भी ऐसा ही है।

[03:24:00] प्लेन कभी ज्यादा जल्दी नहीं पहुंचता पर

[03:24:03] लेट जरूर होता है। डिले होने के चांसेस

[03:24:06] हमेशा ज्यादा होते हैं। टाइम नेगेटिव नहीं

[03:24:09] हो सकता। इसीलिए अनसर्टेनिटी या शॉक का

[03:24:13] इफेक्ट एक तरफ से ही आता है। ज्यादा लेट

[03:24:16] होता है। जल्दी नहीं। प्रोजेक्ट्स में भी

[03:24:20] अनसर्टेनिटी के साथ हमेशा टाइम बढ़ता है।

[03:24:24] कम नहीं होता। पहले के जमाने में

[03:24:26] प्रोजेक्ट छोटे और सिंपल होते थे। पार्ट्स

[03:24:30] लोकल होते थे। इसलिए ढीले कम होता था। अब

[03:24:33] सिस्टम कॉम्प्लेक्स है। इंटरडिपेंडेंस,

[03:24:36] एफिशिएंसी का प्रेशर, हाईटी का यूज हर जगह

[03:24:40] नॉन लीनियर रिस्क बढ़ गए हैं। तो डिले और

[03:24:44] नुकसान भी ज्यादा होने लगे हैं।

[03:24:49] प्लानिंग फैलेसी के नाम पर साइकोलॉजी को

[03:24:52] ब्लेम किया जाता है। पर असली प्रॉब्लम नॉन

[03:24:55] लीनियरिटी में है। कॉम्प्लेक्सिटी, साइज,

[03:24:58] इंटरकनेक्टेडनेस से आजकल के प्रोजेक्ट्स

[03:25:01] हमेशा ज्यादा टाइम लेते हैं। अर्ली

[03:25:04] कंप्लीट होना तो ऑलमोस्ट इंपॉसिबल है।

[03:25:07] कहीं भी ऑप्टिमाइजेशन या एफिशिएंसी के

[03:25:10] चक्कर में साइज बढ़ा दिया तो स्क्वीज और

[03:25:14] नुकसान दोनों का रिस्क बढ़ जाता है।

[03:25:19] वर्ल्ड वॉर वन और टू दोनों में ही कंट्रीज

[03:25:22] ने सोचा था कि वॉर कुछ महीने चलेगा। पर जब

[03:25:25] तक खत्म हुआ तो फ्रांस, ब्रिटेन जैसे देश

[03:25:30] 10 टाइम्स ज्यादा कर्ज में डूब गए। जो

[03:25:32] सोचा था उससे कई ज्यादा खर्चा हो गया।

[03:25:36] इराक वॉर का भी सेम केस है। इनिशियल

[03:25:39] एस्टीमेट था 306 बिलियन डॉलर पर असली

[03:25:43] खर्चा 2 ट्रिलियन डॉलर से भी ज्यादा हो

[03:25:46] गया। क्योंकि इनडायरेक्ट कॉस्ट चेन

[03:25:48] रिएक्शन की तरफ बढ़ते गए। जब सिस्टम

[03:25:51] कॉम्प्लेक्स हो और असिमेट्री हो तो एरर भी

[03:25:54] एक्सप्ललोड करते हैं। मिलिट्री जितनी बड़ी

[03:25:58] कॉस्ट ओवर रंस उतने ही डिस्रपोशनली बड़ी।

[03:26:03] यह सिर्फ वॉर का सीन नहीं है। गवर्नमेंट

[03:26:06] के लगभग हर बड़े प्रोजेक्ट में

[03:26:08] अंडरएस्टीमेट होता है। कॉस्ट कंट्रोल नहीं

[03:26:12] होती। इसलिए गवर्नमेंट पर पैसा हैंडल करने

[03:26:15] का भरोसा नहीं करना चाहिए। सशन है कि

[03:26:19] गवर्नमेंट को कभी बोरो करने ही ना दो।

[03:26:21] हमेशा फिजिकल बैलेंस पर रहे।

[03:26:25] आजकल की एफिशिएंसी भी असल में खतरनाक हो

[03:26:28] सकती है। क्योंकि जब सिस्टम फ्रजाइल होता

[03:26:30] है तो छोटी सी गलती का खर्चा बहुत बड़ा हो

[03:26:33] जाता है।

[03:26:35] जैसे शेयर मार्केट में ट्रेडर्स को

[03:26:38] कंप्यूटरटर्स ने रिप्लेस किया। पर जब

[03:26:40] कंप्यूटर फेल हुआ तो मार्केट क्रैश हो

[03:26:43] गया। जैसे नाइट कैपिटल का केस जिसमें $

[03:26:46] मिलियन पर मिनट का लॉस हुआ। न कॉस्ट

[03:26:50] बेनिफिट एनालिसिस भी साइज के साथ डेंजरस

[03:26:53] हो जाता है। फ्रांस ने न्यूक्लियर एनर्जी

[03:26:56] को क्लीन सोच के ऑप्ट किया। पर फोकशीमा

[03:27:01] डिजास्टर के बाद उन्हें सेफ्टी फीचर्स में

[03:27:03] एक्स्ट्रा पैसा लगाना पड़ा। जो इनिशियल

[03:27:06] कैलकुलेशन में कंसीडर ही नहीं था। जब

[03:27:09] स्क्वीज आता है तो मजबूरी में कुछ भी खर्च

[03:27:12] करना पड़ता है। पोलशन का नुकसान भी नॉन

[03:27:16] लीनियर है। थोड़ा पोलशन से कुछ नहीं होता

[03:27:20] लेकिन ज्यादा से इको सिस्टम का सत्यानाश

[03:27:23] हो जाता है। इसलिए पोलशन को डायवर्सिफाई

[03:27:27] करिए। छोटे-छोटे सोर्सेस रखिए। एक जगह से

[03:27:30] ज्यादा मत करिए। एनसेेस्ट लोग जैसे एल्यूट

[03:27:34] ट्राइब प्र स्विचिंग करते थे। रिसोर्स

[03:27:37] खत्म लगने पर दूसरा रिसोर्स यूज कर लेते

[03:27:40] थे ताकि इकोसिस्टम बैलेंस रहे। आज

[03:27:43] ग्लोबलाइजेशन की वजह से सब लोग एक ही चीज

[03:27:47] पर कंसंट्रेट करते हैं। जो प्लनेट पर

[03:27:50] बर्डन बढ़ा रहा है। जब सब एक ही चीज पे

[03:27:54] भिड़ते हैं तो शॉर्टेज, प्राइस, स्पाइक और

[03:27:58] एक्सटिंशन होती है।

[03:28:01] वेल्थ भी नॉन लीनियर है। ज्यादा पैसा होने

[03:28:05] से सिर्फ कंफर्ट नहीं बढ़ता।

[03:28:07] अनप्रिडिक्टबिलिटी और प्रॉब्लम्स भी बढ़

[03:28:09] जाती हैं। जैसे 100 मिलियन डॉलर के

[03:28:13] प्रोजेक्ट में रिस्क डिले और

[03:28:15] अनप्रिडिक्टबिलिटी 5 मिलियन डॉलर के

[03:28:18] प्रोजेक्ट से कई गुना ज्यादा होती है।

[03:28:21] जीडीपी ग्रोथ का भी साइड इफेक्ट है।

[03:28:24] ज्यादा पैसे का मतलब ज्यादा

[03:28:25] कॉम्प्लेक्सिटी, ज्यादा प्रॉब्लम्स।

[03:28:29] कंक्लूजन यह है कि फ्रजिलिटी हर डोमेन में

[03:28:32] नॉन लीनियर इफेक्ट्स की वजह से आती है। कप

[03:28:35] हो, ऑर्गेनिज्म हो, सिस्टम हो, कंट्री हो

[03:28:39] या कोई भी प्रोजेक्ट हो।

[03:28:42] नॉन लीनियर डैमेज यानी बड़ा एक ही शौक का

[03:28:46] नुकसान छोटे शक्स के टोटल नुकसान से कई

[03:28:51] गुना ज्यादा होता है। डिस्कवरी

[03:28:54] अनप्रिडिक्टबिलिटी से फायदा उठाता है। वो

[03:28:57] फ्रजाइल का अपोजिट है। रैंडमनेस से पैदा

[03:29:01] होता है।

[03:29:03] फ्रिजिलिटी को डिटेक्ट करने का सिंपल रूल

[03:29:06] है कि अगर सिस्टम में थोड़ा चेंज आपको

[03:29:08] नॉर्मल लगता है पर थोड़ा और चेंज बहुत

[03:29:11] बड़ा नुकसान करता है डैमेज एक्सलरेट करता

[03:29:15] है तो वह सिस्टम फ्रजाइल है। जैसे फनी मे

[03:29:20] का रिस्क रिपोर्ट ऊपर की तरफ इकोनॉमिक

[03:29:23] वेरिएबल जाता तो हर स्टेप पे लॉस और

[03:29:26] ज्यादा होता। नीचे आता तो प्रॉफिट कम

[03:29:29] मिलता। यह कॉनकेव कर्व का सिग्नल था इसलिए

[03:29:33] कंपनी बस्ट होने वाली थी। ऐसे ही ट्रैफिक

[03:29:37] में कार्स बढ़ने से अगर ट्रैवल टाइम

[03:29:39] ज्यादा फास्ट बढ़ा है तो ट्रैफिक सिस्टम

[03:29:42] फ्रजाइल है।

[03:29:44] सेम लॉजिक डेफिशिट में गवर्नमेंट बोरोइंग

[03:29:48] में कंपनीज के प्रॉफिट लॉस में भी अप्लाई

[03:29:51] होता है। लॉस एक्सलरेट होता है जब सेल्स

[03:29:54] या इकॉनमी में थोड़ा और गिरावट आती है।

[03:29:58] मेरी असली स्पेशलिटी है मॉडल में एरर को

[03:30:01] समझना। जब मैं ट्रांजैक्शन काम में था,

[03:30:05] बहुत बार गलती हो जाती थी। जैसे 1000

[03:30:08] यूनिट बाय करने का सोचा पर गलती से 2000

