# भक्ति सूत्र- #1

https://www.youtube.com/watch?v=cTIlYE64R7c
Translation: en

[00:00] जीवन है।
  Life is.

[00:03] ऊर्जा।
  Energy.

[00:05] ऊर्जा का सागर।
  An ocean of energy.

[00:08] समय के किनारे पर अथक।
  Relentless on the shores of time.

[00:13] अंतहीन।
  Endless.

[00:16] ऊर्जा की लहरें टकराती रहती।
  Waves of energy keep crashing.

[00:21] ना कोई प्रारंभ है ना कोई अंत बस बस मध्य है।
  There is no beginning, no end, just the middle.

[00:26] बीच है।
  There is the midst.

[00:31] मनुष्य भी उसमें एक छोटी तरंग।
  Man is also a small wave within it.

[00:36] एक छोटा बीज है अनंत संभावनाओं का।
  A small seed of infinite possibilities.

[00:42] तरंग की आकांक्षा स्वाभाविक है कि सागर हो जाए।
  The aspiration of a wave is naturally to become the ocean.

[00:46] और बीज की आकांक्षा स्वाभाविक है कि वृक्ष हो जाए।
  And the aspiration of a seed is naturally to become a tree.

[00:53] बीज जब तक फूलों में खिले ना तब तक तृप्ति संभव नहीं।
  Until the seed blossoms into flowers, contentment is not possible.

[01:00] मनुष्य कामना है परमात्मा होने की उससे
  Man desires to be God, but before that there is a long way to go.

[01:05] पहले पड़ाव बहुत है मंजिल नहीं
  There are many stops, not the destination.

[01:09] रात्रि विश्राम हो सकता है राह में बहुत जगह मिल जाएगी
  You can rest at night, you will find many places on the way.

[01:15] लेकिन कहीं घर मत बना लेना
  But do not make a home anywhere.

[01:18] घर तो परमात्मा ही हो सकता है
  God can only be the home.

[01:22] परमात्मा का अर्थ है तुम जो हो सकते हो उसकी पूर्णता
  God means the completeness of what you can be.

[01:31] परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं
  God is not a person.

[01:35] कहीं आकाश में बैठा कोई रूप नहीं कोई नाम नहीं
  Not some form sitting in the sky, not any name.

[01:40] परमात्मा है तुम्हारी अत्यंतिक संभावना
  God is your ultimate possibility.

[01:44] आखरी संभावना जिसके पार फिर और कोई होना नहीं
  The final possibility, beyond which there is no more being.

[01:50] जिसके आगे फिर कोई जाना नहीं
  Beyond which there is no further going.

[01:53] जहां पहुंचकर तृप्ति हो जाती है, परितोष हो जाता है।
  Where upon reaching, contentment is attained, satisfaction is achieved.

[02:03] प्रत्येक मनुष्य तब तक पीड़ित रहेगा।
  Every human will suffer until then.

[02:07] तब तक तुम चाहे कितना ही धन कमा लो।
  Until then, no matter how much wealth you earn.

[02:10] कितना ही वैभव जुटा लो।
  No matter how much splendor you gather.

[02:14] कहीं कोई पीड़ा का कीड़ा तुम्हें भीतर काटता ही रहेगा।
  Somewhere, a worm of suffering will keep biting you from within.

[02:18] कोई बेचैनी सालती ही रहेगी।
  Some restlessness will keep bothering you.

[02:23] कोई कांटा चुभता ही रहेगा।
  Some thorn will keep pricking you.

[02:27] लाख करोड़ बुलाने के उपाय बहुत तरह की शराबे हैं विस्मरण के लिए लेकिन भुला ना पाओगे
  There are many kinds of wines, a million crore remedies, to forget, but you will not be able to forget.

[02:32] और अच्छा है कि भुला ना पाओगे।
  And it is good that you will not be able to forget.

[02:36] क्योंकि काश तुम भुलाने में सफल हो जाओ तो फिर बीज बीच ही रह जाएगा।
  Because if you could succeed in forgetting, then the seed would remain just a seed.

[02:41] फूल ना बनेगा और जब तक फूल ना बने और जब तक मुक्त आकाश को गंध फूल की ना मिल जाए तब तक परितृप्ति कैसी
  It will not become a flower, and until it becomes a flower, and until the free sky gets the fragrance of the flower, how can there be contentment?

[02:45] जब तक तुम अपने परम शिखर को छूकर बिखर ना जाओ
  Until you touch your highest peak and scatter.

[02:48] जब तक तुम्हारा विस्फोट ना हो जाए अनंत
  Until your explosion into infinity happens.

[03:05] में जब तक तुम्हारी गंगा उसी सागर में वापस ना लौट जाए जहां से आई है तब तक अगर तुम भूल गए तो आत्मघात होगा
  Until your Ganga returns to the same ocean from which it came, if you forget, it will be suicide.

[03:19] तब तक अगर तुमने अपने को भुलाने में सफलता पा ली तो उससे बड़ी और कोई विफलता नहीं हो सकती।
  Until then, if you succeed in forgetting yourself, there can be no greater failure than that.

[03:25] अभागी है वे जिन्होंने समझ लिया कि सफल हो गए।
  Unfortunate are those who have understood that they have succeeded.

[03:28] धन्य भागी है वे जो जानते हैं कि कुछ भी करो असफलता हाथ लगती है।
  Blessed are those who know that whatever they do, failure is achieved.

[03:38] क्योंकि यही वे लोग हैं जो किसी ना किसी दिन तक कभी ना कभी परमात्मा तक पहुंच जाएंगे।
  Because these are the people who will reach God sooner or later, someday.

[03:45] जहां सफलता मिली वहीं घर बन जाता है।
  Where success is found, a home is made.

[03:49] जहां असफलता मिली वहीं से पैर आगे चलने को तत्पर हो जाते हैं।
  Where failure is found, feet become ready to move forward from there.

[03:55] परमात्मा तक पहुंचे बिना कोई तृप्ति संभव नहीं।
  Without reaching God, no satisfaction is possible.

[04:06] कहा मैंने जीवन ऊर्जा है।
  I said life is energy.

[04:10] ऊर्जा के तीन रूप है।
  There are three forms of energy.

[04:13] एक तो बीज रूप है।
  One is the seed form.

[04:13] कुछ भी प्रकट नहीं।
  Nothing is manifested.

[04:18] फिर वृक्ष रूप है।
  Then there is the tree form.

[04:21] सब कुछ प्रकट हो गया है।
  Everything has been manifested.

[04:23] लेकिन प्राण अप्रकट है।
  But the life force is unmanifested.

[04:23] फिर फूल रूप है।
  Then there is the flower form.

[04:28] फिर प्राण भी प्रकट हुआ।
  Then the life force also manifested.

[04:28] फिर वो अनूठी अपूर्व गंध भी आ गई।
  Then that unique, unprecedented fragrance also arrived.

[04:32] पखुरिया खिल गई और खुले आकाश के साथ मिलन हो गया।
  The petals opened and merged with the open sky.

[04:36] अनंत के साथ एकता हो गई।
  Oneness was achieved with the infinite.

[04:43] साधारणता बीज का अर्थ है कामना।
  The ordinariness of the seed means desire.

[04:46] वृक्ष का अर्थ है प्रेम।
  The tree means love.

[04:49] फूल का अर्थ है भक्ति।
  The flower means devotion.

[04:54] जब तक तुम बीज में हो तब तक काम वासना में रहोगे।
  As long as you are in the seed, you will remain in lust.

[05:00] जब तुम वृक्ष बनोगे तब तुम्हारे जीवन में प्रेम का अवतरण होगा और जब तुम फूल बनोगे तब भक्ति
  When you become a tree, love will descend into your life, and when you become a flower, then devotion

[05:08] भक्ति परम शिखर
  Devotion is the highest peak.

[05:12] वो आखरी बात है
  That is the last thing.

[05:16] इसे हम थोड़ा समझ ले तभी इन
  If we understand this a little, then in

[05:21] अनूठे सूत्रों में प्रवेश हो सकेगा
  unique formulas, entry will be possible.

[05:29] तुम शरीर हो,
  You are the body,

[05:32] तुम मन भी हो।
  you are also the mind.

[05:34] तुम उसके पार भी कुछ हो जिसका तुम्हें पता
  You are also something beyond that, which you do not know.

[05:37] नहीं।
  do not know.

[05:39] शरीर तो बहुत स्थूल है।
  The body is very gross.

[05:43] उसका पता चल जाता है।
  It is known.

[05:45] उसके लिए किसी बुद्धिमत्ता की जरूरत
  For that, there is no need for any intelligence.

[05:45] नहीं।
  no need.

[05:50] शरीर तो वजन रखता है।
  The body has weight.

[05:50] उसका बोध हो जाता है।
  It is realized.

[05:53] उसके लिए किसी ध्यान की जरूरत
  For that, there is no need for any meditation.

[05:53] नहीं।
  no need.

[05:54] मन की भी थोड़ी झलक तुम्हें मिल जाती है
  You also get a glimpse of the mind

[05:57] क्योंकि मन स्थूल और सूक्ष्म के मध्य में
  because the mind is in the middle of gross and subtle,

[06:01] शरीर से भी जुड़ा है आत्मा से भी शरीर के
  connected to the body and also to the soul. From the body,

[06:05] तरफ से थोड़ी सी खबरें मन की मिल जाती
  a little news of the mind is received

[06:08] क्योंकि एक धागा शरीर के तट से जुड़ा है
  because one thread is connected to the shore of the body.

[06:15] लेकिन आत्मा की तुम्हें कोई खबर नहीं मिलती
  But you get no news of the soul.

[06:21] आत्मा कोरा शब्द मालूम होता
  The soul seems like an empty word.

[06:24] आत्मा शब्द सुनते से ही तुम्हारे भीतर कोई घूंघर नहीं बजते।
  As soon as you hear the word soul, no bells ring within you.

[06:30] आत्मा शब्द सुनते से ही बेचैनी सी होती है।
  As soon as you hear the word soul, a restlessness arises.

[06:33] शब्द बेबुझ है।
  The word is incomprehensible.

[06:38] भाषा कोश का अर्थ तो पता है।
  You know the meaning of the language dictionary.

[06:42] जीवन के कोष का कुछ अर्थ पता नहीं।
  You don't know some meaning of the dictionary of life.

[06:46] शरीर के साथ जुड़ी है काम वासना।
  Lust is attached to the body.

[06:50] काम वासना स्थूल है।
  Lust is gross.

[06:53] शरीर शरीर को मांगता है।
  The body demands the body.

[06:57] काम वासना का अर्थ शरीर अपने से विपरीत शरीर को मांगता है।
  The meaning of lust is that the body demands the opposite body from itself.

[07:00] क्योंकि एक किनारा अधूरा है।
  Because one shore is incomplete.

[07:03] दूसरे किनारे की चाह पैदा होती है।
  The desire for the other shore arises.

[07:06] पुरुष स्त्री को मानता है।
  Man desires woman.

[07:09] स्त्री पुरुष को मानती है।
  Woman desires man.

[07:13] ताकि जीवन की सरिता बीच में बह सके।
  So that the river of life can flow in between.

[07:13] दो किनारे जुड़ जाएं।
  The two shores may join.

[07:13] पुरुष अकेला है, स्त्री अकेली है।
  Man is alone, woman is alone.

[07:17] शरीर के तल पर शरीर की मांग है।
  On the level of the body, there is a demand of the body.

[07:21] शरीर से मिलन की आकांक्षा है।
  There is a desire for union with the body.

[07:25] क्षण भर को मिलन हो भी जाता है।
  For a moment, union does happen.

[07:28] क्षण भर को शरीर शरीर में डूब जाते हैं और खो भी जाते लेकिन बस क्षणभर को।
  For a moment, bodies sink into the body and also get lost, but only for a moment.

[07:35] उससे पीड़ा मिटती नहीं गहन हो जाती है।
  Pain does not diminish from it; it intensifies.

[07:37] उस मिलन के बाद बड़ा गहरा विषाद हो जाता है।
  After that union, a great deep sorrow occurs.

[07:39] क्योंकि मिलन के बाद गहरा बिछो होता है।
  Because after union, there is a deep separation.

[07:46] मिलता कुछ भी नहीं ऐसा लगता है उल्टा खो गया।
  Nothing is gained; it feels like the opposite, that something is lost.

[07:49] शरीर का मिलन क्षण भर को ही हो सकता है।
  The union of bodies can only be for a moment.

[07:53] स्थूल एक दूसरे में विलीन नहीं हो सकते।
  Gross entities cannot merge into each other.

[07:56] स्थूल की सीमा है।
  The gross has a limit.

[08:00] स्थूल अपनी सीमा को छोड़ नहीं सकता।
  The gross cannot leave its limit.

[08:02] अन्यथा स्थूल ना रह जाएगा।
  Otherwise, the gross will cease to exist.

[08:06] बर्फ के दो टुकड़ों को तुम मिलाने की कोशिश करो मुश्किल होगी।
  Try to bring two pieces of ice together; it will be difficult.

[08:12] लेकिन वही पिघल जाएं।
  But if they melt.

[08:16] जल होके बिल्कुल मिल जाते हैं।
  Becoming water, they merge completely.

[08:16] फिर कोई अड़चन नहीं होती।
  Then there is no obstruction.

[08:16] सीमा
  Limit

[08:18] खो गई।
  It was lost.

[08:18] मिलन सुलभ हो गया।
  Union became easy.

[08:22] शरीर बर्फ की तरह है।
  The body is like ice.

[08:22] जमा हुआ ठोस।
  Frozen solid.

[08:25] ऊर्जा वही है।
  Energy is the same.

[08:28] पिघल जाए तो मन बनता है।
  If it melts, the mind is formed.

[08:31] मन जल की तरह है।
  The mind is like water.

[08:31] सीमा तो है लेकिन तरल सीमा है।
  There is a boundary, but it is a fluid boundary.

[08:35] ठोस नहीं।
  Not solid.

[08:40] तो मन को कैसा भी ढालो ढल जाता है।
  So, however you mold the mind, it gets molded.

[08:40] शरीर को कैसा भी ढालो तो ना ढलेगा।
  However you mold the body, it will not mold.

[08:47] मन को कैसा भी ढालो ढल जाएगा।
  However you mold the mind, it will get molded.

[08:51] हिंदू के घर में बच्चा पैदा हो मुसलमान के घर में रख दो मुसलमान हो जाएगा।
  If a child is born in a Hindu home and placed in a Muslim home, they will become Muslim.

[08:53] शरीर नहीं होगा मन हो जाएगा।
  The body will not, the mind will.

[08:59] शरीर तो बाप की ही झलक देगा मां की झलक देगा।
  The body will only show the reflection of the father, the reflection of the mother.

[09:03] शरीर की खबर तो वही जुड़ी रहेगी जहां से शरीर आया है।
  The information of the body will remain connected to where the body came from.

