# आज से 10 बातें छोड़ दो, निहाल हो जाओगे ! // 27-06-2026 // Shri Hit Premanand Ji Maharaj

https://www.youtube.com/watch?v=eODMpWqtSj8
Translation: en

[00:03] यह 10 बातें भगवत मार्ग के पथिक को त्याग देनी चाहिए।
  A traveler on the path of God should renounce these 10 things.

[00:07] दूसरे के धन का अपहरण करने की वृत्ति चाहे विरक्त हो चाहे गृहस्थ हो पर द्रव्य ध्यानम मनसानिष्ट चिंतनम
  The tendency to covet another's wealth, whether one is a renunciate or a householder, focusing on others' wealth, contemplating it mentally.

[00:24] जो मन से भी दूसरे के धन का चिंतन करने लगता है तो खुद उसका निष्ट शुरू हो जाता है
  When one starts contemplating another's wealth even in their mind, their own destruction begins.

[00:30] शास्त्र की बात मान लो जिम हरि शरण न को बाधा सुखी सुखी मीन ज नीगाधा तुम भगवान से विमुख होकर जी पाओगे
  Believe what the scriptures say, O Hari, there is no obstacle. You will not be able to live happily by turning away from God.

[00:41] पर द्रव्य ध्यानम ये मायावी लोग मिल जाते हैं अगर धन का चिंतन करोगे मिल जाएंगे
  Focusing on others' wealth. These illusory people will meet you. If you contemplate wealth, you will find them.

[00:50] बहुत बहुत मारा घूम रहा है रुपया रुपया के लिए
  Many, many are wandering around for money, for money.

[00:54] भगवत मार्ग चाहे गृहस्थ हो चाहे विरक्त रुपया कोई भगवत प्राप्ति नहीं कराता केवल भोग देता है
  On the path of God, whether one is a householder or a renunciate, money does not bring realization of God; it only provides enjoyment.

[00:59] तो भगवान जैसे रखे
  So, live as God keeps you.

[01:03] वैसे धर्म पूर्वक चलो अन्याय पूर्वक या चिंतन पूर्वक नहीं चिंतन नहीं धन का चिंतन।
  Walk righteously in the world, not unrighteously, or with contemplation, not contemplation, but contemplation of wealth.

[01:09] हरि का मनसानिष्ट चिंतनम।
  The mind's contemplation of Hari is not to be disturbed.

[01:14] चिंतन करोगे तुम्हारा अनिष्ट कर देगा।
  If you contemplate, it will bring you harm.

[01:17] रुपया ये संसारी पुरुष नहीं समझ रात दिन उसी का चिंतन करते हैं तभी डिप्रेशन में पहुंच जाते हैं।
  This worldly man does not understand, he contemplates it day and night, only then does he fall into depression.

[01:23] नाना प्रकार की कुभावनाएं प्रकट होने लगती है।
  Various types of negative emotions begin to manifest.

[01:30] जिसको इस जन्म में परमानंद की अनुभूति करनी है उसको सावधान पारुस अनतम च पून्यम चाप सर्वसा।
  One who wishes to experience supreme bliss in this life should be cautious. The ultimate and the virtuous are for all.

[01:43] अगर परलोक की प्राप्ति करनी परमधाम जाना है तो आप चुगली करना निंदा करना दूसरे की बातें करना छोड़ दो दूसरे के धन का चिंतन अपहरण करना छोड़ दो।
  If you wish to attain the afterlife and go to the supreme abode, then stop gossiping, criticizing, and talking about others. Stop contemplating the theft of others' wealth.

[02:00] मिथ्या भाषण पर निंदा और असंबद्ध प्रलाप।
  False speech, slander, and irrelevant rambling.

[02:04] ये साधक में नहीं होना चाहिए।
  This should not be in the seeker.

[02:07] असंबद्ध प्रलाप चुगली निंदा ये जबान में नहीं होना चाहिए।
  Irrelevant chatter, backbiting, slander, these should not be on the tongue.

[02:11] और कह रहे हैं अत्ता नाम उपादान हिंसा चवा विधानता परोप सेवाचा शारीरम त्रिविध स्मृतम
  And it is said that the self, attachment, violence, chewing, scholarship, service to others, the body, are of three types.

[02:23] बिना किसी के दिए हुए किसी वस्तु का स्पर्श मत करो।
  Do not touch anything without someone giving it to you.

[02:25] देने पर भी तब देखो कि तुम्हारे योग्य है कि नहीं
  Even when given, then see if it is worthy of you or not.

[02:33] और परदार रति क्योंकि ये गृहस्थ या विरक्त कोई भी भगवत प्राप्ति के लिए चले उसके लिए किसी भी परदार रति दूसरे की स्त्री के प्रति तनिक भी लगाव नहीं होना चाहिए।
  And adultery, because whether a householder or a renunciate, whoever sets out for the attainment of God, for them, there should not be the slightest attachment to adultery, to another's wife.

[02:47] काम भाव का अगर काम भाव का जरा भी लगाव है तो तुम्हारा पतन हो जाएगा।
  If there is even the slightest attachment to lustful thoughts, your downfall will occur.

[02:57] बहुत विचित्र समय कलिकाल का प्रभाव चल रहा है।
  A very strange time, the influence of the Kali Yuga is prevailing.

[03:02] इस पर दृष्टि ही नहीं जा रही।
  The sight is not even going towards this.

[03:02] ये जो
  This which

[03:06] व्यभचार प्रवृत्ति है इसको एक मनोरंजन मान लिया गया है।
  Adultery is a tendency, it has been considered a form of entertainment.

[03:09] इसको एक खिलवाड़ मान लिया।
  It has been considered a game.

[03:12] इसे एक सीमा में रखा गया है।
  It has been kept within a limit.

[03:15] एक सीमा में रखा। पाणी ग्रहण संस्कार कर स्वीकार करके फिर धर्म पूर्वक चलो।
  Kept within a limit. Accept after the sacrament of marriage and then walk righteously.

[03:20] वैराग्य हो जाएगा।
  Detachment will occur.

[03:23] अधर्म पूर्वक चलोगे आसक्त हो जाओगे।
  If you walk unrighteously, you will become attached.

[03:25] परदार रति
  Adultery

[03:27] यह नरक प्राप्ति का हेतु है।
  This is the cause of attaining hell.

[03:30] इसलिए उपासक जो भगवत प्राप्ति करना चाहता है अशुभ कर्मों से बचे परदार रति से बचे।
  Therefore, the devotee who wants to attain God should avoid sinful deeds and avoid adultery.

[03:37] किसी भी तरह से जो अपवित्र वस्तु दी जाए उसको स्पर्श ना करें।
  In any way, do not touch any impure object that is given.

[03:45] हमारे लिए क्या पवित्र विरक्त के लिए हम भगवत मार्ग के पथिक हैं।
  What is pure for us, for the detached, we are travelers on the path of God.

[03:52] जितना हमें चाहिए उतना मांग लेंगे।
  We will ask for as much as we need.

[03:55] जो नहीं चाहिए वो हमारे लिए सब अपवित्र हमें नहीं चाहिए।
  Whatever is not needed is impure for us, we do not want it.

[03:57] नहीं चाहिए।
  Do not want it.

[04:01] और गृहस्थ के लिए धर्म पूर्वक कमाई हुई वस्तु किसी के दान दक्षिणा या किसी का ऐसा स्वीकार ना करो।
  And for the householder, do not accept anything earned righteously, or any donation, charity, or anything like that from anyone.