[03:30:12] बाय हो गया। अगर प्राइस ऊपर गया तो

[03:30:15] प्रॉफिट नीचे गया तो लॉस। लेकिन ऐसे एरर्स

[03:30:18] दोनों साइड हो सकते हैं। इसलिए लॉन्ग रन

[03:30:20] में न्यूट्रल हो जाते हैं। ज्यादा फर्क

[03:30:23] नहीं पड़ता। और क्योंकि हर एक ट्रांजैक्शन

[03:30:26] छोटा होता है। एरर भी छोटा रहता है। पर जो

[03:30:29] चीजें फ्रजाइल है उनमें नेगेटिव

[03:30:31] कॉन्वेक्सिटी का इफेक्ट होता है। मतलब एरर

[03:30:35] या डिस्टरबेंस से नुकसान एक तरफ ही होता

[03:30:37] है। फायदा नहीं होता।

[03:30:40] प्लेन ज्यादा लेट लैंड होता है। जल्दी

[03:30:43] नहीं। वॉर ज्यादा खराब होती है। अच्छी

[03:30:46] नहीं। ट्रैफिक का डिस्टरबेंस ट्रैवल टाइम

[03:30:49] बढ़ाता है। कम नहीं करता।

[03:30:53] यह वन साइडेडनेस, एरर और नुकसान को

[03:30:56] अंडरएस्टेट करने का रीजन है क्योंकि

[03:31:00] नुकसान की प्रोबेबिलिटी ज्यादा होती है और

[03:31:02] बेनिफिट कम या जीरो होता है। मतलब अगर

[03:31:06] रैंडमनेस दोनों तरफ से आया तो भी आपको

[03:31:09] नुकसान ज्यादा होता है। फायदा कम।

[03:31:14] इसलिए जो ट्रेड का लॉजिक है वह सिंपल है

[03:31:17] कि कुछ चीजें डिस्टरबेंसेस को पसंद करती

[03:31:20] हैं। जैसे इवोल्यूशन डिस्कवरी कुछ

[03:31:23] न्यूट्रल होती है और कुछ को नुकसान होता

[03:31:25] है। जैसे फॉरकास्ट, ट्रैवल टाइम, डेफिसिट।

[03:31:30] एयरलाइंस ने बफर डालकर इस प्रॉब्लम को

[03:31:33] सॉल्व किया पर गवर्नमेंट्स नहीं कर पाई।

[03:31:37] यह मेथड हर जगह अप्लाई होता है। छोटे

[03:31:39] प्रोबेबिलिटीज में भी इसे फकुशीमा

[03:31:42] डिजास्टर। वहां कैलकुलेशन में थोड़ा सा

[03:31:45] एजमशन बदलने से प्रोबेबिलिटी

[03:31:48] 10,000 टाइम्स बढ़ सकती है। मतलब जब भी

[03:31:52] मॉडल में छोटा चेंज बड़ा इफेक्ट लाता है,

[03:31:55] एक्सलरेशन होती है, तो समझ जाइए कि मिडिल

[03:31:58] फ्रजाइल है। जैसे फेनी में केस में हुआ।

[03:32:02] मॉडलर्स ब्लू अप हो जाते हैं ब्लैक स्वान

[03:32:06] इवेंट से।

[03:32:08] मतलब ज्यादातर इकोनॉमिक इक्वेशंस और

[03:32:12] इकोनमेट्रिक्स की पढ़ाई बेकार है। बस

[03:32:15] शलेंटिज्म है। फ्रजिलिता हमेशा फ्रजाइल

[03:32:19] रहते हैं। एक और कांसेप्ट है एवरेज का

[03:32:23] मतलब फ्रजाइल चीजों में कुछ नहीं होता।

[03:32:25] जैसे अगर रिवर का एवरेज डेप्थ 4 फीट है पर

[03:32:29] बीच में कहीं 10 फीट है तो क्रॉस करने

[03:32:32] वाले डूब सकते हैं।

[03:32:35] या दादी को एवरेज टेंपरेचर 70 डिग्री

[03:32:39] फारेनहाइट पर रखना है। लेकिन अगर एक घंटा

[03:32:42] जीरो पे और दूसरा घंटा 140 पे रखा तो

[03:32:46] एवरेज 70 है। पर दादी गई काम से। मतलब

[03:32:50] फ्रजाइल चीजों में एवरेज की जगह

[03:32:52] स्टेबिलिटी मैटर करती है। वेरिएबिलिटी

[03:32:55] नुकसान करती है। यह नेगेटिव कॉन्वेक्सिटी

[03:32:59] इफेक्ट है। मतलब कर्व अंदर की तरफ है।

[03:33:02] रिस्पांस लीनियर नहीं है। जितनी ज्यादा

[03:33:06] नॉन लीनियरिटी उतना एवरेज बेकार और

[03:33:09] स्टेबिलिटी ज्यादा इंपॉर्टेंट।

[03:33:12] सिंपलीफाइड मॉडल जो एवरेज दिखाता है वह

[03:33:15] प्रोकस्टियन बेड बन जाता है। सिचुएशन को

[03:33:19] गलत दिखाता है और नुकसान करता है।

[03:33:22] फिलॉसफर्स स्टोन की तरह एक प्रॉपर्टी है।

[03:33:26] ऑप्शन

[03:33:27] जो भी चीज के पास ऑप्शन है या कॉन्वेक्स

[03:33:31] पे ऑफ है उसको लॉन्ग टर्म में अनसर्टेनिटी

[03:33:34] में एज मिलती है। मतलब अगर आपका फंक्शन

[03:33:38] कॉन्वेक्स है तो एवरेज ऑफ फंक्शन हमेशा

[03:33:41] फंक्शन ऑफ एवरेज से ज्यादा होता है। फॉर

[03:33:44] एग्जांपल

[03:33:46] डाइस पे वन से सिक्स का एवरेज निकालिए।

[03:33:49] फिर उसका स्क्वायर करिए तो रिजल्ट कुछ

[03:33:53] आएगा। पर हर नंबर को स्क्वायर करके उसका

[03:33:56] एवरेज लीजिए तो रिजल्ट और बड़ा आएगा। यानी

[03:34:01] कॉन्वेक्स फंक्शन का हिडन बेनिफिट है।

[03:34:04] जितनी ज्यादा अनसर्टेनिटी उतना ज्यादा

[03:34:07] ऑप्शनलिटी का फायदा।

[03:34:10] इसी लॉजिक से फ्रजाइल या कॉनकेव फंक्शन

[03:34:14] में रिवर्स होता है। एवरेज ऑफ फंक्शन कम

[03:34:19] हो जाता है फंक्शन ऑफ एवरेज से और ज्यादा

[03:34:22] एक्यूरेसी चाहिए नुकसान से बचने के लिए।

[03:34:25] मतलब फ्रजाइल सिस्टम में सर्वाइव करने के

[03:34:29] लिए।

[03:34:30] बहुत ज्यादा सही होना पड़ता है वरना

[03:34:33] नुकसान हो जाएगा।

[03:34:39] बहुत सी चीजें हैं जो हम बिना नाम दिए भी

[03:34:42] समझ लेते हैं। जैसे पहले ब्लू का कोई नाम

[03:34:46] नहीं था। फिर भी लोग ब्लू देख लेते थे।

[03:34:50] वैसे ही एंटीफजिलिटी का कांसेप्ट पहले

[03:34:53] वर्ड के बिना भी काम करता था। सिस्टम

[03:34:58] नेचुरल ही सर्वाइव करता था बिना इसको

[03:35:00] डिफाइन किए। दुनिया में बहुत ऐसी

[03:35:04] इंपॉर्टेंट चीजें हैं जो शब्दों में

[03:35:06] डायरेक्ट एक्सप्रेस नहीं हो पाती।

[03:35:10] बस इनडायरेक्टली समझ आती हैं।

[03:35:13] जब डायरेक्ट डिस्क्राइब नहीं कर सकते तो

[03:35:15] हम बोल सकते हैं कि यह चीज क्या नहीं है।

[03:35:20] इसको वाया नेगेटिव कहते हैं यानी नेगेटिव

[03:35:24] वे। जैसा कि पुराने थियोलॉजी में होता है।

[03:35:29] गॉड को डिस्क्राइब नहीं करते। सिर्फ यह

[03:35:31] बताते कि गॉड क्या नहीं है। माइकल एंजेलो

[03:35:35] से पूछा गया कि डेविड का स्टचू कैसे

[03:35:37] बनाया? उन्होंने कहा जो डेविड नहीं था

[03:35:40] उसको हटा दिया। मतलब सबट्रक्शन से असली

[03:35:43] चीज सामने आई। बारबेल लॉजिक भी इसी पर

[03:35:47] बेस्ड है। पहले फ्रेजिलिटी हटाइए फिर बाकी

[03:35:50] चीजें देखिए। शेरन हमेशा पॉजिटिव एडवाइस

[03:35:54] देगा, कुछ करने को कहेगा। स्टेप बाय स्टेप

[03:35:58] फार्मूला देगा। जैसे 10 स्टेप्स फॉर

[03:36:01] सक्सेस।

[03:36:02] पर असली प्रो लोग नेगेटिव वे में सोचते

[03:36:05] हैं क्या नहीं करना? क्या अवॉइड करना है।

[03:36:09] ग्रैंड मास्टर्स चिस जीतते हैं। गलत मूव

[03:36:12] से बच के। बिजनेस में लोग अमीर तब बनते

[03:36:16] हैं जब वह बर्बाद नहीं होते।

[03:36:19] रिलीजन भी मोस्टली चीजें मना करता है।

[03:36:23] जिंदगी का सबसे बड़ा सीखना होता है क्या

[03:36:26] अवॉयड करें? अक्सर एक ही चीज बचाता है वह

[03:36:31] है अवॉयड करना।

[03:36:34] नॉलेज भी सबट्रैक्टिव होता है। सबसे बड़ी

[03:36:37] नॉलेज

[03:36:38] यह है कि गलत क्या है? क्या नहीं करना?