[09:06] लेकिन मन मुसलमान का हो जाएगा।
  But the mind will become Muslim.

[09:09] बच्चे को याद भी ना रहेगी कि वो कभी हिंदू था।
  The child will not even remember that they were ever Hindu.

[09:19] हिंदू होने के पहले मन इसके पहले डलता मुसलमान हो गया मुसलमान बाद में चाहे तो हिंदू हो जाए ईसाई हो जाए आस्तिक नास्तिक हो जाए नास्तिक आस्तिक हो जाए मन में कुछ अड़चन नहीं है
  Before being a Hindu, the mind first becomes Muslim. After that, whether one becomes a Hindu or a Christian, an atheist or an atheist, there is no obstruction in the mind.

[09:36] मन तरल है
  The mind is fluid.

[09:39] मन प्रतिपल बदलता रहता है उसकी तरलता अनूठी
  The mind keeps changing every moment; its fluidity is unique.

[09:46] काम वासना है शरीर जैसी और शरीर की प्रेम है मन जैसा और मन का प्रेम की मांग शरीर की मांग से ऊपर प्रेम कहता है दूसरे का मन मिल जाए
  Lust is like the body, and love is like the mind. The demand of the mind's love is above the body's demand. Love says, 'Let the other's mind be met.'

[10:00] प्रेम करने वाला वैश्या के द्वार पर ना जाएगा यह बात ही बेहूदी मालूम पड़ेगी यह बात ही संभव नहीं सोच भी बेहूदा मालूम पड़ेगा
  A person in love will not go to the door of a prostitute. This itself will seem absurd. This is not even possible; the thought itself will seem absurd.

[10:14] लेकिन काम वासना से भरा व्यक्ति वैश्या के घर चला जाएगा शरीर की ही मांग है।
  But a person full of lust will go to the house of a prostitute. It is the demand of the body.

[10:19] शरीर खरीदा जा सकता
  The body can be bought.

[10:22] मन खरीदा नहीं जा सकता।
  The mind cannot be bought.

[10:25] शरीर जड़ है।
  The body is inert.

[10:29] मन थोड़ा थोड़ा चेतन है।
  The mind is a little bit conscious.

[10:32] इसलिए इतना नीचा नहीं उतरा जा सकता।
  Therefore, it cannot descend so low.

[10:36] कि खरीद और बेच की जा सके।
  That it can be bought and sold.

[10:39] मन प्रेम मांगता है।
  The mind seeks love.

[10:43] कोई जो अपना सर्वस्व देने को तैयार हो बिना किसी शर्त के।
  Someone who is ready to give their all without any conditions.

[10:48] मन अपने को किसी को दे देना चाहता है।
  The mind wants to give itself to someone.

[10:51] बेशर्त लुटा देना चाहता है।
  It wants to be lost unconditionally.

[10:55] मन की मांग प्रेम की है।
  The mind's demand is for love.

[10:58] मन जब दो मिलते हैं तो जो रस पैदा होता है उसका नाम प्रेम है।
  When two minds meet, the essence that is produced is called love.

[11:05] जब दो शरीर मिलते हैं तो जो रस पैदा होता है उसका नाम काम है।
  When two bodies meet, the essence that is produced is called lust.

[11:10] फिर मन के भी बाहर तुम्हारा अस्तित्व है।
  Then, beyond the mind, there is your existence.

[11:14] आत्मा का।
  Of the soul.

[11:14] आत्मा ऐसे है जैसे पानी भाप बन के आकाश में उड़ गया।
  The soul is like water that has turned into vapor and flown into the sky.

[11:17] पानी ही है
  It is still water.

[11:22] लेकिन अब तरल सीमा भी ना रही।
  But now the liquid limit is also gone.

[11:25] अब कोई सीमा ना रही।
  Now there is no limit.

[11:28] आकाश में फैलना हो गया।
  It has spread in the sky.

[11:32] अदृश्य हो जाती है।
  It becomes invisible.

[11:32] भाप
  Steam

[11:35] थोड़ी दूर तक दिखाई पड़ती है।
  It is visible for a short distance.

[11:35] फिर खो जाती है।
  Then it gets lost.

[11:41] आत्मा
  The soul

[11:43] अदृश्य है,
  is invisible,

[11:46] भाप जैसी
  like steam

[11:46] आत्मा की तलाश किसकी है?
  who is searching for the soul?

[11:49] शरीर मांगता है शरीर को,
  The body wants the body,

[11:52] मन मांगता है मन को,
  the mind wants the mind,

[11:55] आत्मा मांगती है आत्मा को।
  the soul wants the soul.

[12:00] शरीर और शरीर के मिलन से जो रस पैदा होता है
  The pleasure that is produced from the union of body and body

[12:02] क्षणभंगुर।
  is ephemeral.

[12:05] उसका नाम काम
  Its name is desire.

[12:05] मन और मन के मिलन से जो रस पैदा होता है
  The pleasure that is produced from the union of mind and mind

[12:09] थोड़ा ज्यादा स्थाई
  is a little more permanent

[12:13] जीवन भर चल सकता है
  it can last a lifetime.

[12:13] आकांक्षा तो मन की होती है कि जीवन के पार भी चलेगा
  The aspiration of the mind is that it will continue even beyond life.

[12:16] प्रेमी कहते हैं मौत हमारे प्रेम को ना तोड़ पाएगी
  Lovers say that death will not be able to break our love.

[12:22] अगर प्रेम जाना है तो प्रेमी कहता है कुछ
  If love is to be known, then the lover says something.

[12:26] हमें छुड़ा ना पाएगा शरीर मिट जाएगा
  It will not be able to free us, the body will perish.

[12:31] तो भी हमारा प्रेम नष्ट ना होगा ये कामना
  Even then our love will not be destroyed, this desire

[12:34] ही है
  is it.

[12:36] लेकिन मन थोड़ा ज्यादा दूरगामी है।
  But the mind is a little more far-reaching.

[12:41] शरीर से उसकी सीमा थोड़ी बड़ी है।
  Its limit is a little larger than the body.

[12:45] फिर आत्मा है।
  Then there is the soul.

[12:47] वो शाश्वत की मांग है उसकी।
  It demands the eternal.

[12:50] उससे कम पर उसकी तृप्ति नहीं।
  It is not satisfied with anything less.

[12:53] क्षणभंगुर को भी क्या चाहना।
  Why desire the ephemeral?

[12:55] अंधेरी रात में क्षण भर को बिजली चमकती है
  In the dark night, lightning flashes for a moment,

[12:57] फिर अंधेरा और अंधेरा हो जाता है
  then it becomes darker and darker.

[13:02] दुख ही बेहतर है
  Sorrow is better.

[13:05] दुख की दुनिया में क्षणभर को सुख का फूल
  In the world of sorrow, a flower of happiness blooms for a moment,

[13:07] खिलता है दुख और दुभ हो जाता है फिर झेलना
  sorrow becomes deeper, and then it becomes more difficult to bear.

[13:16] आत्मा मन के प्रेम को भी नहीं मानती
  The soul does not accept even the love of the mind,

[13:21] क्योंकि मन तरल है
  because the mind is fluid.

[13:24] आज किसी से प्रेम किया कल किसी और के प्रेम में पड़ सकता है मन का कोई बहुत भरोसा नहीं।
  Today one loves someone, tomorrow one can fall in love with someone else. The mind is not very trustworthy.

[13:32] जब प्रेम में होता है तो ऐसा ही कहता तेरे सिवाय किसी को कभी प्रेम ना कर सकूंगा अब तेरे सिवाय मेरे लिए कोई और नहीं मगर ये मन की ही बातें मन का भरोसा कितना आज कहता है कल बदल जाए अभी कहता है अभी बदल जाए।
  When in love, one says, 'I can never love anyone but you. Now, there is no one else for me but you.' But these are just the mind's words. How much can the mind be trusted? It says one thing today and changes tomorrow; it says something now and changes immediately.

[13:51] मन पानी की तरह तरल आत्मा और आत्मा के मिलन पर जो रस पैदा होता है, उसका नाम भक्ति है।
  The mind is fluid like water. The joy that arises from the union of soul and soul is called devotion.

[13:59] शरीर की सीमा है। ठोस मन की सीमा है तरल आत्मा की कोई सीमा नहीं।
  The body has limits. The solid mind has limits, but the fluid soul has no limits.

[14:08] काम क्षणभंगुर है। प्रेम थोड़ा दूर तक जाता थोड़ा स्थाई हो सकता है।
  Lust is transient. Love goes a little further; it can be a little more permanent.

[14:15] भक्ति शाश्वत हैं।
  Devotion is eternal.

[14:18] काम में शरीर और शरीर का मिलन होता है।
  In lust, bodies meet bodies.

[14:22] स्थूल का स्थूल से
  The gross with the gross.

[14:25] मन में सूक्ष्म का सूक्ष्म से आत्मा में
  From the subtle of the mind to the subtle of the soul.

[14:31] निराकार का निराकार से।
  From the formless to the formless.

[14:34] भक्ति
  Devotion

[14:36] निराकार के निराकार से मिलने का शास्त्र
  The scripture of meeting the formless with the formless.

[14:42] ऐसा समझो की तुम अपने घर में बैठे हो
  Imagine that you are sitting in your house.

[14:44] द्वार खिड़कियां बंद करके
  With doors and windows closed.

[14:48] रोशनी नहीं आती सूरज के भीतर
  Light does not come from within the sun.

[14:51] हवा के झोंके नहीं आते फूलों की गंध नहीं
  Breezes do not come, the fragrance of flowers does not.

[14:56] आती पक्षियों की कलरों की आवाज नहीं आती
  The chirping sound of birds does not come.

[15:01] तुम अपने में बंद बैठे हो ऐसा शरीर शरीर
  You are sitting closed in yourself, such is the body, body.

[15:03] द्वार दरवाजे सब बंद
  All doors and windows are closed.

[15:06] फिर तुमने द्वार दरवाजे खोले
  Then you opened the doors and windows.

[15:10] खिड़किया खोली हवा के नए झोंकों ने प्रवेश
  Opened the windows, new breezes entered.

[15:15] किया सूरज की किरणें आई पक्षियों के गीत
  Sun's rays came, birds' songs.

[15:17] गूंजने लगे आकाश की झलक मिली ऐसा मन है
  Began to resonate, a glimpse of the sky was received, such is the mind.

[15:23] थोड़ा खुलता है लेकिन बैठे तुम घर में ही
  It opens a little, but you are still sitting in your house.

[15:25] हो
  Yes

[15:28] फिर भक्ति है कि तुम घर के बाहर निकल आए
  Then there is devotion that you have come out of the house

[15:32] खुले आकाश में खड़े हो गए।
  You stood in the open sky.

[15:35] अब सूरज आता नहीं बरस रहा है।
  Now the sun is not shining.

[15:38] अब हवा कहीं से आती नहीं तुम्हारे चारों तरफ आंदोलित होती।
  Now the wind does not come from anywhere, it stirs around you.

[15:44] अब तुम पक्षियों के कलरों में एक हो गए।
  Now you have become one with the chirping of birds.

[15:51] भक्ति सूत्र
  Bhakti Sutra

[15:56] पूरा शास्त्र है भक्ति का।
  It is the entire scripture of devotion.

[16:00] एक एक सूत्र को अति ध्यान पूर्वक समझने की कोशिश करना और अति प्रेम पूर्वक भी
  Try to understand each and every sutra with great ध्यान (attention) and also with great love

[16:07] क्योंकि यह प्रेम का ही शास्त्र है इसे तुम तर्क से ना समझ पाओगे
  Because this is a scripture of love, you will not be able to understand it with logic

[16:15] स्वाद ही समझा पाएगा
  Only taste will be able to explain it

[16:21] अथातो भक्ति व्याख्या श्यामा
  Athato Bhakti Vyakhyana Shyama

[16:25] अब भक्ति की व्याख्या
  Now the explanation of devotion

[16:28] क्यों अब अथातो हो चुकी बात काम की बहुत
  Why now, the matter of the infinite has been discussed a lot.

[16:37] हो चुकी चर्चा प्रेम की बहुत अथा तो भक्ति
  The discussion of love has been done a lot, so the infinite devotion.

[16:41] अब भक्ति की बात हो
  Now let's talk about devotion.

[16:44] जी लिए बहुत देख लिए शरीर के भी खेल
  Lived a lot, seen the games of the body too.

[16:49] देख लिए मन के भी चाल
  Seen the tricks of the mind too.

[16:53] गुजर चुके उन सब पड़ावों से अब भक्ति की थोड़ी बात हो
  Having passed through all those stages, let's talk a little about devotion now.

[16:59] अब अचानक शुरू होता है शास्त्र
  Now suddenly the scripture begins.

[17:03] सिर्फ भारत में ऐसे शास्त्र जो अथातों से शुरू होते हैं।
  Only in India are there such scriptures that begin from the infinite.

[17:06] दुनिया की किसी भाषा में ऐसे शास्त्र नहीं क्योंकि ये तो बड़ा अधूरा मालूम पड़ता है।
  There are no such scriptures in any language of the world because this seems very incomplete.

[17:10] कहीं अब से कोई शास्त्र शुरू होता है।
  Somewhere, a scripture begins from now.

[17:17] ये तो ऐसा लगता है जैसे इसके पहले कोई बात चल रही थी।
  It seems as if some conversation was going on before this.

[17:19] कोई कथा आगे चल रही थी जो छूट गई है।
  Some story was going on which has been missed.

[17:22] कोई बीच का अध्याय प्रारंभ का नहीं।
  There is no middle chapter of the beginning.

[17:28] पश्चिम के व्याख्याकार
  Western commentators

[17:30] जब पहली दफा ब्रह्म सूत्र से परिचित हुए
  When I first became acquainted with the Brahma Sutras,

[17:33] वह भी ऐसे शुरू होता है।
  that also begins like this.

[17:33] अथा ब्रह्म जिज्ञासा
  Now, the inquiry into Brahman.

[17:35] अब ब्रह्म की जिज्ञासा तो
  Now, the inquiry into Brahman,

[17:37] उन्होंने कहा इसके पहले कोई किताब थी जो खो गई
  he said, was there a book before this that was lost?

[17:43] निश्चित ही क्योंकि ये तो मध्य से शुरुआत हो रही है।
  Certainly, because this is starting from the middle.

[17:45] नहीं कोई किताब खो नहीं गई।
  No, no book was lost.

[17:49] शुरुआत ही है।
  It is just the beginning.

[17:54] यह जीवन की किताब का आखिरी अध्याय है।
  This is the last chapter of the book of life.

[17:57] शास्त्र शुरू ही हो रहा है, मगर जीवन की किताब का आखिरी अध्याय है।
  The scripture is just beginning, but it is the last chapter of the book of life.

[18:00] ये उनके लिए नहीं है जो अभी शरीर की वासना में पड़े हो।
  This is not for those who are still caught up in the desires of the body.