[04:06] बहुत हानिकारक होता है।
  It is very harmful.

[04:09] दोष प्रयुक्त शरीरण प्रवर्तमान हिंसास्ते
  The sin committed by the body, the violence that prevails.

[04:13] प्रसिद्ध मैथुन्याचरति
  Famous for practicing sexual intercourse.

[04:19] जो दोषों को स्वीकार करके इस मार्ग में
  One who accepts the faults and on this path

[04:23] चलता है। बहुत बुरी तरह चारों खाना चित्त
  walks. Falls very badly on all fours.

[04:25] गिरता है। परमार्थ में
  falls. In the ultimate sense,

[04:31] कई तरह के मैथुन होते हैं। उन मैथुनों से
  there are many types of sexual intercourse. From those sexual intercourse

[04:34] बचे। अष्ट मैथुनों का वर्णन आया है।
  be saved. The description of eight types of sexual intercourse has come.

[04:37] यह कुकर्म आचरण करने वाला कभी भगवत प्राप्ति
  One who practices this misdeed can never achieve God-realization.

[04:40] के मार्ग में अग्रसारी नहीं हो सकता।
  cannot progress on the path.

[04:43] इसलिए शास्त्र है बहुत सावधान।
  Therefore, the scriptures are very cautious.

[04:46] चाहे गस्थ हो चाहे विरक्त अगर शुद्ध सच्चिदानंद का
  Whether one is a householder or a renunciate, if one wants to experience the pure bliss of Sat-Chit-Ananda,

[04:48] आनंद लेना चाहते हो, दुखों से अपने आप को
  want to take joy, want to save yourself from sorrows,

[04:51] बचाना चाहते हो तो हर प्रकार के मैथुनों
  then try to avoid all types of sexual intercourse.

[04:54] से बचने की चेष्टा करें।
  Make an effort to avoid.

[04:57] पर प्रीडन दूसरे को कभी दुख ना दे।
  Do not cause pain to others. Never give sorrow to another.

[05:02] मिथ्या भाषण कशोर भाषण यह सब कुकर्म के
  False speech, immature speech, all this comes under misdeed.

[05:05] अंतर्गत ही आता है। परद्रोह अन्याय पूर्वक
  It falls under it. Harming others, unjustly.

[05:09] परद्रव्य ग्रहण नास्तिकता पैदा कर देता है।
  Acquiring the wealth of others creates atheism.

[05:13] पर द्रव्य अन्याय पूर्वक ये नास्तिकता पैदा कर देता है।
  Acquiring the wealth of others unjustly creates atheism.

[05:17] भगवान से बिल्कुल विमुख कर देता है।
  It completely turns one away from God.

[05:19] भगवान छूट गए तो सब मिला मिलाया सब प्राण छूटने के बाद कुछ नहीं तुम्हारे पास।
  If God is lost, then all that you have gathered, after your life leaves you, nothing remains with you.

[05:25] भगवान है तो सब कुछ है नास्तिकता ना पावे पर द्रव्य ग्रहण से अन्याय पूर्वक न्याय कहते हैं जो धर्म शास्त्र आज्ञा करते हैं अन्याय पूर्वक धन ग्रहण करना ये नास्तिकता पैदा कर देता है।
  If God exists, then everything exists; atheism is not attained. Acquiring the wealth of others unjustly, justice is what the scriptures command. Acquiring wealth unjustly creates atheism.

[05:42] नास्तिकता क्यों आई है? क्योंकि पापाचरण है तभी नास्तिकता आती है।
  Why has atheism come? Because of sinful conduct, atheism arises.

[05:48] उपासक को सावधानी पूर्वक दुसंग से बचना चाहिए।
  The devotee should carefully avoid bad company.

[05:55] दुस कई तरह का होता है।
  Bad company is of many types.

[06:03] यदि दुर्जनों का संग मिल जाए तो जैसे 10 वर्ष सत्संग करने से आप उज्जवल
  If one encounters the company of the wicked, then just as after 10 years of good company, you become radiant.

[06:12] हुए तो 10 दिन का दुर्जन का संग आपको नष्ट कर देगा।
  So, 10 days of bad company will destroy you.

[06:17] तो कहते दुर्जनस ही संग सुजनो विनसति प्रसन्नम जलत्या करम कलसी कृतम जैसे अति निर्मल जल बहुत दिनों में होता है हिलन डुलन नहीं हुई धीरेधीरे वो शांत निर्मल होता है लेकिन उसमें जे ही कोई घुसेगा तो पूरा मलिन हो जाएगा ऐसे ही मन को निर्मल करने में बहुत समय लगता है लेकिन दुर्जन का संग चरित्र दोष ित करके हृदय को मलिन कर देने में बिल्कुल देर नहीं लगती।
  So it is said that even a good person is destroyed by bad company. Just as very pure water, which takes many days to become still and clear without disturbance, becomes completely impure if anyone enters it, similarly, it takes a long time to purify the mind, but bad company quickly corrupts character and pollutes the heart.

[06:53] इसलिए दुर्जनस ही संग सुजन विनसति बड़े-बड़े सज्जन पुरुषों का नाश भी दुर्जन पुरुषों के संग से हो जाता है।
  Therefore, good people are destroyed by bad company; even great virtuous men are destroyed by the company of wicked men.

[06:59] एक बार यदि दुर्जन का संग हो जाए तो निकलना मुश्किल होता है।
  Once you associate with bad company, it is difficult to get out.

[07:07] बड़े-बड़े सज्जनों के हृदय में भगवत मार्ग पर अविश्वास पैदा करके नास्तिक बना दिया
  It creates disbelief in the path of God in the hearts of great virtuous people, making them atheists.

[07:13] दुर्जनों ने।
  The wicked.

[07:16] जब दुर्जनता का संग हो जाता है तो वह दुर्जन पुरुष बड़े-बड़े सज्जनों के प्रति भी दोष दर्शन करता है।
  When one associates with the wicked, that wicked person finds fault even with great gentlemen.

[07:25] जैसे लोगों के साथ रहा जाता है।
  The kind of people one lives with.

[07:28] जैसे लोगों की बात सुनी जाती है।
  The kind of people one listens to.

[07:31] जैसे लोगों से हम बात करते हैं वैसा स्वभाव बन जाता है।
  The kind of people we talk to, our nature becomes like that.

[07:35] जब दुर्जनों का संग हो जाता है तो बड़े-बड़े सिद्ध साधु के पास भी वह कुछ लाभ नहीं ले पाता।
  When one associates with the wicked, even a great accomplished saint cannot gain anything from it.

[07:41] केवल दोष दर्शन करता है।
  He only finds fault.

[07:45] स्वभाव उसका बन जाता है दोष दर्शन का इसलिए भमादु दुष्ट नाम संग कुरते जमथा पुन तत्रते
  His nature becomes one of finding fault, therefore, O Bhama, do not associate with the wicked, for if by mistake one associates with the wicked, then immediately abandon the association, otherwise, he will destroy.

[07:59] यदि भूल से भी दुष्ट का संग हो जाए तो तत्काल संग त्याग कर दो नहीं वो नष्ट कर देगा दुष्ट की पहचान जिसके संग से भगवत स्मरण छूट जाए जिसके संग से कुवासनाएं
  The characteristic of a wicked person is that association with them makes one forget remembrance of God, association with them leads to evil desires.