[03:36:44] जिंदगी में एंटीफ्रजाइल होने का सबसे बड़ा

[03:36:46] फार्मूला है सककर मत बनो।

[03:36:50] जितना कुछ गलत है उसको हटाओ। अपनी

[03:36:54] गलतफहमियों को पहचानो।

[03:36:57] प्लेटनिक एब्स्ट्रैक्ट फॉर्म के चक्कर में

[03:36:59] ना पड़ो बल्कि जो गलत है उसको हटा के रियल

[03:37:03] वर्ल्ड को समझो।

[03:37:06] नेगेटिव नॉलेज ज्यादा रोबस्ट है। पॉजिटिव

[03:37:09] नॉलेज ज्यादा एरर प्रोन है। क्योंकि जो

[03:37:12] चीज गलत साबित हो गई वह वापस सही नहीं हो

[03:37:15] सकती। पर जो सही लगती है वह गलत निकल सकती

[03:37:19] है। यानी एक काला हंस एक ब्लैक स्ान देख

[03:37:23] के तुरंत ऑल स्ान्स आर वाइट। यह झूठ हो

[03:37:28] गया। पर लाख वाइट हंस देख के भी यह प्रूफ

[03:37:31] नहीं हो सकता कि सब वाइट ही है।

[03:37:38] डिसंफर्मेशन यानी गलत साबित करना।

[03:37:42] कंफर्मेशन से ज्यादा पावरफुल है। साइंस भी

[03:37:45] इसी पर बेस्ड है। एक गलत एक्सपेरिमेंट

[03:37:49] पुराने थ्यरी को तोड़ सकता है। पॉपर की

[03:37:52] फिलॉसफी भी यही थी। पर यह आईडिया और भी

[03:37:55] पुराना है। पॉलिटिक्स में भी सबसे अच्छा

[03:37:58] सिस्टम वह है जो बुरे आदमी को हटा दे ना

[03:38:02] कि बस नए अच्छे लोग लाए। बुरा आदमी ज्यादा

[03:38:06] नुकसान कर सकता है। इसलिए मिसचीफ को रोकना

[03:38:09] बेस्ट है। जिंदगी में वाया नेगेटिव का

[03:38:13] प्रिंसिपल यूज करिए जो गलत है। गलत लोग,

[03:38:17] गलत चीजें, गलत आदतें, गलत रिश्ते सबको

[03:38:20] हटाइए। स्टीव जॉब्स का भी कहना है कि असली

[03:38:24] फोकस यस बोलना नहीं पर नो बोलना है।

[03:38:29] 1000 ऑप्शंस को जो काम नहीं आता जो गलत है

[03:38:34] उसको हटा दीजिए। वही सबसे बड़ी इनोवेशन

[03:38:37] है। बारबेल लॉजिक भी सबट्रैक्टिव ही है।

[03:38:41] एक साइड पे टोटल सेफ्टी दूसरी साइड पर

[03:38:44] रिस्क लीजिए। पर गलत चीजों से हमेशा बच के

[03:38:47] रहिए।

[03:38:49] सबट्रैक्टिव नॉलेज यानी कम करिए, गलत

[03:38:53] हटाइए। वही सबसे ज्यादा सेफ, रोबस्ट और

[03:38:57] एंटी फ्रजाइल है।

[03:39:00] जो लेस इज मोर का आईडिया है वह डिसीजन

[03:39:03] मेकिंग में बहुत पावरफुल है। सिंपल तरीके

[03:39:07] जैसे छोटे रूल ऑफ थंब यानी फास्ट एंड

[03:39:10] फ्रूगल यूरिस्टिक्स काम करते हैं।

[03:39:13] कॉम्प्लिकेटेड मेथड से भी अच्छा। स्पेशली

[03:39:16] जब टाइम, डाटा या रिसोर्सेज कम हो। जब

[03:39:20] रेयर इवेंट यानी ब्लैक स्ान ज्यादा इफेक्ट

[03:39:24] डालती हैं तो उसको फोकस करिए। बाकी चीजें

[03:39:28] इग्नोर करिए। बहुत प्रॉब्लम्स का स्यूशन

[03:39:30] सिंपल है। एक दो बड़े स्टेप्स या एक दो की

[03:39:34] पॉइंट्स पर ध्यान दीजिए। छोटी-छोटी

[03:39:36] डिटेल्स में मत अटकिए। वरना असली प्रॉब्लम

[03:39:39] छूट जाएगी।

[03:39:42] 80020 रूल भी यही कहता है 20% इफेक्ट से

[03:39:46] 80% रिजल्ट और अब तो और अनइवन हो गया है।

[03:39:51] 1% लोगों के पास सब कुछ 1% चीजें सबसे

[03:39:55] ज्यादा मैटर करती हैं। यानी सिस्टम में

[03:39:58] सिर्फ थोड़ा सा बदलाव करके 99% फ्रेजिलिटी

[03:40:02] दूर की जा सकती है। काम पे भी देखिए तो

[03:40:07] कुछ ही लोग प्रॉब्लम क्रिएट करते हैं। कुछ

[03:40:10] ही लोग रेवेन्यू लाते हैं। उन्हीं पर फोकस

[03:40:12] करिए।

[03:40:14] डाटा का ओवरलोड भी खतरनाक है। जितना

[03:40:17] ज्यादा डाटा उतना ज्यादा डिस्ट्रैक्शन। जब

[03:40:21] रोड क्रॉस करनी हो आपके सामने ट्रक है या

[03:40:24] नहीं बस वही देखिए। लोगों की आंखों का रंग

[03:40:28] देखने का कोई फायदा नहीं। साइंस में भी जो

[03:40:31] सब्जेक्ट कॉन्फिडेंट है जैसे फिजिक्स वहां

[03:40:34] स्टैटिस्टिक्स कम यूज होती है। पर

[03:40:36] इकोनॉमिक्स, पॉलिटिकल साइंस यहां कुछ भी

[03:40:40] प्रैक्टिकल काम नहीं हुआ। वहां

[03:40:42] स्टैटिस्टिक्स की भरमार है।

[03:40:45] असली चीज यह है कि ब्लैक स्ान इवेंट्स ही

[03:40:48] सब कुछ पलट देते हैं और वह प्रेडिक्ट नहीं

[03:40:51] हो सकते। तो कॉम्प्लिकेटेड स्टैटिस्टिक्स

[03:40:54] का कोई मतलब नहीं।

[03:40:57] अगर आपके पास किसी चीज को करने के लिए एक

[03:41:00] से ज्यादा रीजन है तो मत करिए क्योंकि आप

[03:41:04] खुद को कन्वस करने की कोशिश कर रहे हैं।

[03:41:08] एक रीजन काफी है अगर डिसीजन सही है। यही

[03:41:12] सिंपल डिसीजन मेकिंग का तरीका है।

[03:41:16] टाइम और फ्रजिलिटी जो चीज पुरानी है वह

[03:41:21] ज्यादा स्ट्रांग है। नई चीज ज्यादा

[03:41:24] फ्रजाइल होती है। टाइम सबको टेस्ट करता

[03:41:27] है। जो फ्रजाइल है वह टूट जाता है।

[03:41:30] टेक्नोलॉजी भी जो ज्यादा टाइम तक दिखेगी

[03:41:34] वही असली है। नए-नए चीजें बस फैशन है।

[03:41:38] असली काम टाइम दिखाता है। जो चीज पुरानी

[03:41:41] है वह हिडन पर्पस सर्व करती है जो हम समझ

[03:41:45] भी नहीं पाते। नई चीजें अनावश्यक

[03:41:49] फ्रिजिलिटी लाती हैं। न्यूमेनिया बोलते

[03:41:52] हैं इसको।

[03:41:55] फ्यूचर प्रेडिक्ट करने का बेस्ट तरीका यही

[03:41:59] है वाया नेगेटिव।

[03:42:01] यानी फ्यूचर में जो नहीं चलेगा उसको हटा

[03:42:04] दीजिए। जो फ्रजाइल है वह खत्म हो जाएगा।

[03:42:07] बस इसी पर ध्यान दीजिए। पॉजिटिव

[03:42:11] प्रेडिक्शन से ज्यादा इंपॉर्टेंट है यह

[03:42:13] सोचना कि क्या नहीं टिक पाएगा।

[03:42:16] जैसे पोएट ने कहा था टाइम सब कुछ निगल

[03:42:19] जाता है। सबसे मजबूत चीजें भी। लेकिन एंटी

[03:42:23] फ्रजाइल चीजें टाइम से सर्वाइव कर जाती

[03:42:26] हैं। इसलिए टाइम के हिसाब से देखिए कि

[03:42:29] क्या टिक रहा है और सबसे फ्रजाइल चीजें

[03:42:32] पहले आउट हो जाएंगी। शॉर्ट टर्म

[03:42:35] प्रेडिक्शन हमेशा गलत होती है लेकिन लॉन्ग

[03:42:38] टर्म में सर्टेनिटी है कि जो ब्लैक स्ान

[03:42:41] प्रोन है वह हट जाएगा।

[03:42:46] जब भी लोग फ्यूचर इमेजिन करते हैं, वह

[03:42:48] सोचते हैं कि आज का बेस ले लीजिए। उस पर

[03:42:52] नए-नए चीजें जोड़ दीजिए। पर असल में

[03:42:57] ज्यादातर प्रेडिकशंस गलत ही साबित होती

[03:43:00] हैं। जो चीजें हमारी लाइफ में सबसे

[03:43:03] इंपॉर्टेंट हैं। जैसे इंटरनेट, सूटकेस का

[03:43:07] व्हील या कंडोम वो कभी किसी की प्रेडिक्शन

[03:43:11] में नहीं आई थी। जो चीजें हजारों साल से

[03:43:14] हैं जैसे शूज, चेयर्स, फायर, ग्लास, वाइन,

[03:43:19] चीज, सिल्वर वेयर वो अभी भी वैसी ही यूज

[03:43:23] हो रही हैं। और हमारा डेली लाइफ इन्हीं

[03:43:25] ओल्ड टेक्नोलॉजीस पे चल रहा है।

[03:43:29] डिनर पे जाके हम उतने ही पुराने तरीके से

[03:43:32] खाना खाते हैं। उतने ही पुराने टूल्स से

[03:43:36] जितना पुराना जमाने में होता था।

[03:43:40] लोग ओवर टेक्नोलॉजाइज करते हैं फ्यूचर को।

[03:43:43] सोचते हैं हर चीज हाइपर मॉडर्न हो जाएगी।

[03:43:47] पर रियलिटी में पुराने टूल्स ज्यादा टिकते

[03:43:51] हैं। मोस्ट इन्वेस्टमेंट और एफर्ट

[03:43:53] एक्चुअली ओल्ड टेक्नोलॉजीस को मेंटेन या

[03:43:56] इंप्रूव करने में जाता है ना कि नई चीजें

[03:43:59] बनाने में। जैसे साइकिल का एग्जांपल

[03:44:03] बसाइकिल्स कार से ज्यादा बनती हैं पर इस

[03:44:06] पर ध्यान कम है। कंडोम जैसी चीजें ज्यादा

[03:44:10] से ज्यादा इनविज़िबल बनती जा रही हैं ताकि