[18:03] वे इसे ना समझ पाएंगे।
  They will not be able to understand it.

[18:07] अभी देर है।
  It is still too early.

[18:11] अभी फल पकेगा।
  The fruit will ripen yet.

[18:11] अभी उनके गिरने का समय नहीं आया।
  The time for them to fall has not yet come.

[18:18] यह उनके लिए नहीं है जो अभी प्रेम की कविता में डूबे और उसको ही जिन्होंने आखरी समझा है
  This is not for those who are still immersed in the poetry of love and have considered that to be the ultimate.

[18:25] उन दो को छोड़ने के लिए अथातु तो शुरू में ही शास्त्र कह देता है
  To leave those two behind, the scripture says at the very beginning, 'Athāto'...

[18:34] कि कौन है अधिकारी ये अधिकारी की व्याख्या है अथा तो ये कहता है कि अगर चूक गए हो
  Who is the officer? This officer's explanation is that if you have missed,

[18:41] काम वासना से भर गया हो मन तो अन्यथा अभी थोड़ी देर और भटको क्योंकि क्योंकि भटके बिना कोई अनुभव नहीं।
  if the mind is filled with lust, then wander a little longer, because without wandering, there is no experience.

[18:50] अगर अभी प्रेम में रस आता हो तो क्षमा करो।
  If you are still enjoying love, then forgive.

[18:53] अभी इस मंदिर में प्रवेश ना हो सकेगा।
  You will not be able to enter this temple yet.

[18:57] अभी तुम किसी और ही प्रतिमा के पुजारी हो।
  You are still a worshipper of some other idol.

[19:01] अभी परमात्मा की प्यास नहीं जगी।
  The thirst for the divine has not yet awakened.

[19:06] अभी तुम या तो बीज हो या वृक्ष हो।
  You are either a seed or a tree.

[19:09] अभी फूल होने का समय नहीं आया।
  The time to become a flower has not yet come.

[19:13] और जब तक समय ना आ जाए तब तक कुछ भी तो नहीं होता।
  And until the time comes, nothing happens.

[19:17] इसलिए व्यर्थ मेहनत नहीं करनी
  Therefore, do not work in vain.

[19:20] यह जीवन की पाठशाला में जिनका आखिरी अध्याय करीब आ गया इसका यह मतलब नहीं है कि बूढ़ों के लिए
  In the school of life, for those whose final chapter is near, it does not mean that for the elderly,

[19:29] जैसे पश्चिम के लोगों ने गलत समझा उन्होंने समझा कि यह आधी किताब है आधी से
  as people in the West misunderstood, they thought it was half a book, half

[19:34] खो गई।
  It was lost.

[19:36] वैसे पूरब के लोगों ने भी गलत समझा।
  Similarly, people from the East also misunderstood.

[19:38] उन्होंने समझा कि यह तो बूढ़ों के लिए है।
  They thought it was for the elderly.

[19:41] नहीं प्रौढों के लिए है बूढ़ों के लिए।
  No, it is for adults, not for the elderly.

[19:45] प्रौढ़ कोई कभी भी हो सकता है।
  An adult can be anyone at any time.

[19:48] एक छोटा बच्चा प्रढ़ हो सकता है।
  A small child can be an adult.

[19:50] प्रगाढ़ बुद्धिमत्ता चाहिए और नहीं तो बूढ़े भी बचकाने रह जाते।
  Profound intelligence is needed, otherwise even the elderly remain childish.

[19:55] कोई बूढ़े होने से थोड़ी पक जाता है।
  One does not ripen merely by becoming old.

[19:58] धूप में पक जाने से बाल कोई वृद्ध नहीं हो जाता।
  Hair does not turn gray just by ripening in the sun.

[20:06] बूढ़े के मन में भी वही कामनाएं चलती रहती है।
  The same desires continue to run in an old person's mind.

[20:09] वही वासनाएं चलती रहती है।
  The same passions continue to run.

[20:11] तो उसके लिए भी नहीं है ये शास्त्र।
  So these scriptures are not for them either.

[20:14] फिर कभी-कभी कोई जवान भी भर जवानी में जाग जाता है।
  Then sometimes a young person also awakens in the prime of their youth.

[20:18] अभी जबकि सोने के दिन थे तब जाग जाता है।
  They awaken when it was time to sleep.

[20:22] कभी कोई छोटा बच्चा भी अचानक बीच से छलांग लेता है और फूल हो जाता है।
  Sometimes a small child suddenly leaps from the middle and blossoms.

[20:29] कोई शंकराचार्य छोटी उम्र में बड़ी छोटी उम्र में
  Like Shankara, at a very young age.

[20:35] उम्र का कोई सवाल नहीं है। बोध का सवाल

[20:39] है।

[20:42] अथा तो अब भक्ति की व्याख्या करते

[20:46] व्याख्या करते हैं परिभाषा नहीं

[20:50] परिभाषा हो नहीं सकती

[20:53] कुछ चीजें हैं जिनका वर्णन हो सकता है

[20:56] व्याख्या हो सकती परिभाषा नहीं हो सकती

[21:02] जैसे तुमने

[21:04] कोई स्वाद पाया

[21:07] और तुम किसी दूसरे को समझाने लगे जिसके

[21:09] जीवन में अभी वैसा स्वाद आया नहीं लेकिन

[21:12] स्वाद को समझने की उत्सुकता आई है। रस जगा

[21:16] है। जिज्ञासा बनी है।

[21:19] तुम क्या करोगे? तुम वर्णन करोगे।

[21:25] तुम्हें जो स्वाद मिला है

[21:28] उसका तुम वर्णन करोगे कैसा मिला?

[21:32] तुम कुछ प्रतीक चुनोगे। जिस से तुम बात कर

[21:36] रहे हो उसकी भाषा में कुछ संकेत दिए जा

[21:39] सके। उसके अनुभव से तुम अपना अनुभव जोड़ने

[21:42] की कोशिश करोगे। व्याख्या का अर्थ होता है

[21:45] तुम्हें जिन्हें अनुभव नहीं है

[21:48] उनसे अपने अनुभव को जोड़ने की चेष्टा

[21:58] जो तैयार तो हैं मंदिर में प्रवेश के

[22:02] लेकिन अभी मंदिर में प्रवेश नहीं हुआ है

[22:05] उन्हें मंदिर की खबर देनी है मंदिर के

[22:08] भीतर क्या घट रहा है

[22:10] मंदिर के भीतर कैसा अनुभव हुआ

[22:14] थोड़ा सा स्वाद उनके लिए लाना है।

[22:17] क्या करेंगे? परिभाषा करेंगे।

[22:22] व्याख्या करेंगे।

[22:25] परिभाषा नहीं हो सकती। परिभाषा तो उनके

[22:29] बीच हो सकती है जो दोनों ही जानने वाले

[22:32] हो।

[22:33] परिभाषा संक्षिप्त होती

[22:36] परिभाषा तो एक दो वचनों में वचन वाक्यों

[22:40] में पूरी हो जाती

[22:44] लेकिन व्याख्या थोड़ी लंबी होती है

[22:49] और व्याख्या से सिर्फ हम दृश्य देते हैं

[22:54] झलक देते हैं वो बिल्कुल ठीक नहीं होती

[22:57] व्याख्या क्योंकि ठीक हो नहीं सकती

[23:00] थोड़ी-थोड़ी ठीक होती है थोड़ी

[23:02] थोड़ी-थोड़ी गलत होती है। क्योंकि ज्ञानी

[23:05] जब अज्ञानी से बात करता है तो अज्ञानी की

[23:08] भाषा में करता है। परिभाषा तो बिल्कुल ठीक

[23:12] होती है।

[23:14] व्याख्या बिल्कुल ठीक नहीं होती। हो नहीं

[23:17] सकती जब बुद्ध बोलेंगे उनसे जिनके जीवन

[23:20] में बुद्धत्व नहीं है। तो अगर बुद्ध अपनी

[23:23] ही भाषा का उपयोग करें तो परिभाषा होगी।

[23:26] अगर बुद्ध उनकी भाषा का उपयोग करें जिनसे

[23:29] बोल रहे हैं तो व्याख्या होगी। इसलिए

[23:32] सूत्र पहले ही कह देता है अथ तो भक्ति

[23:36] व्याख्या

[23:37] अब हम भक्ति की व्याख्या करते हैं।

[23:48] वह ईश्वर के प्रति परम प्रेम रूपा है।

[23:52] भक्ति की पहली व्याख्या का सूत्र। वह

[23:56] ईश्वर के प्रति परम प्रेम रूपा है।

[24:00] मैंने तुम्हें कहा ऊर्जा का एक रूप है

[24:03] काम।

[24:05] ऊर्जा का दूसरा रूप है प्रेम, ऊर्जा का

[24:08] तीसरा रूप है भक्ति। भक्ति और काम के बीच

[24:12] में प्रेम।

[24:14] प्रेम का एक हाथ काम से जोड़ा है। प्रेम

[24:17] का दूसरा हाथ भक्ति से जोड़ा है।

[24:22] अगर काम वासना की व्याख्या करनी हो

[24:26] तो भी प्रेम से ही करनी होगी।

[24:31] अगर भक्ति की व्याख्या करनी हो तो भी

[24:33] प्रेम से ही करनी होगी।

[24:36] क्योंकि प्रेम सेतु है दोनों के बीच।

[24:39] प्रेम दोनों का मध्य बिंदु है।

[24:43] प्रेम दोनों का संतुलन है।

[24:47] जिसने भक्ति को जाना वह उनसे बोले

[24:50] जिन्होंने भक्ति को नहीं जाना तो वह किस

[24:52] भाषा में बोले?