[08:13] बढ़ने लगे उसी का संग दुष्ट संग कहा जाता है।
  The company of the wicked began to grow, which is called the company of the wicked.

[08:20] भगवान श्री राम तो इतना भी कह दिए कि बर भल बास नरक कर ताता दुष्ट संग जन दे दे विधाता नरक मिल जाए अच्छा पर दुष्ट ना मिले
  Lord Shri Ram even said that it is better to live in hell than to associate with the wicked; God, give me hell, but do not give me the company of the wicked.

[08:28] दुसंग बहुत बुरी तरह विनाश करता है।
  Bad company destroys very badly.

[08:33] उदर निमित्तम बहु कृतवेष यह दुसंग हो जाएगा जो जनेंद्र रस्द का पोषण करता भष कोई भी रखे हो वो सत्संग नहीं हो सकता वो दुसंग ही है
  For the sake of the stomach, many disguises are adopted. This will become bad company, which nourishes the senses. Whatever one keeps, it cannot be good company, it is bad company.

[08:45] जिनका चित्त शुद्ध होकर सच्चिदानंद भगवान के सुख में डूबने का लक्ष्य बन गया वो साधक सावधान दुर्जना परतव्य
  Those whose minds have become pure and whose goal has become to drown in the bliss of the ever-blissful Lord, that seeker should be careful, avoid the wicked.

[08:54] विद्या अलंकृत यदि मणिना भूषिता सर्पा किमसना भयंकर
  Even if a snake is adorned with a jewel, is it not terrible?

[09:00] दुर्जन मनुष्य हो बहुत विद्वान हो तो तुम्हारा नाश ही कर देगा जैसे मणि से भूषित सांप हो तो क्या विष नहीं छोड़ेगा
  If a wicked person is very learned, he will surely destroy you. Just as a snake adorned with a jewel, will it not still shed venom?

[09:07] वो विषय ही छोड़ेगा इसलिए बहुत संभल करके
  It will only shed poison, so be very careful.

[09:16] सदरासी सततम सद कुरत संतितम सदर विवादम
  Always associate with the virtuous, engage in virtuous deeds, and do not quarrel with the virtuous.

[09:20] मैत च ना सद कििंचिदाचरे
  Do not behave in any way that is not virtuous.

[09:24] संत पुरुषों के साथ रहो संत पुरुषों का
  Stay with saintly men, associate with saintly men.

[09:27] संग करो उनसे विवाद मत करो जैसा वो कह रहे
  Do not quarrel with them, do as they say.

[09:31] हैं वैसे करो सज्जन पुरुषों के संग से
  By associating with noble men,

[09:34] तुम्हारे हृदय में सज्जनता आएगी और
  nobility will come into your heart, and

[09:36] दुर्जनों का संपर्क तुम्हारे हृदय में
  contact with wicked men will in your heart

[09:39] अश्रद्धा पैदा कर देगा कैसा अब जिस संत से
  create faithlessness. How is it that now, with the saint you meet,

[09:43] मिलोगे तुम्हारे अंदर अश्रद्धा है तो तुम
  you have faithlessness within you, then you

[09:45] वहां दोष दर्शन करोगे।
  will find fault there.

[09:49] महापुरुषों के समीप रहते हुए भी तुम कुछ
  Even while staying near great souls, you will gain nothing.

[09:52] नहीं प्राप्त कर पाओगे।
  You will not be able to attain anything.

[09:52] जाड्या धियो हरति वाच सत्यम मनोति दति पाप मपा करोति चेता
  It removes ignorance, steals speech, truth, mind, gives, removes sin, consciousness.

[09:57] प्रसाद दी तनोति कीर्त सत्संगति कथ किम न
  It bestows grace, expands fame. What does good company not do for a person?

[10:02] करोति पुषम जब सत्संग मिलता है तो हृदय का
  When good company is found, the heart's

[10:06] कूड़ा करकट दूर हो जाता है काम क्रोध ये
  dirt and debris are removed. Lust, anger, these

[10:10] नष्ट हो जाते हैं।
  are destroyed.

[10:13] बुद्धि विवेकवान होकर
  The intellect becomes discerning.

[10:16] भगवान की तरफ बढ़ती है और जब कुसंग मिलता है तो ऐसी संशयम बुद्धि हो जाती है कि बड़े-बड़े संत महात्माओं के समीप जाकर के भी वो दुर्लभ लाभ ना लेकर वो दोष दर्शन करता रहता है।
  It moves towards God, and when it encounters bad company, the intellect becomes so doubtful that even by going near great saints and mahatmas, it does not take that rare benefit and keeps seeing faults.

[10:30] समीप में दूरदूर से आकर लोग उनके दर्शन और उनके वचन सुनकर अपना परम कल्याण कर लेते हैं।
  People coming from far and wide near them take their darshan and listen to their words, thereby achieving their ultimate welfare.

[10:36] लेकिन दुर्जन स्वभाव वाला दुर्जन संग करने वाला उनके समीप रहकर उनकी निंदा करता है।
  But a wicked person, who has a wicked nature and keeps bad company, stays near them and criticizes them.

[10:43] उनके दोष दर्शन करता है।
  He sees their faults.

[10:46] उनसे लाभ नहीं ले पाता है।
  He is unable to take benefit from them.

[10:49] अनेकों बार बड़े महापुरुषों का संग प्राप्त होने पर भी वो अगम में रहते हैं।
  Many times, even after getting the company of great saints, they remain inaccessible.

[10:52] वो उनका लाभ नहीं ले पाते।
  They are unable to take their benefit.

[10:56] इसीलिए देवर्षि नारद जी ने बताया कि साधु संग अगम्य है।
  Therefore, Devarshi Narada explained that the company of saints is inaccessible.

[10:59] साधु के समीप रहना साधु के समीप जाना अगर आपके अंदर दुष्टता है, दुष्ट स्वभाव है तो आप उसका लाभ नहीं ले पाएंगे।
  Staying near a saint, going near a saint, if you have wickedness within you, a wicked nature, then you will not be able to take its benefit.

[11:07] दूर दूर से आकर लोग दर्शन संभाषण और अपना परिवर्तन कर रहे हो।
  People coming from far and wide are having darshan, conversation, and are transforming themselves.

[11:11] समीप
  Nearby

[11:16] रहकर दुष्ट स्वभाव होने के कारण वो साधु में दोष दर्शन करने के कारण लाभ नहीं ले पाते।
  Remaining, due to their wicked nature, those ascetics, by seeing faults in others, are unable to gain benefit.

[11:22] इसलिए सदैव सत्संग करो।
  Therefore, always associate with the virtuous.

[11:26] दुर्जनों का संग त्याग करो।
  Abandon the company of the wicked.

[11:30] नाम जप करो और रस्द को संभाल के रखो और लेने में बहुत सावधान रहो।
  Chant the divine name, keep provisions carefully, and be very cautious in receiving.

[11:33] किसी से कुछ लेने में सावधान रहो।
  Be cautious in taking anything from anyone.

[11:37] वो ऐसा पाप की कमाई ना हो जो तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट करके भगवान से विमुख कर दे।
  May it not be ill-gotten gains that corrupt your intellect and turn you away from God.

[11:42] चाहे गृहस्थ हो चाहे विरक्त अन्याय पूर्वक जीवन नहीं होना चाहिए।
  Whether one is a householder or a renunciate, life should not be lived unjustly.

[11:45] धर्म पूर्वक जीवन होना चाहिए।
  Life should be lived righteously.