[03:44:13] उनका इफेक्ट तो हो पर दिखे ना। प्रॉब्लम

[03:44:16] यह है कि हम प्रेडिक्ट करते वक्त ओल्ड

[03:44:19] चीजों को अंडरएस्टेट कर देते हैं और नए को

[03:44:22] ओवर एस्टीमेट करते हैं। हम अपने टाइम की

[03:44:25] टोपियां या अपनी इच्छा फ्यूचर पे लगा देते

[03:44:29] हैं। पर एक्चुअल में दुनिया में जो टिक

[03:44:32] जाता है वह छोटी अनसंग ऑलमोस्ट इनविज़िबल

[03:44:37] चीजें होती हैं। हर जनरेशन की नई

[03:44:41] टेक्नोलॉजी भी तब तक रहती है जब तक वह

[03:44:45] किसी

[03:44:47] ओल्ड प्रॉब्लम को सॉल्व कर रही हो या कोई

[03:44:50] बेकार चीज हटा रही हो। अच्छी टेक्नोलॉजी

[03:44:53] तब बेस्ट है जब वह खुद को इनविज़िबल कर दे।

[03:44:57] लाइफ को आसान बना दे बिना शो ऑफ के।

[03:45:03] लिटरेचर और हिस्ट्री को रिस्पेक्ट करना।

[03:45:07] ओल्ड विडम, एल्डर्स की एडवाइस और सिंपल

[03:45:11] रूल्स ऑफ थंब यानी हरिस्टिक्स को समझना ही

[03:45:14] फ्यूचर को समझने का असली तरीका है।

[03:45:17] म्यूजियम्स, ओल्ड बुक्स और पुरानी आर्ट यह

[03:45:22] सब फ्यूचर की प्रॉपर्टीज को समझते हैं ना

[03:45:25] कि टेक्नो कॉन्फ्रेंसेस के स्लाइड्स।

[03:45:30] टेक्नोलॉजी खुद भी कभी-कभी अपने ओल्ड

[03:45:33] वर्जन को हटा के बेहतर बन जाती है। जैसे

[03:45:37] पहले शूज में कशनिंग और इंजीनियरिंग ऐड

[03:45:40] की। अब फिर से ऐसे शूज बन रहे हैं जैसे कि

[03:45:43] बेयर फीट हो। यानी असली नेचुरल स्टाइल।

[03:45:48] टेबलेट कंप्यूटरटर्स की एग्जांपल भी है।

[03:45:51] एक तरह से हम फिर से टेबलेट पे लिखने लगे।

[03:45:54] जैसे बेबीलोन में लिखा जाता था। अभी

[03:45:58] टेक्नोलॉजी अपने आप को माइनस कर देती है।

[03:46:02] यानी सबट्रैक्टिव हो जाती है।

[03:46:06] फिर एक टेक्निकल पॉइंट पेरिशेबल चीजें

[03:46:09] जैसे एक ह्यूमन या एक कार मर जाएगी खत्म

[03:46:12] हो जाएगी नॉन पेरिशेबल चीजें जैसे

[03:46:16] टेक्नोलॉजी का आईडिया बुक का कंटेंट जींस

[03:46:19] इंफॉर्मेशन वह सर्वाइव करते हैं और यही

[03:46:23] लिंडी इफेक्ट का मेन पॉइंट है। जो चीज

[03:46:27] जितनी पुरानी है उसके सर्वाइव करने का

[03:46:30] चांस उतना ही ज्यादा है। एक 80 साल पुरानी

[03:46:35] टेक्नोलॉजी 10 साल पुरानी से एट टाइम्स

[03:46:38] ज्यादा सर्वाइव कर सकती है। इसलिए जो चीज

[03:46:41] टाइम से टेस्ट हो चुकी है उस पे भरोसा

[03:46:44] ज्यादा है।

[03:46:47] जो चीजें पेरिशेबल है। जैसे इंसान जितना

[03:46:52] ज्यादा टाइम बीतेगा उतना कम फ्यूचर बचा।

[03:46:56] जैसे आदमी 40 साल का है तो उसकी एवरेज

[03:46:59] लाइफ एक्सपेक्टेंसी कम होती जाएगी हर साल

[03:47:02] के साथ।

[03:47:04] लेकिन नॉन पेशेबल चीजें जैसे एक पुरानी

[03:47:08] बुक क्लासिक कार्ड या टेक्नोलॉजी जितना

[03:47:11] ज्यादा टाइम सर्वाइव कर गई उतना ही ज्यादा

[03:47:14] फ्यूचर में टिकने की चांस बढ़ जाती है।

[03:47:17] मतलब अगर कोई बुक 40 साल से प्रिंट में है

[03:47:20] तो अगले 40 साल और रहने का चांस है। और

[03:47:24] अगर वह बुक 10 साल और सर्वाइव कर गई तो

[03:47:27] फिर 50 साल तक और चलेगी। यानी ओल्ड थिंग्स

[03:47:32] रिवर्स एज होती हैं। जितनी पुरानी उतनी

[03:47:35] ज्यादा टिकेगी। यही चीजें स्ट्रांग होती

[03:47:38] हैं। विनर टेक ऑल इफेक्ट के चलते।

[03:47:43] बहुत लोग कंफ्यूज हो जाते हैं इस आईडिया

[03:47:45] को लेके। पहला कंफ्यूजन यह है कि हर

[03:47:49] टेक्नोलॉजी या चीज पर अप्लाई नहीं होता।

[03:47:52] अगर कोई टेक्नोलॉजी ऑलरेडी मर रही है जैसे

[03:47:55] लैंडलाइन फोन तो ऑब्वियसली वह नहीं चलेगी।

[03:47:59] प्रिंसिपल यह है कि जो अब तक सर्वाइव कर

[03:48:03] गई

[03:48:05] उसके सर्वाइव करने के चांस फ्यूचर में भी

[03:48:08] ज्यादा है।

[03:48:11] बाकी जो मरने लायक थी वह ऑलरेडी मर चुकी।

[03:48:16] दूसरा कंफ्यूजन है कि लोग सोचते हैं कि नई

[03:48:19] चीजें या टेक्नोलॉजी को अडॉप करना यंग है

[03:48:22] और पुराना रखना ओल्ड। पर असल में ऐसा नहीं

[03:48:26] है। टेक्नोलॉजी फिजिकल चीज नहीं

[03:48:29] इंफॉर्मेशन है। वह ह्यूमन की तरह बूढ़ा

[03:48:32] नहीं होता। विल पुराना हो सकता है लेकिन

[03:48:35] वह खराब नहीं होता।

[03:48:39] मोस्ट नई आइडियाज फ्रजाइल होती हैं इसलिए

[03:48:42] ज्यादा टिकती नहीं।

[03:48:45] यहां एक मेंटल बायस भी है। जब हम किसी को

[03:48:48] स्टॉक मार्केट में पैसा कमाते देखते हैं

[03:48:51] तो सक्सेस स्टोरी सुनते हैं। फेलियर्स छुप

[03:48:54] जाती हैं। इसी तरह नवेल लिखने वाले या

[03:48:57] टेक्नोलॉजी में भी हम वही देखते हैं जो

[03:49:00] सर्वाइव कर गई।

[03:49:04] इसलिए लगता है कि जो अच्छा है वही टिकता

[03:49:07] है। लेकिन असल में ज्यादातर नई चीजें फेल

[03:49:11] हो जाती हैं।

[03:49:13] दूसरा बायस है कि हम चेंज को ज्यादा नोटिस

[03:49:17] करते हैं। स्टैटिक चीजों को नहीं। जैसे

[03:49:22] पानी हर रोज चाहिए। पर हम सेलफोन के नए

[03:49:25] मॉडल को ज्यादा वैल्यू देते हैं क्योंकि

[03:49:27] उसमें वेरिएशन दिख रहा है।

[03:49:32] नोमिना का इफेक्ट यह है कि हम नई चीजों के

[03:49:36] पीछे भागते रहते हैं। हर बार नया मॉडल देख

[03:49:39] के लगता है पुराना आउटडेटेड है। पर असल

[03:49:43] में चेंज छोटा होता है। मोस्टली कॉस्मेटिक

[03:49:46] इसको ट्रेड मिल इफेक्ट कहते हैं। नया

[03:49:50] खरीदिए।

[03:49:51] थोड़ा बूस्ट मिलेगा। फिर वही पुराना लगने

[03:49:54] लगेगा। फिर नया चाहिए।

[03:49:59] लेकिन क्लासिकल आर्ट पुराने फर्नीचर या

[03:50:03] आर्टिजनल चीजें में ऐसा नहीं होता। उनका

[03:50:06] मजा टाइम के साथ कम नहीं होता।

[03:50:09] इलेक्ट्रॉनिक्स में हम फर्क पर ध्यान देते

[03:50:11] हैं। पर असली मजा फिजिकल बुक्स, पुराने

[03:50:14] पेंस, हैंडमेड चीजों में है जो आर्टिजनल

[03:50:19] टच ले आती है। हैंडमेड चीजें ज्यादा

[03:50:22] सेटिस्फाई करती हैं। ट्रेडमिल इफेक्ट कम

[03:50:24] होता है और फ्रजाइल भी कम होती हैं। इसलिए

[03:50:28] जो चीज ओल्ड, क्लासिक और आर्टिजनल है,

[03:50:32] उसकी वैल्यू ज्यादा है और वह ज्यादा टिकती

[03:50:35] है।

[03:50:38] आजकल के आर्किटेक्ट्स और प्लेनर्स को नई

[03:50:40] चीजें बनाने का बहुत भूत जैसा लग जाता है।

[03:50:44] जिससे हर जगह एक नयापन या नोमिना आ जाता

[03:50:48] है।

[03:50:50] मॉडर्न बिल्डिंग्स ज्यादा फ्रजाइल नहीं है

[03:50:53] कि जल्दी गिर जाए। इसलिए जब एक बार कोई

[03:50:56] बोरिंग या अजीब सी बिल्डिंग बन जाती है,

[03:50:59] वह हमारे आसपास टॉर्चर की तरह चिपक जाती

[03:51:02] है। अर्बन प्लानिंग में प्रॉब्लम यह है कि

[03:51:06] टॉप डाउन डिजाइन यानी

[03:51:08] ऊपर से डिजाइन करके बनाई गई सिटी

[03:51:11] स्ट्रक्चर ईली रिवर्स नहीं होता। गलती हो

[03:51:15] गई तो फिर वह अटक जाती है। पर बॉटम अप

[03:51:18] यानी धीरे-धीरे लोकल लोगों के हिसाब से

[03:51:21] बदलने वाला शहर उसमें गलती सुधारने का

[03:51:24] मौका रहता है और चीजें नेचुरली डेवलप होती

[03:51:29] हैं।

[03:51:31] जो नेचुरली ग्रो होता है। जैसे जंगल, ट्री

[03:51:34] या पुराने शहर उनमें फ्रैक्टल पैटर्न होता

[03:51:38] है। छोटी-छोटी डिटेल्स रिपीट होती रहती

[03:51:41] हैं। जैसे ट्री का ब्रांच छोटा ट्री जैसा