[24:55] प्रेम के अतिरिक्त और कोई भाषा नहीं बचती।

[24:59] काम में तो बोला ही नहीं जा सकता क्योंकि

[25:01] काम एक छोर है। भक्ति दूसरा छोर है।

[25:05] भक्ति तो काम के करीब करीब विपरीत है।

[25:10] तो अगर काम से कहना हो तो इतनी कहा जा

[25:12] सकता है कि जो कामना नहीं है वही भक्ति

[25:15] लेकिन इससे कुछ हल ना होगा निषेध हो जाएगा

[25:20] हम पूछते हैं भक्ति क्या है अगर काम से

[25:23] कहना हो तो हम इतना ही बता सकते हैं कि

[25:25] भक्ति क्या नहीं है

[25:29] लेकिन पूछने वाला पूछ रहा है हम यह नहीं

[25:30] पूछते कि भक्ति क्या नहीं है पत्थर नहीं

[25:33] है वृक्ष नहीं है पक्षी नहीं है माना

[25:36] भक्ति है क्या

[25:39] तो कहां से शुरू करें? परम प्रेम रूपा है।

[25:44] प्रेम से शुरुआत करनी पड़ेगी। लेकिन प्रेम

[25:47] में एक शर्त लगाई है परम प्रेम रूपा।

[25:50] परम प्रेम रूपा का अर्थ है ऋण। काम।

[25:56] अगर सिर्फ प्रेम रूपा कहते तो फिर भक्ति

[25:58] में और प्रेम में कोई फर्क ना रह जाता।

[26:01] फिर तो प्रेम ही भक्ति हो जाती। फिर तीसरे

[26:04] की कोई जरूरत ना होती। काम और प्रेम दो

[26:06] काफी थे विभाजन के लिए। नहीं प्रेम में

[26:10] थोड़ा सा काम शेष रहता है। भक्ति में उतना

[26:13] भी काम शेष नहीं रह जाता।

[26:17] अब हम इसे ऐसा समझे

[26:21] कि काम में थोड़ा सा प्रेम है।

[26:26] इसलिए तो आदमी काम में उलझा रहता है।

[26:30] एक प्रतिशत होगा प्रेम। 9% केवल कामना है।

[26:34] केवल वासना है लेकिन वो एक प्रतिशत प्रेम

[26:39] काम को भी एक सुंदर प्रतिमा बना देता है।

[26:44] काम को भी एक भाव भंगिमा दे देता है जो

[26:47] उसकी नहीं है। उदार है।

[26:50] काम की कुरूपता को ढक लेता है और एक

[26:53] सौंदर्य का आवरण दे देता है। काम की

[26:56] व्यर्थता को ढाक लेता है

[26:59] और सार्थकता की

[27:02] थोड़ी सी झलक दे देता है। काम वासना में

[27:05] भी प्रेम का थोड़ा सा अंश है

[27:09] और प्रेम में भी काम वासना का थोड़ा सा

[27:11] अंश दोनों जुड़े हैं।

[27:14] इसलिए प्रेम भी

[27:18] पूरा प्रेम नहीं है। कुछ उसमें अभी भी

[27:23] विजाती है।

[27:26] प्रेम में भी थोड़ी काम वासना इसे हम ऐसा

[27:29] समझे।

[27:32] कि कामी

[27:34] काम वासना में पड़ता है।

[27:37] काम वासना में पड़ने के कारण थोड़े से

[27:39] प्रेम का अविर्भाव हो जाता है। प्रेमी

[27:43] प्रेम में डूबता है। प्रेम में डूबने के

[27:46] कारण काम वासना आ जाती है।

[27:51] दोनों में बड़ा फर्क है।

[27:55] लेकिन तालमेल भी है।

[27:58] कामी काम के कारण प्रेम करने लगता है।

[28:01] प्रेमी प्रेम के कारण काम में उतरता है।

[28:06] दोनों में मौलिक अंतर है।

[28:09] क्योंकि प्रेमी का काम

[28:13] बड़ा मधुर और प्रीतकर हो जाएगा।

[28:17] कामी का प्रेम भी गंदा होगा।

[28:20] उसके प्रेम में भी बदबू होगी।

[28:26] लेकिन दोनों एक दूसरे में घुले मिले हैं।

[28:30] परम प्रेम रूपा है भक्ति। परम प्रेम रूपा

[28:34] का अर्थ हुआ प्रेम खालिस सोना बचा।

[28:40] 14 कैरेट नहीं।

[28:43] 18 कैरेट नहीं। खालिस

[28:48] उसमें एक भी कैरेट काम वासना का ना रहा।

[28:51] शुद्ध प्रेम हो गया।

[28:54] तो भक्ति

[28:57] क्योंकि तुम प्रेम को शायद थोड़ा सा जानते

[29:00] हो इसलिए प्रेम के आधार पर भक्ति को

[29:03] समझाया जा रहा है। तुम प्रेम की थोड़ी सी

[29:06] भाषा जानते हो। वो भी पूरी नहीं जानते।

[29:10] कहीं सपने में झलक मिली है।

[29:14] कहीं

[29:18] टटोलते टटोलते हाथ पड़ गया है।

[29:21] कहीं से कोई थोड़ी पहचान आ गई है। संयोगिक

[29:25] रही होगी।

[29:27] लेकिन तुम्हें थोड़ा सा स्वाद है।

[29:30] जैसे कि पीतल

[29:34] पीला है और सोना तुमने नहीं देखा।

[29:40] तो हम पीतल से सोने को समझाते हैं कहते

[29:43] हैं ऐसा ही पीला

[29:46] पर और शुद्ध

[29:49] ज्योतिर्म

[29:52] सूर्य की किरण जैसा चमकता हुआ

[29:56] कुछ प्रतीक खोजते प्रतीक खोजना वर्णन है।

[30:01] व्याख्या है।

[30:04] वह भक्ति।

[30:07] ईश्वर के प्रति परम प्रेम रूपा है।

[30:12] सूत्र के जो भी अनुवाद किए गए हैं हिंदी

[30:14] में। उन सब में यही अनुवाद किया गया है,

[30:17] वह भक्ति ईश्वर के प्रति परम प्रेम रूपा

[30:20] है। पर संस्कृत में बात कुछ और है।

[30:25] सास्मिन परम प्रेम रूपा।

[30:30] ईश्वर शब्द का प्रयोग नहीं किया है। ईश्वर

[30:33] शब्द नहीं है। उसके प्रति तस्मिन

[30:38] बड़ा फर्क

[30:40] जिन्होंने भी हिंदी में अनुवाद किए

[30:45] उन्होंने बात को संकीर्ण कर दिया उसके

[30:48] प्रति उसका नाम नहीं हो सकता

[30:52] इशारा है

[30:55] बड़े दूर है वो उसे ईश्वर कहने से बात हल

[30:58] ना होगी

[31:00] क्योंकि उसे ईश्वर कहने से ही हम उसकी

[31:03] परिभाषा सा कर देंगे ईश्वर शब्द का अर्थ

[31:06] होता है ऐश्वर्यवान

[31:09] सारा ऐश्वर्य जिसका है वो ईश्वर

[31:15] यह हमारी परिभाषा है क्योंकि हम ऐश्वर्य

[31:18] की भाषा में सोचने के आदि हो गए हमारे लिए

[31:21] ईश्वर ऐसा है जैसे सम्राट सारे जगत का है

[31:26] पर है सम्राट ही धन की भाषा में हम सोचने

[31:30] के आदि हो गए ऐश्वर्य की भाषा में सोचने

[31:32] के आदि हो गए तो ईश्वर कहते हैं।

[31:36] लेकिन धन से और ईश्वर का क्या लेना देना?

[31:39] ऐश्वर्य से और ईश्वर का क्या संबंध?

[31:46] सम्राटों से उसकी कल्पना करनी ठीक नहीं।

[31:50] इसलिए संस्कृत शब्द ठीक है तस्मिन। उसके

[31:54] प्रति नाम मत दो उसे।

[31:58] नाम तुम दोगे तुम्हारा नाम होगा। तुम्हारा

[32:00] मन प्रविष्ट हो जाएगा। सिर्फ इतना ही कहो

[32:04] उसके, इशारा करो, अंगुली बता दो।

[32:09] शब्द मत दो। वो अनाम है। नाम में मत

[32:13] घसीटो। वो अरूप है। रूप का आग्रह मत करो।

[32:17] वो निराकार है। तुम कोई आकार मत दो। ईश्वर

[32:21] देते ही आकार मिल जाता है।

[32:24] ईश्वर शब्द आते ही तुम्हारे मन में आकार

[32:27] उठने शुरू हो जाते सोचो थोड़ा उसके प्रति

[32:32] कोई आकार उठता है उसके प्रति तुम पूछोगे

[32:36] किसके प्रति

[32:38] ये कौन है उस

[32:41] किसकी बात कर रहे हैं? ईश्वर कहते ही हाल

[32:44] हो गया। तुम निश्चिंत हुए तुमने कहा समझ

[32:46] गए। जहां तुमने कहा समझ गए वहीं ना समझिए

[32:51] तुम ना समझो बड़ी कृपा होगी

[32:56] तुम बहुत जल्दी समझ जाते हो

[32:59] वही भूल हो जाती है

[33:04] परमात्मा इतना आसान नहीं कि समझ में आ जाए

[33:11] वस्तुत उसे समझने के लिए सब समझ छोड़नी

[33:14] पड़ती

[33:15] उसे केवल वही ही समझ पाते हैं जो समझ का

[33:18] आग्रह भी छोड़ देते हैं।

[33:21] इसलिए अच्छा होगा हम भी कहे उसके प्रति

[33:26] उसके कहते ही बड़ा विराट का द्वार खुलता

[33:29] है। फिर ये पशु पक्षी पौधे आकाश सब

[33:32] सम्मिलित हो जाते हैं। परमात्मा कहते ही

[33:36] ईश्वर कहते ही बात कुछ बिगड़ जाती है। भेद

[33:39] खड़ा हो जाता है। स्रष्टा और सृष्टि का

[33:42] भेद हो जाता है।

[33:46] फिर तुम

[33:48] सृष्टि की निंदा में लग जाते हो स्रष्टा

[33:50] की पूजा में

[33:53] और कहीं स्रष्टा और सृष्टि अलग नहीं है।

[33:57] स्रष्टा शब्द ठीक नहीं। सृजन की ऊर्जा है।

[34:03] वही सृष्टि है, वही स्रष्टा है। उसके

[34:07] प्रति कहना बिल्कुल ठीक है।

[34:13] सात तस्मिन परम प्रेम रूपा

[34:16] उसके प्रति परम प्रेम रूप है। ना नाम का

[34:20] पता है ना धाम का पता है। इसका क्या अर्थ

[34:24] हुआ?

[34:25] इसका अर्थ यह हुआ कि प्रेम

[34:29] तो नाम धाम के बिना नहीं हो सकता। भक्ति

[34:32] हो सकती है। प्रेम के लिए तो नाम धाम

[34:35] चाहिए। तुम अगर कहो कि मैं प्रेम में पड़

[34:38] गया हूं। और कोई पूछे किसके प्रति तुम कहो

[34:42] इसका कुछ पता नहीं। तो तुम पागल हो।

[34:50] प्रेम तो साकार के प्रति है इसलिए नाम पता

[34:54] है।

[34:57] प्रेम का तो कोई एड्रेस है। पत्र लिखा जा

[35:01] सकता है। परमात्मा का कोई एड्रेस नहीं।

[35:03] पत्र लिखा नहीं जा सकता।

[35:07] परमात्मा के लिए तो बड़ा बावलापन चाहिए।

[35:13] निराकार के प्रति प्रेम

[35:17] इसका अर्थ यह हुआ

[35:20] कि ऑब्जेक्ट विषय तो खो गया सब्जेक्ट केवल

[35:24] तुम ही बचे

[35:27] जिन्होंने परमात्मा के प्रति प्रेम जाना

[35:30] उन्होंने वस्तुतः यही जाना कि वहां कोई भी

[35:32] नहीं है बस प्रेम ही प्रेम है।

[35:35] असल में परमात्मा के प्रति प्रेम कहना ठीक

[35:38] नहीं है। वहां प्रति है ही नहीं।

[35:43] वहां सिर्फ प्रेम का निवेदन है। किसी के

[35:45] प्रति नहीं सिर्फ प्रेम का अविर्भाव है।

[35:49] शुद्ध प्रेम की ऊर्जा का उठान है। उत्थान

[35:53] है। उर्ध्व गमन है। किसी के प्रति नहीं।

[36:00] पर कहना होगा तुम्हारी भाषा में। इसलिए

[36:03] सूत्र कहता है वह

[36:06] उसके प्रति परम प्रेम रूपा है। परम प्रेम।

[36:11] तभी है जब प्रेमी की भी जरूरत ना रह जाए।

[36:17] जब तक प्रेमी की जरूरत है तब तक तुम्हारा

[36:20] प्रेम परम प्रेम नहीं निर्भर है।

[36:24] निर्भर है तो शुद्ध नहीं हो सकता। जिससे

[36:27] तुम प्रेम करोगे वो तुम्हारे प्रेम को

[36:30] आच्छादित करेगा। जिससे तुम प्रेम करोगे वह

[36:33] तुम्हारे प्रेम को रंग देगा। जिसको तुम

[36:36] प्रेम करोगे वह तुम्हारे प्रेम को डंग

[36:38] देगा।

[36:41] परम नहीं हो सकता। ऐसा समझो कि जब भी सोने

[36:45] का आभूषण बनाओगे तो शुद्ध ना रह जाएगा।

[36:50] कुछ ना कुछ

[36:52] मिलाना पड़ेगा क्योंकि शुद्ध सोना इतना

[36:55] नाजुक है। उसके आभूषण नहीं बनते।

[36:59] उसमें कुछ मिलाना ही पड़ेगा। विजाती कुछ

[37:03] तांबा मिलाओ, कुछ और मिलाओ।

[37:06] वो 18 कैरेट रह जाएगा। 20 कैरेट होगा, 22

[37:09] कैरेट होगा। लेकिन शुद्ध नहीं हो सकता। 24

[37:12] कैरेट नहीं हो सकता।

[37:16] ऐसा समझो कि भक्ति के जब तुम आभूषण बनाते

[37:20] हो तो प्रेम हो जाता है।

[37:23] और जब तुम प्रेम के आभूषणों को पिघला लेते

[37:26] हो और शुद्ध कर लेते हो। तब भक्ति हो जाती

[37:29] है। लेकिन जब तुम प्रेम के आभूषण पिघलाते

[37:33] हो तो प्रेमी भी पिघल जाता है। तुम जिसे

[37:35] प्रेम करते थे वो बचता नहीं। तुम भी नहीं

[37:40] बचते। प्रेम ही बचता है। वो दोनों गए। वो

[37:44] द्वेद गया और जब प्रेम ही बचता है तब

[37:47] प्रेम शुद्ध है।

[37:51] ना मैं ना तू।

[37:54] दोनों खो गए।

[37:58] जलालुद्दीन रूमीन की बड़ी प्रसिद्ध कविता

[38:01] मुझे बड़ी प्यारी एक प्रेमी अपने प्रेष के

[38:03] द्वार पर दस्तक देता है। भीतर से आवाज आती

[38:07] कौन है? प्रेमी कहता है मैं हूं तेरा

[38:09] प्रेमी पहचाना नहीं मेरी पग ध्वनि

[38:13] विस्मृत हो गई मेरी आवाज

[38:18] पहचान से उतर गई लेकिन भीतर से आवाज आई

[38:23] अभी तुम इस योग नहीं के द्वार खोले अभी

[38:27] तुम अधिकारी नहीं।

[38:29] प्रेमी बड़ा हैरान हुआ

[38:33] क्योंकि प्रेमी तो सदा सोचता है कि

[38:35] अधिकारी है ही। हर व्यक्ति की यही भूल है

[38:39] कि हर व्यक्ति जन्म से ही समझता है कि वो

[38:41] प्रेम का अधिकारी इसलिए प्रेम को कोई

[38:43] सीखता ही नहीं। बिना सीखे ही प्रेम करने

[38:46] लगते हैं

[38:47] और इसलिए फिर प्रेम में इतनी भूले होती है

[38:50] और प्रेम में इतना उपद्रव होता है और सारा

[38:53] जीवन बर्बाद हो जाता है।

[38:55] प्रेम संभावना है सत्य नहीं।

[38:59] प्रेम को प्रकटाना है। वो प्रगट नहीं है।

[39:02] प्रेम कोई मिली हुई संपदा नहीं है। खोजनी

[39:04] है। सृजन करना है उसका। प्रेमी लौट गया।

[39:09] वर्षों भटकता रहा। प्रेम की खोज करता रहा।

[39:12] प्रेम का अर्थ समझने की चेष्ठा करता रहा।

[39:14] ध्यान किया प्रार्थना की। धीरे-धीरे प्रेम

[39:17] का अविर्भाव हुआ। वो लौटा। फिर उसने दस्तक

[39:21] दी। भीतर से आवाज आई कौन? तो जलालुद्दीन

[39:26] कहता है कि अब प्रेमी ने कहा तू ही है।

[39:31] और द्वार खुल गए। जलालुद्दीन से अगर मेरी

[39:34] कभी मुलाकात हो जाए।

[39:37] कभी ना कभी हो सकती

[39:40] क्योंकि जो रहा है वह कहीं होगा

[39:45] जो है वह मिटता नहीं तो उसे मैं कहूं कि

[39:47] कविता पूरी कर दो ये अधूरी

[39:50] अभी भी द्वार खुलने नहीं चाहिए क्योंकि

[39:53] जहां तू है वहां मैं मिट नहीं सकता

[39:58] प्रेमी ने पहले कहा मैं

[40:01] अब उसने बदल लिया पहलू

[40:04] लेकिन पहलू बदलने से कुछ फर्क नहीं पड़ता

[40:06] अब वो कहता है तू।

[40:09] लेकिन तू का क्या अर्थ है अगर मैं मिट गया

[40:12] हो? किसको कहोगे तू?

[40:15] किस प्रसंग में कहोगे तू?

[40:19] तू का सारा अर्थ मैं में छिपा है। जब तक

[40:22] मैं हूं तभी तक तू में अर्थ है। जब मैं ही

[40:25] ना रहा तो तू कौन?

[40:31] जलालुद्दीन से मैं कहूं कि इसे थोड़ा और

[40:34] आगे बढ़ा। एक दफा और लौट आए इस प्रेमी को

[40:36] जल्दी मत कर कविता खत्म करने की इतनी

[40:40] जल्दी भी क्या है और चार लाइन जोड़ी जा

[40:42] सकती है जाने दे वापस

[40:46] प्रसी से कहलवा दे कि कुछ कुछ तैयार हुआ

[40:50] लेकिन पूरा नहीं

[40:52] थोड़ी अधिकारी होने की क्षमता आई लेकिन

[40:56] अभी प्रारंभ है

[40:59] थोड़ा और भटक थोड़ा और खोज इतना पहुंचा है

[41:03] तो आगे भी पहुंच पहुंच ही जाएगा। रास्ता

[41:06] ठीक है जिस पर चल पड़ा मंजिल अभी नहीं आई।

[41:10] आधी यात्रा हो गई है। मैं खो गया। आधी और

[41:15] होनी चाहिए। तू भी खो जाए।

[41:19] फिर ला कुछ वर्षों बाद।

[41:23] फिर लाने की वैसे जरूरत भी नहीं।

[41:27] फिर तो प्रसी वही चली आएगी जहां प्रेमी

[41:30] है।

[41:38] परम प्रेम तब है जब ना प्रेमी रहा ना

[41:41] प्रेसी रहे

[41:44] जब द्वंद खो गया

[41:48] उसके प्रति परम प्रेम रूपा है

[41:51] और तब

[41:55] अभी मैखान दीदार हर जर्रे में खुलता है

[42:00] अगर इंसान अपने आप से बेगाना हो जाए

[42:05] और तब कण कण में उसकी मधुशाला का दरवाजा

[42:09] खुल जाता है। कण-कण में अभी महखाने दीदार

[42:14] हर जर्रे में खुलता है।

[42:17] कण कण में उसका मधु बिखर जाता है। कण-कण

[42:20] में उसकी मधुशाला का द्वार खुल जाता है।

[42:22] अगर इंसान अपने आप से बेगाना हो जाए। अगर

[42:25] आदमी अपने को भूल जाए तो परमात्मा को पाने

[42:28] में अड़चन कहां?