[11:47] भगवत मार्ग में सबसे ज्यादा जो बाधक है वो है मान, बढ़ाई, प्रशंसा, सम्मान और हे लाडली हमारा मन इसी में फंस गया।
  The greatest obstacles on the path to God are honor, praise, admiration, respect, and O beloved, our mind gets entangled in these.

[12:05] मान, सम्मान प्रिय लगने लगा।
  Honor and respect began to feel dear.

[12:09] बढ़ाई प्रतिष्ठा कीर्ति अच्छी लगने लगी।
  Praise, reputation, and fame began to feel good.

[12:13] इसीलिए हर्ष और शोक
  Therefore, joy and sorrow

[12:17] मान और अपमान दुख और सुख इन द्वंदों में मैं फंस गया।
  Honor and dishonor, sorrow and happiness, I am trapped in these dualities.

[12:23] हे मेरी स्वामिनी अगर कोई बचा सकता है तो सिर्फ आप बचा सकते हो।
  O my mistress, if anyone can save me, it is only you.

[12:29] क्योंकि मान प्रतिष्ठा यह ऐसा मीठा जहर है कि इसे कोई छोड़ना नहीं चाहता और बिना इसको त्यागे भगवत प्राप्ति या तत्व बोध हो ही नहीं सकता।
  Because honor and prestige are such a sweet poison that no one wants to leave them, and without renouncing them, divine realization or self-knowledge cannot be attained.

[12:44] जिसकी दृष्टि में गौरव अर्थात मान घोर गौरवम प्रतिष्ठा सुकरी विष्ठा सम्मानम विष के समान सम्मानम कल्यात घोर गरम वो इस मार्ग में आगे बढ़ता है।
  He whose vision considers glory, that is, honor, great glory, prestige, like excrement, honor, like poison, greatly heated, he moves forward on this path.

[13:03] मेरी लाडली मेरे मन बुद्धि तो मान सम्मान में गौरव करते हैं।
  My darling, my mind and intellect take pride in honor and respect.

[13:08] दुख सुख हर्ष शोक द्वंदों में फंसे हुए हैं।
  They are trapped in the dualities of sorrow, happiness, joy, and grief.

[13:13] हे मेरी लाडली इसमें
  O my darling, in this

[13:17] हमारा साधन बल काम नहीं करेगा।
  Our means and strength will not work.

[13:21] आपकी कृपा से ही हम इससे निकल सकते हैं।
  Only by your grace can we get out of this.

[13:26] संग दोष व्यापे घने कासो कहो पुकार श्यामा प्यारी तुम बिना मेरो सुनो सब संसार।
  When the company of evil prevails, whom shall I call out to? Beloved Shyama, without you, my whole world is deaf.

[13:43] शास्त्रों में वर्णन किया गया है कि जो साधक जित संग दोष होता है वही भगवत प्राप्ति करता है पर हमारे ऊपर तो छोटे छोटे छोटे विषयों के संग का प्रभाव, व्यक्तियों के संग का प्रभाव, धना आदि का प्रभाव तो संग दोष से हम युक्त हो गए हैं।
  It is described in the scriptures that the devotee who is free from the company of evil attains God realization, but we are affected by the influence of the company of small, small worldly matters, the influence of the company of people, the influence of wealth, etc., so we have become afflicted by the company of evil.

[14:05] मेरा कोई संसार में नहीं है कि मुझे सहयोग दे सके।
  I have no one in this world who can help me.

[14:15] श्यामा प्यारी किससे पुकार करके कहूं कि हमारे हृदय में
  Beloved Shyama, to whom shall I cry out and say that in my heart

[14:18] संग दोष जागृत हो चुका है।
  The company of sin has awakened.

[14:22] हमारे हृदय में मान प्रतिष्ठा अच्छी लगने लगी है।
  In our hearts, honor and prestige have begun to feel good.

[14:25] हमारे हृदय में दुख सुख हर्ष शोक का प्रभाव पड़ रहा है।
  In our hearts, the influence of sorrow, happiness, joy, and grief is falling.

[14:33] लाडली आप ही केवल हमारी तरफ करुणा दृष्टि से देखो तो यह दूर हो जाए।
  Ladli, if you alone look towards us with a compassionate gaze, this will be removed.

[14:36] कोई दूसरा इस संसार में आपके सिवा हमारा नहीं है।
  There is no one else in this world for us besides you.

[14:46] मैं जानो कछु सूरज है दिन प्रति उरझो जाए।
  I know something like the sun gets entangled every day.

[14:50] मैं मेरे बस हूं नहीं श्यामा जो कहूं सुनाए।
  I am not in my control, Shyama, what I say is heard.

[14:59] हम आपसे साफ बात कह रहे हैं।
  We are telling you plainly.

[15:03] श्यामा जी मैंने समझा कि साधन पथ में चलने पर मैं सुलझ जाऊंगा सुधर जाऊंगा।
  Shyama Ji, I thought that by walking on the path of practice, I would become disentangled and improve.

[15:06] लेकिन स्वामिनी जी यहां तो और उलझ गया।
  But Swamini Ji, here I became even more entangled.

[15:11] तन छाड़े मन ग रहे दोनों ही दुख होए।
  The body is left behind, the mind is gone, both cause suffering.

[15:15] तन से विषय भोग छोड़ा।
  From the body, the enjoyment of worldly pleasures was abandoned.

[15:15] मन उनको पकड़े हुए है।
  The mind is still holding onto them.

[15:19] लाडली सुलझा दो आप ही सुलझा सकती हो।
  Ladli, resolve it, you alone can resolve it.

[15:22] दूसरा कोई नहीं।
  No one else can.

[15:26] मैंने समझा मैं सूरज रहा हूं लेकिन दिन का दिन छूटवे के जतन विशेष बांधे जाओगे तो लाडली अब आप ही छोड़ दो इस माया के बंधन से इस मैं मोर तय तोर के बंधन से आप ही आप हमें छुड़ा लो मन बुद्धि ये थिर नहीं
  I thought I was the sun, but if special efforts are made to leave the day, then Ladli, now you yourself release us from this bondage of illusion, from this bondage of mine, my chosen form.

[15:47] ये भरी भंगार श्री श्यामा करुणा भरी दृष्टि नेक निहार बहुत कूड़ा भरा है हृदय में स्वामिनी जो ये अंतःकरण चतुष्टय बुद्धि का निश्चय होना चाहिए प्रिया प्रीतम के सिवा हमारा कोई नहीं मन का संकल्प विकल्प प्रिया प्रीतम की सेवा जगत की सेवा औरित का निरंतर भगवदाकार चिंतन
  This is full of impurities. Shri Shyama, with a compassionate glance, look kindly. There is a lot of garbage filled in the heart, Swamini. This inner quartet, the determination of the intellect should be, besides Priya Pritam, we have no one. The mind's resolutions and alternatives are service to Priya Pritam, service to the world, and continuous contemplation of the divine form.

[16:20] अहम का पूर्ण दासत्व में समर्पण ये सब कुछ नहीं बड़ा कूड़ा करकट भरा हुआ है।
  The complete surrender of the ego to servitude, all this is not filled with great garbage.

[16:27] कोई भी सत कार्य होते हैं उसमें अहंकार उदय हो जाता।
  In any good deed, ego arises.

[16:30] मैंने किया।
  I did it.

[16:30] बुद्धि का निश्चय है।
  It is the determination of the intellect.

[16:33] जगत में भोगों में रुपया में प्रतिष्ठा में सुख है।
  There is happiness in worldly pleasures, in money, in prestige.