[03:51:44] दिखता है। नेचर में हर जगह जैक्ड अनइवन

[03:51:49] लेकिन पैटर्न बेस्ड डिटेल मिलती है।

[03:51:52] मॉडर्न बिल्डिंग्स मोस्टली स्मूथ और

[03:51:55] बोरिंग हो गई हैं। वो फ्रक्टल रिचनेस नहीं

[03:51:57] मिलती। सब डेड लगती हैं।

[03:52:02] गौदी के बिल्डिंग्स बार्सिलोना में एक

[03:52:04] एक्सेप्शन है। वह नेचर से इंस्पायर्ड है।

[03:52:07] डिटेल से भरे हुए। अगर जाइए तो लगता है

[03:52:11] किसी केव में आ गए हो। पर मॉडर्निज्म में

[03:52:14] बाद में यह रिचनेस खत्म हो गई। सब कुछ

[03:52:18] स्मूद और सिंपल हो गया। और यह खाली और

[03:52:21] अजीब लगता है। खुद लिखने का मजा भी तब आता

[03:52:25] है जब सामने ट्रीज या वाइल्ड गार्डन हो ना

[03:52:28] कि एकदम प्लेन सफेद वॉल्स हो।

[03:52:33] कभी-कभी मॉडर्न आर्किटेक्चर डिक्टेटरशिप

[03:52:36] के साथ मिल जाता है और तब तो और भी बुरा

[03:52:39] होता है। जैसे रोमानिया में सुजेक्यू ने

[03:52:44] ट्रेडिशनल गांव तोड़ के हाई राइस बनवा

[03:52:46] दिए। फ्रांस में इमीग्रेंट राइट्स के पीछे

[03:52:49] भी अननेचुरल बिल्डिंग्स का हाथ माना जाता

[03:52:52] है। जेन जोकूब्स जैसे एक्टिविस्ट ने इस

[03:52:55] अर्बन नोमिना के खिलाफ फाइट की। उन्होंने

[03:52:59] कहा कि शहर को फुटपाथ पर ग्राउंड लेवल पर

[03:53:02] रहना चाहिए। बड़े-बड़े हाईवे और बिल्डिंग

[03:53:05] सिटी की लाइफ को चूस लेते हैं।

[03:53:09] शहर की सबसे अच्छी जगह वही होती है जहां

[03:53:12] चीजें पुरानी छोड़ी गई हो। पेरिस में भी

[03:53:15] सबसे महंगी जगह वही है जो हाउसमैन के

[03:53:19] रिडवलपमेंट से बच गई थी। सिटीज विलेजेस की

[03:53:23] तरह चलती हैं। अबस्ट्रैक्ट पेंटिंग्स से

[03:53:27] नहीं।

[03:53:28] लंदन में जाम क्यों लगता है? क्योंकि लोग

[03:53:31] वहां रहना चाहते हैं और सिटी में खिंचाव

[03:53:34] है। ब्राजीलिया जैसे परफेक्टली प्लंड सिटी

[03:53:37] खरीदने का कोई शौक नहीं रखता।

[03:53:41] बिल्डिंग्स भी टाइम के साथ म्यूटेट करती

[03:53:43] हैं। बदलती रहती हैं। ऑप्शनलिटी चाहिए

[03:53:46] डिजाइन में ताकि फ्यूचर में एडजस्ट हो

[03:53:49] सके। स्टीवर्ड ब्रांड ने हाउ बिल्डिंग्स

[03:53:52] लर्न में दिखाया है कि बिल्डिंग्स भी

[03:53:55] इवॉल्व करती हैं।

[03:53:58] कुछ मॉडर्न टिक जैसे वॉल टू वॉल विंडोज।

[03:54:02] यह चीजें अच्छी हैं क्योंकि अब हम नेचर को

[03:54:05] एंजॉय कर सकते हैं। पहले सिर्फ इंसुलेशन

[03:54:09] के लिए छोटी खिड़की होती थी। टेक्नोलॉजी

[03:54:12] अच्छी तब है जब वह इनविज़िबल हो जाए। जैसे

[03:54:15] एक वॉल पूरा ट्रांसपेरेंट हो गया और आप

[03:54:18] नेचर में घुल जाइए।

[03:54:23] मैट्रिफिकेशन का एग्जांपल है कि फ्रेंच

[03:54:27] रिवोल्यूशन के बाद सबको मीटर किलोग्राम पे

[03:54:31] शिफ्ट करने की कोशिश हुई।

[03:54:34] लेकिन फुट, पाउंड, इंच जैसे यूनिट्स

[03:54:37] ज्यादा इंट्यूटिव हैं। हर कल्चर में मिलते

[03:54:40] हैं। इंसान की बॉडी से या डेली लाइफ से

[03:54:43] जुड़े हुए हैं।

[03:54:45] मॉडर्न एफिशिएंट लॉजिक को जब फोर्स किया

[03:54:49] जाता है तो लोग नेचुरल तरीकों पर वापस आ

[03:54:52] जाते हैं। इंफॉर्मेशन में भी यही रूल है।

[03:54:57] जो बुक या पेपर पुराने हैं, वह ज्यादा

[03:55:00] वैल्यूुएबल है। नई बुक्स या साइंटिफिक

[03:55:03] पेपर्स मोस्टली नॉइज़ होते हैं। हाइप में आ

[03:55:06] जाते हैं। लेकिन टाइम यह फ़िल्टर करता है

[03:55:09] कि क्या असली वैल्यू का है। इसलिए लिंडी

[03:55:12] इफेक्ट को फॉलो करिए।

[03:55:17] जितनी पुरानी चीज है उतनी लंबी चलेगी।

[03:55:20] कॉन्फ्रेंसेस और नई रिसर्च पेपर्स में

[03:55:23] मोस्टली टाइम वेस्ट होता है। सिर्फ

[03:55:25] क्लासिक टाइम टेस्टेड चीजें ही रियल

[03:55:28] वैल्यू रखती हैं। अमेर्स जो पेशेंस से

[03:55:33] सब्जेक्ट पढ़ते हैं उनसे बात करना भी

[03:55:35] ज्यादा फायदेमंद है। प्रोफेशनल एकेडमिक्स

[03:55:38] के गसिप से नहीं।

[03:55:40] अगर किसी चीज को फ्यूचर में सर्वाइव करना

[03:55:43] है तो उसमें स्ट्रेंथ होनी चाहिए। वह

[03:55:46] फ्रजाइल नहीं होनी चाहिए। जो चीजें

[03:55:49] फ्रजाइल हैं जैसे बड़ी-बड़ी कंपनीज, ओवर

[03:55:53] ऑप्टिमाइज सिस्टम्स,

[03:55:56] ऐसी टेक्नोलॉजीस जो सिर्फ लेटेस्ट फैशन पर

[03:55:59] चल रही हैं या जो सिर्फ साइंटिफिक मेथड पर

[03:56:02] बेस्ड है बिना पुराने विज़डम के यह सब टाइम

[03:56:05] के साथ टूट जाएंगी।

[03:56:09] जो चीजें छोटी हैं जैसे सिटी स्टेट्स,

[03:56:12] छोटी कंपनीज, लोकल आर्टिजंस यह ज्यादा

[03:56:16] टिकती हैं क्योंकि इनमें फ्लेक्सिबिलिटी

[03:56:18] होती है और यह बड़े शौक सर्वाइव कर सकती

[03:56:21] हैं। नेशन, स्टेट, सेंट्रल बक्स,

[03:56:24] इकोनॉमिक्स, डिपार्टमेंट्स यह सब नॉमिनली

[03:56:28] तो रहेंगे लेकिन इनकी पावर कम हो जाएगी।

[03:56:34] सही प्रॉफिट का काम फ्यूचर बताना नहीं

[03:56:37] बल्कि लोगों को वार्निंग देना है। जो

[03:56:40] वनरेबल चीजें हैं उन पर अलर्ट करना है और

[03:56:43] बताना है कि क्या ना करें। प्रॉफिट का

[03:56:47] असली काम होता है मत करो। जो भी ट्रेडिशन

[03:56:51] में है उसको प्रोटेक्ट करना। गलत चीजों से

[03:56:54] बचना और टाइम की फिल्टरिंग पर भरोसा रखना।

[03:57:00] प्रॉफेट का मैसेज सबको पसंद नहीं आता।

[03:57:02] अक्सर उनको लोग इग्नोर करते हैं। उनको

[03:57:04] पनिश भी किया जाता है। यह पैटर्न हर जगह

[03:57:08] है। लोग अपनी गलतियों से नहीं सीखते। नए

[03:57:11] आइडियाज को वैल्यू नहीं मिलती जब तक वह

[03:57:13] टाइम की टेस्ट पास ना कर ले।

[03:57:18] एक स्टोरी है एमडोक्कलीस के डॉग की। डॉग

[03:57:22] हमेशा एक ही टाइल पर सोता है क्योंकि उसका

[03:57:24] नेचुरल मैच उस टाइल से है। हिस्ट्री में

[03:57:28] वह बार-बार वहां गया है। इसी तरह

[03:57:32] ह्यूमन टेक्नोलॉजी में भी जो चीज लॉन्ग

[03:57:35] टाइम तक चल रही है, वह ह्यूमन नेचर के साथ

[03:57:38] डीपली कंपैटिबल है। चाहे वह लिखना हो,

[03:57:42] पढ़ना हो या नई स्किल सीखना हो।

[03:57:47] जब लोग ई रीडर और बुक कंपेयर करते हैं या

[03:57:50] कोई नई टेक्नोलॉजी और पुरानी चीज कंपेयर

[03:57:52] करते हैं तो असली वैल्यू सिर्फ टाइम से

[03:57:56] पता चलती है। ओपिनियन से नहीं।

[03:58:03] अगर कोई चीज या हैबिट आपको इलॉजिकल, बेकार

[03:58:06] या बैकवर्ड लगती है लेकिन वह बहुत टाइम से

[03:58:09] चल रही है तो हो सकता है उसमें कोई गहरा

[03:58:12] लॉजिक या वैल्यू हो जो समझ से बाहर हो।

[03:58:16] इसीलिए वह सर्वाइव कर रही है। कोई भी चीज

[03:58:19] अगर नेचुरल है तो उससे बेनिफिट का प्रूफ

[03:58:22] चाहिए नहीं। लेकिन कोई आर्टिफिशियल या नई

[03:58:27] चीज है तो उसको प्रूफ करना पड़ेगा कि वह

[03:58:29] फायदेमंद है। वरना इसको अवॉइड करिए।

[03:58:35] मेडिसिन में भी यही है। ओनली तभी

[03:58:38] इंटरवेंशन करिए जब बेनिफिट रिस्क से

[03:58:41] ज्यादा हो। जैसे लाइफ सेविंग सर्जरी या

[03:58:45] नेसेसरी मेडिसिन जैसे पेनिसिलिन,

[03:58:48] छोटी-छोटी कंफर्ट वाली चीजें या अननेसेसरी

[03:58:52] प्रोसीजर्स यह सब डेंजरस हो सकती हैं

[03:58:55] क्योंकि यहां हार्म ज्यादा हो सकता है। हर

[03:58:58] चीज में डोज इंपॉर्टेंट है। कुछ चीजें कम