[42:32] अपने से बेगाना हो जाए

[42:36] मैं को भूल जाए

[42:38] मैं को छोड़ दे

[42:41] मैं को ना पकड़े रखे

[42:46] तो उसकी मधुशाला

[42:48] कण कण पर बिखर जाती फिर सभी जगह उसकी ही

[42:51] मस्ती है

[42:54] ना तुम हो ना वह मस्ती ही मस्ती वही परम

[42:58] प्रेम रूप

[43:04] अमृत स्वरूपाचा

[43:07] बड़े अद्भुत सूत्र है छोटे बीज रूप

[43:14] और

[43:15] अमृत स्वरूपा है वह भक्ति परम प्रेम रूपा

[43:20] है और अमृत स्वरूपा है क्योंकि जिसने परम

[43:24] प्रेम जाना फिर उसकी कोई मृत्यु नहीं

[43:27] क्यों क्योंकि वो तो मर ही चुका अब मरेगा

[43:31] कैसे?

[43:32] मरना तो तभी तक शेष है जब तक तुम मिटे

[43:35] नहीं मरे नहीं। मौत तो तभी तक डराएगी जब

[43:40] तक तुम हो। जिसने अपने को खो दिया उसकी

[43:44] कैसी मौत? उसने मौत पर विजय पा ली। वो

[43:48] अमृत स्वरूप को उपलब्ध हो गया।

[44:04] ध्यान रखना

[44:06] अहंकार की ही मृत्यु होती है तुम्हारी कभी

[44:09] नहीं होती कभी हुई नहीं हो नहीं सकती तुम

[44:12] शाश्वत हो सनातन हो सदा थे सदा रहोगे

[44:17] अन्यथा कोई उपाय नहीं है तुम चाहो भी अपने

[44:21] को मिटा लेना तो नहीं मिटा सकते

[44:24] मौत होती ही नहीं

[44:27] लेकिन तुमने एक अपना काल्पनिक

[44:31] आकार रूप समझ रखा है। उस कल्पना की मौत

[44:35] होती है। तुमने अपनी एक अहंकार की प्रतिमा

[44:38] बना रखी है। परमात्मा से जुदा तुमने अपने

[44:42] को मैं कहने का भाव बना रखा है। वही मैं

[44:45] भाव मरता है।

[44:48] क्योंकि तुम उससे बड़े जुड़े हो। तुम्हें

[44:50] लगता है मैं मरा।

[44:54] मैं भाव छूट जाए

[44:57] अमृत स्वरूपाचा

[45:01] तब

[45:02] तब जो मिलता है उसकी कोई मृत्यु नहीं

[45:10] सिद्ध भवती अमृत भवती तृप्तो भवती

[45:16] उस भक्ति को प्राप्त मनुष्य सिद्ध हो जाता

[45:19] है अमर हो जाता है और तृप्त हो जाता

[45:24] सिद्ध हो जाता है। सिद्ध का क्या अर्थ

[45:26] होता है? सिद्ध का अर्थ होता है जो होने

[45:30] को थे वही हो गए।

[45:33] जो बीज की तरह लाए थे वो खिल गया फूल की

[45:36] तरह। सिद्ध का अर्थ होता है।

[45:40] सिद्ध का अर्थ होता है अब और साधना करने

[45:43] को ना रही। अब और कोई साधना रहा।

[45:48] अब सभी साधनों के पार आ गए।

[45:54] सिद्ध का अर्थ होता है, तुमने पा लिया

[45:57] अपने स्वभाव को, अपने स्वरूप को

[46:02] पहुंच गए उस परम मंदिर में जिसकी तलाश थी।

[46:06] जन्मों जन्मों अनंत काल तक जिसे खोजा था,

[46:09] जिसके लिए भटके थे।

[46:15] स्वयं को खोते ही व्यक्ति सिद्ध हो जाता

[46:18] है। इसका अर्थ हुआ कि सारा भटकाव अहंकार

[46:22] का है। तुम इसलिए नहीं भटकते कि कोई

[46:25] तुम्हें और भटका रहा है। तुम इसलिए भटकते

[46:27] हो कि तुम हो।

[46:32] जब तक तुम हो भटकोगे

[46:34] तुम मिटे कि पहुंचे।

[46:37] मिटने में ही पहुंच जाना है। होने में ही

[46:40] भटकना है।

[46:46] अमर हो जाता है, तृप्त हो जाता है।

[46:51] जिस भक्ति के प्राप्त होने पर मनुष्य ना

[46:53] किसी वस्तु की इच्छा करता है, ना द्वेष

[46:56] करता है ना आसक्त होता है और ना उसे विषय

[46:59] भोगों में उत्साह होता है।

[47:03] इब्तदा वो थी कि जीने के लिए मरता था मैं।

[47:07] इंतहा यह है कि मरने की भी हसरत ना रही।

[47:11] [संगीत]

[47:13] ऐसे भी दिन थे जब जीने के लिए ऐसी आतुरता

[47:17] थी कि मरने को भी तैयार हो जाता था

[47:21] और आखरी वक्त इंतहा यह है और आखरी बात यह

[47:26] है पहुंच जाने की बात यह है कि मरने की भी

[47:30] हसरत ना रही जीने की तो बात छोड़ो

[47:33] मरने की भी आकांक्षा नहीं उठती तुमने कभी

[47:37] ख्याल किया तुम्हें मरने की आकांक्षा तभी

[47:40] उठती है जब तुम्हारी जीवन की आकांक्षा

[47:42] पूरी नहीं होती। जहां जहां अड़चन आती है

[47:45] जीवन की आकांक्षा में वही तुम कहते हो मर

[47:47] जाना बेहतर। मरना तुम चाहते नहीं। जीना

[47:51] तुम चाहते हो अपनी शर्तों पर। शर्त कभी

[47:54] पूरी नहीं होती तो मरने की तैयारी करने

[47:57] लगते हो। रूसी कहानी है। एक लकड़हारा लौट

[48:00] रहा है। गठ्ठर लेकर सिर पर। जिंदगी भर

[48:04] लकड़ियां ढोता रहा है। थक गया है। सभी थक

[48:08] जाते हैं और सभी लकड़ियां ढो रहे हैं।

[48:11] काटो जंगल से बेचो बाजार में फिर दूसरे

[48:14] दिन काटो जंगल से फिर बेचो बाजार में थक

[48:17] गया है हड्डी हड्डी जरा जीर्ण हो गई है उस

[48:21] दिन तो बड़ा दुखी है कि इससे भी क्या सार

[48:24] है यही करता रहा यही करता रहूंगा और एक

[48:27] दिन मर जाऊंगा और मिट्टी में गिर जाऊंगा

[48:30] तो उसने कहा ये मौत सभी को आती है एक मुझे

[48:34] को छोड़ देती मुझे क्यों नहीं आती उठा ले

[48:37] मुझे ऐसे मौत साधारणता इतनी जल्दी सुनती

[48:41] नहीं।

[48:44] पर कहानी है कि मौत ने सुन लिया। मौत आ

[48:48] गई।

[48:51] लकड़हारा गट्ठर को पटक के दुखी मन से बैठा

[48:54] था। मौत ने आकर कहा मैं आ गई। बोलो क्या

[48:57] काम है? देखा मौत को हाथ पैर कप गए। प्राण

[49:01] कप गए। सांस रुक गई। उसने कहा नहीं कुछ

[49:03] काम नहीं। कोई और दिखाई नहीं पड़ा। गट्ठर

[49:05] उठवा के सिर पर रखवाना।

[49:10] कृपा कर और गट्ठर उठा के सिर पर रख दे।

[49:15] तुम जब भी मरने की बात करते हो तब गौर से

[49:19] देखना वहां जीने की आकांक्षा बड़ी गहरी

[49:21] है। इसलिए जो लोग आत्महत्या करते हैं तुम

[49:24] चौकना मत। तुम ये मत सोचना कि इन लोगों ने

[49:27] आत्महत्या कर ली। बात क्या है? आदमी तो

[49:30] जीना चाहता है। यह मर कैसे गए? ये बहुत

[49:32] बुरी तरह जीना चाहते थे। बड़ी प्रगाढ़ता

[49:36] से जीना चाहते थे। इनकी शर्तें बड़ी थी

[49:39] जिंदगी पूरी ना कर पाई।

[49:42] यह जिंदगी से नाराज हो गए।

[49:47] यह जिंदगी को तो ना मिटा पाए जिंदगी को

[49:49] मिटाने के लिए तत्पर हो गए थे। अपने को

[49:51] मिटा लिया।

[49:55] मगर इनकी आत्महत्या में जीवन की आकांक्षा

[49:58] जीना है।

[50:03] जब तुम जीवन की आकांक्षा छोड़ देते हो।

[50:08] तब तुम चकित हो जाओगे कि उसके साथ ही साथ

[50:11] मृत्यु की आकांक्षा भी छूट जाती है।

[50:15] जिस व्यक्ति के जीवन को जीवना से छुटकारा

[50:19] मिल गया

[50:21] जो अभी राजी है कि मौत आ जाए तो तैयार पाए

[50:25] जो यह भी नहीं कहता कि कल मुझे जीना है।

[50:28] उसे तुम कभी आत्महत्या करता ना पाओगे।

[50:31] हालांकि तुम्हें लगेगा कि इसे तो

[50:33] आत्महत्या कर लेनी चाहिए। जब यह आदमी कहता

[50:36] है कि मुझे जीने का कोई सवाल नहीं है तो

[50:40] इसे आत्महत्या कर लेनी चाहिए लेकिन

[50:42] आत्महत्या तभी की जाती जब जीने की बड़ी

[50:44] गहरी आकांक्षा होती है। यह आत्महत्या भी

[50:47] क्यों करें

[50:49] मरने की भी हसरत ना रही

[50:52] उतनी आकांक्षा भी नहीं है

[50:58] ना किसी वस्तु की इच्छा करता है क्योंकि

[51:01] जिसने भक्ति को जान लिया

[51:05] वस्तुएं व्यर्थ हो गई। तुम जब कभी प्रेम

[51:08] को जानते हो तब भी वस्तुएं व्यर्थ हो जाती

[51:10] हैं। तुमने कभी ख्याल किया प्रेमी एक

[51:12] दूसरे को वस्तुओं की भेंट देने लगते हैं।

[51:15] वो प्रेम का लक्षण है।

[51:18] क्यों? वस्तुओं का मोह नहीं रह जाता।

[51:22] वस्तुएं देने योग्य हो जाती। पकड़ रखने

[51:25] योग्य नहीं रह जाती। जिसे तुम प्रेम करते

[51:28] हो उसे तुम सब दे देना चाहते हो।

[51:31] इसलिए कंजूस प्रेम नहीं कर पाते।

[51:34] कृपण आदमी के जीवन में कोई प्रेम नहीं हो

[51:37] सकता। क्योंकि कृपणता और प्रेम एक साथ

[51:40] नहीं हो सकते। एक ही घर में उन दोनों का

[51:42] निवास नहीं हो सकता।

[51:46] तो ध्यान रखना कृपण तो प्रेमी भी नहीं हो

[51:49] सकता। भक्त होना तो असंभव है। लेकिन अक्सर

[51:52] तुम कृपणों को भक्त पाओगे। वो भक्ति झूठी

[51:56] है। निजाम हैदराबाद भक्त आदमी थे।

[52:01] लेकिन मैंने सुना है कि दुनिया के सबसे

[52:05] बड़े संपत्तिशाली आदमी थे। इतनी बड़ी

[52:08] संपत्ति और किसी के पास नहीं। लेकिन कृपण

[52:11] तुम ऐसा आदमी ना पाओगे। जो टोपी उनको

[52:14] सिंहासन पर बैठते वक्त पहनी थी वो 40 साल

[52:17] उसको पहने रहे। उससे बास आती थी। वो इतनी

[52:21] गंदी हो गई थी। वो उसको धुलने नहीं देते

[52:24] थे। क्योंकि धुलने में कहीं बिगड़ ना जाए।

[52:27] कहीं खराब ना हो जाए। वह मरते दम उसी को

[52:30] पहने रहे।

[52:32] [संगीत]

[52:33] मेहमान

[52:35] सिगरेट अधली छोड़ जाते तो एस्ट्रेस वो

[52:38] इकट्ठे कर लेते थे। खुद पीने के लिए तुम

[52:41] भरोसा ना करो।

[52:44] और यह आदमी भक्त था। पांच बार इबादत करता

[52:46] था भगवान की। यह असंभव है।

[52:53] यह बिल्कुल असंभव है। यह आदमी किसको धोखा

[52:57] दे रहा है?

[52:59] अभी तो इस आदमी के जीवन में प्रेम भी नहीं

[53:03] जली सिगरेट झूठी सिगरेट इकट्ठी कर रहा है।

[53:08] जैसे ही मेहमान जाए जो पहला काम निजाम

[53:11] करते थे वो ये कि जल्दी से सिगरेट संभाल

[53:14] के रख लेना फिर फुर्सत से पिएंगे।

[53:21] जहां भी तुम कृपण को पाओ वहां तुम समझ

[53:25] लेना कि अगर वह भगवान की बातें कर रहा हो

[53:30] प्रेम और भक्ति की बातें कर रहा हो तो

[53:33] किसी गहरे गांव को छिपाने की तरकीबे

[53:37] कृपण कभी भक्त नहीं हो सकता। कृपण प्रेमी

[53:40] ही नहीं हो पाता। वो पहली ही सीढ़ी नहीं

[53:42] चढ़ता। दूसरी पर तो पहुंचेगा कैसे?