[16:36] मन नाना प्रकार की भोग वासनाओं का संकल्प करता रहता।
  The mind keeps resolving various types of sensual desires.

[16:40] बड़ा कूड़ा कर्कट अंतःकरण में जमा है।
  Great garbage is accumulated in the inner self.

[16:43] हे मेरी श्यामा प्यारी आप करुणा दृष्टि से देख लो तो आपकी दृष्टि मात्र से मन बुद्धि सुधर जाएंगे।
  O my beloved Shyama, if you look with a compassionate gaze, then with just your sight, the mind and intellect will improve.

[16:55] श्यामा प्यारी लाडली तुम जानत हो सबके भाव मेरे तो तुम एक हो।
  Shyama, beloved Ladli, you know everyone's feelings, for me, you are the only one.

[17:13] कछु साधन ना ही उपा ना हमारे कोई साधना है ना कोई उपाव है आप
  There is no means, no remedy, we have no practice, no remedy, you

[17:23] सबके मन के भाव को जानती हो हे श्यामा जी
  You know the feelings of everyone's heart, O Shyama Ji.

[17:27] आप ही हमारी साधना हो आप ही हमारे साध्य हो
  You are our practice, you are our goal.

[17:31] आपके सिवा हमारा कोई और साधन साध्य नहीं है हे लाडली
  Besides you, we have no other means or goal, O Ladli.

[17:38] जो अपने अवगुण कहो पाऊ और ना छोड़ पर अंतर की तुम जानो सब
  Whatever flaws I may have, I find them and do not let them go, but you know everything within.

[17:55] मेरी श्यामा कहो निहोर यदि हम अपनी गाथा हृदय की सुनावे तो कितने अवगुण है पार नहीं पाएंगे
  My Shyama, if I tell the story of my heart, I cannot overcome so many flaws.

[18:08] बस एक बात हृदय में देख पा रहे हैं कि वह स्वीकार करता है कि हमारी माई श्यामाजू को राज
  I can only see one thing in my heart, that it accepts that our mother Shyama Ji is the queen.

[18:15] हे श्यामाजू आपके सिवा और किसी का आश्रय नहीं है इसलिए आपसे ही निहरा है कि
  O Shyama Ji, besides you, there is no refuge for anyone, therefore, it is from you that...

[18:24] आप ही हमारे हृदय को पावन कर दो अपने प्रेम के योग्य कर दो निर्विकार कर दो
  You yourself purify our hearts, make them worthy of your love, make them unblemished.

[18:32] राधा प्यारी मेरी स्वामिनी
  Beloved Radha, my mistress.

[18:38] निज सहज चरी समुदाय
  The community of my natural companions.

[18:43] अली माधुरी
  Ali Madhuri.

[18:47] आपके चरण परी बिललाए
  I fall at your feet and cry out.

[18:51] हे समस्त सहचरियों
  O all you companions.

[18:53] आपके मध्य में विराजमान जो श्यामा श्याम है सहचरी सहित समस्त वृंदावन के परिकर को
  Those who are present among you, Syama and Shyam, along with their companions, the entire retinue of Vrindavan.

[19:02] प्रिया प्रीतम को हृदय से बार-बार वंदना करते हुए विलख कर हम केवल इनके चरणों का आश्रय लेते।
  With repeated salutations from the heart to the beloved and the beloved, crying, we take refuge only at their feet.

[19:11] अब आप देख लो आपको संभालना है।
  Now you see, you have to take care of it.

[19:15] इसे निर्भरा भक्ति कहते हैं।
  This is called selfless devotion.

[19:20] पूर्ण रूप से अपने इष्ट के भरोसे में हो
  Be completely in the trust of your beloved.

[19:24] जाना।
  To go.

[19:29] जब अपनी तरफ दृष्टि जाए तो अति दैन्य और दोष युक्त।
  When we look towards ourselves, we are full of extreme misery and faults.

[19:32] और जब इष्ट की तरफ दृष्टि जाए तो अत्यंत गर्व और आनंदमय तो हम अपनी तरफ दृष्टि करके अपने इष्ट को बता रहे हैं कि हमारे में यह सब दोष है।
  And when we look towards the beloved, we are full of extreme pride and joy, so by looking towards ourselves, we are telling our beloved that we have all these faults.

[19:39] हमारे में ऐसा कोई गुण नहीं कि हम आपको प्रसन्न कर पावे।
  We have no such quality that we can please you.

[19:46] इसलिए हे लाडली हे लालजू आप कृपा करो और अपने योग्य हमारे हृदय को बना लो क्योंकि बनावटी प्रभु को पसंद नहीं।
  Therefore, O Ladli, O Lalju, please have mercy and make our heart worthy of you, because the Lord does not like pretense.

[19:59] निर्मल जन मन सो मोहि पावा मोहि कपट छल छिद्र न भावा।
  The pure-hearted find me; I do not like deceit, trickery, or flaws.

[20:10] मुझे कोई कपट छल दोष विचार ये प्राप्त नहीं कर सकते मुझे प्राप्त कर सकता है निर्मल मन और हमारा मन मलिन है।
  No deceit, trickery, or consideration of faults can attain me; a pure mind can attain me, and our mind is impure.