[03:59:01] डोज में ठीक ज्यादा में खराब हो सकती हैं।

[03:59:05] जब एविडेंस की बात आती है तो नॉन नेचुरल

[03:59:09] चीजों पर बर्डन ऑफ प्रूफ है कि वह

[03:59:11] फायदेमंद है। नेचर पे नहीं। और अगर किसी

[03:59:16] चीज का हार्म का प्रूफ नहीं है, इसका मतलब

[03:59:18] यह नहीं कि वह सेफ है। यह लॉजिकल फैलेसी

[03:59:21] है। मेडिसिन और लाइफ के डिसीजंस में हमेशा

[03:59:25] अननोन ज्यादा होता है। इसलिए सेफ साइड पर

[03:59:28] रहना चाहिए।

[03:59:33] हिस्ट्री में मेडिसिन ने लोगों को मिसलीड

[03:59:35] इसलिए किया क्योंकि उसकी सफलता सबके सामने

[03:59:39] दिखाई गई। लेकिन उसकी गलतियां लिटरली

[03:59:42] ग्रेवयार्ड में दफन हो गई। जो लोग

[03:59:45] ट्रीटमेंट से मर गए उनको कोई याद नहीं

[03:59:47] करता। सिर्फ बच गए लोगों की स्टोरी सुनाई

[03:59:50] जाती हैं।

[03:59:53] इसी वजह से इंटरवेंशन का बायस आ गया। मतलब

[03:59:58] हमेशा कुछ करने का चाहे उससे नुकसान ही

[04:00:01] क्यों ना हो। जैसे 1940 50 में एकने

[04:00:06] टॉन्सिलाइटिस बर्थ मार्क्स या रिंग वार्म

[04:00:09] के लिए बच्चों को रेडिएशन दिया गया। लेकिन

[04:00:12] बाद में पता चला कि उस रेडिएशन से 7%

[04:00:15] लोगों को 20 40 साल बाद थायरॉइड कैंसर हो

[04:00:18] गया। थोड़ा नेचुरल रेडिएशन तो जरूरी है

[04:00:22] क्योंकि हम उसके लिए एंटीफ्रजाइल है लेकिन

[04:00:25] एक्सेसिव या अननेचुरल एक्सपोज़र डेंजरस है।

[04:00:28] सूरज से भी वही है। शायद इंडस्ट्री ने सन

[04:00:31] प्रोटेक्शन प्रोडक्ट्स के लिए प्रॉफिट

[04:00:34] बनाना शुरू किया है। जबकि हम तो मिलियंस

[04:00:37] ऑफ इयर्स से सूरज के साथ एडजस्ट करते आए

[04:00:40] हैं।

[04:00:42] फेनोमिनोलॉजी का मतलब है कि एक्सपीरियंस

[04:00:45] या जो असर रियलिटी में दिख रहा है, वह

[04:00:48] थ्यरी से ज्यादा पावरफुल है। और इसी पर

[04:00:51] पॉलिसी बनाना चाहिए। जैसे एक कंसलटेंट जिम

[04:00:55] में बता रहे थे कि उन्होंने इंसुलिन वाली

[04:00:57] थ्यरी सुन के ही लो कार्ब डाइट ट्राई की

[04:01:00] और फिर वेट लॉस हुआ। जबकि पहले वह बिलीव

[04:01:04] नहीं करता था। बस थ्यरी सुनते ही एक्शन

[04:01:06] लिया। लेकिन असल बात यह है कि थ्यरीज तो

[04:01:09] बदलती रहती हैं पर जो रिजल्ट है वह सेम

[04:01:12] रहता है। लोग मसल्स बनाने की अलग-अलग

[04:01:16] साइंटिफिक एक्सप्लेनेशन देते हैं। कभी

[04:01:18] मेटाबॉलिज्म, कभी इंसुलिन सेंसिटिविटी,

[04:01:21] कभी माइक्रो टियरिंग, कल कुछ और थ्योरी आ

[04:01:24] जाएगी। लेकिन मसल्स बनाना या वेटलिफ्टिंग

[04:01:27] का असर सेम ही रहेगा। चाहे एक्सप्लेनेशन

[04:01:30] कुछ भी हो।

[04:01:34] ब्रेन और न्यूरोटाइप थ्यरी सुनते ही लोग

[04:01:37] ज्यादा इंप्रेस हो जाते हैं। जैसे कोई

[04:01:39] सीक्रेट कॉज लिंक मिल गई हो। पर्सनल में

[04:01:42] दिमाग इतना कॉम्प्लेक्स है कि वहां थ्यरीज

[04:01:44] ज्यादा फेल होती हैं। बस सुनने में

[04:01:47] साइंटिफिक लगती हैं।

[04:01:50] ट्रेडिशनल मेडिसिन में तीन अप्रोच थी। एक

[04:01:53] रशनलिस्ट थरी वाले दूसरे स्केप्टिकल

[04:01:56] एरेसिस्ट्स

[04:01:58] जो थरीज को इग्नोर करते हैं। बस जो दिख

[04:02:01] रहा है उसी पर फोकस करते हैं। तीसरे

[04:02:04] मेथोडिस्ट्स, प्रैक्टिकल रूल्स, सिंपल

[04:02:07] हरिस्टिक्स, बिना ज्यादा थ्यरी के। यह

[04:02:10] तीनों में हमेशा टेंशन रहती थी।

[04:02:14] मैंने अपने आप को एररिस्ट की लाइन में

[04:02:17] रखता हूं। मतलब जो नहीं पता उसमें

[04:02:20] ईमानदारी रखनी है। पुराने टाइम के

[04:02:22] इंपरसिस्ट कहते थे आई डिड नॉट नो जब तक

[04:02:27] उन्हें वैसे ही कोई सिचुएशन पास्ट में ना

[04:02:30] मिली हो। मतलब एनालॉजी यूज करी लेकिन थरी

[04:02:34] पर चिपके मत रहिए।

[04:02:37] एक जोक है कि एपरर हेड्रियन मरते वक्त

[04:02:40] बार-बार कहता था कि डॉक्टर ने ही उसको

[04:02:42] मारा। मोंटिंग ने भी बताया कि डॉक्टर अपने

[04:02:45] दोस्त की सेहत में कोई खुशी नहीं लेता।

[04:02:49] सोल्जर को भी शांति में मजा नहीं आता

[04:02:51] क्योंकि उनका काम तभी चलता है जब प्रॉब्लम

[04:02:54] हो। इसलिए मैं कहता हूं कि बायोलॉजी की

[04:02:58] थ्यरी में ज्यादा घुसने की जरूरत नहीं। बस

[04:03:01] जो डायरेक्ट असर दिख रहा है उसको देख के

[04:03:04] काम करिए। क्योंकि नेचर की अपनी लॉजिक है

[04:03:07] और थरीज हमेशा टेंपरेरी होती हैं।

[04:03:12] फैट्स के अगेंस्ट जो फैट फ्री का क्रेज है

[04:03:15] वह भी स्ट्स की गलत इंटरप्रिटेशन से आया

[04:03:18] है। सॉल्ट और ब्लड प्रेशर का लिंक भी

[04:03:21] ज्यादातर गलत ही है। वह सबको इफेक्ट नहीं

[04:03:24] करता। सिर्फ कुछ लोगों को। मेडिसिन में

[04:03:27] मैथमेटिक्स का यूज भी कभी-कभी बुरा रिजल्ट

[04:03:30] देता है। डॉक्टर्स या तो सिर्फ नोन चीजों

[04:03:33] पर फोकस करते हैं। अननोन को इग्नोर कर

[04:03:36] देते हैं या स्टेट्स का मिसयूज करते हैं।

[04:03:39] रोबस्ट डिसीजन मेकिंग का मतलब है एक्सेप्ट

[04:03:42] करना कि हम सब नहीं जानते।

[04:03:47] स्मोकिंग को हटा देना पिछले 60 साल की

[04:03:50] सबसे बड़ी मेडिकल अचीवमेंट है। एक डॉक्टर

[04:03:53] ने कहा कि स्मोकिंग के नुकसान उतने ही है

[04:03:56] जितने सारी मॉडर्न मेडिसिन की अच्छी चीजें

[04:03:59] मिला के भी नहीं है। यानी चीजें हटा देना,

[04:04:03] बुरा कम करना ज्यादा पावरफुल है।

[04:04:07] हैप्पीनेस भी नेगेटिव कांसेप्ट है।

[04:04:09] हैप्पीनेस पाने से ज्यादा इंपॉर्टेंट है

[04:04:11] अनहैपीनेस हटाना। सबको पता है क्या चीजें

[04:04:15] उनको अनहै करती हैं तो उन चीजों को हटाइए।

[04:04:19] पुराने लोग भी कहते थे कभी-कभी कम खाना,

[04:04:22] फास्टिंग, रेस्ट और खुश रहना ही बेस्ट

[04:04:25] ट्रीटमेंट है। कैलोरिक रेस्ट्रिक्शन या

[04:04:28] फास्टिंग से कई डिजीजेस ठीक हो सकती हैं।

[04:04:30] जैसे डायबिटीज।

[04:04:34] हमने देखा है कि कई लोग जब अननेचुरल फूड

[04:04:37] प्रोडक्ट्स हटा देते हैं जैसे शुगर, वीट,

[04:04:40] दूध, सोडास, विटामिन पिल्स तो हेल्थ

[04:04:44] इंप्रूव हो जाती है। हेडेक मेडिसिन पर भी

[04:04:48] ज्यादातर लोग अननेसेसरीली डिपेंड हो जाते

[04:04:51] हैं। जबकि उनको असली वजह ढूंढनी चाहिए।

[04:04:56] मैं खुद वही फ्रूट्स खाता हूं जो एंशिएंट

[04:04:58] मेडिटेरेनियन में थे और ड्रिंक्स भी वही

[04:05:01] पीता हूं जो हजार साल से टेस्ट हुए हैं।

[04:05:04] सिर्फ वाटर, वाइन, कॉफी। ऑरेंज जूस या

[04:05:08] सॉफ्ट ड्रिंक सब अवॉयड करता हूं। हर वह

[04:05:11] चीज जो हेल्दी बताई जाती है असल में

[04:05:14] अनहेल्दी होती है। पर्सनल हेल्थ

[04:05:17] इंप्रूवमेंट में सबसे बड़ा रोल मेरा मानना

[04:05:21] है कि अननेसेसरी इरिटेंट्स हटा देना है।

[04:05:24] न्यूज़पेपर बॉस, डेली कम्यूट, एयर

[04:05:28] कंडीशनिंग, टीवी, जिम की मशीनंस, ईमेल्स,

[04:05:32] ईटीसी

[04:05:34] मनी भी हाइड्रोजेनिक हो सकता है। ज्यादा

[04:05:37] पैसा, ज्यादा कंफर्ट, ज्यादा प्रॉब्लम्स

[04:05:40] लाता है। जबकि कंस्ट्रक्शन वर्कर अपनी

[04:05:42] सिंपल रोटी खा के खुश है। रोमंस और अरब्स

[04:05:46] के लिए भी कंफर्ट नेगेटिव चीज थी। पावर्टी

[04:05:50] अगर सही वे में हो तो बॉडी और माइंड के

[04:05:53] लिए हेल्दी स्ट्रेसर है।