[53:47] जब तुम प्रेम करते हो ततक्षण तुम्हारी

[53:49] पकड़ वस्तुओं से उठ जाती है तुम भेंट कर

[53:53] सकते हो दान दे सकते हो और देकर तुम

[53:55] प्रसन्न होते हो उदास नहीं

[53:59] और जो तुमसे ले लेता है तुम उसके

[54:02] अनुग्रहित होते हो कि उसने हल्का किया

[54:06] तुम ऐसा नहीं सोचते कि वो तुम्हारा

[54:08] अनुग्रहित हो क्योंकि अगर उतना भी रह गया

[54:10] तो सौदा हुआ फिर तुम कृपण हो

[54:15] हिंदुस्तान में रिवाज है।

[54:19] ब्राह्मण घर आए

[54:23] तो पहले उसे भेंट दो। दान दो। फिर दक्षिणा

[54:26] भी दो। दक्षिणा का मतलब होता है धन्यवाद

[54:31] कि तुमने भेंट स्वीकार की। दक्षिणा बड़ा

[54:34] अद्भुत शब्द है। पहले दान दो।

[54:38] और क्योंकि ब्राह्मण ने स्वीकार किया।

[54:40] इंकार भी कर सकता था।

[54:43] फिर दक्षिणा दो कि धन भाग कि तुमने

[54:46] स्वीकार किया तुम इंकार कर देते

[54:53] तो मेरा प्रेम अधूरा

[54:56] वापस लौट आता तुमने द्वार दिया इसलिए

[55:00] प्रेमी अनुग्रहित होता है देकर

[55:04] भक्त सब लुटा के अनुग्रहित होता है

[55:11] किसी वस्तु की इच्छा नहीं करता है ना

[55:14] द्वेष करता है क्योंकि जब इच्छा ही ना रही

[55:17] तो द्वेष कहां द्वेष तो इच्छा की छाया है

[55:22] जब तक तुम इच्छा करते हो तब तक द्वेष भी

[55:25] करोगे

[55:27] क्योंकि जो वस्तु तुम चाहते हो अगर किसी

[55:29] और के कब्जे में है तो तुम क्या करोगे तुम

[55:32] द्वेष करोगे

[55:34] तुम ईर्ष्या करोगे तुम जलोगे

[55:40] ना आसक्त होता

[55:42] क्योंकि जब इच्छा ही ना रही

[55:46] समझ लो इसको ठीक से जिसके जीवन में

[55:48] वस्तुओं की इच्छा है

[55:51] उसका अर्थ है कि उसने प्रेम को नहीं जाना

[55:53] पहली बात वो चूक गया

[55:58] वस्तुएं तो पड़ी रह जाएंगी प्रेम साथ जाता

[56:03] थोड़ा जाता भक्ति होती तो पूरा जाता उतना

[56:07] जाता जितना प्रेम था जितना खाली सोना था

[56:10] साथ चला जाता शेष विजाती ही पड़ा रह जाता

[56:12] है।

[56:16] अगर तुम प्रेम तक नहीं पहुंच पाए

[56:19] तो उसका अर्थ केवल इतना है तुम जो भी

[56:22] इकट्ठा कर रहे हो वो सब मौत छीन लेगी।

[56:25] इसलिए कृपण मौत से डरता है। जीता नहीं और

[56:29] मौत से डरता है।

[56:33] जीने की तैयारी करता है। जीता कभी नहीं।

[56:35] क्योंकि जीने में तो खर्च,

[56:39] जीने में तो प्रेम लाना पड़ेगा।

[56:43] जीने में तो

[56:46] व्यक्तित्व प्रवेश कर जाएंगे। वस्तुओं की

[56:49] दुनिया समाप्त हो जाएगी।

[56:51] ना वो सिर्फ जीने की तैयारी करता है। मकान

[56:54] बनाता है जिसमें कभी रहेगा। धन इकट्ठा

[56:56] करता है जिसको कभी भोगेगा। शादी करता है

[57:00] पत्नी जिससे कभी प्रेम करेगा फुर्सत से।

[57:03] बच्चे पैदा करता है कि कभी जब समय होगा

[57:05] सुविधा होगी

[57:08] तब इन पर आशीर्वाद बरसा देंगे मगर वह दिन

[57:11] कभी आता नहीं

[57:13] वो तैयारी ही करता है एक दिन मौत उसे उठा

[57:16] लेती है और जो भी उसने इकट्ठा किया था वो

[57:19] सब पड़ा रह जाता है इसका बहस सताता है

[57:23] इसलिए कृपण डरता रहता है और डर के कारण और

[57:26] भी कृपण होता जाता है मौत के खिलाफ इंतजाम

[57:30] करता है मौत के खिलाफ एक एक ही इंतजाम है

[57:33] और वह है प्रेम। मौत के खिलाफ दूसरा कोई

[57:36] इंतजाम नहीं। कोई सुरक्षा नहीं। कोई बीमा

[57:40] कंपनी मौत के खिलाफ सुरक्षा नहीं दे सकती।

[57:43] सिर्फ प्रेम।

[57:45] क्योंकि प्रेम के क्षण में तुम वस्तुओं के

[57:48] ऊपर उठते हो और व्यक्तित्व

[57:50] दृष्टि में आता है। व्यक्तियों का संसार

[57:53] शुरू होता है। वस्तुओं का समाप्त होता है।

[57:56] तब वस्तुएं साधन रूप हो जाती है। तुम

[57:59] प्रेम के लिए उनका उपयोग करते हो। लेकिन

[58:01] वे तुम्हारा उपयोग नहीं कर पाती।

[58:07] जब तुम वस्तुओं की इच्छा करते हो तो जो

[58:10] वस्तुएं तुम्हारे पास है, उनमें तुम्हारी

[58:13] आसक्ति होती है। कोई छीन ना ले। और जो

[58:16] तुम्हारे पास नहीं है, दूसरों के पास है

[58:18] उनसे तुम्हारा द्वेष होता है क्योंकि उनके

[58:21] पास है और तुम्हारे पास नहीं है। इच्छा के

[58:25] दो पहलू बन जाते हैं। फिर अपने पास जो है

[58:28] उसे पकड़ो और दूसरे के पास जो है उसे

[58:30] छीनो।

[58:32] तब सारा जीवन एक छीना झपट एक आपाधापी

[58:37] एक दौड़ धूप हो जाती है। हाथ कुछ भी नहीं

[58:40] लगता।

[58:42] मरते वक्त हाथ खाली होते हैं।

[58:48] ना आसक्त होता है ना उसे विषय भोगों में

[58:51] उत्साह होता है।

[58:53] यह बात बहुत समझ लेने जैसा है। विषय भोगों

[58:57] में तुम्हें उत्साह तभी तक है जब तक

[58:59] तुम्हें परम भोग का स्वाद नहीं मिला।

[59:02] क्षद्र को भोगता आदमी तभी तक है जब तक

[59:05] विराट के भोग का द्वार नहीं खुला। कंकर

[59:08] पत्थर बिनते हो क्योंकि हर जवाहरातों का

[59:11] पता नहीं।

[59:13] कूड़ा करकट इकट्ठा करते हो

[59:17] क्योंकि संपत्ति की कोई पहचान नहीं।

[59:21] यह लक्षण है

[59:25] भक्त का कि उसे विषय भोगों में कोई उत्साह

[59:29] नहीं होता।

[59:31] कामी को सिर्फ विषय भोग में उत्साह होता

[59:33] है और कोई उत्साह नहीं होता।

[59:37] प्रेमी को

[59:39] विषय भोग में उत्साह नहीं होता।

[59:42] किन्हीं और चीजों में उत्साह होता है। अगर

[59:45] उनके सहारे काम भी चले तो ठीक। जैसे समझो

[59:53] अगर तुम किसी व्यक्ति के प्रेम में हो तो

[59:56] तुम चाहोगे कि दोनों बैठकर कभी शांत

[59:59] आकाश में तारों को देखो।

[01:00:03] काम ही नहीं चाहेगा।

[01:00:06] काम ही कहेगा क्यों फिजूल समय खराब करना।

[01:00:08] तारों में क्या रखा है?

[01:00:11] एक दफा देख लिए सदा के लिए देख लिए

[01:00:16] को तो शरीर में रस है तारों में नहीं

[01:00:21] चांद में नहीं

[01:00:23] पक्षियों के गीत में नहीं दो प्रेमी बैठकर

[01:00:26] सितार सुन सकते हैं या गीत गा सकते हैं या

[01:00:30] दो प्रेमी बैठ के शांत मौन ध्यान कर सकते

[01:00:34] हैं प्रार्थना कर सकते हैं

[01:00:39] उस प्रार्थना के माध्यम से ही अगर काम भी

[01:00:42] जीवन में आ जाए तो उन्हें कोई विरोध नहीं

[01:00:45] है।

[01:00:47] लेकिन शुरू उन्होंने प्रार्थना की थी।

[01:00:49] चांद को देखतेदे वह करीब आ जाए और एक

[01:00:52] दूसरे का हाथ हाथ में ले ले तो उन्हें कुछ

[01:00:54] विरोध नहीं है। लेकिन देखना उन्होंने चांद

[01:00:57] को शुरू किया था।

[01:00:59] प्रेमियों की आंख एक दूसरे पर नहीं होती।

[01:01:02] एक साथ किसी और चीज पर होती है। काियों की

[01:01:06] आंख एक दूसरे पर होती और किसी चीज पर नहीं

[01:01:09] होती।

[01:01:12] प्रेमी किसी और तीसरी चीज को देखते हैं

[01:01:15] अपने से पार प्रेम का कोई गंतव्य है काम

[01:01:18] का कोई गंतव्य नहीं काम अपने आप में

[01:01:22] समाप्त हो जाता है प्रेम अपने से पार जाता

[01:01:24] है जो पार ले जाए जो अतिक्रमण कराए जो

[01:01:29] तुम्हें तुमसे ऊपर देखने की

[01:01:33] सुविधा दे वही प्रेम है तो प्रेमी कभी बैठ

[01:01:37] के सितार सुनेंगे या कभी गीत गाए या कभी

[01:01:40] नाचेंगे

[01:01:43] या कभी खुले आकाश के नीचे लेटेंगे या कभी

[01:01:47] सागर तट पर घूमेंगे कभी सागर के नाथ को

[01:01:51] सुनेंगे

[01:01:53] लेकिन प्रेमी काम ही नहीं

[01:01:59] प्रेमी का कुछ लक्ष्य जो दोनों से पार है

[01:02:07] लेकिन बार-बार

[01:02:09] उस लक्ष्य से वह अपने पर लौट आएंगे। भक्त

[01:02:11] कभी नहीं लौटता गया सो गया। वह जब चांद की

[01:02:15] तरफ गया तो गया फिर नहीं लौटता।

[01:02:19] भक्त पीछे लौटना नहीं जानता। कामी तो कहीं

[01:02:23] जाता ही नहीं। प्रेमी जाता है लौट-लौट आता

[01:02:26] है। भक्त गया सो गया।

[01:02:33] काम ऐसे हैं। जैसे पिंजरे में बंद पक्षी।

[01:02:39] कहीं जाता नहीं वही पिंजरे में उछल कूद

[01:02:42] करता रहता है

[01:02:45] वही हालन चलन करता रहता है बस पिंजरा उसकी

[01:02:48] सीमा है प्रेम ऐसे है

[01:02:52] जैसे कबूतर

[01:02:54] उड़ते हैं आकाश में फिर अपने घर पर वापस

[01:02:57] लौट आते पिंजर में बंद नहीं

[01:03:01] ना लौटे तो कोई उन्हें बुलाता नहीं कोई

[01:03:04] पकड़ने नहीं जा सकता अपने से लौट आते

[01:03:08] घर के ऊपर एक लगा दिया होता है।

[01:03:11] उड़ते हैं दूर आकाश में बड़ी दूर की

[01:03:13] यात्रा करते हैं। थकते हैं लौट आते हैं

[01:03:15] वापस। प्रेमी ऐसे पक्षी हैं जो पिंजरों

[01:03:19] में बंद नहीं है। जाते हैं दूर अपने से

[01:03:21] पार लौट आते हैं। भक्त ऐसा पक्षी है जो

[01:03:25] गया सो गया। उसका लौटने को कोई घर नहीं

[01:03:28] है। उसका घर सदा आगे है और आगे।

[01:03:32] वह जब तक परमात्मा तक ही ना पहुंच जाए तब

[01:03:35] तक यात्रा जारी रहती है।

[01:03:39] भक्ति के प्राप्त होने पर मनुष्य ना किसी

[01:03:42] वस्तु की इच्छा करता है ना द्वेष करता है

[01:03:44] ना आसक्त होता है और ना उसे विषय भोगों

[01:03:47] में उत्साह होता है।

[01:03:56] यत्वा, मत्तो भवती, स्तब्धो भवती, आत्मा

[01:04:01] रामो भवती। उस भक्ति को जानकर मनुष्य

[01:04:04] उन्मत्त हो जाता है। स्तब्ध हो जाता है और

[01:04:08] आत्माराम हो जाता है। उन्मत्त हो जाता है।

[01:04:13] पागल हो जाता है।

[01:04:18] भक्ति अपूर्व उन्मत्तता है।

[01:04:22] आंखें सदा नशे से सरोब रहती है।

[01:04:28] मन सदा

[01:04:32] एक अपूर्व बेहोशी में डूबा होता है।

[01:04:40] जीवन

[01:04:42] साधारण गति नहीं रह जाती। नृत्य हो जाता

[01:04:45] है।

[01:04:47] जीवन से गद्य खो जाता है। पद्य का जन्म

[01:04:51] होता है।

[01:04:55] किसी और ही आयाम में प्रवेश हो जाता है।

[01:05:00] वह सिजदा क्या रहे एहसास जिसमें सिर उठाने

[01:05:05] का

[01:05:07] इबारत और बकद्रे होश तौहीन इबादत है।

[01:05:14] भक्त का सिर झुकता है तो फिर उठता नहीं।

[01:05:18] साधारण लोगों को पागल मालूम पड़ेगा।

[01:05:22] साधारण लोग तो सिर झुकाते नहीं सिर्फ

[01:05:24] दिखाते हैं कि सिर झुकाते

[01:05:28] दिखाते भर

[01:05:31] अहंकार तो अकड़ा खड़ा रहता है शरीर ही

[01:05:33] कवायद करता है

[01:05:37] वह सिजदा क्या रहे एहसास जिसमें सिर उठाने

[01:05:41] का लेकिन भक्त ऐसे पागल हैं कि वह इसी को

[01:05:44] सिजदा कहते हैं इसी को सिर झुकाना कहते

[01:05:46] हैं कि जब ये ख्याल ही ना रह जाए कि अब

[01:05:48] सिर उठाना भी झुका दिया उसको उठाना क्या

[01:05:51] मिटा दिया उसे वापिस संभालना क्या इबादत

[01:05:55] और बकद्रे होश तोहीन इबादत है और होश क्या

[01:05:59] बचाना जब डूबे तो डूबे होशियारी से कहीं

[01:06:04] कोई डूबता है हिसाब रख के कहीं कोई प्रेम

[01:06:08] में गया है

[01:06:10] गणित को तो छोड़ जाना पड़ता है पीछे

[01:06:14] तर्क के तो पार जाना होता है बुद्धि तो

[01:06:17] बेईमानी है चालाकी

[01:06:21] बुद्धि तो कुशलता है, गणित है।

[01:06:26] प्रेम इस तरह के गणित को स्वीकार नहीं

[01:06:29] करता। फिर भक्ति की तो बात ही क्या? प्रेम

[01:06:33] में भी गणित टूटने लगता है।

[01:06:36] प्रेम में भी दो चार नहीं होते सदा। कभी

[01:06:39] पांच हो जाते हैं, कभी तीन ही रह जाते

[01:06:41] हैं।

[01:06:43] प्रेम में हिसाब किताब की दुनिया डमाडोल

[01:06:45] हो जाती है।

[01:06:48] भक्ति तो आखिरी शराब है। फिर उसके आगे और

[01:06:51] कोई नशा नहीं।

[01:06:54] वह सजदा क्या रहे एहसास जिसमें सिर उठाने

[01:06:57] का इबारत और बकदरे होश प्रार्थना और वह भी

[01:07:02] होश के साथ। तो भले आदमी प्रार्थना करने

[01:07:06] ही क्यों गए?