[20:17] तो हम आपसे निवेदन करते हैं हे
  So we request you, O

[20:24] प्रभु आप अपने योग्य बना लीजिए इस मन को।

[20:28] मेरे में सामर्थ्य नहीं कि मैं आपके योग्य

[20:32] मन को बनाकर के आपकी प्राप्ति कर पाऊं।

[20:36] अगर हम करोड़ों कल्पों तक साधना करें तो

[20:39] भी आपके योग्य नहीं बन पाएंगे। और अगर आप

[20:43] पल पाओ पल के चौथाई हिस्से में चाहे तो

[20:46] मेरा मन आपके योग्य हो सकता है। इसलिए हम

[20:50] पूर्ण रूप से अजात पक्षायु मातरम खगा जैसे

[20:55] बिना पंख निकला हुआ चिड़िया का बच्चा कुछ

[20:59] नहीं कर सकता। केवल मां की बाट जो होता

[21:01] है। बस ऐसे हे मेरी श्यामाजु

[21:04] हमारे में कोई साधन नहीं। बस आपकी कृपा की

[21:08] बाट जो रहा हूं। इसे पूर्ण आत्म समर्पण

[21:13] निर्भर शरणागति भक्ति कहते हैं। और यह

[21:16] अमोग है जिसके हृदय में ऐसा समर्पण हो गया

[21:20] हमारे माई श्यामा को राज तो हरि ही श्यामा

[21:25] है। श्यामा ही हरि है। केवल

[21:28] स्वभाव

[21:30] और महिमा का रसास्वादन कराने के लिए प्रभु

[21:34] अपने प्रेम स्वभाव और अपनी प्रेम महिमा का

[21:37] रसास्वादन कराने के लिए ही हरि राधा

[21:40] किशोरी के रूप में विराजमान है। और प्रेम

[21:44] का कैसे रसास्वादन किया जाता है। कितनी

[21:47] दैन्यता तो राधा किशोरी ही हरि के रूप में

[21:51] विराजमान है। हरि ही राधा किशोरी है। राधा

[21:54] किशोरी ही हरि है। किंच मात्र इनमें भेद

[21:57] नहीं है। देखो यद्यप सकल लोकमणि यद्यपि

[22:01] हरि अनंत ब्रह्मांडों के स्वामी पर दीन पन

[22:05] को मानत दैन्य होकर कैसे प्रेम का

[22:08] रसास्वादन करते हैं तो प्रेम का रसास्वादन

[22:12] कैसे किया जाता है हरि रूप और प्रेम और

[22:16] प्रेम का प्रभाव और प्रेम का स्वभाव श्री

[22:19] राधा किशोरी रूप हमारा अहो भाग्य पता नहीं

[22:22] कौन सा

[22:25] अवगुण देख के रीझ गए प्रभु गुण तो है ही

[22:29] नहीं कि ऐसी महामहिम महाधुर्य रस करुणा

[22:32] समुद्र से लाडली जू के चरणों की शरणागति

[22:35] मिली और हमें यह गर्व से कहने का साहस हुआ

[22:41] कि हम श्री जी के हैं। हम लाडली जी के

[22:44] हैं। यह अनन्यता हृदय में आ गई तो सर्वस्व

[22:48] की प्राप्ति हो जाएगी। देख लेना मेरे

[22:51] प्रभु अनन्यता देखते हैं और जितने दिव्य

[22:54] सद्गुण प्रभु को रिझाने की वृत्तियां वो

[22:58] सब इसी अनन्यता से जागृत हो जाती है। जब

[23:02] हम शरीर के अनन्य होते हैं तो सारे दोष

[23:04] जागृत हो जाते हैं। और जब हम प्रियाल के

[23:07] अनन्य होते हैं तो सारी दैवी संपदा जागृत

[23:10] हो जाती है। इसमें साधन बल नहीं। इसमें

[23:14] अनन्यता, इसमें प्रियता, इसमें ममता और वह

[23:18] ममता, प्रियता, अनन्यता

[23:21] धाम प्रदान करता है। जब हम धाम के आश्रित

[23:25] होते हैं तो रजरानी की कृपा और रसिकों की

[23:29] कृपा मिलती है। जो श्री जी के अनन्य है।

[23:31] उन्हीं की कृपा से हमारे हृदय में यत

[23:34] किंचित अनन्यता जागृत होती है। अनन्यता ही

[23:38] साधना की परम सिद्धि है। अनन्यता ही

[23:42] परमार्थ की वह सुदृढ़ भूमि है जिस पर

[23:45] दिव्य लीलाओं का रसास्वादन होता है।

[23:48] अनन्यता ही जीवन मुक्तता है। अन्य ही जीवन

[23:52] बंधन है। वो धन्य है जो अपने इष्ट के

[23:56] गुरुदेव के अनन्य हो गए। जिनके हृदय में

[23:59] ऐसी दृढ़ता आ गई कि बने तो रघुवर ते बने

[24:03] बिगड़े तो भरपूर। तुलसी और ते बने ता बनवे

[24:07] पे धूर ये अनन्यता हमारे इष्ट हमें जैसे

[24:12] रखे हम राजी हैं हम राजी हैं जिसमें हमारे

[24:16] इष्ट राजी है इष्ट जैसा जैसा विधान करते

[24:19] हैं चाहे वो दुखद हो चाहे सुखद हो हम कभी

[24:23] कोई प्रश्न उनसे नहीं करेंगे और हम

[24:25] प्रसन्न रहेंगे उनके विधान को मानकर ये

[24:29] अनन्य भक्त के हृदय की स्थिति होती है

[24:32] श्रीपाद प्रबोधनांद जी महाराज

[24:37] श्री वृंदावन धाम के अनन्य महापुरुष हैं।

[24:41] जिनको तत्व बोध है और प्रियाल के प्रेम

[24:45] में उन्मत्त रहते हैं। वह कहते हैं कलिंद

[24:50] सुतयातम

[24:52] प्रणय माधुरी

[24:55] धया

[24:58] प्रबद्ध सुख चंद्रिका

[25:01] जलद फुलवली

[25:03] धुमम

[25:05] कपूत सुख सारिका

[25:09] पिक मयूर काल कृतम भ्रमद भ्रमर झं कृतम

[25:15] जयति धाम

[25:17] वृंदावनम

[25:21] प्रेम रस की धारा

[25:25] यहां बहती रहती है वृंदावन में अब निज

[25:29] धर्म आपनो कहत तहां नित्य वृंदावन रहत बहत

[25:35] प्रेम सागर जहां

[25:38] बोले प्रणलय माधुरी की रसधारा यहां

[25:41] प्रवाहित होती है। जैसे समुद्र के तट पर

[25:45] रहने वाले को शंका बनी रहती है। कभी भी

[25:49] ज्वार भाटा आए और तटस्थ भूमि को तोड़ के

[25:53] डुबो दे। ऐसे ही वृंदावन में है। यह बहता

[25:58] हुआ प्रेम समुद्र है। बहता हुआ

[26:02] इसकी तरंगे हैं। इसकी लहर है। इसकी धारा

[26:05] है। यहां की लताएं खग मृग पशु पंछी यहां

[26:09] के रसिक महात्मा

[26:12] ये जब बाढ़ आएगी किसी भी रसिक महापुरुष का

[26:16] सानिध्य मिला और उसकी करुणा बरस गई तो

[26:19] प्रेम में डूब ही जाओगे।

[26:22] यहां पक्का प्रेम में डूब जाओगे। अंतिम

[26:25] क्षण तक डूब जाओगे। अगर अभी कुछ नहीं बन

[26:28] पा रहा और आप धाम के आमरण व्रत धारी हैं

[26:33] कि मेरा शरीर छूटे तो वृंदावन में छूटे तो

[26:37] अंतिम समय तक किसी न किसी सखी की नजर

[26:40] पड़ेगी और आपको प्रियाल के प्रेम में डुबो

[26:44] देगी। क्योंकि करुणा का मूर्तिमान स्वरूप

[26:47] सहचर्या है। इसलिए धाम प्रेम धाम कहा गया

[26:52] है। यहां प्रेम समुद्र बहता हुआ है। यद्यप