[04:05:55] सिविलाइजेशन का रोल है। लेकिन सबट्रैक्टिव

[04:05:59] अप्रोच यानी चीजें हटाना।

[04:06:03] लाइफ को बेहतर बना सकता है। नो सनस्क्रीन,

[04:06:06] नो सनग्लासेस, नो सॉफ्ट ड्रिंक्स, नो

[04:06:10] पिल्स, नो एलिवेटर सब हटा दीजिए। हेल्थ

[04:06:13] आएगी।

[04:06:15] रियल वेल्थ है पीसफुल। नींद, ग्रेटट्यूड,

[04:06:19] मसल स्ट्रेंथ, लाफ्टर, सिंपल फूड, थोड़ा

[04:06:23] काम, कोई जिम नहीं। यह सब सबट्रैक्टिव

[04:06:26] आयोट्रोजेनिक्स हैं।

[04:06:30] रिलीजन भी इसी तरह काम करता है। उसका एक

[04:06:34] बड़ा हिडन रोल है इंटरवेंशन बायस को लिमिट

[04:06:37] करना कि हर छोटी बीमारी पर डॉक्टर के पास

[04:06:40] मत भागो। मंदिर या चर्च जाकर रेस्ट करो।

[04:06:43] माइल्ड केसेस में नेचर को टाइम दो। बहुत

[04:06:47] लोगों ने टेंपल्स पे यह लिखा हुआ देखा कि

[04:06:51] डॉक्टर ने मार दिया। अपोलो ने बचाया।

[04:06:55] मैं खुद रिलीजियस फास्टिंग फॉलो करता हूं।

[04:06:59] ग्रीक ऑर्थोडॉक्स कैलेंडर के हिसाब से कभी

[04:07:01] विगन हो जाता है, कभी कार्नवोर बिना किसी

[04:07:05] मॉडर्न लेवल के।

[04:07:07] मेरा मानना है कि पेियो या विगन कैंप्स

[04:07:10] में स्ट्रिक्टली रहना रशनलिस्टिक मिस्टेक

[04:07:13] है। रिलजन का रोल है आपको एंटाइटलमेंट

[04:07:16] भुलवाना और अबंडेंस का हाइड्रोजेनिक्स कम

[04:07:20] करना।

[04:07:24] हमारे बॉडी में रैंडमनेस का बहुत बड़ा रोल

[04:07:26] है। खासकर खानेपीने में रेगुलरिटी या हर

[04:07:30] चीज को फिक्स तरीके से करना एक्चुअली

[04:07:32] नुकसान कर सकता है। और कभी-कभी

[04:07:35] इर्रेगुलरिटी यानी बीच-बीच में मील्स

[04:07:38] स्किप करना या फास्टिंग करना यह मेडिसिन

[04:07:41] की तरह काम करता है। यह जेनसेंस इनकलिटी

[04:07:45] का प्रैक्टिकल रिजल्ट है कि कभी-कभी रैंडम

[04:07:48] चीजें ही बेस्ट होती हैं और स्टडी चीजें

[04:07:52] बुरी हो सकती हैं।

[04:07:55] इंसान ओमनीवोरस है क्योंकि हमारे

[04:07:57] एनवायरमेंट में हमेशा अलग-अलग तरह का और

[04:08:00] अलग-अलग टाइम पर अवेलेबल खाना मिलता था।

[04:08:04] काऊ या शेर जैसे एनिमल्स के खाने का

[04:08:06] पैटर्न अलग है। काऊ रोज सलाद खाती है।

[04:08:10] लेकिन लायन को कभी दिन भर भूखा रहना पड़ता

[04:08:13] है और फिर एक साथ बहुत सारा प्रोटीन मिलता

[04:08:16] है। इसी वजह से हमारी बॉडी भी रैंडमनेस से

[04:08:20] एडप्ट हुई है। यानी प्रोटीन, कार्ब्स, फैट

[04:08:23] सब हर मील में बैलेंस करने की जरूरत नहीं।

[04:08:28] बल्कि कभी ज्यादा, कभी कम। यह साइकिल भी

[04:08:31] हेल्दी है। फास्टिंग या डिप्रवेशन एक

[04:08:34] स्ट्रेसर है जो बॉडी को एंटीफजाइल बनाता

[04:08:37] है। जैसे एक्सरसाइज बॉडी को स्ट्रांग

[04:08:40] बनाती है। जैसे मैं खुद ऑर्थोडॉक्स लेंट

[04:08:44] का फास्टिंग करता हूं। जहां कई दिन कोई

[04:08:46] एनिमल प्रोडक्ट स्वीट्स अलाउड नहीं होता।

[04:08:49] और कभी-कभी तो ऑलिव ऑयल भी नहीं। तो बॉडी

[04:08:53] डिप्रवेशन को फील करती है और फिर जब

[04:08:55] फास्टिंग तोड़ते हैं तो फूड और अच्छा लगता

[04:08:58] है और यूफोरिया जैसा फील होता है। साइंस

[04:09:02] भी अब यही बताने लगा है कि थोड़ा-थोड़ा

[04:09:05] भूखा रहना या फूड ग्रुप्स को कभी-कभी

[04:09:09] अवॉइड करना यह बॉडी के लिए अच्छा है।

[04:09:14] जब खाना नहीं मिलता तो बॉडी ऑटोफेगी

[04:09:17] प्रोसेस शुरू करती है। अपने ही ओल्ड

[04:09:19] प्रोटीनंस को तोड़ती है। नए सेल्स बनाती

[04:09:22] है। यह वैक्यूम क्लीनर इफेक्ट जैसे काम

[04:09:25] करता है और लोंजिविटी भी बढ़ सकती है।

[04:09:29] फास्टिंग या एपिसोडिक डिपवेशन बॉडी के लिए

[04:09:32] बेनिफिशियल है। यह वही चीज है जो रिलीजंस

[04:09:36] के रिचुअल फास्ट करवाते हैं और यह रैंडमली

[04:09:39] न्यूट्रिएंट इंटेक को चेंज करके बॉडी की

[04:09:42] बायोलॉजी को सूट करता है।

[04:09:47] आजकल लोग वॉकिंग को इग्नोर करते हैं।

[04:09:50] लेकिन एफर्टलेस स्ट्रेस फ्री वॉकिंग उतना

[04:09:53] ही जरूरी है जितना स्लीप। हमारे

[04:09:55] एनसेेस्टर्स हमेशा वॉक करते थे। गाड़ियों

[04:09:58] से पहले पावर वॉक या जिम का ओवरफोकस गलत

[04:10:02] है। एक्चुअल नेचुरल मूवमेंट ही बॉडी के

[04:10:05] लिए बेस्ट है।

[04:10:09] मॉडर्न लोग बस लंबा जीना चाहते हैं। लेकिन

[04:10:12] पुराने जमाने के हीरोज़ के लिए डेथ से भी

[04:10:15] बुरा था डिसऑनर। पहले लोग अपने ग्रुप

[04:10:19] फ्यूचर जनरेशंस या नॉलेज यानी बुक्स के

[04:10:23] लिए सैक्रिफाइस करते थे। लेकिन आज सब खुद

[04:10:26] के सर्वाइवल में ही लगे हैं।

[04:10:29] मैं यह भी सोचता हूं कि यह अजीब लगता है

[04:10:32] कि कुछ लोग इम्मोर्टलिटी चाहते हैं। 200

[04:10:36] पिल्स खाते हैं। लेकिन वह कहते हैं कि

[04:10:38] सिस्टम की एंटी फ्रजिलिटी तभी होती है जब

[04:10:40] इंडिविजुअल फ्रजाइल हो। यानी एक टाइम पर

[04:10:44] सबको मरना है ताकि नए लोग आए, नए आइडियाज

[04:10:47] आए।

[04:10:49] मेरी फिलोसफी यह है कि अननेसेसरी चीजें

[04:10:52] हटाओ, बी नेचुरल। खाने में रैंडमनेस लाऊं,

[04:10:56] रेगुलर फास्टिंग करो, सिंपल मूवमेंट यानी

[04:10:59] वॉकिंग करूं और इस सब से आप हेल्दी,

[04:11:02] हैप्पी और एंटी फ्रजाइल बनिए। हम जिंदा

[04:11:06] हैं ताकि इंफॉर्मेशन या अगले जनरेशन के

[04:11:08] लिए कुछ छोड़ जाए ना कि बस अपनी लाइफ को

[04:11:12] आर्टिफिशियली लंबा करें।

[04:11:19] आज की दुनिया में सब कुछ इतना कॉम्प्लेक्स

[04:11:22] हो गया है कि लोग अपने रिस्क दूसरों पर

[04:11:24] डाल देते हैं और लॉ भी इन्हें पकड़ नहीं

[04:11:27] पाता। बहुत सी चीजें होती हैं जो सामने

[04:11:30] नहीं आती। जैसे मेडिसिन के नुकसान या कोई

[04:11:33] भी सिस्टम का हिडन रिस्क जो टाइम के साथ

[04:11:36] ही समझ आता है।

[04:11:39] इस प्रॉब्लम का असली सशन है स्किन इन द

[04:11:42] गेम। मतलब जिसने डिसीजन लिया उसको खुद भी

[04:11:46] रिस्क उठाना पड़े। यह बात बहुत पुरानी है।

[04:11:50] जैसे हम राबी का कोड अगर किसी ने दूसरे को

[04:11:54] नुकसान पहुंचाया तो उसको भी वही भुगतना

[04:11:57] पड़ेगा। लेकिन आजकल लोग इस सिंपल रूल को

[04:12:00] भूल गए हैं। सबसे बड़ा इशू है जब कोई

[04:12:03] फायदा एक इंसान उठाता है और नुकसान किसी

[04:12:07] और को होता है। यह एजेंसी प्रॉब्लम है

[04:12:11] जिसमें असिमेट्री होती है। एक पार्टी

[04:12:14] बेनिफिट उठा रही, दूसरी पार्टी रिस्क ले

[04:12:16] रही। पहले के सोसाइटीज में सबसे इज्जत

[04:12:19] उनको मिलती थी जो दूसरों के लिए अपनी जान

[04:12:22] रिस्क पर लगाते थे या सैक्रिफाइस करते थे।

[04:12:26] हीरो बनना मतलब सिर्फ युद्ध या दंगा नहीं

[04:12:30] बल्कि दूसरे की भलाई के लिए अपना नुकसान

[04:12:33] उठाना।

[04:12:36] जैसे कोई नैनी बच्चे को बचाने के लिए मर

[04:12:40] जाए या सैनिक या संत या कोई भी आदमी जो

[04:12:44] इंसान की सोसाइटी के लिए सैक्रिफाइस करता

[04:12:46] है उसको सबसे ऊपर माना जाता है। यही है।

[04:12:51] यही सोसाइटी को स्ट्रांग बनाता है।

[04:12:57] आजकल जो लोग पावर में हैं, बैंकर,

[04:12:59] पॉलिटिशियन, बड़े कॉरपोरेट लोग, यह खुद के

[04:13:03] लिए अपसाइड ले लेते हैं। डाउन साइड पब्लिक

[04:13:05] पर डाल देते हैं। यह असली हीरोइज़्म नहीं,