[01:07:09] दुकान ही चलाते

[01:07:13] वही तुम्हारी पात्रता थी

[01:07:16] जब प्रार्थना करने गए तो फिर क्या होश

[01:07:20] क्या हिसाब

[01:07:22] इबारत और ब कदरे होश तोहीन इबारत फिर तो

[01:07:26] तुम प्रार्थना की बेइज्जती कर रहे हो

[01:07:30] तोहीन कर रहे हो

[01:07:37] सुना है मैंने

[01:07:40] एक फकीर

[01:07:45] दीवाना हो गया

[01:07:50] घर के लोग समझे नहीं

[01:07:55] मित्र परिजन पहचाने नहीं

[01:07:59] ये बीमारी ना थी

[01:08:01] ये जो आदमियों की साधारण बीमारी है उससे

[01:08:04] मुक्त हो जाना था।

[01:08:06] लेकिन

[01:08:08] साधारण बीमारी को हम स्वास्थ्य समझते हैं।

[01:08:13] उन्होंने वैद्य को बुला लिया।

[01:08:16] वैद्य ने उसकी

[01:08:19] नब्ज को जांच की तो कहते हैं उस फकीर ने

[01:08:23] कहा चाराघर

[01:08:26] मस्त की दुनिया है जमाने से जुदा।

[01:08:31] होश में आ

[01:08:35] जहां हम हैं वहां होश नहीं

[01:08:38] होश में आ कि जहां हम हैं वहां होश नहीं

[01:08:44] कहा वैद्य

[01:08:46] मस्तों की दुनिया और ही दुनिया है ये तू

[01:08:49] क्या कर रहा है होश में आ क्या नब्ज़ पकड़

[01:08:53] रहा है

[01:08:55] मस्तों की एक और ही दुनिया है

[01:08:59] दीवाने

[01:09:02] कुछ और ही आयाम में जीते उसे हम समझे कि

[01:09:06] वो आयाम क्या है? तुम कहां जीते हो?

[01:09:11] तुम वहां जीते हो जहां गणित है, हिसाब है।

[01:09:16] साफ सुथरी रेखाएं हैं। तुम ऐसे जीते हो

[01:09:20] जैसे कोई बगीचा बना लेता है।

[01:09:23] साफ सुथरा।

[01:09:27] भक्त ऐसे जीता है जैसे कोई जंगल में जीता

[01:09:30] है। कुछ साफ सुथरा नहीं है।

[01:09:37] आदमी के हाथ की कोई छाप नहीं है।

[01:09:42] सिर्फ परमात्मा के हस्ताक्षर है। वो किसी

[01:09:46] नियम से नहीं जीता।

[01:09:49] क्योंकि जिसने प्रेम को पा लिया उसके लिए

[01:09:51] कोई नियम लागू नहीं होते।

[01:09:54] जरूरत नहीं रह जाती। संत अगस्त को कोई

[01:09:58] पूछता था

[01:10:00] कि मुझे एक ही नियम बता दो। बहुत नियमों

[01:10:04] की बात मुझसे मत करो मैं ना समझ।

[01:10:08] बहुत आज्ञाएं मुझे मत दो क्योंकि मैं भूल

[01:10:11] ही जाऊंगा। तुम मुझे एक ही सार की बात बता

[01:10:14] दो। मैं शास्त्रों को नहीं जानता हूं।

[01:10:18] आदमी बड़ा अनूठा था।

[01:10:21] क्योंकि अपने अज्ञान को स्वीकार करने से

[01:10:23] बड़ी घटना इस जगत में और नहीं

[01:10:26] मैं अज्ञानी हूं। उसने कहा मुझे तुम

[01:10:28] साधारण सा सूत्र दे दो जो मैं पाल लूं जो

[01:10:31] मुझे भूले ना

[01:10:35] तो अगस्तिन ने बहुत सोचा

[01:10:38] अगस्तिन बोलने में कुशल आदमी था।

[01:10:42] लेकिन इस आदमी के सामने उसका बोलना खो

[01:10:44] गया। उसने बहुत सोचा उसने कहा फिर तुम एक

[01:10:47] काम करो प्रेम बस इतना ही याद रखो फिर से

[01:10:51] सब अपने से हो जाएगा

[01:10:53] तुम प्रेम करो सब नियम पूरे हो जाते हैं

[01:10:57] और तुम सब नियम पूरे करो प्रेम को छोड़ दो

[01:11:00] तो तुम सिर्फ धोखे में हो

[01:11:03] बिना प्रेम के कोई नियम पूरा नहीं होता

[01:11:06] बिना प्रेम के सारी नीति अनीति है और सारा

[01:11:10] आचरण सिर्फ दुराचरण को छिपाने की व्यवस्था

[01:11:14] है

[01:11:17] प्रेम के अतिरिक्त कोई आचरण नहीं

[01:11:21] और जिसने प्रेम को पा लिया उसके लिए फिर

[01:11:23] आचरण के कोई नियम नहीं कोई अनुशासन नहीं

[01:11:26] उसने परम अनुशासन पा लिया

[01:11:33] उस भक्ति को जानकर मनुष्य उन्मत्त हो जाता

[01:11:36] ये वर्णन ये व्याख्या

[01:11:40] परिभाषा नहीं

[01:11:42] उस भक्ति के संबंध में कुछ खबरें दे रहे

[01:11:44] हैं। उन्मत्त हो जाता तुमने पागल को देखा

[01:11:47] है।

[01:11:51] पागल

[01:11:54] भी नियम छोड़ देता है।

[01:11:57] लोकलाज छोड़ देता है।

[01:12:00] कुल मर्यादा छोड़ देता है। पागल से हम आशा

[01:12:03] भी नहीं रखते।

[01:12:05] पागल

[01:12:06] और भक्त में थोड़ी सी समानता है। थोड़ी सी

[01:12:10] अंतर बड़ा है। थोड़ी सी समानता है।

[01:12:15] पागल सामान्य जीवन से नीचे गिर जाता है।

[01:12:18] भक्त ऊपर उठ जाता है।

[01:12:21] दोनों सामान्य जीवन के पार हो जाते हैं।

[01:12:23] एक नीचे गिर के दूसरा ऊपर उठकर।

[01:12:27] पार होने की समानता है। इसलिए

[01:12:33] यह सूत्र है

[01:12:35] कि ध्यान रखना

[01:12:38] भक्ति की पहचान उन्मत्तता है। हमने चैतन्य

[01:12:42] को नाचते देखा है। घर के लोग परेशान थे।

[01:12:47] पागल हो गए। मीरा को हमने नाचते देखा है

[01:12:50] सड़कों पर

[01:12:52] घर के लोग प्रीजन

[01:12:55] परिवार के लोग और मीरा शाही खानदान से थी

[01:13:00] बड़े दुखी थे

[01:13:04] मार डालने की भी चेष्टा क्योंकि ये बदनामी

[01:13:06] का कारण थी राजघराने की महिला और राजस्थान

[01:13:10] में

[01:13:12] जहां घूंघट के बाहर आना ही संभव ना था

[01:13:15] रास्तों पर नाचने लगी लोक लाच खोकर

[01:13:19] सब मर्यादा कुल मर्यादा भूली

[01:13:24] पर मीरा पागल हो गई।

[01:13:30] कहते हैं मीरा

[01:13:33] एक मंदिर में गई। उस मंदिर में रिवाज था

[01:13:38] कि कोई स्त्री प्रवेश ना कर सकेगी।

[01:13:42] बहुत से मंदिर स्त्रियों के लिए बंद रहे।

[01:13:45] डरपों को उन्होंने बनाए होंगे। कायरों ने

[01:13:47] बनाए होंगे।

[01:13:50] व्यभिचारियों ने बनाए होंगे।

[01:13:56] उस मंदिर का जो पुजारी था

[01:14:02] वो बाल ब्रह्मचारी था।

[01:14:05] और दूर-दूर तक उसकी ख्याति थी।

[01:14:11] ख्याति उसकी यही थी कि स्त्रियों को वो

[01:14:13] देखता भी नहीं।

[01:14:15] मंदिर से बाहर निकलता नहीं। मीरा उस द्वार

[01:14:18] पर पहुंच गई। कृष्ण का मंदिर था। वह नाचने

[01:14:20] लगी। वह भीतर प्रवेश करने लगी। उसे रोका

[01:14:22] गया।

[01:14:24] पुजारी घबराया हुआ आया। उसने कहा कि सुनो

[01:14:27] यहां स्त्रियों का प्रवेश नहीं।

[01:14:30] मीरा ने गौर से उस पुजारी को देखा। और

[01:14:33] उसने कहा मैंने तो सोचा था कि एक ही पुरुष

[01:14:36] है। तो दो पुरुष तुम भी एक पुरुष हो।

[01:14:40] मैंने तो कृष्ण को ही जाना कि एक पुरुष

[01:14:42] बाकी तो सब प्रकृति है।

[01:14:45] पुरुष तो एक ही है। बाकी तो सब गोपियां है

[01:14:50] और कृष्ण के मंदिर में इतने दिन रहकर तुम

[01:14:52] क्या करते रहे? अभी भी तुम पुरुष हो।

[01:14:56] तुम्हें मेरी स्त्री दिखाई पड़ती लेकिन

[01:14:58] मुझे तुम्हारा पुरुष दिखाई नहीं पड़ता।

[01:15:00] रास्ता दो।

[01:15:03] उस दिन जैसे किसी ने नींद से जगाया उस

[01:15:06] पुजारी को।

[01:15:10] रास्ता दे दिया। आंख आंसुओं से भर गई।

[01:15:14] पश्चाताप से भर गई। यह अब तक का समय

[01:15:17] व्यर्थ गवाया।

[01:15:20] किसको रोक रहा था?

[01:15:22] अब मीरा क्या लोकलाज रखे उसे कोई पुरुष

[01:15:25] दिखाई नहीं पड़ता।

[01:15:28] तो घूंघर सरक गया है। कपड़ों का हिसाब

[01:15:31] नहीं रहा है। रास्तों पर नाच रही है। भक्त

[01:15:38] उन्मत्त हो जाता है। होगा ही।

[01:15:42] ऐसा समझो कि छोटी प्याली में सागर समा जाए

[01:15:44] तो प्याली पागल ना होगी तो और क्या होगा?

[01:15:50] बूंद में सागर उतरा आए

[01:15:53] तो बूंद कहां हिसाब रख पाएगी?