[26:55] समुद्र स्थिर होता है। पर यहां कह बहुत

[26:59] प्रेम सागर जहां क्योंकि प्रेम स्थिर नहीं

[27:03] है। प्रति क्षण वर्धमानम है। बढ़ता ही

[27:06] रहता है। प्रेम जैसे चंद्र कला बढ़ता है।

[27:10] पर चंद्रमा में पूर्णिमा होती है। प्रेम

[27:12] में कभी पूर्णिमा नहीं होती है। सदैव

[27:14] बढ़ता रहता है। नवम नवम नवम प्रति क्षण

[27:17] वर्धमानम इसलिए बहता हुआ प्रेम समुद्र

[27:20] वृंदावन धाम है। और इसकी तरंगे हैं। यहां

[27:24] की लता रज रानी खग मृग पशु पंछी और यहां

[27:27] के रसिक जन किसी की भी कृपा हो जाए। यहां

[27:31] के एक पक्षी की कृपा हो जाए तो आप प्रेम

[27:34] में डूब जाएंगे। यहां एक लता की कृपा हो

[27:37] जाए। यहां किसी रसिक की कृपा हो जाए तो जो

[27:40] प्रेम बड़ी-बड़ी साधनाओं से भी सुलभ नहीं

[27:43] है अत्यंत दुर्लभ वो प्रेम प्रकाशित हो

[27:47] जाए प्रेम मेरी प्रियाजू मेरे लालजू और

[27:51] उनका चिंतन करते हुए अशुभ प्रवा कर हृदय

[27:54] में ऐसी पीड़ा हो रही हाय कब मिलेंगे जो

[27:57] मेरे हैं अनंत जन्मों से बिछड़े दरस बिन

[28:00] दुःखन लागे नैन भारी विकलता अनंत जन्मों

[28:05] के पाप संस्कार भस्म हो गए

[28:07] कर्म बंधन छिन्न भिन्न हो गए और वह भगवत

[28:11] स्वरूप होकर प्रियाल की दिव्य लीला में

[28:14] प्रवेश पा गया। यह प्रणय रस धारा है श्री

[28:18] धाम वृंदावन

[28:20] और बहुत करुणा करके दुरंत मोह का नाश करने

[28:24] वाली श्री यमुना जी ये श्रृंगार रसधारा

[28:27] मानो द्रवित होकर प्रवाहित हो रही हो।

[28:31] बहुत करुणा है यमुना रस रानी की जिस पर

[28:34] यमुना जी प्रसन्न होती है दुरंत मोह का

[28:37] नाश करके इसी जन्म में राधा वल्लभ लाल की

[28:40] उत्तम प्रेम लक्षणा भक्ति और सहचरी भाव

[28:43] प्रदान कर देती है यही राधिका पते पदा

[28:47] भक्तिमा मवा ध्रम भवेत परत्र तत प्रियगा

[28:52] आप मलिन दृष्टि मत रखें यमुना जी में कि

[28:55] ये गिर रहा है वो गिर नहीं जैसे अग्नि

[28:59] भगवान सब कुछ जलाकर अपना स्वरूप दे देते

[29:02] हैं। ऐसे यमुना जी सबको अपना स्वरूप

[29:06] प्रदान कर देती हैं। परम पावन यमुना जी को

[29:09] कभी कोई अपवित्र कर ही नहीं सकता। किसी की

[29:12] सामर्थ्य नहीं है। यमुना जी साक्षात करुणा

[29:15] बपू है। हमारी लाडली जो की प्रिय सहचरी

[29:19] है। और मोह का नाश होना बड़ा कठिन है। सो

[29:22] यमुना जी नाश कर देती है। जिसने यमुना जी

[29:25] का दर्शन किया, यमुना जी का आचमन किया,

[29:28] यमुना जी का अवगाहन किया वो कभी यमपुरी

[29:30] नहीं जा सकता।

[29:32] पक्का

[29:34] जो यमुना जी का थोड़ी भी भक्ति कर ली है

[29:38] तो यमुना के भक्ति मात्र से उनके परम

[29:42] भ्राता

[29:44] श्री जो यमराज जी हैं वो अपने दूतों को

[29:47] आदेश करते हैं कभी भी जिसके मुख से यमुना

[29:50] निकला है आचमन किया है अवगाहन किया है

[29:53] बैठकर समीप कुछ नाम जप किया कभी मत जाना

[29:56] उनकी तरफ देखना भी मत ऐसी यमुना जी जहां

[30:00] प्रवाहित हो रही परेश वर्ण रूपणी भगवान

[30:03] श्री कृष्ण की श्री अंग की जैसी कांत ऐसे

[30:07] झलमल झलमल श्याम वर्ण यमुना बड़ी दिव्य है

[30:10] यमुना जी अपने तो नेत्र प्राकृतिक है

[30:14] इसलिए देख नहीं पा रहे जब त्रिगुणातीत

[30:16] कृपा होगी श्री जी की और त्रिगुणातीत

[30:19] वृत्ति जागृत होगी तब आप इन यमुना जी को

[30:22] देखेंगे बड़ी दिव्य है जिनमें स्वर्ण कमल

[30:25] नील कमल

[30:28] पीत कमल अरुण वर्ण के कमल विविध प्रकार के

[30:31] कमल खिले हुए हैं। भौरे गुंजार कर रहे

[30:34] हैं। समीप में ही कुंज में अद्भुत अद्भुत

[30:38] लताएं फूली हुई झूम रही हैं। और कपोत सुख

[30:42] सारिका पिक मयूर कालंकृतम

[30:46] कपोत

[30:48] सुख सारिका कोकिला मोर ऐसे गुंजार कर रहे

[30:53] हैं। ऐसे मानो प्रियाजू का यश गा रहे पर

[30:57] हम उनकी वाणी समझ नहीं सकते। ऐसा लगता है

[31:00] कि ये शोरगुल कर रहे हैं। नहीं वो राधा

[31:03] यशो मुखर मत खगावली की यहां के जितने

[31:06] पक्षी हैं सब श्री जी का नाम श्री जी का

[31:09] जस गान कर रहे हैं।

[31:14] कृष्ण प्रेम रसम सदा रसयते वृंदावन

[31:19] अंतर्गतम

[31:21] जो वृंदावन के अंतर्गत

[31:23] अपने जीवन को समर्पित कर दिया है। पक्का

[31:27] श्री कृष्ण प्रेम में डूबेगा। डूबेगा

[31:30] पक्का डूबेगा।

[31:33] जब

[31:35] वृंदावन में आए और बिहारी जी की कृपा से

[31:38] राधा वल्लभ जी गए। जब राधा वल्लभ जी के

[31:41] दर्शन किए तो ऐसा लगा

[31:44] जैसे बहुत पहले से हम इनसे परिचित है।

[31:49] श्री कृष्ण प्रेम रसम सदा रसते वृंदावन

[31:53] अंतर्गतम

[31:55] वृंदावन में यदि अपने जीवन को समर्पित कर

[31:58] दिया जाए चाहे आश्रय भाव से या वास भाव से

[32:03] अरे बहुत मानो कृपा ही कृपा उदय हुई है

[32:06] वृंदावन के रूप में

[32:10] आप लोग बाहरी दृष्टि से देखेंगे तो आपको

[32:13] दोष दर्शन भी दिखाई दे सकता है। लेकिन

[32:16] आपसे सत्य कहते हैं। कभी-कभी एकांत में जब

[32:19] वृंदावन की कृपा उदय होती है तो सिर्फ

[32:22] रोना आता है कि

[32:25] कोई ऐसे सद्गुण नहीं, कोई ऐसी बात नहीं

[32:28] जिससे हमारी प्रिया ने हमें रीच कर

[32:30] वृंदावन का अखंड वास दे दिया। हमें अपने

[32:33] महल में हम कहां वास कर रहे हैं? वृंदावन

[32:36] वासी हैं। प्रिया प्रीतम के चरण चिन्हों

[32:40] में वास कर रहे हैं। परम पावन रज में वास

[32:42] कर रहे हैं। हम धाम वासी हैं। कहां नारकी

[32:47] जन्म कहां नारकी योनियों में भटकने वाला

[32:50] जीव और कहां परम पावन महामहिम शिव सनकाद