[04:13:08] यह अपोजिट है। और जो लोग दूसरों के लिए

[04:13:11] रिस्क लेते हैं, सैक्रिफाइस करते हैं।

[04:13:15] सोसाइटी का असली स्ट्रेंथ वही है। लेकिन

[04:13:18] सैक्रिफाइस का मतलब है सोच समझ के रिस्क

[04:13:21] लेना ना कि बेवकूफी।

[04:13:23] करिश का मतलब है अपने इंपल्स को कंट्रोल

[04:13:26] करना भी। पहले हिरोइज्म सिर्फ फिजिकल करिश

[04:13:30] था। फिर आइडियाज के लिए खड़े रहना भी बन

[04:13:33] गया। जैसे सोक्रेटीज इन जीसस जो अपने सच

[04:13:37] के लिए मरने को रेडी थे। असली हीरो वही है

[04:13:41] जो कुछ कीमत चुकाता है। अपनी जान, अपना

[04:13:44] कंफर्ट, अपनी इज्जत, रिस्क पे लगाता है।

[04:13:48] दूसरों के भले के लिए।

[04:13:51] आज की मिडिल क्लास वैल्यूस सिर्फ सेफ जॉब,

[04:13:55] बॉस की सुनना, स्टॉक मार्केट, सेफ सबर्बन

[04:13:59] लाइफ यह सब हीरोइज़्म फ्री है और इसमें

[04:14:02] असली ऑनर नहीं है। मॉडर्न सोसाइटी में

[04:14:06] काफी लोग ऐसे हैं जो रिस्क नहीं लेते।

[04:14:08] सिर्फ अपना फायदा देखते हैं और खुद को

[04:14:11] हीरो कहते हैं। लेकिन जो असली में रिस्क

[04:14:14] उठाता है, सैक्रिफाइस करता है, उसी में

[04:14:16] असली ग्रेटनेस होती है। चाहे उसको कभी

[04:14:19] पब्लिक स्टचू मिले या ना मिले।

[04:14:23] इरोडिशन या नॉलेज तभी वैल्यूुएबल है जब

[04:14:27] उसके लिए कुछ रिस्क लिया हो। असली

[04:14:30] डिग्निटी तब आती है जब इंसान अपनी वैल्यू

[04:14:33] पर खड़ा होता है। चाहे उसको नुकसान हो

[04:14:36] जाए। जो इंसान खुद के लिए रिस्क नहीं लेता

[04:14:40] उसका ओपिनियन या बोलना किसी काम का नहीं।

[04:14:46] इस प्रॉब्लम का सशन हमारे पुरखों के पास

[04:14:49] था। हमराबी का कोड अगर बिल्डर ने घर बनाया

[04:14:53] और गिर गया, किसी की जान गई तो बिल्डर को

[04:14:56] भी वही सजा मिलेगी। मतलब जिसने रिस्क

[04:14:59] लिया, उसको भी उसका रिजल्ट भुगतना होगा।

[04:15:02] बिना सेफ जोन में छुपे।

[04:15:06] यह रूल इसलिए था कि लोग ध्यान से काम

[04:15:09] करें। अपनी गलतियां ना छुपाएं और किसी और

[04:15:12] को नुकसान ना हो। सबसे खतरनाक रिस्क वही

[04:15:16] है जो छुपा होता है। जैसे फाउंडेशन में

[04:15:19] छुपा हुआ फौल्ट जिसका नुकसान बाद में

[04:15:21] सामने आता है। हम राबी ने यह समझ लिया था।

[04:15:28] मेरे फ्रेंड फैट टोनी के दो सिंपल रूल्स

[04:15:32] हैं। पायलट खुद प्लेन में हो बिना पायलट

[04:15:35] के कभी मत चढ़िए और एक बैकअप भी होना

[04:15:38] चाहिए। मतलब जिसने रिस्क डिजाइन किया या

[04:15:41] एडवाइस दी उसको खुद भी रिस्क लेना चाहिए।

[04:15:45] जिसने वॉर वोट किया उसके अपने फैमिली के

[04:15:49] आदमी को भी वॉर में भेजना चाहिए। इंजीनियर

[04:15:53] को अपने बनाए पुल के नीचे टाइम बिताना

[04:15:56] चाहिए। इकोनॉमिस्ट, जर्नलिस्ट या एनालिस्ट

[04:15:59] को अपनी ओपिनियन पर कुछ लूज होने का रिस्क

[04:16:02] होना चाहिए। फॉरकास्ट करने वाले को खुद भी

[04:16:05] उस फॉरकास्ट पर कुछ दांव लगाना चाहिए।

[04:16:09] आजकल के सिस्टम्स में लोग प्रेडिक्शन कर

[04:16:12] देते हैं, बातें करते हैं, पर खुद सेफ

[04:16:15] रहते हैं। चाहे दूसरों का नुकसान हो जाए।

[04:16:19] यही रीजन है कि प्योर टॉकर्स जो बस बोलते

[04:16:23] हैं उनको सोसाइटी में सबसे नीचे होना

[04:16:26] चाहिए और रिस्क लेने वालों को सबसे ऊपर।

[04:16:29] लेकिन आज का सिस्टम उल्टा हो गया है। जो

[04:16:32] सिर्फ बोलते हैं उनको स्टेटस मिल रहा है

[04:16:34] और जो रिस्क लेते हैं उनको नीचे देखा जाता

[04:16:38] है।

[04:16:40] आज के जमाने में इंफॉर्मेशन का पावर

[04:16:42] ज्यादा हो गया है। बोलने वालों को इंपैक्ट

[04:16:44] बहुत बड़ा हो गया है और लोग बिना कुछ किए

[04:16:47] या रिस्क लिए सोसाइटी पे इफेक्ट डाल रहे

[04:16:50] हैं। पहले जमाने में जो पावर में था उसको

[04:16:54] भी रिस्क लेना पड़ता था। जैसे राजा, जनरल

[04:16:57] सबसे पहले बैटल में जाते थे और रिस्क

[04:17:01] उठाते थे। फेल होने पर भी रिस्क लेने वाले

[04:17:04] की इज्जत थी।

[04:17:06] आज के सिस्टम में रिस्क शिफ्ट हो गया है

[04:17:10] टॉकर्स के हाथ में और वह अपनी गलती छुपा

[04:17:13] लेते हैं। दूसरे उनके बातों पर नुकसान उठा

[04:17:16] लेते हैं। दूसरा प्रॉब्लम है पोस्ट

[04:17:19] डिक्टर्स जो बाद में घटना होने के बाद

[04:17:22] कहते हैं मैंने पहले से कहा था या अपने

[04:17:26] पास्ट स्टेटमेंट्स को मैनपुलेट कर लेते

[04:17:28] हैं ताकि लगे कि वह स्मार्ट है। यह लोग

[04:17:31] सिर्फ चेरी पिक करते हैं। अपनी गलतियां

[04:17:33] हिस्ट्री में छुपा लेते हैं और फायदा उठा

[04:17:36] लेते हैं। नुकसान सबका होता है। एक मशहूर

[04:17:41] अरब पोएट अलमुतना भी थे। उनकी पोएट्री

[04:17:45] इतनी जबरदस्त थी कि लोगों पर जादू सा असर

[04:17:48] करते थे। लेकिन उनके सबसे बड़ी बात यह थी

[04:17:51] कि उन्होंने अपनी पोएट्री पर पूरा विश्वास

[04:17:54] किया। उसकी वजह से उनकी मौत हो गई क्योंकि

[04:17:57] उन्होंने एक ट्राइब को अपनी कविता में

[04:18:00] बेइज्जत किया था। फिर भी उन्होंने डर के

[04:18:02] भागने के बजाय सामना किया और मर गए। मतलब

[04:18:05] उन्होंने अपनी बात को जीवन से भी ऊपर रखा।

[04:18:12] पुराने जमाने में बैंकर्स को उनके गलत काम

[04:18:15] के लिए पर्सनल जिम्मेदार बनाया जाता था।

[04:18:17] जैसे हम राबी के लॉ में या माफिया के

[04:18:21] रूल्स में या कुछ कंट्रीज में आज भी। मतलब

[04:18:24] असली जस्टिस वही है जहां रिस्क और रिवॉर्ड

[04:18:27] का बैलेंस हो और इंसान अपने बोले या काम

[04:18:32] का असली प्राइस खुद दे। जब तक सिस्टम में

[04:18:35] सोल इन द गेम नहीं आएगा सब फेक ही चलेगा।

[04:18:39] चाहे मैनेजर हो या पोएट हो या एक्टिविस्ट

[04:18:43] हो।

[04:18:44] ग्रीिक्स के हिसाब से रियल फ्री मैन वह है

[04:18:48] जिसके पास अपना ओपिनियन है। अपने टाइम पर

[04:18:51] कंट्रोल है जो किसी भी मजबूरी में ना फंसा

[04:18:54] हो। फैट टोनी के हिसाब से असली फ्रीडम है

[04:18:58] जब आपको कोई दबा नहीं सकता। आपको कुछ करने

[04:19:02] को मजबूर नहीं कर सकता। सिर्फ पैसा या

[04:19:06] स्टेटस से इंसान फ्री नहीं होता। उसके

[04:19:09] अंदर करेज होना चाहिए। बड़ी स्टेट या नेशन

[04:19:13] में फेस टू फेस शर्म या शेम खत्म हो गई

[04:19:16] है। इसलिए सब कुछ एनोनिमस और अनएथिकल हो

[04:19:20] गया है। पब्लिक सर्विस वाले लोगों को कैप

[04:19:23] लगाना चाहिए कि वह बाद में प्राइवेट

[04:19:26] सेक्टर में ज्यादा पैसा ना कमा सके ताकि

[04:19:29] सिर्फ जेन्युइन लोग ही पब्लिक ऑफिस में

[04:19:31] आए।

[04:19:34] जिंदा होने का सबसे अच्छा टेस्ट है कि

[04:19:37] आपको बदलाव अच्छा लगता है या नहीं। बिना

[04:19:41] भूख के खाना बेकार है। बिना सैडनेस के

[04:19:44] खुशी की कोई वैल्यू नहीं। बिना

[04:19:47] अनसर्टेनिटी के रिजल्ट बेकार है। जो जीना

[04:19:51] चाहता है उसको रिस्क लेना पड़ेगा। पर्सनल

[04:19:54] रिस्क के बिना एथिकल लाइफ भी बेकार है।

[04:20:00] आज के लिए बस इतना ही। हम फिर मिलेंगे

[04:20:03] आपसे एक नए एपिसोड में एक नई किताब के

[04:20:06] साथ। मेरा नाम है रोहित और आप सुन रहे थे

[04:20:09] सिलेबस वि रोहित। धन्यवाद।