[01:15:57] और बूंदों की दुनिया के नियम कैसे बचेंगे।

[01:16:01] फिर तो सागर की उन्मत्तता होगी। फिर तो

[01:16:04] सागर की उन्मत्त लहरें होंगी। फिर बूंद

[01:16:06] चीखे चिल्लाए और कहे कि मेरे तो नियम थे

[01:16:09] व्यवस्था थी। वह सब टूटी जा रही है। वो

[01:16:12] टूटेगी।

[01:16:13] जब भक्त के जीवन में परमात्मा उतरता है।

[01:16:17] जब भक्त जगह देता है, द्वार देता है, हटता

[01:16:20] है मार्ग से और परमात्मा को उतरने देता

[01:16:23] है। तब एक आंधी आती है। तब एक तूफान उठता

[01:16:27] है। फिर जो कभी जाता नहीं फिर भक्त किसी

[01:16:31] और ही जगत में जीता है। फिर जीता नहीं।

[01:16:35] अपनी तरफ से परमात्मा ही उसमें जीता है।

[01:16:43] मोहब्बत में गिरा पा हो ना इतना खौफ रहजन

[01:16:48] से जो इस रस्ते में लुट जाए बड़ी तकदीर

[01:16:52] वाले

[01:16:55] लुटेरों से घबराओ मत प्रेम के मार्ग पर

[01:17:00] लुटेरे सहयोगी हैं जो इस रस्ते में लुट

[01:17:04] जाए बड़े तकदीर वाले

[01:17:09] हम उसे देखा किए जब तक हमें गफलत रही। पड़

[01:17:14] गया आंखों पर पर्दा होश आ जाने के बाद।

[01:17:19] हम उसे देखा किए जब तक हमें गफलत रही। जब

[01:17:23] तक हम बेहोश रहे।

[01:17:25] तब तक उसे देखा किए। पड़ गया आंखों पर

[01:17:29] पर्दा होश आ जाने के बाद।

[01:17:33] और जैसे ही होश आया गणित की दुनिया वापस

[01:17:36] लौटी आंख पर पर्दा पड़ गया।

[01:17:40] उन्मत्तता

[01:17:42] पहला लक्षण भक्त स्तब्ध हो जाता है। आवाक

[01:17:48] ठिटक जाता है।

[01:17:51] अब तक जो गति थी सब रुक जाती है। अब तक जो

[01:17:54] जाना था सब व्यर्थ हो जाता है। अब तक

[01:17:57] जिसको जीवन पहचाना था तो अचानक मृत्यु

[01:18:00] जैसा हो जाता है।

[01:18:02] अब तक जो था

[01:18:05] सब गिर जाता है बिखर जाता है जैसे ताश के

[01:18:08] पत्तों का घर बनाया था

[01:18:11] या जैसे कागज की नाव में सागर के पार जाने

[01:18:14] की आकांक्षा संजोई थी

[01:18:17] सब ठिटक जाता है सब गिर जाता है अवाक

[01:18:22] स्वास भी जैसे रुक जाए

[01:18:31] चुप हो जाता है। बोल खो जाता है। बोली बंद

[01:18:35] हो जाती है।

[01:18:38] समय लगता है।

[01:18:40] वापिस बोली की दुनिया को लौटने में। वापस

[01:18:44] बोलने की योग्यता जुटाने में समय लगता है।

[01:18:48] बुद्ध को ज्ञान हुआ। सात दिन तक चुप बैठे

[01:18:52] रहे। सात दिन तक आवाक

[01:18:55] सब ठहर गया। ठिटक गया देव घबरा गए देवताओं

[01:19:00] में परेशानी हो गई कि कहीं बुध चुप ही ना

[01:19:04] रह जाए जब भी कोई बुध को जब भी कोई

[01:19:07] बुद्धत्व को उपलब्ध होता है तभी यह

[01:19:10] संभावना है कि कहीं वो चुप ही ना रह जाए

[01:19:15] क्योंकि घटना इतनी बड़ी है कहीं बोल सदा

[01:19:19] के लिए ना खो जाए कहीं स्तब्धता उसके जीवन

[01:19:22] की व्यवस्था ना बन जाए

[01:19:25] तो कहते ब्रह्मा

[01:19:27] और देवता बुद्ध के चरणों में आए प्रार्थना

[01:19:30] की कि आप बोले आप कुछ भी बोले और रुकना

[01:19:35] खतरनाक है सदियों तक हम प्रतीक्षा करते

[01:19:39] हैं कोई बुद्धत्व को उपलब्ध हो तो खबर लाए

[01:19:42] उस लोक की देवता भी तरसते हैं आदमी ही

[01:19:46] नहीं

[01:19:52] अल्लाह है अल्लाह

[01:19:55] मन मंजरे बर के जमाल देखती है आंख लब

[01:19:59] खामोश

[01:20:02] आंख तो देखती है ऊंट चुप हो जाते हैं

[01:20:07] आंख तो पहचानती है

[01:20:11] हंठ बोल नहीं पाते

[01:20:14] है ऐसी ही बात जो चुप हो वरना क्या बात

[01:20:18] करनी नहीं आती

[01:20:22] स्तब्धता

[01:20:26] इसे थोड़ा समझे

[01:20:30] योगी

[01:20:31] मौन साधता है। भक्त को मौन आता है।

[01:20:37] योगी स्तब्ध होने की चेष्टा करता है।

[01:20:41] भक्त के ऊपर स्तब्धता बरसती है।

[01:20:45] योगी को जो चेष्टा से मिलता है। भक्त को

[01:20:48] निश्चित प्रसाद रूप मिलता है।

[01:20:53] योगी जो उपाय कर करके पाता है, भक्त सिर्फ

[01:20:55] प्रेम में अपने को खो के पा लेता है।

[01:21:05] जिस भक्ति को जानकर मनुष्य उन्मत्त हो

[01:21:08] जाता है। स्तब्ध शांत हो जाता है।

[01:21:13] और आत्मा राम हो जाता है।

[01:21:17] आत्मा राम शब्द समझने जैसा है।

[01:21:21] अब राम और आत्मा में फासला नहीं रह जाता

[01:21:25] इसलिए एक शब्द बनाया आत्माराम

[01:21:29] अब यह कहना ठीक नहीं कि आत्मा है अब ये भी

[01:21:31] कहना ठीक नहीं कि राम है अब कुछ ऐसा है

[01:21:35] जिसमें दोनों है और दोनों अलग नहीं जुदा

[01:21:38] नहीं आत्मा राम

[01:21:42] उनसे मिलकर मैं उन्हीं में खो गया और जो

[01:21:46] कुछ आगे राज

[01:21:51] उसके आगे फिर कुछ कहा नहीं जा सकता। फिर

[01:21:54] वह रहस्य की बात है, राज है।

[01:21:59] वाक्या यह दोनों आलम में रहेगा यादगार।

[01:22:03] जिंदगानी मैंने हासिल की है मर जाने के

[01:22:06] बाद।

[01:22:09] दोनों लोक में यह बात याद रहेगी।

[01:22:13] वाक्या यह दोनों आलम में रहेगा यादगार

[01:22:16] जिंदगानी मैंने हासिल की है मर जाने के

[01:22:19] बाद। जिन्होंने भी पाई जिंदगी मर के ही

[01:22:23] पाई। जो मरने से डरते रहे वो चूकते ही चले

[01:22:27] गए।

[01:22:29] दो तरह की मौत है। एक जो अपने से आती है

[01:22:33] और एक जो तुम स्वीकार कर लेते हो। जो तुम

[01:22:36] बुला लेते हो। मौत तो अपने से बहुत बार आई

[01:22:40] है और तुम मरे हो।

[01:22:42] फिर पैदा हुए हो। जिस दिन तुम मौत को अपने

[01:22:46] हाथ से स्वीकार कर लोगे स्वेच्छाया उसी

[01:22:49] दिन मृत्यु समाधि बन जाती है।

[01:22:52] जीसस ने कहा है बचाओगे अपने को मिट जाओगे

[01:22:56] मिटा दो बचाने का बस एक ही उपाय है।

[01:23:02] जिंदगानी मैंने हासिल की है मर जाने के

[01:23:05] बाद

[01:23:08] जैसे ही तुम मिटेगी परमात्मा हुआ।

[01:23:12] मेरे पास लोग आते हैं। वह पूछते हैं हम

[01:23:14] परमात्मा को कैसे खोजें? मैं कहता हूं तुम

[01:23:17] कृपा करके मत खोजना।

[01:23:20] नहीं तो परमा बचता ही परमात्मा बचता ही

[01:23:23] चला जाएगा। तुम जहां जहां जाओगे उसे ना

[01:23:25] पाओगे। क्योंकि तुम्हारी मौजूदगी ही

[01:23:29] तुम्हारी आंख पर पर्दा है। परमात्मा नहीं

[01:23:32] छिपा है। यह तो बात ही मत पूछो कि

[01:23:34] परमात्मा को कहां खोजे?

[01:23:41] इतना ही पूछो कि मेरी आंख पर पर्दा क्या

[01:23:43] है कि जो है और दिखाई नहीं पड़ता है।

[01:23:48] तुम छुपे हो अपने ही पर्दे में अपनी ही

[01:23:51] आड़ में परमात्मा कहीं खो नहीं गया है।

[01:23:55] परमात्मा खो नहीं सकता। एक छोटी स्कूल में

[01:23:59] शिक्षक ने बच्चों से पूछा हाथी कहां पाए

[01:24:02] जाते? एक छोटी लड़की ने खड़े होकर कहा

[01:24:04] हाथी पहली बात खोते ही नहीं। इतने बड़े

[01:24:08] होते

[01:24:10] खोएंगे कहां पाने का सवाल नहीं परमात्मा

[01:24:14] कैसे खो जाएगा वही सब कुछ है

[01:24:19] उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं

[01:24:22] तुमने कैसे खोया है यह पूछो यह मत पूछो कि

[01:24:25] परमात्मा कैसे खो गया है

[01:24:29] तजाल से मेरे नाम निश के पूछने वाले वही

[01:24:33] रहता हूं मैं अब तक जहां ढूंढा नहीं तूने

[01:24:38] अपने भीतर

[01:24:40] भ्रम नहीं ढूंढते

[01:24:42] क्योंकि अपने भीतर ढूंढने का एक ही उपाय

[01:24:45] है अहंकार मरे तो तुम अपने भीतर जाओ

[01:24:49] अहंकार द्वार पर खड़ा है अटकाता है। वो

[01:24:52] तुम्हें भीतर नहीं जाने देता। अहंकार की

[01:24:55] परत पिघले तो तुम अपने भीतर जाओ।

[01:24:58] मैं मिटे तो तुम जानो कि तुम कौन हो।

[01:25:02] वहीं रहता हूं मैं अब तक जहां ढूंढा नहीं

[01:25:05] तूने।

[01:25:07] जैसे ही तुम छोड़ते हो मैं

[01:25:11] छोड़ते हो तू मैं तू का जाल और मैं तू का

[01:25:15] भेद मिटता है एक अभेद

[01:25:20] की रोशनी एक अभेद का प्रकाश जहां ना कोई

[01:25:25] सीमा है

[01:25:27] ना जहां कोई अलग-अलग है जहां एक का ही

[01:25:32] विस्तार है

[01:25:35] हम लहरें है उस सागर की, थोड़ा भीतर

[01:25:38] झांके, सागर हमारे भीतर है। हर लहर के

[01:25:41] भीतर सागर है।

[01:25:44] लेकिन लहरें बड़े अहंकार पे चढ़ गई हैं।

[01:25:48] उन्हें यह बात ही नहीं समझ में आती कि

[01:25:51] अपने भीतर झांकने से उसका पता चल सकता है।

[01:25:55] जिससे हम पैदा हुए और जिसमें हम खो

[01:25:58] जाएंगे।

[01:26:00] भक्ति मृत्यु की कला है।

[01:26:05] भक्ति परमात्मा खोजने की कला नहीं अपने को

[01:26:08] खोने की कला है।

[01:26:11] मुझे फिर दोहराने दे भक्ति परमात्मा को

[01:26:15] खोजने की कला नहीं अपने को खोने की कला

[01:26:18] है। खोजने में तो अहंकार बना ही रहता है।

[01:26:22] खोजने वाला बना रहता है। खोना है अपने को

[01:26:26] और जिसने अपने को खोया उसने उसे पाया।

[01:26:30] अपने भीतर ही नहीं फिर सब तरफ वही मालूम

[01:26:33] पड़ता है। फिर हर पत्ती में उसी की

[01:26:36] हरियाली है।

[01:26:39] हर हवा के झोंके में उसी की ताज की है।

[01:26:44] चांद तारों में वही तुम्हारी तरफ झांकता

[01:26:47] है। और तुम्हारे भीतर भी वही चांद तारों

[01:26:51] की तरफ झांकता है।

[01:26:55] एक बार पर्दा हटे

[01:27:00] सुबह फूटी

[01:27:02] तो आसमान पर तेरे रंगे रुक्सार की फुहार

[01:27:06] गिरी

[01:27:08] रात छाई तो रूहे आलम पर तेरी जुल्फों की

[01:27:13] आबसार गिरी

[01:27:17] उसी की जुल्फें हैं रात

[01:27:21] ढक लेती है गहरे अंधेरे में तुम्हें है।

[01:27:24] उसी का रंग रूप है। उसी की बहार है।

[01:27:29] उसी के गीत है। उसी की हरियाली है। उसी का

[01:27:34] जन्म है। उसी की मृत्यु है।

[01:27:37] तुमने व्यर्थ ही अपने को बीच में खड़ा कर

[01:27:40] लिया। अपने को बीच में खड़ा करने के कारण

[01:27:43] परमात्मा खो गया है। और परमात्मा को तुम

[01:27:47] जब तक ना जान लो तब तक तुम अपनी ऊंचाई और

[01:27:50] अपनी गहराई से वंचित रहोगे। परमात्मा यानी

[01:27:53] तुम्हारी आखिरी ऊंचाई परमात्मा यानी

[01:27:56] तुम्हारी आखिरी गहराई जब तक तुम उसे ना

[01:27:59] जान लो तब तक तुम अपनी ही ऊंचाई और गहराई

[01:28:03] से वंचित रहोगे उस मनुष्य से ज्यादा

[01:28:06] दरिद्र और कोई भी नहीं जिसके जीवन में

[01:28:08] परमात्मा का भाव खो गया है।

[01:28:16] जिसके जीवन में परमात्मा की तरफ उठने की

[01:28:18] आकांक्षा खो गई है।

[01:28:22] जो आदमी होने से तृप्त हो गया उस आदमी से

[01:28:25] दरिद्र और कोई भी नहीं।

[01:28:28] नित्य ने कहा है अभाग्य होंगे वे दिन जब

[01:28:32] आदमी की प्रत्यंछा पर परमात्मा की तरफ

[01:28:35] जाने का तीर ना चढ़ेगा।

[01:28:38] पर बहुत से ऐसे लोग हैं जिनकी प्रत्यक्षा

[01:28:41] पर परमात्मा की तरफ जाने वाला तीर कभी भी

[01:28:44] नहीं चढ़ता। तब वे छिछले रह जाते तब वे

[01:28:48] उथले रह जाते तब उन्हें पता नहीं चल पाता

[01:28:51] कि जो गहराई बिल्कुल उनके ही पैरों के

[01:28:54] नीचे छिपी थी और सदा उपलब्ध थी बस जरा

[01:28:57] डूबने की बात थी और जो ऊंचाई सदा उनके ही

[01:29:00] सिर पर थी आसमान की तरह फैली थी जरा आंखें

[01:29:03] ऊपर उठाने की बात थी वो भूल ही जाते हैं

[01:29:08] आदमी ही हो जाने से तृप्त मत हो जाना

[01:29:11] उससे बड़ा कोई दुर्भाग्य नहीं

[01:29:15] ख्याल जिसमें है पर तब जमाल का तेरे उस एक

[01:29:20] ख्याल की रफत किसी को क्या मालूम

[01:29:24] और जिसके हृदय में तेरे सौंदर्य का एक

[01:29:26] छोटा सा ख्याल भी है।

[01:29:30] परमात्मा के अनंत सौंदर्य का थोड़ा सा

[01:29:32] ख्याल भी है। खयाल जिसमें है परतब जमाल का

[01:29:36] तेरे उस एक ख्याल की रफ़ किसी को क्या

[01:29:39] मालूम उस एक छोटे से विचार की गहराई किसी

[01:29:43] को क्या मालूम

[01:29:46] परमात्मा के ख्याल

[01:29:49] की गहराई और ऊंचाई

[01:29:52] वही तुम्हारा विस्तार है तुम्हारा विकास

[01:29:55] है

[01:29:58] इस सदी की सबसे बड़ी तकलीफ यही है

[01:30:03] कि उसके सौंदर्य का बोध खो गया है

[01:30:08] और हम लाख उपाय करते हैं सिद्ध करने के कि

[01:30:10] वो नहीं है और हमें पता नहीं कि जितना हम

[01:30:14] सिद्ध कर लेते हैं कि वो नहीं है उतना ही

[01:30:17] हम अपनी ही ऊंचाइयों और गहराइयों से वंचित

[01:30:20] हुए जा रहे हैं।

[01:30:24] परमात्मा को बुलाने का अर्थ अपने को

[01:30:26] बुलाना है।

[01:30:29] परमात्मा को भूल जाने का अर्थ

[01:30:33] अपने को भटका लेना है।

[01:30:36] फिर दिशा खो जाती है। फिर तुम कहीं

[01:30:39] पहुंचते मालूम नहीं पड़ते। फिर तुम कोलू

[01:30:41] के बैल हो जाते हो। जो चक्कर लगाते रहते

[01:30:44] हो। आंखें खोलो।

[01:30:49] थोड़े हृदय को

[01:30:51] अपने से ऊपर जाने की सुविधा दो।

[01:30:55] काम को प्रेम बनाओ। प्रेम को भक्ति बनने

[01:30:58] दो।

[01:31:00] परमात्मा से पहले तृप्त होना ही मत पीड़ा

[01:31:05] होगी बहुत विरह होगा बहुत आंसू पड़ेंगे

[01:31:09] मार्ग में पर घबराना मत

[01:31:13] क्योंकि जो मिलने वाला है

[01:31:16] उसका कोई भी मूल्य नहीं हम कुछ भी

[01:31:21] करें जिस दिन मिलेगा उस दिन हम जानेंगे जो

[01:31:24] हमने किया था वो ना कुछ था

[01:31:28] तुम्हारे एक एक एक आंसू पर हजार फूल

[01:31:30] खिलेंगे

[01:31:34] और तुम्हारी एक एक पीड़ा

[01:31:39] हजार मंदिरों का द्वार बन जाएगी

[01:31:46] घबराना मत

[01:31:48] जहां भक्तों के पैर पड़े वहां काबा बन

[01:31:51] जाते

[01:31:54] आज इतना ही