[32:53] द्वारा बंदित रज में वास करने का सौभाग्य

[32:58] श्री कृष्ण प्रेम रसम सदा रसते वृंदावन

[33:02] अंतर्गतम श्री प्रिया और कृष्ण लाल प्रिया

[33:06] लाल के प्रेम रस से डुबो देने वाला ये

[33:09] वृंदावन है जिसने वृंदावन का आश्रय लिया

[33:12] वृंदावन का वास स्वीकार किया आप केवल केवल

[33:15] अपराध मत कीजिए। जो साधन पद्धति बताई गई

[33:19] उससे समय काटिए। परम लाभ तो कृपा से हो

[33:22] जाएगा। आपका प्रयत्न केवल अपराध रहित होने

[33:26] के लिए आपसे असाधन ना बने इसलिए काम तो सब

[33:30] कृपा से हो जाएगा।

[33:33] चेता स्थान चरिष्णु चिदघन मोह रूपम तवा पी

[33:38] दम।

[33:40] यहां अगर पक्षी भी कोई बाहर से उड़कर आकर

[33:42] वास करता है तो वह भगवत स्वरूप हो जाता

[33:45] है। चिद घन स्वरूपम तो पक्षी क्या साधना

[33:48] करता है? केवल आश्रित हो गया वृंदावन के

[33:53] ऐसे ही आप भी आश्रित हो जाए तो कह रहे

[33:56] चिदघन रूपम तवापी दृश्यम तुम भी वही

[34:00] चिदानंद रूप हो जाओगे यदि वृंदावन का

[34:03] आश्रय ले लिया वृंदावन का वास स्वीकार कर

[34:06] लिया वृंदावन का चिंतन करते हो वृंदावन की

[34:09] महिमा सुनते हो तो धाम आपको चिदघन रूप

[34:12] प्रदान करेगा चेता स्थानु चरष्णु

[34:16] यहां के चैतन्य और जड़ सब चिदानंद रूप हो

[34:20] जाएंगे। अभी हैं आप देख नहीं पा रहे।

[34:23] लेकिन अंतत गत्वा आप भी चिदानंद रूप हो

[34:26] जाएंगे। यदि वृंदावन का आश्रय और वास

[34:28] स्वीकार किया। एवं चे नहीं भात तद गुरु

[34:32] मुखान सदा चिंत।

[34:36] यहां वृंदावन में सद्गुरु का वर्णन करो।

[34:39] तो तुम भी ब्रजवासी हो जाओगे।

[34:42] दीक्षा में नया जन्म माना जाता है। एक

[34:45] होता है बिंदु से जन्म लेना जो पिता और

[34:48] माता के संयोग से और एक होता है नाद से

[34:52] जन्म होना। जो गुरुदेव मंत्र नाद हमारे

[34:55] कान में करते हैं उससे हमारा नया जन्म

[34:58] होता है। और यह नया जन्म ब्रजवासी माना

[35:00] जाएगा। वृंदावन वासी माना जाएगा। एवं चे न

[35:04] भाति तद गुरु मुखात्वा सदा चिंतय श्री

[35:08] सदगुरुदेव का वर्णन करके श्री सदगुरुदेव

[35:12] के मुख से जो तुम्हें साधन मिला है नाम

[35:15] मिला है उपासना मिली है तो कह रहे सदा

[35:19] चिंतय उसी का सदा चिंतन करो गुरुमुख से

[35:22] निकले हुए नाम और मंत्र की बड़ी अपार

[35:25] महिमा है। जो वृंदावन में सद्गुरु का

[35:28] वर्णन कर लेता है वो ब्रजवासी ही माना

[35:30] जाता है। उसका जन्म ब्रज में हुआ। कौन सा

[35:33] जन्म? बोले दीक्षा जन्म, नाद जन्म। इस

[35:37] जन्म की बहुत बड़ी महिमा है।

[35:40] जैसे अभी आपने आज दीक्षा ली तो दीक्षा

[35:44] लेते ही पूर्व के सारे जो आपके अपराध पाप

[35:48] है वो भस्म हो जाएंगे। अब सावधान हो जाओ

[35:51] कि अब नहीं करेंगे। अगर ऐसा नियम ले लिया

[35:55] पक्का विश्वास कर लिया और गुरु मुख से

[35:57] निकले हुए साधना का चांगो पांग अनुष्ठान

[36:01] करो इसी जन्म में भगवत प्राप्ति हो जाएगी

[36:05] सद्गुरु के मुख से

[36:08] जो

[36:09] उपदेश हुए सदा चिंतय उनका चिंतन करो नाम

[36:14] का मंत्र का मार्ग का जो प्रियाल के प्रेम

[36:19] मार्ग का उपदेश हुआ और कह रहे हैं

[36:23] प्रारब्ध

[36:26] वसा सहसा

[36:28] स्वादश्य सेम रसम प्रारब्ध के अनुसार शरीर

[36:33] में जो दुख सुख आ जाए उसे भोग लो उसे

[36:36] मिटाने की कोशिश मत करो क्या होगा बोले

[36:41] आपके हृदय में सहसा एक दिन देख लेना

[36:44] प्रियालाल प्रकाशित हो जाएंगे और आप उस

[36:47] आस्वादन से प्रेम आस्वादन से उन्मत्त हो

[36:50] जाएंगे। क्या करें? कह रहे हैं कि जो

[36:54] वृंदावन का आश्रय लेता है, वास स्वीकार कर

[36:57] लेता है, वह श्री कृष्ण के प्रेम रस में

[36:59] निश्चित डूब जाता है। कैसे? बोले वृंदावन

[37:02] में सद्गुरु का वर्णन करो। उनके द्वारा

[37:05] निकली हुई उपासना पद्धति जो श्री मुख से

[37:07] है उसका अनुष्ठान करो। उनके बताए हुए

[37:11] मार्ग पर चलो। नाम मंत्र जो उन्होंने दिया

[37:14] उसका सदा चिंतन करो और प्रारब्ध के अनुसार

[37:17] जो दुख सुख आ जाए उसे भोग लो।

[37:20] यहां यह नहीं कह रहे कि उसे मिटाने की

[37:22] चेष्टा करो। उसे भोग लो तो क्या होगा? तुम

[37:24] भगवत प्राप्त हो जाओगे। यह सिद्धांत है।

[37:28] इसीलिए संत महात्मा बड़े-बड़े आप देखो जो

[37:31] दिव्य हुए उन्होंने अपने प्रारब्ध को नहीं

[37:34] मिटाया। दूसरों के प्रारब्ध को स्वयं लेकर

[37:37] भोग लिया। अपने प्रारब्ध को तो भोगा ही

[37:40] औरों के भी प्रारब्ध को भोग लिया कि यह

[37:43] भजन करने में कमजोर है। प्रारब्ध आएगा

[37:46] इनको क्षीण कर देगा। चलो तुम आगे बढ़ो।

[37:48] हमें तो कोई फर्क नहीं पड़ता। प्रारब्ध को

[37:51] अपने ऊपर ले लिया। उसे श्री जी सहसा हृदय

[37:55] में प्रकाशित होकर प्रेम रस में डुबो देती

[37:58] है। ये धाम की कृपा धाम में गुरु बनाने की

[38:01] कृपा गुरु के मुख से निकले हुए नाम मंत्र

[38:05] का निरंतर चिंतन करने की कृपा से प्रियाल

[38:08] का सहसा सहसा माने कभी भी अचानक हृदय में

[38:13] प्रकाश हुआ और आप डूब गए। वो जब आप समर्पण

[38:16] आपका पूर्णतः होता है तब ये स्थिति आती

[38:20] है। अचानक खड़े हैं या बैठे हैं या

[38:23] क्रियारत है। एकदम वृत्त गोल एकदम वृत्ति

[38:26] समाहित हो गई। एकदम डूब गई। क्या कहना है

[38:29] क्या करना है कुछ सुधि नहीं। मात्र एक

[38:31] सामने प्रियाल उनकी दिव्य माधुरी दिव्य

[38:34] लीला सच्ची मानिए निहाल हो जाओगे। बस एक

[38:39] एक जीवन का खेल है।
